काली मां ने क्यों रखा शिव जी के ऊपर पैर? | Kali Maa And Shiva Story In Hindi

प्राचीन काल में राक्षस अपनी तपस्या के बल पर ऐसी शक्तियां प्राप्त कर लेते थे, जिनके सामने टिकना देवताओं के लिए भी मुश्किल हो जाता था। राक्षस अपनी शक्तियों का प्रयोग करके आतंक और भय फैलाते थे। ऐसी ही एक घटना रक्तबीज नाम से राक्षस से जुड़ी है। रक्तबीज का अंत मां काली के हाथों हुआ, लेकिन इस दौरान गलती से मां काली का पांव भगवान शिव के ऊपर आ गया था। आइये, जानते हैं उस घटना के बारे में। एक बार रक्तबीज नाम के एक राक्षस ने भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे एक वरदान हासिल कर लिया। रक्तबीज को यह वरदान मिला था कि उसका खून जहां भी गिरेगा, वहां से उसी के समान राक्षस पैदा हो जाएगा। रक्तबीज को अपने इस गुण पर बहुत अभिमान था, इसलिए उसने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। घमंड में चूर रक्तबीज ने देवताओं को युद्ध के लिए ललकारा। देवता रक्तबीज से लड़ने के लिए आ गए, लेकिन जहां भी रक्त बीज का रक्त गिरता, वहां से एक और रक्त बीज पैदा हो जाता। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुत सारे रक्तबीज पैदा हो गए, जिन्हें हराने का कोई रास्ता देवताओं को दिखाई नहीं दे रहा था। घबरा कर सभी देवता मां दुर्गा के पास पहुंचे और अपने प्राणों की भीख मांगने लगे। मां दुर्गा ने रक्तबीज के वध के लिए काली का रूप धारण कर लिया। रक्तबीज को देखकर मां काली क्रोध से भर उठीं और अपनी जीभ को इतना फैला लिया कि सारे रक्तबीज उसमें समा गए। अब जहां भी रक्तबीज का रक्त गिरता, मां काली उसे पी जाती। रक्तबीज को समाप्त करते हुए मां इतनी क्रोधित हो गईं कि उनको शांत करना मुश्किल हो गया। काली मां का यह रूप विनाशकारी हो सकता था, इसलिए सभी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और बोले कि आप ही मां का क्रोध शांत कर सकते हैं। मां काली के क्रोध को शांत करना भगवान शिव के लिए भी आसान नहीं था, इसलिए भगवान शिव काली मां के मार्ग में लेट गए। क्रोधित मां काली ने जैसे ही भगवान शिव के ऊपर पांव रखा वो झिझक कर ठहर गईं और उनका गुस्सा शांत हो गया। इस तरह भगवान शिव ने देवताओं की मदद की और मां काली के गुस्से को शांत किया, जो सृष्टि के लिए भयानक हो सकता था।

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भगवान श्री गणेश की जन्म कथा | Ganesh Ji Ka Janam

गणेश जी के जन्म और हाथी वाले सिर की कहानी बहुत रोचक है। शिवपुराण के मुताबिक देवी पार्वती एक दिन हल्दी का उबटन लगा रही थी। तभी माता के कक्ष मे नंदी आ पहुंचा। यह देखकर उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने सोचा कि वह घर में अकेली रहती हैं, इसलिए जब जिसका मन करता है, उनके कक्ष में आ जाता है। अब मुझे एक ऐसा बेटा चाहिए, जो मेरे साथ रहे और किसी को अंदर न आने दें। यह सोचते-सोचते मां का उबटन सूख गया था। वो उबटन को धोने लगीं। उसी उबटन से उन्होंने एक बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उस बालक को माता पार्वती ने कहा, “तुम मेरे पुत्र हो और तुम्हें हमेशा मेरी आज्ञा को मानना होगा। उन्होंने आगे कहा, “देखो पुत्र, अब मैं स्नान के लिए अंदर जा रही हूं। तुम यह ख्याल रखना कि घर के अंदर कोई भी न आ पाए।” माता पार्वती का आदेश मिलते ही आज्ञा पालन के लिए गणेश भगवान द्वार पर जाकर खड़े हो गए। कुछ देर बाद वहां भगवान शिव जी आए। उन्होंने जैसे ही अंदर जाने का प्रयास किया, तो भगवान गणेश ने उनको रोक दिया। शिव शंभू ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की। जब वह नहीं मानें, तो भगवान ने गुस्से में आकर गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। उसी वक्त पार्वती स्नान करके बाहर आई और अपने पुत्र गणेश का सिर जमीन पर पड़ा देखकर क्रोधित हो गईं। उन्होंने भोलनाथ से नारजगी जताई और गणेश को वहां खड़ा करने की वजह भी बताई। इसके बाद पार्वती माता का गुस्सा शांत करने के लिए भगवान शिव ने हाथी का सिर गणेश के धड़ से जोड़ दिया। साथ ही यह भी आशीर्वाद दिया कि सभी देवताओं की पूजा से पहले पूरी दुनिया गणेश जी की पूजा करेगी।

