Batuk Bhairav Jayanti 2025 Date:जानियें कब और कैसे करें बटुक भैरव जयंती की पूजा ?

Batuk Bhairav Jayanti 2025 Date:बटुक भैरव भगवान शंकर का बाल रूप और सबसे भयानक, विकराल और प्रचंड रूप है. कहते हैं कि बटुक भैरव की पूजा करने से विरोधियों और शत्रुओं का कोई भी षड्यंत्र सफल नहीं होता. Batuk Bhairav Jayanti 2025 : हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी को बटुक भैरव जयंती मनाई जाती है. इस साल  5 जून 2025, गुरूवार को बटुक भैरव जयंती मनाई जाएगी. इस दिन भोलेनाथ (Lord Shiva) ने भैरव के रूप में अवतार लिया था. शास्त्रों में इस बात का वर्णन है कि वेदों में जिस परम पुरुष का नाम रूद्र है तंत्र शास्त्र में उसी का भैरव के नाम से वर्णन किया गया है. आपको बता दें कि शिव पुराण (Shiv Puran) में भैरव को भगवान शिव का पूर्ण रूप बताया गया है. विद्वानी भगवान शंकर और भैरवनाथ में कोई अंतर नहीं मानते. बटुक भैरव भगवान शंकर का बाल रूप और सबसे भयानक, विकराल और प्रचंड रूप है. कहते हैं कि बटुक भैरव की पूजा करने से विरोधियों और शत्रुओं का कोई भी षड्यंत्र सफल नहीं होता. How is the form of Lord Shri Batuk Bhairav:कैसा है भगवान श्री बटुक भैरव का स्वरूप ? Batuk Bhairav Jayanti:कुछ साधक भगवान के बटुक भैरव रूप को शुद्ध आत्मा का प्रतिनिधित्व करने वाला उसका प्रतीकात्मक रूप मानते हैं। बटुक भैरव भगवन शिव का बाल रूप है जो अतिकोमल है और जिसका रंग गोरा है। इसलिये इन्हे गोरा भैरव के नाम से भी जाना जाता हैं। बालक रुपी भगवान बटुक भैरव की देह की कान्ति स्फटिक की तरह चमकदार है। केश घुंघराले और चमकता हुआ मुख। कमर और पैरों में किंकिणी, नूपुर आदि नव मणियों के अलंकार सज्ज्ति हैं। उनके तीन नेत्र है। भव्य और उज्जवल मुख है। सदा प्रसन्न-चित्त दिखते है। उन्होने हाथों में शूल और दण्ड धारण किए हुए हैं। How to worship Batuk Bhairav:कैसे करें बटुक भैरव की पूजा? बटुक भैरव जयंती (Batuk Bhairav Jayanti) के दिन भगवान बटुक भैरव की पूजा किये जाने का विधान है। इस साधक को भगवान बटुक भैरव के मन्दिर जाकर उनकी पूजा करनी चाहिये। पूजा की विधि इस प्रकार है – प्रात:काल नित्यक्रिया से निवृत्त होकर गंगा नदी में स्नान करें यदि गंगा स्नान सम्भव ना होतो स्नान के जल में गंगा जल डालकर स्नान करें। फिर स्वच्छ सफ़ेद वस्त्र धारण करें। स्नान के बाद व्रत का संकल्प करें। भगवान बटुक भैरव के मंदिर जाकर पूजा करें। Batuk Bhairav Jayanti यदि ऐसा सम्भव ना हो तो शिवालय जाकर भी पूजा कर सकते है। भगवान बटुक भैरव देव को सफ़ेद फूल और केला अर्पित करे। लड्डू और पंचामृत चढ़ाएं। यह सब चढ़ाते हुये इस मंत्र का जाप करते रहें। मंत्र – “ॐ बटुक भैरवाय नमः”। फिर बटुक भैरव स्तोत्र (श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शत-नामावली ) का पाठ करें। आरती करें। गरीबों को प्रसाद बाँटें। इसके बाद बाहर आकर कुत्ते को दूध अवश्य पिलायें। साथ ही पुआ या हलवा भी खिलायें। Significance of Batuk Bhairav Jayanti:बटुक भैरव जयंती का महत्व बटुक भैरव जयंती (Batuk Bhairav Jayanti) के दिन उत्तर भारत में बहुत से बटुक भैरव मंदिरों विशेष पूजा और अनुष्ठानों किये जाते है। तंत्रवाद में विश्वास करने वाले तांत्रिकों द्वारा भगवान शिव के रूप बटुक भैरव और काल भैरव की पूजा की जाती है। इस दिन Batuk Bhairav Jayanti भगवान बटुक भैरव की विधि अनुसार पूजा करने से The story of the origin of Batuk Bhairav:बटुक भैरव की उत्पत्ति की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार अति प्राचीन काल में आपद नाम का एक राक्षस था। Batuk Bhairav Jayanti उसने कठिन तपस्या के द्वारा यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई भी देवी-देवता नही मार सकेगा। उसकी मृत्यु सिर्फ पाँच वर्ष की आयु वाला कोई बालक ही कर सकेगा। यह वर पाने के बाद आपद निरंकुश हो गया और तीनों लोकों में उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया। देवी – देवता और मनुष्य सभी उसके अत्याचार से परेशान हो गये थे। आपद के द्वारा प्रताडित देवी – देवताओं ने जाकर भगवान शिव से प्रार्थना करी कि वो उनकी आपद से रक्षा करें। तब भगवान शिव जी ने पांच वर्ष के बालक रूप में बटुक भैरव को प्रकट किया। Batuk Bhairav Jayanti इस प्रकार से बटुक भैरव की उत्पत्ति हुई। इसके बाद भगवान बटुक भैरव ने आपद नामक राक्षस का वध करा। उसके बाद से ऐसा कहा जाता है कि इस कलियुग में यदि आपके उपर कोई मुसीबत आये तो बटुक भैरव का ध्यान करें। बटुक भैरव की पूजा करने से मिलता है लाभ:Benefits of worshiping Batuk Bhairav इस बार बटुक भैरव जयंती मनाई जा रही है. Batuk Bhairav Jayanti जयंती पड़ने से इसका महत्व और भी ज्यादा बढ़ गया है. कहा जाता है कि रविवार को भगवान बटुक भैरव की सच्चे मन से साधना और आराधना करने वाले साधक को बुद्धि, बल, विद्या और मान सम्मान की प्राप्ति होती है. Batuk Bhairav Jayanti ज्योतिषियों के मुताबिक राहु केतु के संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए भी बटुक की साधना बहुत ही ज्यादा फलदाई है. बटुक भैरव जयंती के दिन करें उपाय:Remedies to be taken on the day of Batuk Bhairav ​​Jayanti

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Sundar kand Path lyrics in hindi:संपूर्ण सुंदरकांड पाठ हिंदी में, जामवंत के बचन सुहाए, सुनि हनुमंत हृदय अति भाए…

