November 2023

काला अष्टमी कब है? | 2023 में कालाष्टमी व्रत तिथियाँ Masik Kalashtami Vrat 2023

काला अष्टमी कब है? | 2023 में कालाष्टमी व्रत तिथियाँ | Masik Kalashtami Vrat 2023 दिसंबर में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 05 दिसंबर 2023मार्गशीर्ष, कृष्ण अष्टमी04 दिसंबर 2023 रात 10:00 बजे – 06 दिसंबर 2023 पूर्वाह्न 12:37 बजे Kalashtami 2023 Date:  सनातन धर्म में कालाष्टमी (kalashtami ) का बेहद ही महत्व होता है. हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन इसे मनाया जाता है. कालाष्टमी व्रत हर माह किया जाता है. कालभैरव के उपासक इस दिन भगवान काल भैरव का पूजन करते है. मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित कालभैरव मंदिर में विशेष अनुष्ठान किया जाता है. उपासक इन दिन उपवास रखते हैं. बिहार में इसे कालाष्टमी को कालभैरव जयन्ती के नाम से जाना जाता है, उत्तरी भारतीय पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार मार्गशीर्ष के महीने में पड़ती है जबकि दक्षिणी भारतीय अमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार कार्तिक माह में पड़ती है. कालाष्टमी पूजा विधि (Kalashtami Puja Vidhi)भगवान काल भैरव को मानने वाले लोगों को इस दिन अलसुबह उठकर स्न्नान करना चाहिए. जिसके बाद भैरव चालीसा का पाठ करना चाहिए. इस पावन दिन पर कुत्ते को भोजन कराने से घर में सुख समृद्धि आती है. इतना ही नहीं श्वान को भोजन कराने से भैरव बाबा सदा प्रसन्न होते हैं. कुत्ते को भोजन कराने से विशेष फल की प्राप्ति भक्तों को होती हैं. Kalashtami 2023 december कालाष्टमी व्रत का महत्व काल भैरव को भगवान शिव का एक रौद्र रूप माना जाता है. बाबा भैरव का पूजन करने से समस्त पापों और रोगों से छुटकारा मिलता है. सनातन शास्त्रों के अनुसार कालाष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक वर्त रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा ताउम्र बनी रहती है.इस दिन व्रत रखने से कुंडली में मौजूद राहु के दोषों से भी छुटकारा मिलता है.

काला अष्टमी कब है? | 2023 में कालाष्टमी व्रत तिथियाँ Masik Kalashtami Vrat 2023 Read More »

Dev Uthani Ekadashi 2023:देवउठनी एकादशी इस बार बन रहे हैं ये तीन शुभ संयोग, भूलकर ना करें ये काम, विष्णु भगवान हो जायेंगे नाराज

सनातन परंपरा में जिस कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की देवोत्थान या फिर कहें देवउठनी एकादशी पर श्रीहरि अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और उसमें शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है, उसकी तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आदि के बारे में जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. सनातन परंपरा में एकादशी तिथि को भगवान श्री विष्णु की पूजा के लिए बहुत ज्यादा शुभ माना गया है, लेकिन इसका महत्व तब और ज्यादा बढ़ जाता है, जब यह कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में पड़ती है और देवउठनी या फिर देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है. हिंदू धर्म में देवउठनी को इसलिए बहुत ज्यादा शुभ माना गया है क्योंकि इसी भगवान श्री विष्णु चार महीने बाद अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और उसी के बाद शुभ कार्यों की शुरुआत होती है. आइए देवोत्थान एकादशी तिथि की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और जरूरी नियम के बारे में विस्तार से जानते हैं. देवउठनी एकादशी की पूजा का शुभ मुहूर्त देश की राजधानी दिल्ली के पंचांग के अनुसार इस साल कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी 22 नवंबर 2023 की रात्रि 11:03 बजे से प्रारंभ होकर 23 नवंबर 2023 की रात्रि 09:01 बजे समाप्त होगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार इस साल देवोत्थान एकादशी का पावन पर्व 23 नवंबर 2023 को मनाया जाएगा और इस व्रत का पारण अगले दिन 24 नवंबर 2023 को प्रात:काल 06:51 से 08:57 बजे के बीच किया जा सकेगा. गौरतलब है कि एकादशी का व्रत बगैर पारण के अधूरा माना जाता है. देवउठनी एकादशी की पूजा विधि देवउठनी एकादशी पर भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए व्यक्ति को प्रात:काल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए फिर उसके बाद उगते हुए सूर्य देवता को अर्घ्य देना चाहिए. इसके बाद भगवान श्री विष्णु के व्रत एवं पूजन का संकल्प करना चाहिए और अपने घर के ईशान कोण में उनकी विधि-विधान से फल-फूल, धूप-दीप, चंदन-भोग आदि अर्पित करके पूजा करनी चाहिए. देवउठनी एकादशी की पूजा में एकादशी की कथा का पाठ या श्रवण जरूर करना चाहिए और सबसे अंत में श्रीहरि और माता लक्ष्मी की आरती करना चाहिए तथा अधिक से अधिक लोगों को इस व्रत एवं पूजा का प्रसाद बांटना चाहिए. हिंदू मान्यता के अनुसार एकादशी का व्रत बगैर पारण के अधूरा माना गया है, इसलिए व्रत के अगले दिन शुभ समय में पारण जरूर करें. देवउठनी पूजा का अचूक उपाय देवउठनी एकादशी वाले दिन व्यक्ति को भगवान श्री विष्णु के सामने घी का दीया जलाना चाहिए और उसके बाद पूरे घर-आंगन, छत और मुख्य द्वार पर दीया जरूर रखना चाहिए. हिंदू मान्यता है कि देवोत्थान एकादशी के दिन घर में देशी घी का दीया जलाने से घर में हमेशा सुख-शांति और सौभाग्य बना रहता है.