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शेर कैसे बना मां दुर्गा का वाहन? | Sher Maa Durga Ki Sawaari

शेर के मां दुर्गा का वाहन बनने की कहानी तब शुरू होती है, जब देवी पार्वती घोर तपस्या करके भगवान शिव को पति के रूप में पाने की कोशिश कर रही थीं। सालों तक तप करने के बाद माता पार्वती को भोले भंडारी अपनी पत्नी के रूप में अपना लेते हैं। इसी बीच तपस्या की वजह से मां पार्वती का रंग काफी काला पड़ गया था। एक दिन ऐसे ही बातचीत के दौरान भगवान शिव मां पार्वती को काली कह देते हैं। यह बात उन्हें पसंद नहीं आती, वो नाराज होकर दोबारा तप करने के लिए चली जाती हैं। एक दिन बाद घूमते-घूमते एक शेर घोर तप कर रहीं मां पार्वती के पास पहुंचा। उन्हें खाने की इच्छा से वो वहां घूमता रहा। मां को तप में लीन देखकर शेर भी वहीं इंतजार करता रहा। देवी का इंतजार करते-करते सालों बीत गए। शेर मां पार्वती के तेज की वजह से उनके पास नहीं पहुंच पाता था। कोशिश करता और असफलता हाथ लगने पर दोबारा लौटकर कोने में बैठ जाता। होते-होते कई साल बीत गए। मां के तप से खुश होकर भगवान शिव प्रकट हुए और मां से मन चाहा वर मांगने को कहा। देवी पार्वती अपना गोरा रंग वापस चाहती हैं। भगवान ने आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए। वरदान मिलते ही मां पार्वती नहाने के लिए चली गईं। नहाते ही उनके शरीर से एक और देवी का जन्म हुआ, जिनका नाम कौशिकी पड़ा। उनके शरीर से काला रंग भी निकल गया था और मां का रंग पहले की तरह ही साफ हो गया। इसी वजह से माता पार्वती का नाम मां गौरी भी पड़ गया। नहाने के कुछ देर बाद मां की नजर शेर पर पड़ी। शेर को देखते ही उन्होंने भगवान शिव को याद किया और शेर के लिए भी वरदान मांगा। माता पार्वती ने भगवान से कहा, “हे नाथ! यह शेर सालों से मुझे भोजन के रूप में ग्रहण करने के लिए इंतजार कर रहा था। मेरे पूरे तप के दौरान यह यहीं था। जितना तप मैंने किया है, उतनी ही तपस्या इसने भी की है। इसी वजह से अब वरदान के रूप में इस शेर को मेरी सवारी बना दीजिए। भगवान ने प्रसन्न होकर माता की बात मान ली और शेर को उनकी सवारी बना दिया। आशीर्वाद मिलने के बाद माता शेर पर सवार हो गईं और तभी से उनका नाम मां शेरावाली और दुर्गा पड़ गया।

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भगवान गणेश को दूर्वा क्यों अर्पित की जाती है? | Ganpati Ko Durva Kyu Pasand Hai

