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Shri Durga Panjara Stotram:श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्रम्

Shri Durga Panjara Stotram:श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्रम् विनियोगःॐ अस्य श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्रस्य सूर्य ऋषिः, त्रिष्टुप्छन्दः,छाया देवता, श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्र पाठे विनियोगः ।ध्यानम् ।ॐ हेम प्रख्यामिन्दु खण्डात्तमौलिं शङ्खाभीष्टा भीति हस्तां त्रिनेत्राम् ।हेमाब्जस्थां पीन वस्त्रां प्रसन्नां देवीं दुर्गां दिव्यरूपां नमामि ।अपराध शतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।यां गतिं समवाप्नोति नतां ब्रह्मादयः सुराः ।सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ॥ १॥ मार्कण्डेय उवाच –दुर्गे दुर्गप्रदेशेषु दुर्वाररिपुमर्दिनी ।मर्दयित्री रिपुश्रीणां रक्षां कुरु नमोऽस्तुते ॥ १॥ पथि देवालये दुर्गे अरण्ये पर्वते जले ।सर्वत्रोऽपगते दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ २॥ दुःस्वप्ने दर्शने घोरे घोरे निष्पन्न बन्धने ।महोत्पाते च नरके दुर्गेरक्ष नमोऽस्तुते ॥ ३॥ व्याघ्रोरग वराहानि निर्हादिजन सङ्कटे ।ब्रह्मा विष्णु स्तुते दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ४॥ खेचरा मातरः सर्वं भूचराश्चा तिरोहिताः ।ये त्वां समाश्रिता स्तांस्त्वं दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ५॥ कंसासुर पुरे घोरे कृष्ण Durga Panjara रक्षणकारिणी ।रक्ष रक्ष सदा दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ६॥ अनिरुद्धस्य रुद्धस्य दुर्गे बाणपुरे पुरा ।वरदे त्वं महाघोरे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ७॥ सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra) देव द्वारे नदी तीरे Durga Panjara राजद्वारे च सङ्कटे ।पर्वता रोहणे दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ८॥ दुर्गा पञ्जर मेतत्तु दुर्गा सार समाहितम् ।पठनस्तारयेद् दुर्गा नात्र कार्या विचारण ॥ ९॥ रुद्रबाला महादेवी क्षमा च परमेश्वरी ।अनन्ता विजया नित्या मातस्त्वमपराजिता ॥ १०॥ इति श्री मार्कण्डेयपुराणे देवीमहात्म्ये रुद्रयामले देव्याः पञ्जरस्तोत्रम् ।

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Santan Saptami

Santan Saptami 2025: 29 या 30 अगस्त? जानें सही तिथि, पूजा विधि और महत्व

Santan Saptami;प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए किया जाता है।Santan Saptami 2025 माताएं अपने बच्चों के कल्याण के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं।सनातन धर्म में संतान सप्तमी व्रत का खास महत्व है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने बच्चों की भलाई और सुरक्षा के लिए व्रत रखती हैं। इसके साथ ही शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। इस बार यह व्रत (Santan Saptami 2025 ) कब रखा जाएगा? इस वर्ष 2025 में, Santan Saptami 2025 संतान सप्तमी की तिथि को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति है। कई लोग जानना चाहते हैं कि संतान सप्तमी का व्रत 29 अगस्त को रखा जाएगा या 30 अगस्त को। आइए, इस भ्रम को दूर करते हैं और जानते हैं सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि। संतान सप्तमी डेट और पूजा मुहूर्त (Santan Saptami 2025 Date And Puja Time) Santan Saptami 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, सप्तमी तिथि का आरंभ 29 अगस्त को रात 08 बजकर 21 मिनट पर होगा। वहीं, इसका अंत 30 अगस्त को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। ऐसे में 30 अगस्त को संतान सप्तमी का उपवास रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 05 मिनट से दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। चूंकि उदय तिथि के अनुसार व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, इसलिए Santan Saptami 2025 संतान सप्तमी का व्रत 30 अगस्त 2025, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि रहेगी, जो व्रत के लिए सर्वाधिक मान्य है। संतान सप्तमी व्रत का महत्व:Importance of Santan Saptami fast धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत अपार पुण्य फलदायी होता है। इस व्रत को करने से: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा, जानें गणेश जी के विसर्जन की तिथियां… संतान सप्तमी 2025: पूजा विधि: Santan Saptami 2025: Puja method संतान सप्तमी के दिन व्रत और पूजा करने की विधि इस प्रकार है: निष्कर्ष संतान सप्तमी का व्रत माता-पिता के लिए उनकी संतान के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस वर्ष 30 अगस्त 2025 को श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत को रखें और भगवान शिव और माता पार्वती से अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करें। यह ब्लॉग पोस्ट आपकी वेबसाइट ‘कर्मसु’ के लिए बहुत उपयुक्त है, क्योंकि यह धार्मिक जानकारी को स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करती है, जो पाठकों के लिए उपयोगी है।

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Ganesh Visarjan

Ganesh Visarjan 2025 date: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा, जानें गणेश जी के विसर्जन की तिथियां…

