Sapne Me Shivling Dekhna: सपने में शिवलिंग की पूजा करने का मतलब जानिए, इस मामले में होता है बेहद लाभकारी

Sapne Me Shivling Dekhna :सपने में भगवान शिव की मूर्ति देखना या फिर शिवलिंग देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि सपने में भोलेनाथ का किसी भी रूप में दिखना जीवन में बहुत से आश्‍चर्यजनक परिवर्तन लाने वाला माना जाता है। सपने में शिवलिंग का जलाभिषेक करना या फिर पूजा करने के अर्थ है कि आपके जीवन में किस अति महत्‍वपूर्ण कार्य के शुभ परिणाम मिल सकते हैं। आइए जानते हैं भगवान शिव से जुड़े ऐसे ही कुछ सपनों का अर्थ। Swapna Shastra : अगर आप भगवान शिव के परम भक्‍त हैं और आप खुद को सपने में शिवलिंग की पूजा करते हुए देखते हैं तो यह बहुत ही शुभ संयोग माना जाता है। सपने में शिवजी के दर्शन करना आपके जीवन में तरक्‍की के शुभ संकेत और मनोकामना पूर्ण होने के संकेत देता है। आइए जानते हैं शिवजी का आपके सपने में विभिन्‍न रूपों में नजर आना क्‍या बताता है। Sapne Me Shivling Dekhna:सपने में शिवलिंग का दिखना सपने में यदि आपने शिवलिंग को देखा तो यह बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा मानते हैं कि यदि सपने में आपको शिवलिंग दिखाई दे तो निजी जीवन में आपका कोई बहुप्रतीक्षित कार्य बनने वाला है। ऐसा कहते हैं Sapne Me Shivling Dekhna कि आपको उस कार्य में सफलता मिलना तय और भोले बाबा का हाथ आपके ऊपर है। Sapne Me Shivling Dekhna सपने में शिवलिंग की पूजा करते देखना यदि आपने सपने में खुद को शिवलिंग की पूजा करते देखा है तो समझ लीजिए आपके जीवन से सभी प्रकार के अशुभ तत्‍वों का नाश होने वाला है। ऐसा सपना अच्‍छा समय आने का और पुरानी परेशानियां दूर होने का संकेत देता है। यह सपना किसी की अधूरी इच्‍छा पूरी होने का और मनोकामना पूर्ति का संकेत देता है। सपने में सपरिवार भगवान शिव की पूजा करना यदि आप खुद को अपने परिवार के साथ शिवजी Sapne Me Shivling Dekhna की पूजा करते देखते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि आप अपने काम में पूरे त्‍याग, समर्पण और ईमानदारी के साथ लगे रहते हैं। ऐसा सपना आना बताता है कि कार्यक्षेत्र में आपकी आने वाली परेशानियां जल्‍द ही दूर होने वाली हैं। आपके जीवन में सुख समृद्धि और सौभाग्‍य आने वाला है। ऐसा सपना उन्‍नति और सुख सौभाग्‍य का प्रतीक माना जाता है। सपने में सफेद शिवलिंग देखना अगर आपको सपने में यदि सफेद शिवलिंग के दर्शन हों तो यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आने वाले वक्‍त में आपको या फिर आपके परिवार के किसी सदस्‍य को गंभीर रोग से छुटकारा मिल सकता है और आपके जीवन में कुछ अच्‍छा होने वाला है। सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना भी असल जीवन में बहुत ही शुभ संकेत देता है। इसका अर्थ है कि आप अपने जीवन में सुख शांति की ओर बढ़ रहे हैं। संघर्ष का दौर आपके जीवन से समाप्‍त होने वाला है और जल्‍द ही आपके जीवन में स्‍थायित्‍व आने वाला है और सब कुछ आपके अनुसार होने वाला है।

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Mahashivratri 2025: महाशिवरात्रि की रात जागने से क्या होता है?

