April 29, 2025

Mangal Gitam:श्री मंगल गीतम

Mangal Gitam:मंगल गीतम (श्री मंगल गीतम): जब किसी जातक की कुंडली में मंगल गोचर में या गोचर में खराब प्रभाव डाल रहा हो या मंगल की स्थिति और जातकों का दखल खराब हो तो दिए गए मंगल गीतम का प्रतिदिन जाप करने से मंगल से संबंधित समस्या से मुक्ति मिलती है। मंगल गीतम का प्रतिदिन पाठ करने से मंगल अपना बुरा प्रभाव छोड़कर शुभ फल देने लगता है। अगर आप पर कर्ज या ऋण का बोझ बढ़ गया है और आप चाहकर भी ऋण नहीं ले पा रहे हैं तो अगर आप नियमित रूप से मंगल गीतम का पाठ करेंगे तो आपका कर्ज धीरे-धीरे उतर जाएगा। जैसा कि आप जानते हैं कि मंगल का संबंध हनुमान जी से है और हनुमान जी सर्वशक्ति प्रदाता हैं। इस श्लोक को हनुमान जी की पूजा के रूप में भी जाना जाता है। इस महंगे युग में एक बहुत ही आम समस्या है पैसे की बचत करने की समस्या और इसलिए अधिकतम लोग अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। Mangal Gitam धन इस भौतिक संसार का देवता है और इसलिए अपनी जरूरतों को पूरा करने और खुद को सफल बनाने के लिए इसका होना बहुत जरूरी है। इस युग में प्रतिस्पर्धा, महँगाई, अवांछित खर्चों के कारण धन कमाना और उसे बचाना बहुत कठिन है। Mangal Gitam:मंगल गीतम भगवान मंगल/मंगल की प्रार्थना करने का एक विशेष तरीका है जो शक्ति, संपत्ति, समृद्धि, साहस, क्रोध और सफलता पर नियंत्रण रखता है। ऐसी मान्यता है कि प्रतिदिन भक्तिपूर्वक मंगल गीतम का पाठ करने से सफलता के मार्ग खुल सकते हैं। मंगल देवी पृथ्वी के पुत्र हैं और व्यक्ति को कर्ज मुक्त करने में सक्षम हैं। Mangal Gitam उनका आसन स्थिर है और उनका शरीर शक्तिशाली है और वे कर्तव्यों को पूरा करने में आने वाली सभी बाधाओं को जड़ से खत्म करने में भी सक्षम हैं। Mangal Gitam:मंगल गीतम के लाभ: मंगल गीतम का उपयोग करके प्रतिदिन मंगल पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिल सकती है।भगवान मंगल की कृपा से कमाई में रुकावटें आसानी से दूर हो सकती हैं।व्यक्ति काम करने और सफलतापूर्वक कमाने की शक्ति विकसित कर सकता है।इस मंगल गीतम का प्रतिदिन पाठ करने से व्यक्ति संतोषजनक मौद्रिक शक्ति प्राप्त करके सफल जीवन जी सकता है।यह कुज दोष या मांगलिक दोष को कम करने में मदद कर सकता है। Mangal Gitam:इस गीत का पाठ किसे करना चाहिए: जिन व्यक्तियों की कुंडली में मांगलिक दोष है, जो गरीबी, जुनून और अन्य प्रकार के अवसाद से पीड़ित हैं, उन्हें इस मंगल गीत का पाठ अवश्य करना चाहिए । श्री मंगल गीतम हिंदी पाठ:Mangal Gitam in Hindi श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए ।कलितललितवनमाल जय जय देव हरे ।। 1 ।। दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए ।मुनिजनमानsहंस जय जय देव हरे ।। 2 ।। कालियविषधरगञ्जन जनरञ्जन ए ।यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ।। 3 ।। मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए ।सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे ।। 4 ।। अमलकमलदललोचन भवमोचन ए ।त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे ।। 5 ।। जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए ।समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे ।। 6 ।। अभिनवजलधरसुंदर धृतमंदर ए ।श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे ।। 7 ।। तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए ।कुरु कुशलं प्रणतेषु जय जय देव हरे ।। 8 ।। श्रीजयदेवकवेरूदितमिदं कुरुते मुदम् ।मंगलमञ्जुलगीतं जय जय देव हरे ।। 9 ।। राधेकृष्ण हरि गोविन्द गोपालहरि वसुदेव बाल भज नन्द दुलालजय जय देव हरे ।। 10 ।। ।। इति श्री मंगल गीतम संपूर्णम्‌ ।।

