September 2022

सीता की निंदा करने वाले धोबी के पूर्व जन्म का वृत्तान्त

मिथिला नाम की नगरी में महाराज जनक राज्य करते थे। उनका नाम था सीरध्वज। एक बार वे यज्ञ के लिए पृथ्वी जोत रहे थे उस समय फाल से बनी गहरी रेखा द्वारा एक कुमारी कन्या का प्रादुर्भाव हुआ। रति से भी सुंदर कन्या को देख कर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उस कन्या का नाम सीता रख दिया। परम सुंदरी सीता एक दिन सखियों के साथ उद्यान में खेल रहीं थीं। वहाँ उन्हें एक शुक पक्षी का जोड़ा दिखाई दिया,जो बड़ा मनोरम था। वे दोनों पक्षी एक पर्वत की चोटी पर बैठ कर इस प्रकार बोल रहे थे —-‘पृथ्वी पर श्री राम नाम से विख्यात एक बड़े सुंदर राजा होंगे। उनकी महारानी, सीता के नाम से विख्यात होंगी। श्री राम, सीता के साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकी देवी और धन्य हैं वे श्री राम। तोते को ऐसी बातें करते देख सीता ने यह सोचा कि ये दोनों मेरे ही जीवन की कथा कह रहे हैं, इन्हें पकड़ कर सभी बातें पूछूँ।ऐसा विचार कर उन्होंने अपनी सखियों से कहा, ‘यह पक्षियों का जोड़ा सुंदर है तुम लोग चुपके से जाकर इसे पकड़ लाओ।’ सखियाँ उस पर्वत पर गयीं और दोनों सुंदर पक्षियों को पकड़ लायीं। सीता उन पक्षियों से बोलीं—‘तुम दोनों बड़े सुंदर हो; देखो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँ से आये हो? राम कौन हैं? और सीता कौन हैं? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई? सारी बातों को जल्दी जल्दी बताओ। भय न करो। सीता के इस प्रकार पूछने पर दोनों पक्षी सब बातें बताने लगे —–‘देवि ! वाल्मीकि नाम से विख्यात एक बहुत बड़े महर्षि हैं। हम दोनों उन्हीं के आश्रम में रहते हैं। महर्षि ने रामायण नाम का एक ग्रन्थ बनाया है जो सदा मन को प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्यों को उस रामायण का अध्ययन भी कराया है। रामायण का कलेवर बहुत बड़ा है। हम लोगों ने उसे पूरा सुना है । राम और जानकी कौन हैं, इस बात को हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि जानकी के विषय में क्या क्या बातें होने वाली हैं; तुम ध्यान देकर सुनो। ‘महर्षि ऋष्यश्रंग के द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञ के प्रभाव से भगवान विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। देवांगनाएँ भी उनकी उत्तम कथा का गान करेंगी। श्री राम महर्षि विश्वामित्र के साथ भाई लक्ष्मण सहित हाथ में धनुष लिए मिथिला पधारेंगे। उस समय वहाँ वे शिव जी के धनुष को तोड़ेंगे और अत्यन्त मनोहर रूप वाली सीता को अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। फिर उन्हीं के साथ श्री राम अपने विशाल राज्य का पालन करेंगे। ये तथा और भी बहुत सी बातें वहाँ हमारे सुनने में आयी हैं। सुंदरी ! हमने तुम्हें सब कुछ बता दिया। अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो। पक्षियों की ये अत्यंत मधुर बातें सुनकर सीता ने उन्हें मन में धारण किया और पुनः उन दोनों से पूछा —-‘राम कहाँ होंगे? वे किसके पुत्र हैं और कैसे वे आकर जानकी को ग्रहण करेंगे? मनुष्यावतार में उनका श्री विग्रह कैसा होगा? उनके प्रश्न सुनकर शुकी मन ही मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचान कर वह सामने आ उनके चरणों पर गिर पड़ी और बोली —- श्री रामचन्द्र का मुख कमल की कली के समान सुंदर होगा। नेत्र बड़े बड़े तथा खिले हुए, नासिका ऊँची, पतली और मनोहारिणी होगी। भुजाएँ घुटनों तक, गला शंख के समान होगा। वक्षःस्थल उत्तम व चौड़ा होगा। उसमें श्रीवत्स का चिन्ह होगा। श्री राम ऐसा ही मनोहर रूप धारण करने वाले हैं। मैं उनका क्या वर्णन कर सकती हूँ। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणों का बखान नहीं कर सकता। फिर हमारे जैसे पक्षी की क्या बिसात है ।वे जानकी देवी धन्य हैं जो शीघ्र रघुनाथ जी के साथ हजारों वर्षों तक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी। परंतु सुंदरी ! तुम कौन हो? पक्षियों की बातें सुनकर सीता अपने जन्म की चर्चा करती हुई बोलीं—-‘जिसे तुम लोग जानकी कह रहे हो, वह जनक की पुत्री मैं ही हू। श्री राम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम दोनों को छोड़ूँगी। तुम इच्छानुसार खेलते हुए मेरे घर में सुख से रहो। यह सुनकर शुकी ने जानकी से कहा —-‘साध्वी ! हम वन के पक्षी हैं। हमें तुम्हारे घर में सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थान पर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर यहाँ आ जाऊँगी। उसके ऐसा कहने पर भी सीता ने उसे नहीं छोड़ा। तब उसके पति ने कहा —-‘सीता ! मेरी भार्या को छोड़ दो। यह गर्भिणी है। जब यह बच्चों को जन्म दे लेगी, तब इसे लेकर फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तोते के ऐसा कहने पर जानकी ने कहा — महामते ! तुम आराम से जा सकते हो, मगर यह मेरा प्रिय करने वाली है। मैं इसे अपने पास बड़े सुख से रखूँगी । जब सीता ने उस शुकी को छोड़ने से मना कर दिया, तब वह पक्षी अत्यंत दुखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणी में कहा —-‘योगी लोग जो बात कहते हैं वह सत्य ही है—-किसी से कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोष के कारण ही बन्धन में पड़ता है। यदि हम इस पर्वत के ऊपर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिए यह बन्धन कैसे प्राप्त होता। इसलिए मौन ही रहना चाहिए ।’ इतना कहकर पक्षी पुनः बोला—– ‘सुन्दरी ! मैं अपनी इस भार्या के विना जीवित नहीं रह सकता, इसलिए इसे छोड़ दो। सीता ! तुम बहुत अच्छी हो, मेरी प्रार्थना मान लो।’ इस तरह उसने बहुत समझाया, किन्तु सीता ने उसकी पत्नी को नहीं छोड़ा, तब उसकी भार्या ने क्रोध और दुख से व्याकुल होकर जानकी को शाप दिया ——- ‘अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पति से अलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणी की अवस्था में श्री राम से अलग होना पड़ेगा।’ यों कहकर पति वियोग के कारण उसके प्राण निकल गये। उसने श्री रामचंद्र जी का स्मरण तथा पुनः पुनः राम नाम का उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिए उसे ले जाने के लिए एक सुंदर विमान आया और वह

