2023

जानिए शिवपुराण के अनुसार भगवन शिव को कौनसी चीज़ चढाने से मिलता है क्या फल

किसी भी देवी-देवता का पूजन करते वक़्त उनको अनेक चीज़ें अर्पित की जाती है। प्रायः भगवन को अर्पित की जाने वाली हर चीज़ का फल अलग होता है। शिव पुराण में इस बात का वर्णन मिलता है की भगवन शिव को अर्पित करने वाली अलग-अलग चीज़ों का क्या फल होता है। शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को चढ़ाने से क्या फल मिलता है भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है। तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है। जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है। गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है। यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए। शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है। नपुंसक व्यक्ति अगर घी से भगवान शिव का अभिषेक करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान संभव है। तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को चढ़ाएं। सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में वृद्धि होती है। शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है। शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा (टीबी) रोग में आराम मिलता है। शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है। चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है। अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है। शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है। बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है। जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं। हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है। धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है। लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है। दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि | महत्व | भगवान कार्तिकेय का जन्म कथा

स्कंद षष्ठी 2023 का महत्वसंतान प्राप्ति के लिए भी षष्ठी तिथि को महत्वपूर्ण माना गया है. पौराणिक कथा में सुनने को मिलता है कि, इस व्रत के प्रभाव से ही च्यवन ऋषि को आंखों की ज्योति प्राप्त हुई थी. वहीं स्कंद षष्ठी व्रत के प्रभाव और भगवान स्कंद की कृपा से ही प्रियव्रत का मृत शिशु फिर से जीवित हो गया था स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। इनकी पूजा से जीवन में हर तरह की कठिनाइंया दूर होती हैं और व्रत रखने वालों को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। साथ ही संतान के कष्टों को कम करने और उसके सुख की कामना से ये व्रत किया जाता है। हालांकि यह त्योहार दक्षिण भारत में प्रमुख रूप से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाना जाता है। उनका प्रिय पुष्प चंपा है। इसलिए इस व्रत को चंपा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। स्कंद षष्ठी का महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान कार्तिकेय षष्ठी तिथि और मंगल ग्रह के स्वामी हैं तथा दक्षिण दिशा में उनका निवास स्थान है। इसीलिए जिन जातकों की कुंडली में कर्क राशि अर्थात् नीच का मंगल होता है, उन्हें मंगल को मजबूत करने तथा मंगल के शुभ फल पाने के लिए इस दिन भगवान कार्तिकेय का व्रत करना चाहिए। क्योंकि स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय को प्रिय होने से इस दिन (Skanda Shashti Vrat) व्रत अवश्य करना चाहिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिकेय अपने माता-पिता और छोटे भाई श्रीगणेश से नाराज होकर कैलाश पर्वत छोड़कर मल्लिकार्जुन (शिव जी के ज्योतिर्लिंग) आ गए थे और कार्तिकेय ने स्कन्द षष्ठी को ही दैत्य तारकासुर का वध किया था तथा इसी तिथि को कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने थे। भारत में स्कन्द षष्ठी भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर है। ज्ञात हो कि स्कन्द पुराण कार्तिकेय को ही समर्पित है। स्कन्द पुराण में ऋषि विश्वामित्र द्वारा रचित कार्तिकेय 108 नामों का भी उल्लेख हैं। इस दिन निम्न मंत्र से कार्तिकेय का पूजन करने का विधान है। खासकर दक्षिण भारत में इस दिन भगवान कार्तिकेय के मंदिर के दर्शन करना बहुत शुभ माना गया है। चम्पा षष्ठी या स्कन्द षष्ठी का त्योहार दक्षिण भारत, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि में प्रमुखता से मनाया जाता है। बैंगन छठ  स्कंद षष्ठी का दिन भगवान शिव के अवतार जिसे खंडोबा के नाम से जाना जाता है, उन्हें भी समर्पित है। खंडोबा को ही मल्हारी मार्तण्ड भी कहा गया। होलकर राजवंश के कुल देवता मल्हारी मार्तण्ड की चम्पा षष्ठी की रात्रि बैंगन छठ का आयोजन होता है। चौंसठ भैरवों में मार्तण्ड भैरव भी एक हैं। वैसे सूर्य को भी मार्तण्ड कहा गया है। जैसे बिहार में छठ पूजा, सूर्य पूजा का महत्व है, उसी तरह महाराष्ट्र में बैंगन छठ का महत्व है। महाराष्ट्र में जैजूरी खंडोबा का मुख्य स्थान है, जो होळ गांव के पास है। इंदौर के शासक इसी होळ गांव के होने से होलकर कहलाए और खंडोबा उनके कुल देवता है। कहा जाता है कि इस दिन तेल का सेवन नहीं करना चाहिए तथा बाजरे की रोटी एवं बैंगन के भुर्ते को प्रसाद वितरित करने का प्रचलन है। महाराष्ट्र और सुदूर मालवा में बसे मराठी भाषियों में मल्हारी मार्तण्ड की नवरात्रि का आयोजन मार्गशीर्ष प्रतिपदा से मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी तक 5 दिन के उपवास के उपरांत मल्हारी मार्तण्ड की ‘षडरात्रि’ ‘बोल सदानंदाचा येळकोट येळकोट’ के साथ संपन्न होती है। इसीलिए इस दिन भगवान कार्तिकेय और खंडोबा का पूजन विशेष रूप से करना चाहिए। स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि स्कन्द षष्ठी के दिन सुबह जल्दी उठें और घर की साफ-सफाई करें।  इसके बाद स्नान-ध्यान कर सर्वप्रथम व्रत का संकल्प लें।  पूजा घर में मां गौरी और शिव जी के साथ भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को स्थापित करें।  स्कन्द षष्ठी के दिन व्रतधारी व्यक्तियों को दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके भगवान कार्तिकेय का पूजन करना चाहिए। पूजन में जल, मौसमी फल, फूल, मेवा, दही, कलावा, दीपक, अक्षत, हल्दी, चंदन, दूध, गाय का घी, इत्र आदि से करें।  अंत में आरती करें।  वहीं शाम को कीर्तन-भजन पूजा के बाद आरती करें।  इसके पश्चात फलाहार करें। रात्रि में भूमि पर शयन करना चाहिए। भगवान कार्तिकेय की पूजा का मंत्र देव सेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव। कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥’ इसके अलावा स्कन्द षष्ठी एवं चम्पा षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय के इन मंत्रों का जाप भी किया जाना चाहिए। कार्तिकेय गायत्री मंत्र ‘ॐ तत्पुरुषाय विद्महे: महा सैन्या धीमहि तन्नो स्कन्दा प्रचोदयात’। यह मंत्र हर प्रकार के दुख एवं कष्टों का नाश करने के लिए प्रभावशाली है। शत्रु नाश के लिए पढ़ें ये मंत्र- ॐ शारवाना-भावाया नम:ज्ञानशक्तिधरा स्कन्दा वल्लीईकल्याणा सुंदरादेवसेना मन: कांता कार्तिकेया नामोस्तुते। इस तरह से भगवान कार्तिकेय का पूजन-अर्चन करने से जीवन के सभी कष्‍टों से मुक्ति मिलती है। भगवान कार्तिकेय की जन्म कथा कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार राक्षसों के बढ़ते आतंक को देखते हुए देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी थी। भगवान ब्रह्मा ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, परंतु उस काल च्रक्र में माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे।  इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद ली और कामदेव ने भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया और दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे।  उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ।