बच्चों, आपने कई बार देखा होगा कि गणेश जी की पूजा करते समय दूर्वा का इस्तेमाल किया जाता है। दूर्वा एक प्रकार की घास होती है, जिसे कलावे यानी लाल धागे के साथ बांधकर गणेश जी को चढ़ाया जाता है। दरअसल, गणेश जी को दूर्वा चढ़ाने के पीछे एक रोचक कहानी है। तो कहानी ऐसे है कि प्राचीन काल में हर जगह राक्षसों का आतंक फैला हुआ था। राक्षस देवताओं और ऋषि मुनियों को बहुत परेशान किया करते थे। ऐसा ही एक राक्षस था अनलासुर। अनलासुर ने हर जगह हाहाकार मचा रखा था। सभी देवतागण उससे बहुत डरते थे। जब अनलासुर के पाप बहुत बढ़ गए तब सभी देवतागण भगवान शिव के पास पहुंचे। शिव जी ने कहा कि अनलासुर का विनाश सिर्फ गणेश जी कर सकते हैं। शिव भगवान की यह बात सुनकर सभी देवतागण श्री गणेश जी के पास पहुंचे। गणेश जी के सामने सभी हाथ जोड़कर खड़े हो गए और बोले हे प्रभु! हमें इस निर्दयी राक्षस से बचा लो। देवताओं की ऐसी दैन्य स्थिति को देखकर श्रीगणेश उनकी मदद के लिए तैयार हो गए। इस घटना के बाद अनलासुर और श्री गणेश जी के बीच भयानक युद्ध होता है। क्रोध में आकर श्री गणेश अनलासुर को निगल जाते हैं। अनलासुर का अंत हो जाता है, लेकिन गणेश जी के पेट में बहुत जलन होने लगती है। इस जलन को ठीक करने के लिए सभी देवता और ऋषि-मुनि उपचार खोजने में लग जाते हैं, लेकिन किसी भी उपचार से श्री गणेश जी के पेट की जलन कम नहीं होती। तब कश्यप ऋषि दूर्वा की 21 गांठ खाने के लिए गणेश जी को देते हैं। गणेश जी को दूर्वा के सेवन से आराम मिलता है और उनके पेट की जलन शांत हो जाती है। इससे खुश होकर गणेश जी कहते हैं कि आज के बाद जो कोई भी मुझे दूर्वा चढ़ाएगा, मैं उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी करूंगा।

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भगवान श्री गणेश और धन के देवता कुबेर की कहानी | Ganesh Aur Kuber Ki Kahani In Hindi

हिन्दू धर्म के अनुसार कुबेर धन और वैभव के देवता हैं। माना जाता है कि उनके पास ढेर सारा धन है और यह आपने सुना ही होगा कि जरूरत से अधिक पैसा व्यक्ति को अंधा बना देता है। बिलकुल ऐसा ही कुछ धन के देवता कुबेर के साथ भी हुआ। उन्हें लगने लगा कि तीनों लोकों में सबसे ज्यादा धन उन्ही के पास है और उन्हें इस बात पर घमंड होने लगा। एक दिन अपने धन का दिखावा करने के लिए धन के देवता कुबेर ने महाभोज का आयोजन किया। इस महाभोज में उन्होंने सभी देवतागण को बुलाया। कार्यक्रम का न्योता लेकर वो कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के पास भी गए और उन्हें विशेष अतिथि के रूप में आने का न्योता दिया। भगवान शिव ने एक बार में कुबेर के घमंड को भांप लिया और फिर सोचा कि इसे सही पाठ पढ़ाना जरूरी है। यह सोचकर उन्होंने कुबेर से कहा, “कुबेर, हमें तुम्हारा न्योता स्वीकार है, लेकिन किसी जरूरी काम के कारण हम महाभोज में नहीं आ पाएंगे, किंतु तुम चिंता न करो। हमारी जगह, हमारा पुत्र गणेश तुम्हारे कार्यक्रम में जरूर आएगा।” भगवान शिव की बात सुनकर कुबेर खुशी-खुशी वहां से चले गए। महाभोज का दिन आ गया। सभी देवतागण कुबेर के घर पधारने लगे। भगवान श्री गणेश भी समय से कार्यक्रम में पहुंच गए। जैसे ही भोजन शुरू हुआ, भगवान गणेश ने सारा भोजन खत्म कर दिया। जब कुबेर ने बाकी मेहमानों के लिए फिर से भोजन बनवाया, तो गणपति ने फिर से सारा भोजन खा लिया। भगवान गणेश कुबेर की रसोई में रखा सारा खाना खत्म करते जा रहे थे, लेकिन उनकी भूख शांत ही नहीं हो रही थी। धीरे-धीरे करके कुबेर के पास मौजूद सभी खाने की चीजें खत्म हो गईं, तो उन्होंने भगवान गणेश से कहा, “प्रभु और खाना आने में समय लगेगा। तब तक आप बैठ जाइए।” इस पर भगवान गणेश ने कहा, “अगर तुमने मुझे अभी भोजन नहीं दिया, तो मैं तुम्हारे महल में रखी हर चीज खा जाऊंगा।” यह सुनते ही कुबेर घबरा गए और उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया। वो तुरंत भगवान गणेश के पैरों में गिर गए और उनसे माफी मांग ली। कहानी से सीख दोस्तों, इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए।