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महाशिवरात्रि व्रत कथा

एक बार एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूँ. शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना। ‘ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया। कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई। शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी. इस समय मुझे मत मार। शिकारी हँसा और बोला, ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ. मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, ‘जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ। मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,’ हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े, मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा। मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ। उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा। थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की. तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

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नाभाग की कथा

मनुपुत्र नभग का पुत्र था नाभाग। जब वह कई वर्ष ब्रह्मचर्य का पालन कर लौटा, तब बड़े भाइयों ने उसे हिस्से में केवल पिता को दिया। सम्पत्ति तो उन्होंने पहले ही आपस में बाँट ली थी। उसने अपने पिता से कहा — पिता जी ! मेरे बड़े भाइयों ने हिस्से में मेरे लिए आपको ही दिया है।पिता ने कहा — बेटा! तुम उनकी बात न मानो। देखो, ये आंगिरस गोत्र ब्राह्मण बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं । परंतु वे प्रत्येक छठे दिन अपने कर्म में भूल कर बैठते हैं। तुम उनके पास जाकर उन्हें वैश्वदेव सम्बन्धी दो सूक्त बतला दो; जब वे स्वर्ग जाने लगेंगे, तब यज्ञ से बचा हुआ सारा धन तुम्हें दे देंगे। उसने अपने पिता के आज्ञानुसार वैसा ही किया। उन ब्राह्मणों ने भी यज्ञ का बचा हुआ धन उसे दे दिया और वे स्वर्ग में चले गये। जब नाभाग धन लेने लगा, तब उत्तर दिशा से एक काले रंग का पुरुष आया। उसने कहा — ‘इस यज्ञभूमि में जो कुछ बचा हुआ है, वह सब धन मेरा है ‘। नाभाग ने कहा —‘ ऋषियों ने यह धन मुझे दिया है, इसलिए यह मेरा है ‘। इस पर उस पुरुष ने कहा —‘हमारे विवाद के विषय में तुम्हारे पिता से ही प्रश्न किया जाय ‘। तब नाभाग ने जाकर पिता से पूछा। पिता ने कहा — ‘एक बार दक्षप्रजापति के यज्ञ में ऋषि लोग यह निश्चय कर चुके हैं कि यज्ञभूमि में जो कुछ बच रहता है, वह सब रुद्रदेव का हिस्सा है। इसलिए यह धन तो महादेव जी को ही मिलना चाहिए ‘। नाभाग ने जाकर उन काले रंग के पुरुष रुद्र भगवान को प्रणाम किया और कहा कि ‘प्रभो ! यज्ञभूमि की सभी वस्तुएँ आपकी हैं, मेरे पिता ने ऐसा ही कहा है। भगवन्! मुझसे अपराध हुआ, मैं सिर झुकाकर आपसे क्षमा माँगता हूँ । तब भगवान रुद्र ने कहा — ‘तुम्हारे पिता ने धर्म के अनुकूल निर्णय दिया है और तुमने भी मुझसे सत्य ही कहा है।तुम वेदों का अर्थ तो पहले से ही जानते हो।अब मैं तुम्हें सनातन ब्रह्म तत्व का ज्ञान देता हूँ । यहाँ यज्ञ में बचा हुआ मेरा जो अंश है, यह धन भी मैं तुम्हें ही दे रहा हूँ; तुम इसे स्वीकार करो। इतना कहकर भगवान रुद्र अन्तर्धान हो गये। जो मनुष्य प्रातः और सायंकाल एकाग्रचित्त से इस आख्यान का स्मरण करता है, वह प्रतिभाशाली एवं वेदज्ञ तो होता ही है, साथ ही अपने स्वरूप को भी जान लेता है।

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भगवान श्री कृष्ण द्वारा मारे गये धेनुकासुर के पूर्व जन्म की कथा

एक समय की बात है। राजा बलि का पुत्र साहसिक देवताओं को परास्त कर गन्धमादन की ओर प्रस्थित हुआ। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्ग की अप्सरा तिलोत्तमा उधर से निकली। उसने साहसिक को देखा और साहसिक ने उसको। दोनों आकर्षित हो गये।तिलोत्तमा ने अपने सौन्दर्य से साहसिक को मोहित कर दिया। वे दोनों एकांत में यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं ऋषि दुर्वासा श्री कृष्ण के चरणों का चिंतन कर रहे थे। वे दोनों उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यंत निकट बैठे मुनि को नहीं देखा। शोर सुनकर सहसा मुनि का ध्यान भंग हो गया। उन्होंने उन दोनों की कुत्सित चेष्टाएँ देख क्रोध में भरकर कहा। दुर्वासा बोले —ओ गदहे के समान निरलज्ज नराधम। उठ ! भक्त बलि का पुत्र होकर तू पशुवत् आचरण कर रहा है। पशुओं के सिवा सभी मैथुन कर्म में लज्जा करते हैं। विशेषतः गदहे लज्जा से हीन होते हैं; अतः अब तू गदहे की योनि में जा। तिलोत्तमे ! तू भी उठ। दैत्य के प्रति ऐसी आसक्ति; तो अब तू दानव योनि में जन्म ग्रहण कर। ऐसा कहकर दुर्वासा मुनि चुप हो गये । फिर वे दोनों लज्जित और भयभीत होकर मुनि की स्तुति करने लगे । साहसिक बोला –मुने ! आप ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात् महेश्वर हैं। भगवन् ! मेरे अपराध को क्षमा करें। कृपा करें। यों कहकर वह फूट फूट कर रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा। तिलोत्तमा बोली —हे नाथ ! हे दीनबन्धो ! मुझ पर कृपा कीजिए। कामुक प्राणी में लज्जा और चेतना नहीं रह जाती है। ऐसा कहकर वह रोती हुई दुर्वासा की शरण में गयी। उन दोनों की व्याकुलता देखकर मुनि को दया आ गयी। दुर्वासा बोले — दानव ! तू विष्णु भक्त बलि का पुत्र है। पिता का स्वभाव पुत्र में अवश्य रहता है। जैसे कालिय के सिर पर अंकित श्री कृष्ण का चरण चिन्ह सभी सर्पों के मस्तक पर रहता है। वत्स ! एक बार गदहे की योनि में जन्म लेकर तू मोक्ष को प्राप्त हो जा। अब तू वृन्दावन के तालवन में जा। वहाँ श्री कृष्ण के चक्र से प्राणों का परित्याग करके तू शीघ्र मोक्ष को प्राप्त कर लेगा। तिलोत्तमे ! तू वाणासुर की पुत्री होगी; फिर श्री कृष्ण –पौत्र अनिरुद्ध का आलिंगन पाकर शुद्ध हो जायगी। यह कहकर दुर्वासा मुनि चुप हो गये। तत्पश्चात् वे दोनों भी उन मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम करके यथा स्थान चले गये। इस प्रकार साहसिक गर्दभ योनि में जन्म लेकर धेनुकासुर हुआ और तिलोत्तमा बाणासुर की पुत्री उषा होकर अनिरुद्ध की पत्नी हुई।

