2023

गंगा जन्म की कथा 

ऋषि विश्वामित्र ने इस प्रकार कथा सुनाना आरम्भ किया, “पर्वतराज हिमालय की अत्यंत रूपवती, लावण्यमयी एवं सर्वगुण सम्पन्न दो कन्याएँ थीं। सुमेरु पर्वत की पुत्री मैना इन कन्याओं की माता थीं। हिमालय की बड़ी पुत्री का नाम गंगा तथा छोटी पुत्री का नाम उमा था। गंगा अत्यन्त प्रभावशाली और असाधारण दैवी गुणों से सम्पन्न थी। वामन पुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन रूप में अपना एक पैर आकाश की ओर उठाया तो तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के चरण धोकर जल को अपने कमंडल में भर लिया। इस जल के तेज से ब्रह्मा जी के कमंडल में गंगा का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने गंगा हिमालय को सौंप दिया इस तरह देवी पार्वती और गंगा दोनों बहन हुई। वह किसी बन्धन को स्वीकार न कर मनमाने मार्गों का अनुसरण करती थी। उसकी इस असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर देवता लोग विश्व के क्याण की दृष्टि से उसे हिमालय से माँग कर ले गये। पर्वतराज की दूसरी कन्या उमा बड़ी तपस्विनी थी। उसने कठोर एवं असाधारण तपस्या करके महादेव जी को वर के रूप में प्राप्त किया।” वत्स राम! तुम्हारी ही अयोध्यापुरी में सगर नाम के एक राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। सगर की पटरानी केशिनी विदर्भ प्रान्त के राजा की पुत्री थी। केशिनी सुन्दर, धर्मात्मा और सत्यपरायण थी। सगर की दूसरी रानी का नाम सुमति थी जो राजा अरिष्टनेमि की कन्या थी। दोनों रानियों को लेकर महाराज सगर हिमालय के भृगुप्रस्रवण नामक प्रान्त में जाकर पुत्र प्राप्ति के लिये तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उन्हें वर दिया कि तुम्हें बहुत से पुत्रों की प्राप्ति होगी। दोनों रानियों में से एक का केवल एक ही पुत्र होगा जो कि वंश को बढ़ायेगा और दूसरी के साठ हजार पुत्र होंगे। कौन सी रानी कितने पुत्र चाहती है इसका निर्णय वे स्वयं आपस में मिलकर कर लें। केशिनी ने वंश को बढ़ाने वाले एक पुत्र की कामना की और गरुड़ की बहन सुमति ने साठ हजार बलवान पुत्रों की।विश्वामित्र के इतना कहने पर राम ने कहा, “गे भगवन्! जब गंगा को देवता लोग सुरलोक ले गये तो वह पृथ्वी पर कैसे अवतरित हुई और गंगा को त्रिपथगा क्यों कहते हैं?” इस पर ऋषि विश्वामित्र ने बताया, “महादेव जी का विवाह तो उमा के साथ हो गया था किन्तु सौ वर्ष तक भी उनके किसी सन्तान की उत्पत्ति नहीं हुई। एक बार महादेव जी के मन में सन्तान उत्पन्न करने का विचार आया। जब उनके इस विचार की सूचना ब्रह्मा जी सहित देवताओं को मिली तो वे विचार करने लगे कि शिव जी के सन्तान के तेज को कौन सम्भाल सकेगा? उन्होंने अपनी इस शंका को शिव जी के सम्मुख प्रस्तुत किया। उनके कहने पर अग्नि ने यह भार ग्रहण किया और परिणामस्वरूप अग्नि के समान महान तेजस्वी स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ। देवताओं के इस षड़यंत्र से उमा के सन्तान होने में बाधा पड़ी तो उन्होंने क्रुद्ध होकर देवताओं को शाप दे दिया कि भविष्य में वे कभी पिता नहीं बन सकेंगे। इस बीच सुरलोक में विचरण करती हुई गंगा से उमा की भेंट हुई। गंगा ने उमा से कहा कि मुझे सुरलोक में विचरण करत हुये बहुत दिन हो गये हैं। मेरी इच्छा है कि मैं अपनी मातृभूमि पृथ्वी पर विचरण करूँ। उमा ने गंगा आश्वासन दिया कि वे इसके लिये कोई प्रबन्ध करने का प्रयत्न करेंगी। उचित समय पर रानी केशिनी ने असमंजस नामक पुत्र को जन्म दिया। रानी सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकल जिसे फोड़ने पर छोटे छोटे साठ हजार पुत्र निकले। उन सबका पालन पोषण घी के घड़ों में रखकर किया गया। कालचक्र बीतता गया और सभी राजकुमार युवा हो गये। सगर का ज्येष्ठ पुत्र असमंजस बड़ा दुराचारी था और उसे नगर के बालकों को सरयू नदी में फेंक कर उन्हें डूबते हुये देखने में बड़ा आनन्द आता था। इस दुराचारी पुत्र से दुःखी होकर सगर ने उसे अपने राज्य से निर्वासित कर दिया। असमंजस के अंशुमान नाम का एक पुत्र था। अंशुमान अत्यंत सदाचारी और पराक्रमी था। एक दिन राजा सगर के मन में अश्वमेघ यज्ञ करवाने का विचार आया। शीघ्र ही उन्होंने अपने इस विचार को कार्यरूप में परिणित कर दिया। राम ने ऋषि विश्वामित्र से कहा, “गुरुदेव! मेरी रुचि अपने पूर्वज सगर की यज्ञ गाथा को विस्तारपूर्वक सुनने में है। अतः कृपा करके इस वृतान्त को पूरा पूरा सुनाइये।” राम के इस तरह कहने पर ऋषि विश्वामित्र प्रसन्न होकर कहने लगे, ” राजा सगर ने हिमालय एवं विन्ध्याचल के बीच की हरी भरी भूमि पर एक विशाल यज्ञ मण्डप का निर्माण करवाया। फिर अश्वमेघ यज्ञ के लिये श्यामकर्ण घोड़ा छोड़कर उसकी रक्षा के लिये पराक्रमी अंशुमान को सेना के साथ उसके पीछे पीछे भेज दिया। यज्ञ की सम्भावित सफलता के परिणाम की आशंका से भयभीत होकर इन्द्र ने एक राक्षस का रूप धारण करके उस घोड़े को चुरा लिया। घोड़े की चोरी की सूचना पाकर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया कि घोड़ा चुराने वाले को पकड़कर या मारकर घोड़ा वापस लाओ। पूरी पृथ्वी में खोजने पर भी जब घोड़ा नहीं मिला तो, इस आशंका से कि किसीने घोड़े को तहखाने में न छुपा रखा हो, सगर के पुत्रों ने सम्पूर्ण पृथ्वी को खोदना आरम्भ कर दिया। उनके इस कार्य से असंख्य भूमितल निवासी प्राणी मारे गये। खोदते खोदते वे पाताल तक जा पहुँचे। उनके इस नृशंस कृत्य की देवताओं ने ब्रह्मा जी से शिकायत की तो ब्रह्मा जी ने कहा कि ये राजकुमार क्रोध एवं मद में अन्धे होकर ऐसा कर रहे हैं। पृथ्वी की रक्षा कर दायित्व कपिल पर है इसलिये वे इस विषय में कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। पूरी पृथ्वी को खोदने के बाद भी जब घोड़ा और उसको चुराने वाला चोर नहीं मिला तो निराश होकर राजकुमारों ने इसकी सूचना अपने पिता को दी। रुष्ट होकर सगर ने आदेश दिया कि घोड़े को पाताल में जाकर ढूंढो। पाताल में घोड़े को खोजते खोजते वे सनातन वसुदेव कपिल के आश्रम में पहुँच गये। उन्होंने देखा कपिलदेव आँखें बन्द किये बैठे हैं और उन्हीं के पास यज्ञ का वह घोड़ा बँधा हुआ है। उन्होंने कपिल मुनि को घोड़े का चोर समझकर उनके लिये अनेक दुर्वचन कहे और उन्हें