Mangal Gitam:श्री मंगल गीतम Read More »

भारत भूमातृ स्तोत्र:Bharat Bhumatra Stotram

Bharat Bhumatra Stotra in Hindi:भारत भूमातृ स्तोत्र हिंदी पाठ वन्दे मातरमव्यक्तां व्यक्तां च जननीं पराम् ।दीनोहं बालक: कांक्षे सेवां जन्मनि जन्मनि ।। 1 ।। सागरालिंगिता लक्ष्मीं जगज्जनककन्यकाम् ।स्थितां हिमनगस्यांके पार्वतीमपरां भजे ।। 2 ।। शुभ्रं धर्मध्वजं मातु: किं वा राशीकृतं यश: ।रौप्यं वा मुकुटं दिव्यं वन्देऽहं तं हिमालयम् ।। 3 ।। जाह्नवीयमुनासिन्धुब्रह्मपुत्रशतद्रुभि: ।भूदेवीं पंचधाराभि सततं साभिषिचंति ।। 4 ।। नगाधिपं धारयंती मस्तके रत्नमद्वयम् ।काश्मीरं च ललाटे भ्रूमध्ये नेपालिकां शुभाम् ।। 5 ।। Bharat Bhumatra Stotra नर्मदातापतीविंध्यसप्तपीठकमेखलाम् ।पूर्वापराचलोरूँ च मलयं पादपीठके ।मध्यदेशोदरे गुप्तानक्षयान् धनसंचयान् ।। 6 ।। असुराणां पुरी लंका दासी यंच्चरणयो: कृता । तां देवी भारतीं वन्दे मातरं विश्वपूजिताम् ।। 7 ।। दृष्टा चैवोपनिषदां गीतशास्त्रप्रवर्तक: ।षड्दर्शनप्रवक्ता च भगवान्पाणिनिर्मुनि: ।। 8 ।। वाल्मीकिश्र्च तथा व्यास: कालिदासो महाकवि: ।आर्यभट्टश्र्च भरत: शंकरोऽद्वैतकेसरी ।। 9 ।। भीष्मरामार्जुना वीरा नृपौ रामयुधिष्ठिरौ ।सावित्री द्रोपदी सीता दमयंती च तारका ।। 10 ।। महाधान्यद्वितीयानि रत्नान्येतानि भूतले ।जननी भारती तेषां रत्नगर्भा कथं न सा ।। 11 ।। वसुंधरा रत्नगर्भा रसा विश्र्वंभरा क्षमा ।सर्वसहा स्थिरा चैव भारती भूसुकन्यका ।। 12 ।। रत्नाकर: स्वयं भक्त्या मुक्तो पायनपूर्वकम् ।चरणान्क्षालयत्यस्या अंतद्रश्र्च दिवानिशम् ।। 13 ।।  कैलासद्वारकाधीशौ रामेश्वरपुरीश्र्वरौ ।द्वारपाला वभूबुश्र्च सौभाग्यं मातुरद्भुतम् ।। 14 ।। पोषयन्ति सदा मातु: पर्वतस्तनमण्डलात् ।नि:सृहाश्र्च पयोधारा: संततीनां परंपरा ।। 15 ।। पुत्रवत्सलता मातुरगाथा हरिणा स्वयम् ।अवतीर्योदरे सोढं गर्भदुखं पुन: पुन: ।। 16 ।। Bharat Bhumatra Stotra मरणे जन्मकाले च मुमूर्षुर्नवबालक: ।त्वदंके चैव संशेते अहो वत्सलता तव ।। 17 ।। पद्मालया त्वमेवासि त्वमेव च सरस्वती ।अन्नपूर्णा त्वमेवासि त्वमेव च शिवा सती ।। 18 ।। त्वदृक्षा: कल्पवृक्षाश्र्च चिंतामणिशिला: शिला: ।त्वद्वनं नन्दनं साक्षात्साक्षात्वं स्वर्गदेवता ।। 19 ।। प्रतिजन्मनि मे चित्तं वित्तं देहश्र्च संतति: ।त्वत्सेवानिरता भूयुर्माता त्वं करुणामयी ।। 20 ।। न मे वांछाऽस्ति यशसि विद्वत्तवे न च वा सुखे ।प्रभुत्वं नैव वा स्वर्गे मोक्षेत्यानंददायके ।। 21 ।। परं च भारते जनम मानवस्य च वा पशो: ।विहंगस्य च वा जन्तोर्व्रक्षपाषाणयोरपि ।। 22 ।। निरंतरं भवतु मे मातृ सेवांशभाग्यभाक् ।एषैव वांछा ह्रदये साक्षी सर्वात्मक: प्रभु: ।। 23 ।। Bharat Bhumatra Stotra।। इति भारत भूमातृ स्तोत्र संपूर्णम्‌ ।।