Mahashivratri 2025: हिंदू धर्म शास्त्रों में महाशिवरात्रि का दिन बड़ा ही पावन और विशेष माना गया है. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. इसलिए इस दिन भोलेनाथ का पूजन और व्रत किया जाता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव के पूजन और व्रत से भकतों की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. Mahashivratri 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह साल का अंतिम महीना होता है. हिंदू धर्म शास्त्रों में ये महीना भगवान महादेव को समर्पित किया गया है. इसी महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पड़ती है. Mahashivratri 2025 महाशिवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का पूजन और व्रत किया जाता है. इस दिन व्रत और पूजन करने से भगवान शिव सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. Mahashivratri 2025 Kab hai:महाशिवरात्रि कब है ? हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 26 फरवरी को सुबह 11 बजकर 8 मिनट पर शुरू होगी. वहीं 27 फरवरी को सुबह 8 बजकर 54 मिनट प इस तिथि का समापन होगा. ऐसे में महाशिवरात्रि 26 फरवरी को मनाई जाएगी. इस दिन इसका व्रत रखा जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार… हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि पर पूरी रात जागकर भगवान शिव की आराधना और जागरण किया जाता है. महाशिवरात्रि की रात में जागरण करने का अध्यामिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है, आइए जानते हैं. महाशिवरात्रि की रात का धार्मिक महत्व महाशिवरात्रि के दिन भोलेनाथ वैराग्य जीवन छोड़कर मां पार्वती के साथ विवाह के बंधन में बंधे थे. इस दिन माता पार्वती और भोलेनाथ रात में भ्रमण पर निकलते हैं. ऐसे में जो लोग रात्रि जागरण कर महादेव की आराधना करते हैं Mahashivratri 2025 उनके समस्त दुख दूर होते हैं और जीवन में खुशियों का आगमन होता है.  महाशिवरात्रि की रात का वैज्ञानिक महत्व महाशिवरात्रि की रात में ब्रह्माण्ड में ग्रह और नक्षत्रों की ऐसी स्थिति होती है जिससे एक खास ऊर्जा का प्रवाह होता है. इस रात ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर जाने लगती है यानी प्रकृति स्वयं मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद कर रही होती है. Mahashivratri 2025 इसलिए  महाशिवरात्रि की रात में जागरण करने व रीढ़ की हड्डी सीधी करके ध्यान मुद्रा में बैठने की बात कही गई है. Mahashivratri 2025 Puja Vidhi महाशिवरात्रि पूजा विधि महाशिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और शुभ मुहूर्त में ही पूजा करें. इस दिन रात्रि के चारों प्रहर में भी पूजा की जाती है. लेकिन निशिता मुहूर्त में पूजा करना सबसे शुभ होता है. पूजा के लिए साफ कपड़े पहन लें और शिव-पार्वती का ध्यान करें. आसन लेकर बैठ जाएं. एक साफ स्थान पर चौकी रखें और सफेद का कपड़ा बिछाएं.  चौकी के ऊपर शिव पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें. आप मंदिर जाकर भी शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं.  सबसे पहले शिवलिंग का गंगाजल, कच्चे दूध, गन्ने के रस, दही आदि से अभिषेक करें. फिर घी का दीपक जलाकर विधि-विधान से शिवजी और मां पार्वती का पूजन करें. शिवजी को चंदन का टीका लगाएं और उन्हें बेलपत्र, भांग, धतूरा, फूल, मिष्ठान आदि सभी सामग्रियां अर्पित करें. माता पार्वती को भी सिंदूर लगाएं और उनका पूजन करें.  साथ ही पार्वती जी को सुहाग का सामान भी अर्पित करें. अब भगवान को भोग लगाएं और फिर शिवजी की आरती करें. इस दिन शिवजी के प्रिय मंत्रों का जाप भी जरूर करें. Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Devyapradh Kshamapan Stotra:देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम्

Devyapradh Kshamapan Stotra (देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम्) Devyapradh Kshamapan Stotra:न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम ॥१॥ विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥ पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥ जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥ परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पच्चाशीतेरधिकमपनीते Devyapradh Kshamapan Stotra तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम ॥५॥ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥ चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम ॥७॥ न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे Devyapradh Kshamapan Stotra जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥ नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥ आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥ जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम ॥११॥ मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥ ॥इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्॥

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वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:इस मंदिर को विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है, जो अभी मथुरा के वृंदावन में अंडर कंस्ट्रक्शन है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर, भारत के उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के वृन्दावन शहर का एक ऐतिहासिक मंदिर है। इस मंदिर को विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है, जो अभी मथुरा के वृंदावन में अंडर कंस्ट्रक्शन है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर परिसर करीब 26 एकड़ में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई 700 फीट है। इस मंदिर में वर्ष भर में आने वाले विभिन्न तरह के धार्मिक पर्वों और त्योहारों को मनाया जाएगा। आने वाले समय में यह मंदिर हिन्दूओं के लिए एक बहुत बड़ा दर्शनिक स्थान होगा। मंदिर का इतिहास वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का निर्माण कार्य 2014 में शुरू हुआ। इस मंदिर की नीव का पहला पत्थर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी द्वारा रखा गया था। वर्तमान समय में इस मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जिसके पुरे होने की संभावना 2024 से 2025 के बीच में है। इसका निर्माण कार्य पूरा होते ही यह मंदिर सभी श्री कृष्ण भक्तों के लिए खोल दिया जायेगा। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर की संरचना में आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियर डिपार्टमेंट के इंजिनियर लगे हुए हैं, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जिनके स्ट्रक्चरल कंसलटेंट संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के थोर्नटन टॉमसटी हैं। इस मंदिर के निर्माण के लिए मुख्य आर्केटेक्ट के रूप में गुरुग्राम की कंपनी InGenious Studio प्राइवेट लिमिटेड और नोएडा स्थित क्विंटेस्सेंस डिजाईन स्टूडियो काम कर रही है। मंदिर का महत्व वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का मुख्य आकर्षण एक कैप्सूल एलिवेटर होगा, जो आगंतुकों को शीर्ष पर ले जाएगा जहां से आप पुरे ब्रज मंडल के विहंगम दृश्य का आनंद ले सकेंगे। मंदिर के निर्माण की कुल लागत लगभग 300 करोड़ होगी, जिस कारण यह दुनिया का सबसे महंगा मंदिर बन जाएगा । वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर मंदिर परिसर के चारों ओर 12 वनों का नाम ब्रज मंडल के 12 उद्यानों के नाम पर रखा जाएगा, जो इस प्रकार हैं- महावन, वृंदावन, लोहावन, काम्यवन, कुमुदवन, तलवन, भांडीरावण, मधुवन, कुमुदवन, बहुलवन, बिल्ववन और भद्रवन। मंदिर की वास्तुकला वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का निर्माण आधुनिक डिजाइन के साथ एक पारंपरिक नागर शैली की वास्तुकला के अनुसार किया जा रहा है। यह मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा धार्मिक स्थल बनने जा रहा है, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जो लगभग 700 फीट ऊंचा और 213 मीटर लंबा होगा। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर परिसर लगभग 26 एकड़ भूमि के क्षेत्र में बनेगा। इस परिसर के चारों ओर हरे-भरे जंगल बनाए जा रहे हैं। इस जंगल को फल-फूल के वृक्षों, झरनों और छोटी-छोटी कृत्रिम पहाड़ियों से बनाया जायेगा, यहां पर श्री कृष्ण काल के वर्णन के अनुसार सब कुछ निर्मित किया जाएगा। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:00 PM दोपहर में मंदिर खुलने का समय 01:00 PM – 08:00 PM