Dev Uthani Ekadashi 2023:देवउठनी एकादशी इस बार बन रहे हैं ये तीन शुभ संयोग, भूलकर ना करें ये काम, विष्णु भगवान हो जायेंगे नाराज Read More »

Chhath puja:छठ पर्व की पौराणिक लोक कथाएं

छठ पर्व बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गु़ड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। Chhath puja: छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएं प्रचलित हैं। पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल पंडालों और भव्य मंदिरों की जरूरत होती है न ऐश्वर्ययुक्त मूर्तियों की। एक पौराणिक लोककथा के अनुसार लंका विजय के बाद राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। Chhath Puja 2023: छठ पूजा में भूलकर भी न करें ये गलतियां, छठी मैया हो जाएंगी नाराज एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्घा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्घति प्रचलित है। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। Chhath puja एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्घि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ पूजा सूर्य उपासना का अनुपम लोकपर्व है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है।

Chhath puja:छठ पर्व की पौराणिक लोक कथाएं Read More »

Pauranik katha : कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा

आज रविवार है और सूर्यदेव का दिन है। आज जागरण आध्यात्म के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि भगवान सूर्य की उत्पति कैसे हुई। पृथ्वी के दो साक्षात देव हैं सूर्य और चंद्र। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं। Pauranik katha आज रविवार है और सूर्यदेव का दिन है। आज जागरण आध्यात्म के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि भगवान सूर्य की उत्पति कैसे हुई। पृथ्वी के दो साक्षात देव हैं सूर्य और चंद्र। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं। वेदों के अनुसार, सूर्य को जगत की आत्मा माना गया है। इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही है। हिंदू धर्म में लोग सूर्य को जल का अर्घ्य देते हैं। पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति, प्रभाव, स्तुति, मन्त्र इत्यादि के बारे में बताया गया है। नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है। आइए जानते हैं कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति। नाग पंचमी पौराणिक कथा (Nag Panchami Pauranik Katha) Pauranik katha : हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही हैं हिंदू धर्म में सूर्य को जल का अर्घ्य दिया जाता हैं। हिंदू धर्म पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति, प्रभाव, स्तुति, मंत्र आदि के बारे में बताया गया हैं नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद मिलता हैं तो आज हम आपको अपने इस लेख में सूर्य देव की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं। हिंदू धर्म के मार्कंडेय पुराण के मुताबिक सारा जगत पहले प्रकाश रहित था। उस वक्त कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के मुंह से सबसे पहला शब्द जो निकला वो था ॐ, यह सूर्य का तेज रूप सूक्ष्म रूप था। इसके बाद ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए। यह चारों ॐ के तेज में एकाकार हो गए। यह विश्व का अविनाशी कारण हैं सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार का कारण हैं ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की जिससे सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को धारण किया। वही सृष्टि की रचना की गई तब ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र ​ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। सूर्य को प्रसन्न करने के लिए अदिति ने घोर तप किया। फिर सुषुम्ना नाम की किरण ने अदिति के गर्भ में प्रवेश किया। इस अवस्था में भी अदिति ने चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन किया। इस ऋषि राज कश्यप क्रोधित हो गए। उन्होंने अदिति से कहा कि तुम इस तरह व्रत रख कर गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचा रही हो। इस तरह तुम शिशु को क्यों करना चा​हती हो। वही जब देवी अदिति ने यह सुना तो अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। फिर सूर्य देव शिशु रूप में अदिति के गर्भ में प्रगट हुए। अदिति को मारिचम अन्डम कहा जाता था। इसके चलते ही इस बालक का नाम मार्तंड पड़ा। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया हैं।

Pauranik katha : कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा Read More »