भारत भूमातृ स्तोत्र:Bharat Bhumatra Stotram Read More »

अन्नपूर्णा मंदिर:अयोध्या, उत्तरप्रदेश, भारत

3200 वर्ग फुट में फैला अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। अन्नपूर्णा मंदिर:भारत में माता अन्नपूर्णा के कई सारे मंदिर हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर में बने अन्नपूर्णा मंदिर की अपनी अलग पहचान है। 3200 वर्ग फुट में फैला अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर की ऊंचाई 100 फुट से भी अधिक है। यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। लोग मान्यता अनुसार यहां मांगने वालो की हर मुराद पूरी होती है। मंदिर न केवल धार्मिक आगंतुकों के लिए है, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो प्राचीन भारतीय कला और हिंदू धर्म के वर्चस्व के बारे में जानना चाहते हैं। Annapurna Temple:मंदिर का इतिहास अन्नपूर्णा मंदिर की स्थापना 63 साल पहले यानी 1959 में हुई। इसकी स्थापना ब्रह्मलीन स्वामी प्रभानंद गिरी महाराज ने की थी। मंदिर से मिली जानकारी के मुताबिक महाराज का जन्म 14 जनवरी 1911 को आंध्रप्रदेश के नंदी कुटकुट स्थान पर हुआ। 15 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ वैराग्य लिया। बाद में स्वामी प्रभानंद गिरी जी उज्जैन होते हुए गुजरात पहुंचे जहां प्रसिद्ध देव स्थल गिरनार पर्वत पर कठोर तपस्या की, वहीं उन्हें भगवती अम्बिका का दर्शन हुआ और वहां से वे इंदौर आ गए। 1955 में इंदौर आने के बाद वे रणजीत हनुमान मंदिर क्षेत्र में निवास करने लगे। अन्नपूर्णा मंदिर में वट वृक्ष के नीचे बैठकर मां अन्नपूर्णा की भक्ति-साधना में लग गए। यहीं आपने अन्नपूर्णा मंदिर बनाने का संकल्प लिया और भक्तों के सहयोग से 22 फरवरी 1959 को समारोहपूर्वक मां अन्नपूर्णा का श्री विग्रह स्थापित कर प्राण-प्रतिष्ठा की। मंदिर का महत्व मां अन्‍नपूर्णा को भोजन की देवी माना जाता है। मंदिर की अद्भुत स्‍थापत्‍य शैली, विश्‍व प्रसिद्ध मदुरै के मीनाक्षी मंदिर से प्रेरित लगती है। बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने के लिए ट्रस्ट अन्नपूर्णा विद्यालय, अन्नपूर्णा वेद वेदांग विद्यालय चलाया जाता है। साथ ही आसपास के गरीब बच्चों का 12वीं तक की शिक्षा का शर्च भी मंदिर द्वारा उठाया जाता है। अन्नपूर्णा मंदिर में विराजित तीनों देवियों का दिनभर में तीन बार श्रृंगार किया जाता है यहां देवियों का श्रृंगार कराने के लिए आपको मंदिर के पुजारी से या ऑफिस में संपर्क करना होता है। उनके द्वारा फिर दिन आपको बताया जाता है। जिस दिन श्रृंगार करना होता है उसके एक दिन पहले आपको श्रृंगार की सामग्री और साड़ी देना होती है। मंदिर की वास्तुकला अन्नपूर्णा मंदिर इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर को 9 वीं शताब्दी में इंडो-आर्यन और द्रविड़ स्थापत्य शैली के संयोजन का उपयोग करके बनाया गया था। यह मंदिर में हिंदू देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है। इसमें मां अन्नपूर्णा की तीन फुट ऊंची संगमरमर की मूर्ति है। मंदिर की अविश्वसनीय वास्तुकला शैली मदुरई के विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर से प्रभावित है। मंदिर का प्रवेश द्वार बहुत प्रभावशाली है। मंदिर के मुख्य द्वार पर चार बड़े हाथियों की मूर्ति है। मंदिर परिसर के भीतर अन्नपूर्णा, शिव, हनुमान और काल भैरव भगवान को समर्पित मंदिर भी हैं। मंदिर की बाहरी दीवारें अभी भी रंगीन पौराणिक चित्रों में शामिल हैं। मंदिर की दीवारों पर कृष्ण लीला का चित्रण है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM पहला श्रृंगार 05:00 AM – 05:00 AM सुबह की आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM दूसरा श्रृंगार 11:00 AM – 11:00 AM भोग का समय 12:00 PM – 12:00 PM दोपहर में मंदिर खुलने का समय 02:00 PM – 10:00 PM तीसरा श्रृंगार 05:00 PM – 05:00 PM शाम की आरती 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद अन्नपूर्णा मंदिर में भक्त मां को ड्राई फ्रूट्स, फल, लड्डू और खीर का भोग चढ़ाते हैं। श्रद्धालु माता को अन्न भी चढ़ाते हैं।

