Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye:रुथिनी एकादशी पर भूलकर पर भी न खाएं ये 5 चीजें, आर्थिक तंगी बढ़ने के साथ भाग्य हो सकता है कमजोर

Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye: वरूथिनी एकादशी पर भक्त उपवास रखकर विष्णु भगवान की आराधना करेंगे। वरूथिनी एकादशी पर कुछ कामों को करना अशुभ माना जाता है, जो प्रभु की नाराजगी का कारण भी बन सकता है। वरूथिनी एकादशी पर क्या न करें? 1. चावल- वरूथिनी एकादशी पर चावल का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। मान्यता है इस दिन चावल का सेवन करने से दोष लगता है।  2. तुलसी की पत्तियां- तुलसी की पत्तियां भगवान श्री हरि विष्णु को बेहद प्रिय हैं, जिनके बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जाता है। इसलिए वरूथिनी एकादशी के दिन भूलकर भी तुलसी की पत्तियों को न तो स्पर्श करना चाहिए और न ही इन्हें तोड़ना चाहिए। तुलसी की पत्तियां तोड़ने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं। 3. काले वस्त्र- धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी शुभ अवसर या फिर पूजा-पाठ के दौरान काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। इसलिए वरूथिनी एकादशी के दिन काले रंग के कपड़े पहनने से बचें। भगवान विष्णु की असीम कृपा पाने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा। 4. मास-मदिरा- वरूथिनी एकादशी के दिन भूलकर भी मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नराज हो सकते हैं।  5. अपमान- कोशिश करें की इस दिन आप किसी का दिल न दुखाएं और वाद-विवाद से भी बचें। Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye किसी का भी अपमान करने से बचें और न ही किसी का मजाक उड़ाएं।  डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।  वरुथिनी एकादशी पर क्या करना चाहिए? इस दिन भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का भोग जरूर अर्पित करें. विष्णु जी को तुलसी बेहद प्रिय है. अगर आपने एकादशी व्रत नहीं भी रखा है तब भी इस दिन सात्विक चीजों का ही सेवन करें. एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि के समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए. Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye इसके अलावा, एकादशी के दिन दान-पुण्य करने का खास महत्व है, इसलिए एकादशी तिथि को दान देना न भूलें. वरुथिनी एकादशी के दिन जगत के पालनहार श्रीहरि विष्णु के साथ ही धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा करें और पूरे दिन ईश्वर का ध्यान करते हुए व्रत का पालन करें. एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि यानी एकादशी के अगले दिन तक किया जाता है. पान माता लक्ष्मी को किया जाता है अर्पित Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye वरुथिनी एकादशी पर पान के पत्ते भी न चबाएं या फिर किसी भी तरह से पान का उपयोग न करें क्योंकि पान के पत्ते माता लक्ष्मी की पूजा में रखे जाते हैं, इसलिए इस दिन पान को चढ़ावे का एक रूप माना जाता है, Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye इसलिए वरुथिनी एकादशी पर पान न खाएं। पालक खाना वर्जित है Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye इस दिन पालक खाना भी वर्जित है। पालक खाने से भी भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा आपको नहीं मिल पाती है। साथ ही इस दिन पालक खाने से आपको त्वचा सम्बधित कई परेशानियां हो सकती है। शहद खाने से नाराज होती है मां लक्ष्मी वरुथिनी एकादशी पर शहद भी न खाएं क्योंकि इस दिन शहद से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को स्नान कराया जाता है, इसलिए शहद खाने को वर्जित माना गया है। वरुथिनी एकादशी पर शहद खाने से माता लक्ष्मी और विष्णु जी की कृपा आपको नहीं मिलती। चना खाने से आर्थिक तंगी होती है इस दिन चने खाने को भी वर्जित माना गया है। Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye मान्यता है कि आप अगर इस दिन चना खाते हैं, तो आर्थिक तंंगी आपका पीछा नहीं छोड़ती है। इसके अलावा चना खाने से आपको कई तरह की समस्याएं हो सकती है। वरुथिनी एकादशी पर चना खाना वर्जित है। उड़द की दाल से रोगों का खतरा वरुथिनी एकादशी पर उड़द की दाल खाने से परहेज करना चाहिए। माना जाता है कि अगर आप वरुथिनी एकादशी पर उड़द की दाल खाते हैं, तो इससे आपको कई रोग होने का खतरा हो सकता है, Varuthini Ekadashi Par Kya Na Khaye इसलिए इस दिन उड़द की दाल खाने को वर्जित माना गया है।

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Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai:वैशाख माह में कब है वरूथिनी और मोहिनी एकादशी? ये है पूजा का शुभ मुहूर्त

Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai : सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ मानी जाती है। Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai इस शुभ तिथि पर श्रीहरि और देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विधान है। अब जल्द ही वैशाख माह शुरू होने जा रहा है तो ऐसे में आइए जानते हैं कि इस माह में कौन-सी एकादशी व्रत किया जाएगा? Varuthini Ekadashi 2025 tithi & shubh muhurat :  हर साल वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वरूथिनी एकादशी मनाई जाती है. हिन्दू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है. इस दिन लक्ष्मी नारायण (Lakshmi Narayan) जी की सच्चे मन से पूजा अर्चना करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं साथ ही, सभी कष्टों से मुक्ति भी मिलती है. यह भी कहा जाता है कि वरूथिनी एकादशी व्रत रखने से मृत्यु के बाद वैकुंठ में स्थान मिलता है. ऐसे में आइए जानते हैं इस साल  वरूथिनी एकादशी की तिथि,शुभ मुहूर्त, योग, पारण का समय और मंत्र… वरूथिनी एकादशी तिथि और शुभ मुहूर्त 2025 – Varuthini Ekadashi date and auspicious time 2025 पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 23 अप्रैल को शाम 04:43 मिनट से होगी, जिसका समापन अगले दिन यानी 24 अप्रैल को दोपहर 02:32 मिनट पर होगा. उदयातिथि पड़ने के कारण यह व्रत 24 अप्रैल को रखा जाएगा.  वरूथिनी एकादशी शुभ योग – Varuthini Ekadashi Shubh Yoga वरूथिनी एकादशी पर शुभ योग Auspicious yoga on Varuthini Ekadashi ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस वर्ष वरूथिनी एकादशी पर ब्रह्म और इन्द्र योग का संयोग बन रहा है, Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai साथ ही शिववास योग भी है। इन शुभ योगों के बीच शतभिषा और पूर्व भाद्रपद नक्षत्र का संयोग होने से यह दिन विशेष रूप से पुण्यकारी माना जाता है। Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai इस समय भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से साधक के जीवन में अपार सुख और सौभाग्य की वृद्धि होती है। वरूथिनी एकादशी पारण समय – Varuthini Ekadashi Paran time वरूथिनी एकादशी का पारण समय 25 अप्रैल को सुबह 05:46 मिनट से लेकर सुबह 08:23 मिनट तक है.  वरूथिनी एकादशी पर राशि अनुसार करें इन मंत्रों का जाप – Chant these mantras according to your zodiac sign on Varuthini Ekadashi आप इस दिन राशि के अनुसार मंत्रों का जाप कर लेते हैं तो इस व्रत का फल दोगुना मिल सकता है… वरूथिनी एकादशी 2025 पारण टाइम (Varuthini Ekadashi 2025 Vrat Paran Time) Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि पर किया जाता है। ऐसे में वरूथिनी एकादशी व्रत पारण 25 अप्रैल को किया जाएगा। इस दिन व्रत का पारण करने का शुभ मुहूर्त सुबह 05 बजकर 46 मिनट से लेकर 08 बजकर 23 मिनट तक है। वरूथिनी एकादशी का महत्व Importance of Varuthini Ekadashi वरूथिनी एकादशी का विशेष धार्मिक महत्त्व है। यह व्रत भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी के पूजन का दिन है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य की वृद्धि होती है। Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai इसके अलावा, यह व्रत व्यक्ति के पापों को नष्ट करता है और पुण्य की प्राप्ति कराता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन व्रत करने से साधक को मृत्यु के बाद वैकुंठ लोक में स्थान मिलता है। Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai साथ ही, यह व्रत सभी संकटों से मुक्ति और जीवन में शांति लाने का उपाय है। Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai वरूथिनी एकादशी विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह पारिवारिक सुख और समृद्धि का प्रतीक है। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा करके व्यक्ति धन-धान्य में वृद्धि प्राप्त करता है। Varuthini Ekadashi 2025 Mai Kab Hai इस व्रत को करने से आत्मिक शांति और मोक्ष का मार्ग भी खुलता है। वरूथिनी एकादशी पूजा विधि Varuthini Ekadashi puja method पूजा शुरू करने से पहले प्रात:काल जल्दी उठकर स्नान करें और शुद्ध हो जाएं। फिर स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा की शुरुआत में “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ श्री लक्ष्मीनारायणाय नमः” मंत्र का जाप करें। पूजा स्थल पर दीपक जलाएं और भगवान लक्ष्मी नारायण की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ करें। भगवान लक्ष्मी नारायण को ताजे फूल, फल, और पत्तियां अर्पित करें। पूजा के दौरान धूप और अगरबत्तियां जलाएं और वातावरण को पवित्र बनाएं। ध्यान लगाकर भगवान लक्ष्मी नारायण से अपने जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्रार्थना करें। इस दिन उपवास रखें। यदि संभव हो तो रात को फलाहार करें। पूजा के बाद, व्रत खोलने से पहले अन्न, धन या वस्त्र का दान करें। इस प्रकार, विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और भगवान लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