Durga mata:दुर्गा अष्टमी: देवी महागौरी की कथा, पूजा विधि और कन्या भोजन का महत्व

देवी महागौरी की कथाकथा है कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने कठोर तप किया था. इससे उनका शरीर काला पड़ गया था. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव इन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करते हैं और इनके शरीर को गंगाजल से धोया जाता है. इससे वे विद्युत के समान कांतिमान हो जाती हैं. वे गौरवर्ण हैं इसलिए उन्हें महागौरी के नाम से जाना जाता है. Durga mata:महागौरी का स्वरूपमहाअष्टमी के दिन देवी दुर्गा के चार हाथों में से दो हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में होते हैं और दो हाथों में डमरू और त्रिशूल रहता है. महागौरी सफेद या हरा वस्त्र धारण करती हैं. इस दिन देवी दुर्गा के अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है. शस्त्रों के प्रदर्शन के कारण इस दिन को वीराष्टमी भी कहा जाता है. अष्टमी पर लाल फूल, लाल चंदन, दिया और धूप जैसी चीजों से मां दुर्गा का पूजन करते हैं. दुर्गा सप्तशती के पाठ का आज विशेष महत्व है. आराधना मंत्रया देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमस्तस्यै मनो नम:. कन्या पूजन का फल अष्टमी के दिन कन्याओं को भोजन करवाया जाता है. मान्यता है कि इस दिन 10 साल के कम उम्र की  कन्याओं के पूजन और उन्हें भोजन कराने से शुभ फल मिलता है. ये कन्याएं मां दुर्गा का प्रतिनिधि मानी जाती हैं. आमतौर पर कन्याभोज में नौ कन्याओं को भोजन कराया जाता है लेकिन 5, 7 और 11 की संख्या भी शुभ मानी जाती है. घर बुलाकर पहले उनके पैर पूजे जाते हैं, फिर उन्हें भोजन कराकर पसंदीदा तोहफे दिए जाते हैं और उनसे आशीर्वाद लिया जाता है. Durga mata: माता को अर्पणमंदिरों में इस दिन महाअष्टमी का हवन होता है. इसमें भक्त बड़ी श्रद्धा से शामिल होते हैं क्योंकि मान्यता है कि इस हवन से पुण्यलाभ होता है. महिलाएं देवी मां को लाल चुनरी, लाल-हरी चूड़ियां और सिंदूर अर्पित करती और अपने सुख-सौभाग्य के लिए प्रार्थना करती हैं. पौराणिक विश्वास के अनुसार देवी के इस स्वरूप की सच्चे मन से पूजा करें तो सारे कष्ट दूर हो जाते हैं.

Durga mata:दुर्गा अष्टमी: देवी महागौरी की कथा, पूजा विधि और कन्या भोजन का महत्व Read More »

Chhath Puja 2023: छठ पूजा में भूलकर भी न करें ये गलतियां, छठी मैया हो जाएंगी नाराज

Chhath Puja 2023: इस साल छठ पूजा की शुरुआत 17 नवंबर 2023 से हो रही है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व सभी के लिए बहुत खास होता है। हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व होता है। पंचांग के अनुसार, छठ पूजा का यह पर्व हर साल कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। इसे साल के सबसे बड़े त्योहार के रूप में भी देखा जाता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है। छठ पूजा को लेकर कई मान्यताएं व परंपराएं हैं, जो इस व्रत को और भी खास बनाती है। यह व्रत संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और उनके उज्जवल भविष्य की कामना के लिए रखा जाता है। इसे सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। ये व्रत 36 घंटों तक चलता है। इस दौरान कई नियमों का पालन करना जरूरी होता है नहीं तो छठी मैया नाराज हो सकती हैं। इसी कड़ी में आइए जानते हैं कि छठ पूजा में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। Chhath Puja 2023: कब है छठ पूजा, जानें चैती छठ से जुड़ी ये 5 जरूरी बातें, बस इतने दिन हैं बाकी Chhath Puja 2023 प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल न करेंछठ पूजा में सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। साथ ही पूरे विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है। इस दौरान भूलकर भी चांदी, स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इस पूजा में मिट्टी के चूल्हे और बर्तनों का ही इस्तेमाल करना चाहिए। लहसुन व प्याज का सेवन न करेंछठ पर्व के शुभ दिनों में भूलकर भी मांसाहारी भोजन का सेवन न करें। साथ ही इसे घर में भी न बनाएं। छठ पूजा के दिनों में लहसुन व प्याज का सेवन भी नहीं करना चाहिए। सूर्य देव को अर्घ्य दिए बिना कुछ न खाएंइस दौरान व्रत रख रही महिलाएं सूर्य देव को अर्घ्य दिए बिना किसी भी चीज का सेवन न करें। साथ ही व्रत रखने वाली महिलाएं जमीन पर सोएं। सेंधा नमक का इस्तेमालछठ पूजा का व्रत कठिन उपवास में से एक है। इस दौरान व्रत रह रही महिलाएं इससे जुड़ें सभी नियमों का पालन करती हैं। छठ पूजा से करीब 10 दिन पहले से ही लोगों को अरवा चावल, सेंधा नमक का इस्तेमाल करना चाहिए। प्रसाद बनाते समय चखने की भूल न करेंछठ पूजा का प्रसाद बेहद पवित्र होता है। इसे बनाते समय भूलकर भी इसे जूठा न करें। साथ ही इसे बनाने से पहले भी कुछ भी न खाएं। अपने हाथों को भी साफ रखें। याद रखें कि, प्रसाद बनाने वाली जगह एक दम स्वच्छ हों।

Chhath Puja 2023: छठ पूजा में भूलकर भी न करें ये गलतियां, छठी मैया हो जाएंगी नाराज Read More »

Chhath Puja 2023: कब है छठ पूजा, जानें चैती छठ से जुड़ी ये 5 जरूरी बातें, बस इतने दिन हैं बाकी

