November 2023

Tulsi Vivah 2023: तुलसी विवाह कब है? जानें डेट, तिथि, शुभ मुहूर्त व महत्व

Tulsi Vivah 2023:हिंदू पंचांग के अनुसार, तुलसी विवाह हमेशा देवउठनी एकादशी के दिन किया जाता है. इस दिन तुलसी माता और शालिग्राम भगवान का विवाह किया जाता है. यह हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है. आइए जानते हैं इस बार तुलसी विवाह कब है और इसका क्या महत्व है. Tulsi Vivah 2023: हिंदू रीति-रिवाजों में तुलसी विवाह का विशेष महत्व है. इस दिन विष्णु भगवान के शालिग्राम स्वरुप के साथ तुलसी जी के विवाह का विधान है. मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक तुलसी माता का विवाह संपन्न कराता है उसके दांपत्य जीवन में खुशियां बनी रहती हैं. सारी मनोकामनाएं पूरी होती है और संतान सुख का भी वरदान मिलता है. पंचांग के अनुसार, तुलसी विवाह प्रति वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के एक दिन बाद रचाई जाती है. इस दिन देशभर में तुलसी विवाह का धूमधाम से आयोजन किया जाता है. इसके साथ हीं, शादी-विवाह आदि मांगलिक कार्यों के शुभ मुहूर्त की भी शुरुआत हो जाती है. तो चलिए जानते हैं इस साल तुलसी विवाह कब है और इसका क्या महत्व है. कब है तुलसी विवाह? तुलसी विवाह हर साल हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के एक दिन बाद मनाई जाती है. लेकिन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, इस बार 23 नवंबर को एकादशी है और अगले दिन 24 नवंबर को द्वादशी तिथि है. द्वदशी तिथि पर घरों में तुलसी माता और शालिग्राम भगवान का विवाह रचाने का विधान है. कहते हैं, ऐसा करने से व्यक्ति जीवन में खूब तरक्की करते हैं और भाग्य में भी वृद्धि होती है. तुलसी विवाह की शुभ मुहूर्त तुलसी विवाह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर किया जाता है. पंचांग के अनुसार, द्वादशी तिथि 23 नवंबर, गुरुवार की शाम 9 बजकर 01 मिनट से प्रारंभ होगी. वहीं इसका समापन 24 नवंबर, शुक्रवार की शाम 7 बजकर 06 मिनट पर होगा. ऐसे में उदयातिथि को मानते हुए तुलसी विवाह 24 नवंबर को ही मनाया जाएगा. कहते हैं, इस शुभ संयोग में अपने घर तुलसी-शालिग्राम के विवाह रचाने से घर में अपार धन का आगमन होता है और वैवाहिक जीवन में भी खुशियां आती हैं. Tulsi Vivah katha तुलसी विवाह की पौराणिक कथा, जानें क्यों कराया जाता है प्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी विवाह तुलसी विवाह पूजा विधि- व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करें और व्रत संकल्प लें।इसके बाद भगवान विष्णु की अराधना करें।अब भगवान विष्णु के सामने दीप-धूप जलाएं। फिर उन्हें फल, फूल और भोग अर्पित करें।मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान विष्णु को तुलसी जरुरी अर्पित करनी चाहिए। शाम को विष्णु जी की अराधना करते हुए विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें। पूर्व संध्या को व्रती को सिर्फ सात्विक भोजन करना चाहिए। व्रत के दौरान अन्न का सेवन नहीं किया जाता।व्रत खोलने के बाद ब्राहम्णों को दान-दक्षिणा दें। तुलसी विवाह सामग्री लिस्ट पूजा में मूली, शकरकंद, सिंघाड़ा, आंवला, बेर, मूली, सीताफल, अमरुद और अन्य ऋतु फल चढाएं जाते हैं।   तुलसी पूजा में लगाएं ये चीजें देवउठनी एकादशी पर पूजा स्थल में गन्नों से मंडप सजाया जाता है। उसके नीचे भगवान विष्णु की प्रतिमा विराजमान कर मंत्रों से भगवान विष्णु को जगाने के लिए पूजा की जाती है।तुलसी विवाह के दिन व्रत का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत करने से जन्म और जन्म के पूर्व के पापों से मुक्ति मिल जाती है। कार्तिक मास की एकादशी को तुलसी विवाह का त्यौहार बेहद शुभ माना जाता है। तुलसी को विष्णुप्रिया नाम से भी जाना जाता है। तुलसी विवाह का महत्व Tulsi Vivah 2023 सनातन धर्म में तुलसी विवाह का खास महत्व होता है. इस दिन तुलसी माता के साथ भगवान विष्णु के शालिग्राम अवतार की शादी रचाई जाती है. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से तुलसी-शालिग्राम के विवाह रचाने से जीवन में सकारात्मकता आती है. साथ ही विवाह में आ रही अड़चने भी दूर होती. कहते हैं जो व्यक्ति जीवन में एकबार भी तुलसी विवाह विधिपूर्वक कर लेता है तो उसे कन्यादान के बराबर फल मिल जाता है.