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विष्णु जी की ये पौराणिक कथा, जानकर चकित रह जाएंगे आप

आपने भगवान विष्णु के दशावतार की कथा तो पढ़ी या सुनी होगी। लेकिन हम इससे अलग हटक आपको ऐसी पौराणिक कथा बताने वाले हैं जिससे आपके शायद की पढ़ा या सुना होगा। आओ आज हम बताते हैं भगवान विष्णु और गरुड़ की पौराणिक कथा। आओ आज हम बताते हैं भगवान विष्णु और गरुड़ की पौराणिक कथा। गरुड़ और विष्णु की पौराणिक कथा ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थीं जिनमें से दो वनिता और कद्रू थी।ये दोनों ही बहनें थी, जो एक दूसरे से ईर्ष्या रखती थी।दोनों के पुत्र नहीं थे तो पति कश्यप ने दोनों को पुत्र के लिए एक वरदान दे दिया। गरुड़ और विष्णु की पौराणिक कथा ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थीं जिनमें से दो वनिता और कद्रू थी। ये दोनों ही बहनें थी, जो एक दूसरे से ईर्ष्या रखती थी। दोनों के पुत्र नहीं थे तो पति कश्यप ने दोनों को पुत्र के लिए एक वरदान दे दिया। वनिता ने दो बलशाली पुत्र मांगे जबकि कद्रू ने हजार सर्प पुत्र रूप में मांगे जो कि अंडे के रूप में जन्म लेने वाले थे। सर्प होने के कारण कद्रू के हजार बेटे अंडे से उत्पन्न हुए और अपनी मां के कहे अनुसार काम करने लगे। दोनों बहनों में शर्त लग गई थी कि जिसके पुत्र बलशाली होंगे हारने वाले को उसकी दासता स्वीकार करनी होगी। इधर सर्प ने जो जन्म ले लिया था लेकिन वनिता के अंडों से अभी कोई पुत्र नहीं निकला था। इसी जल्दबाजी में वनिता ने एक अंडे को पकने से पहले ही फोड़ दिया। अंडे से अर्धविकसित बच्चा निकला जिसका ऊपर का शरीर तो इंसानों जैसा था लेकिन नीचे का शरीर अर्धपक्व था। इसका नाम अरुण था। अरुण ने अपनी मां से कहा कि ‘पिता के कहने के बाद भी आपने धैर्य खो दिया और मेरे शरीर का विस्तार नहीं होने दिया। इसलिए मैं आपको श्राप देता हूं कि आपको अपना जीवन एक सेवक के तौर पर बिताना होगा। अगर दूसरे अंडे में से निकला उनका पुत्र उन्हें इस श्राप से मुक्त ना करवा सका तो वह आजीवन दासी बनकर रहेंगी।’ भय से विनता ने दूसरा अंडा नहीं फोड़ा और पुत्र के शाप देने के कारण शर्त हार गई और अपनी छोटी बहन की दासी बनकर रहने लगी। बहुत लंबे काल के बाद दूसरा अंडा फूटा और उसमें से विशालकाय गरुड़ निकला जिसका मुख पक्षी की तरह और बाकी शरीर इंसानों की तरह था। हालांकि उनकी पसलियों से जुड़े उनके विशालकाय पंक्ष भी थे। जब गरुड़ को यह पता चला कि उनकी माता तो उनकी ही बहन की दासी है और क्यों है यह भी पता चला, तो उन्होंने अपनी मौसी और सर्पों से इस दासत्व से मुक्ति के लिए उन्होंने शर्त पूछी। सर्पो ने विनता की दासता की मुक्ति के लिए अमृत मंथन ने निकला अमृत मांग। अमृत लेने के लिए गरुड़ स्वर्ग लोक की तरफ तुरंत निकल पड़े। देवताओं ने अमृत की सुरक्षा के लिए तीन चरणों की सुरक्षा कर रखी थी, पहले चरण में आग की बड़े परदे बिछा ररखे थे। दूसरे में घातक हथियारों की आपस में घर्षण करती दीवार थी और अंत में दो विषैले सर्पो का पहरा। वहां तक भी पहुंचाने से पहले देवताओं से मुकाबला करना था। गरुड़ सब से भीड़ गए और देवताओं को बिखेर दिया। तब गरुड़ ने कई नदियों का जल मुख में ले पहले चरण की आग को बुझा दिया, अगले पथ में गरुड़ ने अपना रूप इतना छोटा कर लिया के कोई भी हथियार उनका कुछ न बिगाड़ सका और सांपों को अपने दोनों पंजो में पकड़कर उन्होंने अपने मुंह से अमृत कलश उठा लिया और धरती की ओर चल पड़े।  लेकिन तभी रास्ते में भगवान विष्णु प्रकट हुए और गरुड़ के मुंह में अमृत कलश होने के बाद भी उसके प्रति मन में लालच न होने से खुश होकर गरुड़ को वरदान दिया की वो आजीवन अमर हो जाएंगे। तब गरुड़ ने भी भगवान को एक वरदान मांगने के लिए बोला तो भगवान ने उन्हें अपनी सवारी बनने का वरदान मांगा। इंद्र ने भी गरुड़ को वरदान दिया की वो सांपों को भोजन रूप में खा सकेगा इस पर गरुड़ ने भी अमृत सकुशल वापसी का वादा किया।  अंत में गरुड़ ने सर्पों को अमृत सौंप दिया और भूमि पर रख कर कहा कि यह रहा अमृत कलश। मैंने यहां इसे लाने का अपना वादा पूरा किया और अब यह आपके सुपूर्द हुआ, लेकिन इसे पीने के आप सभी स्नान करें तो अच्छा होगा। जब वे सभी सर्प स्नान करने गए तभी वहां अचानक से भगवान इंद्र पहुंचे और अमृत कलश को वापस ले गए। लेकिन कुछ बूंदे भूमि पर गिर गई जो घांस पर ठहर गई थी। सर्प उन बूंदों पर झपट पड़े, लेकिन उनके हाथ कुछ न लगा। इस तरह गरुड़ की शर्त भी पूरी हो गई और सर्पों को अमृत भी नहीं मिला।

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कृष्ण के बालपन की 16 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

