September 2022

ऋषि दुर्वासा और कल्पवृक्ष की कथा

एक समय जब श्री रामचंद्र जी का दर्शन करने के लिए अपने साठ हजार शिष्यों सहित दुर्वासा ऋषि अयोध्या को जा रहे थे, तब मार्ग में जाते हुए दुर्वासा ने सोचा कि, मनुष्य का रूप धारण कर यह तो विष्णु जी ही संसार में अवतीर्ण हुए हैं; यह तो मैं जानता हूँ किन्तु संसारी जनों को आज मैं उनका पौरुष दिखलाऊँगा।अपने मन में ऐसा विचारते हुए वे अयोध्या आए और नगरी में प्रवेश कर सबको साथ लिए भगवान के भवन के आठ चौकों को लाँघकर पहले सीता जी के भवन में पहुँचे। तब शिष्यों सहित दुर्वासा को सीता जी के द्वार पर उपस्थित देख पहरेदारों ने शीघ्रता से दौड़कर श्री रामचंद्र जी को इसकी सूचना दी। यह सुनते ही भगवान राम मुनि दुर्वासा के पास आ पहुँचे और प्रणाम कर सबको बड़े आदर सहित भवन के भीतर लिवा गये तथा बैठने के लिए सुंदर आसन दिया। तब आसन पर बैठते ही दुर्वासा ने मधुर वचनों में श्री रामचंद्र जी से कहा कि, आज एक हजार वर्ष का मेरा उपवास व्रत पूरा हुआ है। इस कारण मेरे शिष्यों सहित मुझे भोजन कराइये और इसके लिए आपको केवल एक मुहूर्त का समय देता हूँ। साथ ही यह भी ज्ञात रहे कि मेरा यह भोजन जल, धेनु और अग्नि की सहायता से प्रस्तुत न किया जायेगा। केवल एक मुहूर्त में ही मेरी इच्छानुसार वह भोजन जिसमें विविध प्रकार के पकवान प्रस्तुत हों, मुझे प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त यदि तुम अपने गार्हस्थ्य-धर्म की रक्षा चाहो तो शिव पूजन निमित्त मुझे ऐसे पुष्प मँगवा दो कि जैसे पुष्प यहाँ अब तक किसी ने देखे न हों । यदि यह तुम्हारा किया न हो सके, तो मुझसे स्पष्ट कह दो कि, मैं इसमें असमर्थ हूँ । मैं चला जाऊँ। तब मुनि की इस बात को सुनकर श्री रामचंद्र जी ने मुस्कराते हुए नम्रता से कहा —“भगवान् ! मुझे आपकी यह सब आज्ञा स्वीकार है।” तब राम की बात सुनकर दुर्वासा ने प्रसन्न होकर कहा — मैं सरयू में स्नान करके अभी तुम्हारे पास आता हूँ, शीघ्रता करना। हमारे लिए सब सामग्रियों को प्रस्तुत करने के लिए अपने भाइयों तथा सीता को शीघ्रता के लिए कह देना। रामचंद्र जी ने कहा —अच्छा, आप जाइये स्नान कर आइये। दुर्वासा जी स्नान करने चले गये । राम चिन्तित हो गये। लक्ष्मण आदि भ्राता, जानकी तथा सब के सब व्याकुल हो राम की ओर निर्निमेष दृष्टि से देखने लगे कि मुनि ने तो इस प्रकार की सब अद्भुत वस्तुएँ माँगी हैं। इसके लिए देखें कि अब भगवान क्या करते हैं? क्योंकि बिना अग्नि, जल और बिना गौ के उनके लिए किस प्रकार से भोजन प्रस्तुत करते हैं। तब रामचंद्र जी ने लक्ष्मण जी से एक पत्र लिखवाया। फिर उस पत्र को अपने बाण में बाँध कर धनुष पर चढ़ाया और छोड़ दिया । वह बाण वायु वेग से उड़कर अमरावती में इन्द्र की सुधर्मा नामक सभा में जाकर उनके सामने गिर पड़ा। उस बाण को देखकर इन्द्र व्याकुल हो गये कि यह किसका बाण है? फिर उठाकर जो देखा तो उस पर राम का नाम अंकित था। फिर उसमें बँधे पत्र को खोलकर पढ़ा। पत्र खुलते ही वह बाण फिर वहाँ से उड़कर राम के तरकश में आ घुसा। उधर इन्द्र ने उस पत्र को सभा में बैठे हुए सब देवताओं को सुनाया । उसमें लिखा था — इन्द्र ! स्वर्ग में सुखी रहो। मैं सर्वदा तुम्हारा स्मरण करता हूँ; परंतु तुम्हें एक आज्ञा देता हूँ। आज 1000 वर्ष के भूखे हुए दुर्वासा मुनि अपने साठ हजार शिष्यों के साथ मेरे यहाँ आए हैं। वे ऐसा भोजन चाहते हैं, जो गऊ, जल अथवा अग्नि के द्वारा सिद्ध न किया हो। इसके साथ ही उन्होंने शिव पूजन के लिए ऐसे पुष्प माँगे हैं जिन्हें कि अब तक मनुष्यों ने न देखा हो। मैंने उनकी यह माँग स्वीकार कर ली है। वे सरयू में स्नान करने गये हैं। इसलिए तुम शीघ्र ही कल्पवृक्ष और पारिजात जो क्षीरसागर से निकले हैं, क्षणमात्र में मेरे पास भेज दो, इसके लिए रावण के संहारक मेरे बाणों की प्रतीक्षा मत करना। यह पत्र देवताओं को सुनाकर इन्द्रदेव तत्क्षण उठ पड़े और कल्पवृक्ष तथा पारिजात को साथ ले देवताओं सहित विमान में बैठकर अयोध्या में आ पहुँचे। लक्ष्मण जी ने इन्द्र का स्वागत किया। इन्द्र ने राम के पास पहुँच पारिजात और कल्पवृक्ष को राम को अर्पण किया। इतने ही में सरयू तट से दुर्वासा ने अपने एक शिष्य को राम के पास भेजा कि तुम जाकर देखो कि राम इस समय क्या कर रहे हैं? मैंने जो आज्ञा दी है, उसके अनुसार कुछ अन्न अब तक बना है कि नहीं? अब-तक वैसे ही चिन्तामग्न हैं या कुछ कर रहे हैं? यदि मेरी आज्ञानुसार पकवान प्रस्तुत कर रहे हैं तो अब तक कितनी सामग्री तैयार हुई है? यह सब तुम चुपके से देखकर मेरे पास आओ।तब ‘जो आज्ञा’ ऐसा कहकर वह शिष्य राम के भवन में आया। देखा तो कल्पवृक्ष और पारिजात से युक्त देवताओं की मण्डली में राम विराजमान हैं । यह देखकर उस शिष्य ने शीघ्र ही दुर्वासा के पास जाकर वह समाचार कह सुनाया। शिष्य की यह बात सुनकर दुर्वासा को आश्चर्य हुआ। स्नान कर शिष्यों को साथ ले दुर्वासा ऋषि श्री रामचंद्र जी के सुंदर भवन में आ पहुँचे। दुर्वासा जी को आया देख देवताओं सहित राम ने उठकर उन्हें तथा उनके सब शिष्यों को बड़े आदर के साथ प्रणाम किया और उत्तम आसन पर बिठाकर सीता तथा लक्ष्मण आदि के साथ उनकी पूजा की, फिर जिन पुष्पों को मनुष्यों ने अब-तक नहीं देखा था, शिव पूजन के हेतु पारिजात के उन पुष्पों को राम ने दुर्वासा के समक्ष प्रस्तुत किया। उन पुष्पों को देख मुनि दुर्वासा ने एक बार तो आश्चर्य किया किन्तु मौन भाव से उन्हें ग्रहण कर शिव जी तथा अन्य देवताओं की उन पुष्पों से पूजा की।फिर उसी क्षण श्री रामचंद्र जी ने लक्ष्मण तथा सीता आदि को सब भोजन परोसने की आज्ञा दी।तब दिव्य अलंकारों से विभूषित सीता ने कल्पवृक्ष और पारिजात की पूजा कर अनेक पात्रों को लाकर उनके नीचे रख दिया और वह प्रार्थना करती हुयी इस प्रकार बोली कि, हे क्षीरसागर से उत्पन्न होने तथा देवताओं के मनोरथों को पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष !

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शीतला माता की कहानी

यह कथा बहुत पुरानी है। एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखु कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है, ना मेरी पुजा है।माता शीतला गाँव कि गलियो में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) निचे फेका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी। शीतला माता गाँव में इधर उधर भाग भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा हे। कोई मेरी मदद करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही करी। वही अपने घर के बहार एक कुम्हारन (महिला) बेठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पुरे शरीर में तपन है। इसके पुरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है। तब उस कुम्हारन ने कहा है माँ तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली है माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (जुवार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली। तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हु और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन कि नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख वालो के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उसबूढी माई ने कहा रुक जा बेटी तु डर मत। मैं कोई भुत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पुजा करता है। इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई। माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब में गरीब इस माता को कहा बिठाऊ। तब माता बोली है बेटी तु किस सोच मे पड गई। तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहते हुए कहा- है माँ मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई हे में आपको कहा बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा है बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले। तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है माता मेरी इच्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर कि दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पुजा करने वाली नारि जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना। उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को कपडे धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये। तब माता बोली तथाअस्तु है बेटी जो तुने वरदान मांगे में सब तुझे देती हु । है बेटी तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पुजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील कि डुंगरी। शील कि डुंगरी में शीतला माता का मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी पर वहाँ बहुत विशाल मेला भरता है। इस कथा को पढ़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है।

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नवरात्रि की शुरूआत के पीछे की पौराणिक कथा क्या है ?

नवरात्रि का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है. नवरात्रि में 9 दिनो तक माँ शक्ति की 9 रूपों में पूजा की जाती है. जिसके बारे में आमतौर पर सभी को पता होता है. लेकिन काफी लोगों के मन में सवाल होता है कि नवरात्रि की पूजा क्यों शुरू की गई थी. इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है. अगर आपके मन में भी ऐसा ही सवाल है, तो इस पोस्ट में इसी सवाल का जवाब जानते है. नवरात्रि की शुरूआत के पीछे की पौराणिक कथा – नवरात्रि के पीछे की पहली पौराणिक कथा कि बात करें, तो ऐसा माना जाता है कि एक बार महिषासुर नाम का एक राक्षस होता था. जोकि ब्रह्मा की पूजा करता था. ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उसे वरदान मांगने को कहा. जिसके बाद उसने कहा कि मुझे कोई देव, दानव या फिर पृथ्वी पर रहने वाला मनुष्य नहीं मार सकता. ब्रह्माजी उसको यह वरदान दे देते हैं. वरदान मिलने के बाद वह बहुत ही निर्दयी हो जाता है तथा तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगता है. जिसके बाद ब्रह्मा , विष्णु तथा महेश ने उसके आतंक से छूटकारा दिलाने के लिए माँ शक्ति के रूप में दूर्गा को जन्म दिया. दूर्गा और महिषासुर के बीच घमासान युद्ध हुआ. यह युद्ध 9 दिनों तक चलता रहा. अंत में माँ दूर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया. ऐसा माना जाता है कि तभी से इन 9 दिनों को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर मनाया जाता है.नवरात्रि के पीछे कि दूसरी पौराणिक कथा कि बात करें, तो ऐसा माना जाता है कि रामायण में राम और रावण के बीच युद्ध हुआ था. उस युद्ध से पहले भगवान राम ने रावण के खिलाफ युद्ध जीतने के लिए रामेश्वरम में 9 दिनों तक माँ शक्ति की अराधना दी थी. जिससे प्रसन्न होकर माँ शक्ति ने राम को विजय श्री का आशिर्वाद दिया. जिसके बाद राम को रावण के खिलाफ विजय प्राप्त हुई. यहीं कारण है कि तब से नवरात्रि की पूजा का शुभारंभ हुआ तथा इन 9 दिनों को नवरात्रि के तौर पर मनाया जाना शुरू हुआ.उपरोक्त पौराणिक कथाओं के आधार पर हम देख सकते हैं कि नवरात्रि का त्यौहार का आधार बुराई पर जीत की विजय है. माँ शक्ति की पूजा करने से आपके जीवन में आने वाली बुराईयों के लड़ने की आपको ताकत मिलती है. नवरात्रि का त्यौहार वर्ष में 2 बार मनाया जाता है.

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कैसे हुई नवरात्रि मनाने की शुरुआत, पढ़ें ये पौराणिक कथाएं

नवरात्रि पर्व हिन्दू धर्म में बेहद महत्व रखता है. इस पर्व को लेकर लोग काफी उत्साहित (Excited) रहते हैं और मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना में नतमस्तक हो जाते हैं. नवरात्रि पर्व मनाये जाने की पौराणिक कथा पहली पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नाम का एक राक्षस था जो ब्रह्माजी का बहुत बड़ा भक्त था. उसने अपने तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न करके एक वरदान प्राप्त कर लिया था. जिसके तरह उसे कोई देव, दानव या पृथ्वी पर रहने वाला कोई मनुष्य मार नहीं सकता था. वरदान प्राप्त करते ही वह बहुत निर्दयी हो गया और तीनों लोकों में आतंक माचने लगा. उसके आतंक से परेशान होकर देवी देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ मिलकर मां शक्ति के रूप में दुर्गा देवी को जन्म दिया. जिसके बाद मां दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ और दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया. तब से इस नौ दिनों को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है. ये भी पौराणिक कथा है प्रचलित नवरात्रि मनाये जाने की एक और पौराणिक कथा है. इसके अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले, रावण से युद्ध में जीत की कामना के साथ शक्ति की देवी भगवती मां की आराधना की थी. उन्होंने रामेश्वरम में नौ दिनों तक माता की पूजा-अर्चना की. श्रीराम की भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने उनको लंका में विजय प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था. जिसके बाद भगवान राम ने लंका नरेश रावण को युद्ध में हराकर उसका वध कर दिया और लंका पर विजय प्राप्त की. तब से इन नौ दिनों को नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है. इसके साथ ही लंका पर विजय प्राप्त करने के दिन को दशहरे के रूप में मनाया जाता है

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यूं ही नहीं हुई थी शारदीय नवरात्र की शुरुआत, जान‍िए क्‍या है पौराणिक कथा