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Tulsi Vivah katha तुलसी विवाह की पौराणिक कथा, जानें क्यों कराया जाता है प्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी विवाह

Tulsi Vivah 2023 Date : ऐसा करने से भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। क्योंकि पद्म पुराण के अनुसार तुलसी जी लक्ष्मी का ही रुप है और भगवान विष्णु ने शालग्राम का रुप लिया था। ऐसा क्यों हुआ इसके पीछे ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथा है। तुलसी और शालग्राम विवाह करवाने से घर में समृद्धि और सुख बढ़ता है। इसलिए सनातन धर्म में देवी तुलसी और भगवान शालग्राम के विवाह की परंपरा है। Tulsi Vivah poranik katha: पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक राक्षस था जिसका नाम जालंधर था। वह बहुत ही शक्तिशाली था। उसे हरा पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। उसके शक्तिशाली होने का कारण था। उसकी पत्नी वृंदा। दरअसल, उसकी पत्नी बहुत ही पतिव्रता थी। उसके प्रभाव से जालंधर को कोई भी परास्त नहीं कर पाता था। धीरे धीरे उसके उपद्रव के कारण देवतागण परेशान होने लगे। तब सभी देवतागण मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचा और उन्हें सारी व्यथा सुनाई। इसके बाद समाधान यह निकाला गया की क्यों न वृंदा के सतीत्व को ही नष्ट कर दिया जाए। Tulsi Vivah 2023: तुलसी विवाह कब है? जानें डेट, तिथि, शुभ मुहूर्त व महत्व तब भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वृंदा के पास जा पहुंचे। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे। जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गई। ऋषि ने वृंदा के सामने दोनों को भस्म कर दिया। इसके बाद वृंदा ने अपने पति के बारे में पूछा जो कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के साथ युद्ध कर रहा था। ऋषि ने अपनी माया से दो वानर को प्रकट किया। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था और दूसरे के हाथ में उसका धड़। अपनी पति की ऐसी स्थिति को देखकर वृंदा मूर्छित हो गई। जब वह होश में आई जो उसने ऋषि से विनती की कि वह उसके पति को जिंदा कर दें। इसके बाद भगवान विष्णु ने अपनी माया से जालंधर का सिर फिर से धड़ से जोड़ दिया। लेकिन वह साथ ही उसी शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को भगवान के इस छल का जरा भी पता नहीं चला। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी। जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया और ऐसा होते ही वृंदा का पति युद्ध हार गया। इन सबके बारे में जब वृंदा को पता चला तो उसने क्रोध में आकर उसने भगवान विष्णु को हृदयहीन शिला होने का श्राप दे दिया। अपने भक्त के श्राप को भगवान विष्णु ने स्वीकार किया और शालिग्राम पत्थर बन गए। सृष्टि के पालनकर्ता के पत्थर बन जाने से ब्रह्मांड में असंतुलन हो गया। इसके बाद सभी देवताओं ने वृंदा से प्रार्थना की वह जल्द ही भगवान विष्णु को श्राप मुक्त कर दें। इसके बाद वृंदा ने भगवान विष्णु को तो श्राप मुक्त कर दिया लेकिन, उसने खुद आत्मदाह कर लिया। जहां वृंदा भस्म हुई वहां तुलसी का पौधा उग गया। तब भगवान विष्णु ने कहा कि वह उनके सतीत्व का आदर करते हैं। लेकिन, वह तुलसी के रूप में सदा तुम मेरे साथ रहोगी। तब से हर साल कार्तिक माह की देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने कहा कि जो व्यक्ति भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुलसी विवाह Tulsi Vivah करेगा उसे इस लोक और परलोक में यश प्राप्त होगा। ऐसा कहा जाता है कि जिस घर में भी तुलसी मौजूद होती है वहां यम के दूत असमय नहीं जा सकते। मृत्यु के समय जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख में डालकर निकलते हैं वह पापों से मुक्ति हो जाता है और बैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।