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बुध पंचविंशति नाम स्तोत्रम् | Budha Panchavimshatinama Stotram

बुध पंचविंशति नाम स्तोत्रम् (Budha Panchavimshatinama Stotram)  बुधो बुद्धिमतां श्रेष्ठो बुद्धिदाता धनप्रदः। प्रियंगुकुलिकाश्यामः कञ्जनेत्रो मनोहरः॥ १॥ ग्रहोपमो रौहिणेयः नक्षत्रेशो दयाकरः। विरुद्धकार्यहन्ता सौम्यो बुद्धिविवर्धनः ॥२॥ चन्द्रात्मजो विष्णुरूपी ज्ञानी ज्ञो ज्ञानिनायकः। ग्रह्पीडाहरो दारपुत्रधान्यपशुप्रदः ॥३॥ लोकप्रियः सौम्यमूर्तिः गुणदो गुणिवत्सलः। पञ्चविंशतिनामानि बुधस्यैतानि यः पठेत्॥४॥ स्मृत्वा बुधं सदा तस्य पीडा सर्वा विनश्यति। तद्दिने वा पठेद्यस्तु लभते स मनोगतम् ॥५॥ Budh Panchvinshatinama Stotram | बुध पंचविंशति नाम स्तोत्रम् Budho intellects bestow wisdom Dhanpradah. Priyangukulikashyam: Kanjnetro Manoharah. 1॥ Grahopmo rouhineyah nakshatrasho dayakarah. Virudhakaryahanta Soumyo Buddhivivardhan: 2॥ The chandratma who is the knowledgeable person of Vishnu, the knowledgeable one. Grahpidaharo darputradhanyapashupradah 3 || Popular: Soumyamurthy: Gunado Gunivatsalah. Panchavishtinamani Budhasayatani yaha pathet4॥ Smritiva Budham, always tasya pain, sarva vinyasti. Taddine wa pathedyastu labhte sa manogtam 5॥ बुध पंचविंशति नाम स्तोत्रम् विशेषताए: बुध पंचविंशति नाम स्तोत्रम् के साथ-साथ यदि नव्ग्रह आरती या नव्ग्रह चलीसा का पाठ किया जाए तो, इस स्तोत्रम का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र  का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस अष्टकम का पाठ करे| इस स्तोत्रम् के पाठ के साथ साथ बुद्ध गुटिका और बुध ग्रह यंत्र का भी पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है| और नियमित रुप से करने से रुके हुए कार्य भी पूर्ण होने लगते है | और साधक के जीवन में रोग, भय, दोष, शोक, बुराइया, डर दूर हो जाते है साथ ही देवी की पूजा करने से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि प्राप्त होती है। याद रखे इस बुध पंचविंशति नाम स्तोत्रम् पाठ को करने से पूर्व अपना पवित्रता बनाये रखे| इससे मनुष्य को जीवन में बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है|

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प्रियकांत जू मंदिर वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

प्रिय यानी कि राधा जी और कांत यानी श्री कृष्ण के आधार पर ही इस मंदिर का नाम रखा गया है। प्रियकांत जू मंदिर उत्तर प्रदेश के पवित्र शहर मथुरा के वृन्दावन में स्थित है। यह मंदिर भगवान कृष्ण और राधा जी को समर्पित है। मंदिर में राधा कृष्ण की बहुत ही मनमोहक मूर्ति है। भक्त इनके दर्शन कर आनंदित हो जाते है। प्रिय यानी कि राधा जी और कांत यानी श्री कृष्ण के आधार पर ही इस मंदिर का नाम रखा गया है। प्रियकांत जू मंदिर का इतिहास PRIYAKANT JU MANDIR श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के निर्माण का संकल्प 2007 में विश्व शांति चैरिटेबल ट्रस्ट ने लिया था। इसके बाद 2009 में श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज द्वारा इसकी स्थापना की गयी थी। 2012 में इस मंदिर निर्माण के प्रथम चरण की शुरुआत हुयी। इस मंदिर को पूर्ण रूप से बनने में सात साल का समय लगा। 8 फरवरी 2016 में श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए इस मंदिर को खोला गया। प्रियकांत जू मंदिर का महत्व मंदिर में होली का त्यौहार बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। ब्रज की होली को देखने और इस त्यौहार को मनाने के लिए लोग दूर दूर से आते है। यहाँ आकर वह भी ब्रज के रंग में रंग जाते है। में यदि दर्शन करना चाहते है तो सबसे अच्छा समय शाम का होता है। क्योंकि शाम के समय मंदिर की भव्यता बहुत शानदार होती है। नीली रौशनी से मंदिर जगमगा उठता है और मंदिर में विराजित राधा कृष्ण की जोड़ी का यह स्वरुप देखने में बहुत ही मनमोहक लगता है। प्रियकांत जू मंदिर की वास्तुकला मंदिर की वास्तुकला मंदिर के बाहर से देखते ही बनती है। यह मंदिर कमल के आकार का बना हुआ है। इस मंदिर की ऊँचाई लगभग 125 फिट है। सड़क के समीप बना यह मंदिर बहुत ही शानदार है। मंदिर के दोनों तरफ फव्वारे लगाए गए है। इस मंदिर में राधा कृष्ण जी के अलावा भोलेनाथ, गणेश जी और हनुमान जी के छोटे छोटे मंदिर है। प्रियकांत जू मंदिर का निर्माण मकराना राजस्थान के संगमरमर से किया गया है। मंदिर का समय प्रियकांत जू मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:30 PM मंगला आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM प्रियकांत जू मंदिर के शाम को खुलने का समय 04:30 PM – 08:30 PM राजभोग का समय 11:45 AM – 12:00 PM मंदिर का प्रसाद प्रियकांत जू मंदिर में प्रसाद के रूप में पेड़ा, बूंदी, रेवडी, बेसन सेवैया का भोग लगता है। भगवान को पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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Kedarnath Dham Kese Jaye:केदारनाथ जाने का बना रहे हैं प्लान, तो यहां जानिये खर्चा, समय और रास्ते के बारे में