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हर की पौड़ी:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

‘हर की पौड़ी’ या ब्रह्मकुंड के एक पत्थर में श्रीहरि के पदचिह्न स्थापित है। उत्तराखंड के शहर हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी एक अत्यंत प्रतिष्ठित और पवित्र स्थल है। इस स्थान का हिंदू पौराणिक कथाओं में अत्यधिक धार्मिक महत्व है। ‘हर की पौरी’ नाम का सामान्य अर्थ है “भगवान श्री हरि विष्णु के चरण” । इसे पवित्र गंगा नदी के तट पर सबसे पवित्र स्नान घाटों में से एक माना जाता है। इस धार्मिक स्थल को वह बिंदु भी माना जाता है जहां पवित्र गंगा पहाड़ों से निकलकर मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। प्राचीन वैदिक काल के अनुसार, माना जाता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों ही हर की पौरी आये थे। जिस कारण यह स्थान अत्यधिक पवित्र स्थान के रूप में परिवर्तित हो गया है। मंदिर का इतिहास किंवदंतियों के अनुसार, बताया जाता है कि हर की पौड़ी का निर्माण पहली शताब्दी ईसा पूर्व में राजा विक्रमादित्य द्वारा किया गया था। राजा विक्रमादित्य ने इस घाट को अपने भाई भतृहरि की श्रद्धांजलि के रूप में निर्मित करवाया था। क्योंकि भतृहरि पवित्र गंगा के तट पर ध्यान करते थे। हर की पौड़ी की सीढ़ियों पर कई मंदिर बनाए गए जिनका निर्माण 19वीं सदी में हुआ। 1938 में, घाटों का प्रारंभिक विस्तार किया गया, जिसे उत्तर प्रदेश के आगरा के जमींदार पंडित हरज्ञान सिंह कटारा द्वारा बनवाया गया था। इसके बाद, 1986 में, घाटों का नवीनीकरण भी हुआ। ऐसा भी बताया जाता है कि हर की पौड़ी पर राजा श्वेत ने भगवान् ब्रह्मा की तपस्या की थी। उनकी तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी ने वरदान मांगने को कहा। इस पर राजा ने इच्छा रखी कि इस स्थान को भगवान के नाम से जाना जाए। तब से हर की पौड़ी को ‘ब्रह्म कुण्ड’ भी कहा जाता है। मंदिर का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मन्थन होने के बाद अमृत के लिए देव और दानव झगड़ रहे थे तब उनसे बचाकर धन्वंतरी अमृत ले जा रहे थे तो अमृत की कुछ बूँदें पृथ्वी पर गिर गई और वह जगहें धार्मिक स्थान बन गए। हरिद्वार में भी अमृत की बूँदे गिरी थीं वह स्थान हर की पौड़ी था। ऐसा माना जाता है कि यहाँ पर स्नान करने से मोक्ष प्राप्त होता है। यहाँ से ही भक्त जल भरकर अपने घर ले जाते हैं जिसे गंगा जल कहते हैं। मंदिर की वास्तुकला हर की पौड़ी एक बहुत ही सुन्दर घाट है। जो गंगा नदी के तट पर बना हुआ है। यहाँ पर भक्त गंगा स्नान के लिए आते हैं। घाट के पास ही बहुत छोटे छोटे मंदिर बने हुए हैं। हर की पौड़ी के घाट पर ही प्रसिद्ध ” ब्रह्म कुंड” बना हुआ है। इस घाट के एक पत्थर की दीवार पर एक बड़ा पदचिह्न है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह भगवान विष्णु के चरण है। बहुचर्चित शाम की गंगा आरती भी यहां आयोजित की जाती है, जो दुनिया भर से हजारों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है। घाट के थोड़ी थोड़ी दूरी पर नारंगी और सफ़ेद रंग के जीवन रक्षक टावर भी लगाए गए है। जो कि निगरानी के लिए है। ताकि गंगा के तेज बहाव में कोई श्रद्धालु बह न जाएँ। मंदिर का समय गर्मियों के दौरान सुबह की आरती का समय 05:30 AM – 06:30 AM सर्दियों के दौरान सुबह की आरती का समय 06:30 AM – 07:30 AM गर्मियों के दौरान शाम की आरती का समय 06:30 PM – 07:30 PM सर्दियों के दौरान शाम की आरती का समय। गंगा आरती में उपस्थित रहने के लिए आपको आरती से कम से कम आधे घंटे पहले पहुंचना चाहिए। ताकि आप सरलता से आरती के दर्शन कर सकें। 05:30 PM – 06:30 PM

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कांच मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

