सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस पूरे माह शिवजी की आराधना की जाएगी। सावन में भोलेनाथ अपने भक्तों से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन में शिवजी को कई तरह के अभिषेक किए जाते हैं और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन सावन में 5 तरह के अनाज शिवजी को अर्पित करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी।

आषाढ़ माह खत्म होते ही सावन माह की शुरुआत आज 14 जुलाई से शुरू हो गई है। सावन का महीना भोलेनाथ की पूजा-अराधना के लिए समर्पित होता है। इस पूरे माह भगवान शिवजी की विशेष आराधना की जाती है, जिससे वे प्रसन्न होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। सावन शिवजी का प्रिय माह होता है। यही कारण है कि शिवभक्तों को भी इस माह का बेसब्री से इंतजार रहता है। वैसे तो भोले भंडारी एक लोटे शुद्ध जल से जलाभिषेक करने मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन यदि आप सावन में भगवान शिव की विशेष कृपा चाहते हैं तो उनके प्रिय फल-फूल के साथ ही यह 5 तरह के अनाज अर्पित करें। शिवजी को इन 5 तरह के अनाज चढ़ाने से आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी होगी और कष्टों से मुक्ति मिलेगी। जानते हैं कौन से हैं ये पांच अनाज.. सावन में शिवजी को अर्पित करें ये 5 अनाज अक्षत सावन माह में शिवलिंग पर सफेद चावल या अक्षत चढ़ाने से धन लाभ होता है। सावन सोमवारी के दिन एक मुट्ठी अक्षत शिवजी को चढ़ाएं और इसके बाद यह अक्षत किसी गरीब को दान दे दें। ऐसा करने से रुपये-पैसों से जुड़ी समस्या दूर होती है। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि चावल का कोई भी दाना टूटा हुआ न हो। काला तिल भांग, धतूरा और बेलपत्र की तरह ही शिवलिंग पर काला तिल भी चढ़ाया जाता है। क्योंकि काला तिल भगवान शिव को अतिप्रिय है। सावन में शिवजी को काले तिल अर्पित करने से मानसिक और शारीरिक संबंधी परेशानियां दूर होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। अरहर दाल सावन माह में शिवलिंग पर पीली अरहर की दाल अर्पित करना बेहद शुभ होता है। ऐसा करने से व्यक्ति को सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गेहूं विवाह में किसी कारण देरी हो रही है या बाधाएं उत्पन्न हो रही है तो सावन माह में शिवलिंग पर गेहूं अर्पित करना चाहिए। साथ ही गेहूं चढ़ाने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है और व्यक्ति के बौद्धिक स्तर का भी विकास होता है। मूंग हरे मूंग की दाल सावन माह में शिवलिंग पर अर्पित करें। इससे भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस पूरे माह शिवजी की आराधना की जाएगी। सावन में भोलेनाथ अपने भक्तों से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन में शिवजी को कई तरह के अभिषेक किए जाते हैं और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन सावन में 5 तरह के अनाज शिवजी को अर्पित करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी। Read More »

सावन का पहला व्रत, जानें क्यों होता है सावन में दाढ़ी व बाल कटवाना वर्जित?