अन्नपूर्णा मंदिर:अयोध्या, उत्तरप्रदेश, भारत Read More »

गायत्री मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत

मां गायत्री को समर्पित यह शक्तिपीठ भक्तों की धार्मिक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। गायत्री मंदिर:मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के महाराणा प्रताप नगर में स्थित है अद्भुत धार्मिक व आध्यात्मिक स्थल गायत्री मंदिर। यह गायत्री शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध है। मां गायत्री को समर्पित यह शक्तिपीठ भक्तों की धार्मिक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। भोपाल शहर में व्यायाम के लिए यह मंदिर मुख्य केंद्र माना जाता है। आध्यात्मिक शांति के लिए रोजाना यहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। मंदिर परिसर में एक्यूप्रेशर पार्क बना है, जहां कांटेदार ट्रेक पर चलने से शरीर स्वस्थ्य व निरोगी रहता है। शांतिकुंज हरिद्वार की तर्ज पर इस पार्क की शुरुआत की गई। गायत्री मंदिर में लोग विवाह व उपनयन संस्कार भी कराने आते हैं। Gayatri Mandir का इतिहास गायत्री मंदिर के इतिहास पर नजर डालें तो साल 1980 में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा मंदिर में मां गायत्री की प्राण प्रतिष्ठा की गई। तभी से मंदिर में मां गायत्री की पूजा व हवन संस्कार का कार्य किया जा रहा है। शांतिकुंज हरिद्वार के संस्थापक पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी ने ही गायत्री शक्तिपीठ की स्थापना की थी। इस शक्तिपीठ को बनाने का मुख्य उद्देश्य था कि हरिद्वार की शांतिकुंज आश्रम में होने वाली सभी गतिविधियों को देश के हर छोटे-बड़े गांव शहर कस्बों तक पहुंचाया जा सके। सभी जगहों पर हरिद्वार की तरह धार्मिक आयोजन किया जा सके। मंदिर का महत्व गायत्री मंदिर परिसर में लगे राशि वृक्षों की परिक्रमा से ग्रहों की स्थिति ठीक हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार बुद्ध पूर्णिमा के दिन गायत्री यज्ञ करने से अश्वमेध जैसा फल मिलता है। ऐसा माना जाता है की जो भी भक्त इस मंदिर में गायत्री यज्ञ करता है उसके जीवन से सभी कष्ट मिट हाते हैं। मंदिर की वास्तुकला चारों तरफ प्राकृतिक चीजों से घिरा गायत्री मंदिर देखने में काफी सुंदर लगता है। मंदिर में मां गायत्री की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर के पूरे परिसर में दीवारों पर गायत्री मंत्र व अच्छे विचार लिखे गए हैं, जिसे अगर मनुष्य अपना ले तो उसका जीवन सफल बन सकता है। मंदिर में एक बड़ी गौशाला भी है, यहां आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन के साथ गायों को घास खिलाकर परमसुख की अनुभूति करते हैं। मंदिर परिसर में पुस्तक प्रदर्शनी लगती है, जहां धार्मिक, अध्यात्मिक व साहित्य की पुस्तकें मिलती हैं। मंदिर परिसर में एक्यूप्रेशर पार्क सेंटर, स्वास्थ्य भवन सहित अन्य स्वास्थ्य संबंधी भवन बनाए गए हैं। पार्क में नक्षत्र व राशि वाटिका भी है। यानी हर राशि के अनुसार अलग-अलग वृक्ष लगे हैं। पार्क के अंदर ही मां भगवती प्राकृतिक रसाहार केंद्र भी है, जहां आंवला, एलोवेरा, ज्वारे का रस सहित अन्य प्रकार के जूस मिलते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद हैं। एक्यूप्रेशर ट्रेक के पास बहुत से औषधिय पौधें भी लगे हैं, जैसे: आंवला, तुलसी, एलोवेरा, नीम आदि। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM सुबह मां गायत्री की आरती का समय 05:30 AM – 06:00 AM शाम को मां गायत्री की आरती का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद गायत्री मंदिर में किसी प्रकार का कोई प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता है। मंदिर परिसर में बने हवन कुंड में हवन के लिए नारियल, घी, शहद सहित अन्य हवन सामग्री लगती है।