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भारत के प्रमुख धार्मिक स्थल और इनकी यात्रा

भारत देश में धर्म, कर्म और क्षमा को प्राथमिकता दी जाती हैं। भारत एक ऐसा देश हैं जहां कई जाति और धर्म को मानने वाले लोग बहुत ही प्रेम से रहते हैं और भाईचारे का परिचय देते हैं। भारत को “विश्वास की भूमि” भी कहा जा सकता है। भारत के धार्मिक स्थलों में कई मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा के अलावा भी तीर्थ स्थल हैं। भारत के निवासी अपने-अपने धर्म के अनुसार इन पवित्र स्थानों पर जाते हैं और अपने ईस्ट देव, अल्लाह और गॉड से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आज हम आपको अपने आर्टिकल के माध्यम से भारत के खास तीर्थ स्थलों और मंदिरों के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं। यदि आप इण्डिया के इन पवित्र स्थलों के बारे में जानना चाहते है तो इस लेख को पूरा जरूर पढ़े। 1. भारत का धार्मिक स्थल वैष्णो देवी माता मंदिर भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल माता वैष्णो देवी का मंदिर हिन्दू धर्म का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। जम्मू कश्मीर की आकर्षित त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है यह पवित्र स्थान 9 देवियों में से एक माता वैष्णो रानी का परम धाम हैं। देवी के दर्शन के लिए आने वाले भक्तो की भीड़ नवरात्री के अवसर पर देखने लायक होती है। श्रद्धालुगण सीढ़ियों पर चलते हुए लम्बा सफर तय करते हैं और माता रानी का जयकारा लगाते है। वैष्णो देवी धाम में कई पावन स्थान हैं। 2. भारत का धार्मिक मंदिर अमृतसर में स्वर्ण मंदिर / स्वर्ण मंदिर / हरमंदिर साहिब  भारत के धार्मिक तीर्थ स्थलों में अमृतसर का स्वर्ण मंदिर / हरमंदिर साहिब सिखों के चौथे गुरु श्री रामदास साहिब जी द्वारा निर्मित किया गया था। भारत में धार्मिक स्थलों की यात्रा करने के लिए गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब भारत में सिख तीर्थ स्थल में सबसे ख़ास माना जाता है। स्वर्ण जडित यह पवित्र पर्यटन स्थल अपने में कई ऐतिहासिक घटनाओ को समेटे हुए हैं। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। अमृत कलश (झील) और तीर्थ परिसर कि यात्रा टूरिस्टों को बहुत लुभाती हैं। 3. भारत का ऐतिहासिक धार्मिक स्थल कोणार्क सूर्य मंदिर (सन टेम्पल) कोणार्क सूर्य मंदिर भारत में ओडिशा के तट पर पुरी से लगभग 35 किलोमीटर कि दूरी पर उत्तर-पूर्व कोणार्क में स्थित है। हिंदू देवता सूर्य को समर्पित यह एक विशाल मंदिर है और भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हैं। कोणार्क दो शब्दों कोण (कोना) और अर्क (अर्का) से मिलकर बना है। जहां कोण का अर्थ कोना (कॉर्नर) और अर्क का अर्थ सूर्य (सूर्य) है। दोनों को संयुक्त रूप से मिलाने पर यह सूर्य का कोना यानि कोणार्क कहा जाता है। कोणार्क के सन मंदिर को काले पैगोडा के नाम से भी जाना जाता है। 4. हिंदुस्तान के धार्मिक स्थल जगन्नाथ मंदिर पूरी भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में जगन्नाथ मंदिर ओडिशा में सबसे अच्छा धार्मिक स्थल माना जाता हैं। इस मंदिर के प्रमुख देवता भगवान जगन्नाथ, बलभद्रऔर देवी सुभद्रा हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं, जिसमे मंदिर के तीनो मुख्य देवताओं को एक रथ में बिठाया जाता हैं। इस पवित्र मंदिर को भारतीय संस्कृति का प्रामाणिक प्रतिबिंब माना जाता है। 5. भारत का दर्शनीय स्थल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का पहले द्वादश ज्योतिर्लिंग (प्रकाश का स्तंभ) हैं। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य में स्थित हिन्दू धर्म का एक प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। हिन्दू धर्म से सम्बंधित यह पवित्र स्थान पर्यटकों को अपने दरबार में आमंत्रित करता हैं। 6. भारत का प्रसिद्ध तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर  भारत के प्रसिद्ध स्थानों में शामिल तिरुपति का वेंकटेश्वर मंदिर यहाँ का एक प्रमुख दर्शनीय स्थान हैं, जोकि भगवान विष्णु का अवतार हैं। भगवान विष्णु का तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर आंध्र प्रदेश राज्य के तिरुपति में शेषचलम श्रेणी की अंतिम पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर भारत में सबसे अधिक देखे जाने वाले हिंदू मंदिरों में से एक हैं। 7. भारत में देखने लायक जगह हेमकुंड साहिब भारत में देखने वाली जगहों में शामिल हेमकुंड साहिब भारत का प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। हेमकुंड साहिब की संरचना पंचकोणीय है। बर्फ से ढंकी हुई ऊँची पहाड़ियों पर स्थित इस स्थान सुन्दरता देखने लायक होती हैं। पर्यटक हेमकुंड का दौरा करना बहुत अधिक पसंद करते हैं। 8. भारत के पवित्र तीर्थ स्थल अमरनाथ गुफा भारत में देखने वाली पवित्र जगहों में अमरनाथ गुफा भारत के सबसे खूबसूरत राज्य जम्मू और कश्मीर में स्थित है। अमरनाथ गुफा भारत के प्राचीन तीर्थ स्थलों में शुमार हैं। माना जाता है कि भगवान भोले नाथ ने अपनी पत्नी देवी पार्वती की अमरता का रहस्य इसी स्थान पर उजागर किया था। यह स्थान अमरनाथ लिंग के लिए प्रसिद्ध हैं और हिन्दू धर्म का एक परम पूजनीय स्थान हैं। 9. इंडिया के फेमस धार्मिक स्थल वाराणसी भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित वाराणसी भारत में एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है, जोकि हिन्दू धर्म की आस्था से सम्बंधित हैं। वाराणसी की सुन्दरता और अखंडता को देखने के लिए देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की लम्बी कतार लगी रहती है। शहर के मध्य से प्रवाहित होने वाली पवित्र गंगा नदी निस्संदेह वाराणसी शहर की सुन्दरता और पवित्रता को बढ़ा देती है। सुबह शाम होने वाली गंगा नदी की आरती से वाराणसी शहर में भक्ति लहर दौड जाती है। 10. इंडिया टूरिज्म में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल द्वारका नगरी भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल द्वारिका नगरी एक प्रमुख तीर्थ स्थल हैं जिसका निर्माण महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण ने करबाया था। जब श्री कृष्ण और बलराम ने अपनी राजधानी मथुरा से द्वारिका में स्थानांतरित की थी। द्वारिका गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित है। हिन्दू धर्म से सम्बंधित द्वारिका चार धामों में से एक हैं। 11. भारत में फेमस ऋषिकेश शहर की धार्मिक यात्रा ऋषिकेश भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों की यात्राओं में शामिल है। यहां स्थित असंख्य हिंदू मंदिरों और योग केंद्रों की भारी व्यवस्था की गई हैं। ऋषिकेश धाम भारत में यात्रा करने के लिए एक प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। 12. भारत में घूमने वाली जगह मथुरा भारत के दर्शनीय स्थलों में मथुरा एक ऐसी जगह है जोकि भारत की सबसे पवित्र भूमि मानी जाती हैं। दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पवित्र स्थान भगवान श्री कृष्ण