भगवान शिव का सबसे प्रिय सावन हिंदू पंचांग के अनुसार 14 जुलाई गुरुवार से शुरू होने वाला है। सावन का त्योहार 12 अगस्त तक रहेगा। इस साल सावन में चार सोमवार पड़ेंगे। पहला सोमवार का व्रत 18 जुलाई को रखा जाएगा। सावन का त्यौहार शिव भक्तों के लिए सबसे खास होता है। सावन के महीने में शिव भक्त भगवान शिव की भक्ति में लीन हो जाते हैं। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव की विधि विधान से पूजा करने पर भगवान शिव हर मनोकामना पूरी करते हैं। सावन के सोमवार में कुछ लोग पूरा सावन व्रत भी रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो करना वर्जित माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन कार्यों को करने से भगवान शिव नाराज हो जाते हैं। आइए जातने हैं आखिर क्यों इन कार्यों को करना सावन के महीने में वर्जित माना जाता है। दाढ़ी व बाल काटना माना जाता है अशुभ हिंदू शास्त्रों के अनुसार सावन के महीने में बाल काटना व दाढ़ी बनाना वर्जित माना जाता है। अगर आप सावन का व्रत रख रहे हैं तो नियमित रूप से शिवजी के मंदिर जाकर पूजा पाठ करें और सावन के महीने में बाल काटने व दाढ़ी बनाने से बचें। इसके अलावा सावन के महीने में नाखून काटना व शरीर पर तेल मालिश करना भी वर्जित बताया गया है। माना जाता है कि ऐसा करने से ग्रह दोष लगता है और सावन में रखा गया व्रत भी फलदाई नहीं होता है। सब पर नहीं होता यह नियम लागू हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि सावन का महीना धार्मिक कार्य के लिए महत्वपूर्ण है। इस महीने में बहुत से लोग कावड़ चढ़ाने जाते हैं। बहुत से धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं, इसलिए अनुष्ठान तथा कावड़ का कार्य जब तक पूरा नहीं होता तब तक लोग दाढ़ी बाल नहीं कटवाते हैं और ना ही नाखून काटते हैं। ज्योतिष के अनुसार दाढ़ी और बाल काटने का नियम सभी पर लागू नहीं होता है। यह स्वैच्छिक है अनिवार्य नहीं।

सावन का पहला व्रत, जानें क्यों होता है सावन में दाढ़ी व बाल कटवाना वर्जित? Read More »

Sawan Vrat Katha in Hindi: सावन का पवित्र महीना मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की पूजा के दौरान कथा का पाठ करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव को सावन का महीना बेहद प्रिय है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है जिसमें भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं। वर्ष 2022 में सावन का महीना 14 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है। इस वर्ष सावन का पहला सोमवार 18 जुलाई के दिन पड़ने वाला है। जो भक्त सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करता है और उनकी तपस्या में लीन रहता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा उसे जीवन में हमेशा सफलता हाथ लगती है। इसके साथ यह भी कहा जाता है कि अविवाहित कन्याओं के लिए भी सावन में व्रत करना फलदाई होता है। माना जाता है कि सावन में भगवान शिव की पूजा करने के दौरान पौराणिक कथाओं का पाठ अवश्य करना चाहिए। जो भक्त भगवान शिव की पौराणिक कथा का पाठ करता है उसे व्रत का पूरा फल मिलता है। कैसे शुरू हुई कांवड़ की परंपरा? पौराणिक कथाओं के अनुसार, कांवड़ की परंपरा शुरू करने वाले भगवान परशुराम थे। कहा जाता है कि सावन के महीने में भगवान परशुराम सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा आराधना किया करते थे। वह कांवड़ में जल भरकर शिव मंदिर तक यात्रा करते थे और शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के बाद भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा करते थे। भगवान शिव को सावन का महीना और सावन सोमवार बेहद प्रिय है इसीलिए सावन के महीने में सोमवार का व्रत करना बहुत लाभदायक माना गया है। कहा जाता है कि भगवान परशुराम की वजह से ही भगवान शिव की पूजा और उनका व्रत शुरू हुआ था। भगवान शिव को क्यों प्रिय है सावन का महीना? एक और कथा के मुताबिक, भगवान शिव ने सनत कुमारों को स्वयं यह बताया था कि उन्हें सावन का महीना क्यों प्रिय है और इस महीने में उनकी पूजा करना क्यों लाभदायक है। जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से सावन के महीने की महिमा पूछी तब भगवान शिव ने यह कहा कि देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में शरीर का त्याग किया था। देवी सती ने यह संकल्प लिया था कि वह हर जन्म भगवान शिव से ही विवाह करेंगी। अगले जन्म देवी सती का पार्वती के रूप में जन्म हुआ था। पार्वती ने सावन के महीने में ही भगवान शिव को पाने के लिए कड़ी तपस्या की थी। जिसकी वजह से उन्हें भगवान शिव मिले थे और उन्होंने सुखी जीवन व्यतीत किया था। तब से ही भगवान शिव के लिए सावन का महीना बेहद प्रिय हो गया।

