September 2022

कैसे आये भगवान राम के पग तलवे में ये चार चिन्ह :–कमल_ वज्र _अंकुश _ध्वजा

बाबा तुलसी दास जी ने रामचरित्र मानस में लिखा है।“ललित अंक कुलसादिक चारी ।।” अर्थात भगवान राम के पग तलवे में चार चिन्ह अंकित हैं। १- कमल २- वज्र ३-अंकुश ४-ध्वजा। आइए जानते है कैसे आए प्रभु श्री राम के पग तलवे में ये चिन्ह  पूर्व कल्प में गज के पैर को ग्राह ने अपने मुख से पकड लिया। हाथी को खाना चाहता है। दर्द से हाथी कराह उठा।चिल्लाने लगा। अपनी सूंढ में एक कमल पुष्प लेकर भगवान को पुकारने लगा। हे कमलापति कमलनयन भक्तवत्सल प्रभु हमारी रक्षा कीजिए। भक्त की वेदना भगवान से सही नही गई। भगवान नंगे पाँव दौड के गज के पास पहुँच गये।गज को ग्रह से बचाया। भगवान को समर्पित करने के लिए गज के पास सूँढ मे कमल पुष्प तथा भक्ती ये दो चीजें थी उसने बडे प्रेम से दोनों वस्तुएें प्रभु को अर्पित करदीं।भगवान विष्णु ने ” उस भक्ति रूपी कमल को अपने पाँव के तलवे में स्थापित कर लिया। और गज से बोले :– ये भक्ति रूपी कमल हमारे पाँव के तलवे में अनन्त काल तक रहेगा । २– वज्र– विष्णुजी तपस्या कर रहे थे वहीं एक वृक्ष उग आया जो गुडहल के नाम से जाना गया। उसने विष्णु जी को धूप से बचाने के लिए अपनी छाया विष्णु जी पे करदी। और दस हजार वर्षों तक लगातार विष्णु जी पे पुष्पों की बरसात करता रहा। लेकिन विष्णु जी ने अपने नेत्र नही खोले। यह देखकर वृक्ष को क्रोध आ गया। अपने पुष्पों को पत्थर रूप में परिवर्तित करके भगवान विष्णु जी पे बरसाने लगा। अचानक भगवान विष्णु जी के नेत्र खुल गये ।भगवान का सारा शरीर घायल हो गया था।विष्णु जी ने उसे दंड नही दिया बल्कि उसे बरदान दिया। उसे भक्ती का बरदान देके पत्थर रूपी पुष्पों को अस्त्र में परिवर्तित कर के वज्र बना दिया। और वृक्ष से बोले ये भक्तिरूपी पुष्प वज्र हमारे पाँव के तलवे में तुम्हारी निशानी के रूप में अनन्तकाल तक रहेगी । ३–अंकुश नारयणी नाम की एक नाग कन्या थी । जिसने भगवान विष्णु की ऩिराहार रह कर पच्चास हजार वर्षों तक घोर तपस्या की। नाग कन्या की तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु प्रगट हुए और कन्या से वर मांग ने को कहा। कन्या बोली :– प्रभु मैं -सदा आप के साथ रहना चाहती हूँ, आप के साथ रहकर आप पे आने वाली हर मुसीबत तथा दैहिक,दैविक,भौतिक तापों का हनन करना चाहती हूँ। बस यही वर चाहिए । कन्या की बात सुनके भगवान विष्णु ने उस कन्या को अंकुश रूप में परिवर्तित करके अपने पग के तलवे में स्थापित कर लिया।

कैसे आये भगवान राम के पग तलवे में ये चार चिन्ह :–कमल_ वज्र _अंकुश _ध्वजा Read More »