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Mata Durga:माता दुर्गा के 5 रहस्य जानकर आप रह जाएंगे हैरान

हिन्दू धर्म में माता रानी का देवियों में सर्वोच्च स्थान है। उन्हें अम्बे, जगदम्बे, शेरावाली, पहाड़ावाली आदि नामों से पुकारा जाता है। संपूर्ण भारत भूमि पर उनके सैंकड़ों मंदिर है। ज्योतिर्लिंग से ज्यादा शक्तिपीठ है। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती ये त्रिदेव की पत्नियां हैं। इनकी कथा के बारे में पुराणों में भिन्न भिन्न जानकारियां मिलती है। पुराणों में देवी पुराण देवी में देवी के रहस्य के बारे में खुलासा होता है। Mata Durga:शाक्त सम्प्रदाय की वह मुख्य देवी हैं। दुर्गा को आदि शक्ति, परम भगवती परब्रह्म बताया गया है। वह अंधकार व अज्ञानता रुपी राक्षसों से रक्षा करने वाली, ममतामई, मोक्ष प्रदायनी तथा कल्याणकारी हैं। उनके बारे में मान्यता है कि वे शान्ति, समृद्धि तथा धर्म पर आघात करने वाली राक्षसी शक्तियों का विनाश करतीं हैं। Mata durga ki kahani आखिर उन अम्बा, जगदम्बा, सर्वेश्वरी आदि के बारे में क्या रहस्य है? यह जानना भी जरूरी है। माता रानी के बारे में संपूर्ण जानकारी रखने वाले ही उनका सच्चा भक्त होता है। हालांकि यह भी सच है कि यहां इस लेख में उनके बारे में संपूर्ण जानकारी नहीं दी जा सकती, लेकिन हम इतना तो बता ही सकते हैं कि आपको क्या क्या जानना चाहिए? माता रानी कौन है? : 1.अम्बिका : शिवपुराण के अनुसार उस अविनाशी परब्रह्म (काल) ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की। उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्तिरहित परम ब्रह्म है। परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म। परम अक्षर ब्रह्म। वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने विग्रह (शरीर) से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धि तत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है। वह शक्ति अम्बिका (पार्वती या सती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेव जननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या और मूल कारण भी कहते हैं। सदाशिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं। पराशक्ति जगतजननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है। एकांकिनी होने पर भी वह माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है। उस कालरूप सदाशिव की अर्द्धांगिनी हैं यह शक्ति जिसे जगदम्बा भी कहते हैं। 2.Mata Durga:देवी दुर्गा : हिरण्याक्ष के वंश में उत्पन्न एक महा शक्तिशाली दैत्य हुआ, जो रुरु का पुत्र था जिसका नाम दुर्गमासुर था। दुर्गमासुर से सभी देवता त्रस्त हो चले थे। उसने इंद्र की नगरी अमरावती को घेर लिया था। देवता शक्ति से हीन हो गए थे, फलस्वरूप उन्होंने स्वर्ग से भाग जाना ही श्रेष्ठ समझा। भागकर वे पर्वतों की कंदरा और गुफाओं में जाकर छिप गए और सहायता हेतु आदि शक्ति अम्बिका की आराधना करने लगे। देवी ने प्रकट होकर देवताओं को निर्भिक हो जाने का आशीर्वाद दिया। एक दूत ने दुर्गमासुर को यह सभी गाथा बताई और देवताओं की रक्षक के अवतार लेने की बात कहीं। तक्षण ही दुर्गमासुर क्रोधित होकर अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र और अपनी सेना को साथ ले युद्ध के लिए चल पड़ा। घोर युद्ध हुआ और देवी ने दुर्गमासुर सहित उसकी समस्त सेना को नष्ट कर दिया। तभी से यह देवी दुर्गा कहलाने लगी। 