Sawan Vrat Katha in Hindi: सावन का पवित्र महीना मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की पूजा के दौरान कथा का पाठ करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। Read More »

नंदी कैसे बने भगवान शिव के वाहन? | Nandi Kaise Bane Shiv Ke Vahan

पुराणों के अनुसार नंदी असल में शिलाद ऋषि के पुत्र थे और शिलाद ऋषि थे ब्रह्मचारी। दरअसल, हुआ यूं कि ब्रह्मचारी व्रत का पालन करते-करते शिलाद ऋषि के मन एक भय बैठ गया। भय था कि बिना संतान उनकी मृत्यु के बाद उनका वंश समाप्त हो जाएगा। इसलिए, उन्होंने अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए एक बच्चा गोद लेने का मन बनाया। मन तो ऋषि शिलाद ने बना लिया, लेकिन दुविधा यह थी कि ऋषि ऐसे बालक को गोद लेना चाहते थे, जिस पर भगवान शिव की असीम कृपा हो। अब ऐसा बालक ढूंढने से भी मिलना मुश्किल था तो ऋषि भगवान की घोर तपस्या में लीन हो गए। लंबे समय तक तप करने के बाद भी उन्हें इसका कोई भी फल प्राप्त नहीं हुआ। ऐसे में ऋषि शिलाद ने अपनी तपस्या को और भी कठोर कर दिया। काफी समय के कठोर तप के बाद आखिर भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने ऋषि शिलाद को दर्शन दिए। भगवान शिव ने शिलाद ऋषि से कहा, “मांगो, क्या वर मांगना चाहते हो।” ऋषि शिलाद ने अपनी कामना भगवान शिव से जाहिर की। भगवान शिव ने शिलाद को पुत्र का आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए। अगले ही दिन जब ऋषि शिलाद पास के खेतों से गुजर रहे थे तो उन्हें वहां एक नवजात बच्चा मिला। बच्चे का मुख बेहद ही मनमोहक और लुभावना था। ऋषि बच्चे को देख बहुत खुश हुए और यह सोचकर इधर-उधर देखने लगे कि इतने प्यारे बच्चे को इस हाल में यहां छोड़कर कौन चला गया। तभी भगवान शिव की आवाज आई और उन्होंने कहा शिलाद यही है, तुम्हारा पुत्र। अब तो ऋषि शिलाद की प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही नहीं था। वह उसे अपने साथ अपने घर ले आए और उसका लालन-पालन करने लगे। देखते देखते नंदी बड़ा हो गया। एक दिन ऋषि शिलाद के घर दो सन्यासी आए। ऋषि शिलाद की आज्ञा से नंदी ने दोनों सन्यासियों का खूब आदर सत्कार किया। उन्हें भोजन कराया। ऋषि शिलाद के घर मिले इस सेवा भाव से दोनों सन्यासी अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषि शिलाद को दीर्घ आयु का आशीर्वाद दिया, लेकिन नंदी जिसने उनकी इतनी मन से सेवा की थी उसके लिए एक शब्द भी नहीं कहा। सन्यासियों द्वारा ऐसा किए जाने पर ऋषि शिलाद को आश्चर्य हुआ। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए शिलाद ने सन्यासियों से ऐसा करने के पीछे की वजह पूछी। तब सन्यासियों ने बताया कि आपके इस पुत्र की आयु बहुत कम है। इसलिए, हमने इसे कोई आशीर्वाद नहीं दिया। नंदी ने सन्यासियों की यह बात सुन ली। नंदी ने अपने पिता से कहा, “आपने मुझे स्वयं भगवान शिव के आशीर्वाद से पाया है, तो मेरे इस जीवन की रक्षा भी भगवान शिव ही करेंगे। आप इस बात की बिलकुल भी चिंता न करो।” इतना कहते हुए नंदी भगवान शिव की अराधना में लग जाता है। अपने पिता की तरह ही नंदी ने भी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया। फलस्वरूप भगवान शिव प्रसन्न हुए और नंदी को बैल का मुख देकर अपना सबसे प्रिय और वाहक बनाया। इस प्रकार नंदी भगवान शिव के सबसे प्रिय वाहन बने और समाज में उन्हें पूजनीय स्थान भी मिला। यही वजह है कि भगवान शिव की आराधना से पूर्व उनके प्रिय नंदी की पूजा की जाती है।