1. कंस को भविष्यवाणी कंस मथुरा नामक राज्य का राजा था। और वह बहुत लालची और क्रूर भी था। वह अत्याचारी भी था, इसलिए मथुरा की प्रजा उससे डरी रहती थी। कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्यार करता था। जब देवकी का विवाह हुआ, तो कंस ने अपने बहन और उसके पति वासुदेव के रथ का सारथी बनने का निर्णय किया। जब वह रथ हांक रहा था, तभी उसे आकाशवाणी सुनाई दी, “अरे मूर्ख, तेरी मौत के दिन पास आ रहे हैं!” कंस यह सब सुनकर भौचक्का रह गया। आकाशवाणी दुबारा सुनाई दी, “देवकी का आठवां पुत्र तेरा वध करेगा।” कंस यह सुनते ही अपनी बहन को मारने के लिए उठा, लेकिन वासुदेव ने उसे रोका और वचन दिया कि वे अपनी सारी संतान पैदा होते ही उसे दे दीया करेगा। कंस मान गया लेकिन उसने दोनों को कारागार में डाल दिया। वासुदेव और देवकी की छह संतान को उसने पैदा होते ही मार डाला, लेकिन कृष्ण और बलराम को वासुदेव ने अपनी चतुराई से बचा लिया। कई सालों बाद भविष्यवाणी सच साबित हुई और कृष्ण जोकि देवकी का आठवां संतान था उसने कंस का वध कर दिया और मथुरा को कंस की गुलामी से आजाद कर दिया। 2. कृष्ण के जन्म की कहानी कृष्ण की कहानियां कंस ने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया था। देवकी ने विष्णु की आराधना की, तो विष्णु ने उसे वचन दिया कि वह स्वयं उसके आठवें पुत्र के रूप में जन्म लेगा। इसके बाद श्रावण महा में तूफानी रात में विष्णु ने देवकी के पेट से जन्म लिया। उस समय आश्चर्यजनक रूप से वासुदेव की हथकड़ियां और बेड़िया खुल गई। सैनिकों को नींद आ गई। तभी आकाशवाणी हुई, “अपने बच्चे को गोकुल में नंद के पास छोड़ आओ।”वासुदेव ने एक टोकरी में नवजात बच्चे को रखा और कारागार से निकल गया। रास्ते में भारी बारिश के बीच उन्होंने यमुना नदी पार की। वह अपने बच्चे को सुरक्षित यशोदा के पास छोड़ आए। आकाशवाणी सच निकली बड़े होकर देवकी की आठवीं संतान कृष्ण ही कंस के काल बने और सभी लोगों को उनके आतंक से मुक्त किया। 3. बलराम के जन्म की कहानी कंस ने अपनी बहन देवकी और बहनोई वासुदेव को कारागार में डाल दिया और उनके होने वाली हर संतान को दुष्ट कंस मार देता था। क्योंकि आकाशवाणी के अनुसार देवकी की आठवीं संतान कंस का काल बनेगा परंतु दुष्ट कंस ने हर संतान को मारने लगा। जब देवकी और वासुदेव के छठे पुत्र को दुष्ट कंस ने मार डाला, तो देवकी बहुत दुखी हुई। उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की।एक रात भगवान विष्णु उसके सपने में आए और बोले कि नागराज शेषनाग उनके सातवे पुत्र के रूप मैं पैदा होंगे। विष्णु ने यह भी कहा कि कंस उस बच्चे को मार नहीं पाएगा। जब देवकी गर्भवती हुई तो आश्चर्यजनक रूप से उसके पेट से भ्रूण रोहिणी के गर्भ मैं चला गया। रोहिणी वासुदेव की दूसरी पत्नी थी। यह बच्चा बलराम के रूप में पैदा हुआ, जो कृष्ण का बड़ा भाई था। 4. कंस और पूतना की कहानी बच्चों के लिए कृष्ण के बालपन की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ कंस जानता था कि आकाशवाणी के अनुसार देवकी का आठवां पुत्र उसे मार डालेगा। जब देवकी की आठवीं संतान ने जन्म लिया, तो कंस को पता चला कि वह आठवीं संतान एक लड़की है तो वह तुरंत देवकी के पास कारागार जा पहुंचा। कंस ने देवकी की गोद से संतान को छीन लिया। वह दरअसल देवी योगमाया थी। योगमाया कंस की मूर्खता पर हंसने लगी और बोली की उसको मारने वाला तो जन्म ले चुका है। और गोकुल में रह रहा है। कंस बहुत क्रोधित हुआ। उसने उस दिन जन्में सभी बच्चों को मार डालने का आदेश दिया। उसके सिपाहियों ने बहुत प्रयास किया लेकिन कृष्ण को वह नहीं मार पाए। कंस ने जब राक्षसी पूतना को कृष्ण को मारने के लिए भेजा। उसने अपना विशाला दूध पिलाकर कृष्ण को मारने की योजना बनाई लेकिन बालक कृष्ण ने उस राक्षसी पूतना को ही मार दिया। 5.  कृष्ण का मक्खन प्रेम कृष्ण जैसे जैसे बड़े होते गए, वैसे वैसे उनकी शैतानियां भी बढ़ती गई। दूध और मक्खन के उनके शोक की कहानियां घर-घर में फैल चुकी थी। जब ग्वालिने दूध की मटकिया लेकर निकलती तो कृष्ण और उनके साथी पत्थर मारकर मटकिया फोड़ देते थे। कृष्ण का दूध मक्खन का लालच देखकर मक्खन को मटकी में अच्छी तरह से बंद कर ऊपर छींके पर लटका देती थी, ताकि कृष्ण के हाथ पुस्तक ना पहुंच पाए। एक दिन कृष्ण को सोता जानकर यशोदा पास के कुवे से पानी भरने चल दी। उनके जाते ही कृष्ण उठ बैठे और सिटी बजाकर उन्होंने अपने सारे साथियों को बुला लिया। सारे साथी एक के ऊपर एक खड़े होते गए और सबसे ऊपर चढ़कर किसने मटकी उतार ली। सारे साथी मिलकर मक्खन खाने लगे तभी, यशोदा वहां आ गई। क्रोध में आकर उन्होंने छड़ी उठाई और उसके पीछे दौड़ी। सारे बालक भाग निकले, लेकिन कृष्ण पकड़े गए और उनकी अच्छी पिटाई हुई। आज भी हम कृष्ण के इस दही माखन के प्रेम के लिए कृष्ण जयंती पर बालक एक के ऊपर एक चढ़कर भाई या माखन की मटकी फोड़ते हैं और उन्हें याद करते हैं। 6. तृणावर्त और कृष्णा की कहानी श्री कृष्ण की बचपन की कहानी एक दिन यशोदा अपने घर के कामकाज में व्यस्त थी, बालकृष्ण को उन्होंने आंगन में छोड़ दिया। तभी, कंस का सेवक असुर तृणावर्त तेज हवा के बवंडर के रूप में वहां प्रकट हुआ और कृष्ण को उड़ा ले गया।  पूरे गोकुल नगर में धूल छा गई और तृणावर्त  आकाश में लगातार ऊंचाई पर बढ़ता गया। पूरे नगर में धूल का घना बादल छा गया। किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।  यशोदा को चिंता हुई। उन्होंने कृष्ण को ढूंढने की कोशिश की। जब कृष्ण ही नहीं मिला तो वह जोर जोर से रोने लगी। तृणावर्त ने नन्हे बालक को अपने कंधों पर उठाने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण ने अपने आप को  इतना भारी कर लिया कि वह विवश होकर नीचे जमीन की ओर आने लगा। कृष्ण ने अपना आकार किसी पहाड़ की तरह बड़ा कर डाला और तृणावर्त  की गर्दन दबा ली। असुर कृष्ण की पकड़ से छूटने

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परशुराम जी को मिला था चिरंजीवी रहने का वरदान, जानें उनकी जन्म कथा