Sundar kand Path lyrics in hindi: Sundarkand का हर मंगलवार को करना चाहिए, ऐसा करने से जीवन में सभी दुख दूर हो जाते हैं। Sundar kand Path:रामचरित मानस का हिस्सा है जो सुंदरकांड बजरंगबली हनुमानजी को समर्पित है। सुंदरकांड हिंदू धर्म में रामचरितमानस का विशेष महत्व है, और उसके सुंदरकांड अध्याय को अत्यंत शुभ और शक्तिशाली माना जाता है। सुंदरकांड श्रीराम कथा का वह भाग है जिसमें भगवान हनुमान की वीरता, भक्ति और बुद्धिमत्ता का अद्भुत वर्णन है। इस पाठ को नियमित रूप से पढ़ने से जीवन में कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं आध्यात्मिक, मानसिक, सुंदरकांड भावनात्मक और भौतिक रूप से। सुंदरकांड का पाठ करने से व्यक्ति का साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव भी कम हो जाता है। संपूर्ण सुंदरकांड पाठ: सुंदरकांड का पाठ नियमित करना चाहिए। हर दिन सुंदरकांड का पाठ नहीं कर सकते तो शनिवार और मंगलवार को जरूर इसका पाठ करना चाहिए। सुंदरकांड रामचरित मानस का हिस्सा है जो वीर हनुमानजी की महिमा का बखान करता है। इसके पाठ करने मात्र से मंगल की प्रतिकूल स्थिति और शनि की साढेसाती एवं ढैय्या का प्रभाव दूर हो जाता है। सुंदरकांड इतना ही नहीं यह संकट और परेशानी से भी उबारने वाला है। सुंदरकांड इसलिए सुंदरकांड हनुमान जयंती के अलावा हर शनिवार और मंगलवार को सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। सुंदरकांड तो आइए हनुमानजी का ध्यान करते हुए सुंदरकांड का पाठ आरंभ करते हैं। सुंदरकांड आसन।।कथा प्रारम्भ होत है। सुनहुँ वीर हनुमान।।आसान लीजो प्रेम से। करहुँ सदा कल्याण।। सुंदरकांड पाठ से पहले करें हनुमानजी का ध्यानशान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्,रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं,वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।। नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीयेसत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मेकामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।। अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहंदनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।सकलगुणनिधानं वानराणामधीशंरघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।। Sundar kand Path:सुंदरकांड का पाठ आरंभ जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।। जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।। निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।। सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।। कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।दो0-पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।.मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।दो0-तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।.प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।दो0-रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।.लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।.सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।

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Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi :मंगलवार को हनुमान जी के इन नामों का करें जप, सभी संकट जल्द होंगे दूर

Hanuman Ji Ke 108 Name:मंगलवार के दिन राम जी के भक्त हनुमान की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही कार्यों में आ रही बाधा को दूर करने के लिए व्रत भी किया है। मान्यता है कि बजरंगबली की उपासना करने से कभी धन का अभाव नहीं रहता है और घर में खुशियों का आगमन होता है। ऐसे में मंगलवार के दिन बजरंगबली की पूजा के दौरान उनके Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi नामों का जप करें। Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi:हनुमानजी के कई नाम है और हर नाम के पीछे कुछ ना कुछ रहस्य है। Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi हनुमानजी के लगभग 108 नाम बताए जाते हैं। वैसे प्रमुख रूप से हनुमानजी के 12 नाम बताए जाते हैं। बलशालियों में सर्वश्रेष्ठ है हनुमानजी। कलिकाल में उन्हीं की भक्ति से भक्त का उद्धार होता है। Hanuman Ji Ke 108 Name जो जपे हनुमानजी का नाम संकट कटे मिटे सब पीड़ा और पूर्ण हो उसके सारे काम। तो आओ जानते हैं कि हनुमानजी के नामों का रहस्य। 1. मारुति : हनुमानजी का बचपना का यही नाम है। यह उनका असली नाम भी माना जाता है।  2. अंजनी पुत्र : हनुमान की माता का नाम अंजना था। इसीलिए उन्हें अंजनी पुत्र या आंजनेय भी कहा जाता है। 3. केसरीनंदन : हनुमानजी के पिता का नाम केसरी था इसीलिए उन्हें केसरीनंदन भी कहा जाता है। 4. हनुमान : जब बालपन में मारुति ने सूर्य को अपने मुंह में भर लिया था तो इंद्र ने क्रोधित होकर बाल हनुमान पर अपने वज्र से वार किया। वह वज्र जाकर मारुति की हनु यानी कि ठोड़ी पर लगा। इससे उनकी ठोड़ी टूट गई इसीलिए उन्हें हनुमान कहा जाने लगा। 4. पवन पुत्र : उन्हें वायु देवता का पुत्र भी माना जाता है, इसीलिए इनका नाम पवन पुत्र हुआ। Hanuman Ji Ke 108 Name उस काल में वायु को मारुत भी कहा जाता था। मारुत अर्थात वायु, इसलिए उन्हें मारुति नंदन भी कहा जाता है। वैसे उनमें पवन के वेग के समान उड़ने की शक्ति होने के कारण भी यह नाम दिया गया। 6. शंकरसुवन : हनुमाजी को शंकर सुवन अर्थात उनका पुत्र भी माना जाता है क्योंकि वे रुद्रावतार थे। 7. बजरंगबली : वज्र को धारण करने वाले और वज्र के समान कठोर अर्थात बलवान शरीर होने के कारण उन्हें वज्रांगबली कहा जाने लगा। अर्थात वज्र के समान अंग वाले बलशाली। लेकिन यह शब्द ब्रज और अवधि के संपर्क में आकर बजरंगबली हो गया। बोलचाल की भाषा में बना बजरंगबली भी सुंदर शब्द है। 8. कपिश्रेष्ठ : हनुमानजी का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था। रामायणादि ग्रंथों में हनुमानजी और उनके सजातीय बांधव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ ‘वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम’ आदि विशेषण प्रयुक्त किए गए। Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम से लंकादहन इसका प्रमाण है कि वे वानर थे। रामायण में वाल्मीकिजी ने जहां उन्हें विशिष्ट पंडित, राजनीति में धुरंधर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है, Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi वहीं उनको लोमश ओर पुच्छधारी भी शतश: प्रमाणों में व्यक्त किया है। अत: सिद्ध होता है कि वे जाति से वानर थे। 9. वानर यूथपति : हनुमानजी को वानर यूथपति भी कहा जाता था। वानर सेना में हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था। अंगद, दधिमुख, मैन्द- द्विविद, नल, नील और केसरी आदि कई यूथपति थे।  10. रामदूत : प्रभु श्रीराम का हर काम करने वाले दूत। 11. पंचमुखी हनुमान : पातल लोक में अहिरावण का वध करने जब वे गए तो वहां पांच दीपक उन्हें पांच जगह पर पांच दिशाओं में मिले जिसे अहिरावण ने मां भवानी के लिए जलाए थे। Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi इन पांचों दीपक को एक साथ बुझाने पर अहिरावन का वध हो जाएगा इसी कारण हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख।  Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi :मंगलवार को हनुमान जी के इन नामों का करें जप, सभी संकट जल्द होंगे दूर इस रूप को धरकर उन्होंने वे पांचों दीप बुझाए तथा अहिरावण का वध कर राम,लक्ष्मण को उस से मुक्त किया। मरियल नामक दानव को मारने के लिए भी यह रूप धरा था। दोहा :  उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥  स्तुति :  हनुमान अंजनी सूत् र्वायु पुत्रो महाबलः। रामेष्टः फाल्गुनसखा पिङ्गाक्षोऽमित विक्रमः॥ उदधिक्रमणश्चैव सीता शोकविनाशनः। लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा॥ एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः। सायंकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्॥ तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्। यहां पढ़ें हनुमानजी के 12 चमत्कारिक नाम 1. हनुमान हैं (टूटी हनु). 2. अंजनी सूत, (माता अंजनी के पुत्र). 3. वायुपुत्र, (पवनदेव के पुत्र). 4. महाबल, (एक हाथ से पहाड़ उठाने और एक छलांग में समुद्र पार करने वाले महाबली). 5. रामेष्ट (राम जी के प्रिय). 6. फाल्गुनसख (अर्जुन के मित्र). 7. पिंगाक्ष (भूरे नेत्र वाले). 8. अमितविक्रम, ( वीरता की साक्षात मूर्ति)  9. उदधिक्रमण (समुद्र को लांघने वाले). 10. सीताशोकविनाशन (सीताजी के शोक को नाश करने वाले). 11. लक्ष्मणप्राणदाता (लक्ष्मण को संजीवनी बूटी द्वारा जीवित करने वाले). 12.. दशग्रीवदर्पहा (रावण के घमंड को चूर करने वाले). Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi:हनुमान जी के 108 नाम 1.भीमसेन सहायकृते 2. कपीश्वराय 3. महाकायाय 4. कपिसेनानायक 5. कुमार ब्रह्मचारिणे 6. महाबलपराक्रमी 7. रामदूताय 8. वानराय 9. केसरी सुताय 10. शोक निवारणाय 11. अंजनागर्भसंभूताय 12. विभीषणप्रियाय 13. वज्रकायाय 14. रामभक्ताय 15. लंकापुरीविदाहक 16. सुग्रीव सचिवाय 17. पिंगलाक्षाय 18. हरिमर्कटमर्कटाय 19. रामकथालोलाय 20. सीतान्वेणकर्त्ता 21. वज्रनखाय 22. रुद्रवीर्य 23. वायु पुत्र 24. रामभक्त 25. वानरेश्वर 26. ब्रह्मचारी 27. आंजनेय 28. महावीर 29. हनुमत 30. मारुतात्मज 31. तत्वज्ञानप्रदाता 32. सीता मुद्राप्रदाता 33. अशोकवह्रिकक्षेत्रे 34. सर्वमायाविभंजन 35. सर्वबन्धविमोत्र 36. रक्षाविध्वंसकारी 37. परविद्यापरिहारी 38. परमशौर्यविनाशय 39. परमंत्र निराकर्त्रे 40. परयंत्र प्रभेदकाय 41. सर्वग्रह निवासिने 42. सर्वदु:खहराय 43. सर्वलोकचारिणे 44. मनोजवय 45. पारिजातमूलस्थाय 46. सर्वमूत्ररूपवते 47. सर्वतंत्ररूपिणे 48. सर्वयंत्रात्मकाय 49. सर्वरोगहराय 50. प्रभवे 51. सर्वविद्यासम्पत 52. भविष्य चतुरानन 53. रत्नकुण्डल पाहक 54. चंचलद्वाल 55. गंधर्वविद्यात्त्वज्ञ 56. कारागृहविमोक्त्री 57. सर्वबंधमोचकाय 58. सागरोत्तारकाय 59. प्रज्ञाय 60. प्रतापवते 61. बालार्कसदृशनाय