Kedarnath Dham Kese Jaye : हर साल लाखों श्रद्धालु (Delhi) दिल्ली के रास्ते केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं। अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं, तो इसके आसपास और भी खूबसूरत जगहें हैं, जो घूमने के लिए बहुत अच्छी हैं। Kedarnath Yatra Route map:भगवान शिव को समर्पित और 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक केदारनाथ पवित्र स्थल है। यह मंदिर बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच स्थित है। समुद्र तल से 3585 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारानाथ मंदिर उत्तराखंड (Kedarnath Temple Uttarakhand) में चार धाम और पंच केदार का एक हिस्सा है। हर साल लाखों श्रद्धालु दिल्ली के रास्ते केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं। खूबसूरत मंदाकिनी नदी मंदिर के पास बहती है। बर्फ से ढंकी चोटियां इस जगह के आकर्षण को बढ़ा देती हैं। आश्चर्य की बात है कि यह मंदिर अप्रैल के अंत और मई के पहले सप्ताह में खुलता है और अक्टूबर के अंत और नवंबर के पहले सप्ताह में बंद हो जाता है। मंदिर के भीतर एक नुकीली सी चट्टान की पूजा भगवान शिव के रूप में की जाती है। Kedarnath Dham Kese Jaye अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं, तो इसके आसपास और भी खूबसूरत जगहें हैं, Kedarnath Dham Kese Jaye जो घूमने के लिए बहुत अच्छी हैं। तो आइए जानते हैं केदारनाथ की यात्रा से जुड़ी कुछ जरूरी बातें और आसपास घूमने वाली जगहों के बारे में। Kedarnath Dham Yatra Route Map: भगवान शिव को समर्पित और 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक केदारनाथ पवित्र स्थल है। यह मंदिर बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच स्थित है। समुद्र तल से 3585 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारानाथ मंदिर उत्तराखंड (Kedarnath Temple Uttarakhand) में चार धाम और पंच केदार का एक हिस्सा है। Kedarnath Dham Kese Jaye हर साल लाखों श्रद्धालु दिल्ली के रास्ते केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं। खूबसूरत मंदाकिनी नदी मंदिर के पास बहती है। बर्फ से ढंकी चोटियां इस जगह के आकर्षण को बढ़ा देती हैं। केदारनाथ का रूट – Kedarnath Route केदारनाथ की यात्रा 5 रातें 6 दिन की होती है। पहला दिन – दिल्ली से हरिद्धार (230 किमी) या 6 घंटे – दिल्ली से ट्रेन या फ्लाइट से हरिद्वार जा सकते हैं और फिर होटल में चेकइन कर सकते हैं। Ganga गंगा आरती के लिए शाम को हर की पौड़ी जाएं और फिर अपने होटल में डिनर और नाइट स्टे करें। दूसरे दिन – हरिद्वार से रूद्रप्रयाग (165 किमी) या 6 घंटे –सुबह सीधे जोशीमठ के लिए निकलें। यहां रास्ते में देवप्रयाग और रूद्रप्रयाग के होटल में ठहरें। तीसरा दिन – रूद्रप्रयाग से केदारनाथ (75 किमी ) 3 घंटे 14 किमी ट्रेक – गौरीकुंड के लिए सुबह पैदल, टट्टू , डोली से आप गौरकुंड के लिए ट्रेक शुरू कर सकते हैं। शाम की आरती के लिए केदारनाथ जाएं और फिर यहीं पर नाइट स्टे करें। दिन 4 – केदारनाथ से रूद्रप्रयाग – (75 किमी) 3 घंटे – सुबह केदारनाथ जी के दर्शन करें और फिर गौरीकुंड की यात्रा करें। बाद में वापस रूद्रप्रयाग जाएं और होटल में नाइट स्टे करें। दिन 5- रूद्रप्रयाग से हरिद्वार- 160 किमी 5 घंटे – हरिद्वार के लिए निकलें। रास्ते में ऋषिकेश में दर्शनीय स्थल की यात्रा कर सकते हैं। इसके बाद हरिद्वार पहुंचे और यहीं पर नाइट स्टे करें। दिन 6- हरिद्वार से दिल्ली 230 किमी 6 घंटे – सुबह आप हरिद्वार के स्थानीय स्थलों की यात्रा कर दिल्ली ऐयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हो सकते हैं। How much does it cost to visit Kedarnath Dham? केदारनाथ धाम के दर्शन में कितना लगता है खर्च? दिल्ली से देहरादून तक आप 300 से 1000 रूपए में आसानी से पहुंच सकते हैं. देहरादून से गौरीकुंड के लिए बस करने पर आपको करीब 500 का टिकट लगेगा. दिल्ली से गौरीकुंड के लिए सीधे बस सेवा भी मिलती है Kedarnath Dham Kese Jaye जिसका किराया 500 से 1000 के बीच होता है. अगर हेली सेवा ले रहे हैं Kedarnath Dham Kese Jaye तो प्रति व्यक्ति सिरसी से 5498 रुपये राउंड ट्रिप, फाटा से केदारनाथ धाम का टिकट 5500 रुपये और गुप्तकाशी से 7740 रुपये का टिकट मिलेगा. हेलीकॉप्टर सेवा कई लोगों के बजट से बाहर होती है, तो ऐसे में आप गौरीकुंड से केदारनाथ धाम जाने के लिए पालकी या फिर घोड़े भी बुक कर सकते हैं. केदारनाथ के पास घूमने की जगहें – Places to visit around Kedarnath गांधी सरोवर Gandhi Sarovar – केदारनाथ और कीर्ति स्तंभ चोटी की तलहटी पर समुद्र तल से 3900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गांधी सरोवर को चोराबाड़ी ताल के नाम से भी जाना जाता है। यह केदारनाथ मंदिर से 3 किमी के ट्रैकिंग डिस्टेंस पर स्थित है। सोनप्रयाग Sonprayag – मंदाकिनी और बासुकी दो पवित्र नदियों के संगम पर स्थित सोनप्रयाग केदारनाथ धाम के रास्ते में एक धर्मिक स्थल है। तीर्थयात्री मंदिर की यात्रा शुरू करने से पहले नदी में डुबकी लगाते हैं। गौरीकुंड मंदिर Gaurikund Temple – केदारनाथ यात्रा के बाद आप गौरीकुंड मंदिर जा सकते हैं। यह मंदिर देवी पार्वती को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां देवी पार्वर्ती ने भगवान शिव का दिल जीतने के लिए तपस्या की थी। Kedarnath Dham Kese Jaye गौरीकुंड में गर्म पानी के झरने हैं, जहां तीर्थीयात्री स्नान कर सकते हैं। वासकुी ताल Vasaku Tal – केदारनाथ से 5 किमी की दूरी पर स्थित वासुकी ताल समुद्र तल से 4,135 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह झील अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। वासुकी ताल ट्रैक आप चौखंभा चोटी के दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। कैसे जाएं केदारनाथ – How To reach Kedarnath Delhi to Kedarnath by train दिल्ली से केदारनाथ ट्रेन से – अगर आप ट्रेन से केदारनाथ जाने की सोच रहे हैं, तो ट्रेन की सुविधा सिर्फ हरिद्वार तक है। आपको दिल्ली से हरिद्वार के लिए ट्रेन लेनी होगी। Kedarnath Dham Kese Jaye हरिद्वार से सड़क के रास्ते या फिर हेलीकॉप्टर से केदारनाथ जाना होगा। Delhi to Kedarnath by flight फ्लाइट से दिल्ली से केदारनाथ – आप फ्लाइट से केदारनाथ जाना चाहते हैं, तो देहरादून में जॉली ग्रेट एयरपोर्ट है। यह केदारनाथ से लगभग 239 किमी दूर है। देहरादून से केदारानाथ जाने के लिए बस और टैक्सी की सुविधा भी उपलब्ध हैँ। Delhi to Kedranath by road सड़क के रास्ते