महाभारत युद्ध का 18 दिनों का घटनाक्रम : जानिए किस दिन क्या हुआ था

मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत युद्ध प्रारम्भ हुआ था जो लगातार 18 दिनों तक चला था। यहां जानिए महाभारत युद्ध के 18 दिनों में किस दिन क्या हुआ था… पहला दिनयुद्ध के पहले दिन पांडव पक्ष को भारी हानि हुई थी। विराट नरेश के पुत्र उत्तर और श्वेत को शल्य और भीष्म ने मार दिया था। भीष्म ने पांडवों के कई सैनिकों का वध कर दिया था। ये दिन कौरवों के लिए उत्साह बढ़ाने वाला और पांडव के लिए निराशाजनक था। दूसरा दिनदूसरे दिन पांडवों को अधिक नुकसान नहीं हुआ था। द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को कई बार हराया। भीष्म ने अर्जुन और श्रीकृष्ण को कई बार घायल किया। भीम ने हजारों कलिंग और निषाद मार गिराए। अर्जुन ने भीष्म को रोके रखा। तीसरा दिनतीसरे दिन भीम ने घटोत्कच के साथ मिलकर दुर्योधन की सेना को युद्ध से भगा दिया। इसके बाद भीष्म भीषण संहार मचा देते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को भीष्म वध करने को कहते हैं, लेकिन अर्जुन उत्साह से युद्ध नहीं कर पाते हैं, जिससे श्रीकृष्ण स्वयं ही भीष्म को मारने के लिए दौड़ पड़ते हैं। तब अर्जुन भरोसा दिलाते हैं कि वे पूरे उत्साह से युद्ध लड़ेंगे। चौथा दिनइस दिन कौरवों अर्जुन को रोक नहीं सके। भीम ने कौरव सेना में हाहाकार मचा दिया। दुर्योधन ने अपनी गजसेना भीम को मारने के लिए भेजी, लेकिन घटोत्कच के साथ मिलकर भीम ने उन सबको मार दिया। भीष्म से अर्जुन और भीम का भयंकर युद्ध हुआ। पांचवां दिनयुद्ध के पांचवें दिन भीष्म ने पांडव सेना में खलबली मचा दी। भीष्म को रोकने के लिए अर्जुन और भीम ने उनसे युद्ध किया। सात्यकि ने द्रोणाचार्य रोके रखा। भीष्म ने सात्यकि को युद्ध से भागने के लिए मजबूर कर दिया। छठा दिनइस दिन भी दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। दुर्योधन क्रोधित होता रहा, लेकिन भीष्म उसे आश्वासन देते रहे और पांचाल सेना का संहार कर दिया। सातवां दिनसातवें दिन अर्जुन कौरव सेना पर हावी हो जाता है। धृष्टद्युम्न दुर्योधन को युद्ध में हरा देता है, अर्जुन का पुत्र इरावान विन्द और अनुविन्द को हरा देता है। दिन के अंत में भीष्म पांडव सेना पर हावी हो जाते हैं। आठवां दिनआठवें दिन भी भीष्म पांडव सेना पर हावी रहते हैं। भीम धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों का वध कर देता है, राक्षस अम्बलुष अर्जुन पुत्र इरावान का वध कर देता है। घटोत्कच दुर्योधन को अपनी माया से प्रताड़ित करता है। तब भीष्म की आज्ञा से भगदत्त घटोत्कच, भीम, युधिष्ठिर व अन्य पांडव सैनिकों को पीछे ढकेल देता है। दिन के अंत तक भीम धृतराष्ट्र के नौ और पुत्रों का वध कर देता है। नवां दिननवें दिन दुर्योधन भीष्म से कर्ण को युद्ध में लाने की बात कहता है, तब भीष्म उसे आश्वासन देते हैं कि या तो श्रीकृष्ण को युद्ध में शस्त्र उठाने के लिए विवश कर देंगे या किसी एक पांडव का वध कर देंगे। युद्ध में भीष्म को रोकने के लिए श्रीकृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ती है और वे शस्त्र उठा लेते हैं। इस दिन भीष्म पांडवों की सेना का अधिकांश भाग समाप्त कर देते हैं। दसवां दिनइस दिन पांडव श्रीकृष्ण के कहने पर भीष्म से उनकी मुत्यु का उपाय पूछते हैं। भीष्म के बताए उपाय के अनुसार अर्जुन शिखंडी को आगे करके भीष्म पर बाण ही बाण चला देते हैं। अर्जुन के बाणों से भीष्म बाणों की शय्या पर लेट जाते हैं। ग्याहरवां दिनग्याहरवें दिन कर्ण युद्ध में आ जाता है। कर्ण के कहने पर द्रोणाचार्य को सेनापति बनाया जाता है। दुर्योधन और शकुनि द्रोण से कहते हैं कि युधिष्ठिर को बंदी बना लेंगे तो युद्ध खत्म हो जाएगा। दुर्योधन की योजना अर्जुन पूरी नहीं होने देता है। कर्ण भी पांडव सेना का भारी संहार करता है। बारहवां दिनयुधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए शकुनि और दुर्योधन अर्जुन को युधिष्ठिर से काफी दूर भेजने में कामयाब हो जाते हैं, लेकिन अर्जुन समय पर पहुंचकर युधिष्ठिर को बंदी बनने से बचा लेते हैं। तेरहवां दिनइस दिन दुर्योधन राजा भगदत्त को अर्जुन से युद्ध करने के लिए भेजता है। भगदत्त भीम को हरा देते हैं, अर्जुन के साथ युद्ध करते हैं। श्रीकृष्ण भगदत्त के वैष्णवास्त्र को अपने ऊपर लेकर अर्जुन की रक्षा करते हैं। अर्जुन भगदत्त की आंखो की पट्टी तोड़ देता है, जिससे उसे दिखना बंद हो जाता है। अर्जुन इस अवस्था में ही उनका वध कर देता है। इसी दिन द्रोण युधिष्ठिर के लिए चक्रव्यूह रचते हैं। जिसे केवल अभिमन्यु तोड़ना जानता था, लेकिन निकलना नहीं जानता था। युधिष्ठिर भीम आदि को अभिमन्यु के साथ भेजता है, लेकिन चक्रव्यूह के द्वार पर जयद्रथ सभी को रोक देता है। केवल अभिमन्यु ही प्रवेश कर पाता है। वह अकेला ही सभी कौरवों से युद्ध करता है और मारा जाता है। पुत्र अभिमन्यु का अन्याय पूर्ण तरीके से वध हुआ देखकर अर्जुन अगले दिन जयद्रथ वध करने की प्रतिज्ञा ले लेता है और ऐसा न कर पाने पर अग्नि समाधि लेने को कह देता है। चौदहवां दिनअर्जुन की अग्नि समाधि वाली बात सुनकर कौरव जयद्रथ को बचाने योजना बनाते हैं। द्रोण जयद्रथ को बचाने के लिए उसे सेना के पिछले भाग मे छिपा देते है, लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा किए गए सूर्यास्त के कारण जयद्रथ बाहर आ जाता है और अर्जुन और वध कर देता है। इसी दिन द्रोण द्रुपद और विराट को मार देते हैं। पंद्रहवां दिनइस दिन पाण्डव छल से द्रोणाचार्य को अश्वत्थामा की मृत्यु का विश्वास दिला देते हैं, जिससे निराश हो द्रोण समाधि ले लेते हैं। इस दशा में धृष्टद्युम्न द्रोण का सिर काटकर वध कर देता है। सोलहवां दिनइस दिन कर्ण को कौरव सेनापति बनाया जाता है। इस दिन वह पांडव सेना का भयंकर संहार करता है। कर्ण नकुल-सहदेव को हरा देता है, लेकिन कुंती को दिए वचन के कारण उन्हें मारता नहीं है। भीम दुःशासन का वध कर देता है और उसकी छाती का रक्त पीता है। सत्रहवां दिनसत्रहवें दिन कर्ण भीम और युधिष्ठिर को हरा देता है, लेकिन कुंती को दिए वचन के कारण उन्हें मारता नहीं है। युद्ध में कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धंस जाता है, तब कर्ण पहिया निकालने के लिए नीचे उतरता है और उसी समय श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन कर्ण का वध कर देता है। फिर

महाभारत युद्ध का 18 दिनों का घटनाक्रम : जानिए किस दिन क्या हुआ था Read More »