Ganesh Visarjan: हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश उत्सव का शुभारंभ होता है. यह पर्व दस दिनों तक पूरे भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है, और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है. गणेश चतुर्थी का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसी दिन विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, प्रथम पूज्य श्री गणेश जी का प्राकट्य हुआ था. यह उत्सव केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष और अब तो विदेशों में भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, Ganesh Visarjan जहां दस दिनों तक अखंड भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ और सांस्कृतिक आयोजन होते रहते हैं. गृहस्थ लोग भी बप्पा की कृपा पाने के लिए अपने घर में गणेश जी को स्थापित करते हैं. गणेश चतुर्थी Ganesh Visarjan के दिन बप्पा को घर लाकर विधिवत पूजा करने के साथ उसी दिन या फिर डेढ़, तीन, पांच, सात दिन में, या फिर अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा को जल में विसर्जित करते हैं. Ganesh Visarjan विसर्जन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है. यदि आप भी घर पर गणपति बप्पा को लेकर आए हैं, तो द्रिक पंचांग और हिंदू पंचांग के अनुसार जान लें कि Ganesh Visarjan गणपति बप्पा को किस तिथि और किस समय विदा करना सबसे शुभ है. अनंत चतुर्दशी 2025 की तिथि और विसर्जन मुहूर्त: Anant Chaturdashi 2025 date and immersion time अनंत चतुर्दशी, जो गणेश उत्सव का अंतिम दिन होता है, 6 सितंबर 2025, शनिवार को मनाई जाएगी. • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ: 6 सितंबर 2025 को 03:12 ए एम बजे • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि समाप्त: 7 सितंबर 2025 को 01:41 ए एम बजे • उदया तिथि के हिसाब से अनंत चतुर्दशी: 6 सितंबर 2025 को अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन के शुभ मुहूर्त (6 सितंबर 2025, शनिवार) • प्रातः मुहूर्त (शुभ): 07:36 ए एम से 09:10 ए एम तक • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 12:19 पी एम से 05:02 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): 06:37 पी एम से 08:02 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 7 सितंबर को 09:28 पी एम से 01:45 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 7 सितंबर को 04:36 ए एम से 06:02 ए एम तक Ganesh Visarjan 2025 date: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा अनंत चतुर्दशी से पहले गणेश विसर्जन के अन्य शुभ मुहूर्त:Other auspicious times for Ganesh immersion before Anant Chaturdashi Ganesh Visarjan अगर आप पूरे दस दिनों तक बप्पा को नहीं रख सकते हैं, तो हिंदू पंचांग के अनुसार Ganesh Visarjan गणेश चतुर्थी के दिन, डेढ़ दिन बाद, तीसरे दिन, पांचवें दिन या सातवें दिन भी बप्पा का विसर्जन किया जा सकता है. इन दिनों पर विसर्जन के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: 1. गणेश चतुर्थी पर गणेश विसर्जन (27 अगस्त 2025, बुधवार): • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ): 03:35 पी एम से 06:48 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 28 अगस्त को 08:12 पी एम से 12:23 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 28 अगस्त को 03:10 ए एम से 04:33 ए एम तक 2. एक और आधा दिन (डेढ़ दिन) के बाद गणेश विसर्जन (28 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार) • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 12:22 पी एम से 03:35 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 05:11 पी एम से 06:47 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (अमृत, चर): 06:47 पी एम से 09:35 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 29 अगस्त को 12:22 ए एम से 01:46 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (शुभ, अमृत): 29 अगस्त को 03:10 ए एम से 05:58 ए एम तक 3. तीसरे दिन गणेश विसर्जन (29 अगस्त 2025, शुक्रवार): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 05:58 ए एम से 10:46 ए एम तक • अपराह्न मुहूर्त (चर): 05:10 पी एम से 06:46 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 12:22 पी एम से 01:58 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 09:34 पी एम से 10:58 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 30 अगस्त को 12:22 ए एम से 04:34 ए एम तक 4. पांचवें दिन गणेश विसर्जन (31 अगस्त 2025, रविवार): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 07:34 ए एम से 12:21 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 01:57 पी एम से 03:32 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 06:44 पी एम से 10:57 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 1 सितंबर को 01:46 ए एम से 03:10 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (शुभ): 1 सितंबर को 04:35 ए एम से 05:59 ए एम तक 5. सातवें दिन गणेश विसर्जन (2 सितंबर 2025): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 09:10 ए एम से 01:56 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 03:31 पी एम से 05:06 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): 08:06 पी एम से 09:31 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 3 सितंबर को 10:56 पी एम से 03:10 ए एम तक निष्कर्ष गणेश विसर्जन Ganesh Visarjan का पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में हर चीज़ का एक अंत होता है, Ganesh Visarjan और यह चक्र चलता रहता है. बप्पा को विधिवत विदा करने से वे अगले साल वापस आने का न्यौता स्वीकार करते हैं और आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. अस्वीकरण: यह लेख विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं. हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है. इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं. इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें

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Shri Mahaganapati Vajrapa njara Kavacham: श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचम्