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Lord Shiva things In Dream:शिवजी को सपने में दिखने का क्या है मतलब ?

Lord Shiva things In Dream:अक्सर हम रात को सोते समय सपने देखते हैं। हम में से ज्यादातर लोग सपनों में वही देखते हैं जो असल में हमारे जीवन में हो रहा होता है। या हम क्या सोच रहे थे। इसी तरह अगर आप सपने में कोई मंदिर या कोई देवता देख रहे हैं तो उसके बीच में कोई शुभ या अशुभ कारण है। आपको बता दें कि स्वप्न शास्त्र में सपनों के अर्थ बताए गए हैं। Sapne mein Dikhe bhagwan Shiv:ऐसे में अगर आप सपने में कोई देवता देखते हैं तो उसके भी अलग-अलग अर्थ होते हैं। भगवान शिव का प्रिय महीना सावन चल रहा है। यदि सावन के महीने में आपको सपने में भगवान शिव या उनसे जुड़ी चीजें दिखें तो इसका कोई न कोई अर्थ अवश्य होता है। सपने में भगवान शिव आते हैं और सभी संकटों को दूर करने का संकेत देते हैं। आइए जानते हैं सपने में भगवान शिव या उनसे संबंधित वस्तुएं देखने का क्या अर्थ है।  Swapna Shastra Sapne Me Shivling Damru Trishul Dekhna Know Lord Shiva things In Dream Meaning In Hindi शिवलिंग का स्वप्न:Dream of Shivalinga Lord Shiva things In Dream अगर सपने में भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग का आपने दर्शन किया है तो यह बहुत ही शुभ संकेत है। इससे व्यक्ति के सभी दुखों की समाप्ति होती है और भगवान शिव का आशीर्वाद सदैव जातक पर बना रहता है। सपने में भगवान शिव को देखना:Seeing Lord Shiva in dreams यदि आपने सपने में भगवान शिव को देखा है Lord Shiva things In Dream तो यह स्पष्ट है कि आपके जीवन की परेशानियां बहुत जल्द दूर होने वाली हैं। सके साथ ही अगर आप सपने में शिवलिंग देखते हैं तो यह सपना भी बहुत शुभ माना जाता है। यह सपना प्रगति, प्रगति और प्रसिद्धि की प्राप्ति का संकेत माना जाता है। सपने में शिव पार्वती को एक साथ देखना:Seeing Shiva and Parvati together in dreams यदि आप शिव और पार्वती को एक साथ देखते हैं तो इसका मतलब है कि आपके दरवाजे पर नए अवसर हैं। जल्द ही आपको लाभ, यात्रा, अन्न और खाद्यान्न प्राप्त करने, धन और बहुतायत के समाचार सुनने को मिलेंगे। शिव और पार्वती को एक साथ देखना एक अच्छा शगुन है। सपने में शिव को नृत्य करते हुए देखना:Seeing Shiva dancing in dream शिव तांडव को आक्रामकता और जुनून का प्रतीक माना जाता है। लेकिन अगर आप सपने में शिव को नाचते हुए देखते हैं तो इसका मतलब है कि आपकी समस्या का जल्द ही समाधान हो जाएगा। यह यह भी दर्शाता है कि आप धन प्राप्त करेंगे लेकिन कुछ संघर्ष के बाद। शिव मंदिर के बारे में सपने देखना:Dreaming about Shiva temple Lord Shiva things In Dream यदि आप शिव मंदिर के बारे में सपना देखते हैं, तो यह दर्शाता है कि आपको दो पुत्रों की प्राप्ति होगी। एक सपने में मंदिर का मतलब किसी बीमारी से उबरना भी हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति माइग्रेन के सिरदर्द से पीड़ित है, Lord Shiva things In Dream तो सपने में उसके मंदिर लोहे में बदल जाते हैं, इसका मतलब है कि उसे अपनी बीमारी का इलाज मिल जाएगा। सपने में किसी के मंदिर की व्याख्या भी धन के रूप में की जा सकती है। शिव के त्रिशूल के बारे में सपना देखना:Dreaming about Shiva’s trident शिव का त्रिशूल दर्शाता है कि शिव सभी 3 अवस्थाओं से ऊपर हैं-जागना, स्वप्न देखना और सोना, फिर भी वे सभी 3 अवस्थाओं को बनाए रखते हैं। यदि आप त्रिशूल के बारे में सपना देखते हैं, तो इसका भूत, वर्तमान और भविष्य या जन्म, जीवन और मृत्यु की पीड़ा से कुछ संबंध है। त्रिशूल जो आपको सभी समस्याओं और कष्टों से छुटकारा दिलाता है। तो यह एक अच्छा शगुन है। शिव के चंद्रमा के बारे में सपना देखना:Dreaming about Shiva’s Moon शिव पर अर्धचंद्राकार ज्ञान का प्रतीक है। यदि आप चंद्रमा का सपना देखते हैं, Lord Shiva things In Dream तो इसका मतलब है कि आपको जीवन में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे। इस सपने का संबंध आपके शिक्षा क्षेत्र से हो सकता है। भगवान शिव का तीसरा नेत्र:third eye of lord shiva तीसरा नेत्र सतर्कता और जागरूकता से जुड़ा है। इसके बारे में सपने देखने का मतलब जीवन में कुछ महत्वपूर्ण बदलावों का संकेत है। शिव के डमरू के बारे में सपने देखना- डमरू ब्रह्मांड का प्रतीक है Lord Shiva things In Dream जो हमेशा विस्तार और पतन कर रहा है। दारमरू ध्वनि का भी प्रतीक है। इसके बारे में सपने देखने का अर्थ है आपके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में ऊर्जा का सकारात्मक प्रवाह।