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Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025:जानिए कब खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट और क्या हैं नियम, भक्‍त कर लीज‍िए जाने की तैयारी 

Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025:गढ़वाल हिमालय की मनमोहक पहाड़ियों में बसा केदारनाथ मंदिर छह महीने तक बंद रहने के बाद 2 मई, 2025 को श्रद्धालुओं के लिए अपने दरवाजे फिर से खोलने वाला है। यह मंदिर, सबसे पवित्र हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक है, जो चार धाम यात्रा का हिस्सा है। हर साल हजारों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होने आते हैं। केदारनाथ 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 11,968 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर साल में अप्रैल-मई से अक्टूबर-नवंबर के बीच लगभग छह से सात महीने तीर्थयात्रियों के लिए खुला रहता है और सीजन के दौरान सालाना लगभग 20 लाख तीर्थयात्री यहां आते हैं। अगर आप भी लंबे समय से केदारनाथ धाम जाने की योजना बना रहे हैं, तो कुछ जरूरी बातों के बारे में जान लीजिए। How are the doors of Kedarnath Dham opened:किस तरह खोले जाते हैं केदारनाथ धाम के कपाट  Kedarnath Dham Yatra:केदारनाथ धाम के कपाट खुलने का दिन तय किया जा चुका है. इसके पश्चात नियमानुसार कपाट खोले जाएंगे. कपाट खुलने से पूर्व 27 अप्रैल के दिन ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में भैरव पूजा का आयोजन किया जाएगा. इसके बाद बाबा केदार की डोली केदारनाथ धाम के लिए प्रस्थान करेगी. इसके बाद बाबा केदार की डोली को 28 अप्रैल गुप्तकाशी ले जाया जाएगा, यहां से 29 अप्रैल को फाटा और 30 अप्रैल को बाबा केदार की डोली गौरीकुंड पहुंचेगी. बाबा केदार की डोली 1 मई के दिन केदारनाथ पहुंच जाएगी और फिर अगले दिन 2 मई को सुबह 7 बजे केदारनाथ मंदिर के कपाट खोल दिए जाएंगे. Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 कब खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट जब केदारनाथ धाम के द्वार खोले जाते हैं तो इस दौरान पूरा मंदिर प्रांगण में बाबा केदारनाथ का जयकारा लगाया जाता है और ठोल नगाड़ों की आवाज गूंजती है. इसके बाद भक्त बाबा केदारनाथ के दर्शन कर सकते हैं. Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 कपाट खुल जाने के बाद भक्त बाबा केदारनाथ की विधिवत पूजा करते हैं. यह पूजा शैव लिंगायत विधि से की जाती है. Devotees should prepare for Kedarnath Yatra in this way:केदारनाथ यात्रा के लिए भक्त इस तरह करें तैयारी  केदारनाथ यात्रा (Kedarnath Yatra) पर जाना चाहते हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है. यात्रा पर जाने का अच्छा समय मई से जून और सितंबर से अक्टूबर के बीच माना जाता है.  मौसम के अनुसार ही कपड़े लेकर जाएं. अलग-अलग दिन पर अलग मौसम हो सकता है. Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 इसीलिए मौसम में बदलाव को ध्यान में रखकर ही कपड़े लेकर जाना सही रहेगा.  पैकिंग करते समय जरूरत की चीजें ध्यान से रखें. दवाइयां रखना ना भूलें. अगर किसी को कोई मेडिकल कंडीशन है तो उसे भी ध्यान में रखें. फर्स्ट एड का सामान भी लेकर जाएं.  यात्रा पर निकलने से पहले सभी जरूरी डॉक्यूमेंट्स को ध्यान से रखें. साथ ही अपनी आईडी वगैरह रख लें.  पहनने के लिए सही जूते लेकर जाएं, स्टाइलिश सैंडल्स या बूट्स चढ़ाई और लंबी यात्रा के लिए सही नहीं होते हैं.  पर्सनल हाइजीन की चीजें भी साथ लेकर चलें. यह ना सोचें कि आप लास्ट मिनट पर कुछ खरीद लेंगे. अपने साथ फ्लैशलाइट और हेडलैंप वगेरह लेकर जाएं.  ऑनलाइन पेमेंट पर पूरी तरह निर्भर होकर ना जाएं और अपने साथ कैश लेकर चलें.  Where to stay during Kedarnath Yatra :केदारनाथ यात्रा के दौरान कहां ठहरें? Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 अपनी केदारनाथ यात्रा के लिए, आप केदारनाथ में ही रुक सकते हैं, जहां गेस्ट हाउस, शयनगृह और आश्रम जैसी बेसिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, या आप गुप्तकाशी (Guptkashi) या सोनप्रयाग (Sonprayag) में अधिक आरामदायक अकोमोडेशन का ऑप्शन चुन सकते हैं, जहां से केदारनाथ तक आने-जाने का ऑप्शन भी उपलब्ध है। Don’t forget to register:रजिस्ट्रेशन करना न भूलें केदारनाथ यात्रा के लिए तीर्थयात्रियों को यात्रा शुरू करने से पहले रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी करनी होती है। आप आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से या ट्रैवल एजेंसियों की मदद से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। बता दें, रजिस्ट्रेशन करने के लिए आधिकारिक वेबसाइट registrationandtouristcare.uk.gov.in पर जाकर आधार कार्ड के माध्यम से प्रक्रिया पूरी हो सकती है। How to prepare yourself for Kedarnath:केदारनाथ के लिए कैसे करें खुद को तैयार Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 केदारनाथ यात्रा में लगभग 16 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई शामिल है (यदि पैदल यात्रा कर रहे हैं)। ऐसे में खुद को शारीरिक रूप से तैयार रखना जरूरी है, क्योंकि यात्रा के दौरान पैदल चलना, हल्की ट्रैकिंग या सीढ़ियां चढ़ना शामिल है। Kedarnath Ke Kapat Kab Khulenge 2025 इसी के साथ अच्छे और मजबूत जूतों का चयन करना सबसे जरूरी है.

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Bal Raksha Stotra | बालरक्षा स्त्रोत्र