गायत्री मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत Read More »

How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:कैसे शुरू हुए कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष,जानिए इसके पीछे की पौराणिक मान्यता

How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:हिन्दू कैलेंडर यानी पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है। चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है। दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं। kaise shuru hue krishna and shukla paksha:हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने में 30 दिन होते हैं जिनकी गणना सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर की जाती है. इसी पंचांग के आधार पर भारत के अधिकतर राज्यों में व्रत और त्योहार आदि मनाए जाते हैं. पंचाग के मुताबिक पूर्णिमा के बाद यानी कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नया महीना शुरू होता है. How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: चंद्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही हर महीने को कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के आधार पर दो भागों में बांटा जाता है. इसमें 15 दिनों के एक पक्ष को कृष्ण पक्ष, तो बाकी के 15 दिनों का दूसरा शुक्ल पक्ष कहा जाता है. How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:हिन्दू कैलेंडर यानी पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है। चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है। दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:ऐसे होती है कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की गणना पूर्णिमा से अमावस्या के बीच के 15 दिनों को कृष्ण पक्ष कहा जाता है. वहीं, दूसरी तरफ अमावस्या से पूर्णिमा तक की अवधि को शुक्ल पक्ष कहा गया है. अमावस्या के अगले दिन से ही चंद्रमा का आकार बढ़ना शुरू हो जाता है जिससे अंधेरे में भी चंद्रमा की काफी तेज रोशनी दिखाई देती है. अमावस्या के बाद चंद्रमा अपने पूरे तेज पर रहता है. इसलिए शुक्ल पक्ष के इन 15 दिनों के दौरान कोई भी नया काम करना बेहद शुभ माना जाता है. आइए पहले जानते हैं कि कैसे हुई थी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की शुरुआत. What is the difference between Krishna Ekadashi and Shukla Ekadashi? शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष से जुड़ी कथा This is how the Krishna Paksha started:इस तरह हुई कृष्णपक्ष की शुरुआत How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस बेटियों का विवाह चंद्रमा से कर दिया। ये सत्ताईस बेटियां सत्ताईस स्त्री नक्षत्र हैं और अभिजीत नामक एक पुरुष नक्षत्र भी है। लेकिन चंद्र केवल रोहिणी से प्यार करते थे। ऐसे में बाकी स्त्री नक्षत्रों ने अपने पिता से शिकायत की कि चंद्र उनके साथ पति का कर्तव्य नहीं निभाते। दक्ष प्रजापति के डांटने के बाद भी चंद्र ने रोहिणी का साथ नहीं छोड़ा और बाकी पत्नियों की अवहेलना करते गए। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: तब चंद्र पर क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने उन्हें क्षय रोग का शाप दिया। क्षय रोग के कारण सोम या चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे कम होता गया। कृष्ण पक्ष की शुरुआत यहीं से हुई।  This is how Shuklapaksha started:ऐसे शुरू हुआ शुक्लपक्ष How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:कहते हैं कि क्षय रोग से चंद्र का अंत निकट आता गया। वे ब्रह्मा के पास गए और उनसे मदद मांगी। तब ब्रह्मा और इंद्र ने चंद्र से शिवजी की आराधना करने को कहा। शिवजी की आराधना करने के बाद शिवजी ने चंद्र को अपनी जटा में जगह दी। ऐसा करने से चंद्र का तेज फिर से लौटने लगा। इससे शुक्ल पक्ष का निर्माण हुआ। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: चूंकि दक्ष ‘प्रजापति’ थे। चंद्र उनके शाप से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकते थे। शाप में केवल बदलाव आ सकता था। इसलिए चंद्र को बारी-बारी से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में जाना पड़ता है। दक्ष ने कृष्ण पक्ष का निर्माण किया और शिवजी ने शुक्ल पक्ष का।