नंदी कैसे बने भगवान शिव के वाहन? | Nandi Kaise Bane Shiv Ke Vahan Read More »

श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कहानी | Shri Krishna Govardhan Parvat

गोकुल के निवासी देवराज इंद्र से बहुत भयभीत रहते थे। उन्हें लगता था कि देवराज इंद्र ही धरती पर बारिश करते हैं। नगरी के सभी निवासी इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए उनकी बहुत पूजा किया करते थे, ताकि गोकुल पर इंद्रदेव की कृपा बनी रहे। एक बार श्री कृष्ण ने गोकुल वासियों को समझाया कि इन्द्रदेव की पूजा में अपना समय बर्बाद करने से अच्छा है कि तुम लोग गाय-भैंसों की पूजा करो। ये तुम्हें दूध देती हैं। ये पशु सम्मान के अधिकारी हैं। गोकुलवासी श्री कृष्ण की बात जरूर मानते थे। उन्होंने इंद्रदेव की जगह पशुओं को मान-सम्मान देना शुरू कर दिया। जब इन्द्रदेव ने देखा कि अब कोई भी उनकी पूजा नहीं कर रहा है, तो वह इस अपमान से तिलमिला उठे। इन्द्रदेव ने गुस्से में आकर गोकुलवासियों को सबक सिखाने का निर्णय लिया। भगवान इंद्र ने बादलों को आदेश दिया कि गोकुल नगरी तब तक तुम बरसते रहो, जब तक वह डूब न जाए। इन्द्रदेव का आदेश पाकर बादलों ने गोकुल नगरी पर बरसना शुरू कर दिया। गोकुल नगर में ऐसी बारिश कभी नहीं पड़ी थी। चारों ओर पानी ही पानी नजर आने लगा। पूरे नगर में बाढ़ आ गई। गोकुलवासी घबरा कर श्री कृष्ण के पास पहुंचे। श्री कृष्ण ने सभी गोकुलवासियों को अपने पीछे चलने का आदेश दिया। गोकुलवासी अपनी गाय और भैंस साथ लेकर श्री कृष्ण के पीछे-पीछे चल दिए। श्री कृष्ण गोवर्धन नाम के पर्वत पर पहुंचे और उस पर्वत को अपने हाथ की सबसे छोटी ऊंगली पर उठा लिया। सभी गोकुल निवासी उस पर्वत के नीचे आकर खड़े हो गए। श्री कृष्ण का यह चमत्कार देखकर भगवान इंद्र भी भयभीत हो गए। उन्होंने वर्षा बंद कर दी। यह देखकर गोकुल वासी खुश हो गए और अपने-अपने घर को लौट गए। इस तरह श्री कृष्ण ने अपनी शक्ति से गोकुलवासियों की जान बचाई।

श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कहानी | Shri Krishna Govardhan Parvat Read More »

कृष्ण और पूतना वध की कहानी | Shri Krishna Putna Vadh

कंस का अंत नजदीक आ चुका था। उसे इस बात का पता चल चुका था कि उसकी मृत्यु उसके ही भांजे कृष्ण के हाथों होने वाली है। फिर क्या था, बाल गोपाल को मारने के लिए कंस कई तरह के हथकंडे अपनाने लगा। वह कृष्ण को मारने के लिए शक्तिशाली दानवों को भेजता, लेकिन नटखट कन्हैया की बाल लीला के आगे किसी की नहीं चली। एक बार कंस ने पूतना नाम की राक्षसी को बाल कृष्ण का वध करने के लिए भेजा। जैसे ही पूतना गोकुल पहुंची, उसने एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लिया। स्त्री का रूप धारण कर पूतना घर-घर जाकर कृष्ण की तलाश करने लगी। कृष्ण की खोज में पूतना को जो भी बालक मिलता, वो उसे अपने विष वाले दूध को पिलाकर मार देती। जब पूतना कृष्ण के घर पहुंचती है, तब भगवान कृष्ण को पता चल जाता है कि वह एक राक्षसी है। पूतना कृष्ण को गोदी में उठाकर अपना विषैला दूध पिलाने लगती है। कृष्ण को दूध पीते देखकर पूतना सोचने लगती है कि अब यह मर जाएगा। भगवान कृष्ण कुछ देर बाद दूध पीते-पीते ही राक्षसी के प्राण खींचने लगते हैं। दर्द के कारण राक्षसी पूतना कृष्ण को आसमान की ओर लेकर उड़ जाती है और पास के जंगल में कान्हा सहित गिर जाती है। थोड़ी देर बाद ही राक्षसी के प्राण निकल जाते हैं। इस तरह भगवान कृष्ण राक्षसी पूतना का वध कर देते हैं।