अदभुत रहस्य :- आखिर क्यों निगला सीताजी ने लक्ष्मण को

एक समय की बात है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम रावण का वध करके भगवती सीता के साथ अवधपुरी वापस आ गए । अयोध्या को एक दुल्हन की तरह से सजाया गया और उत्सव मनाया गया ।उत्सव मनाया जा रहा था तभी सीता जी को यह ख्याल आया की वनवास जाने से पूर्व मां सरयु से वादा किया था कि अगर पुन: अपने पति और देवर के साथ सकुशल अवधपुरी वापस आऊंगी तो आपकी विधिवत रूप से पूजन अर्चन करूंगी ।यह सोचकर सीता जी ने लक्ष्मण को साथ लेकर रात्रि में सरयू नदी के तट पर गई। सरयु की पूजा करने के लिए लक्ष्मण से जल लाने के लिए कहा ,! लक्ष्मण जी जल लाने के लिए घडा लेकर सरयू नदी में उतर गए। जल भर ही रहे थे कि तभी-सरयू के जल से एक अघासुर नाम का राक्षस निकला जो लक्ष्मण जी को निगलना चाहता था ।लेकिन तभी भगवती सीता ने यह दृश्य देखा :—-और लक्ष्मण को बचाने के लिए माता सीता ने अघासुर के निगलने से पहले स्वयं लक्ष्मण को निगल गई । लक्ष्मण को निगलने के बाद सीता जी का सारा शरीर जल बनकर गल गया (यह दृश्य हनुमानजी देख रहे थे जो अद्रश्य रुप से सीता जी के साथ सरयू तट पर आए थे ) उस तन रूपी जल को श्री हनुमान जी घड़े में भरकर भगवान श्री राम के सम्मुख लाए। और सारी घटना कैसे घटी यह बात हनुमान जी ने श्री राम जी से बताई । मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी हँसकर बोले:– -हे मारूति सुत सारे राक्षसों का बध तो मैने कर दिया लेकिन ये राक्षस मेरे हाथों से मरने वाला नही है । इसे भगवान भोलेनाथ का वरदान प्राप्त है कि जब त्रेतायुग में सीता और लक्ष्मण का तन एक तत्व में बदल जायेगा तब उसी तत्व के द्वारा इस राक्षस का बध होगा । और वह तत्व रूद्रावतारी हनुमान के द्वारा अस्त्र रूप में प्रयुक्त किया जाये । सो हनुमान इस जल को तत्काल सरयु जल में अपने हाथों से प्रवाहित कर दो। इस जल के सरयु के जल में मिलने से अघासुर का बध हो जायेगा और सीता तथा लक्ष्मण पुन:अपने शरीर को प्राप्त कर सकेंगे । हनुमान जी ने घडे के जल को आदि गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके सरयु जल में डाल दिया ।घडे का जल ज्यों ही सरयु जल में मिला त्यों ही सरयु के जल में भयंकर ज्वाला जलने लगी उसी ज्वाला में अघासुर जलकर भस्म हो गया । और सरयु माता ने पुन: सीता तथा लक्ष्मण को नव-जीवन प्रदान किया ।_____________________अवधपुरी मम् पुरी सुहावन ।उत्तर दिश बह सरयु पावन ।।_____________________|| राम ||

अदभुत रहस्य :- आखिर क्यों निगला सीताजी ने लक्ष्मण को Read More »

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा

अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और अनंत फल देने वाला माना गया है। भगवान विष्णु को समर्पित अनंत चतुर्दशी का पर्व भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इसे लोकभाषा में अनंत चौदस के नाम से भी जाता है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णुजी के अनंत रूप की पूजा की जाती है। अनंत अर्थात जिसके न आदि का पता है और न ही अंत का अर्थात वे स्वयं श्री नारायण ही हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखकर एवं उनकी पूजा करके अनंतसूत्र बांधने से समस्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है। ऐसे कहलाए अनंत भगवान अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और अनंत फल देने वाला माना गया है। शास्त्रों की मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने सृष्टि की शुरुआत में चौदह लोकों तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुवः, स्वः, जन, तप, सत्य, मह की रचना की थी एवं इन लोकों की रक्षा और पालन के लिए भगवान विष्णु स्वयं भी चौदह रूपों में प्रकट हो गए थे, जिससे वे अनंत प्रतीत होने लगे इसलिए आज के दिन भगवान विष्णु के अनंत रूपों की पूजा की जाती है। अनंत चतुर्दशी की पूजा में सूत्र का बड़ा महत्व है। इस व्रत में स्नानादि करने के बाद अक्षत, दूर्वा, शुद्ध रेशम या कपास के सूत से बने और हल्दी से रंगे हुए चौदह गांठ के अनंत सूत्र को भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा के सामने रखकर पूजा की जाती है। हर गाँठ में श्री नारायण के विभिन्न नामों से पूजा की जाती है। पहले में अनंत,उसके बाद ऋषिकेश,पद्मनाभ, माधव, वैकुण्ठ, श्रीधर, त्रिविक्रम, मधुसूदन, वामन, केशव, नारायण, दामोदरऔर गोविन्द की पूजा होती है फिर अनंत देव का ध्यान करके इस शुद्ध अनंत, जिसकी पूजा की गई होती है को पुरुष दाहिने और स्त्री बांये हाथ में बांधते हैं। मान्यता है कि इस अनंत सूत्र को बांधने से व्यक्ति प्रत्येक कष्ट से दूर रहता है। जो मनुष्य विधिपूर्वक इस दिन श्री हरि की पूजा करता है उसे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है। ऐसा माना गया है कि अगर इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ कोई व्यक्ति विष्णु सहस्त्रनाम स्रोत का पाठ करता है तो उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। ये व्रत महिलाएं सुख-समृद्धि, धन-धान्य और संतान प्राप्ति के लिए करती हैं। अनंत सूत्र बांधने का मंत्र अनंत संसार महासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्यनंतसूत्राय नमो नमस्ते।। पांडवों ने भी किया था यह व्रत पुराणों में अनंत चतुर्दशी की कथा के युधिष्ठिर से सम्बंधित होने का उल्लेख मिलता है। पांडवों के राज्यहीन हो जाने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत करने का सुझाव दिया। इससे पांडवों को हर हाल में राज्य वापस मिलेगा, इसका विश्वास भी दिलाया। इस पर युधिष्ठिर ने अनंत भगवान के बारे में जिज्ञासा प्रकट की तो कृष्ण जी ने कहा कि वह भगवान विष्णु का ही एक रूप हैं। चतुर्मास में भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर अनंत शयन में रहते हैं। इनके आदि और अंत का पता नहीं है इसीलिए ये अनंत कहलाते हैं। इस व्रत को विधि विधान से करने से जीवन में आ रहे समस्त संकट समाप्त होंगे। जय श्री हरि