How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:कैसे शुरू हुए कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष,जानिए इसके पीछे की पौराणिक मान्यता Read More »

Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai:सभी एकादशियों में बड़ी एकादशी कौन – कौन सी होती हैं,सबसे शुभ माना जाता है इन चार एकादशी को….

Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai:हर माह आने वाली एकादशी की दो तिथियां भगवान विष्णु की अराधना के लिए समर्पित होती हैं. एक वर्ष में कुल 24 एकादशी आती हैं लेकिन उनमें से कुछ एकादशी बहुत खास मानी जाती हैं. Most Important Ekadashi:हर माह आने वाली एकादशी की दो तिथियां भगवान विष्णु की अराधना के लिए समर्पित होती हैं. इस दिन भक्त व्रत रखकर विधि-विधान से भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा करते हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai मान्यता है कि एकादशी का व्रत रखने और भगवान विष्णु की अराधना से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और सांसारिक कष्ट मिट जाते हैं. एक वर्ष में कुल 24 एकादशी (Ekadashi) आती हैं लेकिन उनमें से कुछ एकादशी बहुत खास होती हैं. आइए जानते हैं कौन सी 4 एकादशी का महत्व होता है सबसे अधिक. Ekadashi | हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में महत्वपूर्ण होता हैं और साल में चौबीस एकादशी आती हैं यानि कि हर महीने में दो एकादशी होती हैं एक कृष्ण पक्ष की और दूसरी शुक्ल पक्ष की लेकिन जिस साल अधिक मास या फिर मलमास आती हैं तो एकादशी व्रत की संख्या दो बढ़ जाया करती हैं अर्थात 24 एकादशी की जगह 26 एकादशी होती हैं अधिक मास में परमा और पद्मिनी एकादशी नाम की होती हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai सभी एकादशी व्रत भगवान विष्णु की पूजा अर्चना के लिए समर्पित होती हैं मान्यता है कि जो भी एकादशी व्रत को सच्चे मन से करता है उसे उसके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती हैं और इस लोक में सभी सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद स्वर्ग में स्थान प्राप्त करता है कहा जाता हैं कि एकादशी व्रत के प्रताप से पितरों को मोक्ष मिलता हैं. हर एकादशी का अपना विशेष महत्व होता लेकिन सभी एकादशियों में से चार एकादशियों ऐसी है जिनको विशेष महत्व माना गया है और वे सभी एकादशी बड़ी एकादशी कहलाती हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai :आइए जानते हैं साल की चार बड़ी एकादशी और उनके महत्व को…. 1) आमलकी एकादशी : Amalaki Ekadashi Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai आमलकी एकादशी फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है इस एकादशी को आंवला एकादशी और रंगभरनी एकादशी भी कहा जाता हैं. आमलकी एकादशी को सारे एकादशियों में श्रेष्ठ माना जाता हैं क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु के साथ आंवले वृक्ष की भी विधिवत पूजन किया जाता हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai यह एकादशी साल की एक मात्र ऐसी एकादशी है जिसमें भगवान विष्णु के अलावा भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा होती हैं मान्यता है कि इस एकादशी के दिन भगवान शंकर के गण शंकर पार्वती के संग गुलाल की होली खेलते हैं इसी लिए इस एकादशी को रंगभरनी एकादशी भी कहा जाता हैं. आमलकी एकादशी का महत्व :Importance of Amalaki