कृष्ण और पूतना वध की कहानी | Shri Krishna Putna Vadh Read More »

श्री कृष्ण को गोविंद क्यों कहते हैं? | Shri Krishna Kyon Govinda Kyun Kehte

बच्चों, जब भगवान कृष्ण छोटे थे, तो बहुत नटखट थे। उनके कन्हैया, श्याम, नंदलाला और गोपाल जैसे कई नाम थे और हर नाम के पीछे एक कहानी है। ऐसी ही कहानी उनके गोविंद नाम के पीछे भी है, तो आज की कहानी इस गोविंद नाम पर ही है। बात उन दिनों की है जब बाल-गोपाल कृष्ण जंगल में गायों को चराने जाया करते थे। एक दिन वह अपनी गायों को जंगले ले कर गए, तो कामधेनु नाम की एक गाय उनके पास आई। उस गाय ने भगवान श्री कृष्ण से कहा, “मेरा नाम कामधेनु है और मैं स्वर्गलोक से आई हूं। जिस तरह आप पृथ्वी पर गायों की रक्षा करते हैं, उससे मैं बहुत प्रभावित हूं और आपका सम्मान करने के लिए आपका अभिषेक करना चाहती हूं।” कामधेनु की यह बात सुन कर भगवान मुस्कुराए और उन्होंने उसे अभिषेक करने की अनुमति दे दी। इसके बाद, कामधेनु ने पवित्र जल से भगवान श्री कृष्ण का अभिषेक किया। इसके बाद, इंद्रदेव अपने हाथी एरावत पर बैठकर वहां आए और उन्होंने श्री कृष्ण से कहा कि आपके पुण्य कामों की वजह से अब से सारी दुनिया में लोग आपको गोविंद के नाम से भी जानेंगे।

श्री कृष्ण को गोविंद क्यों कहते हैं? | Shri Krishna Kyon Govinda Kyun Kehte Read More »