Chhath Puja 2023 Date In Hindi: हिंदू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार है छठ पूजा. पंचांग के अनुसार यह महापर्व 19 नवंबर, रविवार को मनाया जाएगा. Chhath Puja 2023 Date: छठ (chhath puja) महापर्व उत्तर भारत के सबसे बड़े पर्व में से एक है, जो कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से लेकर सप्तमी तक चलता है. यह पर्व सूर्य भगवान और षष्ठी माता को समर्पित है. ये कहना गलत नहीं होगा कि यह पर्व सबसे कठिन त्योहारों में से एक है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें व्रत करने वाले भक्तों को 36 घंटो तक निर्जला व्रत करना पड़ता है यानी इस दौरान वे पानी तक नहीं पीते. इस व्रत के नियम- कानून बहुत (chhath puja niyam) कड़े माने जाते हैं इसलिए यह सबसे कठिन व्रत में गिना जाता है. अगर आपके घर में भी छठ पर्व मनाया जाता है तो आपको इन जरूरी बातों को जरूर जान लेना चाहिए.  Chhath Puja 2023: नवंबर में छठ पूजा कब है? जानें नहाए खाय, खरना की डेट व अर्घ्य टाइमिंग छठ पूजा 2023 कैलेंडर (Chhath Puja 2023 Calendar) छठ पूजा की शुरुआत 17 नवंबर, शुक्रवार से हो रही है इस दिन नहाय खाय किया जाता है. 18 नवंबर, शनिवार को खरना किया जाएगा, वहीं 19 नवंबर, रविवार को छठ पूजा की पहली अर्घ्य यानी संध्या अर्घ्य दी जाएगी और 20 नवंबर, सोमवार को छठ पूजा की दूसरी और आखिरी अर्घ्य यानी उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा. छठ पूजा की 5 जरुरी बातें | Chhath Puja 5 Important Things निर्जला व्रत – छठ पर्व की शुरुआत नहाय खाय से होती है. यह पर्व चार दिनों तक चलता है और खरना के भोजन ग्रहण करने के बाद इसकी शुरुआत होती है. किन देवता देवी देवताओं की होती है पूजा – छठ पूजा में सूर्य देव, उनकी बहन छठी मैया, उनकी पत्नी उषा, प्रत्युषा की पूजा करने की परंपरा है.  छठी मैया कौन हैं – छठी मैया ब्रह्मा जी की पुत्री है. इन्हें षष्ठी माता भी कहा जाता है, जो संतानों की रक्षा करने वाली देवी मानी जाती है. डूबते सूर्य को अर्घ क्यों दिया जाता है –  छठ में डूबते और उसके बाद उगते सूरज को अर्घ्य देने का यह मतलब होता है कि जो डूबा है उसका उदय होना भी निश्चित है. यानी अगर अभी परिस्थितियां खराब है तो वह अच्छी भी होगी बस सयंम रखने की जरूरत है. छठ पूजा में व्रत पारण की विधि – ऐसी मान्यता है कि छठ पूजा का में चढ़ाए गए प्रसाद से ही अपने व्रत को खोलना चाहिए. उसके बाद कच्चा दूध पीने की सलाह दी जाती है.

Chhath Puja 2023: कब है छठ पूजा, जानें चैती छठ से जुड़ी ये 5 जरूरी बातें, बस इतने दिन हैं बाकी Read More »

Diwali से पहले और बाद कई बड़े ग्रहों का महापरिवर्तन वाला, दो ग्रहण, किन राशियों की Diwali अच्छी मनेगी, मां लक्ष्मी की कृपा मिलेगी

Diwali big planet rashi parivartan: इस अवधि में आप नया घर खरीदने पर भी विचार कर सकते हैं और आने वाला समय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अनुकूल रहेगा। कुल मिलाकर आपकी आर्थिक स्थिति काफी अनुकूल रहेगी  Diwali bih rashi parivartan: दिवाली से पहले और बाद का महीना कई बड़े ग्रहों का परिवर्तन लेकर आ रहा है। इस साल दिवाली 12 नवंबर को मनाई जाएगी। दिवाली से पहले धनतरेस और नर्क चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है, लेकिन अक्टूबर के आखिर में राहु और केतू का राशि परिवर्तन हो रहा है। इसके बाद अभी सिंह राशि में शुक्रदेव भी सभी राशियों पर सुख सुविधाओं की बरसात करेंगे। 3 नवंबर को शुक्र कन्या राशि में प्रवेश करें। वहीं 4 नवंबर के शुरू में शनि मार्गी हो रहे हैं, जो कई राशियों को लाभ पहुंचाएंगे। शनि के राशि परिवर्तन होने से कई राशियों के लिए शुभ परिणाम होंगे। शनि से  पहले 6 नवंबर को बुध भी वृश्चिक राशि में आ जाएंगे और दिवाली से पहले ही मंगल भी 6 नवंबर को वृश्चिक राशि में आ जाएंगे और फिर 17 नवंबर को सूर्य राशि बदलकर वृश्चिक राशि में आ जाएंगे। कुल मिलाकर इन राशि परिवर्तन से कई राशियों को मां लक्ष्मी की कृपा मिलेगी। Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त Diwali दिवाली से पहले और बाद में ग्रहों का यह राशि परिवर्तन मेष राशि वालों के लिए अच्छा साबित होगा। इस राशि के परिवार के लोग खुश रहेंगे और उन पर धन-धान्य की बरसात होगी। इसकी के साथ हेल्थ का भी आपको थोड़ा ध्यान रखना होगा।  कन्या राशि वालों के लिए यह परिवर्तन अच्छा साबित होगा, आप जिस काम में हाथ डालेंगे सफलता मिलेगी। आपकी राशि में शुक्र आ रहे हैं, तो आपके लिए समय सोने पर सुहागा रहेगा। इस गोल्डन पीरियड का आप अच्छे से इस्तेमाल करें। कुंभ-विदेश यात्रा, धन लाभ दिवाली पर शनि और कई ग्रहों के कारण इस राशि के लोगों के लिए समय बहुत अच्छा है। इस राशि के लोग घर परिवार के साथ मिलकर रहें और सभी को वस्त्र और आभूषण दें। मां लक्ष्मी की कृपा से आपको आर्थिक लाभ होगा।