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा Read More »

सम्पूर्ण जीवन अधर्म करने के बाद भी दुर्योधन को क्यों मिला स्वर्ग में स्थान

 महाभारत का युद्ध खत्म हुआ। कौरव तो सभी युद्ध में मारे जा चुके थे। पांडव भी कुछ समय तक राज्य करके हिमालय पर चले गए। वहां पर एक, एक करके सभी भाई गिर गए। अकेले युधिष्ठिर अपने एक मात्र साथी कुत्ते के साथ बचे रहे और वे स्वर्ग गए। कहते हैं युधिष्ठिर जीवित ही स्वर्ग में गए थे। वहां उन्होंने स्वर्ग और नरक दोनों को देखा।स्वर्ग में प्रवेश करते ही दुर्योधन दिखाई दिया। अपने भाइयों से भी उनका सामना हुआ। रास्ते में अन्य भाइयों को गिरते समय प्रश्न करने वाले भीम के मन में यहां भी जिज्ञासा उठी पूछा भैय्या दुष्ट दुर्योधन तो आजीवन अनीति का ही पक्ष लेता रहा। उसने अपने पूरे जीवन में कोई धर्म का काम नहीं किया जिसके पुण्य से उसे स्वर्ग मिला हो। क्या ईश्वर के न्याय में भी गलती है। ईश्वरीय विधान के अनुसार हर पुण्य का परिणाम चाहे वह किंचित ही क्यों न हो, स्वर्ग मिलता है। सभी बुराइयों के होते हुए भी दुर्योधन में एक सद्गुण था जिसके प्रसाद स्वरूप उसे स्वर्ग में स्थान प्राप्त हुआ है। वह क्या- भीम ने पूछा। भीम की जिज्ञासा शांत करते हुए धर्मराज युद्धिष्ठिर ने बताया कि अपने पूरे जीवन में दुर्योधन का ध्येय एक दम स्पष्ट था। उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने हर संभव कार्य किया। दुर्योधन को बचपन से ही सही संस्कार प्राप्त नहीं हुए इसलिए वह सच का साथ नहीं दे पाया। लेकिन मार्ग में चाहे कितनी ही बाधएं क्यों ना आई हों, दुर्योधन का अपने उद्देश्य पर कायम रहना, दृढ़संकल्पित रहना ही उसकी अच्छाई साबित हुई।युद्धिष्ठिर ने बताया कि अपने उद्देश्य के लिए एकनिष्ठ रहना मनुष्य का एक बड़ा सद्गुण है। इसी सद्गुण के कारण कुछ समय के लिए उसकी आत्मा को स्वर्ग के सुख भोगने का अवसर प्राप्त हुआ है। युद्धिष्ठिर की बात सुनकर भीम की जिज्ञासा शांत हुई और कुछ समय दुर्योधन और पांडवों ने फिर एक साथ बिताया।

सम्पूर्ण जीवन अधर्म करने के बाद भी दुर्योधन को क्यों मिला स्वर्ग में स्थान Read More »

सतयुग में पृथ्वी पर श्री हनुमान जन्म का अदभुत रहस्य

श्री व्यास जी ने राजा परीक्षित से कहा:–परीक्षित होनी तो होके रहती है, इसे कोई बदल नही सकता। आज मैं तुम्हे उस रहस्य को बताता हूँ, जो दुर्लभ है। एक समय सृष्टि से जल तत्व अदृश्य हो गया ।सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गयीऔर जीवन का अंत होने लगा तब व्रम्हा जी विष्णु जी ऋषि गण तथा देवता मिलकर श्री शिव जी के शरण में गए और शिव जी से प्रार्थना की और बोले नाथों के नाथ आदिनाथ अब इस समस्या से आप ही निपटें । श्रृष्टि में पुन: जल तत्व कैसे आयेगा । देवों की विनती सुन कर भोलेनाथ ने ग्यारहों रुद्रों को बुलाकर पूछा आप में से कोई ऐसा है जो सृष्टि को पुनः जल तत्व प्रदान कर सके । दस रूदों ने इनकार कर दिया । ग्यारहवाँ रुद्र जिसका नाम हर था उसने कहा मेरे करतल में जल तत्व का पूर्ण निवास है । मैं श्रृष्टि को पुन: जल तत्व प्रदान करूँगा लेकिन इसके लिए मूझे अपना शरीर गलाना पडेगा और शरीर गलने के बाद इस श्रृष्टि से मेरा नामो निशान मिट जायेगा । तब भगवान शिव ने हर रूपी रूद्र को वरदान दिया और कहा:–इस रूद्र रूपी शरीर के गलने के बाद तुम्हे नया शरीर और नया नाम प्राप्त होगा और मैं सम्पूर्ण रूप से तुम्हारे उस नये तन में निवास करूंगा जो श्रृष्टि के कल्याण हेतू होगा। हर नामक रूद्र ने अपने शरीर को गलाकर श्रृष्टि को जल तत्व प्रदान किया ।और उसी जल से एक महाबली वानर की उत्पत्ति हुई। जिसे हम हनुमान जी के नाम से जानते हैं । यह घटना सतयुग के चौथे चरण में घटी । शिवजी ने हनुमान जी को राम नाम का रसायन प्रदान किया।हनुमान जी ने राम नाम का जप प्रारम्भ किया । त्रेतायुग में अन्जना और केशरी के यहाँ पुत्र रूप में अवतरित हुए । इस लिए बाबा तुलसी दास जी ने हनुमान चालीसा में कहा है:— शंकर स्वयं केशरी नन्दनतेज प्रताप महा जग बन्दन *****दोहा— तीन लोक चौदह भुवन कर धारे बलवान ।राम काज हित प्रगट भे बीर बली हनुमान। चौपाई:– अजय शरण तुम्हरे हनुमंता ।नहि देखा तुम सम कोउ संता ।।कृपा करहु मो पर बलधारी ।भवं भवानी हर तिरपुरारी ।। दोहा—राम नाम की है सपथ ये श्रृष्टी के नाथ ।परम् ज्ञान मोहि दीजिए साक्षी श्री रघुनाथजय सियारामजय हनुमान