Shri Mahaganapati Vajrapa njara Kavacham: श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचम् ॥ पूर्वपीठिका ॥ महादेवि गणेशस्य वरदस्य महात्मनः ।कवचं ते प्रवक्ष्यामि वज्रपञ्जरकाभिधम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचस्य श्रीभैरव ऋषिः,गायत्रं छन्दः, श्रीमहागणपति देवता, गं बीजं, ह्रीं शक्तिः,कुरु कुरु कीलकं, वज्रविद्यादिसिद्ध्यर्थेमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचपाठे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥ श्रीभैरवर्षये नमः शिरसि । गायत्रछन्दसे नमो मुखे ।श्रीमहागणपतिदेवतायै नमो हृदि । गं बीजाय नमो गुह्ये ।ह्रींशक्तये नमो नाभौ । कुरु कुरु कीलकाय नमः पादयोः ।वज्रविद्यादिसिद्ध्यर्थे महागणपतिवज्रपञ्जरकवचपाठेविनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ॥ करन्यासः ॥ गां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । गीं तर्जनीभ्यां नमः ।गूं मध्यमाभ्यां नमः । गैं अनामिकाभ्यां नमः ।गौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । गः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ ॥ अङ्गन्यासः ॥ गां हृदयाय नमः । गीं शिरसे स्वाहा । गूं शिखायै वषट् ।गैं कवचाय हुम् । गौं नेत्रत्रयाय वौषट् । गः अस्त्राय फट् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ विघ्नेशं विश्ववन्द्यं सुविपुलयशसं लोकरक्षाप्रदक्षंसाक्षात्सर्वापदासु प्रशमनसुमतिं पार्वतीप्राणसूनुम् ।प्रायः सर्वासुरेन्द्रैः ससुरमुनिगणैः साधकैः पूज्यमानंकारुण्येनान्तरायामितभयशमनं विघ्नराजं नमामि ॥ ॥ कवचपाठः ॥ ॐ श्रीं ह्रीं गं शिरः पातु महागणपतिः प्रभुः ।विनायको ललाटं मे विघ्नराजो भ्रुवौ मम ॥ १॥ पातु नेत्रे गणाध्यक्षो नासिकां मे गजाननः ।श्रुती मेऽवतु हेरम्बो गण्डौ मे मोदकाशनः ॥ २॥ द्वैमातुरो मुखं पातु चाधरौ पात्वरिन्दमः ।दन्तान्ममैकदन्तोऽव्याद्वक्रतुण्डोऽवताद्रसाम् ॥ ३॥ गाङ्गेयो मे गलं पातु स्कन्धौ सिंहासनोऽवतु ।विघ्नान्तको भुजौ पातु हस्तौ मूषकवाहनः ॥ ४॥ ऊरू ममावतान्नित्यं देवस्त्रिपुरघातनः ।हृदयं मे कुमारोऽव्याज्जयन्तः पार्श्वयुग्मकम् ॥ ५॥ प्रद्युम्नो मेऽवतात्पृष्ठं नाभिं शङ्करनन्दनः ।कटिं नन्दिगणः पातु शिश्नं विश्वेश्वरोऽवतु ॥ ६॥ मेढ्रे मेऽवतु सौभाग्यो भृङ्गिरीटी च गुह्यकम् ।विराटकोऽवतादूरू जानू मे पुष्पदन्तकः ॥ ७॥ जङ्घे मम विकर्तोऽव्याद्गुल्फावन्त्यगणोऽवतु ।पादौ चित्तगणः पातु पादाधो लोहितोऽवतु ॥ ८॥ पादपृष्ठं सुन्दरोऽव्यान्नूपुराढ्यो वपुर्मम ।विचारो जठरं पातु भूतानि चोग्ररूपकः ॥ ९॥ शिरसः पादपर्यन्तं वपुः सप्तगणोऽवतु ।पादादिमूर्धपर्यन्तं वपुः पातु विनर्तकः ॥ १०॥ विस्मारितं तु यत्स्थानं गणेशस्तत्सदाऽवतु ।पूर्वे मां ह्रीं करालोऽव्यादाग्नेये विकरालकः ॥ ११॥ दक्षिणे पातु संहारो नैरृते रुरुभैरवः ।पश्चिमे मां महाकालो वायौ कालाग्निभैरवः ॥ १२॥ उत्तरे मां सितास्योऽव्यादैशान्यामसितात्मकः ।प्रभाते शतपत्रोऽव्यात्सहस्रारस्तु मध्यमे ॥ १३॥ दन्तमाला दिनान्तेऽव्यान्निशि पात्रं सदाऽवतु ।कलशो मां निशीथेऽव्यान्निशान्ते परशुस्तथा ।सर्वत्र सर्वदा पातु शङ्खयुग्मं च मद्वपुः ॥ १४॥ ॐ ॐ राजकुले हौं हौं रणभये ह्रीं ह्रीं कुद्यूतेऽवतात्श्रीं श्रीं शत्रुगृहे शौं शौं जलभये क्लीं क्लीं वनान्तेऽवतु ।ग्लौं ग्लूं ग्लैं ग्लं गुं सत्त्वभीतिषु महाव्याध्यार्तिषु ग्लौं गं गौंनित्यं यक्षपिशाचभूतफणिषु ग्लौं गं गणेशोऽवतु ॥ १५॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इतीदं कवचं गुह्यं सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ।वज्रपञ्जरनामानं गणेशस्य महात्मनः ॥ १॥ अङ्गभूतं मनुमयं सर्वाचारैकसाधनम् ।विनानेन न सिद्धिः स्यात्पूजनस्य जपस्य च ॥ २॥ तस्मात्तु कवचं पुण्यं पठेद्वा धारयेत्सदा ।तस्य सिद्धिर्महादेवि करस्था पारलौकिकी ॥ ३॥ यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति पाठतः ।अर्धरात्रे पठेन्नित्यं सर्वाभीष्टफलं लभेत् ॥ ४॥ इति गुह्यं सुकवचं महागणपतेः प्रियम् ।सर्वसिद्धिमयं दिव्यं गोपयेत्परमेश्वरि ॥ ॥ श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Lord ganesha

Lord ganesha dreams meaning: सपने में भगवान गणेश का दिखना देता है यह संकेत, जान लें इसका मतलब