Ekadashi Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai धार्मिक मान्यता हैं कि आमलकी एकादशी व्रत को करने से सभी पाप धुल जाते हैं और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु को आंवला फल को चढ़ाने से भक्त को अच्छे स्वास्थ्य, धन और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. शास्त्रों के अनुसार जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्माजी का जन्म हुआ तब उसी समय भगवान विष्णु ने आंवले वृक्ष को आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया जिसके हर भाग में ईश्वर का स्थान माना जाता हैं. 2) पापमोचनी एकादशी : Papmochani Ekadashi पापमोचनी एकादशी चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती हैं और धार्मिक मान्यता के अनुसार पापमोचनी एकादशी का विशेष महत्व है. पापमोचनी दो शब्द पाप और मोचनी से मिलकर बना है Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai जिसमें पाप का अर्थ पाप या फिर दुष्कर्म और मोचनी का अर्थ है हटाने वाला यानि कि पापमोचनी एकादशी का व्रत को करने वालों को उनके पापों से मुक्ति मिल जाती हैं. पापमोचनी एकादशी का महत्व : Importance of Papamochani Ekadashi: पापमोचनी एकादशी का व्रत रखने से मन की चंचलता खत्म होने के साथ ही धन और आरोग्य की प्राप्ति होती हैं.पुराणों के अनुसार इस एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के सारे कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai तो वहीं पापमोचनी एकादशी व्रत से जाने अनजाने में कि गई पाप और गलतियों से छुटकारा मिल जाता हैं और उसे सहस्त्र गोदान यानि हजार गायों के बराबर दान का फल मिलता हैं मान्यता है कि ब्रह्म हत्या, स्वर्ण चोरी, सुरापान और गुरुपत्नी गमन जैसे महापाप भी पापमोचनी एकादशी व्रत को करने से दूर हो जाते हैं. 3) निर्जला एकादशी : Nirjala Ekadashi निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती हैं. इस एकादशी में निर्जल व्रत यानि कि बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती हैं. निर्जला एकादशी को भीम एकादशी भी कहा जाता हैं. मान्यता है कि जो कोई भी यह व्रत रखता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने के साथ ही यश, वैभव और सुख की प्राप्ति होती हैं. निर्जला एकादशी का महत्व : Importance of Nirjala Ekadashi: निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन और पवित्र व्रतों में से एक है इस एकादशी के बारे में मान्यता है कि अगर पूरे साल एक भी एकादशी का व्रत नहीं करते हैं और जो निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai तो उनकों संपूर्ण एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता हैं. पद्म पुराण के अनुसार इस व्रत को करने से दीर्घायु और मोक्ष मिलता है इस व्रत को अन्न और जल त्याग करके व्रत करना पड़ता हैं. 4) देवोत्थान एकादशी : Devotthan Ekadashi देवोत्थान एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है इस एकादशी को देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देव शयन करते हैं और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को उठते हैं इसीलिए इसे देवोत्थान एकादशी या देवउठनी एकादशी कहते हैं. इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती

Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai:सभी एकादशियों में बड़ी एकादशी कौन – कौन सी होती हैं,सबसे शुभ माना जाता है इन चार एकादशी को…. Read More »