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जानिए, क्यों मनाते हैं बैसाखी और क्या है महत्व

)बैसाखी का त्योहार 14 अप्रैल 2023 को मनाया जाएगा. पंजाब के लोगों, विशेषकर सिखों के लिये, वैसाखी एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व है. वैसाखी को हिन्दु सौर कैलेंडर पर आधारित, सिख नव वर्ष के रूप में भी मनाया जाता है भारत त्योहारों का देश माना जाता है। अलग-अलग धर्मों का पालन करने वाले लोग यहां रहते हैं। हर धर्म के अपने-अपने कुछ खास त्योहार हैं। पूरे साल भर इसी तरह त्योहारों का उत्सव चलता रहता है। हिंदू धर्म में होली, दीपोत्सव और रक्षाबंधन जैसे त्योहार मनाते हैं। उसी तरह सिख लोगों के लिए चैत्र माह में पड़ने वाला बैसाखी का त्योहार खास होता है। यह समय ही कुछ विशेष होता है, खेतों मे रबी की फसल पक कर लहलहाती है। किसान अपनी मेहनत से आई फसलों को देखकर खुश होते हैं। मान्यता है कि इस खुशी का इजहार बैसाखी त्योहार को मनाकर करते हैं। वैसे इस त्योहार के मनाए जाने को लेकर कई मान्यताएं है। हम आपको इसके महत्व और मनाए जाने के पीछे के कारणों के बारे में बताएंगे। बैसाखी के पर्व की शुरुआत भारत के पंजाब प्रांत से हुई है और इसे रबी की फसल की कटाई शुरू होने की सफलता के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा के अलावा उत्तर भारत में भी बैसाखी के पर्व का बहुत महत्व है। इस दिन गेहूं, तिलहन, गन्ने आदि की फसल की कटाई शुरू होती है। क्यों मनाते हैं बैसाखीदरअसल बैसाखी को मनाए जाने का एक कारण यह भी है कि इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। बैसाखी का पर्व किसानों का खास त्योहार होता है। किसान भाई इसी दिन अपनी अच्छी फसल के लिए भगवान का शुक्रिया करते हैं। इतिहास पर गौर फरमाएं तो सन् 1699 मे इसी दिन सिक्खों के अंतिम गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिक्खों को खालसा के रूप मे संगठित किया था, यह भी इस दिन को खास बनाने का एक कारण है। कैसे मनाते हैं बैसाखीइस त्योहार की तैयारी भी सबसे बड़े त्योहार दीपावली की ही तरह कई दिनों पहले से शुरू हो जाती है। लोग घरों की सफाई करते है, आंगन में अल्पना और रंगोली बनाई जाती है। शाम को लाइटिंग से घर सजाते हैं, कई तरह के पकवान बनाते हैं। सुबह स्नान आदि के बाद सिक्ख लोग गुरुद्वारे जाते हैं। गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ होता है, कीर्तन आदि करवाए जाते हैं। नदी के किनारे मेले लगाए जाते हैं जिसमें भारी संख्या में लोग आते हैं। पंजाबी लोग इस दिन विशेष नृत्य भांगड़ा करते हुए खुशी मनाते हैं। बच्चे,बूढ़े और महिलाएं सभी ढोल की आवाज में मदमस्त हो जाते हैं और हर्षोल्लास से नाचते गाते हैं। वैसे तो यह त्योहार पूरे भारत वर्ष मे मनाया जाता है, परंतु पंजाब और हरियाणा राज्यों मे इस त्योहार की चहक अलग ही होती है। यह है महत्वहिंदू धर्म के लोग बैसाखी को नववर्ष के रुप में भी मनाते हैं इस दिन स्नान, भोग आदि लगाकर पूजा की जाती है। हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मान्यता यह भी है कि हजारों साल पहले मुनि भागीरथ कठोर तपस्या के बाद देवी गंगा को धरती पर उतारने में इसी दिन कामयाब हुए थे। इसलिये इस दिन हिंदू संप्रदाय के लोग पारंपरिक रूप से गंगा स्नान करने को भी पवित्र मानते हैं व देवी गंगा की स्तुति करते हैं। इस दिन पवित्र नदियोंं में स्नान का अपना अलग महत्व है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी बैसाखी का बहुत ही शुभ व मंगलकारी महत्व है क्योंकि इस दिन आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। वहीं सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से इसे मेष सक्रांति भी कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि लोगों के राशिफल पर बैसाखी का सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसे सौर नववर्ष भी कहा जाता है। मेष संक्राति के दौरान पर्वतीय इलाकों में भी मेलों का आयोजन होता है व देवी पूजा करने का रिवाज है। लोग इस दिन अपने घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

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श्राद्ध या पितृपक्ष में कौवों को भोजन क्यों कराते है ?