कांच मंदिर:जैन समाज के कांच मंदिर में सभी धर्मों और समाज के लोग दर्शन करने आते हैं। कांच मंदिर:भारत के मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में कांच मंदिर स्थित है। ना केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी मशहूर है। 102 साल पुराने इस मंदिर का पूरा इंटीरियर कांच से किया गया है यानी छत से लेकर, खंभे, दरवाज़े, खिड़कियां, झूमर सबकुछ कांच का बना हुआ है। जैन समाज के कांच मंदिर में सभी धर्मों और समाज के लोग दर्शन करने आते हैं। साथ ही के बेहतरीन बनावट के दर्शन के साथ इसकी खूबसूरती को निहारते ही रह जाते हैं। मंदिर का इतिहास बनाने की शुरुआत करीब 1913 में इंदौर के सर सेठ हुकुमचंद ने की थी। श्री विक्रम सवंत 1978 मिति आषाढ़ सुदी 7 सोमवार सन 1921 में इसमें मूर्ति स्थापना कि गई । कांच मन्दिर बनाने वाले सर सेठ हुकुमचंद ने अपना निजी मन्दिर बनाए जाने के उद्देश्य से इसे बनवाया था, लेकिन ये सभी लोगों के लिए खुला था। सेठ हुकुमचंद ने कांच मंदिर को बनवाने में करीब 1 लाख 62 हज़ार रुपये खर्च करीब 250 कारीगरों से बनवाया था। पूरे मंदिर में बनाई गई अद्भुत कलाकृतियों में जैन धर्म के विषय में बताया गया है। मंदिर का महत्व कांच मंदिर को छत से लेकर ज़मीन तक पूरा कांच का बनाया गया है। इसमें जैन समाज के सभी गुरु और मुनियों की कलाकॄति के साथ धर्म के विषय में भी खूबसूरत नक्काशी की गई है। कांच मंदिर में स्थापित भगवान शांतिनाथ के काली संगरमरमर की मूर्ति राजस्थान से गई थीं। इस मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो पाई इसलिए इसे चेतालय कहा जाता है। में रखा सोने का रथ और पालकी महावीर जयंती पर निकाला जाता था। मंदिर की वास्तुकला कांच मंदिर में श्री चंद्रप्रभा भगवान एवं बाईं और आदिनाथ भगवान विराजे है। शांतिनाथ भगवान कि मूर्ति काले पत्थर कि बनी है, जिसे जयपुर में बनवाया गया, जिसमें अन्दर सारा कार्य कांच का किया हुआ है। यह कांच बेल्जियम से मंगाया गया था व खम्भे लाल पत्थर के है इसका दरवाजा लकड़ी का बना हुआ है। उस पर चाँदी कि परत लगाई गई है। इस मंदिर में कि गयी कारीगरी देखते ही बनती है यहाँ पर कारीगरी और कांच कि नक्काशी ईरान और जयपुर के कारीगरों द्वारा कि गई है | इस मंदिर में कि गयी कांच कि नक्काशी और कारीगरी के कारण यहाँ 3D प्रभाव आता है। मंदिर की की इमारत में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं है बल्कि चूने से पत्थर की जुड़ाई की गई है। इसका आर्किटेक्ट खुद सेठ हुकुमचंद ने किया था। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 10:00 AM – 05:00 PM

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तक्षकेश्वर नाथ:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

प्रयागराज में इस स्थल को “बड़ा शिवाला” के नाम से जाना जाता है। तक्षकेश्वर नाथ मंदिर, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज जिले में स्थित है। संगम नगरी में यमुना किनारे तक्षकेश्वर नाथ मंदिर विश्व का एकलौता तक्षक तीर्थ स्थल है। वर्तमान में यह स्थान प्रयागराज शहर के दक्षिणी क्षेत्र में दरियाबाद मुहल्ले में स्थित है। यह स्थल आदिकाल से संरक्षित है और यहां शेषनाग के अवशेष आज भी मौजूद है। यह यमुना तट पर विशाल घने जंगलों में स्थापित शिवलिंग था। हालांकि यहां अब जंगल का अस्तित्व खत्म हो गया है। प्रयागराज में इस स्थल को “बड़ा शिवाला” के नाम से जाना जाता है। मंदिर का इतिहास तक्षकेश्वर नाथ मंदिर का इतिहास 5,000 साल से भी ज्यादा पुराना है। तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग की प्राचीनता और पौराणिकता स्वयं पुराणों में दर्ज है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा परीक्षित को जब तक्षक नाग ने डसा था, तब उस घटना के प्रायश्चित में इन पांचों मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी और वरदान दिया गया था कि जो कोई भी इस मंदिर में जाकर दर्शन करेगा, उसके वंशजों को कभी सर्प की विष बाधा नहीं होगी। पुराणों की माने तो तक्षक संपूर्ण सर्पजाति के स्वामी हैं। आदिकाल से यह धर्म की राजधानी तीर्थराज प्रयाग में निवास कर रहे हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है कि काल सर्पयोग शांति, राहु की महादशा, नागदोष एवं विष बाधा से मुक्ति का मुख्य स्थान तक्षकेश्वर नाथ प्रयाग ही है। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि दो दशक पहले तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में सावन के महीने में यहां सांपों का आना जाना अत्याधिक बढ़ जाता था। मान्यता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन से कालसर्प दोषों से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में शिव जी के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को और उनके वंशजों को सर्प विष बाधा से मुक्ति मिलती है। मंदिर की वास्तुकला प्रयागराज में तक्षकेश्वर नाथ मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। मंदिर में विशाल शिखर के साथ गुंबद भी बने हैं। तक्षकेश्वर महादेव के लिंग के चारों ओर तांबे का अर्घ्य बना है। परिसर में हनुमान जी, गणेश जी की मूर्ति है। 20 जनवरी 1992 को खुदाई के दौरान यहां खुदाई में पौराणिक काल के कुछ अवशेष प्राप्त हुये थे। कई पत्थर और प्राचीन मूर्तियां यहां मिलीं और उन पर पर बारीक नक्काशी मौजूदा मानव सभ्यता से भी प्राचीन बताई गई। पुरातत्व विभाग ने भी यहां पत्थरों का अवलोकन किया और अति प्राचीन सभ्यता की कृति होने के कारण आज भी उस पर शोध जारी है। मंदिर का समय सुबह तक्षकेश्वर नाथ मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM शाम को तक्षकेश्वर नाथ मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM मंदिर का प्रसाद तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में भक्त शिव जी फल, दूध, लड्डू का भोग चढ़ाते हैं। साथ ही भांग, दतुरा, बेलपत्र भी शिव जी को चढ़ाया जाता है।

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Buffalo in dream:सपने में भैंस देखने का क्या होता है मतलब, और अगर पूंछ दिख जाए तो फिर