Diwali से पहले और बाद कई बड़े ग्रहों का महापरिवर्तन वाला, दो ग्रहण, किन राशियों की Diwali अच्छी मनेगी, मां लक्ष्मी की कृपा मिलेगी Read More »

Dev Deepawali 2023: देव दीपावली को लेकर लोगों के बीच भम्र की स्थिति, जानें तारीख, दीपदान का महत्व

Dev Deepawali 2023: देव दीपावली पर तिथि भेद का यह पहला मामला नहीं है. इसके पहले रक्षाबंधन और होली पर भी तिथिभेद के कारण संशय की स्थिति बन चुकी है. गंगा के घाटों पर शाम की आरती करने वाली समितियों ने बैठक करके 27 नवंबर को देव दीपावली मनाने का फैसला किया. साथ ही काशी विद्वत परिषद के निर्णय को खारिज कर दिया. Dev Deepawali 2023: वाराणसी के विश्व प्रसिद्ध देव दीपावली में शामिल होने के लिए न केवल काशी बल्कि देश दुनिया के कोने-कोने से आस्थावान और सैलानी पहुंचते हैं. लेकिन, इस बार देव दीपावली की तिथि ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है. एक तरफ काशी विद्वत परिषद तो दूसरी तरफ केंद्रीय उद्योग दीपावली महासमिति सहित गंगा आरती कराने वाली तमाम समितियां हो गई हैं. काशी विद्वत परिषद ने देव दीपावली की तिथि का ऐलान 26 नवंबर को किया है और इसे ही शास्त्रोक्त विधि से मनाने की नसीहत भी दी है. दूसरी ओर काशी के गंगा घाटों पर देव दीपावली कराने की जिम्मेदारी उठाने वाली तमाम गंगा आरती की समितियां और केंद्रीय देव दीपावली महासमिति ने बैठक करके 27 नवंबर को देव दीपावली मनाने की घोषणा की है और बताया है कि उदया तिथि के अनुसार ही 27 नवंबर को देव दीपावली मनाई जाएगी. कब मनाई जाएगी देव दीपावली 26 नवंबर या 27 नवंबर?  हिंदू तीज-त्योहारों को लेकर अक्सर तिथियों का मतभेद बड़ा सिरदर्द बन जाता है. लेकिन इस बार इससे भी एक कदम आगे जाकर काशी की विश्व प्रसिद्ध देव दीपावली मनाने को लेकर काशी विद्वत परिषद् के सामने गंगा आरती कराने वाली समितियों के सहित केंद्रीय देव दीपावली महासिमिति आ गई है. परिषद् के मुताबिक 26 नवंबर को देव दीपावली मनाया जाना चाहिए. वहीं समितियों के मुताबिक, बैठक करके यह फैसला ले लिया गया है कि वे 27 नवंबर को ही उदयातिथि के अनुसार देव दीपावली का पर्व मनाएंगे. काशी विद्वत परिषद्’ की ओर से एक पत्र जारी करते हुए बताया गया है कि स्वयं ब्रह्मा जी ने सृष्टि के अंतर वेदांग स्वरूप में काल गणना हेतु ज्योतिष शास्त्र एवं उस गणना के आधार पर शुभ काल के निदर्शन हेतु धर्मशास्त्र की रचना की. जिसके समन्वय से उपयुक्त काल का विवेचन किया जा सके. इसमें शास्त्र का आधार ही प्रमाण होता है अपनी तार्किक बुद्धि नहीं. परंतु वर्तमान समय में लोग शास्त्र और तार्किक शक्तियों के द्वारा अपनी सुविधा की दृष्टि से शुभ काल की व्याख्या करते हुए व्रत पर्व उत्सव आदि मनाने का निर्देश देने लगे हैं. जैसे उदया तिथि मान्य होगी, अस्तकालिक तिथि मान्य होगी, मध्यान्ह काल की तिथि मान्य होगी आदि. परंतु कार्य एवं व्रतादि के भेद से आचार्यों ने इन तिथियों को उदय, अस्त, मध्यरात्रि तथा मध्यदिन कालिक इत्यादि का अलग विवेचन किया है, जैसे- कृष्ण जन्माष्टमी में अर्धरात्रि कालिक, दीपावली में प्रदोष कालिक आदि.  