Bal Raksha Stotra बाल रक्षा स्तोत्र: यह बाल रक्षा स्तोत्र संस्कृत में है और श्री मद भागवत से लिया गया है। जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक प्रत्येक बच्चे को सुरक्षा की आवश्यकता होती है। माता पिता और डॉक्टर की सहायता से ऐसी सुरक्षा प्रदान करती है। हालाँकि, कभी-कभी यह सुरक्षा अपर्याप्त होती है और इसलिए उन्हें दिव्य सुरक्षा की आवश्यकता होती है। Bal Raksha Stotra इस स्तोत्र में भगवान श्री विष्णु से दिव्य सुरक्षा की प्रार्थना की गई है। श्री भगवान विष्णु निश्चित रूप से बच्चे की रक्षा करते हैं। भारत में माताएँ प्रतिदिन विश्वास, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस स्तोत्र का पाठ करती हैं। यह बाल रक्षा स्तोत्र भगवान गणेश को प्रणाम करने से शुरू होता है। अच्युत, केशव, नारायण गोविंदा इस स्तोत्र में पाए जाने वाले कई अन्य नामों में से विष्णु का नाम है। बच्चे को सुरक्षा प्रदान करने के लिए भगवान श्री विष्णु को इन नामों से पुकारा जाता है। Bal Raksha Stotra इन नामों से पुकारने पर माँ बच्चे को सभी दस दिशाओं यानी पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों कोनों और ऊपर और नीचे की दिशाओं से बचाने के लिए कह रही है। फिर वह ऋषिकेश से प्रार्थना करती है कि वह बालक के सभी अंगों की रक्षा करें, नारायण से प्राण की रक्षा करें, योगेश्वर से मन की रक्षा करें, शिवात्द्वीपी से चित्त की रक्षा करें, पृथ्वीगर्भ से बुद्धि की रक्षा करें, श्री भगवान से आत्मा की रक्षा करें, गोविंद से खेलते समय रक्षा करें, माधव से यज्ञभू खाते समय सभी ग्रहों से रक्षा करें, माता कुशमांडा से राक्षसों से रक्षा करें तथा अक्ष विनायक से दैत्यों, भूतों, लाशों आदि से रक्षा करें। मातृकादया, जेष्ठा, रेवती से मानसिक रोग, दौरे आदि से रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। जब भगवान विष्णु का नाम श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता के साथ लिया जाता है तो बालक को सभी प्रकार से रक्षा मिलती है। महिलाओं से अनुरोध है कि वे गर्भावस्था के दौरान भी प्रतिदिन इस बाल रक्षा स्तोत्र का पाठ करें जब तक कि बच्चा 5 वर्ष का न हो जाए। Bal Raksha Stotra यह युति योग एक अच्छा योग माना जाता है। यह युति योग कभी-कभी कुंडली में बहुत अच्छा होता है। उपरोक्त सूचीबद्ध घरों में से किसी एक में यह युति; एक अच्छा निवास, वाहन, बहुत सारा पैसा देती है। ये लोग कला, अभिनय, चित्रकारी, गायन, कविता, ललित कला, सिलाई और कपड़े पर चित्रकारी में अच्छे होते हैं। ये लोग अच्छे कपड़े, सुगंध आदि पहनने के शौकीन होते हैं। ये खरीद-फरोख्त में अच्छे होते हैं। यदि यह युति सूर्य, शनि, हर्षल, नेपच्यून, राहु या केतु की दृष्टि में हो तो बुरी नज़र या कोई नेत्र रोग दर्शाता है।Bal Raksha Stotra यदि यह युति उपरोक्त ग्रहों के साथ 6वें, 8वें या 12वें भाव में हो तो व्यक्ति बुरी आदतों वाला होता है। मूला या कृतिका नक्षत्र में यह युति वैवाहिक जीवन में परेशानियों को दर्शाती है। बाल रक्षा स्तोत्र के लाभ: Bal Raksha Stotra इस बाल रक्षा स्तोत्र का जाप करने से व्यक्ति अपने बच्चे को बुरी नज़र, खराब स्वास्थ्य और कई अन्य अनचाही परिस्थितियों से बचा सकता है। बच्चे के विकास के लिए बिना किसी बाधा के इसका जाप करना चाहिए। किसको यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए: जिन लोगों का बच्चा बीमार है उन्हें इस बाल रक्षा स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। Bal Raksha Stotra अधिक जानकारी और बाल रक्षा स्तोत्र के विवरण के लिए कृपया एस्ट्रो मंत्रा से संपर्क करें। Bal Raksha Stotra | बालरक्षा स्त्रोत्र श्री गणेशाय नमः । अव्यादजोऽङ्घ्रि मणिमांस्तव जान्वथोरू यज्ञोऽच्युतः कटितटं जठरं हयास्यः । हृत्केशवस्त्वदुर ईश इनस्तु कण्ठं विष्णुर्भुजं मुखमुरुक्रम ईश्वरः कम् ॥ १॥ चक्र्यग्रतः सहगदो हरिरस्तु पश्चात् त्वत्पार्श्वयोर्धनुरसी मधुहाजनश्च । कोणेषु शङ्ख उरुगाय उपर्युपेन्द्रस् तार्क्ष्यः क्षितौ हलधरः पुरुषः समन्तात् ॥ २॥ इन्द्रियाणि हृषीकेशः प्राणान्नारायणोऽवतु । श्वेतद्वीपपतिश्चित्तं मनो योगेश्वरोऽवतु ॥ ३॥ पृश्निगर्भस्तु ते बुद्धिमात्मानं भगवान्परः । क्रीडन्तं पातु गोविन्दः शयानं पातु माधवः ॥ ४॥ व्रजन्तमव्याद्वैकुण्ठ आसीनं त्वां श्रियः पतिः । भुञ्जानं यज्ञभुक्पातु सर्वग्रहभयङ्करः ॥ ५॥ डाकिन्यो यातुधान्यश्च कुष्माण्डा येऽर्भकग्रहाः । भूतप्रेतपिशाचाश्च यक्षरक्षोविनायकाः ॥ ६॥ कोटरा रेवती ज्येष्ठा पूतना मातृकादयः । उन्मादा ये ह्यपस्मारा देहप्राणेन्द्रियद्रुहः ॥ ७॥ स्वप्नदृष्टा महोत्पाता वृद्धबालग्रहाश्च ये । सर्वे नश्यन्तु ते विष्णोर्नामग्रहणभीरवः ॥ ८॥ ॥ इति श्रीमद्भागवते दशमस्कन्धे गोपीकृतबालरक्षा समाप्ता ॥ बालरक्षा स्तोत्र

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Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri: महाशिवरात्रि: महासिद्धिदात्री का आध्यात्मिक महत्व

Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri:शास्त्र कहते हैं कि दुनिया में कई तरह के व्रत हैं, विभिन्न तीर्थ यात्राएँ, कई तरह के यज्ञ, विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ और जप आदि महाशिवरात्रि व्रत की बराबरी नहीं कर सकते। इसलिए सभी को अपने-अपने फायदे के लिए इस व्रत का पालन करना चाहिए। महाशिवरात्रि की पूजा करने का आशीर्वाद प्रदोषकाल के दौरान सबसे अच्छा माना जाता है। त्रयोदशी तिथि का अंत और चतुर्दशी तिथि की शुरुआत उनकी अंतिम अवधि है। किसी भी तिथि, वार, नक्षत्र, योग, कारण आदि और सुबह और शाम के सत्र को प्रदोषकाल कहा जाता है। वैसे तो हर महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को शिवरात्रि मनाई जाती है, लेकिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। भगवान शिव को प्रसन्न करने और अलग-अलग कामनाओं के लिए महाशिवरात्रि पर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri:जानिए उपवास के पीछे की आध्यात्मिकता? महाशिवरात्रि व्रत अत्यंत शुभ और दिव्य है। इससे अनित्य भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस शिवरात्रि व्रत को व्रतराज के नाम से जाना जाता है। लोगों को इस व्रत का पालन सुबह से लेकर रात तक त्रयोदशी की रात तक करना चाहिए। भगवान शंकर की पूजा रात्रि के चार घंटे में करनी चाहिए। इस विधि से जागरण पूजा करने से तीन पुण्य कर्म एक साथ हो जाते हैं और भगवान शिव की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है। यह व्यक्ति को जन्म के पापों से मुक्त करता है। इस दुनिया में आनंद प्राप्त करके, एक व्यक्ति अंत में शिव की आयु प्राप्त करता है। जीवन भर इस विधि में आस्था के साथ व्रत रखने से आपको भगवान शिव की कृपा से मनोवांछित फल मिलता है। Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri जो लोग इस विधि से व्रत करने में असमर्थ हैं, वे रात की शुरुआत में और आधी रात को भगवान शिव की पूजा करके व्रत को पूरा कर सकते हैं। शिवरात्रि में पूरी रात जागने से आपको महान परिणाम मिलते हैं। Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri परमदयालु भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित वर देते हैं। महाशिवरात्रि को ‘महासिद्धिदात्री’ कहा जाता है क्योंकि यह पर्व आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक सिद्धियों को प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है। हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का प्रतीक है, जो सृष्टि की रचनात्मक और संहारक शक्तियों के संतुलन को दर्शाता है। इस दिन की रात्रि को विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है, क्योंकि यह वह समय है जब शिव की कृपा और ऊर्जा अपने चरम पर होती है, जिससे भक्तों को साधना और तप के माध्यम से सिद्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था, जो शक्ति और शिव का एकीकरण दर्शाता है। यह एकीकरण भक्तों को यह संदेश देता है कि जीवन में संतुलन और सामंजस्य के साथ साधना करने से उच्चतम आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इस रात्रि को ‘सिद्धिदात्री’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस समय की गई साधना, ध्यान, जप और उपवास से व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने और आत्मिक उन्नति प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है। महाशिवरात्रि का महत्व योग और तंत्र साधना में भी विशेष है। इस दिन ग्रहों की स्थिति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा ऐसी होती है कि साधक के लिए ध्यान और तप का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। Why does Mahashivratri called Mahasiddhidatri मान्यता है कि इस रात्रि में भगवान शिव का रुद्राभिषेक, मंत्र जप और शिवलिंग पूजा करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है। इसके अतिरिक्त, महाशिवरात्रि का संबंध माता सिद्धिदात्री से भी जोड़ा जाता है, जो नवदुर्गा का नौवां स्वरूप हैं। सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियों की दात्री हैं। इस दिन उनकी पूजा और शिव की आराधना से भक्तों को सिद्धियों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार, महाशिवरात्रि न केवल शिव की भक्ति का पर्व है, बल्कि यह आध्यात्मिक साधना के लिए एक महान अवसर भी है, जो इसे ‘महासिद्धिदात्री’ की संज्ञा देता है।