श्री कृष्ण और कालिया नाग की कहानी | Shri Krishna Aur Kaliya Naag

श्री कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़े कई रोचक किस्से हैं। ऐसा ही एक किस्सा है कालिया नाग का। श्री कृष्ण ने अपनी लीला से उसका घमंड चूर-चूर कर दिया था, तो चलो यही कहानी सुनते हैं। यह बात तब की है जब यशोदा के लला कंहैया गोकुल में रहा करते थे। गोकुल के पास ही युमना नदी बहती है। एक बार यमुना को कालिया नाग ने अपना घर बना लिया और नदी के पानी को अपने विष से जहरीला कर दिया। उस पानी को पीकर पशु-पक्षी और गांव के लोग मरने लगे थे। एक बार श्री कृष्ण अपने दोस्तों के साथ खेलते-खेलते यमुना नदी के किनारे पहुंच गए और खेलते-खेलते अचानक से उनकी गेंद नदी में गिर जाती है। अब यमुना नदी के पानी और उसमें रहने वाले कालिया नाग के बारे में सभी को मालूम था। इसलिए, मौत के डर से कोई भी नदी में जाने को तैयार नहीं हुआ। तब श्री कृष्ण ने कहा कि मैं गेंद लेकर आता हूं। सभी बच्चों ने उन्हें नदी में जाने से रोका, लेकिन वह नहीं माने और नदी में छलांग लगा दी। सभी बच्चे डर के मारे घर पहुंचे और यशोदा मैया को कंहैया के नदी में कूदने की बात बता दी। यह सुनते ही यशोदा मैया डर गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। यह बात धीरे-धीरे पूरे गाेकुल धाम में जंगल की आग की तरह फैल गई। सभी दौड़े-दौड़े यमुना नदी किनारे आए गए, लेकिन कृष्ण अभी तक वापस नहीं आए थे। वहीं, नदी में कृष्ण को देखकर कालिया नाग की पत्नियों ने उन्हें वापस जाने को कहा, लेकिन कृष्ण नहीं माने और तभी कालिया नाग जाग गया। कृष्ण ने कालिया नाग को यमुना नदी छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन कालिया नाग ने मना कर दिया और कृष्ण को मारने के इरादे से उन पर हमला कर दिया। कृष्ण और कालिया नाग की जोरदार लड़ाई हुई। कुछ समय के बाद कालिया नाग हार गया और कृष्ण उसके फन पर नाचने लगे। कालिया नाग थकने के बाद कृष्ण से अपने प्राण बचाने के लिए प्रार्थना करने लगा। तब कृष्ण ने उसे अपने स्थान पर वापस जाने को कहा। कालिया ने कहा कि वहां पर गरुड़ मुझे मार डालेगा, मैं वहां कैसे जाऊं। इस पर कृष्ण ने कहा कि मेरे चरणों के निशान तुम्हारे फन पर हैं, उसे देखकर गरुड़ तुमको नहीं मारेगा। इसके बाद कालिया नाग श्री कृष्ण को अपने फन पर उठाकर यमुना नदी से बाहर आ गया और इसके बाद अपनी पत्नियों के साथ अपने स्थान पर चला गया। कृष्ण को सही सलामत वापस पाकर सभी बहुत खुश हुए और गोकुल में उत्सव मनाया गया।

श्री कृष्ण और कालिया नाग की कहानी | Shri Krishna Aur Kaliya Naag Read More »

श्री कृष्ण और सुखिया मालिन की कहानी | Shri Krishna Aur Fal Bechne Wali

ब्रजधाम में एक सुखिया नाम की मालिन आती थी। वह फल, फूल और सब्जी बेचकर अपना गुजारा किया करती थी। ब्रज में सुखिया जब गोपियों से मिलती, तो वो उसे नन्दलाला के बारे में बताती थीं। बाल कृष्ण की लीला सुनने में सुखिया को बहुत आनंद आता था। उसका मन भी बाल कृष्ण के दर्शन को तरसता था। सुखिया श्री कृष्ण को देखने के लिए घंटों तक नन्द बाबा के महल के सामने खड़ी रहती थी, लेकिन उसे श्री कृष्ण के कभी दर्शन नहीं होते। भगवान कृष्ण तो अंतर्यामी हैं, उन्हें तो सब पता चल जाता है। जब उन्हें पता चला कि सुखिया उनकी परम भक्त है, तो उन्होंने सुखिया को दर्शन देने का निर्णय लिया। अगले दिन सुखिया ने नन्द महल के सामने आवाज दी, “फल ले लो फल”। सुखिया की आवाज सुनकर श्री कृष्ण दौड़े चले आए। नन्दलाल को अपने सामने देखकर सुखिया की खुशी का ठिकाना न रहा। सुखिया ने नन्हे कृष्ण को बहुत से फल दे दिए। फल की कीमत चुकाने के लिए श्री कृष्ण बार-बार महल के अंदर जाते और मुट्ठी में अनाज लाने की कोशिश करते, लेकिन सारा अनाज रास्ते में ही बिखर जाता था। सुखिया को भगवान कृष्ण दो चार दाने ही दे पाए। सुखिया के मन में इस बात का कोई मलाल न था। वह तो बहुत खुश थी कि आज उसने अपने हाथों से भगवान को फल दिए और उन्होंने वो फल खाए। सुखिया मुस्कुराती हुई अपने घर पहुंची। उसकी फल की टोकरी खाली थी, क्योंकि वो सारे फल श्री कृष्ण को दे आई थी। घर जाकर उसने टोकरी अपने सिर से उतारी तो पाया कि उसकी टोकरी हीरे जवाहरात से भरी हुई है। सुखिया समझ गई कि यह भगवान की लीला है। उसने मन ही मन बाल गोपाल को धन्यवाद दिया। इस तरह श्री कृष्ण ने अपनी परम भक्त सुखिया का उद्धार किया।