3.Mata shati:माता सती : भगवान शंकर को महेश और महादेव भी कहते हैं। उन्हीं शंकर ने सर्वप्रथम दक्ष राजा की पुत्री दक्षायनी से विवाह किया था। इन दक्षायनी को ही सती कहा जाता है। अपने पति शंकर का अपमान होने के कारण सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में कूदकर अपनी देहलीला समाप्त कर ली थी। माता सती की देह को लेकर ही भगवान शंकर जगह-जगह घूमते रहे। जहां-जहां देवी सती के अंग और आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ निर्मित होते गए। इसके बाद माता सती ने पार्वती के रूप में हिमालयराज के यहां जन्म लेकर भगवान शिव की घोर तपस्या की और फिर से शिव को प्राप्त कर पार्वती के रूप में जगत में विख्यात हुईं। Mata Durga:मां दुर्गा में हैं ये 8 प्रकार की शक्ति, जानिए भगवती के निर्माण की कथा 4.Mata parbati माता पार्वती  : माता पार्वती शंकर की दूसरी पत्नीं थीं जो पूर्वजन्म में सती थी। देवी पार्वती के पिता का नाम हिमवान और माता का नाम रानी मैनावती था। माता पार्वती को ही गौरी, महागौरी, पहाड़ोंवाली और शेरावाली कहा जाता है। माता पार्वती को भी दुर्गा स्वरूपा माना गया है, लेकिन वे दुर्गा नहीं है। इन्हीं माता पार्वती के दो पुत्र प्रमुख रूप से माने गए हैं एक श्रीगणेश और दूसरे कार्तिकेय।  5.कैटभा : पद्मपुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में मधु और कैटभ नाम के दोनों भाई हिरण्याक्ष की ओर थे। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार उमा ने कैटभ को मारा था, जिससे वे ‘कैटभा’ कहलाईं। दुर्गा सप्तसती अनुसार अम्बिका की शक्ति महामाया ने अपने योग बल से दोनों का वध किया था। 6.काली : पौराणिक मान्यता अनुसार भगवान शिव की चार पत्नियां थीं। पहली सती जिसने यज्ञ में कूद कर अपनी जान दे दी थी। यही सती दूसरे जन्म में पार्वती बनकर आई, जिनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय हैं। फिर शिव की एक तीसरी  फिर शिव की एक तीसरी पत्नी थीं जिन्हें उमा कहा जाता था। देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा गया है। उत्तराखंड में इनका एकमात्र मंदिर है। भगवान शिव की चौथी पत्नी मां काली है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया था। काली माता ने ही असुर रक्तबीज का वध किया था। इन्हें दस महाविद्याओं में से प्रमुख माना जाता है। काली भी देवी अम्बा की पुत्री थीं। 7.महिषासुर मर्दिनी : नवदुर्गा में से एक कात्यायन ऋषि की कन्या ने ही रम्भासुर के पुत्र महिषासुर का वध किया था। उसे ब्रह्मा का वरदान था कि वह स्त्री के हाथों ही मारा जाएगा। उसका वध करने के बाद माता महिषसुर मर्दिनी कहलाई। एक अन्य कथा के अनुसार जब सभी देवता उससे युद्ध करने के बाद भी नहीं जीत पाए तो भगवान विष्णु ने कहा ने सभी देवताओं के साथ मिलकर सबकी आदि कारण भगवती महाशक्ति की आराधना की जाए। सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य तेज निकलकर एक परम सुन्दरी स्त्री के