Dreams meaning: स्वप्न शास्त्र: सपने में भगवान गणेश को देखना देता है ये शुभ संकेत, जानिए क्या पड़ता है जीवन पर असर Lord ganesha: क्या आप भी सपने देखते हैं? अक्सर हम में से कई लोग ऐसे सपने देखते हैं जो हमें सुखद अनुभव देते हैं, वहीं कुछ सपने भयभीत भी कर सकते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर सपने का असल जिंदगी में वही मतलब नहीं होता जो हम सोचते हैं? Lord ganesha धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और शुभकर्ता कहा जाता है। सच्चे भाव से उनकी पूजा करने वाले भक्तों को किसी विघ्न का सामना नहीं करना पड़ता है। ऐसे में, अगर आपको सपने में भगवान गणेश के दर्शन हो जाएं, तो इसे बेहद शुभ और दुर्लभ माना जाता है! आइए जानते हैं Lord ganesha स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में गणपति का आना आपके जीवन पर क्या प्रभाव डालता है। Lord ganesha dreams meaning: सपने में भगवान गणेश का दिखना देता है 1. सपने में गणेशजी की पूजा करना स्वप्न शास्त्र कहता है कि यदि आप सपने में खुद को Lord ganesha भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करते देखते हैं, तो यह एक अत्यंत शुभ संकेत है। इसका अर्थ है कि आपको जल्द ही कोई खुशखबरी मिल सकती है। साथ ही, आप किसी समस्या से निजात पा सकते हैं और आने वाले दिनों में आपको आकस्मिक धनलाभ होने की भी संभावना है। यह दर्शाता है कि आप पर गणेश जी की असीम कृपा बनी रहेगी। 2. सुबह के समय गणेश जी का सपना आना अगर आपको सुबह के समय भगवान गणेश जी का सपना आता है, तो यह एक बहुत ही शुभ संकेत माना जाता है। इसका मतलब है कि आपकी कोई मनोकामना पूर्ण हो सकती है। आपको आर्थिक लाभ और धन-संपत्ति का लाभ भी मिल सकता है। करियर में आपको कोई अच्छा अवसर प्राप्त हो सकता है, और आपकी इच्छाओं की पूर्ति भी हो सकती है। 3. सपने में गणेशजी की मूर्ति दिखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आपको सपने में भगवान गणेश जी की मूर्ति दिखाई देती है, तो यह एक बेहद शुभ संकेत है। इस सपने का अर्थ है कि आपके घर-परिवार में कोई धार्मिक या मांगलिक कार्यक्रम हो सकता है। आपके जो रुके हुए काम थे, वे अब पूरे हो सकते हैं, और आपको आकस्मिक धनलाभ भी हो सकता है। Lord ganesha यह सपना किसी योजना में आपकी सफलता का भी सूचक है। इसके अलावा, आपको लंबे समय से जिस खुशखबरी का इंतजार था, वह जल्द ही सुनने को मिल सकती है। 4. गणेशजी को सवारी पर देखना यदि आप सपने में भगवान गणेश जी को मूषक पर सवारी करते हुए देखते हैं, तो यह एक अत्यंत शुभ संकेत माना गया है। इसका मतलब है कि आपको कहीं से धन की प्राप्ति हो सकती है। आपके कार्यों में सिद्धि मिल सकती है, और आपकी कोई मनोकामना पूरी होने वाली है या आपको नौकरी में तरक्की मिलने वाली है। यह सपना किसी शुभ यात्रा पर जाने और इच्छा पूर्ति का भी संकेत देता है। ध्यान रहे, ऐसे सपने को किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। सपने में मृत लोगों का दिखना: क्या हैं इसके शुभ-अशुभ संकेत? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य 5. सपने में गणेश जी का विसर्जन दिखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आपको सपने में गणेश जी का विसर्जन दिखता है, तो यह थोड़ा सावधानी बरतने का संकेत है। इसका मतलब है कि आपके जीवन में कुछ परेशानी आ सकती है। ऐसे में, आपको सावधान हो जाना चाहिए और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना शुरू कर देनी चाहिए, ताकि वे आपके विघ्नों को दूर करें। निष्कर्ष: कुल मिलाकर, सपने में भगवान गणेश का दिखना अधिकतर परिस्थितियों में एक बहुत ही सकारात्मक और दुर्लभ अनुभव होता है। यह आपके जीवन में आने वाली खुशियों, सफलता, धन लाभ और विघ्नों के नाश का संकेत देता है। Lord ganesha यहां तक कि विसर्जन का सपना भी, संभावित परेशानियों की चेतावनी देते हुए, अप्रत्यक्ष रूप से आपको भगवान की शरण में जाने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। तो, अगर आपने भी ऐसे सपने देखे हैं, तो इन संकेतों को समझें और सकारात्मकता के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ें!

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Parivartini ekadashi

Parivartini ekadashi 2025:परिवर्तिनी एकादशी पर जरूर करें इन चीजों का दान, सभी संकट होंगे दूर