अतः हमें ऋषि और धर्मशास्त्रों के वचनों का अवलोकन करते हुए प्रमाण वचनों का आश्रय लेकर के ही किसी व्रत पर्व आदि का आयोजन करना चाहिए. अन्यथा उसके विपरीत परिणाम भी दृष्टिगत होने लगते हैं. इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि कभी-कभी एक ही तिथि में अनेक व्रत पर्व भी वर्णित होते हैं जो की काल भेद से कुछ मध्यान्ह व्यापिनी कुछ प्रदोष व्यापिनी तो कुछ उदयातिथी में मनाए जाते हैं. इसी तरह से कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भी अनेक व्रत पर्व उत्सवों का वर्णन आचार्य ने किया है जैसे स्नान दान की पूर्णिमा, दक्षसावर्णि मान्वादि (कुतुपाद्यघटी व्यापिनी), महाकार्तिकी (भूतविद्धा), धात्री पूजा (परविद्धा), व्रत की पूर्णिमा, केश बंधन गौरी व्रत (परविद्धा), वृषोत्सर्ग (सायंकाल व्यापिनी), त्रिपुरोत्सव (सायंकाल व्यापिनी), देवदीपावली (सायंकाल व्यापिनी) आदि. इस प्रसंग में कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाने वाली देवदीपावाली अर्थात् त्रिपुरोत्सव अति विशिष्ट है और काशी में इसको बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. यह त्रिपुरोत्सव भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर के वध के उपलक्ष्य देवताओं द्वारा दीप जलाकर उत्सव मनाने पर्व है. इसके संबंध में धर्म शास्त्र के ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख प्राप्त है. देव दीपावाली मंत्र अत्रैव त्रिपुरोत्सव उक्तो भविष्य- पौर्णमास्यां तु सन्ध्यायां कर्तव्यस्त्रिपुर उत्सवः . दद्यादनेन मत्रेण सुदीपांश्च सुरालये . कीटाः पतङ्गा मशकाश्च वृक्षा जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः . दृष्ट्वा प्रदीप नहि जन्मभागिनस्ते मुक्तरूपा हि भवन्ति तत्र .’ इति . अत्र पौर्णमासी संध्याकालव्यापिनी ग्राह्या पूर्वोक्तभविष्यवाक्ये सध्यायामित्युक्तेः . अतः पूर्णिमा की स्थिति एवं सूक्ष्म मान को आधार बनाकर काशी विद्वत परिषद के ज्योतिष प्रकोष्ठ की बैठक में वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय की अध्यक्षता में सर्वसम्मति ने यह निर्णय लिया गया कि देव दीपावली 26 नवंबर 2023 को ही मनाई जाएगी. विभिन्न शास्त्र प्रमाणों के आधार पर प्रो. विनय कुमार पाण्डेय ने सब के समक्ष उपस्थापित किया जिस पर सर्वसम्मति से सहमति बनी. वहीं काशी विद्वत परिषद् की घोषणा के बाद गंगा आरती कराने वाली समितियों और कन्द्रीय देव दीपावली महासिमिति ने बैठक की. काशी के गंगा घाटों एवं अनेक देव मंदिरों, कुण्डों, तालाबों में मनाए जाने वाले विश्व विख्यात देव दीपावली महोत्सव आयोजन करने के संदर्भ में एक बैठक का आयोजन पंडित किशोरी रमण दूबे (बाबू महाराज) की अध्यक्षता में गंगा सेवा निधि के कार्यालय में किया गया. जिसमें सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि इस वर्ष पंचांग भेद के कारण 26 एवं 27, नवंबर को अलग-अलग दिन पंचांगों में कार्तिक पूर्णिमा देव दीपावली का जिक्र है. लेकिन, देव दीपावली की तिथि को लेकर एक बार पहले काशी नरेश महाराज डॉ विभूति नारायण सिंह जी के समय में एवं गंगा सेवा निधि के संस्थापक स्मृति शेष पंडित सत्येंद्र मिश्रा {मुनन्न महाराज} जी के समय में आई थी. उन दोनों महानुभावों ने विषय विशेष के विद्वानों से परामर्श करने के बाद उदया तिथि की पूर्णिमा जिस दिन पड़ती है, उसी दिन देव दीपावली मनाई गई थी, जिस दिन प्रात: काल स्नान दान की पूर्णिमा है. उसी दिन सायं काल दीपदान की परंपरा घाटों एवं कुंडों – तालाबों पर है जिस वर्ष भी 2 दिन कार्तिक पूर्णिमा पड़ी है उसी दिन उदया तिथि की ही पूर्णिमा वाले दिन ही देव दीपावली महोत्सव के आयोजन की परंपरा सुदृढ़ रही है.  यहां यह भी अवगत कराना जरूरी है कि उदया तिथि में दूर-दूर से काशी में कार्तिक पूर्णिमा स्नान करने वाले श्रद्धालुओं का गंगा स्नान भी प्रातः काल होता है और सायं काल में भगवती मां गंगा का