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Mata Durga:मां दुर्गा में हैं ये 8 प्रकार की शक्ति, जानिए भगवती के निर्माण की कथा

Mata Durga वैसे इस पर्व के साथ अनेकों कथाएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन मुख्यतः दुर्गा, जो शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसका इतिहास अधिक महत्त्व रखता है। कथा है कि ब्रह्माजी ने असुरों का सामना करने के लिए सभी देवताओं की थोड़ी-थोड़ी शक्ति संगृहीत करके मां दुर्गा अर्थात् संघशक्ति का निर्माण किया और उसके बल पर शुंभ-निशुंभ, मधुकैटभ, महिषासुर आदि राक्षसों का अंत हुआ। मां दुर्गा की अष्टभुजा का मतलब आठ प्रकार की शक्तियों से है। शरीर-बल, विद्याबल, चातुर्यबल, धनबल, शस्त्रबल, शौर्यबल, मनोबल और धर्म-बल इन आठ प्रकार की शक्तियों का सामूहिक नाम ही दुर्गा है। मां दुर्गा ने इन्हीं के सहारे बलवान राक्षसों पर विजय पायी थी। नवरात्रि की कहानी। दुर्गा माता की कहानी। Story of Durga Mata समाज को हानि पहुंचाने वाली आसुरी शक्तियों का सामूहिक और दुष्ट व्यक्तियों का प्रतिरोध करने के लिए हमें संगठन शक्ति के साथ-साथ उक्त शक्तियों का अर्जन भी करना चाहिए। उक्त आठ शक्तियों से संपन्न समाज ही दुष्टताओं का अंत कर सकता है, समाज द्रोहियों को विनष्ट कर सकता है। दुराचारी षड्यंत्रकारियों का मुकाबला कर सकता है। दशहरा का पर्व इन शक्तियों का अर्जन करने तथा शक्ति की उपासना करने का पर्व है। स्मरण रहे संसार में कमजोर, अशक्त व्यक्ति ही पाप-बुराई को प्रोत्साहन देते हैं। जहां इस तरह के व्यक्ति अधिक होंगे, वह समाज अस्त-व्यस्त एवं नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा। वहां असुरता, अशांति अन्याय का बोलबाला होगा ही। दशहरे पर भगवान राम द्वारा रावण पर विजय की कथा भी सर्वविदित है। व्यक्ति के अंदर परिवार एवं समाज में असुर प्रवृत्तियों की वृद्धि ही अनर्थ पैदा करती है। जिन कमजोरियों के कारण उन पर काबू पाने में असफलता मिलती है, उन्हें शक्ति साधना द्वारा समाप्त करने के लिए योजना बनाने- संकल्प प्रखर करने तथा तदुनसार क्रम अपनाने की प्रेरणा लेकर यह पर्व आता है। इसका उपयोग पूरी तत्परता एवं समझदारी से किया जाना चाहिए। Mata Durga नवदुर्गा का रहस्य : नवरात्रि के नौ दिनों में जिन देवियों को पूजा जाता है उनमें से कौन सी देवी का संबंध किससे है यह जानना जरूरी है। पहली देवी शैलपुत्री को सती कहा गया है जो द‍क्ष की पुत्र थीं, जिन्होंने यज्ञ की आग में कूदकर खुद को भस्म कर लिया था। इसके बाद उन्होंने ही ब्रह्मचारिणी के रूप में दूसरा जन्म लिया और वे ही बाद में स्कंद (कार्तिकेय) की माता कहलाई। कठोरतप करने के कारण जब उनका वर्ण काला पड़ गया तब शिव ने प्रसंन्न होकर इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विद्युत प्रभा के समान अत्यंत कांतिमान-गौर हो उठा। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। यही माता हिमालय की पुत्री होने के कारण पार्वती कहलायी।

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Chhath Vrat Katha छठ पूजा की पौराणिक तथा व्रत कथा: द्रौपदी ने रखा था छठ का व्रत