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भगवान श्री गणेश को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाते? | Ganesh And Tulsi Story In Hindi

भारत में पूजा-पाठ का अपना ही एक महत्व है। यहां देवी-देवताओं की पूजा के लिए कई प्रकार की सामग्री चढ़ाई जाती है और तुलसी भी उन्हीं में से एक है। तुलसी को सबसे पवित्र पौधा माना गया है। वहीं, आपको जानकर हैरानी होगी कि एक भगवान ऐसे भी हैं, जिनको तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाए जाते हैं। वो देवता हैं भगवान गणेश। इसके पीछे के रोचक तथ्य को जानने के लिए पढ़ें यह कहानी। एक बार की बात है, भगवान गणेश गंगा किनारे तपस्या कर रहे थे। उसी दौरान देवी तुलसी अपनी शादी की इच्छा मन में लिए यात्रा पर निकलीं। यात्रा के दौरान उनकी नजर गंगा किनारे तपस्या करते हुए भगवान गणेश पर पड़ी। भगवान गणेश एक सिंहासन पर बैठकर तपस्या कर रहे थे, उनके पूरे शरीर पर चंदन लगा था, उन्होंने जेवर पहने थे और फूलों की माला पहनी हुई थी। भगवान गणेश को देख देवी तुलसी आकर्षित हो गईं और उनके सामने शादी का प्रस्ताव रखा। देवी तुलसी द्वारा तपस्या भंग होने से भगवान गणेश गुस्से में आ गए और शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया। इस बात से देवी तुलसी को भी गुस्सा आ गया। उन्होंने भगवान गणेश को श्राप दिया कि उनकी दो शादी होगी, वो भी उनकी इच्छा के बिना। इससे भगवान गणेश और क्रोधित हो गए और उन्होंने भी देवी तुलसी को श्राप दिया कि उनकी शादी किसी असुर से होगी। यह सुनकर देवी तुलसी बहुत दुखी हुईं और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान गणेश से माफी मांगी। भगवान गणेश ने माफी को स्वीकार किया और कहा कि श्राप तो वापस नहीं लिया जा सकता है, लेकिन तुम भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की प्रिय बनोगी। भविष्य में तुम्हें पवित्र पौधे के रूप में पूजा जाएगा, लेकिन तुम्हे मेरी पूजा में शामिल नहीं किया जाएगा।

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बाल गणेश और घमंडी चंद्रमा की कहानी | Bal Ganesh Aur Chandrama Ki Kahani