श्राद्ध के समय लोग अपने पूर्वजों को याद करके यज्ञ करते हैं और कौए को अन्न जल अर्पित करते हैं। दरअसल, कौए को यम का प्रतीक माना जाता है। गरुण पुराण के अनुसार, अगर कौआ श्राद्ध को भोजन ग्रहण कर लें तो पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। साथ ही ऐसा होने से यम भी खुश होते हैं और उनका संदेश उनके पितरों तक पहुंचाते है। पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष में कौवों को पितरों का प्रतिक मानकर भोजन कराया जाता है। लेकिन भोजन कौए को ही क्यों दिया जाता है, इसका वर्णन हमे हमारे पुराणों और ग्रंथों में मिलता है। हमारे धर्म ग्रंथों में इससे सम्बंधित 2 प्रसंगों का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है। पहले प्रसंग के अनुसार मरूता नाम के राजा एक बार यज्ञ कर रहे थे। इसमें इंद्र सहित सभी देवता शामिल हुए। इसमें देवताओं का दुश्मन रवाना (कौए की तरह दिखने वाला एक पक्षी) भी यहां आ गया। फिर इंद्र ने मोर, कुबेर ने गिरगिट, वरुण ने श्वान और यम ने कौए का रूप धारण कर कर उसे भगाया और फिर मूल रूप में वापस लौट आए। उन्होंने अपनी जान की रक्षा करने के लिए कौए, गिरगिट और श्वान को वरदान भी दिया। यम ने कौए को वरदान दिया कि तुम्हें दिया भोजन पूर्वजों की आत्मा को भी शांत करेगा। दूसरे प्रसंग के अनुसार इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था। त्रेता युग की घटना कुछ इस प्रकार हैं – जयंत ने कौऐ का रूप धर कर माता सीता को घायल कर दिया था। तब भगवान श्रीराम ने तिनके से ब्रह्मास्त्र चलाकर जयंत की आंख को क्षतिग्रस्त कर दिया था। जयंत ने अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी, तब राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा। इसके अलावा गरुण पुराण में भी कौओं का जिक्र आया है। गरुड़ पुराण में बताया है कि कौएं यमराज के संदेश वाहक होते हैं। श्राद्ध पक्ष में कौएं घर-घर जाकर खाना ग्रहण करते हैं, इससे यमलोक में स्थित पितर देवताओं को तृप्ति मिलती है। कौओं के संबंध में एक रोचक बात यह है की कौएं KHA की आवाज निकालते है। मूल रूप से KHA एक संस्कृत शब्द हैं। इसके कई अर्थ है – सूर्य, वायु, स्वर्ग, आसमान, पृथ्वी, ख़ुशी, ब्रह्म आदि। विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी कौओं का वर्णन मिलता है। ग्रीक माइथोलॉजी में रैवन (एक प्रकार का कौवा) को गुड लक का सिम्बल माना गया है। इसे गॉड का मैसेंजर कहा गया है। इसे दुनिया का निर्माण करने वालों में से एक बताया गया है। नोर्स माइथोलॉजी में दो रैवन (एक प्रकार का कौवा) हगिन और मुनिन का जिक्र मिलता है। इन्हें ईश्वर के प्रति उत्साह का प्रतीक बताया गया है। इजिप्शियन माइथोलॉजी में आत्मा के तीन रूप माने गए हैं। ये ‘का’, ‘बा’ और ‘अख’ होते हैं। इनमें ‘का’ को प्राणशक्ति बताया गया है। ‘का’ के निकलते ही व्यक्ति प्राणहीन हो जाता है।

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कालाष्टमी व्रत कल, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी मनाई जाती है। जानिए कालाष्टमी व्रत की पूजा- विधि, शुभ मुहूर्त और महत्व के बारे में। हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी मनायी जाती है। इस बार कालाष्टमी का व्रत 13 फरवरी को रखा जाएगा।  कालाष्टमी के दिन भगवान शंकर के भैरव स्वरूप की उपासना की जाती है। दरअसल,  भैरव के तीन रूप हैं- काल भैरव, बटुक भैरव और रूरू भैरव। आज के दिन इनमें से काल भैरव की उपासना की जाती है। कहते हैं आज के दिन भगवान शंकर के काल भैरव स्वरूप की उपासना करने से जीवन की सारी परेशानियां दूर होंगी और आपकी मनचाही मुरादें पूरी होंगी। इसके साथ ही आज के दिन अष्टमी तिथि वालों का श्राद्ध है। इस उन लोगों का श्राद्ध किया जायेगा, जिनका स्वर्गवास किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ हो। इस दिन श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को विशेष फल के रूप में कई तरह की समृद्धियां प्राप्त होती हैं।  चैत्र कालाष्टमी 2023 शुभ मुहूर्तहिंदू पंचांग के अनुसार इस बार चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 14 मार्च 2023 को रात 08 बजकर 22 मिनट पर शुरू हो जाएगी. जिसका समापन अगले दिन यानी 15 मार्च 2023 को शाम 06 बजकर 45 मिनट पर होगा पूजा- विधि कालाष्टमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें। उसके बाद भगवान भैरव की पूजा- अर्चना करें।  इस दिन भगवान भोलेनाथ के साथ माता पार्वती औरभगवान गणेश की भी विधि- विधान से पूजा- अर्चना करनी चाहिए।  फिर घर के मंदिर में दीपक जलाएं आरती करें और भगवान को भोग भी लगाएं।  इस बात का ध्यान रखें भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का ही भोग लगाया जाता है। कालाष्टमी व्रत का महत्व  मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव की पूजा करने से सभी तरह के भय से मुक्ति मिल जाती है। इस दिन व्रत करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है साथ ही भैरव भगवान की कृपा से शत्रुओं से छुटकारा मिल जाता है। कालाष्टमी व्रत मंत्र शिवपुराण में कालभैरव की पूजा के दौरान इन मंत्रों का जप करना बेहद फलदायी माना गया है।  अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्,भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि!! अन्य मंत्र:ओम भयहरणं च भैरव:।ओम कालभैरवाय नम:।ओम ह्रीं बं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।ओम भ्रं कालभैरवाय फट्।