Parivartini ekadashi: हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर व्रत किया जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि पर परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi 2025) व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से साधक को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है। Parivartini ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। उपासक पर उनकी कृपा बनी रहती है। प्रत्येक मास में दो एकादशी व्रत आते हैं। हर मास की एकादशियों का खास महत्व माना जाता है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार माह के लिये सो जाते हैं। इसलिये इन चार महीनों को चतुर्मास कहा जाता है और धार्मिक कार्यों, ध्यान, भक्ति आदि के लिये यह समय श्रेष्ठ माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आषाढ़, श्रावण, भादों, आश्विन ये चारों मास धार्मिक रूप से चतुर्मास और चौमासा के रूप में जाने जाते हैं और ऋतुओं में यह काल वर्षा ऋतु का। भगवान विष्णु चार महीनों तक सोते रहते हैं और देवोठनी एकादशी को ही जागृत होते हैं, लेकिन इन महीनों में एक समय ऐसा भी आता है कि सोते हुए भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं। यह समय होता है भादों मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का। इसलिये इसे परिवर्तिनी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है। आइये जानते हैं भादों मास की शुक्ल एकादशी यानि परिवर्तिनी एकादशी के बारे में – परिवर्तिनी एकादशी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Parivartini ekadashi 2025 Muhurat) इस साल 2025 पार्श्व एकादशी बुधवार, 3 सितम्बर 2025 को है। 4 सितम्बर को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय: दोपहर 01:36 से शाम 04:08 बजे तक। पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय: सुबह 10:18 बजे। एकादशी तिथि प्रारम्भ: 3 सितम्बर 2025 को सुबह 03:53 बजे से। एकादशी तिथि समाप्त: 4 सितम्बर 2025 को सुबह 04:21 बजे तक। परिवर्तिनी एकादशी व्रत एवं पूजा विधि? (Parivartini Ekadashi Vrat aur pooja vidhi) स्नान और संकल्प: इस दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा का संकल्प लेते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें। भगवान विष्णु की पूजा: भगवान विष्णु के वामन अवतार की मूर्ति या तस्वीर को एक साफ स्थान पर स्थापित करें। व्रत का पालन: इस दिन निर्जल या फलाहार व्रत करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। रामायण और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ: दिनभर विष्णु सहस्त्रनाम और रामायण का पाठ करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी पूजा सामग्री (Parivartini Ekadashi Pooja Samagri) इस एकादशी पर व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह व्रत पापों का नाश करता है और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत से मानसिक शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सभी दुखों का अंत होता है। परिवर्तिनी एकादशी का महत्व (Parivartini Ekadashi Mahatav) परिवर्तिनी एकादशी Parivartini ekadashi को पार्श्व एकादशी, वामन एकादशी, जयझूलनी, डोल ग्यारस, जयंती एकादशी आदि कई नामों से जाना जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत से वाजपेय यज्ञ जितना पुण्य फल उपासक को मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की आराधना की जाती है। जो साधक अपने पूर्वजन्म से लेकर वर्तमान में जाने-अंजाने किये गये पापों का प्रायश्चित करना चाहते हैं और मोक्ष की कामना रखते हैं उनके लिये यह एकादशी मोक्ष देने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा (Parivartini Ekadashi Vrat Katha) परिवर्तनी एकादशी की कथा भगवान विष्णु के वामना अवतार से जुड़ी हुई है। अपने वामनावतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली थी। राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था लेकिन उसमें एक गुण यह था कि वह किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं भेजता था उसे दान अवश्य देता था। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे भगवान विष्णु की चाल से अवगत भी करवाया लेकिन बावजूद उसके बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु को तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया। फिर क्या था दो पगों में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप दिया तीसरे पग के लिये कुछ नहीं बचा तो बलि ने अपना वचन पूरा करते हुए अपना शीष उनके पग के नीचे कर दिया। भगवान विष्णु की कृपा से बलि रसातल में पाताल लोक में रहने लगा लेकिन साथ ही उसने भगवान विष्णु को भी अपने यहां रहने के लिये वचनबद्ध कर लिया था। परिवर्तिनी एकादशी पर इन करें चीजों का दान (Parivartini Ekadashi Daan List) परिवर्तिनी एकादशी की पूजा के बाद दान करना शुभ माना जाता है। इस दिन सच्चे मन से अन्न, मिठाई, फल और धन का दान करें। मान्यता है कि इन चीजों का दान करने से पैसों की कमी का सामना नहीं करना पड़ता है। इसके अलावा जीवन के दुख और संकट को दूर करने के लिए परिवर्तिनी एकादशी पर दूध और दही का दान करें। माना जाता है कि ऐसा करने से सभी तरह की परेशानियों का अंत होता है।   अगर आप गृह क्लेश और रोग का सामना कर रहे है, तो ऐसे में परिवर्तिनी एकादशी व्रत करें और जल का दान करें। इससे कुंडली में पितृ और चंद्र दोष का प्रभाव कम होता है। इसके अलावा आर्थिक तंगी दूर होती है। परिवर्तिनी एकादशी के दिन पीले रंग के वस्त्र का दान करना शुभ माना जाता है, क्योंकि विष्णु जी को पीला रंग प्रिय है। ऐसा करने से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं।

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Rishi Panchami Katha PDF Download | ऋषि पंचमी व्रत कथा, विधि और महत्व