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द्रोपदी जन्म कथा, आखिर कैसे मिले ! द्रोपदी को पांच पति ?

प्राचीन काल की बात है। नैमिषारण्य क्षेत्र में देवताओं का एक महान यज्ञ चल रहा था। यमराज ने यज्ञ में दीक्षा ले ली थी, इसलिए वे यज्ञीय पशुओं के अतिरिक्त और किसी का वध नहीं करते थे। इससे मर्त्य-लोक के प्राणियों की मृत्यु का समय बीतने लगा और वे अमर सरीखे हो गये। पृथ्वी पर प्रजा की संख्या बहुत बढ़ गयी। इससे देवताओं को बड़ी चिंता हुई। वे सोचने लगे कि पृथ्वी इतना भार कैसे सह सकेगी। पृथ्वी भी तो देवी ही है। देवी के भार से देवताओं को चिंता होनी ही चाहिए। उनके मन में यह बात भी आयी कि पृथ्वी के प्राणियों से हम इसी अर्थ में अच्छे हैं कि वे मर जाते हैं और हम नहीं मरते। यदि वे भी नहीं मरेंगे तो हममें और उनमें अंतर ही क्या रहेगा। इसका कुछ न कुछ उपाय निकालना चाहिए।इन्द्र, वरुण, कुवेर, चन्द्रमा, रुद्र, वसु, अश्विनी कुमार आदि सब मिलकर श्री ब्रह्मा जी के पास गये।उन्होंने ब्रह्मा जी के चरणों में प्रणाम कर निवेदन किया — ‘दादाजी ! इस समय हम सब बड़े भयभीत हैं; इसका कारण यह है कि आजकल मनुष्यों की संख्या बहुत बढ़ रही है और उसके घटने का कोई उपाय नहीं हो रहा है। हमारी व्याकुलता बढ़ रही है। इस दुख से स्वर्ग में रहने पर भी हमें सुख के दर्शन नहीं हो रहे हैं, सुख-शान्ति पाने के लिए हम आपकी शरण में आये हैं।’ ब्रह्मा ने कहा — ‘देवताओ ! तुम लोग स्वर्ग में रहते हो, तुम्हारे पास भोग की सब सामग्री है। बुढ़ापा और मृत्यु का तुम्हें डर नहीं है, तुम्हें कामना है नहीं; फिर मर्त्य-लोक में रहने वाले बेचारे मनुष्यों से तुम क्यों भयभीत होते हो? तुम्हें मनुष्यों से डरने का कोई कारण नहीं है।’ देवताओं ने अञजलि बाँध कर प्रार्थना की —–‘प्रभो ! आजकल किसी की मृत्यु नहीं हो रही है इससे मृत्यु लोक के मनुष्य भी अमर हो गये हैं। मर्त्यलोक के मनुष्य हमारी बराबरी करें —यह हमसे देखा नहीं जाता, हमें इस बात का बड़ा दुख है। अब आप कोई ऐसी व्यवस्था कीजिए कि हममें और उनमें अंतर मालूम पड़े; इसीलिए हम सब आपके पास आये हैं ‘। ब्रह्मा जी ने कहा —-‘इस समय सूर्यपुत्र यमराज महायज्ञ में लगे हुए हैं, इसी से पृथ्वी के प्राणियों की मृत्यु नहीं हो रही है। जब वे अपना सब काम पूरा कर लेंगे, तब लोगों की मृत्यु होगी । तुम लोगों की शक्ति से शक्तिमान् होकर यमराज मर्त्यलोक के प्राणियों का संहार करेंगे। तब मनुष्य तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकेंगे।’ ब्रह्मा जी की यह बात सुनकर देवता लोग उसी स्थान पर गये, जहाँ यज्ञ हो रहा था। एक दिन सब लोग नदी के तट पर बैठे हुए थे। उन्होंने देखा कि धारा में एक बड़ा ही सुंदर सोने का कमल बहा जा रहा है। उसे देखकर उन लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। देवताओं में सबसे श्रेष्ठ देवराज इन्द्र वहाँ उपस्थित थे। उनके मन में उस पुष्प का ठीक ठीक समाचार जानने की उत्सुकता हुई। वे चल पड़े, आगे जाने पर उन्होंने देखा कि जहाँ से नदी निकली है, वहाँ एक बड़ी ही तेजस्विनी स्त्री नदी के भीतर खड़ी होकर जल भर रही है। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। आँसू की जो बूँद नदी में गिरती, वही सोने का कमल हो जाता। इन्द्र उसके पास गये। उन्होने पूछा —– ‘कल्याणी ! तुम कौन हो? किसलिए रो रही हो? अपनी सब बात मुझसे कहो।’उस स्त्री ने इन्द्र की ओर देख कर कहा —-‘देवराज ! तुम तनिक मेरे साथ आगे चले आओ, तुम्हें मालूम हो जायगा कि मैं कौन हूँ और क्यों रो रही हूँ ।’ इन्द्र उसके पीछे पीछे चलने लगे । इन्द्र ने आगे जाकर देखा कि हिमाचल के शिखर पर एक परम सुंदर युवा पुरुष सिद्धासन लगाये बैठा है और उसके पास ही एक सुंदरी युवती बैठी है। वे दोनों आपस में चौसर खेल रहे थे। इन्द्र के पहुँचने पर भी उन लोगों ने कुछ विशेष ध्यान नहीं दिया। इन्द्र को ऐसा मालूम हुआ कि ये तो मेरा अपमान कर रहे हैं। उन्हें थोड़ी थोड़ी जलन होने लगी। उन्होंने क्रोध पूर्वक दृष्टि से उस युवक की ओर देख कर कहा — ‘युवक! क्या तुम नहीं जानते कि मैं इस लोक का स्वामी हूँ? यह लोक मेरे ही अधीन है। अब भी तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैं ईश्वर हूँ ‘। वह पुरुष अपने खेल में तन्मय हो रहा था। इन्द्र के इस प्रकार कहने पर उसने एक बार धीरे से सिर ऊपर उठाया और हँस दिया। एक बार उसकी दृष्टि इन्द्र पर पड़ गई । दृष्टि पड़ते ही इन्द्र ठूँठ के समान हो गये —न वे हिल सकते थे न डोल सकते थे। वह स्त्री रोने लगी। खेल समाप्त होने पर उस युवा पुरुष ने रोती हुयी स्त्री से कहा —– ‘इन्द्र को मेरे पास ले आओ, मैं इन्द्र का अनिष्ट नहीं कर रहा हूँ। मैं ऐसा उपाय कर रहा हूँ जिससे फिर इन्द्र को अपने ईश्वरपने का कभी गर्व न हो।’ स्त्री ने जाकर ज्यों ही इन्द्र के शरीर का स्पर्श किया, त्यों ही इन्द्र पृथ्वी पर गिर पड़े । तेजस्वी युवक रूपधारी भगवान शंकर ने कहा —–‘इन्द्र ! अब कभी इस प्रकार का अभिमान मत करना कि मैं ईश्वर हूँ। तुम्हारे शरीर में जो शक्ति है, वह तुम्हारी नहीं दूसरे की है। अच्छा, माना कि तुम्हारे अन्दर बड़ी शक्ति है; इसलिए तुम इस बड़ी सी पर्वत शिला को हटा कर नीचे की गुफा में जाओ, वहाँ तुम्हारे समान और भी तेजस्वी इन्द्र हैं ।’ इन्द्र ने वैसा ही किया। उस शिला के हटाने पर इन्द्र ने देखा कि उन्हीं के समान और भी चार इन्द्र वहाँ हैं । उन्हें देखकर इन्द्र बहुत ही दुखी हुए। वे सोचने लगे —– क्या मेरी दशा भी इन्हीं के समान होगी। भगवान शंकर ने अपने दया भरे चेहरे को तनिक कठोर बनाया और भयंकर भाव प्रकट करते हुए कहा ——‘ इन्द्र ! मूर्खता के कारण तुमने मेरा अनादर किया है । जाओ, तुम भी इसी गुफा में रहो।’ शंकर की बात सुनकर इन्द्र डर के मारे थर थर काँपने लगे। उन्होंने अञ्जलि बाँध कर सिर नवाकर भगवान शंकर से निवेदन किया —– ‘प्रभो ! आपने मुझ पर विजय पायी। आप स्वयं तीनों