महत्वपूर्ण जानकारी परशुराम जयंती 2023 शनिवार, 22 अप्रैल 2023 तृतीया तिथि प्रारंभ: 22 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 07:49 बजे तृतीया तिथि समाप्त: 23 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 07:47 बजे क्या आप जानते हैं: कल्कि पुराण के अनुसार, परशुराम, कल्कि के दसवें अवतार विष्णु के गुरु होंगे और उन्हें मार्शल आर्ट सिखाएंगे।  इस दिन को बेहद शुभ माना जाता है. अक्षय तृतीया पर शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं. इसी शुभ दिन पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था. इसलिए, अक्षय तृतीया को परशुराम  जयंती के रूप में मनाया जाता है. परशुराम भगवान विष्णु के अवतार थे. उन्हें विष्णु का उग्र अवतार माना जाता था. उन्होंने श्रीराम से पहले धरती पर अवतार लिया था. कहा जाता है कि उन्हें चिरंजीवी रहने का वरदान मिला था. परशुराम आज भी मौजूद हैं. तो, चलिए उनकी जन्म कथा पढ़ लें.  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार परशुराम को विष्णु के दशावतारों में से छठा अवतार माना जाता है. उनके पिता का नाम ऋषि जमदग्नि था. जमदग्नि ने चंद्रवंशी राजा की पुत्री रेणुका से विवाह किया था. उन्होंने पुत्र के लिए एक महान यज्ञ किया था. इस यज्ञ से प्रसन्न होकर इंद्रदेव ने उन्हें तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया और फिर अक्षय तृतीया को परशुराम ने जन्म लिया.  ऋषि जमदग्नि और रेणुका ने अपने पुत्र का नाम राम रखा था. राम ने शस्त्र का ज्ञान भगवान शिव से प्राप्त किया था. शिवजी ने उन्हें प्रसन्न होकर अपना फरसा यानी परशु दिया था. इसके बाद वे परशुराम कहलाएं. परशुराम को चिरंजीवी माना जाता है यानी कि वे आज भी जीवित हैं. उनका जिक्र रामायण और महाभारत दोनों काल में किया गया है. कहा जाता है कि कलयुग के अंत में जब विष्णु के कल्कि अवतार जन्म लेंगे, तब भी परशुराम आएंगे.    कहा जाता है कि उन्होंने क्षत्रिय कुल के हैहय वंश का 21 बार नाश किया था. महाभारत काल में उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण को अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान दिया था. श्रीकृष्ण को उन्होंने सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था. सतयुग के दौरान भी उनकी एक कथा प्रचलित है. जिसके मुताबिक वे एक बार भगवान शिव के दर्शन के लिए गए तो गणेश जी ने उन्हें रोक लिया. इससे गुस्सा होकर परशुराम ने गणपति का एक दांत तोड़ दिया. वहीं रामायण काल में भी उन्होंने राजा जनक, राजा दशरथ परशुराम का सम्मान किया. परशुराम जंयती हिन्दू धर्म के भगवान विष्णु के छठे अवतार की जयंती के रूप में मनाया जाता है। परशुराम जी की जयंती हर वर्ष वैशाख के महीने में शुक्ल पक्ष तृतीय के दौरान आता है। भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया और देवराज इन्द्र को प्रसन्न कर पुत्र प्राप्ति का वरदान पाया। महर्षि की पत्नी रेणुका ने वैशाख शुक्ल तृतीय पक्ष में परशुराम को जन्म दिया था। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप अवतार तब लिया था। जब पृथ्वी पर बुराई हर तरफ फैली हुई थी। योद्धा वर्ग, हथियारों और शक्तियों के साथ, अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। भगवान परशुराम ने इन दुष्ट योद्धाओं को नष्ट करके ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाये रखा था। हिंदू ग्रंथों में भगवान परशुराम को राम जामदग्नाय, राम भार्गव और वीरराम भी कहा जाता है। परशुराम की पूजा निओगी भूमिधिकारी ब्राह्मण, चितल्पन, दैवदन्या, मोहाल, त्यागी, अनावील और नंबुदीरी ब्राह्मण समुदायों के मूल पुरुष या संस्थापक के रूप में की जाती है।अन्य सभी अवतारों के विपरीत हिंदू आस्था के अनुसार परशुराम अभी भी पृथ्वी पर रहते है। इसलिए, राम और कृष्ण के विपरीत परशुराम की पूजा नहीं की जाती है। दक्षिण भारत में, उडुपी के पास पजका के पवित्र स्थान पर, एक बड़ा मंदिर मौजूद है जो परशुराम का स्मरण करता है। भारत के पश्चिमी तट पर कई मंदिर हैं जो भगवान परशुराम को समर्पित हैं। कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। परशुराम विष्णु अवतार कल्कि को भगवान शिव की तपस्या और दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कहेंगे। यह पहली बार नहीं है कि भगवान विष्णु के 6 अवतार एक और अवतार से मिलेंगे। रामायण के अनुसार, परशुराम सीता और भगवान राम के विवाह समारोह में आए और भगवान विष्णु के 7 वें अवतार से मिले। अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु: ।इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ॥ अर्थ: चार वेदन्यताता अर्थात् पूर्ण ज्ञान है और पीठपर धनुष्य-बाण अर्थात् शौर्य है।यहाँ ब्राह्मतेज और क्षात्रेज, उच्चासन विधायक हैं। जो सत्य का विरोध करेगा, उसे ज्ञान से या बाण से परशुराम परजित करेंगे।

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चंद्र दर्शन 2023 : जानिए तिथि, अनुष्ठान और महत्व