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कन्याकुमारी – धार्मिक स्थल

कन्याकुमारी धार्मिक स्थल, Kanyakumari Religious Places in hindi, हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का संगम स्थल है, जहां भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगो से मनोरम छटा बिखेरते हैं। भारत के सबसे दक्षिण छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षो से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्च है। दूर-दूर फैले समुद्र के विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र बीच पर फैले रंग बिरंगी रेत इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है। कन्याकुमारी दक्षिण भारत के महान शासकों चोल, चेर, पांड्य के अधीन रहा है। यहां के स्मारकों पर इन शासकों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस जगह का नाम कन्याकुमारी पड़ने के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने असुर बानासुरन को वरदान दिया था कि कुंवारी कन्या के अलावा किसी के हाथों उसका वध नहीं होगा। प्राचीन काल में भारत पर शासन करने वाले राजा भरत को आठ पुत्री और एक पुत्र था। भरत ने अपना साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया। दक्षिण का हिस्सा उसकी पुत्री कुमारी को मिला। कुमारी को शक्ति देवी का अवतार माना जाता था। कुमारी ने दक्षिण भारत के इस हिस्से पर कुशलतापूर्वक शासन किया। उसकी ईच्छा थी कि वह शिव से विवाह करें। इसके लिए वह उनकी पूजा करती थी। शिव विवाह के लिए राजी भी हो गए थे और विवाह की तैयारियां होने लगीं थी। लेकिन नारद मुनि चाहते थे कि बानासुरन का कुमारी के हाथों वध हो जाए। इस कारण शिव और देवी कुमारी का विवाह नहीं हो पाया। इस बीच बानासुरन को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा। कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी। दोनों के बीच युद्ध हुआ और बानासुरन को मृत्यु की प्राप्ति हुई। कुमारी की याद में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है। माना जाता है कि शिव और कुमारी के विवाह की तैयारी का सामान आगे चलकर रंग बिरंगी रेत में परिवर्तित हो गया। सागर के मुहाने के दाई और स्थित यह एक छोटा सा मंदिर है जो पार्वती को समर्पित है। मंदिर तीनों समुद्रों के संगम स्थल पर बना हुआ है। यहां सागर की लहरों की आवाज स्वर्ग के संगीत की भांति सुनाई देती है। भक्तगण मंदिर में प्रवेश करने से पहले त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाते हैं जो मंदिर के बाई ओर 500 मीटर की दूरी पर है। मंदिर का पूर्वी प्रवेश द्वार को हमेशा बंद करके रखा जाता है क्योंकि मंदिर में स्थापित देवी के आभूषण की रोशनी से समुद्री जहाज इसे लाइटहाउस समझने की भूल कर बैठते है और जहाज को किनारे करने के चक्कर में दुर्घटनाग्रस्त हो जाते है। यह स्मारक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित है। यही पर महात्मा गांधी की चिता की राख रखी हुई है। इस स्मारक की स्थापना 1956 में हुई थी। महात्मा गांधी 1937 में यहां आए थे। उनकी मृत्यु के बाद 1948 में कन्याकुमारी में ही उनकी अस्थियां विसर्जित की गई थी। स्मारक को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर सूर्य की प्रथम किरणें उस स्थान पर पड़ती हैं जहां महात्मा की राख रखी हुई है। कन्याकुमारी तिरूचेन्दूर 85 किमी दूर स्थित तिरूचेन्दूर के खूबसूरत मंदिर भगवान सुब्रमण्यम को समर्पित हैं। बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित इस मंदिर को भगवान सुब्रमण्यम के 6 निवासों में से एक माना जाता है। कन्याकुमारी नागराज मंदिर कन्याकुमारी से 20 किमी दूर नगरकोल का नागराज मंदिर नाग देव को समर्पित है। यहां भगवान विष्णु और शिव के दो अन्य मंदिर भी हैं। मंदिर का मुख्य द्वार चीन की बुद्ध विहार की कारीगरी की याद दिलाता है। कन्याकुमारी पदमानभापुरम महल पदमानभापुरम महल की विशाल हवेलियां त्रावनकोर के राजा द्वारा बनवाया हैं। ये हवेलियां अपनी सुंदरता और भव्यता के लिए जानी जाती हैं। कन्याकुमारी से इनकी दूरी 45 किमी है। यह महल केरल सरकार के पुरातत्व विभाग के अधीन हैं। कन्याकुमारी कोरटालम झरना यह झरना 167 मीटर ऊंची है। इस झरने के जल को औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है। यह कन्याकुमारी से 137 किमी दूरी पर स्थित है। कन्याकुमारी विवेकानंद रॉक मेमोरियल समुद्र में बने इस स्थान पर बड़ी संख्या में पर्यटक आते है। इस पवित्र स्थान को विवेकानंद रॉक मेमोरियल कमेटी ने 1970 में स्वामी विवेकानंद के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए बनवाया था। इसी स्थान पर स्वामी विवेकानंद गहन ध्यान लगाया था। इस स्थान को श्रीपद पराई के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर कन्याकुमारी ने भी तपस्या की थी। कहा जाता है कि यहां कुमारी देवी के पैरों के निशान मुद्रित हैं। इस स्मारक के विवेकानंद मंडपम और श्रीपद मंडपम नामक दो प्रमुख हिस्से हैं।

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गंगासागर – धार्मिक स्थल , जगन्नाथपुरी – धार्मिक स्थल