उपासना का पर्व है। गजब का है ये शक्तिपीठ, यहां दर्शन से एक, दो नहीं सात जन्‍मों के पापों से म‍िल जाती है मुक्ति शारदीय नवरात्र पर्व की पौराण‍िक कथा शास्त्रों में नवरात्र पर्व मनाए जानेशारदीय नवरात्र मां नवदुर्गा जी की उपासना का पर्व हर साल यह पावन पर्व श्राद्ध खत्म होते ही शुरू हो जाता है। लेकिन इस बार ऐसा अधिक मास के कारण संभव नहीं हो पाया।  क्‍या है शारदीय नवरात्र का महत्‍व और क्‍या है इसकी पौराण‍िक कथा? शारदीय नवरात्र का महत्व धर्म ग्रंथों एवं पुराणों के अनुसार, शारदीय नवरात्र भगवती दुर्गाजी की आराधना का श्रेष्ठ समय होता है। नवरात्र के पावन दिनों में हर दिन मां के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। जो अपने भक्तों को खुशी, शक्ति और ज्ञान प्रदान करती हैं। नवरात्र का हर दिन देवी के विशिष्ठ रूप को समर्पित होता है और हर देवी स्‍वरूप की कृपा से अलग-अलग तरह के मनोरथ पूर्ण होते हैं। नवरात्र का पर्व शक्ति की उपासना का पर्व है। शारदीय नवरात्र पर्व की पौराण‍िक कथा शास्त्रों में नवरात्र पर्व मनाए जाने की दो पौराणिक कथाएं हैं। पहली पौराणिक कथा के अनुसार महिषासुर नाम का एक राक्षस था जो ब्रह्माजी का बड़ा भक्त था। उसने अपने तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न करके एक वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान में उसे कोई देव, दानव या पृथ्वी पर रहने वाला कोई मनुष्य मार ना पाए। वरदान प्राप्त करते ही वह बहुत निर्दयी हो गया और तीनों लोकों में आतंक माचने लगा। उसके आतंक से परेशान होकर देवी देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ मिलकर मां शक्ति के रूप में दुर्गा को जन्म दिया। मां दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ और दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इस दिन को अच्छाई पर बुराई की जीत के रूप में मनाया जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम ने की थी नवदुर्गा की उपासना दूसरी पौराण‍िक कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंका पर आक्रमण करने से पहले और रावण के साथ होने वाले युद्ध में जीत के लिए शक्ति की देवी मां भगवतीजी की आराधना की थी। रामेश्वरम में उन्होंने नौ दिनों तक माता की पूजा की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने श्रीराम को लंका में विजय प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। दसवें दिन भगवान राम ने लंका नरेश रावण को युद्ध में हराकर उसका वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। इस दिन को विजयदशमी के रूप में जाना जाता है। नवरात्र में होती है मां के इन 9 रूपों की पूजा नवरात्र के 9 द‍िनों में देवी भगवती के 9 अलग-अलग स्‍वरूपों की पूजा-उपासना की जाती है। पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कुष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें और अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।नवरात्र के पहले दिन विधिनुसार घटस्थापना का विधान है।

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श्री मुचुकुन्द जी की कथा

 महाराज मुचुकुन्द राजा मान्धाता के पुत्र थे। ये पृथ्वी के एक छत्र सम्राट थे। बल और पराक्रम इतना कि देवराज इन्द्र भी इनकी सहायता के इच्छुक रहते थे। एक बार असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया। दुखी होकर देवताओं ने महाराज मुचुकुन्द से सहायता की प्रार्थना की। देवराज की प्रार्थना स्वीकार करके वे बहुत समय तक असुरों से युद्ध करते रहे। बहुत समय पश्चात देवताओं को शिव जी की कृपा से स्वामी कार्तिकेय के रूप में योग्य सेनापति मिल गये। तब देवराज इन्द्र ने महाराज से कहा –राजन् ! आपने हमारी बड़ी सेवा की। आप हजारों वर्षों से यहाँ हैं। अतः अब आपकी राजधानी का कहीं पता नहीं है। आपके परिवार वाले सब काल के गाल में चले गये। हम आप पर प्रसन्न हैं। मोक्ष को छोड़ आप कुछ भी वर माँग लें; क्योंकि मोक्ष देना हमारी शक्ति से बाहर है। महाराज को मानवीय बुद्धि ने दबा लिया। उन्होंने कहा – देवराज ! मैं यह वरदान माँगता हूँ कि मैं जी भर सो लूँ, कोई विघ्न न डाले।जो मेरी निद्रा भंग करे, वह तुरंत भस्म हो जाय। देवराज ने कहा –ऐसा ही होगा, आप पृथ्वी पर जाकर शयन कीजिए। जो आपको जगायेगा, वह तुरंत भस्म हो जायगा। महाराज मुचुकुन्द भारतवर्ष में आकर एक गुफा में सो गये। सोते सोते उन्हें कई युग बीत गये। द्वापर आ गया, भगवान ने यदुवंश में अवतार लिया। उसी समय कालयवन ने मथुरा को घेर लिया। उसे मरवाने की नियत से और महाराज मुचुकुन्द पर कृपा करने की इच्छा से भगवान श्री कृष्ण कालयवन के सामने से छिपकर भागे। भागते भागते भगवान उस गुफा में घुसकर छिप गये, जहाँ महाराज मुचुकुन्द सो रहे थे। भगवान ने अपना पीताम्बर धीरे से उन्हें ओढ़ा दिया और आप छिपकर तमाशा देखने लगे। कालयवन गुफा में आया और महाराज को ही भगवान कृष्ण समझकर दुपट्टा खींच कर जगाने लगा। महाराज जल्दी से उठे। सामने कालयवन खड़ा था, दृष्टि पड़ते ही वह जलकर भस्म हो गया । अब तो महाराज इधर उधर देखने लगे। भगवान के तेज से गुफा जगमगा रही थी। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को मंद मंद मुस्कराते हुए देखा। देखते ही वे समझ गये कि ये साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं, वे भगवान के चरणों में लोट पोट हो गये। भगवान ने उन्हें उठाकर छाती से लगाया, भाँति भाँति के वरों का प्रलोभन दिया; परंतु उन्होंने यही कहा -प्रभो ! मुझे देना है तो अपनी भक्ति दीजिए। भगवान ने कहा –अब अगले जन्म में तुम सब जीवों में समान दृष्टि बाले ब्राह्मण होओगे, तब तुम मेरी जी खोलकर उपासना करना। वरदान देकर भगवान अन्तर्धान हो गये।

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वनवास काल में महाराज युधिष्ठिर को श्री कृष्ण ने दी राम नाम की दीक्षा