भारत में 21 फरवरी 2023 मंगलवार को चंद्र दर्शन अनुष्ठान किए जा सकते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, चंद्र दर्शन का समय 21 फरवरी, 2023 को शाम 06:15 बजे से शाम 07:28 बजे के बीच है। चंद्र दर्शन एक हिंदू अनुष्ठान है जो चंद्रमा को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए किया जाता है, जिसे चंद्र के नाम से भी जाना जाता है। यह आमतौर पर हर महीने की अमावस्या (अमावस्या) के दिन मनाया जाता है, जब चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता है। चंद्र दर्शन क्या है? चंद्र दर्शन को हिंदू धर्म में एक भाग्यशाली घटना के रूप में माना जाता है जो हिंदू कैलेंडर के हर महीने में एक बार होती है| चन्द्र दर्शन तब किया जाता है जब अमावस्या के बाद पहली बार चंद्रमा दिखाई देता है। यह भारत के लगभग हर हिस्से में बहुत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू मान्यताओं में, यह दिन धार्मिक महत्व रखता है। भक्त इस दिन भगवान चंद्र की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं और चंद्र देवता की विशेष पूजा करते हैं। इस विशेष दिन पर चंद्रमा को देखने के लिए इसे बहुत भाग्यशाली और समृद्ध माना जाता है। चंद्र देव के सम्मान में, चंद्र दर्शन मनाया जाता है। सूर्यास्त के ठीक बाद के समय को चन्द्रमा को देखने के लिए या चंद्र दर्शन के लिए सबसे अनुकूल समय माना जाता है। चौघड़िया की जाँच करें चन्द्र दर्शन के लिए सबसे अच्छा और सबसे शुभ समय की भविष्यवाणी करने के लिए। ऐसा कहा जाता है कि सभी अनुष्ठान समृद्धि और खुशी लाते हैं क्योंकि यह माना जाता है कि जब देवता प्रसन्न होते हैं तो भक्त को सफलता और सौभाग्य प्राप्त होता है। तारीक और मुहूर्त चंद्र दर्शन तिथि: मंगलवार, फरवरी 21, 2023 चंद्र दर्शन समय: शाम 06:15 बजे से शाम 07:28 बजे तक चंद्र दर्शन के अनुष्ठान क्या हैं चन्द्र दर्शन के दिन विभिन्न अनुष्ठान किए जाते हैं: इस विशेष दिन पर,हिंदू लोग चंद्रमा भगवान की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद मांगते हैं। एक व्रत भी है जो भक्तों द्वारा इस विशेष दिन पर चन्द्र देव को प्रसन्न करने के लिए रखा जाता है। श्रद्धालु दिनभर भोजन करने से परहेज करते हैं। व्रत का समापन चन्द्रमा दिखने के बाद किया जाता है और भक्त अपनी प्रार्थना करते हैं। यह एक धारणा है कि जो व्यक्ति प्रत्येक और हर अनुष्ठान का श्रद्धा और धार्मिक रूप से पालन करते हैं, और वे चंद्र दर्शन की पूर्व संध्या पर चंद्रमा भगवान की पूजा करते हैं, उन्हें भारी समृद्धि के साथ-साथ अनंत सौभाग्य भी प्राप्त होता है। दान देना एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान और चंद्र दर्शन महोत्सव का एक अभिन्न पहलू है। लोग आमतौर पर इस दिन ब्राह्मणों को चीनी, चावल और कपड़े दान करते हैं। इस दिन कई अनुष्ठान किए जाते हैं जैसे कि महिलाएं अपने पति के लंबे जीवन के लिए और साथ ही विवाहित जीवन से विभिन्न बाधाओं के उन्मूलन के लिए उपवास रखती हैं। चंद्र दर्शन का महत्व हिंदू धर्म में चंद्र दर्शन का महत्व प्राचीन पौराणिक कथाओं में निहित है। चंद्र, चंद्रमा देवता हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्र ऋषि अत्रि और उनकी पत्नी अनसूया के पुत्र हैं। उन्हें मानव जीवन को प्रभावित करने वाले नौ खगोलीय पिंडों (नवग्रहों) में से एक माना जाता है। चंद्र सौंदर्य, शांति और शांति से जुड़ा है। उन्हें उर्वरता का स्वामी भी माना जाता है और उन जोड़ों द्वारा पूजा की जाती है जो एक बच्चे को गर्भ धारण करने की कोशिश कर रहे हैं। चंद्र मन और भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है और माना जाता है कि इसमें मानव मनोदशा को प्रभावित करने की शक्ति है।

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हिन्दू पौराणिक कथाओं के 5 बड़े खलनायक, जिनके कारण बदल गया इतिहास

हिन्दू धर्म में यूं तो कई ऐसा खलनायक हुए हैं जिनके कारण धरती त्रस्त रही है लेकिन हमने इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ाव के कुछ ऐसे खलनायक चुने हैं जिनकी चर्चा आज भी होती है। आओ जानते हैं ऐसे ही 5 खलनायकों के बारे में संक्षिप्त जानकारी। 1.हिरण्याक्ष : हिरण्याक्ष भयंकर दैत्य था। वह तीनों लोकों पर अपना अधिकार चाहता था। हिरण्याक्ष का दक्षिण भारत पर राज था। ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान वराहरूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान ने जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया। आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। उन्होंने अपनी सेना को लेकर हिरण्याक्ष के क्षे‍त्र पर चढ़ाई कर दी और विंध्यगिरि के पाद प्रसूत जल समुद्र को पार कर उन्होंने हिरण्याक्ष के नगर को घेर लिया। संगमनेर में महासंग्राम हुआ और अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ। आज भी दक्षिण भारत में हिंगोली, हिंगनघाट, हींगना नदी तथा हिरण्याक्षगण हैंगड़े नामों से कई स्थान हैं। उल्लेखनीय है कि सबसे पहले भगवान विष्णु ने नील वराह का अवतार लिया फिर आदि वराह बनकर हिरण्याक्ष का वध किया इसके बाद श्‍वेत वराह का अवतार नृसिंह अवतार के बाद लिया था। हिरण्याक्ष को मारने के बाद ही स्वायंभूव मनु को धरती का साम्राज्य मिला था। 2.महाबली : महाबली बाली अजर-अमर है। कहते हैं कि वो आज भी धरती पर रहकर देवताओं के विरुद्ध कार्य में लिप्त है। पहले उसका स्थान दक्षिण भारत के महाबलीपुरम में था लेकिन मान्यता अनुसार अब मरुभूमि अरब में है जिसे प्राचीनकाल में पाताल लोक कहा जाता था। अहिरावण भी वहीं रहता था। समुद्र मंथन में उसे घोड़ा प्राप्त हुआ था जबकि इंद्र को हाथी। उल्लेखनीय है कि अरब में घोड़ों की तादाद ज्यादा थी और भारत में हाथियों की।शिवभक्त असुरों के राजा बाली की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था। वह मानता था कि देवताओं और विष्णु ने उसके साथ छल किया। हालांकि बाली विष्णु का भी भक्त था। भगवान विष्णु ने उसे अजर-अमर होने का वरदान दिया था। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बाली का जन्म हुआ। बाली जानता था कि मेरे पूर्वज विष्णु भक्त थे, लेकिन वह यह भी जानता था कि मेरे पूर्वजों को विष्णु ने ही मारा था इसलिए बाली के मन में देवताओं के प्रति द्वेष था। उसने शुक्राचार्य के सान्निध्य में रहकर स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को खदेड़ दिया था। वह ‍तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा था। बाली से भारत के एक नए इतिहास की शुरुआत होती है। 3.वृत्रासुर – यह सतयुग की बात है जब कालकेय नाम के एक राक्षस का संपूर्ण धरती पर आतंक था। वह वत्रासुर के अधीन रहता था। दोनों से त्रस्त होकर सभी देवताओं ने मिलकर सोचा वृत्रासुर का वध करना अब जरूरी हो गया। इस वृत्तासुर के वध के लिए ही दधीचि ऋषि की हड्डियों से एक हथियार बनाया जिसका नाम वज्र था। वृत्रासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने आर्यों के नगरों पर कई बार आक्रमण करके उनकी नाक में दम कर रखा था। अंत में इन्द्र ने मोर्चा संभाला और उससे उनका घोर युद्ध हुआ जिसमें वृत्रासुर का वध हुआ। इन्द्र के इस वीरतापूर्ण कार्य के कारण चारों ओर उनकी जय-जयकार और प्रशंसा होने लगी थी। शोधकर्ता मानते हैं कि वृत्रासुर का मूल नाम वृत्र ही था, जो संभवतः असीरिया का अधिपति था। पारसियों की अवेस्ता में भी उसका उल्लेख मिलता है। वृत्र ने आर्यों पर आक्रमण किया था तथा उन्हें पराजित करने के लिए उसने अद्विशूर नामक देवी की उपासना की थी। इन्द्र और वृत्रासुर के इस युद्ध का सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं पर गहरा असर पड़ा था। तभी तो होमर के इलियड के ट्राय-युद्ध और यूनान के जियॅस और अपोलो नामक देवताओं की कथाएं इससे मिलती-जुलती हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन विश्व पर इन्द्र-वृत्र युद्ध का कितना व्यापक प्रभाव पड़ा था। 4.रावण : रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्म ज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी के पास नहीं था। इस सभी के कारण सभी उससे भयभीत रहते थे। एक मान्यता अनुसार असुरराज विष्णु के पार्षद जय और विजय ने ही रावण और कुंभकर्ण के रूप में फिर से जन्म लेकर धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। रावण ने रक्ष संस्कृति की नींव रखी थी। रावण ने कुबेर से लंका और उनका विमान छीना। रावण ने राम की सीता का हरण किया और अभिमानी रावण ने शिव का अपमान किया था। विद्वान होने के बावजूद रावण क्रूर, अभिमानी, दंभी और अत्याचारी था। हालांकि राम या रावण के काल में और भी बहुत सारे खलनायक थे लेकिन रावण उन सभी में अग्र था। 5. जरासंध : भगवान कृष्ण के मामा थे कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राज पद से हटाकर स्वयं राजा बन बैठा था। कंस बेहद क्रूर था। उसमें असुरों, दानवों और राक्षसों जैसी प्रवृत्ति थी। कंस अपने पूर्वजन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। कंस का श्वसुर मगथ का सम्राट जरासंध था। महाभारत काल के सबसे बड़े खलनायक में से किसी एक को  तय करना मुश्किल है। कंस से बड़ा खलनायक जरासंध था। कंस तो भगवान श्रीकृष्ण को मारने के चक्कर में ही मारा गया। भगवान श्रीकृष्ण को सबसे ज्यादा यदि किसी ने परेशान किया तो वह था जरासंध। वह बृहद्रथ नाम के राजा का पुत्र था और जन्म के समय दो टुकड़ों में विभक्त था। जरा नाम की राक्षसी ने उसे जोड़ा था तभी उसका नाम जरासंध पड़ा। महाभारत युद्ध में जरासंध कौरवों के साथ था। जरासंध अत्यन्त क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त