गंगासागर धार्मिक स्थल , बंगाल की खाड़ी के कॉण्टीनेण्टल शैल्फ में कोलकाता से 150 किमी (80मील) दक्षिण में एक द्वीप है। यह भारत के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस द्वीप का कुल क्षेत्रफल 300 वर्ग किमी है। इसमें 43 गांव हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 160000 है। यहीं गंगा नदी का सागर से संगम माना जाता है। इस द्वीप में ही रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास है। यहां मैन्ग्रोव की दलदल, जलमार्ग तथा छोटी छोटी नदियां, नहरें हीं। इस द्वीप पर ही प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर लाखों हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगता है, जो गंगा नदी के सागर से संगम पर नदी में स्नान करने के इच्छुक होते हैं। यहाँ एक मंदिर भी है जो कपिल मुनि के प्राचीन आश्रम स्थल पर बना है। ये लोग कपिल मुनि के मंदिर में पूजा अर्चना भी करते हैं। पुराणों के अनुसार कपिल मुनि के श्राप के कारण ही राजा सगर के 60 हज़ार पुत्रों की इसी स्थान पर तत्काल मृत्यु हो गई थी। उनके मोक्ष के लिए राजा सगर के वंश के राजा भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाए थे और गंगा यहीं सागर से मिली थीं। कहा जाता है कि एक बार गंगा सागर में डुबकी लगाने पर 10 अश्वमेध यज्ञ और एक हज़ार गाय दान करने के समान फल मिलता है। जहां गंगा-सागर का मेला लगता है, वहां से कुछ दूरी उत्तर वामनखल स्थान में एक प्राचीन मंदिर है। उसके पास चंदनपीड़िवन में एक जीर्ण मंदिर है और बुड़बुड़ीर तट पर विशालाक्षी का मंदिर है। गंगासागर तीर्थ एवं मेला महाकुंभ के बाद मनुष्यों का दूसरा सबसे बड़ा मेला है। यह मेला वर्ष में एक बार लगता है। गन्नाथपुरी – धार्मिक स्थल जगन्नाथपुरी धार्मिक स्थल, Jagannathpuri Religious Places in hindi, यह भारत के ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है। इस मंदिर को हिन्दुओं के चार धाम में से एक गिना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर का वार्षिक रथ यात्रा उत्सव प्रसिद्ध है। इसमें मंदिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा तीनों, तीन अलग-अलग भव्य और सुसज्जित रथों में विराजमान होकर नगर की यात्रा को निकलते हैं। मध्य-काल से ही यह उत्सव अतीव हर्षोल्लस के साथ मनाया जाता है। दक्षिणतम छोर पर गंगा डेल्टा में गंगा के बंगाल की खाड़ी में पूर्ण विलय (संगम) के बिंदु पर लगता है। बहुत पहले इस ही स्थानपर गंगा जी की धारा सागर में मिलती थी, किंतु अब इसका मुहाना पीछे हट गया है। अब इस द्वीप के पास गंगा की एक बहुत छोटी सी धारा सागर से मिलती है। यह मेला पांच दिन चलता है। इसमें स्नान मुहूर्त तीन ही दिनों का होता है। यहां गंगाजी का कोई मंदिर नहीं है, बस एक मील का स्थान निश्चित है, जिसे मेले की तिथि से कुछ दिन पूर्व ही संवारा जाता है। यहां स्थित कपिल मुनि का मंदिर सागर बहा ले गया, जिसकी मूर्ति अब पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है, जो भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। इसके साथ ही यह उत्सव भारत के ढेरों वैष्णव कृष्ण मंदिरों में मनाया जाता है, एवं यात्रा निकाली जाती है। यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है। यह गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के लिये खास महत्व रखता है। इस पंथ के संस्थापक श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की ओर आकर्षित हुए थे। मंदिर के शिखर पर स्थित चक्र और ध्वज। चक्र सुदर्शन चक्र का प्रतीक है और लाल ध्वज भगवान जगन्नाथ इस मंदिर के भीतर हैं, इस का प्रतीक है। गंग वंश के हाल ही में अन्वेषित ताम्र पत्रों से यह ज्ञात हुआ है, कि वर्तमान मंदिर के निर्माण कार्य को कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने आरम्भ कराया था।। मंदिर के जगमोहन और विमान भाग इनके शासन काल (1078-1148) में बने थे। फिर सन 1197 में जाकर ओडिआ शासक अनंग भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान रूप दिया था। मंदिर में जगन्नाथ अर्चना सन 1558 तक होती रही। इस वर्ष अफगान जनरल काला पहाड़ ने ओडिशा पर हमला किया और मूर्तियां तथा मंदिर के भाग ध्वंस किए और पूजा बंद करा दी, तथा विग्रहो को गुप्त मे चिलिका झील मे स्थित एक द्वीप मे रखागया। बाद में, रामचंद्र देब के खुर्दा में स्वतंत्र राज्य स्थापित करने पर, मंदिर और इसकी मूर्तियों की पुनर्स्थापना हुई। मंदिर से जुड़ी कथाएं इस मंदिर के उद्गम से जुड़ी परंपरागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अगरु वृक्ष के नीचे मिली थी। यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये। राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। उसके बाद राजा को विष्णु और विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए। किंतु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये। माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं। मंदिर का वृहत क्षेत्र 4,00,000 वर्ग फ़ुट (37,000 मी2) में फैला है और चहारदीवारी से घिरा है। कलिंग शैली के मंदिर स्थापत्यकला और शिल्प के आश्चर्यजनक प्रयोग से परिपूर्ण, यह मंदिर, भारत के भव्यतम स्मारक स्थलों में से एक है।मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का

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शिव आराधना सावन में

शिव आराधना सावन में, भोलेनाथ भगवान शिव की भक्ति का प्रमुख माह सावन है श्रावण जुलाई से प्रारंभ हो जाता है। यह काफी शुभ फलदायक है। पूरे माह भर भोलेनाथ की पूजा-अर्चना का दौर जारी रहता है। सभी शिव मंदिरों में श्रावण मास के अंतर्गत विशेष तैयारियां की जाती हैं। चारों ओर श्रद्धालुओं द्वारा ‘बम-बम भोले और ॐ नम: शिवाय’ की गूंज सुनाई देगी। सोमवार, सावन मास, वैधृति योग व आयुष्मान योग सभी के मालिक स्वत: शिव ही हैं। इस लिए इस बार का सावन खास है। पुराणों के अनुसार सावन में भोले शंकर की पूजा, अभिषेक, शिव स्तुति, मंत्र जाप का खास महत्व है। खासकर सोमवारी के दिन महादेव की आराधना से शिव और शक्ति दोनों प्रसन्न होते हैं।इनकी कृपा से दैविक, दैहिक और भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। निर्धन को धन और नि:संतान को संतान की प्राप्ति होती है। कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। बाबा भोले की पूजा से भाग्य पलट सकता है। श्रावण का यह महीना भक्तों को अमोघ फल देने वाला है। माना जाता है कि भगवान शिव के त्रिशूल की एक नोक पर काशी विश्वनाथ की पूरी नगरी का भार है। उसमें श्रावण मास अपना विशेष महत्व रखता है। श्रावण मास शुरू होते ही कावड़ का मेला शुरू हो जाता है। श्रावण मास में जिस दिन भोलेनाथ पर जल चढ़ता है उस दिन का विशेष महत्व होता है। इस दौरान खास तौर पर महिलाएं श्रावण मास में विशेष पूजा-अर्चना और व्रत-उपवास रखकर पति की लंबी आयु की प्रार्थना भोलेनाथ से करती हैं। खास कर सभी व्रतों में सोलह सोमवार का व्रत श्रेष्ठ माना जाता है। इस व्रत को वैशाख, श्रावण मास, कार्तिक मास और माघ मास में किसी भी सोमवार से प्रारंभ किया जा सकता है। इस व्रत की समाप्ति पर सत्रहवें सोमवार को सोलह दंपति को भोजन व किसी वस्तु का दान उपहार देकर उद्यापन किया जाता है। पूजा में शिव परिवार को पंचामृत यानी दूध, दही, शहद, शक्कर, घी व जलधारा से स्नान कराकर, गंध, चंदन, फूल, रोली, वस्त्र अर्पित करें। शिव को सफेद फूल, बिल्वपत्र, सफेद वस्त्र और श्री गणेश को सिंदूर, दूर्वा, गुड़ व पीले वस्त्र चढ़ाएं। भांग-धतूरा भी शिव पूजा में चढ़ाएं। शिव को सफेद रंगे के पकवानों और गणेश को मोदक यानी लड्डूओं का भोग लगाएं। भगवान शिव व गणेश के जिन स्त्रोतों, मंत्र और स्तुति की जानकारी हो, उसका पाठ करें। श्री गणेश व शिव की आरती सुगंधित धूप, घी के पांच बत्तियों के दीप और कर्पूर से करें। अंत में गणेश और शिव से घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामनाएं करें।