Dev Deepawali 2023: देव दीपावली को लेकर लोगों के बीच भम्र की स्थिति, जानें तारीख, दीपदान का महत्व Read More »

Diwali 2023: दीपावली पर क्या करें, सुबह से लेकर रात तक की 25 जरूरी बातें

Diwali 2023 : ब्रह्म पुराण के अनुसार दिवाली पर अर्धरात्रि के समय महालक्ष्मीजी सद्ग्रहस्थों के घरों में विचरण करती हैं। इस दिन घर-बाहर को साफ-सुथरा कर सजाया-संवारा जाता है। दीपावली मनाने से श्री लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर स्थायी रूप से सद्गृहस्थ के घर निवास करती हैं। दीपावली धनतेरस, नरक चतुर्दशी तथा महालक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा और भाईदूज-इन 5 पर्वों का मिलन है। मंगल पर्व दीपावली के दिन सुबह से लेकर रात तक क्या करें कि महालक्ष्मी का घर में स्थायी निवास हो जाए.. आइए जानें विस्तार से….  Diwali pe kare ye kaam दीपावली के पूजन की संपूर्ण विधियां दी गई हैं। फिर भी संक्षेप में 25 बिंदुओं से जानें कि क्या करें इस दिन ….  Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त 1. प्रातः स्नानादि से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2 . अब निम्न संकल्प से दिनभर उपवास रहें-मम सर्वापच्छांतिपूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादि-सकलशुभफल प्राप्त्यर्थंगजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्‌यर्थं इंद्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये।  3.दिन में पकवान बनाएं या घर सजाएं। बड़ों का आशीर्वाद लें।  4 . सायंकाल पुनः स्नान करें। 5 . लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में घर की सफाई करके दीवार को चूने अथवा गेरू से पोतकर लक्ष्मीजी का चित्र बनाएं। (लक्ष्मीजी का चित्र भी लगाया जा सकता है।) 6 . भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, कदली फल, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयां बनाएं। 7 .लक्ष्मीजी के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर मौली बांधें। 8. इस पर गणेशजी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें। 9 . फिर गणेशजी को तिलक कर पूजा करें। 10. अब चौकी पर छः चौमुखे व 26 छोटे दीपक रखें। 11.इनमें तेल-बत्ती डालकर जलाएं। 12. फिर जल, मौली, चावल, फल, गुड़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करें। 13. पूजा के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें। 14. एक छोटा तथा एक चौमुखा दीपक रखकर निम्न मंत्र से लक्ष्मीजी का पूजन करें-  नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात॥  साथ ही निम्न मंत्र से इंद्र का ध्यान करें-  ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तमा इंद्राय ते नमः॥ पश्चात निम्न मंत्र से कुबेर का ध्यान करें-  धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पदः॥  15. इस पूजन के पश्चात तिजोरी में गणेशजी तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें। 16. तत्पश्चात इच्छानुसार घर की बहू-बेटियों को रुपए दें। 17. लक्ष्मी पूजन रात के बारह बजे करने का विशेष महत्व है। 18. इसके लिए एक पाट पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर एक जोड़ी लक्ष्मी तथा गणेशजी की मूर्ति रखें। 19. समीप ही एक सौ रुपए, सवा सेर चावल, गुड़, चार केले, मूली, हरी ग्वार की फली तथा पांच लड्डू रखकर लक्ष्मी-गणेश का पूजन करें। 20 उन्हें लड्डुओं से भोग लगाएं। 21. दीपकों का काजल सभी स्त्री-पुरुष आंखों में लगाएं। 22. फिर रात्रि जागरण कर गोपाल सहस्रनाम पाठ करें।  23. व्यावसायिक प्रतिष्ठान, गद्दी की भी विधिपूर्वक पूजा करें। 24. रात को बारह बजे दीपावली पूजन के उपरान्त चूने या गेरू में रुई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिल तथा छाज (सूप) पर तिलक करें। 25. दूसरे दिन प्रातःकाल चार बजे उठकर पुराने छाज में कूड़ा रखकर उसे दूर फेंकने के लिए ले जाते समय कहें ‘लक्ष्मी-लक्ष्मी आओ, दरिद्र-दरिद्र जाओ’। 

Diwali 2023: दीपावली पर क्या करें, सुबह से लेकर रात तक की 25 जरूरी बातें Read More »