सतयुग में पृथ्वी पर श्री हनुमान जन्म का अदभुत रहस्य Read More »

वसुदेव, देवकी और रोहिणी के पूर्वजन्म की कथा

कश्यप मुनि और उनकी दो पत्नियों (अदिति और दिति) ने ही जल-जन्तुओं के स्वामी वरूणदेव के शापवश पृथ्वी पर वसुदेव, देवकी और रोहिणी के रूप में अवतार ग्रहण किया था।एक बार महर्षि कश्यप यज्ञकार्य के लिए वरुणदेव की गौ ले आये। यज्ञ-कार्य की समाप्ति के बाद वरुणदेव के बहुत याचना करने पर भी उन्होंने वह गौ वापिस नहीं दी। तब उदास मन से वरुणदेव ब्रह्माजी के पास गये और उनको अपना दु:ख सुनाते हुए कहा–हे महाभाग ! वह अभिमानी कश्यप मेरी गाय नहीं लौटा रहा है। अत: मैंने उसे शाप दे दिया कि मनुष्य जन्म लेकर तुम गोपालक हो जाओ और तुम्हारी दोनों पत्नियां भी मानव योनि में उत्पन्न होकर अत्यधिक दु:खी रहें। मेरी गाय के बछड़े माता से अलग होकर बहुत दु:खी हैं और रो रहे हैं, अतएव पृथ्वीलोक में जन्म लेने पर यह अदिति भी मृतवत्सा (जन्म लेते ही बच्चों का मृत्यु को प्राप्त हो जाना) होगी। इसे कारागार में रहना पड़ेगा और उसे बहुत कष्ट भोगना होगा। वरुणदेव की बात सुनकर प्रजापति ब्रह्मा ने कश्यप मुनि को बुलाया और पूछा–’आपने लोकपाल वरुण की गाय का हरण क्यों किया; और फिर आपने गाय को लौटाया भी नहीं। आप ऐसा अन्याय क्यों कर रहे हैं? न्याय को जानते हुए भी आपने दूसरे के धन का हरण किया है।’ लोभ की ऐसी महिमा है कि वह महान-से-महान लोगों को भी नहीं छोड़ता है। संसार में लोभ से बढ़कर अपवित्र अन्य कोई चीज नहीं है; यह सबसे बलवान शत्रु है। महर्षि कश्यप भी इस नीच लोभवश दुराचार में लिप्त हो गये। अत: मर्यादा की रक्षा के लिए ब्रह्माजी ने अपने प्रिय पौत्र कश्यप मुनि को शाप दे दिया कि तुम अपने अंश से पृथ्वी पर यदुवंश में जन्म लेकर वहां अपनी दोनों पत्नियों के साथ गोपालन का कार्य करोगे। इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वी का बोझ उतारने के लिए वरुणदेव तथा ब्रह्माजी ने कश्यप मुनि को शाप दे दिया था। कश्यप मुनि ने अगले जन्म में वसुदेवजी और उनकी दोनों पत्नियों ने देवकी और रोहिणी के रूप में जन्म लिया।

वसुदेव, देवकी और रोहिणी के पूर्वजन्म की कथा Read More »

भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के घर क्यों लिया कृष्णावतार?

स्वायम्भुवमन्वन्तर में जब माता देवकी का पहला जन्म हुआ था, उस समय उनका नाम ‘पृश्नि’ तथा वसुदेव ‘सुतपा’ नामक प्रजापति थे। दोनों ने संतान प्राप्ति की अभिलाषा से सूखे पत्ते खाकर और कभी हवा पीकर देवताओं का बारह हजार वर्षों तक तप किया।इन्द्रियों का दमन करके दोनों ने वर्षा, वायु, धूप, शीत आदि काल के विभिन्न गुणों को सहन किया और प्राणायाम के द्वारा अपने मन के मल धो डाले। उनकी परम तपस्या, श्रद्धा और प्रेममयी भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीविष्णु उनकी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए उनके सामने प्रकट हुए और उन दोनों से कहा:——-** कि ‘तुम्हारी जो इच्छा हो माँग लो।’ तब उन दोनों ने भगवान श्रीहरि जैसा पुत्र माँगा। भगवान विष्णु उन्हें तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गये। वर देने के बाद भगवान ने शील, स्वभाव, उदारता आदि गुणों में अपने जैसा अन्य किसी को नहीं देखा। ऐसी स्थिति में भगवान ने विचार किया कि मैंने उनको वर तो दे दिया कि मेरे-सदृश्य पुत्र होगा, परन्तु इसको मैं पूरा नहीं कर सकता; क्योंकि संसार में वैसा अन्य कोई है ही नहीं। किसी को कोई वस्तु देने की प्रतिज्ञा करके पूरी ना कर सके तो उसके समान तिगुनी वस्तु देनी चाहिए। ऐसा विचारकर भगवान ने स्वयं उन दोनों के पुत्र के रूप में तीन बार अवतार लेने का निर्णय किया। इसलिए भगवान जब प्रथम बार उन दोनों के पुत्र हुए, उस समय वे ‘पृश्निगर्भ’ के नाम से जाने गये। दूसरे जन्म में माता पृश्नि ‘अदिति’ हुईं और सुतपा ‘कश्यप’ हुए। उस समय भगवान ‘वामन’ के रूप में उनके पुत्र हुए।फिर द्वापर में उन दोनों का तीसरा जन्म हुआ। इस जन्म में वही अदिति ‘देवकी’ हुईं और कश्यप ‘वसुदेवजी’ हुए और अपने वचन को सच करने के लिए भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में श्रीकृष्णावतार लिया।

भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के घर क्यों लिया कृष्णावतार? Read More »

पुराणों में वर्णित शनि देव से जुड़े अदभुत रहस्य

काशी-विश्वनाथ की स्थापना करी थी शनि देव ने :-स्कन्द पुराण में काशी खण्ड में वृतांत आता है, कि छाया सुत श्री शनिदेव ने अपने पिता भगवान सूर्य देव से प्रश्न किया कि हे पिता! मै ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसे आज तक किसी ने प्राप्त नही किया, हे पिता ! आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो, मुझे आपसे अधिक सात गुना शक्ति प्राप्त हो, मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये, चाहे वह देव, असुर, दानव, या सिद्ध साधक ही क्यों न हो। आपके लोक से मेरा लोक सात गुना ऊंचा रहे। दूसरा वरदान मैं यह प्राप्त करना चाहता हूँ, कि मुझे मेरे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हों, तथा मै भक्ति ज्ञान और विज्ञान से पूर्ण हो सकुँ शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न तथा गदगद हुए, और कह, बेटा ! मै भी यही चाहता हूँ, के तू मेरे से सात गुना अधिक शक्ति वाला हो। मै भी तेरे प्रभाव को सहन नही कर सकूं, इसके लिये तुझे तप करना होगा, तप करने के लिये तू काशी चला जा, वहां जाकर भगवान शंकर का घनघोर तप कर, और शिवलिंग की स्थापना कर, तथा भगवान शंकर से मनवांछित फ़लों की प्राप्ति कर ले। शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया, और तप करने के बाद भगवान शंकर के वर्तमान में भी स्थित शिवलिंग की स्थापना की, जो आज भी काशी-विश्वनाथ के नाम से जाना जाता है, और कर्म के कारक शनि ने अपने मनोवांछित फ़लों की प्राप्ति भगवान शंकर से की, और ग्रहों में सर्वोपरि पद प्राप्त किया। मोक्ष देने वाला एक मात्र गृह है शनिशनि ग्रह के प्रति अनेक आखयान पुराणों में प्राप्त होते हैं। शनि को सूर्य पुत्र माना जाता है। लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी। शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है। इसलिये वह शत्रु नही मित्र है। मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है। सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ न्याय करता है। जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही को प्रताडित करता है। वैदूर्य कांति रमल:, प्रजानां वाणातसी कुसुम वर्ण विभश्च शरत:।अन्यापि वर्ण भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद:॥ भावार्थ:-शनि ग्रह वैदूर्यरत्न अथवा बाणफ़ूल या अलसी के फ़ूल जैसे निर्मल रंग से जब प्रकाशित होता है, तो उस समय प्रजा के लिये शुभ फ़ल देता है यह अन्य वर्णों को प्रकाश देता है, तो उच्च वर्णों को समाप्त करता है, ऐसा ऋषि महात्मा कहते हैं। इस कारण शनि है पितृ शत्रुधर्मग्रंथो के अनुसार सूर्य की द्वितीय पत्नी के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ, जब शनि देव छाया के गर्भ में थे तब छाया भगवन शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न थी की उसने अपने खाने पिने तक सुध नहीं थी जिसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ा और उसका वर्ण श्याम हो गया ! शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया की शनि मेरा पुत्र नहीं हैं ! तभी से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखता हैं ! शनि देव ने अपनी साधना तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न कर अपने पिता सूर्य की भाँति शक्ति प्राप्त की और शिवजी ने शनि देव को वरदान मांगने को कहा, तब शनि देव ने प्रार्थना की कि युगों युगों में मेरी माता छाया की पराजय होती रही हैं, मेरे पिता पिता सूर्य द्वारा अनेक बार अपमानित व् प्रताड़ित किया गया हैं ! अतः माता की इक्छा हैं कि मेरा पुत्र अपने पिता से मेरे अपमान का बदला ले और उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली बने ! तब भगवान शंकर ने वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ स्थान होगा ! मानव तो क्या देवता भी तुम्हरे नाम से भयभीत रहेंगे ! शनि के सम्बन्ध मे हमे पुराणों में अनेक आख्यान मिलते हैं। माता के छल के कारण पिता ने उसे शाप दिया। पिता अर्थात सूर्य ने कहा,”आप क्रूरतापूर्ण द्रिष्टि देखने वाले मंदगामी ग्रह हो जाये”. यह भी आख्यान मिलता है कि शनि के प्रकोप से ही अपने राज्य को घोर दुर्भिक्ष से बचाने के लिये राजा दशरथ उनसे मुकाबला करने पहुंचे तो उनका पुरुषार्थ देख कर शनि ने उनसे वरदान मांगने के लिये कहा.राजा दशरथ ने विधिवतस्तुति कर उसे प्रसन्न किया। पद्म पुराण में इस प्रसंग का सविस्तार वर्णन है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में शनि ने जगत जननी पार्वती को बताया है कि मैं सौ जन्मो तक जातक की करनी का फ़ल भुगतान करता हूँ। एक बार जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने शनि से पूंछा कि तुम क्यों जातकों को धन हानि करते हो, क्यों सभी तुम्हारे प्रभाव से प्रताडित रहते हैं, तो शनि महाराज ने उत्तर दिया,”मातेश्वरी, उसमे मेरा कोई दोष नही है, परमपिता परमात्मा ने मुझे तीनो लोकों का न्यायाधीश नियुक्त किया हुआ है, इसलिये जो भी तीनो लोकों के अंदर अन्याय करता है, उसे दंड देना मेरा काम है”. एक आख्यान और मिलता है, कि किस प्रकार से ऋषि अगस्त ने जब शनि देव से प्रार्थना की थी, तो उन्होने राक्षसों से उनको मुक्ति दिलवाई थी। जिस किसी ने भी अन्याय किया, उनको ही उन्होने दंड दिया, चाहे वह भगवान शिव की अर्धांगिनी सती रही हों, जिन्होने सीता का रूप रखने के बाद बाबा भोले नाथ से झूठ बोलकर अपनी सफ़ाई दी और परिणाम में उनको अपने ही पिता की यज्ञ में हवन कुंड मे जल कर मरने के लिये शनि देव ने विवश कर दिया, अथवा राजा हरिश्चन्द्र रहे हों, जिनके दान देने के अभिमान के कारण सप्तनीक बाजार मे बिकना पडा और,शमशान की रखवाली तक करनी पडी, या राजा नल और दमयन्ती को ही ले लीजिये, जिनके तुच्छ पापों की सजा के लिये उन्हे दर दर का होकर भटकना पडा, और भूनी हुई मछलियां तक पानी मै तैर कर भाग गईं, फ़िर साधारण मनुष्य के द्वारा जो भी मनसा, वाचा, कर्मणा, पाप कर दिया जाता है वह चाहे जाने मे किया जाय या अन्जाने