हर किसी को मालूम है कि गणेश जी को मोदक और मिठाई कितनी पसंद है। शायद इसलिए भी वो किसी के भी निमंत्रण को स्वीकार कर लेते हैं और पेट के साथ ही मन भर कर मिठाई खाते हैं। एक बार की बात है धनपती कुबेर ने भगवान शिव और माता पार्वती को भोज पर बुलाया, लेकिन भगवान शिव ने कहा कि मैं कैलाश छोड़कर कहीं नहीं जाता हूं और पार्वती जी ने कहा कि मैं अपने स्वामी को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती, तब उन्होंने कहा कि आप हमारे स्थान पर गणेश को ले जाओ, वैसे भी उन्हें मिठाई और भोज बहुत पसंद आते हैं। तब कुबेर गणेश जी को अपने साथ भोज पर ले गए। वहां उन्होंने मन भर कर मिठाई और मोदक खाए। वापस आते समय कुबेर ने उन्हें मिठाई का थाल देकर विदा किया। लौटने समय चन्द्रमा की चांदनी में गणेश जी अपने चूहे पर बैठकर आ रहे थे, लेकिन ज्यादा खा लेने के कारण बड़ी ही मुश्किल से अपने आप को संभाल पा रहे थे। उसी समय अचानक चूहे का पैर किसी पत्थर से लगकर डगमगाने लगा। इससे गणेशी जी चूहे के ऊपर से गिर गए और पेट ज्यादा भरा होने के कारण अपने आप को संभाल नहीं सके और मिठाइयां भी यहां-वहां गिर गईं। यह सब चन्द्र देव ऊपर से देख रहे थे। उन्होंने जैसे ही गणेश जी को गिरता देखा, तो अपनी हंसी रोक नहीं पाए और उनका मजाक उड़ाते हुए बोले कि जब खुद को संभाल नहीं सकते, तो इतना खाते क्यों हो। चन्द्रमा की बात सुनकर गणेश जी को गुस्सा आ गया। उन्होंने सोचा कि घमंड में चूर होकर चन्द्रमा मुझे उठाने के लिए किसी प्रकार की सहायता नहीं कर रहा है और ऊपर से मेरा मजाक उड़ा रहा है। इसलिए, गणेश जी ने चन्द्रमा को श्राप दिया कि जो भी गणेश चतुर्थी के दिन तुमको देखेगा वह लोगाें के सामने चोर कहलाएगा। श्राप की बात सुनकर चन्द्रमा घबरा गए और सोचने लगे कि फिर तो मुझे कोई भी नहीं देखेगा। उन्होंने शीघ्र ही गणेश जी से माफी मांगी। कुछ देर बात जब गणेश जी का गुस्सा शांत हुआ, तब उन्होंने कहा कि मैं श्राप तो वापस नहीं ले सकता, लेकिन तुमको एक वरदान देता हूं कि अगर वहीं व्यक्ति अगली गणेश चतुर्थी को तुमको देखेगा, तो उसके ऊपर से चाेर होने का श्राप उतर जाएगा। तब जाकर चन्द्रमा की जान में जान आई। इसके अलावा एक और कहानी सुनने में आती है कि गणेश जी ने चन्द्रमा को उनका मजाक उड़ाने पर श्राप दिया था कि वह आज के बाद किसी को दिखाई नहीं देंगे। चन्द्रमा के मांफी मांगने पर उन्होंने कहा कि मैं श्राप वापस तो नहीं ले सकता, लेकिन एक वरदान देता हूं कि तुम माह में एक दिन किसी को भी दिखाई नहीं दोगे और माह में एक दिन पूर्ण रूप से आसमान पर दिखाई दोगे। बस तभी से चन्द्रमा पूर्णिमा के दिन पूरे दिखाई देते हैं और अमावस के दिन नजर नहीं आते।

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मां काली के जन्म की कथा | Story Of Maa Kali In Hindi

सभी देवी-देवताओं के जन्म की कई कहानियां प्रचलित हैं और बिलकुल इसी तरह मां काली के जन्म से जुड़ी कई कथाएं सुनाई जाती हैं। उन सभी कथाओं में से एक कहानी है, जो सबसे ज्यादा प्रचलित है। बात उन दिनों की है, जब एक शक्तिशाली राक्षस, दारुण का अत्याचार तीनों लोकों में बढ़ गया था। तीनों लोकों में सभी इससे बहुत परेशान थे। सारे देवता दारुण के हाथों मात खा चुके थे। दारुण को वरदान मिला था कि उसकी मृत्यु एक स्त्री के हाथों ही हो सकती है। इस कारण सभी देवता हाथ जोड़कर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे कि वे इसका कोई समाधान निकालें। इसके बाद ब्रह्मा जी ने एक स्त्री का रूप लिया और दारुण से युद्ध करने चले गए, लेकिन वो भी इस असुर को हरा नहीं पाए। अंत में सभी देवता, ब्रह्मा जी के साथ भगवान शिव के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे कुछ करें। सभी की प्रार्थना सुनने के बाद, शिव जी ने मुस्कुराते हुए माता पार्वती की तरफ देखा। उनका इशारा समझते हुए माता पार्वती ने अपनी शक्ति का एक अंश निकाला। वह एक चमकता हुआ तेज था, जो देखते ही देखते भगवान शिव के नीलकंठ से होते हुए उनके शरीर में प्रवेश कर गया। इसके बाद भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली और तीनों लोक थर-थर कांपने लगे। भगवान शिव की तीसरी आंख खुलने के बाद वह शक्ति उनकी उस आंख से बाहर निकली, जिसे देखकर वहां खड़े सारे देवता घबरा गए। उस शक्ति ने एक विशाल और रौद्र स्त्री रूप ले लिया था। उनका रंग रात-सा काला गहरा और जुबान खून जैसी लाल थी। चेहरे पर आग-सा तेज था और माथे पर तीसरी आंख थी। इस तरह राक्षसों को खत्म करने के लिए हुआ मां काली का जन्म। इसके बाद उन्होंने कुछ ही देर में असुर दारुण और उसकी सेना का नाश कर दिया। उन सभी दानवों को खत्म करने के बाद भी मां काली का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था। इसके बाद उनका गुस्सा शांत करने के लिए भगवान शिव ने एक बच्चे का रूप लिया और उनके सामने आ गए। भगवान शिव को देखते ही मां काली का गुस्सा शांत हो गया और उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया।