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Sapne Me Shivling Dekhna:सपने में पार्थिव शिवलिंग देखने का मतलब जानिए, इस मामले में होता है बेहद लाभकारी

Shivling Dekhna:कई बार सपने में शिवलिंग हमें लगातार दिखाई देता है जिसे देखने के बाद लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं कि इसका क्या मतलब हो सकता है? अगर आपको कभी सपने में भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग का दर्शन हो तो आपको खुश हो जाना चाहिए। क्योंकि यह सपना आपके लिए बेहद शुभ है। Shivling Darshan: हिंदू धर्म में स्वप्नशास्त्र का बेहद महत्व है। ऐसा माना जाता है कि सपने हमें भविष्य से जुड़े संकेत देते हैं। कई बार सपने में शिवलिंग हमें लगातार दिखाई देता है, जिसे देखने के बाद लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं कि इसका क्या मतलब हो सकता है? Shivling Dekhna अगर आपको कभी सपने में भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग का दर्शन हो, तो आपको खुश हो जाना चाहिए। क्योंकि यह सपना आपके लिए बेहद शुभ है। तो आइए स्वप्नशास्त्र के अनुसार, जानते हैं सपने में शिवलिंग दिखने का महत्व- Sapne Me Shivling Dekhna:सपने में शिवलिंग का दिखना सपने में यदि आपने शिवलिंग को देखा तो यह बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा मानते हैं कि यदि सपने में आपको Shivling Dekhna शिवलिंग दिखाई दे तो निजी जीवन में आपका कोई बहुप्रतीक्षित कार्य बनने वाला है। ऐसा कहते हैं कि आपको उस कार्य में सफलता मिलना तय और भोले बाबा का हाथ आपके ऊपर है। सपने में शिवलिंग की पूजा करते देखना:Seeing worshiping Shivling in the dream यदि आपने सपने में खुद को शिवलिंग की पूजा करते देखा है तो समझ लीजिए आपके जीवन से सभी प्रकार के अशुभ तत्‍वों का नाश होने वाला है। ऐसा सपना अच्‍छा समय आने का और पुरानी परेशानियां दूर होने का संकेत देता है। यह सपना किसी की अधूरी इच्‍छा पूरी होने का और मनोकामना पूर्ति का संकेत देता है। सपने में सपरिवार भगवान शिव की पूजा करना:Worshiping Lord Shiva with family in the dream यदि आप खुद को अपने परिवार के साथ शिवजी की पूजा करते देखते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि आप अपने काम में पूरे त्‍याग, समर्पण और ईमानदारी के साथ लगे रहते हैं।Shivling Dekhna ऐसा सपना आना बताता है कि कार्यक्षेत्र में आपकी आने वाली परेशानियां जल्‍द ही दूर होने वाली हैं। आपके जीवन में सुख समृद्धि और सौभाग्‍य आने वाला है। ऐसा सपना उन्‍नति और सुख सौभाग्‍य का प्रतीक माना जाता है। सपने में सफेद शिवलिंग देखना:Seeing white Shivling in dream अगर आपको सपने में यदि सफेद शिवलिंग के दर्शन हों तो यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आने वाले वक्‍त में आपको या फिर आपके परिवार के किसी सदस्‍य को गंभीर रोग से छुटकारा मिल सकता है और आपके जीवन में कुछ अच्‍छा होने वाला है। सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना:Climbing the stairs of Shiva temple in a dream सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना भी असल जीवन में बहुत ही शुभ संकेत देता है। इसका अर्थ है कि आप अपने जीवन में सुख शांति की ओर बढ़ रहे हैं। संघर्ष का दौर आपके जीवन से समाप्‍त होने वाला है और जल्‍द ही आपके जीवन में स्‍थायित्‍व आने वाला है और सब कुछ आपके अनुसार होने वाला है। पुर्वजन्म से है जुड़ा है सपना:The dream is connected to the previous birth अगर आपको सपने में Shivling Dekhna शिवलिंग के दर्शन होते हैं, तो इसका संबंध पुर्वजन्म से भी हो सकता है। धार्मिक मान्यता है कि इस सपने से यह भी पता चलता है कि आपको आपके बुरे कर्मों की सजा मिल चुकी है। अब आपका बुरा समय खत्म हो गया है। साथ ही आपका भाग्योदय जल्द होने वाला है। सपने में शिवलिंग दिखने पर करें यह उपाय:Do this remedy if you see Shivling in your dream स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आपको सपने में शिवलिंग के दर्शन होते हैं, तो आपको अगली सुबह शिव मंदिर जाना चाहिए। इसके बाद भोलेनाथ की विधिवत पूजा – अर्चना करनी चाहिए। साथ ही शिव जी के पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ या फिर किसी मंत्र का जाप करना चाहिए। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आपके सपनों का शुभ परिणाम दोगुना हो जाएगा।