Chhath Vrat Katha छठ व्रत कथा  दिवाली के 6 दिन बाद छठ मनाया जाता है। छठ के महाव्रत को करना अत्यंत पुण्यदायक है। छठ व्रत सबसे महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को होता है। सूर्योपासना का यह महापर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। छठ पर्व के लिए कई कथाएं प्रचलित हैं, किन्तु पौराणिक शास्त्रों में इसे देवी द्रोपदी से जौड़कर देखा जाता है।मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा था। द्रोपदी के व्रत के फल से पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था। इसी तरह छठ का व्रत करने से लोगों के घरों में समृद्धि और सुख आता है। छठ मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश सहित कई क्षेत्रों में छठ का महत्व है। छठ पूजा या सूर्य षष्ठी या छठ व्रत में सूर्य भगवान की पूजा होती है और धरती पर लोगों के सुखी जीवन के लिए सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। सूर्य देव को ऊर्जा और जीवन शक्ति का देवता माना जाता है। इसलिए छठ पर्व पर समृद्धि के लिए पूजा की जाती है।  सूर्य की पूजा से विभिन्न बीमारियों का इलाज संभव है। सूर्य पूजा के साथ स्नान किया जाता है। इससे कुष्ठ रोग जैसी गंभीर रोग भी दूर हो जाते हैं। छठ पर्व परिवार के सदस्यों और मित्रों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए भी मनाया जाता है। * एक पौराणिक लोककथा के अनुसार लंका विजय के बाद राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। Chhath Puja 2023: नवंबर में छठ पूजा कब है? जानें नहाए खाय, खरना की डेट व अर्घ्य टाइमिंग * एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। * कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। * एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है।  इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।  Chhath Vrat Katha छठ पर्व बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गु़ड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ पूजा सूर्य उपासना का अनुपम लोकपर्व है।  छठ व्रत पूजा विधि छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन हैं। जिनकी पूजा के लिए छठ मनाया जाता है। छठी मैया को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना की जाती है। छठी मैया का ध्यान करते हुए लोग मां गंगा-यमुना या किसी नदी के किनारे इस पूजा को मनाते हैं। इसमें सूर्य की पूजा अनिवार्य है साथ ही किसी नदी में स्नान करना भी। इस पर्व में पहले दिन घर की साफ सफाई की जाती है। छठ पर्व पर गांवों में अधिक सफाई देखने को मिलती है। छठ के चार दिनों तक शुद्ध शाकाहारी भोजन किया जाता है, दूसरे दिन खरना का कार्यक्रम होता है, तीसरे दिन भगवान सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन भक्त उदियमान सूर्य को उषा अर्घ्य देते हैं। छठ के दिन अगर कोई व्यक्ति व्रत को करता है तो  वह अत्यंत शुभ और मंगलकारी होता है। पूरे भक्तिभाव और विधि विधान से छठ व्रत करने वाला व्यक्ति सुखी और साधनसंपन्न होता है। साथ ही निःसंतानों को संतान प्राप्ति होती है। छठ व्रत अनुष्ठान विधि छठ के दिन सूर्योदय में उठना चाहिए।  व्यक्ति को अपने घर के पास एक झील, तालाब या नदी में स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद नदी के किनारे खड़े होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता को नमन करें और विधिवत पूजा करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सूर्य को धुप और फूल अर्पण करें। छठ पूजा में सात प्रकार के फूल, चावल, चंदन, तिल आदि से युक्त जल को सूर्य को अर्पण करें। सर झुका कर प्रार्थना करते हुए ॐ घृणिं सूर्याय नमः, ॐ घृणिं सूर्य: आदित्य:, ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा,  या फिर ॐ सूर्याय नमः 108 बार बोलें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन

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Chhath Puja 2023: नवंबर में छठ पूजा कब है? जानें नहाए खाय, खरना की डेट व अर्घ्य टाइमिंग

Chhath Puja 2023 kab hai: छठ पर्व 4 दिनों तक मनाया जाता है। महिलाएं छठ के दौरान लगभग 36 घंटे का व्रत रखती हैं। छठ के दौरान छठी मईया और सूर्यदेव की पूजा की जाती है। Chhath Puja 2023 Date: हिंदू धर्म में हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा का पर्व मनाया जाता है। षष्ठी तिथि को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। छठ पूजा की शुरुआत नहाए खाय से होती है और अगले दिन खरना मनाया जाता है। छठ पूजा का त्योहार बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत देश कई हिस्सों में धूमधाम के साथ मनाते हैं। मान्यता है कि छठ पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि व खुशहाली का आगमन होता है।  Chhath Vrat Katha छठ पूजा की पौराणिक तथा व्रत कथा: द्रौपदी ने रखा था छठ का व्रत द्रौपदी भी करती थीं छठ पूजा: छठ व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना गया है। महाभारत काल में द्रौपदी ने भी छठ पूजा की थी। खरना के दिन शाम में पूजा करने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर लगातार 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं। छठ पूजा 2023 की प्रमुख तिथियां: 17 नवंबर को नहाय खाए किया जाएगा। 18 नवंबर को खरना मनाया जाएगा। 19 नवंबर को छठ पूजा की जाएगी। इस दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा और इसी के साथ छठ पूजा का समापन व व्रत पारण किया जाएगा। कब है नहाय-खाय 2023? लोक आस्था का यह महापर्व चार दिन तक चलता है। इसका पहला दिन नहाय-खाय होता है। इस साल नहाय-खाय 17 नवंबर को है। इस दिन सूर्योदय 06 बजकर 45 मिनट पर होगा। वहीं सूर्यास्त शाम 05 बजकर 27 मिनट पर होगा।  छठ पूजा 2023 पर संध्या अर्घ्य का समय छठ पूजा का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य का होता है। इस दिन छठ पर्व की मुख्य पूजा की जाती है। इस दिन व्रती घाट पर आते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस साल छठ पूजा का संध्या अर्घ्य 19 नवंबर को दिया जाएगा। 19 नवंबर को सूर्यास्त शाम 05 बजकर 26 मिनट पर होगा। Chhath Puja 2023 छठ पूजा पर उगते सूर्य को अर्घ्य देने का समय चौथा दिन यानी सप्तमी तिथि छठ महापर्व का अंतिम दिन होता है। इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और व्रत का पारण का होता है। इस साल 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्योदय 06 बजकर 47 मिनट पर होगा।  छठ पूजा कैलेंडर 2023 छठ पूजा का पहला दिन नहाय-खाय 17 नवंबर, दिन शुक्रवार छठ पूजा का दूसरा दिन खरना (लोहंडा) 18 नवंबर, दिन शनिवार छठ पूजा का तीसरा दिन छठ पूजा, संध्या अर्घ्य 19 नवंबर, दिन रविवार छठ पूजा का चौथा दिन उगते सूर्य को अर्घ्य, पारण 20 नवंबर, दिन सोमवार