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मरते वक़्त बालि ने, अंगद से कही थी ये तीन ज्ञान की बातें। आप भी जानिए  

रामायण में जब श्रीराम ने बालि को बाण मारा तो वह घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा था। इस अवस्था में जब पुत्र अंगद उसके पास आया तब बालि ने उसे ज्ञान की कुछ बातें बताई थीं। ये बातें आज भी हमें कई परेशानियों से बचा सकती हैं। यहां जानिए ये बातें कौन सी हैं… मरते समय बालि ने अंगद से कही ये बातें बालि ने कहा- देशकालौ भजस्वाद्य क्षममाण: प्रियाप्रिये।सुखदु:खसह: काले सुग्रीववशगो भव।। इस श्लोक में बालि ने अगंद को ज्ञान की तीन बातें बताई हैं…  देश काल और परिस्थितियों को समझो।  किसके साथ कब, कहां और कैसा व्यवहार करें, इसका सही निर्णय लेना चाहिए।  पसंद-नापसंद, सुख-दु:ख को सहन करना चाहिए और क्षमाभाव के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए। बालि ने अंगद से कहा ये बातें ध्यान रखते हुए अब से सुग्रीव के साथ रहो। आज के समय में भी यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए तो हर इंसान बुरे समय से बच सकता है। अच्छे-बुरे हालात में शांति और धैर्य के साथ आचरण करना चाहिए। ये है बालि वध का प्रसंग जब बालि श्रीराम के बाण से घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब बालि में श्रीराम से कहा कि आप धर्म की रक्षा करते हैं तो मुझे (बालि को) इस प्रकार बाण क्यों मारा? इस प्रश्न के जवाब में श्रीराम ने कहा कि छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी और पुत्री, ये सब समान होती हैं और जो व्यक्ति इन्हें बुरी नजर से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता है। बालि, तूने अपने भाई सुग्रीव की पत्नी पर बुरी नजर रखी और सुग्रीव को मारना चाहा। इस पाप के कारण तुझे बाण मारा है। इस जवाब से बालि संतुष्ट हो गया और श्रीराम से अपने किए पापों की क्षमा याचना की। इसके बाद बालि ने अगंद को श्रीराम की सेवा में सौंप दिया। इसके बाद बालि ने प्राण त्याग दिए। बाली की पत्नी तारा विलाप करने लगी। तब श्रीराम ने तारा को ज्ञान दिया कि यह शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से मिलकर बना है। बालि का शरीर तुम्हारे सामने सोया है, लेकिन उसकी आत्मा अमर है तो विलाप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार समझाने के बाद तारा शांत हुई। इसके बाद श्रीराम में सुग्रीव को राज्य सौंप दिया।

मरते वक़्त बालि ने, अंगद से कही थी ये तीन ज्ञान की बातें। आप भी जानिए   Read More »

पौराणिक रहस्य – सुदामा को गरीबी क्यों मिली?