Rishi Panchami Katha PDF Download: हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक है ऋषि पंचमी व्रत, जो सप्तऋषियों को समर्पित होता है। यह व्रत विशेषकर महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से न केवल वर्तमान जन्म बल्कि पिछले जन्म के पाप भी समाप्त हो जाते हैं। इस बार ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:05 एएम से 01:39 पीएम तक रहेगा। ऋषि पंचमी का महत्व Rishi Panchami Vrat महिलाओं द्वारा विशेष रूप से किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने और कथा पढ़ने से महिला को ऋतुकाल में हुई भूलों और अज्ञानता से हुए दोषों से मुक्ति मिल जाती है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा कर उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। ऋषि पंचमी कथा (Rishi Panchami Katha Pdf) प्राचीन समय में विदर्भ देश में उत्तक नाम का एक सदाचारी ब्राह्मण निवास किया करता थे। जिसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी और उन दोनों की दो संतानें थीं एक पुत्र और एक पुत्री। उसके पुत्र सुविभूषण ने वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया और कन्या का समयानुसार एक सामान्य कुल में विवाह कर दिया गया लेकिन कुछ ही दिनों में कन्या विधवा हो गई। जिसके बाद वह अपने मायके में रहने लगी। एक दिन कन्या अपने माता-पिता की सेवा करके एक शिलाखण्ड पर शयन कर रही थी कि तभी रात भर में उसके शरीर में कीड़े पड़ गए। सुबह के समय कुछ शिष्यों ने उस कन्या को इस हालत में देखा तो उन्होंने उसकी जानकारी उसकी माता सुशीला को दी। अपनी पुत्री की यह दशा देख के माता विलाप करने लगी और पुत्री को उठाकर ब्राह्मण के पास लाई। ब्राह्मणी ने हाथ जोड़कर कहा- महाराज! यह क्या कारण है कि मेरी पुत्री के सारे शरीर में कीड़े पड़ गए हैं? तब ब्राह्मण ने ध्यान धरके देखा तो पता चला कि उसकी पुत्री ने सात जन्म पहिले अजस्वला होते हुए भी घर के तमाम बर्तन, भोजन, सामग्री को छू लिया था और ऋषि पंचमी व्रत का भी अनादर किया था उसी दोष के कारण इस पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गए क्योंकि रजस्वला वाली स्त्री का पहला दिन चांडालिनी के बराबर, दूसरा दिन ब्रह्मघातिनी के समान, तीसरा दिन धोबिन के समान होता है। ब्राह्मण ने बताया कि कन्या ने ऋषि पंचमी व्रत के दर्शन अपमान के साथ किये जिससे उसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं । ऋषि पंचमी व्रत विधि (Rishi Panchami Vrat Vidhi) इस प्रकार व्रत करने से स्त्रियां सुंदरता, सौभाग्य, धन और संतान सुख प्राप्त करती हैं और पापों से मुक्ति पाकर उत्तम लोक को प्राप्त होती हैं। ऋषि पंचमी व्रत विधि (Rishi Panchami Vrat Vidhi) तब सुशीला ने कहा- महाराज! ऐसे उत्तम व्रत को आप विधि के साथ वर्णन कीजिए, जिससे सभी प्राणी इस व्रत से लाभ उठा सकें। ब्राह्मण बोले- यह व्रत भादो मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को धारण किया जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान कर व्रत धारण करके सायंकाल सप्तऋषियों का पूजन करना चाहिए, भूमि को शुद्ध गौ के गोबर से लीपने के बाद उस पर अष्ट कमल दल बनाकर नीचे लिखे सप्तऋषियों की स्थापना कर प्रार्थना करनी चाहिए। इस पूजा में महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ महर्षियों की मूर्ति की स्थापना कर आचमन, स्नान, चंदन, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य आदि पूजन कर व्रत की सफलता की कामना करनी चाहिए। इस व्रत का उद्यापन भी विधि विधान करना चाहिए। चतुर्थी के दिन एक समय भोजन करके पंचमी को व्रत आरम्भ करें। सुबह नदी में स्नान कर गोबर से लीपकर सर्वतोभद्र चक्र बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। कलश के कण्ठ में नया वस्त्र बांधकर पूजा – सामग्री एकत्र कर अष्ट कमल दल पर सप्तऋषियों की सुवर्ण प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद षोडषोपचार से पूजन कर रात्रि को इसकी कथा का श्रवण करें फिर सुबह ब्राह्मण को भोजन दक्षिणा देकर व्रत पूर्ण करें। इस प्रकार से इस व्रत का उद्यापन करने से नारी सुन्दर रूप लावण्य को प्राप्त होकर सौभाग्यवती होकर धन व पुत्र से संतुष्ट हो उत्तम गति को प्राप्त होती है। Rishi Panchami Katha PDF Download क्यों करें? 👉 [Download Rishi Panchami Katha PDF Here]

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Parivartini Ekadashi 2025: परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Parivartini Ekadashi 2025: सितंबर माह में आने वाली पहली एकादशी परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) के नाम से जानी जाती है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत शुभ और लाभकारी महत्व बताया गया है, और यह व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में करवट लेते हैं, जिससे इस एकादशी का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। यह व्रत करने से व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। आइए जानते हैं परिवर्तिनी एकादशी 2025 की सही तारीख, इसका महत्व, पूजा विधि और व्रत पारण का समय। Parsva Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और….. Parivartini Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी 2025 कब है? वैदिक पंचांग के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी की तिथि इस प्रकार है: • एकादशी तिथि का आरंभ: 3 सितंबर 2025, बुधवार को सुबह 03 बजकर 53 मिनट से होगा। • एकादशी तिथि का समापन: अगले दिन 4 सितंबर 2025, गुरुवार को सुबह 04 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। • व्रत का दिन: ऐसे में, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 3 सितंबर 2025, बुधवार को रखा जाएगा। यह सितंबर 2025 महीने का पहला एकादशी व्रत होगा। नोट: एकादशी व्रत 2025 की एक सामान्य सूची में परिवर्तिनी एकादशी की तारीख 14 सितंबर 2025 भी दी गई है। हालांकि, नवभारत टाइम्स और लाइव हिंदुस्तान जैसे प्रमुख स्रोतों ने 3 और 4 सितंबर 2025 को परिवर्तिनी एकादशी के रूप में विशेष रूप से विस्तृत जानकारी दी है। इसलिए, अधिक विशिष्ट जानकारी के आधार पर, 3 सितंबर को व्रत रखा जाएगा। Parivartini Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी का महत्व परिवर्तिनी एकादशी Parivartini Ekadashi को पद्म एकादशी, पार्श्व एकादशी और जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान योग निद्रा में वास कर रहे भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं। यही वजह है कि इस दिन को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी पर व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और उसे सभी सुखों की प्राप्ति होती है। अंत में, व्यक्ति वैकुंठ लोक को प्राप्त होता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में धन, धान्य, सुख और समृद्धि आती है। परिवर्तिनी एकादशी 2025 पूजा विधि परिवर्तिनी एकादशी Parivartini Ekadashi का व्रत विधि-विधान से करने पर शुभ फल प्राप्त होते हैं। यहाँ पूजा विधि के चरण दिए गए हैं: 1. सुबह उठें और संकल्प लें: परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्नान के बाद पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। 2. मंदिर की सफाई और पंचामृत स्नान: इसके बाद भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को प्रणाम करें। पूजा के लिए मंदिर की अच्छी तरह से साफ-सफाई करें और सबसे पहले भगवान विष्णु को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण) से स्नान कराएं। 3. सामग्री अर्पित करें: स्नान के बाद भगवान विष्णु को पीले फूल, अक्षत (साबुत चावल), सुपारी और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। 4. मंत्र जप: इस दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का लगातार जप करते रहें। 5. व्रत कथा और आरती: इसके बाद परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। 6. व्रत पारण: एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में किया जाता है। शुभ योग और पूजन मुहूर्त परिवर्तिनी एकादशी 2025 पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जिनमें किए गए कार्य शुभ फलदायी होते हैं: • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 30 मिनट से सुबह 05 बजकर 15 मिनट तक। • रवि योग: सुबह 06 बजे से रात 11 बजकर 08 मिनट तक रहेगा। • अन्य शुभ योग: इस दिन आयुष्मान योग और सौभाग्य योग का भी शुभ संयोग बन रहा है। परिवर्तिनी एकादशी 2025 व्रत पारण का समय व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करना चाहिए। परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण 4 सितंबर 2025, गुरुवार को किया जाएगा। • पारण का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 36 मिनट से शाम 04 बजकर 07 मिनट तक रहेगा। पारण करने से पहले ब्राह्मणों को भोजन करवाने या अन्न का दान करने का विधान है। एकादशी व्रत के सामान्य नियम एकादशी व्रत के कुछ सामान्य नियम भी हैं जिनका पालन करना महत्वपूर्ण है: • चावल वर्जित: एकादशी के दिन चावल और चावल से बनी चीजों का सेवन वर्जित माना गया है। • सात्विक भोजन: मांस-मदिरा, लहसुन, प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। • संयम: इस दिन स्त्री-पुरुष को संयम भाव से रहना चाहिए और मन तथा वाणी से किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं रखना चाहिए। • रात्रि जागरण: एकादशी व्रत रखने वाले व्यक्ति के लिए रात्रि में जागरण करके भगवान का ध्यान और भजन करने का भी विधान है। • दान-पुण्य: एकादशी के दिन दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। यह व्रत श्रद्धा और भक्तिभाव से करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