Buffalo in dream:स्वप्न शास्त्र के अनुसार नींद में जो सपने हम देखते हैं उनका संबंध कहीं न कहीं हमारी जिंदगी से जुड़ा होता है. क्या आपको पता है सपने में भैंस देखने का क्या मतलब होता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार नींद में जो सपने हम देखते हैं उनका संबंध कहीं न कहीं हमारी जिंदगी से जुड़ा होता है. कहा जाता है कि उनसे हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी पहले ही मिल जाती है. सपनों के कई शुभ व अशुभ फल भी होते हैं. Buffalo in dream इसलिए हमें अपने सपनों को समझने की कोशिश करनी चाहिए. यहां हम आपको बताते हैं कि सपने में भैंस को देखना कैसा होता है. हालांकि भैंस को आपने किस अवस्था में देखा है ये भी महत्वपूर्ण होता है. सपने में भैंस देखना शुभ है या अशुभ? खूंटी में बंधी भैंस देखना यदि आप किसी खूंटी में बंधी भैंस देखते है तो यह आपके लिए एक अच्छा संकेत हो सकता है इसका मतलब है की यदि आप कोई मुश्किल काम करने जा रहे हो तो उसके सकारात्मक परिणाम ही देखने को मिलेंगे और सभी परिस्थितियां आपके नियंत्रण में ही रहने वाली है। Buffalo in dream:सपने में भैंस को भागते हुए देखना यदि आप सपने में किसी भैंस को आपके पीछे भागते हुए देखते हैं या फिर आप पर हमला करते हुए देखते हैं तो यह एक तरह से अशुभ संकेत हो सकता है इसका मतलब यह है कि आपके दुश्मन आपको आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा सकते है Buffalo in dream या फिर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को चोट पहुंचा सकते हैं। ऐसे में आपको किसी नए कार्य को करने में थोड़ा धैर्य और सावधानी बरतनी चाहिए।  Buffalo in dream:सपने में भैंस की सवारी करना यदि आप सपने में खुद को किसी भैंस की सवारी करते हुए देखते हैं या फिर भैंस के उसके ऊपर चढ़ा हुआ देखते हैं तो यह एक तरह का अशुभ संकेत है इसका क्या मतलब है की भविष्य में आपको स्वास्थ्य से जुड़ी हुई बुरी खबर मिल सकती है। Buffalo in dream या इस प्रकार का सपना आपके स्वास्थ्य को लेकर एक तरह की चेतावनी है अतः आपको अपने स्वास्थ्य को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए। सपने में भैंस का दूध निकालते हुए देखना सपने में खुद को किसी भैंस का दूध निकालते हुए देखते हैं तो यह बहुत ही शुभ संकेत है इसका यह मतलब है कि आपको बहुत जल्द आर्थिक लाभ होने वाला है। बहुत समय से अटका हुआ धन आपको मिलने वाला है Buffalo in dream यदि आप किसी दोस्त या रिश्तेदार से उधार मांगते हैं वह भी आपको प्राप्त होने वाला है। यह सपना इस तरफ इशारा करता है कि आप द्वारा अतीत में की गई मेहनत का आपको भविष्य में बहुत अच्छा लाभ मिलने वाला है। सपने में भैंस का झुंड देखना यदि आप सपने में भैंस का झुंड देखते हैं तो यह भी एक तरह का शुभ संकेत है, इसका मतलब है कि आने वाला समय आपके परिवार के लिए खुशियों से भरा होगा या फिर परिवार का कोई सदस्य नौकरी भी लग सकता है, जिससे परिवार में खुशी का माहौल होगा। Buffalo in dream और सपने में भैंस को भागते देखना या भैंस का झुण्ड को आपके पीछे भागते हुए देखते हैं तो यह सही संकेत नहीं है इसका यह मतलब है कि आपकी सफलता के कारण आपके बहुत से दुश्मन बनने वाले है। सपने में भैंस का हमला करना यदि आप ऐसा कोई सपना देखते है जिसमें भैंस आप पर हमला कर रही है तो यह अच्छा सपना नहीं है। इस सपने का अर्थ है की आने वाले समय में आप पर कोई भारी विपत्ति आ सकती है ।Buffalo in dream जिससे आप की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा बिगड़ जायेगी और साथ ही साथ आपको चिंता और डर घेरे हुए रहेगा। ऐसे में आपको रात्रि विचरण से बचना चाहिए। आप के साथ किसी तरह की दुर्घटना हो सकती है । सपने में भैंस का गोबर देखना सपने में भैंस का गोबर देखना शुभ ही समझा जाता है। गोबर चाहे भैंस का हो या फिर गाय का सपने में इसे देखना शुभ समझा जाता है। इस तरह का सपना यह संकेत करता है कि आने वाले समय में आपके घर में किसी तरह का आयोजन हो सकता है Buffalo in dream या फिर घर की साफ-सफाई अथवा रिपेयरिंग का काम आप करवा सकते हैं। सपने में भैंस को बच्चा पैदा करते देखना यदि आप सपने में भैंस का बच्चा पैदा होते हुए देखते हैं तो इसका अर्थ है कि आपके ऊपर आने वाले समय में कार्य का बोझ बढ़ सकता है। और आपको कुछ दिनों तक कार्य को लेकर परेशानी रह सकती है Buffalo in dream अतः इस तरह का सपना भविष्य में आपको मिलने वाली जिम्मेदारियों की तरफ इशारा करता है। इस सपने को अशुभ तो नहीं कहा जा सकता परंतु आपको अपने भविष्य को लेकर तैयार रहना चाहिए। सपने में भैंस का पीछे भागना यदि सपने में भैंस को पीछे भागते हुए देखते हैं तो यह सपना शुभ नहीं है। इसका अर्थ है कि कोई समस्या बहुत जल्द आपके दरवाजे पर दस्तक देने वाली है। यह समस्या आपके कार्यक्षेत्र से जुड़ी हो सकती है या फिर घर में किसी तरह का लड़ाई झगड़ा भी हो सकता है। या कोई बीमारी आपको काफी परेशान कर सकती है। ऐसा भी हो सकता है किसी काम की चिंता आपको अंदर ही अंदर खाई जा सकती है। अतः यह सपना एक तरह की चेतावनी है। सपने में 3 भैंस देखना सपने में 3 भैंस देखना शुभ नहीं समझा जाता है। इस सपने का अर्थ है कि आपके द्वारा अतीत में की गई गलतियों का खामियाजा आपको वर्तमान और भविष्य में भुगतना पड़ सकता है। Buffalo in dream आपकी कोई आदत जिससे आप काफी समय से ग्रसित हैं। आप को परेशानी में डाल सकती है। यदि आपको शराब या फिर सिगरेट आदि का नशा है तो इससे आपको भविष्य में किसी तरह की शारीरिक समस्या देखने को मिल सकती है। सपने में हाथी और भैंस देखना यदि आप सपने में हाथी और भैंस देखते हैं तो यह सपना भविष्य में आपके मजबूत होने की तरफ इशारा करता है Buffalo in dream और आप हर समस्या से दृढ़ निश्चय के साथ लड़ोगे और यह सपना आपकी आर्थिक