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Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज 2023 में कब? 14 या 15 नंवबर जानें भाई दूज ही सही डेट

Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज का पर्व भाई बहन के पवित्र रिश्ते है प्रतीक है. कार्तिक मास में मनाया जाने वाला ये पर्व दिवाली के दूसरे दिन आता है. आइये जानते हैं साल 2023 में किस दिन पड़ेगा भाई दूज. Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज का पर्व कार्तिक मास में दिवाली के बाद मनाया जाता है. कार्तिक मास में हिंदू धर्म में बहुत से त्योहार पड़ते हैं.करवाचौथ, धनतेरस, दिवाली, छठ पूजा आदि. इसी मास में भाई दूज का पर्व भी पड़ता है. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की  द्वितीया तिथि को मनाया जाता है. भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है. साल 2023 में किस दिन मनाई जाएगा भाई दूज का पर्व आइये जानते हैं. भाई दूज भाई बहन का पवित्र त्योहार है. इस दिन बहने अपने भाईयों को टीका करती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती है. साल 2023 में भाई दूज 15 नंवबर के दिन मनाया जाएगा. Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त भाई दूज की सही डेट (When is Bhai Dooj in 2023?) इस लिहाज से आप दोनों ही दिन भाई दूज का पर्व मना सकते हैं. 14 नंवबर को दोपहर के बाद से आप टीका कर सकते हैं. ये पर्व भाई- बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है. इस दिन भाई अपने बहन के पास जाकर टीका करवाते हैं. 15 नवंबर 2023 को क्यों मनाई जाएगी भाई दूज?हिंदू धर्म में कोई भी त्योहार उदया तिथि पर ही मनाया जाता है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार भाई दूज का पर्व 15 नवंबर 2023 को मनाया जाएगा। इस दिन भाई को टीका करने के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 10 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 05 मिनट तक है। तिलक करने की विधिपौराणिक मान्यता है कि इस दिन यम अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने गए थे। ऐसे में भाईयों को अपनी बहन के ससुराल जाना चाहिए। वहीं कुंवारी लड़कियां घर पर ही भाई का तिलक करें। भाई दूज के दिन सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करते हुए पूजा अवश्य करनी चाहिए। वहीं भाई का तिलक करने के लिए पहले थाली तैयार करें उसमें रोली, अक्षत और गोला रखें तत्पश्चात भाई का तिलक करें और गोला भाई को दें। फिर प्रेमपूर्वक भाई को मनपसंद का भोजन करवाएं। उसके बाद भाई अपनी बहन से आशीर्वाद लें और उन्हें भेंट स्वरूप कुछ उपहार जरूर दें। भाई दूज का महत्व हिंदू धर्म में भाई दूज के पर्व को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि ये पर्व भाइयों और बहनों के बीच के प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। भाई दूज पर बहनें अपने भाई के माथे पर हल्दी और रोली का तिलक लगाती हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि भाई बहन यमुना नदी के किनारे बैठकर भोजन करते हैं तो जीवन में समृद्धि आती है। कैसे करें भाई दूज पर पूजा ? (Kaise Karen Bhai Dooj Par Pooja)भाई दूज पर बहने अपने भाईयों को टीका लगाती है. टीका लगाने के बाद भाई की आरती उतारती हैं. ऐसा माना जाता है कि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर यमुना जी ने यमराज को अपने घर पर टीका किया और भोजन कराया था और इसी पूजा के बाद यमराज को सुख की प्राप्ति हुई. तभी से भाई दूज मनाने की परंपरा चली आ रही है. इसीलिए इस दिन को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है.