श्री कृष्ण और सुखिया मालिन की कहानी | Shri Krishna Aur Fal Bechne Wali Read More »

श्री कृष्ण और अरिष्टासुर वध की कहानी | Shri Krishna Aur Aristasura Vadh

यह बात उस समय की है जब कृष्ण नन्हे से बालक थे। वह अपने नन्द बाबा की गाय-भैंसों को चराया करते थे। उस समय बाल कृष्ण का मामा कंस हमेशा उन्हें मारने की कोशिश में लगा रहता था। एक बार कंस ने बाल कृष्ण को मारने के लिए अरिष्टासुर नाम के एक राक्षस को भेजा। अरिष्टासुर, श्री कृष्ण की ताकत को जानता था, इसलिए उसने श्री कृष्ण को मारने के लिए अलग तरीका अपनाया। अरिष्टासुर ने गाय के बछड़े का रूप बनाया और गाय के झुंड में शामिल हो गया। झुंड में शामिल होकर वह कृष्ण को मारने का मौका देखने लगा। जब उसे श्री कृष्ण पर वार करने का कोई मौका नहीं मिला, तो उसने कृष्ण के दोस्तों को मारना शुरू कर दिया। जब श्री कृष्ण ने अपने बाल सखाओं की यह हालत देखी, तो उन्हें पता चल गया कि यह किसी राक्षस का काम है। फिर क्या था, भगवान कृष्ण ने गाय रूपी अरिष्टासुर की टांग पकड़ कर उसे जमीन पर पटक दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। जब राधा रानी को इस घटना के बारे में पता चला, तो उन्होंने कहा, “कान्हा तुमने गोहत्या की है, जो घोर पाप है। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए तुम्हें सारे तीर्थों की यात्रा करनी होगी।” श्री कृष्ण को राधा की बात सही लगी, लेकिन सभी तीर्थों की यात्रा तो मुमकिन नहीं थी। इस समस्या का समाधान पाने के लिए श्री कृष्ण नारद मुनि के पास पहुंचे। नारद मुनि ने कहा, “तुम सब तीर्थों को यह आदेश दो कि पानी के रूप में तुम्हारे पास आ जाएं। फिर तुम उस पानी में स्नान कर लेना। इससे तुम्हारे ऊपर से गोहत्या का पाप उतर जायेगा।” श्री कृष्ण ने ऐसा ही किया, उन्होंने सारे तीर्थों को बृजधाम बुलाया और पानी के रूप में एक कुंड में भर लिया। इस कुंड को उन्होंने बांसुरी से खोद कर बनाया था। इस कुंड में स्नान करने के बाद श्री कृष्ण के ऊपर से गोहत्या का पाप उतर गया। ऐसा कहा जाता है कि मथुरा से कुछ दूरी पर एक गांव है, जिसका नाम अरिता है। इस गांव में आज भी श्री कृष्ण के द्वारा बनाया गया कुंड मौजूद है।

श्री कृष्ण और अरिष्टासुर वध की कहानी | Shri Krishna Aur Aristasura Vadh Read More »

भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ? | Bhagwan Shiv Ka Janam Kaise Hua