अब एक भूत-समन्वित भविष्य की कथा सुनिए। जब युधिष्ठुर अपनी माता और भाइयों को साथ लिए वनवास कर रहे थे, तब उन्हें देखने के लिए श्री कृष्ण जी वन में गये। वहाँ पाण्डवों ने बड़े प्रेम से श्री कृष्ण जी की पूजा की और युधिष्ठर ने कहा — हे जगन्नाथ ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे कुछ पूछता हूँ। हे देवेश ! यह तो आपको ज्ञात ही है कि मैं राज्यभ्रष्ट हूँ। इससे आप मुझे ऐसा कोई व्रत बतलाइये जो लक्ष्मी की प्राप्तिकारक हो और पुत्र-पौत्र को बढ़ाने वाला हो। श्री कृष्ण जी बोले — हे राजन ! तुम इस बात को पूछते हो तो सुनो, मैं गुप्त से भी गुप्त व्रत को तुम्हें बतलाता हूँ। राम नाम से बढ़कर मोक्षदायक और लक्ष्मी-वर्धक कोई व्रत नहीं है।यह राम नाम तेजोरूप और अव्यक्त है। राम नाम को जपने वाला राम का ही रूप हो जाता है। इसे स्वयं राम ने ही हनुमान जी से कहा था। युधिष्ठर बोले — हे रुक्मिणीपते ! इस बात को श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी से कब कहा था? श्री कृष्ण जी बोले –रामावतार में जब रावण सीता को हर ले गया था, तब रामचंद्र जी ने हनुमान को बुलाकर कहा कि, हे महावीर ! तुम सीता को खोजने के लिए दक्षिण दिशा में भ्रमण करने जाओ और जैसा समाचार हो, शीघ्र दो। श्री हनुमान जी बोले — हे रघुनाथ! दक्षिण दिशा में तो विशाल सागर है और बहुत से राक्षस रहते हैं, वहाँ मेरा क्या बल लगेगा? श्री रामचंद्र जी बोले — हे हनुमान ! रावण आदि राक्षसों का निवारण करने वाला वह अत्यंत सरल मन्त्र मैं तुम्हें बतलाता हूँ, जिसकी सहायता से तुम सर्वत्र विजयी होओगे। हनुमान जी बोले — हे प्रभो ! अवश्य ही आप हमें उस मन्त्र को पूर्णतया बतलाइये। हनुमान के इस प्रकार प्रार्थना करने पर राम ने उन्हें एकांत में बुलाया।फिर उनके दाहिने कान में “श्री राम ” इस नाम का उपदेश दिया । हनुमान ने उस नाम को एक लाख बार जपा और तब वे दक्षिण दिशा को प्रस्थित हुए।उसी मन्त्र के प्रभाव से वे दुर्गम सागर को पार कर लंका में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने बड़ी खोज की।इतने पर भी सीता का पता न लगा। तब वे अशोक वाटिका में गये, जहाँ सीता एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई थीं ।उन्होंने शीघ्रता से समीप जाकर प्रणाम किया । फिर दण्ड के समान पृथ्वी पर पड़ गये।उस समय उन्होंने बालक का रूप धारण कर रखा था ।उन्हें भूमि पर पड़े देखकर सीता ने कहा — हे बालक! तुम कहाँ से आये हो? किसके बालक हो? हनुमान बोले — मेरी माता सीता और पिता श्री रामचंद्र जी हैं। मैं उन्हीं के समीप से आया हूँ। मेरा नाम हनुमान है। इस मुद्रिका को आप लीजिए। उसे देखकर सीता को यह ज्ञात हुआ कि यह अँगूठी श्री रामचंद्र जी की है तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। हनुमान ने कहा — माता! मुझे बड़ी भूख लगी है, इस वन में बड़े मधुर फल लगे हैं। यदि आप की आज्ञा हो, तो मैं इन सब का भक्षण कर जाऊँ। सीता बोली — हे हनुमान ! इस वन का अधिपति रावण है। तुम ऐसे शक्तिशाली तो नहीं हो। फिर कैसे इन फलों को भक्षण कर सकोगे? हनुमान बोले — मेरे हृदयान्तर में ‘श्रीराम’ का प्रबल शस्त्र है। उससे मैं सब राक्षसों को तृण के समान जानता हूँ। तब उनकी इस उक्ति को सुनकर सीता जी ने आज्ञा दे दी। हनुमान ने फल खाये, वृक्षों को नष्ट किया। समाचार सुनकर बहुत से राक्षस वहाँ आ पहुँचे। हनुमान ने उन्हें सबसे भीषण युद्ध किया। हनुमान ने श्री राम मन्त्र के प्रभाव से उनके बल का दलन कर लंका को जला दिया। सीता जी ने श्री रामचंद्र जी को देने के लिए एक आभूषण दिया। उसे लेकर हनुमान श्री रामचंद्र जी के पास लौट आये। उस अलंकार को लेकर और हनुमान की बातें सुनकर रामचंद्र जी बहुत प्रसन्न हुए। हे महाराज युधिष्ठर ! यह सब राम नाम की महिमा है। इसलिए हे राजेन्द्र ! तुम राम का नाम जपा करो। युधिष्ठुर बोले — इसके जप की क्या विधि है और इसके पुरश्चरण का क्या फल है? श्री कृष्ण जी बोले — हे राजेन्द्र ! स्नान करके तुलसी की माला लेकर पवित्र स्थान में जप करे, अथवा किसी पुस्तक पर लिखे अथवा हृदय में स्मरण करे। एक करोड़ अथवा एक लाख की संख्या में उसकी परिसमाप्ति करे। अनेक मन्त्र और विधियाँ हैं। हे युधिष्ठर! उनमें से एक उत्तम मन्त्र मैं तुमसे कहता हूँ । पहले ‘श्री’ शब्द, मध्य में ‘जय’ शब्द और अन्त में दो ‘जय’ शब्द को प्रयुक्त कर एक मन्त्र हुआ। यथा – श्री राम जय राम जय जय राम। यदि इस मन्त्र को इक्कीस बार जपा जावे तो करोड़ों ब्रह्महत्या का पाप नष्ट हो जाता है। बुद्धिमान को उचित है कि वह इसी मन्त्र से एक लाख जप करे। पश्चात सविधि उद्यापन करे। जप की अपेक्षा राम नाम लिखने में सौ गुना अधिक पुण्य है। इस प्रकार प्रत्येक लाख मन्त्र जप लेने पर उद्यापन का पृथक कार्य करे।

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नवरात्रि में 9 दिनों की पूजा विधि और मंत्र