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श्री कालभैरव मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

कालभैरव को शहर की रक्षा के लिए किया गया नियुक्त कालभैरव मंदिर भगवान का मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। क्षिप्रा नदी के किनारे भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का इतिहास करीब 6,000 वर्ष पुराना बताया जाता है। काल भैरव को उज्जैन शहर का संरक्षक भी कहा जाता है और यह मंदिर इन्हीं को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान कालभैरव के वैष्णव स्वरूप की पूजा की जाती है। श्री कालभैरव मंदिर का इतिहास उज्जैन के काल भैरव मंदिर को राजा भद्रसेन ने बनवाया था, जिसका जिक्र स्कन्द पुराण के अवन्ती खंड में भी किया गया है। परमार शासनकाल (9वीं से 13वीं शताब्दी) के दौरान की शिवजी, माँ पार्वती, भगवान विष्णु और गणेश जी की प्रतिमाएं इसी जगह से मिली है। वहीं राजा भोज के समय इस मंदिर का पुनर्निर्माण भी करवाया गया था। श्री कालभैरव मंदिर का महत्व उज्जैन के राजा महाकाल ने ही कालभैरव को शहर की रक्षा के लिए नियुक्त किया है। इसी वजह से कालभैरव को शहर का कोतवाल भी कहा जाता है। भैरव बाबा के इस मंदिर में उनको मदिरा चढ़ाई जाती है, लेकिन मदिरा जाती कहां है ये रहस्य आज रहस्य बनके ही रह गया है। कालभैरव की इस प्रतिमा को मदिरा पीते हुए देखने के लिए यहां हजारों श्रद्धालु हर रोज पहुंचते हैं। इस मंदिर में भगवान कालभैरव की प्रतिमा सिंधिया पगड़ी पहने हुए दिखाई देती है। यह पगड़ी बाबा भैरवनाथ के लिए ग्वालियर के सिंधिया परिवार की ओर से आती है। यह प्रथा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। श्री कालभैरव मंदिर की वास्तुकला उज्जैन के काल भैरव मंदिर का निर्माण मराठा स्थापत्य शैली के अनुसार किया है, मंदिर की दीवारों में मालवा शैली में बने शानदार चित्रों के अवशेष अभी भी देखने को मिलते हैं। वहीं मंदिर के गर्भ गृह में भगवान काल भैरव की मूर्ति एक चट्टान के रूप में विराजमान है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 10:00 PM सायंकाल आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM सुबह की आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM मंदिर का प्रसाद उज्जैन के इस कालभैरव बाबा को मदिरा का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा भक्त यहाँ पर मावे और बेसन के लड्डू का भी भोग लगाते हैं।

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देवी क्षमा प्रार्थना स्तोत्र | Devi Kshama Prarthana Stotram

देवी क्षमा प्रार्थना स्तोत्र (Devi Kshama Prarthana Stotram) अपराध सहस्राणि कृयन्थे आहर्निसं मया, दासो आयमिथि मां मथ्व क्शमस्व परमेश्वरि ॥१॥ आवजनं न जानामि, न जानामि विसर्जनम्, पूजां चैव न जानामि, क्षंयथं अरमेश्वरि ॥२॥ मन्थ्रहीनम् , क्रियाहीनं, भक्थिहीनं, श्रुरेस्वरि, यतः पूजिथं मया देवी परिपूर्णं थादस्थुथे ॥३॥ आपराध स्थं क्रुथ्व जगदंबेथि चो उचरतः, यं गथिं संवप्नोथे न थां ब्रह्मदाय सुरा ॥४॥ सपरधोस्मि सरणं प्रथस्थ्वं जगदम्बिके, इधनी मनु कंप्योऽहं यदेच्छसि तदा कुरु ॥५॥ अज्ञान स्मृथेर्ब्रन्थ्य यन्यूनं अधिकं कर्थं, ततः सर्व क्षंयधं देवी प्रसीध परमेश्वरि ॥६॥ ख़मेश्वरि जगन्मथ सचिदनन्द विग्रहे, ग़्रहनर्चमीमम् प्रीथ्य प्रसीद परमेश्वरि ॥७॥ गुह्यधि गुह्य गोप्थ्री ग्रहण अस्मद कर्थं जपं, सिधिर भवथु मेय देवी थ्वत् प्रसादतः सुरेश्वरि ॥८॥