भगवान शिव के जन्म की बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। भोलेनाथ का जन्म कब हुआ, कहां हुआ, किस प्रकार हुआ, इस बारे में पुराणों में अलग-अलग बातें कही गई हैं। भगवान शिव के जन्म से जुड़ी ऐसी ही एक कहानी है। शिव पुराण में लिखा है कि भगवान शिव स्वयंभू हैं, यानी उनका जन्म अपने आप ही हुआ है। वहीं, विष्णु पुराण में बताया गया है कि भगवान विष्णु के माथे से निकलते तेज से शिव की उत्पति हुई थी और उनके नाभि से निकलते हुए कमल से ब्रह्मा जी का जन्म हुआ था। दूसरी ओर शिव पुराण यह कहता है कि एक बार की बात है जब भगवान शिव अपने घुटने मल रहे थे और उससे निकले मैल से विष्णु जी का जन्म हुआ। इस कथा के अलावा, एक और पौराणिक कथा प्रचलित है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि एक बार की बात है जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के बीच इस बात पर बहस छिड़ गई कि सबसे महान कौन है। इस बात को लेकर जब दोनों बहस कर रहे थे, तो एक खंबे के रूप में महादेव उनके बीच आ गए। वो दोनों इस रहस्य को समझ नहीं पाए और तभी अचानक एक आवाज आई, जिसने कहा कि जो भी इस खंबे का छोर ढूंढ लेगा, वही सबसे महान कहलाएगा। यह सुनते ही ब्रह्मा जी ने एक पक्षी का रूप लिया और खंबे का ऊपरी हिस्सा ढूंढने निकल गए। वहीं, विष्णु जी ने वराह का रूप धारण किया और खंबे का अंत ढूंढने निकल गए। बहुत देर तक खोजने के बाद भी दोनों में से किसी को खंबे का छोर नहीं मिला और दोनों ने हार मान ली। इसके बाद भगवान शिव अपने असली रूप में आ गए। फिर भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने मान लिया कि वही सबसे महान और शक्तिशाली हैं। यह खंबा उनके न जन्म लेने और न मरने का प्रतीक है। इस कारण यह कहा जाता है कि भगवान शिव स्वयंभू हैं यानी वह अमर हैं।

भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ? | Bhagwan Shiv Ka Janam Kaise Hua Read More »

भगवान विष्णु को कैसे मिला सुदर्शन चक्र? | Sudarshan Chakra Story In Hindi

एक बार की बात है, राक्षसों का अत्याचार बहुत बढ़ गया था। कोई भी धार्मिक कार्य करना मुश्किल हो गया था। राक्षसों ने पूरी पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था। राक्षस स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमाना चाहते थे। देवराज इंद्र उस समय स्वर्ग के राजा थे, वो स्वर्ग के सभी देवतागणों को लेकर भगवान विष्णु के पास गए। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। देवता बोले “हे प्रभु! आप हमें राक्षसों के प्रकोप से मुक्ति दीजिए।” भगवान विष्णु को पता था कि भगवान शिव ही इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। विष्णु भगवान, महादेव के बड़े भक्त थे। विष्णु भगवान ने राक्षसों के विनाश के लिए शिव की तपस्या करने का निर्णय लिया। भगवान विष्णु हिमालय की बर्फीली पहाड़ियों पर शिव जी की तपस्या करने लगे। विष्णु जी, भगवान शिव के एक हजार नामों का जाप करने लगे। हर एक नाम के साथ उन्होंने एक कमल का फूल चढ़ाने का संकल्प लिया।  वहीं, भगवान शिव ने विष्णु जी की परीक्षा लेने की सोची। विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव ने एक हजार कमल के फूलों में से एक फूल गायब कर दिया। विष्णु जी तपस्या में लीन थे, इसलिए उन्हें इस बात की खबर नहीं हुई। विष्णु जी, भगवान शिव का एक नाम पुकारते और कमल का एक फूल चढ़ाते जाते। जब अंतिम नाम की बारी आई तो विष्णु जी ने देखा कि कमल तो बचा ही नहीं। अगर कमल नहीं चढ़ाते, तो तपस्या और संकल्प भंग हो जाता, इसलिए भगवान विष्णु ने कमल की जगह अपनी एक आंख चढ़ा दी। भगवान शिव, विष्णु जी के इस भक्ति भाव से बहुत प्रसन्न हो गए। वह श्रीहरि के सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। विष्णु जी ने राक्षसों का संहार करने के लिए अजय शस्त्र मांगा, तो उन्होंने विष्णु जी को सुदर्शन चक्र प्रदान किया, जिससे विष्णु जी ने राक्षसों को मार गिराया। इस तरह भगवान विष्णु ने अपनी भक्ति का परिचय देकर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया।

भगवान विष्णु को कैसे मिला सुदर्शन चक्र? | Sudarshan Chakra Story In Hindi Read More »