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कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा

कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्तिमार्कंडेय पुराण के अनुसार पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था। उस समय कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था। तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए जो ॐ के तेज में एकाकार हो गए। आज सूयर्देव का दिन है। इस दिन लोग सूर्य देव की उपासना करते हैं। सूर्य ही हैं जिनसे पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य को पूजने का यह प्रचलन आज से नहीं बल्कि वैदिक काल से चला आ रहा है। वेदों में भी सूर्य देव की आराधना की गई है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है। वैदिक काल ही क्यों आजकल भी कई लोग सूर्य को अर्ध्य देना नहीं भूलते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सूर्य देव की उत्पत्ति कैसे हुई थी, अगर नहीं, तो हम आपको इसका जवाब अपने आर्टिकल में दे रहे हैं। हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही हैं हिंदू धर्म में सूर्य को जल का अर्घ्य दिया जाता हैं। हिंदू धर्म पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति, प्रभाव, स्तुति, मंत्र आदि के बारे में बताया गया हैं नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद मिलता हैं तो आज हम आपको अपने इस लेख में सूर्य देव की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं। हिंदू धर्म के मार्कंडेय पुराण के मुताबिक सारा जगत पहले प्रकाश रहित था। उस वक्त कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के मुंह से सबसे पहला शब्द जो निकला वो था ॐ, यह सूर्य का तेज रूप सूक्ष्म रूप था। इसके बाद ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए। यह चारों ॐ के तेज में एकाकार हो गए। यह विश्व का अविनाशी कारण हैं सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार का कारण हैं ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की जिससे सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को धारण किया। वही सृष्टि की रचना की गई तब ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र ​ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। सूर्य को प्रसन्न करने के लिए अदिति ने घोर तप किया। फिर सुषुम्ना नाम की किरण ने अदिति के गर्भ में प्रवेश किया। इस अवस्था में भी अदिति ने चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन किया। इस ऋषि राज कश्यप क्रोधित हो गए। उन्होंने अदिति से कहा कि तुम इस तरह व्रत रख कर गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचा रही हो। इस तरह तुम शिशु को क्यों करना चा​हती हो। वही जब देवी अदिति ने यह सुना तो अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। फिर सूर्य देव शिशु रूप में अदिति के गर्भ में प्रगट हुए। अदिति को मारिचम अन्डम कहा जाता था। इसके चलते ही इस बालक का नाम मार्तंड पड़ा। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया हैं।

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साल 2023 में मासिक शिवरात्रि कब-कब है? यहां देखे पूरे साल की संपूर्ण लिस्ट

हिंदू धर्म में मासिक शिवरात्रि भगवान शंकर और पार्वती के मिलन का दिन माना गया है. जानते हैं साल 2023 में कब-कब है मासिक शिवरात्रि मासिक शिवरात्रि का शिवभक्तों का इंतजार रहता है. साल 2023 में शिवरात्रि कब-कब पड़ रही हैं? पूरे साल की मासिक शिवरात्रि की पूरी लिस्ट, यहां देखें. हिंदू धर्म में शिवरात्रि का बहुत महत्व बताया गया है. हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। शिवरात्रि भगवान भोले नाथ को समर्पित है. एक साल में 12 मास होते है और 12 मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है. मासिक शिवरात्रि भोलेनाथ और माता पार्वती को समर्पित है, शिवरात्रि पर भोलेनाथ की आराधना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है. साथ ही मन चाहे फल की प्राप्ति होती है. मासिक शिवरात्रि पर रात्रि में पूजा करने का विशेष महत्व होता है। इस साल की पहली मासिकत्रि 20 जनवरी 2023 शुक्रवार को पड़ रही है. मासिक शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त 20 जनवरी को रात 11.53 बजे शुरू हो कर 21 जनवरी को 12.47 तक रहेगा . माना जाता है की इस दिन पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखने वालों को भोले नाथ अनंत फल देते है. तो आप भी पूरे श्रद्धा भाव के साथ इस व्रत का पालन करें. मासिक शिवरात्रि का महत्व मान्यताओं के अनुसार और पौराणिक कथाओं के मुताबिक चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। सबसे पहले भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने उनकी पूजा की थी। तभी से इस दिन को भगवान शिव के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। कई पुराणों में भी इस व्रत का जिक्र किया गया है। जिसमें बताया गया है कि इस व्रत को माता लक्ष्मी, माता सरस्वती, गायत्री और सीता माता और पार्वती माता सहित कई देवियों से रखा है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को रखने से व्यक्ति के जीवन में सुख शांति मिलती है। साथ ही रोगों से मुक्ति भी मिलती है। मासिक शिवरात्रि पूजा विधि मासिक शिवरात्रि के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर लें। इसके बाद भगवान शिव के मंदिर या फिर घर के ही मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करें। याद रखें की सबसे पहले शिवलिंग का अभिषेक करें। इसके लिए जल, शुद्ध घी, दूध, शक्कर, दही आदि से अभिषेक करें। कहा जाता है कि रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं। साथ ही इस दिन बेलपत्र, धतूरा, श्रीफल चढ़ाएं। इस बात का ख्याल रखें की आप बेल पत्र को अच्छे से साफ कर लें। शिव पूजा करते समय शिव पुराण, शिव स्तुति, शिव अष्टक, शिव चालीसा और शिव श्लोक का पाठ करें। संध्या के समय आप फलहार कर सकते हैं। ख्याल रखें की शिवरात्रि के व्रत में अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।आपको बता दें कि शिवरात्रि के पूजन का उत्तम समय मध्य रात्रि का समय होता है। भगवान शिव की पूजा रात 12 बजे के बाद करना उत्तम फलदायी रहता है। साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ भी करें ऐसा करने से आपकी आर्थिक परेशानियां दूर होंगी। मासिक शिवरात्रि की लिस्ट 20 जनवरी 2023, शुक्रवार – माघ मासिक शिवरात्रि 18 फरवरी 2023, शनिवार – महाशिवरात्रि, फाल्गुन शिवरात्रि 20 मार्च 2023, सोमवार – चैत्र मासिक शिवरात्रि 18 अप्रैल 2023, मंगलवार – वैशाख मासिक शिवरात्रि 17 मई 2023, बुधवार – ज्येष्ठ मासिक शिवरात्रि 16 जून 2023, शुक्रवार – आषाढ़ मासिक शिवरात्रि 15 जुलाई 2023, शनिवार – सावन मासिक शिवरात्रि 14 अगस्त 2023, सोमवार – अधिक माह, मासिक शिवरात्र 13 सितंबर 2023, बुधवार – भाद्रपद मासिक शिवरात्रि 12 अक्टूबर 2023, गुरुवार – अश्विन मासिक शिवरात्रि 11 नवंबर 2023, शनिवार – कार्तिक मासिक शिवरात्रि 11 दिसंबर 2023, सोमवार – मार्गशीर्ष मासिक शिवरात्रि  मासिक शिवरात्रि पर इन चमत्कारी मंत्रों का करें जाप  ॐ शिवाय नम: ॐ सर्वात्मने नम: ॐत्रिनेत्राय नम: ॐ हराय नम: मासिक शिवरात्रि बोले नाथ और माता पार्वती के मिलन का दिन है, इस दिन  भोलेनाथ और माता पार्वती का विवाह हुआ था, तो आप भी इस शिवरात्रि करें शिव पार्वती की आराधना जिससे पूरी होगी आपकी हर मनोकामना. Disclaimer : यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि karmasu.in किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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जब प्रभु राम ने तोड़ा पवनपुत्र हनुमान का घमंड, पढ़ें यह रोचक कथा