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दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश का पूजन क्यों किया जाता है? | Diwali Par Laxmi Ganesh Ki Puja Kyon Karte Hain

बच्चों क्या आप जानते हो कि दिवाली में लक्ष्मी जी के साथ विष्णु जी की जगह गणेश जी को क्यों पूजा जाता है? इसके पीछे एक रोचक कहानी है। लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा का जिक्र कई पौराणिक कथाओं में हुआ है। एक समय की बात है जब किसी वैरागी साधु को राजाओं की तरह सुख भोगने की लालसा होने लगी। इसलिए, वह लक्ष्मी जी की आराधना करने लगता है। उस साधु की आराधना से प्रसन्न होकर लक्ष्मी जी उसे दर्शन देती हैं और साधु को वरदान देती है कि उसे सम्मान और उच्च पद प्राप्त होगा। वह साधु दूसरे दिन राजा के दरबार में पहुंच जाता है और वरदान के अभिमान में राजा को सिंघासन से धकेल देता है। साधु का राजा के साथ ऐसा व्यवहार देखकर उनके सिपाही साधु को पकड़ने के लिए उसकी तरफ दौड़ते हैं, लेकिन तभी राजा के मुकुट से एक काला नाग निकल आता है। यह देखकर सभी चौंक जाते हैं और सभी उस साधु को ज्ञानी संत और चमत्कारी समझने लगते हैं। वहां दबरबार में मौजूद सभी उस साधु की जय जयकार करने लगते हैं। राजा भी साधु से खुश होकर उसे अपना मंत्री बन देता है। साधु के मंत्री बनने पर राजा उसे निवास के लिए एक महल देता है, जहां वह शान के साथ रहने लगता है। कुछ समय बाद एक दिन साधु राजा के हाथ पकड़कर उसे दरबार से खींचते हुए बाहर ले जाता है। यह देखकर उसके दरबारी भी पीछे-पीछे भागने लगते हैं। सभी के दरबार से बाहर निकलते ही भूकंप आता है, जिसमे महल खंडहर बन जाता है। सबको लगता है कि साधु ने उनकी जान बचाई। इससे साधु का सम्मान और बढ़ जाता है। यह देखकर साधु में घमंड की भावना जागृत हो जाती है। इसके कुछ दिनों के बाद एक सुबह साधु राजमहल में घूम रहा होता है, तभी उसकी नजर गणेश जी की मूर्ति पर पड़ती है। साधु को वह प्रतिमा अच्छी नहीं लगती, तो वह उसे हटवा देता है। इससे गणेश जी साधु से रुष्ठ हो जाते हैं और उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देते हैं। इस कारण वह हर काम उल्टा-पुल्टा करने लगता है। इससे राजा साधु से क्रोधित होकर उसे कैदखाने में डलवा देता है। साधु कैदखाने में ही फिर से लक्ष्मी जी की पूजा आराधना करने लगता है। कुछ समय बाद लक्ष्मी जी साधु को दर्शन देती हैं और कहती हैं कि तुमने गणेश जी को रुष्ठ किया है, इसलिए तुम्हें गणेश जी की पूजा कर उन्हें प्रसन्न करना होगा। लक्ष्मी जी की बात सुनकर साधु गणेश जी की आराधना करने लगता है। इससे गणेश जी प्रसन्न हो जाते हैं और उनका क्रोध शांत हो जाता है। वह राजा के सपने में आकर साधु को फिर से मंत्री बनाने के लिए कहते हैं। राजा दूसरे दिन साधु को कैद से आजाद कर फिर से मंत्री बना देते हैं। इस घटना के बाद लक्ष्मी और गणेश जी एक साथ पूजे की जाने लगी। लक्ष्मी जी धन की देवी है, तो गणेश जी को बुद्धि को संयम में रखने वाला माना गया है। वैसे कहा भी गया है कि एक संपन्न जीवन के लिए धन और बुद्धि दोनों जरूरी होते हैं। इसलिए, लक्ष्मी जी और गणेश जी की पूजा साथ में की जाती है। कहानी से सीख इस कहानी से यह सीख मिलती है कि हमें अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अहंकार के कारण जो हमारे पास है, वो भी हमसे छिन सकता है।