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श्री हनुमान जंयती

 हनुमान जंयती हनुमान जयंती पूरे भारतवर्ष में हर साल बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन को भक्तगण हनुमान जी के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है। भारतीय हिन्दी कैलेंडर के अनुसार यह त्यौहार हर साल चैत्र (चैत्र पूर्णिमा) माह के शुक्ल पक्ष में 15वें दिन मनाया जाता है। श्री हनुमान जी, भगवान श्रीराम के बहुत बड़े भक्त थे ये हम सभी जानते है तो इस दिन हनुमान जी के साथ साथ प्रभु श्रीराम की भी पूजा करते है, पूरे भारत में हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा प्रभु श्री राम में अपनी गहरी आस्था के कारण पूजे जाते हैं। हनुमान जयंती हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा हिन्दूओं के एक महत्वपूर्ण त्यौहार के रुप में बड़े उत्साह और जोश के साथ मनाई जाती है। यह एक महान हिन्दू पर्व है, जो सांस्कृतिक और परंपरागत तरीके से मनाया जाता है। लोग हनुमान जी की पूजा आस्था, जादूई शक्तियों, ताकत और ऊर्जा के प्रतीक के रुप में करते हैं। लोग हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, क्योंकि यह बुरी शक्तियों का विनाश करने और मन को शान्ति प्रदान करने की क्षमता रखती है। इस दिन हनुमान भक्त सुबह जल्दी नहाने के बाद श्री हनुमान जी के मंदिर जाते हैं, और हनुमान जी की मूर्ति पर लाल सिंदूर का चोला चढ़ाते हैं, हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, लड्डू का प्रसाद चढ़ाते हैं, और मंत्रों का जाप करते हुए आरती करते हैं, मंदिर की परिक्रमा आदि करके बहुत सारी रस्में करते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं, कि हनुमान जी का जन्म वानर समुदाय में लाल-नारंगी शरीर के साथ हुआ था, इसी कारण सभी हनुमान मंदिरों में लाल-नारंगी रंग की हनुमान जी की मूर्ति होती है। पूजा के बाद लोग अपने मस्तिष्क पर लाल सिन्दूर का टीका प्रसाद के रुप में लगाते हैं और अपनी मनोकामना पूरी करने के लिये लड्डुओं का भोग लगा कर प्रसाद वितरण करते हैं। कब मनाई जाती है हनुमान जयंती :- महाराष्ट्र में हनुमान जयंती हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यद्दपि अन्य हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह अश्विन माह के अंधेरे पक्ष में 14वें दिन पड़ती है। पूजा के बाद पूरा आशीर्वाद पाने के लिए लोगों में प्रसाद बाँटा जाता है। उड़ीसा में हनुमान जयंती वैशाख (अप्रैल) महीने के पहले दिन मनाई जाती है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में हनुमान जयंती वैशाख महीने के 10वें दिन मनाई जाती है, जो चैत्र पूर्णिमा से शुरु होती है और वैशाख महीने के 10वें दिन कृष्ण पक्ष पर खत्म होती है। तमिलानाडु और केरल में हनुमान जयंती मार्ग शीर्ष माह (दिसम्बर और जनवरी के बीच में) में इस विश्वास के साथ मनाई जाती है, कि भगवान हनुमान इस महीने की अमावश्या को पैदा हुए थे। हनुमान जयंती मनाने का महत्व : प्रभु हनुमान वानर समुदाय से थे, और हिन्दू धर्म के लोग हनुमान जी को एक दैवीय जीव के रुप में पूजते हैं। यह त्यौहार सभी के लिए बहुत अधिक महत्व रखता है, हालांकि ब्रह्मचारी, पहलवान और बलवान इस समारोह की ओर से विशेष रुप से प्रेरित होते हैं। हनुमान जी अपने भक्तों के बीच में बहुत से नामों से जाने जाते हैं; जैसे- बजरंगबली, पवनसुत, पवन कुमार, महावीर, बालीबिमा, मारुतिसुत, संकट मोचन, अंजनिपुत्र, मारुति, आदि। हनुमान जी के अवतार को महान शक्ति, आस्था, भक्ति, ताकत, ज्ञान, दैवीय शक्ति, बहादुरी, बुद्धिमत्ता, निःस्वार्थ सेवा-भावना आदि गुणों के साथ भगवान शिव का 11वाँ रुद्र अवतार माना जाता है। इन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्री राम और माता सीता की भक्ति में लगा दिया और बिना किसी उद्देश्य के कभी भी अपनी शक्तियों का प्रदर्शन नहीं किया। हनुमान भक्त हनुमान जी की प्रार्थना उनके जैसा बल, बुद्धि, ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए करते हैं। इनके भक्तों के द्वारा इनकी पूजा बहुत से तरीकों से की जाती है। कुछ लोग अपने जीवन में शक्ति, प्रसिद्धी, सफलता आदि प्राप्त करने के लिए बहुत समय तक इनके नाम का जाप करने के द्वारा ध्यान करते हैं, वहीं कुछ लोग इस सब के लिए हनुमान चालीसा का जाप करते हैं। हनुमान जयंती कथा : एकबार एक महान संत अंगिरा स्वर्ग के स्वामी इन्द्र से मिलने के लिए स्वर्ग गए, और उनका स्वागत स्वर्ग की अप्सरा पुंजीक्ष्थला के नृत्य के साथ किया गया। हालांकि संत को इस तरह के नृत्य में कोई रुचि नहीं थी, उन्होंने उसी स्थान पर उसी समय अपने प्रभु का ध्यान करना शुरु कर दिया। नृत्य के अन्त में इन्द्र ने उनसे नृत्य के प्रदर्शन के बारे में पूछा। तो संत उस समय चुप थे, और उन्होंने कहा कि, मैं अपने प्रभु के गहरे ध्यान में था, क्योंकि मुझे इस तरह के नृत्य प्रदर्शन में कोई रुचि नहीं है। यह इन्द्र और अप्सरा के लिए बहुत अधिक लज्जा का विषय था, उसने संत को निराश करना शुरु कर दिया और तब अंगिरा ने उसे शाप दिया कि, ‘देखो! तुमने स्वर्ग से पृथ्वी को नीचा दिखाया है। तुम पर्वतीय क्षेत्र के जंगलों में मादा बंदर के रुप में पैदा हो।’ उसे फिर अपनी गलती का अहसास हुआ और संत से क्षमा याचना की। तब उस संत को उस पर थोड़ी सी दया आई और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि, ‘प्रभु का एक महान भक्त तुमसे पैदा होगा। वह सदैव परमात्मा की सेवा करेगा।’ इसके बाद वह कुंजार (पृथ्वी पर बन्दरों के राजा) की बंटी बनी और उनका विवाह सुमेरु पर्वत के राजा केसरी से हुआ। उन्होंने पाँच दिव्य तत्वों जैसे- ऋषि अंगिरा का शाप और आशीर्वाद, उसकी पूजा, भगवान शिव का आशीर्वाद, वायु देव का आशीर्वाद और पुत्रश्रेष्ठी यज्ञ से हनुमान को जन्म दिया। यह माना जाता है, कि भगवान शिव ने पृथ्वी पर मनुष्य के रुप पुनर्जन्म 11वें रुद्र अवतार के रुप में हनुमान बनकर जन्म लिया, क्योंकि वे अपने वास्तविक रुप में भगवान श्री राम की सेवा नहीं कर सकते थे। सभी वानर समुदाय सहित मनुष्यों को बहुत खुशी हुई और महान उत्साह और जोश के साथ नाच, गाकर और बहुत सी अन्य खुशियों वाली गतिविधियों के साथ उनका जन्मदिन मनाया। तभी से यह दिन उनके भक्तों के द्वारा उन्हीं की तरह ताकत और बुद्धिमत्ता प्राप्त करने के लिए हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है। साधना हेतु मंत्र