पुराणों में वर्णित शनि देव से जुड़े अदभुत रहस्य Read More »

उर्वशी अप्सरा के पूर्व जन्म की कहानी

प्राचीन काल में कश्मीर देश में देवव्रत नामक एक द्विज थे। उनके सुन्दर रूप वाली एक कन्या थी। जो मालिनी के नाम से प्रसिद्ध थी। द्विज ने उस कन्या का विवाह सत्यशील नामक सुन्दर बुद्धि मान द्विज के साथ कर दिया।मालिनी कुमार्ग पर चलने वाली पुंश्चली होकर स्वच्छन्दतापूर्वक इधर-उधर रहने लगी। उसके घर में काम- काज के बहाने “उपपति ” रहा करता था । सभी जाति के मनुष्य जार के रूप में उसके यहाँ ठहरते थे । वह कभी पति की आज्ञा नही मानती थी। सदा पर पुरूष के साथ रंगरलियाँ मनाती थी । इसी दोष के कारण उसके सब अंगों में कीडे पड गये थे। उन कीडों से उसकी नाक, जिह्वा और कानों का उच्छेद हो गया,स्तन तथा अंगुलियाँ गल गयीं। उसमें पंगुता आ गयी । इन सब क्लेशों के कारण उसकी मृत्यु हो गयी । तत्पश्चात् सौवीर देश में पद्मबन्धु नामक द्विज के घर में अनेक दुखों से घिरी हुई कुतिया हुई। उस समय भी उसके सिर में कीडे पड गये,और योनि में भी कीडे भरे रहते थे। इस तरह तीस वर्ष बीत गये। एक दिन पद्मबन्धु का पुत्र गंगा में स्नान करके पवित्र हो भीगे वस्त्र से घर आया। उसने तुलसी की वेदी के पास जाकर अपने पैर धोये। दैव योग से वह कुतिया वेदी के नीचे सोई हुई थी। सूर्योदय से पहले का समय था,ब्राह्मणकुमार के चरणोदक से वह नहा गयी और तत्काल उसके सारे पाप नष्ट हो गये । कुतिया को अपने पूर्व जन्म के दुराचरण पूर्ण वृतान्त याद आ गये। और वह वृतान्त कुतिया ने ब्राह्मण कुमार को सुनाये। तब ब्राह्मण कुमार बोले- पति का अपराध करने वाली स्त्री सैकडों बार तिर्यग्योनि में और अरबों बार कीडे की योनि में जन्म लेती है। यह सुनकर कुतिया बोली- दीनवत्सल! मैं आप के दरवाजे पर रहने वाली कुतिया हूँ । मुझ दीना के प्रति दया कीजिये। द्विजेन्द्र मैं आप को नमस्कार करती हूँ । कुतिया की विनती सुनकर ब्राह्मण कुमार के पिता पद्मबन्धु ने संकल्प किया- कुतिया ! ले, मैने द्वादशी का पुण्य तुझे दे दिया। ब्राह्मण के इतना कहते ही कुतिया ने सहसा अपने प्राचीन शरीर का त्यागा कर दिया और दिव्य देह धारण कर दशों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई ब्राह्मण की आग्या से स्वर्गलोक चली गई । वहाँ महान सुखों का उपभोग करके इस पृथ्वी पर भगवान् नर-नारायण के अंश से वही कुतिया “उर्वशी” नाम से प्रकट हुई। धन्य हैं श्री हरि धन्य हैं उनकी माया ।मायापति की माया में “अजय” ब्रहमांड समाया ।।आप की माया का कोई भेद न पाया ।नैनों मे है छबी आप की दिव्य करो मम काया ।। ||हरि हर शरणं गच्छामि ||

उर्वशी अप्सरा के पूर्व जन्म की कहानी Read More »