सुदामा को गरीबी क्यों मिली?- अगर अध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो सुदामा जी बहुत धनवान थे। जितना धन उनके पास था किसी के पास नही था । लेकिन अगर भौतिक दृष्टि से देखा जाये तो सुदामाजी बहुत निर्धन थे ।आखिर क्यों ?एक ब्राह्मणी थी जो बहुत गरीब निर्धन थी। भिच्छा माँग कर जीवन यापन करती थी। एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिच्छा नही मिली वह प्रति दिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी। छठवें दिन उसे भिच्छा में दो मुट्ठी चना मिले । कुटिया पे पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी। ब्राह्मणी ने सोंचा अब ये चने रात मे नही खाऊँगी प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाकर तब खाऊँगी । यह सोंचकर ब्राह्मणी चनों को कपडे में बाँधकर रख दिय। और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी । कहते हैं –पुरुष बली नही होत हैसमय होत बलवान ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आ गये।इधर उधर बहुत ढूँढा चोरों को वह चनों की बँधी पुटकी मिल गयी चोरों ने समझा इसमे सोने के सिक्के हैं इतने मे ब्राह्मणी जग गयी और शोर मचाने लगी । गाँव के सारे लोग चोरों को पकडने के लिए दौडे। चोर वह पुटकी लेकर भगे। पकडे जाने के डर से सारे चोर संदीपन मुनि के आश्रम में छिप गये। (संदीपन मुनि का आश्रम गाँव के निकट था जहाँ भगवान श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे) गुरुमाता को लगा की कोई आश्रम के अन्दर आया है गुरुमाता देखने के लिए आगे बढीं चोर समझ गये कोई आ रहा है चोर डर गये और आश्रम से भगे ! भगते समय चोरों से वह पुटकी वहीं छूट गयी।और सारे चोर भग गये । इधर भूख से व्याकुल ब्राह्मणी ने जब जाना ! कि उसकी चने की पुटकी चोर उठा ले गये । तो ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया की ” मुझ दीनहीन असह।य के जो भी चने खायेगा वह दरिद्र हो जायेगा ” । उधर प्रात:काल गुरु माता आश्रम मे झाडू लगाने लगी झाडू लगाते समय गुरु माता को वही चने की पुटकी मिली गुरु माता ने पुटकी खोल के देखी तो उसमे चने थे। सुदामा जी और कृष्ण भगवान जंगल से लकडी लाने जा रहे थे। (रोज की तरह ) गुरु माता ने वह चने की पुटकी सुदामा जी को दे दी। और कहा बेटा ! जब वन मे भूख लगे तो दोनो लोग यह चने खा लेना । सुदामा जी जन्मजात ब्रह्मज्ञानी थे। ज्यों ही चने की पुटकी सुदामा जी ने हाथ मे लिया त्यों ही उन्हे सारा रहस्य मालुम हो गया। सुदामा जी ने सोंचा ! गुरु माता ने कहा है यह चने दोनो लोग बराबर बाँट के खाना। लेकिन ये चने अगर मैने त्रिभुवनपति श्री कृष्ण को खिला दिये तो सारी सृष्टि दरिद्र हो जायेगी। नही-नही मै ऐसा नही करुँगा मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जायें मै ऐसा कदापि नही करुँगा । मै ये चने स्वयं खा जाऊँगा लेकिन कृष्ण को नही खाने दूँगा। और सुदामा जी ने सारे चने खुद खा लिए। दरिद्रता का श्राप सुदामा जी ने स्वयं ले लिया। चने खाकर । लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को एक भी दाना चना नही दिया। ऐसे होते हैं मित्र ।

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क्या आप जानते हैं ? 68 करोड तीर्थ देवताओं का रूप धारण करके अयोध्या धाम का दर्शन करने तथा सरयू स्नान करने प्रतिदिन आते हैं।

श्री राम जी ने स्वयं कहा है: अवधपुरी सम प्रिय नहि सोऊ।यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ।। एक बार लक्ष्मण जी ने तीर्थ यात्रा जाने के लिए श्री राम जी से प्रार्थना करने लगे । श्री राम जी ने यात्रा करने के लिए आज्ञा दे दी । आज्ञा देने के बाद श्री राम जी मुस्कराने लगे । लक्ष्मण जी ने कहा— भगवन ! दास से कौन सी त्रुटि हो गयी, जिसके कारण आप मुस्करा रहे हैं । श्री राम जी ने कहा:— लक्ष्मण ! समय आने पर खुद ही आप समझ जायेंगे । लक्ष्मण जी तीर्थ यात्रा जाने के लिए तैयारी करने लगे । गुरू देव श्री वसिष्ठ जी ने यात्रा का महूर्त श्रावण शुक्ल पक्ष पंचमी का निकाला । महूर्त के अनुसार सूर्योदय के पहले प्रस्थान करना था । लक्ष्मण जी को तैयारी करते करते रात्रि के दो बज गये । लक्ष्मण जी सोंचने लगे आज प्रात: पाँच बजे यात्रा करनी है । यदि अब विश्राम करूँगा तो बिलम्ब होगा । अब ब्रह्म महूर्त भी होने वाला है। अत: पहले जाकर श्री सरयू जी का स्नान कर लें । ऐसा निश्चय करके स्नान करने के लिए लक्ष्मण जी सरयू के किनारे पधारे। वहाँ बहुत प्रकाश हो रहा था । राज घाट पर हजारों राजा महराजा स्नान कर रहे थे और संध्या करके आकाश मार्ग से चले जा रहे थे । लक्ष्मण जी सोंचने लगे। कोई राम नवमी का पर्व नही, कोई उत्सव – विशेष नही , फिर इस ब्रह्म बेला में इतनी भीड कैसे इकट्ठा हो गयी । लक्ष्मण जी यह दृश्य देखकर लौट आये । श्री राम ने पूँछा:– लक्ष्मण ! आज आप के तीर्थ यात्रा जाने का महूर्त था परंतु आप अभी तक स्नान ही नही किये। लक्ष्मण जी ने कहा:–भगवन ! आज मैने एक आश्चर्यमय घटना सरयू जी के किनारे देखा । और राम जी को सारी घटना सुना दी । श्री राम ने कहा:– लक्ष्मण ! आप ने उन लेगों से पूछा नही कि आप कौन हैं, कहाँ से पधारे हैं । लक्ष्मण जी ने कहा:– भगवन! यह तो दास से बडी भूल हो गयी । मैं संकोचवस कुछ भी नही पूछ सका क्यों की वहाँ हजारों लोग स्नान कर रहे थे। आज मैं पुन: जाऊँगा और सबसे परिचय पूछूँगा ।लक्ष्मण जी पुन: गये । देखते है कल की तरह हजारों लोग स्नान कर रहे हैं, लेकिन कोई किसी से बोलता नही है। लक्ष्मण जी हाथ जोडकर प्रणाम करते हुए बोले :— भगवन ! आप लोगों का परिचय जानना चाहता हूँ । हजारों राजाओं ने कहा:– हम लोग काशी,गया,जगन्नाथ,बद्रीनाथ,केदारनाथ,श्रीरंगम,रामेश्वरम, और द्वारिकापुरी आदि अडसठ (68 करोड ) करोड तीर्थ देवताओं का रूप धारण करके यहाँ नित्य प्रति श्री अयोध्या का दर्शन एवं सरयू जी का स्नान करने आते हैं। इसके बाद लक्ष्मण जी महिलाओं के घाट पर गये और उन्होंने उन माताओं को प्रणाम करते पूछा। माताओं ने कहा:– हम गंगा,यमुना, सरस्वती,ताप्ती,तुंगभद्रा,कमला, कोशी,गंडकी,नर्मदा,कृष्णा,एवं क्षिप्रा आदि भारत की हजारों पवित्र नदियाँ नित्य प्रति श्री राम पुरी का दर्शन एवं श्री सरयू जी का स्नान करने आते हैं। उसी समय एक विकराल काला पुरूष आकाश मार्ग से आया और श्री सरयू जी की धारा में गिरा । थोडी देर बाद जल से निकला तो गौरवर्ण,हाथ में संख ,चक्र,गदा आदि धारण किये प्रकट हुआ । लक्ष्मण जी ने रिषियों से पूछा :– भगवन ! ये देवता कौन हैं जो अभी काले थे फिर गौरवर्ण के हो गये । रिषियों ने कहा लक्ष्मण ये तीर्थ राज प्रयाग हैं। लक्ष्मण जी ने सारी घटना राम जी से बतायी । श्री राम जी ने कहा:– भैया लक्ष्मण ! इस पुरी के दर्शन एवं स्नान हेतु 68 करोड तीर्थ अयोध्या में आते हैं और आप अयोध्या छोडकर अन्य तीर्थों का दर्शन करने जा रहे थे । इसी लिए जब आप ने मुसकराने का कारण पूछा था , तब मैने कहा था उचित समय पर आप स्वयं जान जायेंगे। अब आप निर्णय कर लीजिये की तीर्थ यात्रा में जाना है य नही । अवधपुरी मम् पुरी सुहावन ।उत्तर दिश बह सरयु पावन ।। जय श्री रामजय हनुमानजय सियाराम|| राम |