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श्री कृष्ण माखन चोर | Krishna Bhagwan Makhan Chor

भगवान श्री कृष्ण बचपन में बहुत शरारती थे। कभी गोपियों की मटकी फाेड़ दिया करते थे, तो कभी बछड़ों को गायों का पूरा दूध पिला देते थे। गोकुल की गोपियां चाहकर भी प्यारे-से श्री कृष्ण को डांट नहीं पाती थीं, क्योंकि वो इतने नटखट थे कि उनकी शरारतों को देखकर उन्हें दुलारने का मन करता था। कान्हा की ऐसी ही लीलाओं में से माखन चारी की थी। यह तो सभी का मालूम है कन्हैया को मक्खन कितना पसंद था। माता यशोदा कृष्ण को जो मक्खन देती थीं, उससे उनका मन नहीं भरता था। इसलिए, मैया जहां भी मक्खन रखती कृष्ण चुपके से गांव के बच्चों के साथ आकर सारा मक्खन खा जाते थे। ऐसा कई दिनों तक चलता रहा। जब मैया को कुछ समझ नहीं आया कि माखन कौन चुरा रहा है, तो उन्होंने एक दिन चुपके से मक्खन से भरे छोटे-छोटे घड़ों को रस्सी के सहारे ऊपर टांग दिया, लेकिन श्री कृष्ण की नजरों से क्या छुप सकता है, उन्हाेंने माता को मक्खन रखते हुए देख लिया। अब समस्या यह थी कि मक्खन तक कैसे पहुंचा जाए। काफी सोचने के बाद उन्होंने सभी दोस्तों को इकट्ठा किया और बोले की सभी एक घेरा बनाओ और उसके ऊपर चढ़कर मक्खन निकाला जाएगा। इस तरह से वह उनके सारे दोस्त पूरा माखन चट कर गए। इसके बाद मैया ने सोचा कि आज तो मैं पता करके ही रहूंगी कि आखिर मक्खन को कौन चुराकर ले जाता है। मक्खन को मटकी में रखकर ऊपर टांग दिया और छुपकर देखने लगीं। कुछ ही देर में कान्हा अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंच गए। यह देखकर मैया को पूरी बात समझ में आ गई और जब सभी माखन चुराने लगे, तो तभी माता यशोदा पहुंच गईं। माता को देखते ही सभी बच्चे वहां से भाग गए, लेकिन श्री कृष्ण मटकी की रस्सी पकड़ कर झूल रहे थे। माता ने आकर उन्हें नीचे उतारा और प्यार से डांटते हुए कहा कि अच्छा तो तुम हो वो माखन चोर, जिसने मुझे बहुत परेशान किया है। कृष्ण माता को देखकर हंसने लगे और बोले “मैया मैं नहीं माखन खायो।” इस पर माता बोली कि अपनी मैया से ही छूठ बोलते हो कृष्णा। कन्हैया की भोली-सी सूरत देखकर और उसकी प्यारी-सी बात सुकर माता ने कृष्ण को अपने गले लगा लिया और बोलने लगीं मेरा प्यारा नटखट माखन चोर। बस तभी से श्री कृष्ण को प्यार से माखन चोर कहकर बुलाया जाने लगा।

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अक्रूर जी और श्री कृष्ण की कहानी | Akrur Ji Aur Shri Krishna Ki Kahani