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Devi Apradh Kshamapan Stotra | देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्

Devi Apradh Kshamapan Stotra (देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्): देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् माँ दुर्गा का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, यदि आपसे माँ दुर्गा की पूजा में कोई त्रुटी हो जाए है, आपको लगे की किसी ने आपके उपर तंत्र प्रयोग कर दिया है, जिसके कारण आपकी शक्ति काम नही कर रही है या नष्ट हो हई है, तो आप रात्रि के समय, 9 बजे से 11 बजे के बीच लाल के ऊनि आसन पर बैठकर, पूर्व दिशा की और मुख करके, देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् के 1,3, या 5 पाठ अवश्य ही करे, उसके बाद आप माँ दुर्गा की आरती करे। Devi Apradh Kshamapan Stotra:इस तरह पाठ करने से माँ प्रसन्न होती है, और आपकी गलती को क्षमा करके माँ आपकों आशिर्वाद प्रदान करती है। यदि आप (Devi Apradh Kshamapan Stotra) देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् को संस्कृत में नही पाठ कर सकते तो, हिंदी में पाठ करे, तब भी आपको देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् का पूर्ण लाभ मिलेगा। न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्।।1।। अर्थ – हे मातः ! मैं तुम्हारा मन्त्र, यंत्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता, परन्तु सब प्रकार के क्लेशों को दूर करने वाला आपका अनुसरण करना ही जानता हूँ. विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव  चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।2।। अर्थ: Devi Apradh Kshamapan Stotra सबका उद्धार करने वाली हे करुणामयी माता ! तुम्हारी पूजा की विधि न जान्ने के कारण, धन के आभाव में, आलस्य से और उन विधियों को अच्छी तरह न कर सकने के कारण, तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती. पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला: परं  तेषां  मध्ये  विरलतरलोSहं  तव  सुत:। मदीयोSयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।3।। Devi Apradh Kshamapan Stotra:अर्थ: माँ ! भूमण्डल में तुम्हारे सरल पुत्र अनेको है पर उनमे एक मैं विरला ही बड़ा चंचल हूँ, तो भी हे शिवे ! मुझे त्याग देना तुम्हे उचित नहीं, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती. जगन्मातर्मातस्तव  चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।4।। अर्थ:  हे जगदम्ब ! हे मातः ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की Devi Apradh Kshamapan Stotra अथवा तुम्हारे लिए प्रचुर धन भी समर्पण नहीं किया तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है की क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती. परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्।।5।। अर्थ:  हे गणेश जननी ! मैंने अपनी पचासी वर्ष से अधिक आयु बीत जाने पर Devi Apradh Kshamapan Stotra विविध विधियों द्वारा पूजा करने से घबड़ा कर सब देवों को छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किस की शरण में जाऊं? श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै:। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ।।6।। अर्थ: हे माता अपर्णे ! यदि तुम्हारे मंत्राक्षरों के कान में पड़ते ही चांडाल भी मिठाई के समान सुमधुरवाणी से युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी करोड़पति बन कर चिरकाल तक निर्भय विचरता है तो उसके जप का अनुष्ठान करने पर जपने से जो फल होता है, उसे कौन जान सकता है? चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्।।7।। अर्थ: जो चिता का भस्म रमाए है, विष खाते है, नंगे रहते है, जटाजूट बांधे है, गले में सर्पमाला पहने है, Devi Apradh Kshamapan Stotra हाथ में खप्पर लिए है, पशुपति और भूतों के स्वामी है, ऐसे शिवजी ने भी जो एकमात्र जगदीश्वर की पदवी प्राप्त की है, वह हे भवानि ! तुम्हारे साथ विवाह होने का ही फल है. न मोक्षस्याकाड़्क्षा भवविभववाण्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन:। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत:।।8।। अर्थ: हे चंद्रमुखी माता ! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है, सांसारिक वैभव की भी लालसा नहीं है, विज्ञान तथा सुख की भी अभिलाषा नहीं है, इसलिए मैं तुमसे यही मांगता हूँ कि मेरी साड़ी आयु मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी आदि नामो के जपते-जपते ही बीते. नाराधितासि विधिना विविधोपचारै: किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि:। श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव।।9।। अर्थ: हे श्याम ! मैंने अनेको उपचारों से तुम्हारी सेवा नहीं कि (यही नहीं, इसके विपरीत) Devi Apradh Kshamapan Stotra अनिष्ट चिंतन में तत्पर अपने वचनों से मैंने क्या नहीं किया? (अर्थात अनेकों बुराइयाँ कि है) फिर भी मुझ अनाथ पर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह तुम्हे बहुत ही उचित है, क्योंकि तुम मेरी माता हो. आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथा: क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति।।10।। अर्थ – हे दुर्गे ! हे दयासागर माहेश्वरी ! जब मैं किसी विपत्ति में पड़ता हूँ तो तुम्हारा ही स्मरण करता हूँ, इसे तुम मेरी दुष्टता मत समझना, क्योंकि भूखे-प्यासे बालक अपनी माँ को याद किया करते हैं. जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम्।।11।। अर्थ:  हे जगज्जननी ! मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है, इसमें आश्चर्य ही क्या है? क्योंकि अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देती. मत्सम: पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु।।12।। अर्थ: हे महादेवी ! Devi Apradh Kshamapan Stotra मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप नाश करने वाली नहीं है, यह जानकार जैसा उचित समझो, वैसा करो. इति श्रीमच्छंकराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्।

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Devkrit Laxmi Stotra | देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र