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Maa Annapurna Stotram:माँ अन्नपूर्णा स्तोत्र

Maa Annapurna Stotram in Hindi माँ अन्नपूर्णा स्तोत्र हिंदी पाठ Maa Annapurna Stotram:नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरीनिर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १ ॥ नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरीमुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ २ ॥ योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरीचन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ३ ॥ कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करीकौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ४ ॥ दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरीलीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ५ ॥ उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरीवेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ६ ॥ आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरीकाश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ७ ॥ देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरीवामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ८ ॥ चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरीचन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ९ ॥ क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरीसाक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १० ॥ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥ ११ ॥ माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥ १२ ॥ Maa Annapurna Stotram ॥ इति श्री अन्नपूर्णा स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Mahalakshmi Stotra:महालक्ष्मी स्तोत्र

Mahalakshmi Stotra:महालक्ष्मी स्तोत्र एक भक्ति भजन है, जो भगवान विष्णु की पत्नी देवी महालक्ष्मी के प्रति आस्था और भक्ति की घोषणा है। उन्हें लाल वस्त्रों में और सोने के आभूषणों से सुसज्जित दिखाया गया है। उनके चेहरे पर शांत और सुखदायक भाव हैं और उन्हें हमेशा अपने हाथ में कमल लिए देखा जाता है, जो उन्हें सुंदरता का प्रतीक दर्शाता है। महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ सबसे पहले भगवान इंद्र ने देवी श्री लक्ष्मी की स्तुति में किया था, जो मूल रूप से पद्म पुराण में देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए प्रकट हुई थीं। उनके चार हाथ हिंदू जीवन शैली के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले मानव जीवन के चार लक्ष्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं – धर्म (धार्मिकता और कर्तव्य) काम (सांसारिक इच्छाएँ), अर्थ (धन और समृद्धि) और मोक्ष (मुक्ति)। उनकी हथेलियाँ हमेशा खुली रहती हैं और कभी-कभी उनमें से सिक्के गिरते हुए दिखाई देते हैं, जो दर्शाता है कि वह धन और समृद्धि की दाता हैं। उन्हें एक सुंदर बगीचे में या नीले-सागर में कमल पर बैठे या खड़े दिखाया गया है। उनके चारों ओर दो या चार सफेद हाथी जल से उनका अभिषेक कर रहे हैं। उनके वाहन यानी सवारी सफेद हाथी और उल्लू हैं। महालक्ष्मी स्तोत्र देवी महा लक्ष्मी की प्रार्थना है जिन्हें “श्री” भी कहा जाता है और जो धन के साथ-साथ शुभता का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रतिदिन श्री Mahalakshmi Stotra महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करने या सुनने से व्यक्ति को सफलता और सांसारिक लाभ प्राप्त होंगे। इस अष्टकम के अंत में ही कहा गया है कि यदि इसे प्रतिदिन एक बार पढ़ा जाए तो महान पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि इसे प्रतिदिन दो बार पढ़ा जाए तो धन और समृद्धि सुनिश्चित होती है। यदि इसे प्रतिदिन तीन बार पढ़ा जाए तो महान शत्रु (अहंकार) का नाश होता है। देवी महालक्ष्मी उस शुभ व्यक्ति से सदैव प्रसन्न रहती हैं। Mahalakshmi Stotra ke labh:महालक्ष्मी स्तोत्र के लाभ: वित्तीय समृद्धि, बुद्धि और समझ के लिए महालक्ष्मी स्तोत्र। भगवान विष्णु की पत्नी और गतिशील ऊर्जा श्री लक्ष्मी को हिंदुओं द्वारा धन, भाग्य, विलासिता और समृद्धि (भौतिक और आध्यात्मिक दोनों) की देवी के रूप में पूजा जाता है। उन्हें लाल वस्त्रों में चित्रित किया गया है और सोने के आभूषणों से सुसज्जित किया गया है।Mahalakshmi Stotra:महालक्ष्मी स्तोत्र का नियमित जाप मन को शांति देता है और आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है और आपको स्वस्थ, धनवान और समृद्ध बनाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो लोग गरीबी, असफलता और दुर्भाग्य से पीड़ित हैं, उन्हें तत्काल राहत के लिए महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। महालक्ष्मी स्तोत्र हिंदी पाठ:Mahalakshmi Stotra in Hindi नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ।। नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि ।सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ।। सर्वज्ञे सर्ववरदे देवी सर्वदुष्टभयंकरि ।सर्वदु:खहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ।। सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ।। आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ।। स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे ।महापापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ।। पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणी ।परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ।। श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते ।जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते ।। महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्तिमान्नर: ।सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ।। एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।द्विकालं य: पठेन्नित्यं धन्यधान्यसमन्वित: ।। त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ।। ।। इति महालक्ष्मी स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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33 koti gods names list:33 करोड़ नहीं 33 प्रकार के हैं देवता, जानिए कौन-कौन शामिल हैं 33 कोटि देवताओं में