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कैसे प्राप्त हुई हनुमानजी को अपार शक्तियां, जिससे बने वो परम शक्तिशाली

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, बाल्यकाल में जब हनुमान सूर्यदेव को फल समझकर खाने को दौड़े तो घबराकर देवराज इंद्र ने हनुमानजी पर वज्र का वार किया। वज्र के प्रहार से हनुमान निश्तेज हो गए। यह देखकर वायुदेव बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने समस्त संसार में वायु का प्रवाह रोक दिया। संसार में हाहाकार मच गया। तब परमपिता ब्रह्मा ने हनुमान को स्पर्श कर पुन: चैतन्य किया। उस समय सभी देवताओं ने हनुमानजी को वरदान दिए। इन वरदानों से ही हनुमानजी परम शक्तिशाली बन गए। हनुमानजी को मिले इतने वरदान 1. भगवान सूर्य ने हनुमानजी को अपने तेज का सौवां भाग देते हुए कहा कि जब इसमें शास्त्र अध्ययन करने की शक्ति आ जाएगी, तब मैं ही इसे शास्त्रों का ज्ञान दूंगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा और शास्त्रज्ञान में इसकी समानता करने वाला कोई नहीं होगा। 2. धर्मराज यम ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह मेरे दण्ड से अवध्य और निरोग होगा। 3. यक्षराज कुबेर ने वरदान दिया कि इस बालक को युद्ध में कभी विषाद नहीं होगा तथा मेरी गदा संग्राम में भी इसका वध न कर सकेगी। 4. भगवान शंकर ने यह वरदान दिया कि यह मेरे और मेरे शस्त्रों द्वारा भी अवध्य रहेगा। 5. देवशिल्पी विश्वकर्मा ने वरदान दिया कि मेरे बनाए हुए जितने भी शस्त्र हैं, उनसे यह अवध्य रहेगा और चिंरजीवी होगा। 6. देवराज इंद्र ने हनुमानजी को यह वरदान दिया कि यह बालक आज से मेरे वज्र द्वारा भी अवध्य रहेगा। 7. जलदेवता वरुण ने यह वरदान दिया कि दस लाख वर्ष की आयु हो जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी। 8. परमपिता ब्रह्मा ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह बालक दीर्घायु, महात्मा और सभी प्रकार के ब्रह्दण्डों से अवध्य होगा। युद्ध में कोई भी इसे जीत नहीं पाएगा। यह इच्छा अनुसार रूप धारण कर सकेगा, जहां चाहेगा जा सकेगा। इसकी गति इसकी इच्छा के अनुसार तीव्र या मंद हो जाएगी। 9. इसके अलावा जब हनुमानजी माता सीता को खोजते हुए अशोक वाटिका पहुंचे थे तब माता सीता ने उन्हें अमरता का वरदान दिया था।

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आखिर ! महर्षि वाल्मीकि जी को कवित्व शक्ति कैसे मिली । कैसे हुए “आदिकवि”