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Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर करें ये 5 उपाय, गणपति बप्पा की कृपा से घर आएगी सुख-समृद्धि

Ganesh Chaturthi 2025 Upay: गणेश चतुर्थी पर कुछ उपायों को करने से जीवन में सुख-शांति व समृद्धि आती है। जानें भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी पर क्या उपाय करना चाहिए। Ganesh chaturthi remedies 2025: भगवान गणेश के जन्मदिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन बुद्धि, समृद्धि व सौभाग्य के देवता गणपति बप्पा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में भगवान गणेश की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करते हैं। Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिन तक मनाया जाता है और अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। Ganesh Chaturthi भगवान गणेश की कृपा या आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लोग इस दिन कई तरह के उपाय करते हैं। मान्यता है कि इस दिन कुछ उपायों को करने से गणपति बप्पा की कृपा से जीवन में धन-संपदा आती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। जानें गणेश चतुर्थी के दिन क्या करें उपाय। Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर करें ये 5 उपाय 1. भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अति प्रिय माने गए हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। 2. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास) के जोड़े और शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से धन की स्थिति में सुधार होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है। 3. भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से गणेश जी की कृपा से मनवांछित फल मिलता है और धन-धान्य बढ़ता है। 4. अगर संभव हो सके हो तो, गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को हरा चारा खिलाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से कार्यों की विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। 5. भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति मंदिर जाकर उनके दर्शन करने चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। Ganesh Chaturthi इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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हरतालिका तीज 2025: तिथि, महत्व, पूजा विधि, क्या करें और क्या न करें

हरतालिका तीज 2025: तिथि, महत्व, पूजा विधि, क्या करें और क्या न करें हरतालिका तीज सुहागिन और अविवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के मिलन की स्मृति में रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती ने कठोर तप करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। इसलिए इस दिन का व्रत करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य और अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। हरतालिका तीज 2025 कब है? यह व्रत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। हरतालिका तीज का महत्व हरतालिका तीज पूजा विधि (Step by Step) हरतालिका तीज पर क्या न करें हरतालिका तीज 2025 FAQ Q1. हरतालिका तीज कब है?26 अगस्त 2025, मंगलवार को। Q2. इस व्रत को कौन रख सकता है?विवाहित और अविवाहित महिलाएँ दोनों। Q3. क्या निर्जला व्रत ही करना ज़रूरी है?नहीं, स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार भी किया जा सकता है। Q4. हरतालिका तीज किसके लिए की जाती है?अखंड सौभाग्य और मनचाहा वर प्राप्त करने के लिए। निष्कर्ष हरतालिका तीज 2025 का व्रत मंगलवार, 26 अगस्त को मनाया जाएगा। यह व्रत न सिर्फ़ वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने में सहायक है बल्कि अविवाहित कन्याओं को अच्छे पति की प्राप्ति भी कराता है। इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत-पूजन करने से माता पार्वती और भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। हरतालिका तीज 2025, Hartalika Teej 2025 Date, हरतालिका तीज व्रत, हरतालिका तीज का महत्व, हरतालिका तीज पूजा विधि, Hartalika Teej Vrat Katha, हरतालिका तीज क्या करें क्या न करें सखा, क्या चाहोगे मैं इस

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Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः

Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥दण्डकारण्यमुवाच ।नमस्ते गजवक्त्राय गणेशाय महोदर ।ब्रह्मणे ब्रह्मपालाय विघ्नेशाय नमो नमः ॥ ३८॥हेरम्बाय चतुर्बाहुधराय कञ्जपाणये ।पाशाङ्कुशधरायैव परेशाय नमो नमः ॥ ३९॥अनादये च सर्वेषामादिरूपाय ते नमः ।ज्येष्ठानां ज्येष्ठरूपाय ज्येष्ठाय वै नमो नमः ॥ ४०॥स्वानन्दवासिने तुभ्यं सिद्धिबुद्धिवराय च ।सिद्धिबुद्धिप्रदात्रे ते मूषकध्वजिने नमः ॥ ४१॥मूषकोपरिसंस्थाय गणेशाय परात्मने ।नानामायाप्रचालाय मयूरेशाय ते नमः ॥ ४२॥नायकानां विशेषेण नायकाय विनायक ।नायकैर्वर्जितायैव नायकत्वप्रदायिने ॥ ४३॥विघ्नेशाय महाविघ्नधारिणे सर्वदायिने ।पददात्रे तथा हन्त्रे विघ्नेशैस्ते नमो नमः ॥ ४४॥अमेयशक्तये तुभ्यं सर्वपूज्याय ते नमः ।किं स्तौमि त्वां गणाधीश योगाकारस्वरूपिणम् ॥ ४५॥अधुना वरदोऽसि त्वं तदा मे नाम सार्थकम् ।कुरु नित्यं वस स्वामिन् मम देहे गजानन ॥ ४६॥भक्तिं देहि त्वदीयां मे सदा ब्रह्मप्रकाशिनीम् ।तेनाऽहं कृतकृत्यश्च भविष्यामि गजानन ॥ ४७॥एवमुक्त्वा गणेशानं प्रणनाम कृताञ्जलिः ।भक्तिभावसमायुक्तं तञ्जगाद गजाननः ॥ ४८॥(फलश्रुतिः)श्रीगजानन उवाच ।त्वया कृतमिदं स्तोत्रं मदीयं सर्वसिद्धिदम् ।भविष्यति महारण्य भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् ॥ ४९॥त्वयोक्तं सफलं सर्वं भविष्यति सदा प्रियम् ।मामेव सर्वभावेन भजिष्यसि न संशयः ॥ ५०॥नानावतारवांश्चैव त्वद्देहस्थोऽहमञ्जसा ।भविष्यामि गणेशोक्त्वांऽतर्दधे देवसत्तमाः ॥ ५१॥अतो गणेशक्षेत्रं तु दण्डकारण्यमुत्तमम् ।सकलं तत्र सेवार्थं देवास्तस्य समाययुः ॥ ५२॥तेषां क्षेत्राणि देवेशा दण्डकारण्यगानि तु ।तेषु स्थिता विशेषेण भजन्ते गणनायकम् ॥ ५३॥सर्वेष्वरण्यदेशेषु गणेशः प्रतितिष्ठति ।दण्डकारण्यमध्ये स विशेषेणावतारकृत् ॥ ५४॥दण्डकारण्यकं सर्वं गणेशक्षेत्रमुच्यते ।मयूरक्षेत्रं तन्मध्ये भिन्नं स्वानन्दवाचकम् ॥ ५५॥ इति दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः सम्पूर्णा ॥एकादशस्तोत्रं– ॥ मुद्गलपुराणं षष्टः खण्डः । अध्यायः १३ । ६.१३ ३८-५५॥

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Shri Gajananastotram: श्रीगजाननस्तोत्रम्

Shri Gajananastotram: श्रीगजाननस्तोत्रम् श्रीगणेशाय नमः । जय देव गजानन प्रभो जय सर्वासुरगर्वभेदक ।जय सङ्कटपाशमोचन प्रणवाकार विनायकाऽव माम् ॥ १॥ तव देव जयन्ति मूर्तयः कलितागण्यसुपुण्यकीर्तयः ।मनसा भजतां हतार्तयः कृतशीघ्राधिककामपूर्तयः ॥ २॥ तव रम्यकथास्वनादरः स नरो जन्मलयैकमन्दिरम् ।न परत्र न चेह सौख्यभाङ् निजदुष्कर्मवशाद्विमोहभाक् ॥ ३॥ गजवक्त्र तवाङ्घ्रिपङ्कजे ध्वजवज्राङ्कयुते सदा भजे ।तव मूर्तिमहं परिष्वजे त्वयि हृन्मेऽस्तु सुमूषकध्वजे ॥ ४॥ त्वदृते हि गजानन प्रभो न हि भक्तौघसुखौघदायकः ।सुदृढा मम भक्तिरस्तु ते चरणाब्जे विबुधेश विश्वपाः ॥ ५॥ फलपूरगदेक्षुकार्मुकैर्युत रुक्चक्रधराब्जपाशधृक् ।अव वारिजशालिमञ्जरीरदधृग्रत्नघटाढ्यशुण्ड माम् ॥ ६॥ करयुग्मसुहेमश‍ृङ्खल द्विजराजाढ्यक तुन्दिलोदर ।शशिसुप्रभ विद्यया युत स्तनभारानमितेड्य रक्ष माम् ॥ ७॥ शशिभास्करवीतिहोत्रदृक् शुभसिन्दूररुचे विनायक ।द्विपवक्त्र महाहिभूषण त्रिदिवेशासुरवन्द्य पाहि माम् ॥ ८॥ सृणिपाशवरद्विजैर्युत द्विजराजार्धक मूषकध्वज ।शुभलोहितचन्दनोक्षित श्रुतिवेद्याभयदायकाऽव माम् ॥ ९॥ स्मरणात्तव शम्भुविध्यजेन्द्विनशक्रादिसुराः कृतार्थताम् ।गणपाऽऽपुरघौघभञ्जन द्विपराजास्य सदैव पाहि माम् ॥ १०॥ शरणं भगवान्विनायकः शरणं मे सततं च सिद्धिका ।शरणं पुनरेव तावुभौ शरणं नान्यदुपैमि दैवतम् ॥ ११॥ गलद्दानगण्डं महाहस्तितुण्डं सुपर्वप्रचण्डं धृतार्धेन्दुखण्डम् ।करास्फोटिताण्डं महाहस्तदण्डं हृताढ्यारिमुण्डं भजे वक्रतुण्डम् ॥ १२॥ गणनाथ निबन्धसंस्तवं कृपयाङ्गीकुरु मत्कृतं ह्यमुम् ।इदमेव सदा प्रदीयतां करुणा मय्यतुलाऽस्तु सर्वदा ॥ १३॥ इति गजाननस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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