33 koti gods:एक मान्यता प्रचलित है कि हिन्दू धर्म में कुल 33 करोड़ देवी-देवता माने हैं, जबकि ये बात सही नहीं है। हिन्दु धर्म में 33 करोड़ नहीं 33 कोटि यानी 33 प्रकार के देवता हैं। जानिए इस मान्यता से जुड़ी खास बातें… हिन्दू धर्मग्रंथों में 33 करोड़ नहीं, बल्कि 33 कोटि देवताओं का जिक्र है। यहां कोटि शब्द का अर्थ करोड़ नहीं, बल्कि प्रकार या श्रेणी है। संस्कृत शब्द कोटि के दो अर्थ हैं — करोड़ और प्रकार। इसी वजह से शब्द का गलत अनुवाद करके लोगों ने यह समझ लिया कि हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवता हैं। हिंदू ग्रंथो में 33 कोटि देवी देवता का जिक्र है. कोटि शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका सही अर्थ “प्रकार” है 33 koti gods यानी की हिंदू धर्म में 33 प्रकार के देवी देवता होते हैं. जबकि कोटि शब्द को कहीं कहीं करोड़ भी कहा जाता है इसी वजह से हिंदू धर्म में ये भ्रांति फैली कि हिंदू धर्म में 33 कोटि यानी 33 करोड़ देवी देवता होते हैं. सनातन धर्म इस संसार का सबसे प्राचीन धर्म माना जाता है, जिसमें अनेकों देवी देवताओं की पूजा की जाती है. 33 koti gods अनेकों त्यौहार और धार्मिक मान्यताओं का पालन किया जाता है. सनातन धर्म में कुल कितने देवी देवता हैं, ये प्रश्न हमेशा लोगों की जिज्ञासा रहा है.क्योंकि सनातन धर्म को लेकर लोगों में कुछ भ्रांतियां फैली हुई हैं. जिनमें से सबसे बड़ी भ्रांति है कि 33 koti gods हिंदू धर्म में 33 करोड़ देवी -देवता हैं. आज के समय में भी ज्यादातर लोगों का यही मानना है कि हिंदुओं के 33 करोड़ देवी- देवता होते हैं. आइए जानते हैं, क्या वाकई में हिंदुओ के 33 करोड़ देवी देवता होते हैं? सनातन धर्म का प्राचीन इतिहास रहा है, ये कितना पुराना है या कब से अस्तित्व में आया कोई नहीं जानता.इसी तरह संस्कृत भी बहुत पुरानी भाषा मानी जाती है यही हमारे वेदों की भाषा है, सनातन धर्म में पहले संस्कृत भाषा ही प्रचलन में थी इसका प्रमाण हमारे वेद और उपनिषद हैं जो कि संस्कृत में लिखे गए हैं. हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ गीता और रामायण भी संस्कृत में ही लिखे गए थे. बाद में हिंदी भाषा अस्तित्व में आई और दुनिया भर में फैले हिन्दुओं ने इसे अपनी भाषा के रूप में अपनाया और संस्कृत जिसे बड़े स्तर पर हिंदू लोगों ने अपनाया तभी से धीरे धीरे संस्कृत भाषा पीछे छूटती रही और लोग संस्कृत भूलते गए. इसी वजह से हिंदू धर्म के सभी पवित्र ग्रंथों का संस्कृत भाषा से हिंदी भाषा में अनुवाद किया जाने लगा. क्या है कोटि का अर्थ?:What is the meaning of Koti? कोटि के संस्कृत में दो अर्थ होते हैं – 33 koti gods एक करोड़ और दूसरा सर्वोच्च लेकिन आम बोलचाल की भाषा में कोटि शब्द को करोड़ के रूप में देखा गया, जिससे यह माना जाने लगा कि हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की संख्या 33 करोड़ है. हालांकि यहां कोटि का अर्थ सर्वोच्च है। ऐसे में चलिए जानते हैं कि 33 कोटि देवी-देवता कौन-से हैं। 33 koti gods names list:ग्रंथों में 33 देवताओं के बारे में लिखा है। ये 33 देवता अलग-अलग कोटियों या श्रेणियों में बताए हैं- 33 koti gods:मान्यताओं के अनुसार 33 कोटि देवताओं में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, इंद्र और प्रजापति आते हैं. कहीं कहीं इसमें इंद्र व प्रजापति की जगह दो अश्विनी कुमारों को शामिल किया गया है. ये हैं 33 कोटि देवी-देवता:These are 33 crore Gods and Goddesses 8 वासु – 1. आप 2. ध्रुव 3. सोम 4. धर 5. अनिल 6. अनल 7. प्रत्यूष 8. प्रभाष 11 रुद्र: 1.मनु 2.मन्यु 3.शिव 4.महत 5.ऋतुध्वज 6.महिनस 7.उम्रतेरस 8.काल 9.वामदेव 10.भव 11.धृत-ध्वज 12.आदित्य : 1. अंशुमान 2. अर्यमन 3. इंद्र 4. त्वष्टा 5. धातु 6. पर्जन्य 7. पूषा 8. भग 9. मित्र 10. वरुण 11. वैवस्वत 12. विष्णु इंद्र प्रजापति (इंद्र और प्रजापति या अश्विनी कुमार):Indra and Prajapati or Ashwini Kumar) इंद्र देवताओं के राजा माने जाते हैं, जो मेघ, वर्षा और युद्ध के देवता हैं। प्रजापति ब्रह्मा का एक रूप माने जाते हैं, जो सृष्टि के रचयिता हैं। कई शास्त्रों में इनके स्थान पर अश्विनी कुमारों को 33 कोटि देवताओं में शामिल किया गया है। ये दोनों जुड़वां देवता हैं और आयुर्वेद से जुड़े हैं।

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History Of Kedarnath Temple:नर-नारायण और पांडवों से जुड़ा है केदारनाथ का इतिहास, आदिगुरु शंकराचार्य ने कराया था मंदिर का जिर्णोद्धार

History Of Kedarnath Temple:शिव जी का पांचवां ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड में है। इसका नाम है केदारनाथ। ये मंदिर उत्तराखंड के चारधामों में भी शामिल है। शिव जी के इस धाम का इतिहास भगवान विष्णु के अवतार नर-नारायण, पांडव और आदिगुरु शंकराचार्य से जुड़ा है। ये मंदिर हिमालय क्षेत्र में है, इस वजह से शीत ऋतु के समय करीब 6 महीने बंद रहता है और ग्रीष्म ऋतु के समय भक्तों के लिए खोला जाता है। जानिए पांचवें ज्योतिर्लिंग से जुड़ी खास बातें… History Of Kedarnath Temple:नर-नारायण के तप से प्रसन्न होकर प्रकट हुए थे शिव जी पांडवों से जुड़ी है केदारनाथ की मान्यता:The belief of Kedarnath is related to Pandavas. History Of Kedarnath महाभारत के समय यानी द्वापर युग में केदार क्षेत्र में शिव जी ने पांडवों को बेल रूप में दर्शन दिए थे। वर्तमान मंदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने 8वीं-9वीं सदी में करवाया था। ये मंदिर उत्तराखंड के चार धामों में से एक है। मंदिर समुद्र तल से करीब 3,583 मीटर की ऊंचाई पर है। ये मंदिर हिमालय क्षेत्र में है, इस कारण शीत ऋतु के दिनों में बंद रहता है। गुरु शंकराचार्य ने कराया था मंदिर का जिर्णोद्धार:Guru Shankaracharya had renovated the temple मान्यता है कि ये केदारनाथ धाम में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। स्वयंभू शिवलिंग का अर्थ है जो स्वयं प्रकट हुआ है। History Of Kedarnath केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडव राजा जनमेजय ने करवाया था। बाद में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर का जिर्णोद्धार करवाया। मंदिर से जुड़ी अन्य खास बातें:Other special things related to the temple केदारनाथ मंदिर में सोना लगाने का इतिहास:History of applying gold in Kedarnath temple केदारनाथ मंदिर में सोना लगाने के इतिहास का जिक्र नहीं मिलता है. हालांकि ऐसा दावा किया जाता है कि History Of Kedarnath केदारनाथ मंदिर के निर्माण के बाद से 12 वीं शताब्दी तक यहां सोना-चांदी लगाया जाता था, इसके बाद यह प्रथा खत्म हो गई. पिछले साल जब यहां सोने की परत चढ़ाने काम काम शुरू हुआ था उससे पहले यहां दीवारों पर चांदी की परत चढ़ी थी. जब सोने की परत का काम शुरू हुआ तो पुजारियों ने विरोध किया था. उस वक्त केदार सभा के पूर्व अध्यक्ष महेश बगवाड़ी ने कहा था कि मंदिर की दीवारों पर सोना चढ़ाना हिंदू मान्यताओं और परंपराओं के अनुरूप है. उस वक्त BKTC के चेयरमैन अजेंद्र अजय ने भी कहा था कि यह सामान्य प्रक्रिया है, पहले छत लकड़ी से बनती थी, फिर पत्थर से बनी, इसके बाद तांबें की प्लेंटे आईं. उन्होंने विरोध को साजिश बताया था. महाभारत में है केदारनाथ का जिक्र:Kedarnath is mentioned in Mahabharata History Of Kedarnath केदारनाथ का इतिहास बेहद पुराना है, महाभारत में भी इसका जिक्र मिलता है, ऐसा दावा किया जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था. इसके पीछे यहां एक किवदंती भी है, ऐसा कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद गौत्र बंधुओं की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए पांडव भगवान शंकर के पास केदारघाटी गए. भोलेनाथ ने पांडवों को दर्शन न देने के लिए भैंसे का रूप रख लिया और जानवरों के बीच छिप गए. उन्हें ढूंढने के लिए भीम ने विशाल रूप रखकर घाटी के दोनों ओर पैर जमा लिए. जब भगवान शंकर पहचान लिए गए तो वह धरती में समाने लगे, तभी भीम ने उनका पृष्ठ भाग पकड़ लिया. इसके बाद भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन दिए. History Of Kedarnath केदारनाथ मंदिर में भगवान भोलेनाथ के इसी पृष्ठ भाग का पूजन होता है.