हिंदू धर्म में नवरात्रि के दौरान साधना और उपासना करने के सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। ऐसी मान्यता है की सामान्य दिनों में किसी भी साधना में सिद्धि हासिल करने के लिए कम से कम 40 दिनों की आवश्यकता होती है। वहीं, नवरात्रि में नौ दिन ही अनुष्ठान में सफलता हासिल करने के लिए पर्याप्त होते हैं। बता दें कि साल भर में चार मास चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ इन चार मासों में नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। लेकिन, इनमें से चैत्र और शारदीय नवरात्रि प्रमुख होते हैं। इस बार 2 अप्रैल से चैत्र या बासंतिक नवरात्र शुरू हो रहे हैं। तो आइए जानते हैं नवरात्रि की पूजा विधि और इन नौ दिनों किन मंत्रों का जप करने से आपको लाभ होगा। शैलपुत्री शैलपुत्री मां दुर्गा का प्रथम स्वरुप हैं। मान्यता है कि शक्ति की प्रथम उत्पत्ति शैलपुत्री के रूप में ही हुई थी। नवरात्रि के पहले दिन इनकी ही पूजा करनी चाहिए। मां के सामने धूप, दीप जलाएं और देसी घी का दीपक जलाकर मां की आरती उतारें। इसके बाद शैलपुत्री माता की कथा, दुर्गा स्तुति या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। इस दिन मां को गाय के घी से बनी सफेद चीजों का भोग लगाएं। इसके बाद शाम के समय मां की आरती कर उनका ध्यान करें।मंत्र- ऊं शैलपुत्र्यै नम:। ब्रह्मचारिणी नवरात्रि के दूसरे दिन मां भगवती के द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा की जाती है। सुबह पूजा के समय अपने हाथों में एक फूल लेकर देवी का ध्यान करें।इसके बाद उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं, फिर फूल, कुमकुम, सिंदूर अर्पित करें। बता दें की देवी को सफेद और सुगंधित फूल प्रिय हैं। इसके अलावा आप कमल का फूल भी चढ़ा सकते हैं।मंत्र – ऊँ ब्रह्मचारिण्यै नम:दूसरा मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। चंद्रघंटानवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा के रूप की पूजा की जाती है। सबसे पहले देवी के गंगा जल से स्नान कराएं। इसके बाद धूप-दीप, रोली , फूल और फल अर्पित करें। इसके बाद मां का ध्यान करें और मन में ऊं चंद्रघण्टायै नम: का जप करते रहें।मंत्र- पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता.प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥ कूष्मांडा इन दिन रोज की तरह सबसे पहले कलश की पूजा कर माता कूष्मांडा को नमन करें। इसके बाद मां को जल और पुष्प अर्पित करें। बता दें कि इस दिन पूजा में बैठने के लिए हरे रंग के आसन का इस्तेमाल करें। इस दिन मां को कद्दू के हलवे का भोग लगाएं। मंत्र- ऊं कूष्माण्डायै नम:दूसरा मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: स्कंदमातानवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। इस दिन सबसे पहले स्कंदमाता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल से शुद्धिकरण करें। चौकी पर मिट्टी, तांबे या फिर चांदी के घड़े में जल भरकर उस पर कलश रखें और देवी का ध्यान करें। स्कंदमाता की उपासना करने से मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती है। माता स्कंदमाता को केला प्रिय है। इस दिन मां को केले का भोग जरुर लगाएं। मंत्र- या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।दूसरा मंत्र- ऊं स्कंदमात्र्यै नम: ।। कात्यायनी नवरात्र के छठे दिन देवी कात्यायनी की पूजा अर्चना करनी चाहिए। इस दिन पूजा करते समय लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद कात्यायनी देवी की प्रतिमा स्थापित करें और फिर गंगाजल से उसकी शुद्धी करें। इसके बाद मां के सामने घी का दीपक जलाएं और पुष्प भी चढ़ाएं। इसके असाला मां को पीले रंग के फूलों के साथ कच्ची हल्दी की गांठ भी चढ़ाएं। मंत्र – या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥दूसरा मंत्र – ऊं स्कन्दमात्र्यै नम: कालरात्रि सातवें दिन कालरात्रि की आराधना करना चाहिए। मां की प्रतिमा की स्थापना करने के बाद मां को कुमकुम, लाल पुष्प, रोली आदि चढ़ाएं। इसके बाद मां को नींबूओं की माला पहने और उनके सामने दीपक जलाकर उनका पूजन करें। मां के मंत्रों का जाप करें या सप्तशती का पाठ करें। मां कालरात्रि को लाल रंग के फूल अर्पित करें। माता कालरात्रि को गुड़ या उससे बनी चीजों का भोग लगाना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।ॐ कालरात्र्यै नम: महागौरीनवरात्र के आठवें दिन महागौरी की पूजा करना चाहिए। इस दिन सबसे पहले लकड़ी की चौकी या मंदिर में महागौरी की प्रतिमा की स्थापना करें। इसके बाद चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र की स्थापना करें। मां महागौरी की पूजा करते समय पीले ये सफेद रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं। महागौरी को हलवा और चने का भोग लगाना चाहिए। मंत्र- श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।दूसरा मंत्र – ऊं महागौयैं नम: सिद्धिदात्री मां जगदंबा का ये रूप पूर्ण स्वरूप है। पहले दिन जो पूजा अर्चना शैलपुत्री के रूप में की गई थी वह सिद्धिदात्री के रुप पर आकर पूर्ण हो जाती है। इस दिन सबसे पहले कलश की पूजा और पूजा स्थल पर सभी देवी-देवताओं का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद माता के मंत्रो का जाप कर उनकी पूजा करनी चाहिए। मां सिद्धिदात्री को मौसमी फल, पूड़ी, खीर, नारियल, चना, और हलवा का भोग लगाना चाहिए। मंत्र- या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।दूसरा मंत्र- ऊं सिद्धिदात्र्यै नम:। नोट : यह तमाम जानकारी जनरुचि को ध्यान में रखकर दी जा रहा है, ज्योतिष और धर्म के उपाय और सलाहों को आपनी आस्था और विश्वास पर आजमाएं। कंटेट का उद्देश्य मात्र आपको बेहतर सलाह देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।

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जब तुलसीदास को भगवान जगन्नाथ ने दिये राम रुप में दर्शन

तुलसीदास जी अपने इष्टदेव का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी गये। मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर प्रसन्न मन से अंदर प्रविष्ट हुए। जगन्नाथ जी का दर्शन करते ही निराश हो गये। विचार किया कि यह हस्तपादविहीन देव हमारा इष्ट नहीं हो सकता। बाहर निकल कर दूर एक वृक्ष के तले बैठ गये। सोचा कि इतनी दूर आना ब्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है? कदापि नहीं। रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था। अचानक एक आहट हुई। वे ध्यान से सुनने लगे।अरे बाबा ! तुलसीदास कौन है? एक बालक हाथों में थाली लिए पुकार रहा था। तभी आप उठते हुए बोले –‘हाँ भाई ! मैं ही हूँ तुलसीदास।’ बालक ने कहा, ‘अरे ! आप यहाँ हैं। मैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूँ। ‘बालक ने कहा -‘लीजिए, जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है।’ तुलसीदास बोले –‘कृपा करके इसे बापस ले जायँ। बालक ने कहा, आश्चर्य की बात है, ‘जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ’ और वह भी स्वयं महाप्रभु ने भेजा और आप अस्वीकार कर रहे हैं। कारण? तुलसीदास बोले, ‘अरे भाई ! मैं बिना अपने इष्ट को भोग लगाये कुछ ग्रहण नहीं करता। फिर यह जगन्नाथ का जूठा प्रसाद जिसे मैं अपने इष्ट को समर्पित न कर सकूँ, यह मेरे किस काम का? ‘ बालक ने मुस्कराते हुए कहा, बाबा ! आपके इष्ट ने ही तो भेजा है । तुलसीदास बोले -यह हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकता। बालक ने कहा कि अपने श्रीरामचरितमानस में तो आपने इसी रूप का वर्णन किया है — बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना ।।आनन रहित सकल रस भोगी।बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।**** अब तुलसीदास की भाव-भंगिमा देखने लायक थी। नेत्रों में अश्रु-बिन्दु, मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे। थाल रखकर बालक यह कहकर अदृश्य हो गया कि मैं ही राम हूँ। मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा है।विभीषण नित्य मेरे दर्शन को आता है। कल प्रातः तुम भी आकर दर्शन कर लेना। तुलसीदास जी ने बड़े प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया। प्रातः मंदिर में उन्हें जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के स्थान पर श्री राम, लक्ष्मण एवं जानकी के भव्य दर्शन हुए। भगवान ने भक्त की इच्छा पूरी की। जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने रात्रि व्यतीत की थी, वह स्थान ‘तुलसी चौरा’ नाम से विख्यात हुआ। वहाँ पर तुलसीदास जी की पीठ ‘बड़छता मठ’ के रूप में प्रतिष्ठित है।

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श्री कृष्ण ने किए थे 8 विवाह, जानिए उनकी कहानियां

पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण ने 8 स्त्रियों से विवाह किया था जो उनकी पटरानियां बानी थी। ये थी – रुक्मिणी, जाम्बवती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रविंदा, सत्या(नाग्नजिती), भद्रा और लक्ष्मणा। आइए जानते है श्रीकृष्ण द्वारा इन आठ के साथ किए गए विवाह की कहानियां – 1. रुक्मिणी-विदर्भ राज्य का भीष्म नामक एक वीर राजा था। उसकी पुत्री का नाम रुक्मिणी था। वह साक्षात लक्ष्मीजी का ही अंश थीं। वह अत्यधिक सुंदर और सभी गुणों वाली थी। नारद जी द्वारा श्रीकृष्ण के गुणों सा वर्णन सुनने पर रुक्मिणी श्रीकृष्ण से ही विवाह करना चाहती थी। रुक्मिणी के रूप और गुणों की चर्चा सुनकर भगवान कृष्ण ने भी रुक्मिणी के साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया था। रुक्मिणी का एक भाई था, जिसना नाम रुक्मि था। उसने रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से साथ तय कर दिया था। जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चली तो वे विवाह से एक दिन पहले बलपूर्वक रुक्मिणी का हरण कर द्वारका ले गए। द्वारका पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह किया गया। 2. जाम्बवती-सत्राजित नामक एक यादव था। उसने भगवान सूर्य की बहुत भक्ति की। जिससे खुश होकर भगवान ने उसे एक मणि प्रदान की थी। भगवान कृष्ण ने सत्राजित को वह मणि राजा उग्रसेन को भेंट करने को कहा, लेकिन सत्राजित ने उनकी बात नहीं मानी और मणि अपने पास ही रखी। एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को लेकर जंगल में शिकार करने गया। वहां एक शेर ने प्रसेन का वध करके वह मणि छीन ली और अपनी गुफा में जा छिपा। कुछ दिनों बाद ऋक्षराज जाम्बवन्त ने शेर को मारकर वह मणि अपने पास रख ली। सत्राजित ने मणि चुराने और अपने भाई का वध करने का दोष श्रीकृष्ण पर लगा। इस दोष के मुक्ति पाने के लिए श्रीकृष्ण उस मणि की खोज करने के लिए वन में गए। मणि की रोशनी से श्रीकृष्ण उस गुफा तक पहुंच गए, जहां जाम्बवन्त और उसकी पुत्री जाम्बवती रहती थी। श्रीकृष्ण और जाम्बवन्त के बीच घोर युद्ध हुआ। युद्ध में पराजित होने पर जाम्बवन्त को श्रीकृष्ण के स्वयं विष्णु अवतार होने की बात पता चली। श्रीकृष्ण का असली रूप जानने पर जाम्बवन्त ने उनसे क्षमा मांगी और अपने अपराध का प्रायश्चित करने के लिए अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। 3. सत्यभामा-मणि लेकर श्रीकृष्ण द्वारका पहुंचे। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित को दी और खुद पर लगाए दोष को गलत साबित किया। श्रीकृष्ण के निर्दोष साबित होने पर सत्राजित खुद को अपमानित महसूस करने लगा। वह श्रीकृष्ण के तेज को जानता था, इसलिए वह बहुत भयभीत हो गया। उसकी मूर्खता की वजह से कहीं श्रीकृष्ण की उससे कोई दुश्मनी न हो जाए, इस डर से सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। 4. सत्या (नग्नजिती)-कौशल राज्य के राजा नग्नजित की एक पुत्री थी। जिसका नाम नग्नजिती थी। वह बहुत सुंदर और सभी गुणों वाली थी। अपनी पुत्री के लिए योग्य वर पाने के लिए नग्नजित ने शर्त रखी। शर्त यह थी कि जो भी क्षत्रिय वीर सात बैलों पर जीत प्राप्त कर लेगा, उसी के साथ नग्नजिती का विवाह किया जाएगा। एक दिन भगवान कृष्ण को देख नग्नजिती उन पर मोहित हो गई और मन ही मन भगवान कृष्ण से ही विवाह करने का प्रण ले लिया। भगवान कृष्ण यह बात जान चुके थे। अपनी भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान कृष्ण ने सातों बैल को अपने वश में करके उन पर विजय प्राप्त की। भगवान का यह पराक्रम देखकर नग्नजित ने अपनी पुत्री का विवाह भगवान कृष्ण के साथ किया। 5. कालिन्दी-एक बार भगवान कृष्ण अपने प्रिय अर्जुन के साथ वन में घूम रहे थे। यात्रा की धकान दूर करने के लिए वे दोनों यमुना नदीं के किनार जाकर बैठ गए। वहां पर श्रीकृष्ण और अर्जुन को एक युवती तपस्या करती हुई दिखाई दी। उस युवती को देखकर अर्जुन ने उसका परिचय पूछा। अर्जुन द्वारा ऐसा पूछने पर उस युवती ने अपना नाम सूर्यपुत्री कालिन्दी बताया। वह यमुना नदीं में निवास करते हुए भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। यह बात जान कर भगवान कृष्ण ने कालिन्दी को अपने भगवान विष्णु के अवतार होने की बात बताई और उसे अपने साथ द्वारका ले गए। द्वारका पहुंचने पर भगवान कृष्ण और कालिन्दी का विवाह किया गया। 6. लक्ष्मणा-लक्ष्मणा ने देवर्षि नारद से भगवान विष्णु के अवतारों के बारे में कई बातों सुनी थी। उसका मन सदैव भगवान के स्मरण और भक्ति में लगा रहता था। लक्ष्मणा भगवान विष्णु को ही अपने पति रूप में प्राप्त करना चाहती थी। उसके पिता यह बात जानते थे। अपनी पुत्री की इच्छा पूरी करने के लिए उसके पिता ने स्वयंवर का एक ऐसा आयोजन किया, जिसमें लक्ष्य भेद भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के सिवा कोई दूसरा न कर सके। लक्ष्मणा के पिता ने अपनी पुत्री के विवाह उसी वीर से करने का निश्चय किया, जो की पानी में मछली की परछाई देखकर मछली पर निशाना लगा सके। शिशुपाल, कर्ण, दुर्योधन, अर्जुन कोई भी इस लक्ष्य का भेद न कर सका। तब भगवान कृष्ण ने केवल परछाई देखकर मछली पर निशाना लगाकर स्वयंवर में विजयी हुए और लक्ष्मणा के साथ विवाह किया। 7. मित्रविंदा-अवंतिका (उज्जैन) की राजकुमारी मित्रविंदा के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया था। उस स्वयंवर में मित्रविंदा जिसे भी अपने पति रूप में चुनती उसके साथ मित्रविंदा का विवाह कर दिया जाता। उस स्वयंवर में भगवान कृष्ण भी पहुंचे। मित्रविंदा भगवान कृष्ण के साथ ही विवाह करना चाहती था, लेकिन उसका भाई विंद दुर्योधन का मित्र था। इसलिए उसने अपनी बहन को बल से भगवान कृष्ण को चुनने से रोक लिया। जब भगवान कृष्ण को मित्रविंदा के मन की बात पता चली। तब भगवान ने सभी विरोधियों के सामने ही मित्रविंदा का हरण कर लिया और उसके साथ विवाह किया। 8. भद्रा-भगवान कृष्ण की श्रुतकीर्ति नामक एक भुआ कैकय देश में रहती थी। उनकी एक भद्रा नामक कन्या थी। भद्रा और उसके भाई भगवान कृष्ण के गुणों को जानते थे। इसलिए भद्रा के भाइयों ने उसका विवाह भगवान कृष्ण के साथ करने का निर्णय किया। अपनी भुआ और भाइयों के