एक समय की बात है, ब्रह्मा जी ने सरस्वती से कहा तुम किसी योग्य पुरुष के मुख्य में कवित्व शक्ति होकर निवास करो । ब्रह्मा जी की आज्ञा मानकर सरस्वती योग्य पात्र की खोज में बाहर निकलीं । उन्होंने ऊपर के सत्यादि लोकों में भ्रमण करके देवताओं में पता लगाया तथा नीचे के सातों पातालों में घूमकर वहां के निवासियों में खोज की ; किंतु कहीं भी उनको सुयोग्य पात्र नहीं मिला । इसी अनुसंधान में पूरा एक सतयुग बीत गया।तदंतर त्रेता युग के आरंभ में सरस्वती देवी भारतवर्ष में भ्रमण करने लगीं । घूमते-घूमते वह तमसा नदी के तीर पर पहुंचीं । वहां महातपस्वी महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्यों के साथ रहते थे । वाल्मीकि उस समय अपने आश्रम के इधर-उधर घूम रहे थे । इतने में ही उनकी दृष्टि एक क्रौंच पक्षी पर पड़ी ; जो तत्काल ही एक व्याधके बाण से घायल हो पंख फड़फड़ाता हुआ गिरा था । पक्षी का सारा शरीर लहूलुहान हो गया था। वह पीड़ा से तड़प रहा था ।और उसकी पत्नी क्रौंची उसके पास ही गिरकर बड़े आर्त स्वर मैं चें चें कर रही थी । पक्षी के उस जोड़े कि यह दयनीय दशा देख कर दयालु महर्षि अपनी सहज करुणा से द्रवीभूत हो उठे । उनके मुख से तुरंत ही एक श्लोक निकल पड़ा ; जो इस प्रकार है: मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती समा: ।यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम् ।। यह श्लोक सरस्वती की ही कृपा का प्रसाद था । उन्होंने महर्षि को देखते ही उनकी असाधारण योग्यता और प्रतिभा का परिचय पा लिया था । उन्हीं के मुख में उन्होंने सर्वप्रथम प्रवेश किया । कवित्व शक्ति मयी सरस्वती की प्रेरणा से ही उनके मुख की वह वाणी, जो उन्हों ने क्रौंची की सान्त्वना के लिए कही थी, छंदोमयी बन गई । उनके हृदय का शोक ही श्लोक बनकर बाहर निकला था___ ” शोक: श्लोकत्वमागत: ” ।सरस्वती के कृपा पात्र होकर महर्षि वाल्मीकि ही “आदिकवि ” के नाम से संसार में बिख्यात हुए ।

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पितृपक्ष में देवी देवता की पूजा करनी चाहिए की नहीं, जानिए नियम

आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन पितृपक्ष की शुरुआता होती है, जो कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को समाप्त होती है. इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनका तर्पण और पिंडदान किया जाता है. धार्मिक मान्यता अनुसार पितृपक्ष में सभी प्रकार के मांगलिक व शुभ कार्य वर्जित होते हैं. शास्त्रों में देवी-देवताओं की पूजा के साथ पूर्वजों की पूजा वर्जित है. ऐसे में अब सवाल उठता है कि पितृपक्ष में देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए या नहीं, आइए जानते हैं इसके बारे में… देवी-देवता की पूजा करनी चाहिए कि नहींपितरों को पूज्यनीय माना गया है. पितृ लोग पितृपक्ष के दौरान धरती पर वास करते हैं. ऐसे में इस दौरान पितरों की पूजा करना बेहद कल्याणकारी माना गया है. लेकिन अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि पितर पक्ष के दौरान देवी-देवता की पूजा करनी चाहिए कि नहीं तो हम आपको बता दें कि पितर पक्ष में प्रतिदिन की तरह ही पूजा करनी चाहिए, क्योंकि पितर देव हमारे लिए जरूर पूज्यनीय हैं. लेकिन हमारे ईश्वर से उच्च नहीं हैं. इन बातों का रखें ख्याल घर की मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमा के साथ पूर्वजों की तस्वीर न लगाएं. ऐसा करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और घर में वास्तु दोष लगता है. वास्तु शास्त्र के अनुसार पितरों की तस्वीर हमेशा घर में इस तरह लगाएं कि जहां उनका मुख दक्षिण दिशा की तरफ रहे.  वास्तु के अनुसार घर में पितरों की एक से अधिक तस्वीर नहीं होनी चाहिए. पितृपक्ष के दौरान प्रातः काल स्नान करने के बाद नित्य की तरह ही देवी-देवता की पूजा करनी चाहिए. देवी देवताओं के पूजा के बिना पितृपक्ष में श्राद्ध, पिंडदान इत्यादि का फल नहीं मिलता है. पितृपक्ष में कैसे करें पितरों का श्राद्धपितृपक्ष के दौरान नियमित देवी-देवता की पूजा करने के उपरातं दक्षिण दिशा में मुंह करके बाएं पैर को मोड़कर बाएं घुटने को जमीन पर टीका कर बैठ जाएं. इसके बाद पितरों का ध्यान करते हुए उनकी पूजा करें. पितरों के श्राद्ध के समय जल में काला तिल मिलाएंऔर हाथ में कुश रखकर उनका तर्पण करें. पितृपक्ष की अवधि में दोनों वेला में स्नान करने के पश्चात पितरों का ध्यान करें. इस दौराना ज्यादा से ज्यादा गरीबों को भोजन कराएं.

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विभीषण से कर लेने घटोत्कच गया था लंका, जानिए भीम पुत्र घटोत्कच से जुडी रोचक जानकारी