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Dhanteras 2023: 10 या 11 नवंबर को, कब है धनतेरस? नोट कर लें सही डेट, पूजाविधि और खरीदारी का शुभ मुहूर्त

Dhanteras Kab Hai 2023: हिन्दू धर्म दिवाली या दीपावली खुशियों का त्योहार हर साल की तरह इस साल 2023 में बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा. दिवाली दीपों का त्योहार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है. हर लोग इस दिन का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करते हैं. हर साल दिवाली के मौके पर दीपोत्सव का यह पर्व पूरे पांच दिनों तक मनाया जाता है. जिसकी शुरुआत धनतेरस से होती है. धनतेरस का पर्व छोटी दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाता है. पंचांग के मुताबिक, धनतेरस का पर्व कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है. इस दिन धन्वंतरि देव, लक्ष्मी जी और कुबेर महाराज की पूजा-अर्चना की जाती है. साथ ही किसी भी वस्तु की खरीदारी के लिए यह दिन उत्तम माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि हर साल दिवाली के पर धनतेरस के दिन खरीदी गई चल-अचल संपत्ति में तेरह गुना बढ़ोतरी होती है. इसी वजह से लोग इस दिन बर्तनों की खरीदारी के अलावा सोने-चांदी की चीजें भी खरीदते हैं. ऐसे में चलिए जानते हैं इस साल धनतेरस कब है. पूजा की सही तिथि और शुभ मुहूर्त क्या है… Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त Dhanteras 2023:कब है धनतेरस? धनतेरस का पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनया जाता है. इस साल (Dhanteras 2023 )धनतेरस की तिथि 10 नवंबर को दोपहर 12:35 बजे से शुरू होगी और अगले दिन 11 नवंबर को दोपहर 01:57 बजे समाप्त होगी. बता दें कि धनतेरस के दिन प्रदोष काल में पूजा होती है, इसलिए धनतेरस 10 नवंबर को ही मनाई जाएगी. शुभ मुहूर्त की बात करें तो इस दिन धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 06:02 बजे से रात 08:00 बजे तक रहेगा. यानी पूजा के लिए आपके पास करीब 01 घंटा 58 मिनट तक का समय रहेगा. Dhanteras 2023 धनतेरस का शुभ मुहूर्त: हर साल कार्तिक माह कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस साल 10 नवंबर 2023 को दोपहर 12 बजकर 35 मिनच से धनतेरस की शुरुआत होगी और 11 नवंबर 2023 को दोपहर 1 बजकर 57 मिनट पर इसका समापन होगा। इसलिए उदया तिथि के अनुसार, इस बार 10 नवंबर को ही धनतेरस मनाया जाएगा। धनतेरस की खरीदारी का शुभ मुहूर्त: धनतेरस के दिन दोपहर 2 बजकर 35 मिनट से लेकर 11 नवंबर 2023 को सुबह 6 बजकर 40 मिनट तक खरीदारी का शुभ मुहूर्त बन रहा है। धनतेरस के मौके पर सोना-चांदी और बर्तन की खरीदारी बेहद शुभ माना जाता है। Dhanteras 2023 पूजा का शुभ मुहूर्त: पंचांग के अनुसार, धनतेरस में पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 45 मिनट से शुरू होकर 7 बजकर 42 मिनट पर समाप्त होगा। इस शुभ मुहूर्त में, लक्ष्मी, गणेश, कुबेर देवता और धन्वंतरि देव की पूजा-अराधना का बड़ा महत्व होता है। धनतेरस की पूजाविधि: धनतेरस के दिन पूजा के शुभ मुहूर्त में उत्तर दिशा में गणेश-लक्ष्मी, कुबेर देवता और धन्वंतरि देव की प्रतिमा स्थापित करें। अब मंदिर में दीपक जलाएं और विधिवत सभी देवी-देवताओं की पूजा करें। उन्हें धूप, दीप, फल, फूल, अक्षत, चंदन,इत्र, मिठाई समेत सभी पूजा सामग्री अर्पित करें। इसके बाद कुबरे देवता के मंत्र ऊँ ह्रीं कुबेराय नमः का जाप करें। धन्वंतरि स्तोत्र का पाठ करें। इसके साथ ही माता लक्ष्मी की मंत्रों का जाप करें और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए सभी देवी-देवताओं का ध्यान करें।

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