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अपने पुत्रों को ही नदी में बहाया था गंगा ने, पर क्यों?, जानिए गंगा से जुडी ऐसी ही रोचक बातें

हिन्दू धर्म में गंगा को सबसे पूजनीय नदी माना गया है। गंगा के संबंध में अनेक पुराणों में कई कथाएं पढ़ने को मिलती है। महाभारत के सबसे प्रमुख पात्र भीष्म भी गंगा के ही पुत्र थे। आज हम आपको गंगा से जुड़ी कुछ ऐसी रोचक बातें बता रहे हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं- ब्रह्मा ने दिया था महाभिष को श्रापप्राचीन समय में इक्ष्वाकु वंश में राजा महाभिष थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके स्वर्ग लोक प्राप्त किया था। एक दिन बहुत से देवता और राजर्षि, जिनमें महाभिष भी थे, ब्रह्माजी की सेवा में आए। वहां गंगा भी उपस्थित थीं। तभी हवा के वेग से गंगा के वस्त्र शरीर पर से खिसक गए। वहां उपस्थित सभी लोगों ने अपनी आंखें नीची कर ली, मगर राजा महाभिष गंगा को देखते रहे। जब परमपिता ब्रह्मा ने ये देखा तो उन्होंने महाभिष को मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जन्म लेने का श्राप दिया और कहा कि गंगा के कारण ही तुम्हारा अप्रिय होगा और जब तुम उस पर क्रोध करोगे तब इस श्राप से मुक्त हो जाओगे। राजा शांतनु की पत्नी बनी गंगाब्रह्मा के श्राप के कारण राजा महाभिष ने पूरूवंश में राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु के रूप में जन्म लिया। एक बार राजा शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगा नदी के तट पर आए। यहां उन्होंने एक परम सुदंर स्त्री (वह स्त्री देवी गंगा ही थीं) को देखा। उसे देखते ही शांतनु उस पर मोहित हो गए। शांतनु ने उससे प्रणय निवेदन किया। उस स्त्री ने कहा कि मुझे आपकी रानी बनना स्वीकार है, लेकिन मैं तब तक ही आपके साथ रहूंगी, जब तक आप मुझे किसी बात के लिए रोकेंगे नहीं, न ही मुझसे कोई प्रश्न पूछेंगे। ऐसा होने पर मैं तुरंत आपको छोड़कर चली जाऊंगी। राजा शांतनु ने उस सुंदर स्त्री का बात मान ली और उससे विवाह कर लिया। इस तरह गंगा ने किया राजा शांतनु का अप्रियविवाह के बाद राजा शांतनु उस सुंदर स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। समय बीतने पर शांतनु के यहां सात पुत्रों ने जन्म लिया, लेकिन सभी पुत्रों को उस स्त्री ने गंगा नदी में डाल दिया। शांतनु यह देखकर भी कुछ नहीं कर पाएं क्योंकि उन्हें डर था कि यदि मैंने इससे इसका कारण पूछा तो यह मुझे छोड़कर चली जाएगी। आठवां पुत्र होने पर जब वह स्त्री उसे भी गंगा में डालने लगी तो शांतनु ने उसे रोका और पूछा कि वह यह क्यों कर रही है?उस स्त्री ने बताया कि मैं देवनदी गंगा हूं तथा जिन पुत्रों को मैंने नदी में डाला था वे सभी वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था। उन्हें मुक्त करने लिए ही मैंने उन्हें नदी में प्रवाहित किया। आपने शर्त न मानते हुए मुझे रोका। इसलिए मैं अब जा रही हूं। ऐसा कहकर गंगा शांतनु के आठवें पुत्र को लेकर अपने साथ चली गई। वसुओं ने क्यों लिया गंगा के गर्भ से जन्म?महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, एक बार पृथु आदि वसु अपनी पत्नियों के साथ मेरु पर्वत पर घूम कर रहे थे। वहां वसिष्ठ ऋषि का आश्रम भी था। वहां नंदिनी नाम की गाय भी थी। द्यो नामक वसु ने अन्य वसुओं के साथ मिलकर अपनी पत्नी के लिए उस गाय का हरण कर लिया। जब महर्षि वसिष्ठ को पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर सभी वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। वसुओं द्वारा क्षमा मांगने पर ऋषि ने कहा कि तुम सभी वसुओं को तो शीघ्र ही मनुष्य योनि से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन इस द्यौ नामक वसु को अपने कर्म भोगने के लिए बहुत दिनों तक पृथ्वीलोक में रहना पड़ेगा। इस श्राप की बात जब वसुओं ने गंगा को बताई तो गंगा ने कहा कि मैं तुम सभी को अपने गर्भ में धारण करूंगी और तत्काल मनुष्य योनि से मुक्त कर दूंगी। गंगा ने ऐसा ही किया। वसिष्ठ ऋषि के श्राप के कारण भीष्म को पृथ्वी पर रहकर दुख भोगने पड़े। भीष्म को दिलाई श्रेष्ठ शिक्षागंगा जब शांतनु के आठवे पुत्र को साथ लेकर चली गई तो वे बहुत उदास रहने लगे। इस तरह थोड़ा और समय बीता। शांतनु एक दिन गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे। वहां उन्होंने देखा कि गंगा में बहुत थोड़ा जल रह गया है और वह भी प्रवाहित नहीं हो रहा है। इस रहस्य का पता लगाने जब शांतनु आगे गए तो उन्होंने देखा कि एक सुंदर व दिव्य युवक अस्त्रों का अभ्यास कर रहा है और उसने अपने बाणों के प्रभाव से गंगा की धारा रोक दी है। यह दृश्य देखकर शांतनु को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां शांतनु की पत्नी गंगा प्रकट हुई और उन्होंने बताया कि यह युवक आपका आठवां पुत्र है। इसका नाम देवव्रत है। इसने वसिष्ठ ऋषि से वेदों का अध्ययन किया है तथा परशुरामजी से इसने समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने की कला सीखी है। यह श्रेष्ठ धनुर्धर है तथा इंद्र के समान इसका तेज है। देवव्रत ही आगे जाकर भीष्म कहलाए।

अपने पुत्रों को ही नदी में बहाया था गंगा ने, पर क्यों?, जानिए गंगा से जुडी ऐसी ही रोचक बातें Read More »

वनवास के बाद सीता जी का आगमन, अश्वमेघ यज्ञ का आरम्भ तथा अश्व के पूर्व जन्म की कथा