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कैसे हुआ हनुमान जी का जन्म, बेहद रोचक है कहानी, जानें

हनुमान जयंती 6 अप्रैल 2023, गुरुवार को है. हनुमान जयंती पर हनुमान जी की जन्म कथा का श्रवण करने से बजरंगबली की कृपा बरसती है. हनुमान जयंती 6 अप्रैल 2023, गुरुवार को है. साल में दो बार हनुमान जयंती मनाई जाती है. उत्तर भारत में हनुमान जयंती चैत्र माह की पूर्णिमा पर दूसरी बार कार्तिक महीने में. महावीर हनुमान को भगवान शिव का 11वां रूद्र अवतार कहा जाता है और वे प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त हैं. इस दिन हनुमान जी ने वानर जाति में जन्म लिया. हनुमानजी एक ऐसे देवता हैं जो त्रेतायुग से लेकर आज तक सबसे शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने जाते हैं. मान्यता है कि जहां भी राम कथा होती है वहां हनुमानजी किसी ना किसी रूप में मौजूद रहते हैं. हनुमान जयंती पर हनुमान जी की जन्म कथा का श्रवण करने से बजरंगबली की कृपा बरसती है. हनुमान जयंती 2023 मुहूर्त चैत्र पूर्णिमा तिथि शुरू – 05 अप्रैल 2023, सुबह 09.19 चैत्र पूर्णिमा तिथि समाप्त – 06 अप्रैल 2023, सुबह 10.04 शुभ (उत्तम) – सुबह 06.06 – सुबह 07.40 लाभ (उन्नति) – दोपहर 12.24 – दोपहर 01.58 हनुमान जयंती कथा हनुमान जी को केसरीनंदन और आंजनाय पुत्र कहा जाता है, वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार इन्हें हनुमान जी के जन्म के पीछे पवन देव का भी योगदान था, इसलिए यह पवन पुत्र भी कहलाए गए. पौराणिक कथा के अनुसार त्रैतायुग में राजा दशरथ में पुत्र प्राप्ति के लिए एक हवन. हवन समाप्ति के बाद गुरुदेव ने प्रसाद की खीर राजा दशरथ की तीनों रानियों  कौशल्या, सुभद्रा और कैकेयी को बांटी. उस समय खीर का थोड़ा सा हिस्सा एक पक्षी ले गया. ऐसे हुआ हनुमान जी का जन्म उड़ते-उड़ते वह पक्षी देवी अंजना के आश्रम चला गया. यहां माता अंजना तपस्या कर रही थी. उस दौरान पक्षी के मुंह से खीर माता अंजना के हाथ में गिर गई. देवी ने इसे भोलेनाथ का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लिया. इस प्रसाद के प्रभाव और ईश्वर की कृपा से माता अंजना ने शिव के अवतार बाल हनुमान को जन्म दिया. उस दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि थी. हनुमान जयंती पर कैसे करें पूजा हनुमान जयंती के दिन बजरंगबली को चमेली के तेल में मिश्रित सिंदूर का चोला चढ़ाएं. अक्षत, कनेर, गुड़हल या गुलाब के पुष्प चढ़ाएं. नैवेद्य में मालपुआ, बेसन के लड्डू अर्पित करें. ‘ॐ हं हनुमते नम:‘ का 108 बार जाप करें. हनुमान चालीसा का पाठ करें. अब आरती के पश्चात गरीबों को दान दें. श्री हनुमान चालीसा दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।  बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।  चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे।। लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना।। जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।। दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा। और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।। साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।। राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै।। अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।। संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।। तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।। दोहा : पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

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आज कामदा एकादशी पर पढ़ें यह व्रत कथा, पापों से मिलती है मुक्ति

यह व्रत रखने से पाप और कष्ट मिटते हैं. भगवान श्री विष्णु की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं. जो लोग व्रत रखते हैं, उनको कामदा एकादशी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. किसी कारणवश आप पाठ नहीं कर सकते हैं, तो कामदा एकादशी व्रत कथा को सुन लें. ऐसा करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है. आइए जानते हैं कामदा एकादशी व्रत कथा के बारे में. उस राजा की पत्नी ने चैत्र एकादशी का व्रत रखकर भगवान् नारायण से प्रार्थना की थी कि मेरे इस व्रत का फल मेरे पति को प्राप्त हो जाये। भगवान् नारायण ने पत्नी के व्रत का फल उसके राक्षस बन चुके पति राजा पुंडरीक को दे दिया जिससे वह राक्षस से एक बार फिर से राजा बन गया। कामदा एकादशी व्रत कथा एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताने की प्रार्थना की. तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि चैत्र शुक्ल एकादशी व्रत को कामदा एकादशी कहते हैं. इस व्रत को करने से पाप से मुक्ति मिलती है. इस एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है प्राचीन काल में एक भोगीपुर राज्य था, जिसका राजा पुंडरीक था. वह धन एवं ऐश्वर्य से युक्त था. उसके ही राज्य में ललित और ललिता नाम के स्त्री और पुरुष रहते थे. दोनों एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे. एक बार राजा पुंडरीक की सभा में ललित अन्य कलाकारों के साथ गाना गा रहा था, उसी दौरान ललिता को देखकर उसका ध्यान भंग हो गया और वह स्वर बिगड़ गया

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