बात उस समय की है जब श्री कृष्ण का जन्म नहीं हुआ था। कंस ने आकाशवाणी को सुनकर अपने पिता राजा उग्रसेन काे बंदी बना लिया था और खुद राजा बन बैठा था। अक्रूर जी उन्हीं के दरबार में मंत्री के पद पर आसीन थे। रिश्ते में अक्रूर जी वासुदेव के भाई थे। इस नाते से वह श्री कृष्ण के काका थे। इतना ही नहीं अक्रूर जी को श्रीकृष्ण अपना गुरु भी मानते थे। जब कंस ने नारद मुनी के मुंह से सुना कि कृष्ण वृंदावन में रह रहे हैं, तो उन्हें मारने के विचार से कंस ने अक्रूर जी को अपने पास बुलाया। उसने अक्रूर जी के हाथ निमंत्रण भेज कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को मथुरा बुलाया। अक्रूर जी ने वृंदावन पहुंचकर श्री कृष्ण को अपना परिचय दिया और कंस के द्वारा किए जाने वाले अत्याचार के बारे में उन्हें बताया। साथ ही आकाशवाणी के बारे में भी श्रीकृष्ण को बताया कि उन्हीं के हाथों कंस का वध होगा। अक्रूर जी की बात सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम उनके साथ कंस के उत्सव में शामिल होने के लिए निकल पडे़। रास्ते में अक्रूर जी ने कृष्ण और बलराम को कंस के बारे में और युद्धकला के बारे में बहुत सारी जानकारियां दी। इस वजह से श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना गुरु मान लिया था। मथुरा पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण ने कंस को मार गिराया और मथुरा के सिंहासन पर वापस राजा उग्रसेन को बैठा दिया और अक्रूर जी को हस्तिनापुर भेज दिया। कुछ समय के बाद कृष्ण ने अपनी द्वारका नगरी की स्थापना की। वहां पर अक्रूर जी पांडवों का संदेश लेकर आए कि कौरवों के साथ युद्ध में उन्हें आपकी सहायता चाहिए। इस पर कृष्ण ने पांडवों का साथ दिया, जिससे वो महाभारत का युद्ध जीत सके। कहा जाता है कि अक्रूर जी के पास एक स्यमंतक नामक मणि थी। वह मणि जिसके पास रहती थी, वहां पर कभी भी अकाल नहीं पड़ता था। महाभारत के युद्ध के बाद अक्रूर जी श्री कृष्ण के साथ द्वारका आ गए थे। जब तक अक्रूर जी द्वारका में रहे, तब तक वहां खेतों में अच्छी फसल होती रही, लेकिन उनके जाते ही वहां अकाल पड़ गया। इसके बाद श्री कृष्ण के आग्रह पर अक्रूर जी वापस द्वारका आए और नगरवासियों के सामने स्यमंतक मणि दिखाई, जिसके बाद श्री कृष्ण पर लगा स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप गलत साबित हुआ। बताया जाता है कि इसके कुछ समय के बाद अक्रूर जी ब्रह्म तत्व में लीन हो गए थे।

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श्री कृष्ण के मुंह में ब्रह्मांड | Shri Krishna Ke Muh Mein Brahmand

यह बात उस समय की है जब दुष्टों को मारने और देश में धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने कृष्ण का अवतार लिया था। द्वापर युग की यह घटना कृष्ण भगवान के बाल जीवन से जुड़ी है, जब वह नंदगांव में मां यशोदा की देखरेख में बड़े हो रहे थे। उस समय उनके नटखट स्वभाव की चर्चा पूरे वृन्दावन में थी। एक दिन की बात है, भगवान श्री कृष्ण घर के बाहर मिट्टी के आंगन में खेल रहे थे। उसी समय उसके बड़े भाई दाऊ वहां आए और देखा कि कन्हैया मिट्टी खा रहे हैं। दाऊ उनकी शिकायत लेकर मां यशोदा के पास पहुंचे। दाऊ ने कहा “ मां, तुम्हारा प्यारा लाला आंगन में मिट्टी खा रहा है।” यह सुनते ही यशोदा मां सीधे बाल गोपाल के पास पहुंची और पूछा “लाला, तुमने मिट्टी खाई है।”  कान्हा बोले – “नहीं, मां मैंने मिट्टी नहीं खाई।” मां यशोदा को कान्हा की बात पर विश्वास नहीं हुआ और कहा “कान्हा, मुंह खोलकर दिखाओ कि तुमने मिट्टी नहीं खाई है।” मां यशोदा की बात सुनकर कान्हा ने जैसे ही मुंह खोला, मैया यशोदा चौंक गईं। माता को कान्हा के मुंह में मिट्टी कहीं नहीं नजर आई, बल्कि पूरा का पूरा ब्रह्मांड नजर आ रहा था। मां यशोदा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। अपने छोटे से कन्हैया के मुंह में उन्हें सारी सृष्टि और जगत के समस्त प्राणी नजर आ रहे थे। मां यशोदा ये नजारा ज्यादा देर तक नहीं देख सकीं और बेहोश हो गईं। जब मां यशोदा की आंखें खुलीं, तो उनके मन में बाल कृष्ण के लिए प्यार जाग रहा था। उन्होंने श्री कृष्ण को गले से लगा लिया और उनकी आंखें आंसुओं से भर गई। मां यशोदा को यकीन हो गया था कि कान्हा कोई साधारण बालक नहीं है, बल्कि वो स्वयं सृष्टि के स्वामी और परमात्मा के अवतार हैं।

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