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शत्रुघ्न मंदिर:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने यहाँ की थी मौन तपस्या देवभूमि ऋषिकेश के गंगा नदी के किनारे राम झूला के पास स्थित है शत्रुघ्न मंदिर। यह मंदिर प्राचीन और प्रसिद्ध है। यह मंदिर भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न के नाम पर बनाया गया है। मंदिर शत्रुघ्न को समर्पित है। इस मंदिर में मुख्य रूप से बद्री नारायण की मूर्ती विराजमान है। इस कारण इस मंदिर को “बद्री नारायण मंदिर” के नाम से भी जानते है। आपको बता दे कि भारत में केवल 2 ही स्थानों पर शत्रुघ्न के मंदिर हैं। एक तो केरल के थ्रिसूर जिले में है और दूसरा उत्तराखंड के ऋषिकेश में। शत्रुघ्न मंदिर का इतिहास शत्रुघ्न मंदिर को 8 वीं सदी में अदि गुरु शंकराचार्य ने बनवाया था। ऋषिकेश में मुनि के रेती को मुनियों की तपोभूमि कहते है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शत्रुघ्न ने इसी स्थान पर मौन तपस्या की थी। जिस कारण इस स्थान को मौन की रेती के नाम से जानते थे। और अब इस जगह को मुनी की रेती के नाम से जाना जाता है। रावण के परिवार के लवणासुर का वध भगवान शत्रुघ्न द्वारा हुआ था। जिससे शत्रुघ्न को ब्रह्म दोष लग गया था। इस ब्रह्म दोष के निवारण के लिए वह ऋषिकेश आए थे और ऋषिकेश के इस स्थल पर उन्होंने मौन तपस्या की। तभी से यह मंदिर शत्रुघ्न मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। मंदिर का महत्व मंदिर में प्रत्येक पर्व को बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। परन्तु जन्माष्टमी और रामनवमी दो मुख्य पर्व है जिसे इस मंदिर में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस विशेष अवसर पर लोग दूर दूर से मंदिर में दर्शनों के लिए आते है। शत्रुघ्न का मंदिर कम होने के कारण भी यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। इस मंदिर के दर्शन और यहाँ के शांत वातावरण का अनुभव करने के लिए भी भक्त इस मंदिर में आते है। मंदिर की वास्तुकला मुख्य मंदिर में शत्रुघ्न के रूप में बद्री नारायण जी विराजित है। उनके साथ भगवान राम – सीता और लक्ष्मण की परतिमएं भी स्थापित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु जी भी विराजमान है। मंदिर के ठीक सामने ही गंगा घाट है। इस घाट को शत्रुघ्न घाट भी कहा जाता है। इस घाट की गंगा आरती अपने आप में बहुत अद्भुत है। यह घाट रामझूला और जानकी सेतु के मध्य स्थित है। गंगा आरती के समय ये ओर राम झूला रौशनी से जगमगाता है और इस घाट के दूसरी तरफ जानकी सेतु का दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखाई देता है। मंदिर का समय शत्रुघ्न मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:30 AM मंदिर का प्रसाद शत्रुघ्न मंदिर में फल, फूल, सूखा मेवा, मिठाई आदि का भोग लगाया जाता है।