महाभारत में ऐसे अनेक पात्र हैं, जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं। ऐसा ही एक पात्र है भीम का पुत्र घटोत्कच। अधिकांश लोग ये जानते हैं कि घटोत्कच भीम व राक्षसी हिडिंबा का पुत्र था और उसकी मृत्यु कर्ण के हाथों हुई थी। इसके अलावा भी घटोत्कच से जुड़ी अनेक रोचक बातें हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको घटोत्कच से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-घटोत्कच क्यों गया लंका?महाभारत के दिग्विजय पर्व के अनुसार, जब राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया तो भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव को अलग-अलग दिशाओं में निवास कर रहे राजाओं से कर (टैक्स) लेने के लिए भेजा। कुछ राजाओं ने आसानी से कर दे दिया तो कुछ युद्ध के बाद कर देने के लिए राजी हुए। इसी क्रम में सहदेव ने घटोत्कच को लंका जाकर राजा विभीषण से कर लेकर आने को कहा। घटोत्कच अपनी मायावी शक्ति से तुरंत लंका पहुंच गया। वहां जाकर उसने राजा विभीषण को अपना परिचय दिया और आने का कारण बताया। घटोत्कच की बात सुनकर विभीषण प्रसन्न हुए और उन्होंने कर के रूप में बहुत धन देकर उसे लंका से विदा किया।ऐसे हुआ घटोत्कच का जन्मलाक्षागृह की आग से बच निकलने के बाद पांडव अपनी माता के साथ छिपते हुए वन में चले गए। उस वन में हिडिंबासुर नाम का राक्षस अपनी बहन हिडिंबा के साथ रहता था। हिडिंबा ने जब भीम को देखा तो उससे प्रेम करने लगी। तभी हिडिंबासुर भी वहां आ गया। युद्ध में भीम ने उसका वध कर दिया। कुंती के कहने पर भीम ने हिडिंबा से विवाह कर लिया। कुछ समय बाद भीम और हिंडिबा के मिलन से एक महापराक्रमी बालक पैदा हुआ। वह क्षणभर में ही बड़े-बड़े राक्षसों से भी बढ़ गया और तुरंत ही जवान हो गया। उसके सिर पर बाल नहीं थे। भीम और हिंडिबा ने उसके घट अर्थात सिर को उत्कच यानी केशहीन देखकर उसका नाम घटोत्कच रख दिया।घटोत्कच ने की थी पांडवों की सहायतावनवास के दौरान जब पांडव गंदमादन पर्वत की ओर जा रहे थे, तभी रास्ते में बारिश व तेज हवाओं के कारण द्रौपदी बहुत थक गई। तब भीम ने अपने पुत्र घटोत्कच को याद किया। घटोत्कच तुंरत वहां आ गया। भीम ने उसे बताया कि तुम्हारी माता (द्रौपदी) बहुत थक गई है। तुम उसे कंधे पर बैठाकर हमारे साथ इस तरह चलो की उसे किसी तरह का कष्ट न हो। घटोत्कच ने भीम से कहा कि- मेरे साथ और भी साथी हैं, आप सभी उनके कंधे पर बैठ जाइए। माता द्रौपदी को मैं अपने कंधे पर बैठा लेता हूं। इस तरह आप सभी आसानी से गंदमादन पर्वत तक पहुचं जाएंगे। पांडवों ने ऐसा ही किया। कुछ ही देर में घटोत्कच व उसके साथियों ने पांडवों को गंदमादन पर्वत तक पहुंचा दिया। घटोत्कच ने भी किया था दुर्योधन से युद्धकुरुक्षेत्र के मैदान में जब पांडव व कौरवों की सेना में युद्ध छिड़ा हुआ था, उस समय घटोत्कच और दुर्योधन के बीच भी भयानक युद्ध हुआ था। जब भीष्म पितामाह को पता चला कि दुर्योधन और घटोत्कच में युद्ध हो रहा है तो उन्होंने द्रोणाचार्य को कहा कि- घटोत्कच को युद्ध में कोई भी पराजित नहीं कर सकता। इसलिए आप उसकी सहायता के लिए जाईए। भीष्म के कहने पर द्रोणाचार्य, जयद्रथ, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण व अनेक महारथी दुर्योधन की सहायता के लिए गए, लेकिन घटोत्कच ने उन्हें भी अपने पराक्रम से घायल कर दिया। घटोत्कच ने अपनी माया से ऐसा भयानक दृश्य उत्पन्न किया कि उसे देखकर कौरवों की सेना भाग गई। घटोत्कच ने किया था अलम्बुष का वधयुद्ध के दौरान घटोत्कच और कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे राक्षस अलम्बुष में भी भयानक युद्ध हुआ था। अलम्बुष भी मायावी विद्याएं जानता था। घटोत्कच युद्ध में जो भी माया दिखाता, उसे अलम्बुष अपनी माया से नष्ट कर देता था। अलम्बुष ने घटोत्कच को अपने तीरों से घायल कर दिया। गुस्से में आकर घटोत्कच ने उसका वध करने का निर्णय लिया। घटोत्कच ने अपने रथ से अलम्बुष के रथ पर कूद कर उसे पकड़ लिया और उठाकर जमीन पर इस प्रकार पटका कि उसके प्राण निकल गए। यह देख पांडवों की सेना में हर्ष छा गया और वे प्रसन्न होकर अपने अस्त्र-शस्त्र लहराने लगे। इसका भी वध किया था घटोत्कच नेजब कर्ण पांडवों की सेना का संहार कर रहा था। उस समय श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को अपने पास बुलाया और कर्ण से युद्ध करने के लिए भेजा। जब दुर्योधन ने देखा कि घटोत्कच कर्ण पर प्रहार करना चाहता है तो उसने राक्षस जटासुर के पुत्र अलम्बुष (यह पहले वाले अलम्बुष से अलग है) को युद्ध करने के लिए भेजा। इस अलम्बुष और घटोत्कच में भी भयानक युद्ध हुआ। पराक्रमी घटोत्कच ने इस अलम्बुष का भी वध कर दिया। दुर्योधन की ओर फेंका था अलम्बुष का मस्तकराक्षस अलम्बुष का सिर काटकर घटोत्कच दुर्योधन के पास पहुंचा और गर्जना करते हुए बोला कि- मैंने तुम्हारे सहायक का वध कर दिया है। अब कर्ण और तुम्हारी भी यही अवस्था होगी। जो अपने धर्म, अर्थ और काम तीनों की इच्छा रखता है, उसे राजा, ब्राह्मण और स्त्री से खाली हाथ नहीं मिलना चाहिए (इसलिए मैं तेरे लिए यह मस्तक भेंट के रूप में लाया हूं)। ऐसा कहकर घटोत्कच ने अलम्बुष का सिर दुर्योधन की ओर फेंक दिया। ऐसा था घटोत्कच का रथमहाभारत के द्रोणपर्व के अनुसार, घटोत्कच के रथ पर जो झंडा था, उस पर मांस खाने वाले गिद्ध दिखाई देता था। उसके रथ में आठ पहिए लगे थे और चलते समय वह बादलों के समान गंभीर आवाज करता था। सौ बलवान घोड़े एस रथ में जुते थे। उन घोड़े के कंधों पर लंबे-लंबे बाल थे, उनकी आंखें लाल थी। घटोत्कच का रथ रीछ की खाल से मढ़ा था। उस रथ में सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे। विरूपाक्ष नाम का राक्षस उस रथ का सारथि था। ऐसी हुई घटोत्कच की मृत्युजब श्रीकृष्ण के कहने पर घटोत्कच कर्ण से युद्ध करने गया तो उनके बीच भयानक युद्ध होने लगा। घटोत्कच और कर्ण दोनों ही पराक्रमी योद्धा थे, इसलिए वे एक-दूसरे के प्रहार को काटने लगे। इन दोनों का युद्ध आधी रात तक चलता रहा। जब कर्ण ने देखा

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