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What is Khatu Shyam Nishan Yatra:फाल्गुन महीने में करें खाटू बाबा की निशान यात्रा, दूर भागेगा हर एक संकट !

What is Khatu Shyam Nishan Yatra:खाटू बाबा की ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, उनके बारे में एक नारा प्रचलित है ‘हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा।’ अर्ताथ अगर आप अपने जीवन में हर उम्मीद हार चुके है, तो बाबा खाटू वाले ही आपको सहारा दे सकते है। उनकी कृपा से हारी हुई बाजी भी जीत सकते है। What is Khatu Shyam Nishan Yatra राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर की काफी मान्यता है। खाटू बाबा के भक्त उन्हें कलयुग का श्री कृष्ण बताते है। What is Khatu Shyam Nishan Yatra खाटू बाबा की ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, उनके बारे में एक नारा प्रचलित है ‘हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा।’ अर्ताथ अगर आप अपने जीवन में हर उम्मीद हार चुके है, तो बाबा खाटू वाले ही आपको सहारा दे सकते है। उनकी कृपा से हारी हुई बाजी भी जीत सकते है।  खाटू वाले श्याम बाबा के दर्शन करने न सिर्फ देश बल्कि विदेशों से भक्त पहुंचते है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत के दौरान बर्बरीक नाम के योद्धा को श्री कृष्ण ने अपना नाम ‘खाटू श्याम’ दिया था, What is Khatu Shyam Nishan Yatra क्योंकि उसने भगवान द्वारा दी गई दिव्य दृष्टि से पूरा युद्ध दर्शन किया था। shri krishna barbarik श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा था कि, वह कलयुग में हारे का सहारा बनेंगे और उनके नाम खाटू श्याम से जानें जाएंगे। प्रतिवर्ष खाटू भक्त श्याम बाबा की निशान यात्रा निकालते हैं।  What is Khatu Shyam Nishan Yatra निशान यात्रा What is Khatu Shyam Nishan Yatra फाल्गुन मेले में निशान यात्रा का भी बहुत बड़ा महत्व है। निशान यात्रा एक तरह की पदयात्रा होती है जिसमे भक्त अपने हाथो में श्री श्याम ध्वज हाथ में उठाकर श्याम बाबा को चढाने खाटू श्याम जी मंदिर तक आते है। इसी श्री श्याम ध्वज को निशान कहा जाता है। मुख्यत यह यात्रा रींगस से खाटू श्याम जी मंदिर तक की जाती है जोकि 18 किमी की यात्रा है। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर की काफी मान्यता है। खाटू बाबा के भक्त उन्हें कलयुग का श्री कृष्ण बताते है। खाटू बाबा की ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, उनके बारे में एक नारा प्रचलित है ‘हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा।’ अर्ताथ अगर आप अपने जीवन में हर उम्मीद हार चुके है, तो बाबा खाटू वाले ही आपको सहारा दे सकते है। What is Khatu Shyam Nishan Yatra उनकी कृपा से हारी हुई बाजी भी जीत सकते है।  खाटू वाले श्याम बाबा के दर्शन करने न सिर्फ देश बल्कि विदेशों से भक्त पहुंचते है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत के दौरान बर्बरीक नाम के योद्धा को श्री कृष्ण ने अपना नाम ‘खाटू श्याम’ दिया था, What is Khatu Shyam Nishan Yatra क्योंकि उसने भगवान द्वारा दी गई दिव्य दृष्टि से पूरा युद्ध दर्शन किया था। श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा था कि, वह कलयुग में हारे का सहारा बनेंगे और उनके नाम खाटू श्याम से जानें जाएंगे। प्रतिवर्ष खाटू भक्त श्याम बाबा की निशान यात्रा निकालते हैं।  इस यात्रा के अंतर्गत भक्त अपनी श्रद्धा से अपने-अपने घर से भी शुरू करते हैं। What is Khatu Shyam Nishan Yatra ऐसा माना जाता है कि पैदल निशान यात्रा करके श्याम बाबा को निशान चढाने से बाबा शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना को पूर्ण करते हैं। श्याम बाबा को निशान क्यों चढ़ाते हैं? | श्याम बाबा को निशान अर्पण करने की महिमा: Why do we mark Shyam Baba? , Glory of offering Nishan to Shyam Baba: सनातन संस्कृति में ध्वज को विजय का प्रतीक माना जाता है। श्री श्याम बाबा के महाबलिदान शीश दान के लिए उन्हें निशान चढ़ाया जाता है। जिसमे उन्होंने धर्म की जीत के लिए दान में अपना शीश ही भगवान श्री कृष्ण को दे दिया था। निशान का स्वरूप: Format of mark निशान मुख्यतः केसरी, नीला, सफेद, लाल रंग का झंडा/ध्वज होता है। इन ध्वजाओं पर श्याम बाबा और भगवान श्री कृष्ण के जयकारे और दर्शन के फोटो होते है। कुछ निशानों पर नारियल एवं मोरपंखी भी लगी होती है। इसके सिरे पर एक रस्सी बंधी होती है जिससे यह निशान हवा में लहराता है। वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत अनेक भक्त अब सोने-चांदी के भी निशान श्याम बाबा को अर्पित करने लगे हैं। निशान यात्रा में ध्वज का रंग(Khatu Nishan Yatra Dhwaj Rang)  खाटू नरेश बाबा श्याम की निशान यात्रा में केसरिया, नीला, सफेद और लाल रंग का ध्वज इस्तेमाल होता है। इन ध्वज पर खाटू श्याम और भगवान श्री कृष्ण का चित्र बना होता है। साथ ही कई पताकाओं पर बाबा के जयकारे लिखे होते हैं और कई पर नारियल और मोरपंखी लगे होते है। 

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Method of Kanya Pujan in Navratri:कन्या पूजन कैसे करना चाहिए ? जानिए इसका सही तरीका और महत्व