मंगलवार का दिन पवनपुत्र हनुमान जी की आराधना के लिए समर्पित है. कई बार हनुमान जी ने अपने प्रभु राम की मदद के लिए असंभव को भी संभव कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने ने राम नाम के महत्व के लिए प्रभु राम के क्रोध का सामना भी किया. हनुमान जी के आराध्य प्रभु राम हैं और राम जी को हनुमान जी सभी भक्तों में सबसे अधिक प्रिय हैं. हनुमान जी और प्रभु राम से जुड़ी कई कहानियां हैं. आज हम आपको एक ऐसी कथा के बारे में बता रहे हैं, जिसमें प्रभु राम ने हनुमान जी के घमंड को तोड़ा था. लंका युद्ध के पहले की बात है. समुद्र को पारकर लंका जाने के लिए सेतु बनाया जाना था. उससे पूर्व प्रभु राम चाहते थे कि सेतु पर एक शिवलिंग की स्थापना की जाए. प्रभु राम ने हनुमान जी से अपने मन की बात बताई और कहा कि काशी जाकर शिवलिंग लाएं और मुहूर्त से पूर्व आ जाएं. पवनपुत्र के लिए काशी जाना कोई बड़ी बात नहीं थी. वे तो अतुलित बलशाली और वेगवान थे. वे पलभर में ही काशी पहुंच गए. अपने वेग पर उनको थोड़ा सा अभिमान हो गया. प्रभु राम तो अंतर्यामी हैं. उन्हें यह बात पता चल गई. उन्होंने सुग्रीव से कहा कि मुहूर्त बीत जाएगी, ऐसे में वे रेत की ही शिवलिंग सेतु पर स्थापित कर देते हैं. प्रभु राम ने वहां पर रेत का शिवलिंग स्थापित कर दिया. इसी बीच हनुमान जी काशी से शिवलिंग लेकर प्रभु राम के पास पहुंच गए. उन्होंने देखा कि प्रभु राम ने तो रेत का शिवलिंग स्थापित कर दिया है. हनुमान जी ने प्रभु राम से कहा कि आपने मुझे काशी भेजकर यह शिवलिंग लाने को कहा था. यह लेकर आ गया, लेकिन आपने रेत का शिवलिंगस्थापित कर दिया. तब प्रभु राम ने कहा कि उनसे भूल हो गई है. ऐसा करो कि इस रेत वाले शिवलिंग को यहां से हटा दो. फिर वे काशी से लाए शिवलिंग को यहां स्थापित कर देंगे. हनुमान जी ने प्रभु आज्ञा पाकर अपनी पूंछ से रेत के शिवलिंग को पकड़ लिया और उसे उखाड़ने की कोशिश करने लगे. लेकिन वह शिवलिंग वहां से एक इंच भी नहीं हिला. हनुमान जी को पहले आश्चर्य हुआ, लेकिन थोड़े ही देर में उनको अपनी गलती का एहसास हो गया. उनका घमंड टूट गया. फिर उन्होंने अपने प्रभु श्री राम से क्षमा मांगी.

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जानिए वरुथिनी एकादशी पर्व का महत्व और इससे जुड़ी पौराणिक कथा

भगवान विष्णु इस सृष्टि के पालनकर्ता हैं। शास्त्रों और पुराणों में एकादशी का बहुत महत्व बताया गया है। सनातन धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी को इसी वजह से हरि वासर और हरि का दिन भी कहा जाता है। हिन्दू कैलेंडर के हर महीने में दो एकादशी पड़ती है। हर एकादशी का अपना महत्व है और इसी क्रम में वरुथिनी एकादशी भी आता है। इस दिन भगवान मधुसूदन की पूजा की जाती है। वरुथिनी एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से जातकों के सारे दुख दूर होते हैं और उन्हें करोड़ों साल तक ध्यान करने जितना फल प्राप्त होता है। यूं तो हर एकादशी में दान का विशेष महत्व है लेकिन मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी में दान करने से सूर्य ग्रहण के दौरान स्वर्ण दान जितना फल प्राप्त होता है। वरुथिनी एकादशी के व्रत से कन्यादान के कर्म से भी ज्यादा फल प्राप्त होता है। यही वजह है कि वरुथिनी एकादशी का सनातन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। आज हम आपको इस लेख में वरुथिनी एकादशी के व्रत से जुड़ी एक पौराणिक कथा बताएंगे जोकि स्वयं भगवान विष्णु से जुड़ी है लेकिन उससे पहले आपको वरुथिनी व्रत से जुड़ी कुछ खास जानकारी दे देते हैं। वरुथिनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा मान्यता है कि एक बार पांडु पुत्र अर्जुन के आग्रह पर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें वरुथिनी एकादशी व्रत का महत्व और उससे जुड़ी एक कथा बताई। इस कथा के अनुसार बहुत पहले नर्मदा तट के किनारे एक राज्य हुआ करता था जिस पर मान्धाता नामक राजा का राज हुआ करता था। राजा मान्धाता एक बेहद ही नेक दिल, दानी और तपस्वी राजा था। एक बार राजा मान्धाता किसी जंगल में तपस्या में लीन थे। तभी कहीं से वहां पर एक जंगली भालू आ धमकता है और उनके पैरों को चबाने लगता है। राजा मान्धाता इस कृत्य से घबराते नहीं हैं लेकिन जब भालू उन्हें खींच कर ले जाने लगता है तब वे भगवान श्री हरि विष्णु को याद करते हैं। भक्त की पुकार सुनकर श्री हरि वहाँ प्रकट हो जाते हैं और जंगली भालू का गला अपने सुदर्शन चक्र से काट डालते हैं। लेकिन जब तक ऐसा कुछ होता तब तक वह भालू राजा मान्धाता का एक पैर चबा चुका था। यह देख कर राजा बहुत दुखी होते हैं। तब राजा के दुख को देखते हुए भगवान विष्णु को उन पर दया आ जाती है। ऐसे में भगवान विष्णु राजा मान्धाता को बताते हैं कि उनके पैर की यह हालत उनके पूर्व जन्म में किए गए पापों का फल है। श्री हरि विष्णु राजा मान्धाता से आगे कहते हैं कि राजा मथुरा जाएँ और वहाँ भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा के साथ-साथ वरुथिनी एकादशी का व्रत भी रखें। इससे उनके खराब अंग पुनः ठीक हो जाएंगे।  राजा मान्धाता भगवान श्री हरि विष्णु के आदेशों का पालन करते हुए मथुरा जाते हैं और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखते हुए भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा करते हैं जिसके फलस्वरूप उनका खराब पाँव वापस से ठीक हो जाता है।