Devkrit Laxmi Stotra:देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र: महात्मा पुष्कर ने परशुराम को बताया कि भगवान इंद्र, देवी लक्ष्मी को राज्यलक्ष्मी के रूप में हमेशा के लिए इंद्रलोक में बनाए रखना चाहते हैं। इंद्र ने देवी महालक्ष्मी की उनके अंश से स्तुति की, जिससे उनका राज्य सुरक्षित हो गया और देवों और दानवों के बीच युद्ध में उनके शत्रुओं को परास्त कर दिया गया। जो लोग देवी लक्ष्मी के इस महास्तोत्र को पढ़ते और सुनते हैं, उन्हें समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है और इसलिए महात्मा पुष्कर ने परशुराम को सलाह दी कि वे देवी लक्ष्मी के स्तोत्र को यथासंभव बार-बार और प्रत्येक सप्ताह शुक्रवार को अवश्य पढ़ें। समृद्धि और समृद्धि प्राप्त करने के लिए यह देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र बहुत शक्तिशाली पाठ है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है, वह एक महीने में भगवान कुबेर बन जाता है। भगवान इस शक्तिशाली स्तोत्र से देवी Devkrit Laxmi Stotra महालक्ष्मी की स्तुति करते हैं। कोई भी साधक देवी लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए इस देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का प्रतिदिन 21 बार जाप कर सकता है। दीपावली के पावन अवसर पर देवी लक्ष्मी की पूजा की जा सकती है तथा इस देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का 108 बार जाप करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, Devkrit Laxmi Stotra देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का जाप करना सबसे शक्तिशाली उपाय है। सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए आपको प्रातः स्नान करने के पश्चात देवी लक्ष्मी की मूर्ति अथवा चित्र के समक्ष देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का जाप करना चाहिए। इसके प्रभाव को अधिकतम करने के लिए आपको सबसे पहले स्तोत्र का अर्थ हिंदी में समझना चाहिए। इस स्तोत्र की पूजा प्रतिदिन सभी धनवानों को धन-धान्य की प्राप्ति कराने के लिए करनी चाहिए। Devkrit Laxmi Stotra महालक्ष्मी की कृपा से हमें वैभव, सौभाग्य, स्वास्थ्य, ऐश्वर्य, शील, विद्या, विनय, ओज, गम्भीरी तथा कांति की प्राप्ति होती है। आश्चर्यजनक रूप से असीमित सम्पत्ति प्रदान करने वाला महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना सूत्र है, जिसमें श्री महालक्ष्मी की बहुत ही सुन्दर पूजा की गई है। Devkrit Laxmi Stotra:देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र के लाभ देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का नियमित जाप करने से मन को शांति मिलती है और आपके जीवन से सभी बुराइयाँ दूर रहती हैं और आप स्वस्थ, धनवान और समृद्ध बनते हैं।देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र श्री लक्ष्मी देवी जी को समर्पित है। देवी लक्ष्मी स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को सफलता मिलती है; उसे अपने जीवन में किसी भी मामले में धन के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता है। Devkrit Laxmi Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ धनहीन जीवन जी रहे व्यक्ति को वैदिक पद्धति के अनुसार इस देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। Devkrit Laxmi Stotra | देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र क्षमस्व भगवंत्यव क्षमाशीले परात्परे | शुद्धसत्त्वस्वरूपे च कोपादिपरिवर्जिते |1| उपमे सर्वसाध्वीनां देवीनां देवपूजिते | त्वया विना जगत्सर्वं मृततुल्यं च निष्फलम् |2| सर्वसंपत्स्वरूपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी | रासेश्वर्यधि देवी त्वं त्वत्कलाः सर्वयोषितः |3| कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका | स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं मर्त्यलक्ष्मीश्च भूतले |4| वैकुंठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सरस्वती | गंगा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मालोकतः |5| कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयम् | रासे रासेश्वरी त्वं च वृंदावन वने- वने |6| कृष्णा प्रिया त्वं भांडीरे चंद्रा चंदनकानने | विरजा चंपकवने शतशृंगे च सुंदरी |7| पद्मावती पद्मवने मालती मालतीवने | कुंददंती कुंदवने सुशीला केतकीवने |8| कदंबमाला त्वं देवी कदंबकाननेऽपि च | राजलक्ष्मी राजगेहे गृहलक्ष्मीगृहे गृहे |9| इत्युक्त्वा देवताः सर्वा मुनयो मनवस्तथा | रूरूदुर्नम्रवदनाः शुष्ककंठोष्ठ तालुकाः |10| इति लक्ष्मीस्तवं पुण्यं सर्वदेवैः कृतं शुभम् | यः पठेत्प्रातरूत्थाय स वै सर्वै लभेद् ध्रुवम् |11| अभार्यो लभते भार्यां विनीतां सुसुतां सतीम् | सुशीलां सुंदरीं रम्यामतिसुप्रियवादिनीम् |12| पुत्रपौत्रवतीं शुद्धां कुलजां कोमलां वराम् | अपुत्रो लभते पुत्रं वैष्णवं चिरजीविनम् |13 परमैश्वर्ययुक्तं च विद्यावंतं यशस्विनम् | भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भ्रष्टश्रीर्लभते श्रियम् |14| हतबंधुर्लभेद्बंधुं धनभ्रष्टो धनं लभेत् | कीर्तिहीनो लभेत्कीर्तिं प्रतिष्ठां च लभेद् ध्रुवम् |15| सर्वमंगलदं स्तोत्रं शोकसंतापनाशनम् | हर्षानंदकरं शश्वद्धर्म मोक्षसुहृत्प्रदम् |16| || इति श्रीदेवकृत लक्ष्मीस्तोत्रं संपूर्णम् ||

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