Method of Kanya Pujan in Navratri:नवरात्रि में विधि-विधान से मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इसके साथ ही अष्टमी और नवमी तिथि को बहुत ही खास माना जाता है, क्योंकि इन दिनों कन्या पूजन का भी विधान है। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि में कन्या की पूजा करने से सुख-समृद्धि आती है। इससे मां दुर्गा शीघ्र प्रसन्न होती हैं। पूजन के लिए आमंत्रित छोटी लड़कियों (कन्याओं) को कंजक / कंजकें भी कहा जाता है, अतः यह पूजा कंजक पूजन के नाम से भी प्रसिद्ध है। कन्या पूजन को कंजक पूजा के नाम से भी जाना जाता है। Method of Kanya Pujan in Navratri इस दौरान नौ छोटी लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ अवतारों के रूप में पूजा जाता है, जिन्हें नवदुर्गा भी कहा जाता है। तो आइए कन्या पूजन विधि और इससे जुड़ी कुछ बातों को जानते हैं Kanya Pujan कन्या पूजन / कंजक पूजा का शुभ मुहूर्त Navratri:नवरात्रि में अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन करना शुभ माना जाता है। शुभ मुहूर्त में कन्या की पूजा करना शुभ रहेगा। Method of Kanya Pujan in Navratri:कन्या पूजन की विधि अष्टमी के दिन कन्या की पूजा करने के लिए सबसे पहले सुबह उठकर स्नान कर लें।स्नान करने के बाद सबसे पहले विधि अनुसार भगवान गणेश और महागौरी की पूजा करें।कन्या पूजा के लिए दो साल से लेकर 10 साल तक की 9 लड़कियों और एक लड़के को घर पर बुलाएं। कन्याओं के पैर धोने के बाद उनके हाथों में रोली, कुमकुम और अक्षत का टीका लगाकर मौली बांधें। अब कन्या और बालक को दीप दिखाकर आरती उतारकर यथासम्भव उन्हें अर्पित करें। Method of Kanya Pujan in Navratri आमतौर पर कन्या पूजन के दिन लड़कियों को पुरी, चना और हलवा खाने के लिए दिया जाता है।भोजन के बाद लड़कियों को यथासंभव उपहार दिए जाते हैं। इसके बाद पैर छूकर उन्हें आशीर्वाद दें और मां की स्तुति करते हुए गलती के लिए माफी मांगें। उसके बाद, उन्हें आतिथ्य सत्कार के साथ विदा करें। Importance of Kanya Puja:कन्या पूजा का महत्व कन्या पूजन कन्याओं का सम्मान और पूजा करने का एक उत्तम तरीका है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कुमारी पूजा के लिए दो से दस साल की कन्या उपयुक्त होती हैं। दो से दस वर्ष तक की कन्याएं मां दुर्गा के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके अलावा लंगूर के रूप में एक लड़के को भी इस पूजा में शामिल किया जाता है, जिसे भैरव बाबा व हनुमान जी का प्रतीक माना जाता है। Significance Of Kalash: सुख-समृद्धि का प्रतीक है कलश, जानिए इसके चमत्कारी लाभ Significance Of Kalash: हिंदू संस्कृति में कलश का विशेष महत्व है। कलश के गोल आकार को गर्भ के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जो प्रचुरता और जीवनदायी ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। Method of Kanya Pujan in Navratri इसका उपयोग सनातन धर्म के सभी शुभ कार्य में किया जाता है। कहा जाता है कि कलश के बिना कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है। तो चलिए इसके महत्व और इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य के बारे में जानते हैं, जो इस प्रकार हैं symbol of happiness and prosperity:सुख-समृद्धि का प्रतीक कलश प्रचुरता, समृद्धि और आध्यात्मिक पवित्रता का आधार है। यह आमतौर पर पवित्र गंगा नदी के पानी से भरा होता है, जो अपने जीवनदायी और शुद्ध करने वाले गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं। कलश के भीतर मौजूद यह जल उस दिव्य ऊर्जा का प्रतीक है, Method of Kanya Pujan in Navratri जिसके बारे में कहा जाता है कि यह सभी प्रकार के दुखों को दूर करता है। हिंदू परंपराओं में जल, दिव्य ऊर्जा और जीवन और सृजन के चल रहे चक्र के बीच पवित्र संबंध को उजागर करता है। Benefits of installing Kalash:कलश स्थापित करने के लाभ कलश धार्मिक अनुष्ठानों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसे शादियों, पूजा- पाठ आदि में शुभता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाता है। इसके साथ ही यह सुरक्षात्मक के रूप में भी कार्य करता है। Method of Kanya Pujan in Navratri मान्यताओं के अनुसार, कलश के प्रभाव से सकारात्मक शक्तियों का घर में वास होता है और जीवन से नकारात्मकता समाप्त होती है। इसके अलावा इसका प्रयोग जीवन में धन, वैभव, सुख- शांति की कमी नहीं होने देता है। Method of Kanya Pujan in Navratri इसलिए ज्योतिष शास्त्र में भी इसे बेहद शुभ माना गया है।

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What is Karma? – Explained by Hindu Scriptures (Vedas, Gita & Upanishads)

🔱 Introduction: More Than “What Goes Around Comes Around” In today’s spiritual circles, “karma” is often misunderstood as mere cause and effect. But in Hindu Dharma, Karma (कर्म) is a vast and profound concept — one that shapes your birth, actions, destiny, and liberation. Let’s decode what ancient Hindu scriptures say about Karma — not just as a law, but as a spiritual truth governing the soul’s journey. 📖 What is Karma in Hinduism? Karma means “action” in Sanskrit. It comes from the root ‘Kri’ which means to do.In simple terms: Every action (physical, verbal, or mental) creates an energy imprint that influences future experiences. 🔹 3 Types of Karma (As per the Bhagavad Gita): 🪔 “You are not punished for your karma, you are punished by your karma.” 📜 What Hindu Scriptures Say: 🕉️ 1. Vedas on Karma: The Rigveda (10.117.6) says: “One who gives, receives back; one who helps, is helped.”→ This shows that even the Vedas emphasized reciprocal cosmic justice. 📚 2. Bhagavad Gita on Karma Yoga: Lord Krishna says in Chapter 2, Verse 47: “Karmanye vadhikaraste, Ma phaleshu kadachana”(You have a right to perform your duty, but not to the fruits of your actions) ✅ The Gita teaches selfless action (Karma Yoga) as the path to liberation.🚫 Action with desire (Kama) binds you. Action with surrender (Bhakti) liberates you. 🔮 3. Upanishads on Karma: The Brihadaranyaka Upanishad (4.4.5) states: “As a man acts, so does he become. A man of good acts will become good; a man of bad acts, bad.” 💡 Here, karma is not just about rewards — it is about soul transformation. 🌿 Why Understanding Karma Matters Today 🔔 Karma in Daily Life – A Vedic Approach 🌺 In Sanatan Dharma, Karma is not fate — it is freedom through awareness. 🙏 How to Purify Your Karma? 🌍 KARMASU’s Vedic Karma Services (For Global Audience) ✨ Karmic Healing Puja✨ Personalized Karma Report (Birth Chart Analysis)✨ Maha Mrityunjaya Jaap for Karma Shuddhi✨ Guided Karma Yoga Routine with Mantras 🕉️ Join our Global Digital Satsang & Puja Experience – Only on KARMASU.