तदनन्तर लक्ष्मण ने जाकर पुनः जानकी के चरणों में प्रणाम किया। लक्ष्मण को आया देख पुनः अपने को बुलाये जाने की बात सुनकर सीता ने कहा —- ‘लक्ष्मण ! मुझे श्री रामचंद्र जी ने त्याग दिया है अतः अब मैं कैसे चल सकती हूँ? मैं यहीं रहकर श्री राम को स्मरण किया करूँगी।उनकी बात सुनकर लक्ष्मण ने कहा —- माता ! आप पतिव्रता हैं, श्री रघुनाथ जी बारंबार आपको बुला रहे हैं।पति परायणा स्त्री अपने पति के अपराध को मन में नहीं लाती; इसलिए आप रथ पर बैठकर मेरे साथ चलने की कृपा कीजिए। लक्ष्मण की ये बातें सुनकर सीता सभी तपस्विनी स्त्रियों तथा मुनियों को प्रणाम करके मन ही मन श्री राम का स्मरण करती हुई रथ पर बैठकर अयोध्या की ओर चलीं। नगरी में पहुँच कर वे सरयू तट पर गयीं। सीता वहाँ जाकर रथ से उतर गयीं और श्री रामचंद्र जी के समीप पहुँच कर उनके चरणों में लग गयीं। श्री रामचंद्र जी बोले —-‘साध्वि ! इस समय तुम्हारे साथ मैं यज्ञ की समाप्ति करूँगा।’ तत्पश्चात् सीता महर्षि वाल्मीकि तथा अन्य ऋषियों को प्रणाम करके माताओं के चरणों में प्रणाम करने के लिए उनके पास गयीं। जानकी को आया देख कौशल्या को बड़ा हर्ष हुआ। सीता ने सभी माताओं के चरणों में प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया। सीता को आया देख कर महर्षि कुम्भज ने सोने की सीता को हटा दिया और उसकी जगह उन्हें ही बिठाया। फिर उत्तम समय आने पर श्री रघुनाथ जी ने यज्ञ का कार्य आरंभ किया। उन्होंने महर्षि वसिष्ठ से पूछकर सभी महर्षियों तथा ब्राहणों की पूजा की और रत्न व सुवर्णों के भार दक्षिणा में देकर संतुष्ट किया। इसके बाद श्री रामचंद्र जी सीता के साथ सोने के घड़े में जल ले आने के लिए गये। उनके पीछे सभी भाई व उनके पुत्र पत्नियों सहित तथा अन्य राजा भी अपनी अपनी पत्नियों सहित चले। महर्षि वसिष्ठ ने सरयू में जाकर वेद मंत्र के द्वारा उसके जल को अभिमन्त्रित किया। वे बोले —हे जल ! तुम श्री रामचंद्र जी के यज्ञ के लिए निश्चित किए हुए इस अश्व को पवित्र करो। मुनि के अभिमन्त्रित किए हुए उस जल को राम आदि सभी राजा यज्ञ मण्डप में ले आये। उस जल से उस श्वेत अश्व को नहलाकर महर्षि कुम्भज ने राम के हाथ से उसे अभिमन्त्रित कराया। श्री रामचंद्र जी अश्व को लक्ष्य करके बोले — महावाह ! ब्राह्मणों से भरे इस यज्ञ-मण्डप में तुम मुझे पवित्र करो। ऐसा कहकर श्री राम ने सीता के साथ उस अश्व का स्पर्श किया। उस समय यह बात सभी ब्राह्मणों को बड़ी विचित्र लगी। वे कहने लगे —-‘अहो ! जिनके नाम का स्मरण करने से मनुष्य बड़े बड़े पापों से छूट जाता है, वे ही श्री रघुनाथ जी यह क्या कह रहे हैं? (क्या अश्व इन्हें पवित्र करेगा? ) श्री राम के हाथ का स्पर्श होते ही उस अश्व ने पशु शरीर का परित्याग करके तुरंत दिव्य रूप धारण कर लिया। दिव्य रूप धारी उस अश्व को देख कर सब लोगों को बड़ा विस्मय हुआ। श्री रामचंद्र जी ने सब जानते हुए भी उससे पूछा —-‘दिव्य शरीर धारण करने वाले पुरुष ! तुम कौन हो? अश्व योनि में क्यों पड़े थे तथा इस समय क्या करना चाहते हो? ये सब बातें बताओ। अश्वमेध यज्ञ के अश्व के पूर्व जन्म की कथा- राम की बात सुनकर दिव्य रूप धारी पुरुष ने कहा —–‘भगवन् ! आपसे कोई बात छिपी नहीं है। फिर भी यदि आप पूछ रहे हैं तो मैं आपसे सब कुछ ठीक ठीक बता रहा हूँ । पूर्व जन्म में मैं एक परम धर्मात्मा ब्राह्मण था, किन्तु मुझसे एक अपराध हो गया। एक दिन मैं सरयू के तट पर गया और वहाँ स्नान, दान करके वेदोक्त रीति से आपका ध्यान करने लगा। उस समय मेरे पास बहुत से लोग आये और उनको ठगने के लिए मैंने कई प्रकार का दम्भ प्रकट किया।इसी समय महातेजस्वी महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर विचरते हुए वहाँ आये और सामने खड़े हो कर मुझे देखने लगे।मैंने मौन धारण कर रखा था; न तो उठकर उन्हें अर्ध्य दिया और न कोई स्वागत सत्कार किया। महर्षि दुर्वासा का स्वभाव तो यों ही तीक्ष्ण है, मुझे दम्भ करते देख कर वे प्रचण्ड क्रोध के वशीभूत हो गये तथा शाप देते हुए बोले —–तापसाधम ! यदि तू सरयू के तट पर ऐसा घोर दम्भ कर रहा है तो पशु योनि को प्राप्त हो जा।’ मुनि के शाप को सुनकर मुझे बड़ा दुख हुआ और मैंने उनके चरण पकड़ लिए। तब मुनि ने मुझ पर महान अनुग्रह किया। वे बोले —–‘तापस ! तू श्री रामचंद्र जी के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बनेगा; फिर भगवान के हाथ का स्पर्श होने से तू दम्भहीन एवं दिव्य रूप धारण करके परमपद को प्राप्त हो जायगा।’ महर्षि का दिया हुआ यह शाप मेरे लिए अनुग्रह बन गया। अनेक जन्मों के बाद भी जिसकी प्राप्ति कठिन है वही आपकी अंगुलियों का स्पर्श आज मुझे प्राप्त हुआ है । महाराज ! अब आज्ञा दीजिए, मैं आपकी कृपा से महत् पद को प्राप्त हो रहा हूँ । यह कहकर उसने श्री राम की परिक्रमा की और विमान पर बैठ कर वह उनके सनातन धाम को चला गया।उसकी बातें सुनकर अन्य साधारण लोगों को भी श्री राम की महिमा का ज्ञान हुआ। तदनन्तर, मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी बोले —–‘रघुनन्दन ! आप देवताओं को कर्पूर भेंट कीजिए, जिससे वे प्रत्यक्ष प्रकट होकर हविष्य ग्रहण करेंगे ।’ यह सुनकर श्री रामचंद्र जी ने देवताओं को सुंदर कर्पूर अर्पण किया ।महर्षि वशिष्ठ जी ने प्रसन्न होकर देवताओं का आवाहन किया ।मुनि के आवाहन पर सभी देवता अपने अपने परिवार सहित वहाँ आ पहुँचे। यज्ञ की हवि का इन्द्र सहित सभी देवताओं ने आस्वादन किया। इसके बाद सभी देवता अपना अपना भाग लेकर अपने धाम को चले गये। स्त्रियाँ श्री राम के ऊपर लाजा(खील) की वर्षा करने लगीं। तव श्री राम ने सीता के साथ सरयू के पावन जल में स्नान किया। इस प्रकार भगवान श्री राम ने सीता के साथ तीन अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया और अनुपम कीर्ति प्राप्त की।

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