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दक्षिण काली मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यह एक ऐसा मंदिर है जहां स्थापित माता की मूर्ति का मुख तो पूरब की ओर है, लेकिन मंदिर का नाम दक्षिण काली है। दक्षिण काली मंदिर आमतौर पर किसी मंदिर का नाम वहां स्थापित भगवान या उस स्थान के नाम पर रखा जाता है। लेकिन उत्तराखंड के हरिद्वार में एक ऐसा मंदिर है जहां स्थापित माता की मूर्ति का मुख तो पूरब की ओर है, लेकिन मंदिर का नाम दक्षिण काली है। शहर के नील धारा क्षेत्र में चंडी देवी मंदिर मार्ग पर स्थित प्राचीन दक्षिण काली मंदिर सिद्धपीठ है। इसकी महिमा कोलकाता में स्थित दक्षिणेश्वर मंदिर से कम नहीं है। देश में ऐसे सिर्फ 2 ही मंदिर हैं। मंदिर के नाम के साथ यहां की एक और खास बात है। पूरे देश में नवरात्रि 9 दिन की होती है, लेकिन यहां नवरात्रि पूरे 15 दिन तक मनाई जाती है। मां काली को समर्पित इस मंदिर में शनिवार को विशेष पूजा अर्चना ​की जाती है, जिससे माता प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सारे कष्ट दूर कर देती हैं। नवरात्रि के दिनों में यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। इस मंदिर में आए बिना तंत्र साधकों की साधना को पूरा नहीं माना जाता है। दक्षिण काली मंदिर का इतिहास बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 351 में हुई। इसका विवरण स्कंध पुराण में भी किया गया है। कलकत्ता के काली व शिवभक्त गुरु कमराज ने मां की मूर्ति को यहां स्थापित किया था। इसलिए इस धाम को कमराज पीठ, अमरा गुरु और दक्षिण काली के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, नील धारा क्षेत्र में ही माता कमराज के सपने में आईं और 108 नरमुंडों से मंदिर निर्माण की स्थापना की बात कही। जब कमराज ने पूछा कि इतने सारे नरमुंड वह कहां से लाएंगे, तो माता ने बताया कि इस जगह पर महामशान है। यहां आने वाले मुर्दों को जीवित कर उनकी इच्छा से 108 नरमुंडों की बलि दो। बताया जाता है कि 108 नरमुंडों के ऊपर ही मंदिर का निर्माण किया गया है। हालांकि, माता की मूर्ति कहां से आई, इसकी कोई जानकारी नहीं है। कहा जाता है कि माता की यह प्रतिमा लाखों सालों से यहां है, जोकि स्वयंभू है। यानी अपने आप प्रकट हुई है। इस मंदिर का सागर मंथन से भी कनेक्शन है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सागर मंथन के दौरान जब कालकूट विष निकला तब महादेव ने संसार की रक्षा के लिए पूरा विष अपने कंठ में धारण कर लिया। जिसके बाद महादेव ने विष के असर को कम करने के लिए कजरीवन में बह रह गंगा जी में स्नान किया था। बताया जाता है कि भगवान के स्नान के बाद विष के कारण कजरीवन में गंगा जी की धारा नीली हो गई। गंगा की इसी धारा को ही नीलधारा कहा गया। इसी नीलधारा के तट पर विराजमान हैं मां काली। दक्षिण काली मंदिरका महत्व माना जाता है कि खुद काल भैरव दक्षिण काली मंदिर की रक्षा करते हैं। कहा जाता है कि मंदिर के आसपास काले व सफेद रंग के नाग-नागिन के जोड़े रहते हैं, जोकि सिर्फ सावन के दिनों में दिखाई देते हैं। शनिवार के दिन इस मंदिर में मां काली की अराधना करने से बड़े से बड़ा विघ्न दूर हो जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि इस मंदिर में तंत्र साधक विशेष साधना करते हैं जिससे प्रसन्‍न होकर मां काली उन्‍हें अपना आशीर्वाद देती हैं। यहां नील धारा क्षेत्र में गंगा की धारा में स्‍नान करने पर सभी प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। दक्षिण काली मंदिरकी वास्तुकला गंगा की धारा मंदिर के दक्षिण की ओर से बहती है, इसलिए मंदिर का नाम दक्षिण काली मंदिर पड़ा। नील पर्वत माला व गंगा की तलहटी में मां काली विराजमान है। मंदिर के आसपास का वातावरण काफी शांत है। इसी वजह से यहां आने वाले भक्तों का तनाव व परेशानी दूर हो जाती है। मंदिर के गर्भगृह में मां काली की मूर्ति विराजमान है। गर्भगृह के कोने में ही एक प्राचीन त्रिशूल लगा है, जोकि 2700 साल पुराना बताया जाता है। मंदिर के एक ओर नील पर्वत है तो दूसरी ओर मां गंगा की नील धारा। दक्षिण काली मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM शाम की आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद दक्षिण काली मंदिर में शनिवार को माता को पसंदीदा खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त माता को नारियल, गुलाब के फूल, काला जामुन, मीठा पान आदि अर्पित किया जाता है।

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Ganga Dussehra 2025 Date: गंगा दशहरा कब है? नोट कर लें डेट, पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त

Ganga Dussehra : हिंदू धर्म में गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान और दान-पुण्य के कार्यों का बड़ा महत्व है। यह दिन पापों से मुक्ति और मोक्ष के साथ पितरों को प्रसन्न करने के लिए बेहद खास माना जाता है। Ganga Dussehra 2025 Date :प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है। हिंदू धर्म में गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान और दान-पुण्य के कार्यों का बड़ा महत्व है। यह दिन पापों से मुक्ति और मोक्ष के साथ पितरों को प्रसन्न करने के लिए बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन ही मां गंगा का स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर आगमन हुआ था। मां गंगा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थीं। मां गंगा को संपूर्ण विश्व में सबसे पवित्र नदी माना जाता है। यह भी पढ़ें: Ganga Dussehra 2025: गंगा दशहरा पर करें पितृ चालीसा का पाठ, मिलेगा पितरों का आशीर्वाद हर साल ज्येष्ठ के महीने में गंगा दशहरा Ganga Dussehra के पर्व को बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। इसी वजह से इस दिन गंगा दशहरा का त्योहार मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर पवित्र नदी में स्नान करने का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन पवित्र नदी में स्नान करने से साधक को सभी पापों से छुटकारा मिलता है और मां गंगा की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन स्नान करने के बाद दीपदान जरूर करना चाहिए और गरीब लोगों में दान करें। ऐसा माना जाता है कि गंगा दशहरा (Ganga Dussehra 2025 Kab Hai) के दिन दान करने से मां गंगा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मां गंगा की कृपा से जीवन में सदैव अन्न और धन से भंडार भरे रहते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कब मनाया जाएगा गंगा दशहरा का पर्व। गंगा दशहरा 2025 डेट और  शुभ मुहूर्त 2025 डेट  (Ganga Dussehra 2025Date and Shubh Muhurat) Ganga Dussehra वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 04 जून को देर रात 11 बजकर 54 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 06 जून को देर रात 02 बजकर 15 मिनट पर होगा। ऐसे में 05 जून को गंगा दशहरा का पर्व उत्साह के साथ मनाया जाएगा। Ganga Dussehra Puja Vidhi:गंगा दशहरा पूजा-विधि: गंगा दशहरा के दिन सूर्योदय से पहले उठें। संभव हो तो गंगा नदी में स्नान करें या पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नानादि के बाद स्वच्छ कपड़े धारण करें। पीतल के लोटे में जल भरकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। आप चाहे तो गंगा दशहरा के दिन व्रत भी रख सकते हैं। शिव-गौरी और गंगा माता की विधि-विधान से पूजा-आराधना करें। भगवान शिव, मां दुर्गा, गंगा माता समेत सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें। पूजा समाप्त होने के बाद परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद वितरण करें। पूजा सामग्री की लिस्ट- पूजा के लिए गंगाजल, पान का पत्ता, आम का पत्ता, अक्षत, कुमकुम, दूर्वा, कुश, सुपारी, फल, फूल, नारियल, अनाज,सूत, कलश समेत सभी पूजन-सामग्री एकत्रित कर लें। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 23 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 07 बजकर 17 मिनट पर चंद्रोदय- दोपहर 02 बजकर 08 मिनट पर चंद्रास्त- 06 जून को देर रात 02 बजे शुभ समय (Today Shubh Muhurat) ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 02 मिनट से 04 बजकर 42 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 30 मिनट से 03 बजकर 22 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 07 बजकर 15 मिनट से 07 बजकर 35 मिनट तक निशिता मुहूर्त- रात 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 40 मिनट तक करें इन चीजों का दान गंगा दशहरा के दिन दान करने का खास महत्व है। इस दिन कपडों, मौसमी फल, धन, भोजन, शरबत से भरा मिट्टी का कलश समेत आदि चीजों का दान करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन चीजों का दान करने से साधक को धन की प्राप्ति होती है। साथ ही जीवन में शुभ परिणाम देखने को मिलते हैं।

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