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Lord Brahma:आखिर कैसे हुई ब्रह्मा जी की उत्पत्ति,ब्रह्मा जी ने कैसे की थी सृष्टि की रचना? जानें इसके पीछे की खास कथा

Lord Brahma:सनातन धर्म में भगवान ब्रह्मा एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा tridev त्रिदेवों में से एक हैं जो सृष्टि के सृजन का कार्यभार संभालते हैं। सृष्टि के सृजन के लिए ही उन्होंने मानस पुत्रों को भी जन्म दिया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है खुद उनका जन्म कैसे हुआ। Lord Brahma: सनातन धर्म में ब्रह्मा जी को सृष्टि के सृजनकर्ता के रूप में जना जाता है। वह त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश (भगवान शिव) में से एक हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रिदेव के पास सृष्टि के सृजन, संतुलन और विनाश करने का कार्यभार है। लेकिन आपके मन में यह सवाल जरूर उठता होगा कि जिसने इस पुरी सृष्टि का सृजन किया है खुद उनका जन्म कैसे हुआ। आइए जानते हैं कि ब्रह्मा जी के जन्म को लेकर शिव पुराण में क्या कहा गया है।  How did Brahma ji come into existence:कैसे हुई ब्रह्मा जी की उत्पत्ति पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा जी की उत्पत्ति क्षीरसागर में विराजमान भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल के द्वारा हुई थी। इसलिए वह स्वयंभू भी कहे जाते हैं। ब्रह्मा जी के 4 मुख होने के पीछे ये कारण बताया जाता है कि जब उनकी उत्पत्ति हुई तो उन्होंने अपने चारों और देखा जिस कारण उनके चार मुख हो गए। वहीं, शिवपुराण में कथा मिलती है कि एक बार ब्रह्मा जी अपने पुत्र नारद जी से कहते हैं कि विष्णु को उत्पन्न करने के बाद सदाशिव और शक्ति ने पूर्ववत प्रयत्न करके मुझे (ब्रह्माजी को) अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया और तुरंत ही मुझे विष्णु के नाभि कमल में डाल दिया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में मेरा जन्म हुआ। क्यों पड़ा ब्रह्मा नाम:Why was he named Brahma? भारतीय दर्शन शास्त्र के अनुसार, जो निर्गुण (जो तीनों गुणों -सत्व, रज और तम से से परे हो) निराकार और सर्वव्यापी है वह ब्रह्म कहलाता है। इसलिए ये सभी गुण होने के कारण उन्हें ब्रह्मा नाम से पुकारा जाता है। साथ ही ब्रह्मा जी को स्वयंभू, विधाता, चतुरानन आदि नामों से भी जाना जाता है। ब्रह्मा जी के रोचक तथ्य:Interesting facts about Brahma Ji Lord Brahma ब्रह्मा जी ने अपने हाथों में क्रमशः वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, वेद और कमण्डलु धारण किए हुए हैं। ब्रह्मा जी का वाहन हंस माना जाता है। ब्रह्मा जी की पत्नी का नाम सावित्रि है। देवी सरस्वती को उनकी पुत्री माना जाता है। भगवान विष्णु की प्रेरणा से देवी सरस्वती को Lord Brahma ब्रह्मा जी ने ही सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान कराया था। सभी देवताओं को Lord Brahma ब्रह्मा जी का पौत्र माना गया है। यही कारण है कि उन्हें पितामह भी कहा जाता है। ब्रह्मा जी देवता, दावन तथा समस्त जीवों के पितामह माने जाते हैं। Lord Brahma:ब्रह्मा जी ने कैसे की थी सृष्टि की रचना? जानें इसके पीछे की खास कथा सनातन धर्म के अनुसार, ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता माना जाता है. उन्होंने जल का छिड़काव करके एक विशाल अंड का निर्माण किया, जिसमें सदाशिव ने अपनी चेतना प्रवाहित की. इसी चेतना से विभिन्न अंग उत्पन्न हुए और उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी को आवृत कर लिया. इसके उपरांत, ब्रह्मा जी ने सृष्टि की संरचना प्रारंभ की. ब्रह्म पुराण में भी इस बात का जिक्र है कि सृष्टि का जन्म Lord Brahma ब्रह्मदेवता द्वारा हुआ है. सत्यार्थ नायक की ‘महागाथा’ किताब के जरिए जानते हैं कि आखिर ब्रह्मा जी ने किस तरह से सृष्टि की रचना की थी और इसके पीछे की क्या कथा है? सृष्टि में केवल परब्रह्म था. वह एक सर्वोच्च सिद्धांत (तत्त्व) था जिसका ना कोई आरंभ था, ना अंत. वह परम सत्य था जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता. वह एक दिव्य सार-तत्त्व था जिसके भीतर अनंत क्षमता मौजूद थी. कारण और प्रभाव मिलकर एक हो गए थे. Lord Brahma उसका आकार नहीं था किंतु वह निराकार भी नहीं था. उसमें कोई गुण नहीं था किंतु वह गुणों से रहित भी नहीं था. विचारों और इंद्रियों की पहुंच से परे से वह एक विशुद्ध चेतना थी. एक ऐसा उत्प्रेरक, जो खुद तो परिवर्तित नहीं होता किंतु हर तरह का परिवर्तन ला सकता था. परब्रह्म की इच्छा हुई तभी भौतिक ब्रह्मांड का निर्माण आरंभ हुआ. ब्रह्मांड प्रकट होने को तैयार था. परब्रह्म की इस इच्छा ने एक कंपन पैदा किया जिससे पहली ध्वनि का जन्म हुआ और वह ध्वनि थी-ओम (ऊं). इस एक ध्वनि में समस्त ध्वनियां समाहित थीं. सबसे पहले बनने वाले मूल तत्त्व को महत् तत्त्व कहा गया, जिससे तीन गुणों की उत्पत्ति हुई. सत्व गुण- जो संरक्षण का प्रतीक है, रजो गुण- जो क्रिया को दर्शाता है और तमो गुण- जो विनाश का सूचक है. इन तीन गुणों के पारस्परिक प्रभाव से पांच भौतिक तत्त्वों यानी पंचतत्त्व का जन्म हुआ. वायु, जल, पृथ्वी, अग्नि और आकाश. इन तत्त्वों के साथ में मिलने से प्रकृति अस्तित्व में आई. इन गुणों ने पांच इंद्रियों को भी उत्पन्न किया. दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, गंध और स्वाद. इन पांचों को महसूस करने के लिए पांच ज्ञानेन्द्रियां विकसित हुईं जिन्हें मन द्वारा संचालित किया गया. पदार्थ की उत्पत्ति के साथ संवेदना प्रकट हुई. इसके बाद जल प्रवाहित हुआ जिसने सब कुछ ढक लिया. हर जगह केवल जल था किंतु ऐसा कुछ नहीं था जो उस जल में डूब जाता. तब परब्रह्म ने स्वयं एक दिव्य स्वरूप धारण किया जो जल से भरे सरोवर में कमल-दल बनकर प्रकट हुआ. जल को ‘नार’ और निवास को ‘अयन’ कहते हैं. इस तरह इस दिव्य स्वरूप को नाम मिला- नारायण. फिर परब्रह्म ने अपना अंश जल में प्रत्यारोपित किया. इस तरह जल ने स्वयं निषेचित होकर उस अंश का पालन-पोषण किया. एक सुनहरा अंड, जो प्रकाश-वृत्त की तरह चमक रहा था. चूंकि यह अंड, परब्रह्म से उत्पन्न हुआ इसलिए इसे ‘ब्रह्मांड’ कहा गया. फिर नारायण ने विष्णु बनकर इस अंड में प्रवेश किया. जिसमें विष्णु सर्वव्यापी थे और वे संरक्षक कहलाए, उन्हें सत्त्व गुण का अधिष्ठाता माना गया. चूंकि उस सुनहरे वृत्त अर्थात् हिरण्य ने विष्णु को गर्भ की तरह ढक लिया था इसलिए उस अंड को नाम मिला- हिरण्यगर्भ. विष्णु की नाभि से चौदह पंखुड़ियों वाला एक कमल-पुष्प निकला और फिर इस पुष्प से ब्रह्मा प्रकट हुए. यह परब्रह्म की एक और

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