दीपावली की प्रतिपदा को करें:–पाँचवे वेद ” महाभारत की पूजा, फिर करें गोवर्धन पूजा

व्यास जी ने अर्जुन से कहा :—– पूर्वकाल की बात है,तीन वलवान् असुरों ने आकाश में अपने नगर बना रक्खे थे । वे नगर विमान के रूप में आकाश में विचरा करते थे । उन तीन नगरों में एक लोहे का, दूसरा चाँदी का और तीसरा सोने का बना था । जो सोने का बना था , उसका स्वामी था कमलाक्ष । चाँदी के बने हुए पुर में तारकाक्ष रहता था । तथा लोहे के नगर में विद्युन्माली रहता था । इन्द्र ने उन पुरों का भेदन करने के लिए अपने सभी अस्त्रों का प्रयोग किया पर वे सफल नही हुए ।तब सभी देवता भगवान शंकर की शरण में गये । वहाँ पहुँच कर उन्होंने कहा:——– भगवन ! इन त्रिपुर निवासी दैत्यों को ब्रह्मा जी ने वरदान दे रक्खा है, उसके घमन्ड में फूलकर ये भयंकर दैत्य तीनों लोकों को कष्ट पहुँचा रहे हैं। महादेव! आप के शिवा दूसरा कोई इनका ऩाश करने में समर्थ नही है ,आप ही इन देवद्रोहियों का वध कीजिए । देवताओं के ऐसा कहने पर भगवान शंकर ने उनका हित साधन के लिए तथास्तु कहा और :——— एक दिव्य रथ तथा अस्त्रों का निर्माण किया :—– दिव्य रथ का निर्माण :—-१- रथ की धवाजा बने:–गन्धमादन तथा विन्ध्याचल पर्वत ।२- ऱथ बनी :-समुद्र और वनों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी ।३- नागराज शेष रथ की धुरी के स्थान पर रक्खा गया ।४- पहिया बने :- चन्द्रमा और सूर्य ।५- एलपत्र के पुत्र को और पुष्पदन्त को जुए की कीलें बनाया ।६- मलयाचल को जुआ बनाया ।७- तक्षकनाग को बनाया जुआ बाँधने की रस्सी ।८- घोडे की बागडोर बने सम्पूर्ण प्राणी ।९- चारों वेद बने :- रथ के चार घोडे ।१०- लगाम बने :– उपवेद ।११- गायत्री और सावित्री बनीं :– पगहा१२:- ॐकार को बनाया :– चाबुक ।१३- ब्रह्मा जी बनें :- सारिथ१४- गाण्डीव धनुष बना :- मन्दराचल ।१५- प्रत्यन्चा बने :- वासुकिनाग ।१६- बाण बने ‘- भगवान विष्णु ।१७- बाण का फल बने :- अग्नि देव१८- बाण की पाँख बने :- वायुदेव ।१९:- बाण की पूँछ बने :- वैवस्वत यम ।२०- बाण के फल की धार बनी :– बिजली२१- मेरू को प्रधान ध्वजा बनाया । इस प्रकार सर्वदेवमय दिव्य रथ तैयार कर भगवान शंकर उसपे आरूढ हुए । भगवन शंकर उस रथ में एक हजार वर्ष तक रहे । जब तीनों पुर आकाश में एकत्रित हुए तब शिवजी ने तीन गाँठ और तीन फल वाले बाण से उन तीनों पुरों को भेद डाला । -हे ! अर्जुन यह घटना कार्तिक,शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को घटी थी। इस दिन भगवान शंकर की आराधना करने से मानव विश्वविजयी हो जाता है। तथा शिवजी हर तरह के सुख- साधन प्रदान करते हैं। इस लिए -हे ! अर्जुन तुम शिवजी की आराधना करो तुम्हारा कल्याण हो। भगवान शंकर ही रूद्र,शिव,अग्नि,सर्वज्ञ , इन्द्र,वायु और अश्वनीकुमार हैं। वे ही बिजली और मेघ है। सूर्य, चंद्रमा,वरूण,काल,,,मृत्यु, यम, रात, दिवस, मास, पक्ष, ॠतु, संवत्सर, सन्ध्या, धाता, विधाता, विश्वात्मा और विश्वकर्मा भी वे ही हैं। वे निराकार होकर भी सम्पूर्ण देवताओं के आकार धारण करते हैं। वे एक, अनेक, सौ, हजार और लाख हैं। -हे ! अर्जुन शिवजी की महिमा मैं एक हजार वर्ष तक कहता रहूँ, तो भी उनके गुणों का पार नही पा सकता । कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को जो भी प्राणी महाभारत की पूजा भगवान शिव की आराधना करके करता है वह समस्त सुखों का अधिकारी हो जाता है । शिव जी ने व्यास जी को वरदान दिया था। आप के लिखे इस ग्रंथ में मेरा विजयेश्वर नाम से निवास होगा। जो भी महाभारत ग्रन्थ का रसास्वादन करेगा,करायेगा उसकी मनोकामना पूरी होगी ।

दीपावली की प्रतिपदा को करें:–पाँचवे वेद ” महाभारत की पूजा, फिर करें गोवर्धन पूजा Read More »

||अदभुत रहस्य:- जब मृत्यु की भी हुई मृत्यु ||

गोदावरी के पावन तट पे “श्वेत” नामक एक ब्राह्मण रहते थे । जो शिव जी के अनन्य भक्त थे,सदा शिव भक्ती में लीन रहते थे। उनकी आयु पूरी हो चुकी थी । यमदूत उन्हें समय से लेने आये , लेकिन यमदूत श्वेत के घर में प्रवेश नही कर पाये। तब स्वयं ” मृत्यु देव”आये और श्वेत के घर में प्रवेश कर गये। श्वेत की रक्षा भैरव बाबा कर रहे थे। भैरव बाबा ने मृत्यु देव से वापस जाने के लिए कहा लेकिन मृत्यु देव ने भैरव बाबा की बात नही मानी और श्वेत पर फंदा डाल दिया। भक्त पर मृत्यु देव का यह आक्रमण देखकर भैरव बाबा को सहन न हुआ । भैरव बाबा ने मृत्यु पर डंडे से प्रहार कर दिया । मृत्यु देव वहीं ठंडे हो गये  मर गये । मृत्यु की मृत्यु सुनकर यमराज आ गये उन्होंने श्वेत पर यमदंड से प्रहार कर किया। वहाँ पर कार्तिकेय जी पहले से ही मौजूद थे, जो श्वेत की ऱक्षा कर रहे थे। उन्होंने यमराज को मार गिराया और साथ में यम दूतों का संघार कर दिया । मृत्यु की सजा देने वाले यमराज की भी मृत्यु हो गयी।यह देखकर सूर्य देव विचिलित हो गये क्यों की यमदेव सूर्य देव के पुत्र हैं। पुत्र को मरा हुआ देखकर  सूर्य देव ने भगवान शिव की आराधना की। भोलेनाथ प्रगट हुए, शिव जी ने नंदी के द्वारा गौतमी गंगा (गोदावरी) का जल मँगवाया और मरे हुए लोगों पे छिडकवाया तत्क्षण सबके सब स्वस्थ होकर उठ खडे हुए(जीवित हो गये) । इसी लिए शिव जी को विश्वनाथ कहा जाता है।

||अदभुत रहस्य:- जब मृत्यु की भी हुई मृत्यु || Read More »