मंगलवार को इस मुहूर्त में करें Hanuman Ji की पूजा-आराधना, पूरी होगी हर मनोकामना

 बजरंगबली (bajrangbali) या यूं कहें हनुमान जी (hanuman ji) का दिन है. कई लोग इस दिन व्रत भी रखते है तो वहीं कई लोग इस दिन बड़े ही भक्ति भाव (hanuman ji bhakt) से हनुमान जी की पूजा भी करते है. लेकिन, अगर आप पूजा भी करना चाहते है तो क्यों ना शुभ मुहूर्त में करें जिससे बजरंगबली प्रसन्न हो जाए. तो चलिए आपको आज के दिन का शुभ मुहूर्त बता देते है. जिसमें पूजा करने से आपको बहुत लाभ होंगे.   हनुमान जी की पूजा का शुभ मुहूर्त (shubh muhurat) या सही समय  वैसे तो मंगलवार के दिन हनुमान जी की पूजा सुबह करें या शाम दोनों ही समय में करना फलदायी माना जाता है. इस दिन आप सूरज के उगने के बाद और शाम को सूरज डूबने के बाद हनुमान जी की पूजा कर सकते हैं. वैसे तो पूरे दिन में सूरज डूबने के बाद ही पूजा का शुभ मुहूर्त (hanuman ji puja shubh muhurat) होता है.  Hanuman Ji:जब जीवन में मिले ये संकेत, तो समझ लीजिए आप पर बनी हुई है हनुमान जी की कृपा चलिए, आपको कुछ इसके शुभ मुहूर्त बता देते है-अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 40 मिनट तकविजय मुहूर्त- दोपहर 02 बजकर 02 मिनट से 02 बजकर 44 मिनट तकनिशीथ काल- मध्‍यरात्रि 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट तकगोधूलि बेला- शाम 05 बजकर 19 मिनट से 05 बजकर 43 मिनट तकअमृत काल- शाम 07 बजकर 45 मिनट से 09 बजकर 32 मिनट तकत्रिपुष्कर योग- सुबह 07 बजकर 10 मिनट से दोपहर 02 बजकर 53 मिनट तक अब, शुभ मुहूर्त तो बता दिए इसके साथ ही अशुभ भी बता देते है जिसमें पूजा नहीं करनी चाहिए –  राहुकाल- दोपहर 03 बजे से 04 बजकर 30 मिनट तकदुर्मुहूर्त काल- सुबह 09 बजकर 14 मिनट से 09 बजकर 55 मिनट तकदुर्मुहूर्त काल सुबह 09 बजकर 14 मिनट से 09 बजकर 55 मिनट तकभद्रा- अगली सुबह 03 बजकर 55 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तक हनुमान जी की पूजा विधि (hanuman ji puja vidhi)इस दिन सही विधि के साथ हनुमान जी की पूजा करना शुभ माना जाता है. कहते हैं कि हनुमान जी की पूजा जितनी साधारण है उतनी ही मुश्किल भी है. आज के दिन सुबह उठकर नहा-धोकर लाल रंग के कपड़े पहन लें. आप घर या मंदिर कहीं भी पूजा कर सकते हैं. घर में पूजा करने के लिए ईशान कोष को साफ करके वहां पर एक चौकी की स्थापना करें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं. इसके बाद उस पर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करें. इसके साथ ही भगवान श्री राम और माता सीता की मूर्ति रखना न भूलें. इसके बाद बजरंग बली के आगे घी का दीपक जलाएं. दीप, धूप जलाकर सुंदर कांड का पाठ करें और हनुमान जी के मंत्रों का जाप करें. उसके बाद लाल फूल, लाल सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाएं.  इसके बाद हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमान जी की आरती करें. मंगलवार के दिन भगवान को गुड़, केले और लड्डू का भोग लगाएं और परिवार के सदस्यों को प्रसाद बांटे. अगर आपने मंगलवार का व्रत रखा है तो इस बात का ध्यान रखें कि इसमें शाम के समय एक बार ही खाना खाना होता है. इस दौरान खाने में सिर्फ मीठा भोजन ही शामिल करें. इसके साथ ही दिन में केले, दूध और मीठे फलाहार शामिल किया जा सकता है. 

मंगलवार को इस मुहूर्त में करें Hanuman Ji की पूजा-आराधना, पूरी होगी हर मनोकामना Read More »

Pauranik Katha: भगवान सूर्य की कैसे हुई उत्पत्ति, पढ़ें यह पौराणिक कथा

Pauranik Katha आज रविवार है और आज के दिन सूर्यदेव की पूजा की जाती है। सूर्यदेव और चंद्रदेव साक्षात देव माने जाते हैं। पृथ्वी पर जीवन है तो सूर्यदेव से ही है। वेदों के अनुसार सूर्य को जगत की आत्मा माना गया है। Surya Dev रविवार के दिन सूर्य देव का व्रत सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह व्रत सुख और शांति देता है. पौराणिक धार्मिक ग्रंथों में भगवान सूर्य के अर्घ्यदान का विशेष महत्व बताया गया है. प्रतिदिन सुबह तांबे के लोटे में जल लेकर और उसमें लाल फूल, चावल डालकर प्रसन्न मन से सूर्य मंत्र का जाप करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए. इस अर्घ्यदान से भगवान सूर्य प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य, धन, धान्य, पुत्र, मित्र, तेज, यश, विद्या, वैभव और सौभाग्य को प्रदान करते हैं. सूर्य देव जीवन ऊर्जा देने वाले हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सूर्य देव का जन्म कैसे हुआ. आइए इस पौराणिक कथा से जानें कि कैसे हुआ सूर्य देव का जन्म  Surya Dev janam katha सूर्य देव की जन्म कथा: मार्कंडेय पुराण के अनुसार, जब पूरे जगत में प्रकाश नहीं था तब कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से जो पहला शब्द निकला वो था ॐ। यह शब्द सूर्य के तेज का सूक्ष्म रूप था। फिर ब्रह्मा जी ने चारों मुखों से चार वेद प्रकट किए। यह चारों मिलकर ॐ के तेज में एकाकार हो गए। ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की जिससे सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को धारण किया। जब सृष्टि की रचना हुई थी तब ऋषि कश्यप जो ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि के पुत्र थे, का विवाह अदिति से हुआ था। अदिति ने भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के घोर तपस्या की। उनके तप का फल यह मिला कि सुषुम्ना नाम की किरण ने उनके गर्भ में प्रवेश किया। इस अवस्था में भी अदिति के कठिन व्रत नहीं थमे। वो चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती रहीं। यह देख ऋषि राज कश्यप बेहद क्रोधित हुए। उन्होंने कहा कि इस अवस्था में व्रत करने से गर्भस्थ शिशु को नुकसान होगा। इस तरह शिशु मर जाएगा। तुम क्यों शिशु को मरना चाहती हो। यह सुन अदिति ने उसके गर्भ में पल रहे बालक को उदर से बाहर निकाल दिया। यह बेहद दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। इसके बाद सूर्य भगवान शिशु के रूप में अदिति के गर्भ में प्रगट हुए। अदिति को मारिचम- अन्डम कहा जाता था। इससे ही बालक का नाम मार्तंड पड़ा। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया है। 

Pauranik Katha: भगवान सूर्य की कैसे हुई उत्पत्ति, पढ़ें यह पौराणिक कथा Read More »