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कब है वरूथिनी एकादशी? जान लें विष्णु पूजा का शुभ मुहूर्त और पारण समय, व्रत से होंगे 4 लाभ

वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वरूथिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है. एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से वैशाख कृष्ण एकादशी की महिमा और पूजा विधि के बारे में जानना चाहा. तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि वैशाख कृष्ण एकादशी वरूथिनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है. वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पाप मिटते हैं, भय दूर होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और सौभाग्य मिलता है.  हिंदू धर्म के व्रत त्‍योहारों में एकादशी का सबसे प्रमुख स्‍थान है। प्रत्‍येक मास में दो एकादशी होती है और सभी का कुछ खास महत्‍व होता है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत के बारे में शास्‍त्रों में बताया जाता है कि संपूर्ण व‍िधि-विधान से यह व्रत करने और पूजा करने से उपासक को बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है और सभी पापों का नाश होता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस व्रत के महत्‍व, परंपरा और शुभ मुहूर्त के बारे मे वरूथिनी एकादशी तिथि 2023 हिंदू कैलेंडर के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 15 अप्रैल दिन शनिवार को रात 08 बजकर 45 मिनट पर प्रारंभ हो रही है और इस तिथि का समापन अगले दिन 16 अप्रैल दिन रविवार को शाम 06 बजकर 14 मिनट तक है. उदयातिथि के आधार पर वरूथिनी एकादशी का व्रत 16 अप्रैल रविवार को रखा जाएगा. 3 शुभ योगों में है वरूथिनी एकादशी 16 अप्रैल को वरूथिनी एकादशी वाले दिन प्रात:काल से शुक्ल योग है, जो देर रात 12:13 बजे तक है. उसके बाद से ब्रह्म योग है. यह पारण के दिन हैं. इन दो शुभ योगों के अलावा त्रिपुष्कर योग पारण वाले दिन 17 अप्रैल को प्रात: 04 बजकर 07 मिनट से सुबह 05 बजकर 54 मिनट तक है. व्रत के दिन शतभिषा नक्षत्र है. व्रत के दिन का अभिजित मुहूर्त सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:47 बजे तक है. वरूथिनी एकादशी पूजा मुहूर्त 2023 वरूथिनी एकादशी वाले दिन सुबह 07:32 बजे से लेकर दोपहर 12:21 बजे तक शुभ समय है. इसमें सुबह 09:08 बजे से सुबह 10:45 बजे तक लाभ-उन्नति मुहूर्त और सुबह 10:45 बजे से दोपहर 12:21 बजे तक अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त है. इन मुहूर्त में आप एकादशी व्रत की पूजा कर सकते हैं. दोपहर में शुभ-उत्तम मुहूर्त 01:58 बजे से 03:34 बजे तक है.

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हनुमान जन्‍मोत्‍सव कब है, जानें मुहूर्त, पूजाविधि और महत्‍व

हनुमान जयंती 6 अप्रैल 2203 को मनाई जाएगी. हनुमान भक्ति करने वालों पर कभी विपदा नहीं आती.. जानते हैं हनुमान जयंती पर बजरंगबली की पूजा की सामग्री और मुहूर्त.हनुमान जयंती यानी कि बजरंग बली का जन्‍मोत्‍सव चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस बार हनुमान जयंती 6 अप्रैल को मनाई जाएगी। पौराणिक मान्‍यताओं के हनुमानजी को रुद्रावतार यानी कि भगवान शिव का अवतार माना जाता है और उनका जन्‍म चैत्र मास की पूर्णिमा को मंगलवार के दिन हुआ था। इसलिए मंगलवार का दिन बजरंगबली को समर्पित माना जाता है और इस दिन व्रत करने और उनकी पूजा करने से उनकी कृपा प्राप्‍त होती है। हनुमान जयंती के अवसर पर भी भक्‍त व्रत करते हैं और विधि विधान से उनकी पूजा करके व्रत को पूर्ण करते हैं। इस दिन देश भर के मंदिरों में जगह-जगह भंडारे आयोजित होते हैं और कई तरह के उपाय और अनुष्‍ठान करवाए जाते हैं।  धार्मिक मान्यता है कि हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर अगर विधि विधान से मारुति नंदन की पूजा की जाए तो स्वंय हनुमान साधक की हर संकट में रक्षा करते हैं. हनुमान जी पूजा घर पर करने से बहुत फायदे होते है लेकिन हनुमान मंदिर में जाकर पूजा करें तो अत्यंत लाभकारी होता है. हनुमान जन्मोत्सव 2023 मुहूर्त (Hanuman Jayanti 2023 Muhurat) चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि 05 अप्रैल 2023 बुधवार को प्रातः 09:19 बजे से शुरू होगी. पूर्णिमा तिथि का समापन 06 अप्रैल 2023 गुरुवार, प्रातः 10:04 बजे होगा. उदयातिथि के अनुसार हनुमान जयंती  6 अप्रैल 2023 को है. इस दिन कई लोग हनुमान जी के निमित्त व्रत भी रखते हैं हनुमान जयंती का महत्‍व (Hanuman Jayanti Importance) हनुमान जयंती की पूजा का विशेष महत्‍व माना जाता है। मान्‍यता है कि इस दिन पूजा अर्चना करने वाले को बजरंग बली हर रोग और दोष से दूर रखते हैं और हर प्रकार के संकट से रक्षा करते हैं। जीवन में कष्‍ट दूर होते है और सुख शांति की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जिन लोगों पर शनि की अशुभ दशा चल रही है वे यदि हनुमान जयंती पर व्रत रखें तो उनके शनि के दोष दूर होते हैं और कष्‍टों से मुक्ति मिलती है। हनुमान जयंती पूजा सामग्री (Hanuman Jayanti Samagri) हनुमान जंयती पूजा विधि (Hanuman Jayanti Puja vidhi) हनुमान जी हर बुरी शक्त‍ि का नाश कर हर काम में आगे बढ़ने में मदद करने वाले हैं. ऐसे में हनुमान जयंती पर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें. लाल वस्त्र पहनें और फिर बजरंगबली को सिंदूर का चोला चढ़ाएं. सरसों के तेल का दीपक लगाकर ॐ मारुतात्मजाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें. बजरंगबली को गुड़-चने का भोग लगाएं और फिर घर या मंदिर में 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें.  कहते हैं इस दिन घर में सुंदरकांड करना चाहिए. इससे हनुमान जी का घर में वास होता है. जीवन की हर समस्याओं से मुक्ति मिलती है.

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