महाभारत की 10 अनसुनी कहानियाँ 

महाभारत की कहानियाँ हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, टेलीविज़न पर देखते आ रहे है फिर भी हम सब महाभारत के बारे में बहुत कुछ नहीं जानते है क्योकि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत बहुत ही बड़ा ग्रंथ है, इसमें एक लाख श्लोक है। आज हम आपको महाभारत की कुछ ऐसी ही कहानियां पढ़ाएंगे  जो आपने शायद पहले कभी नहीं पढ़ी होगी। तो आइये शुरुआत करते है मामा शकुनि से।  हम सब मानते है की शकुनि कौरवों का सबसे बड़ा हितैषी था जबकि है इसका बिलकुल विपरीत। शकुनि ही कौरवों के विनाश का सबसे बड़ा कारण था, उसने ही कौरवों का वंश समाप्त करने के लिए महाभारत के युद्ध की पृष्टभूमि तैयार की थी।  पर उसने ऐसा किया क्यों ? इसका उत्तर जानने के लिए हमे ध्रतराष्ट्र और गांधारी के विवाह से कथा प्रारम्भ करनी पड़ेगी। शकुनि ही थे कौरवों के विनाश का कारण : से एक साधु के कहे अनुसार उसका विवाह पहले एक बकरे के साथ किया गया था। बाद मैं उस बकरे की बलि दे दी गयी थी। यह बात गांधारी के विवाह के समय छुपाई गयी थी. जब ध्रतराष्ट्र को इस बात का पता चला तो उसने गांधार नरेश सुबाला और उसके 100 पुत्रों को कारावास मैं डाल दिया और काफी यातनाएं दी। एक एक करके सुबाला के सभी पुत्र मरने लगे। उन्हैं खाने के लिये सिर्फ मुट्ठी भर चावल दिये जाते थे। सुबाला ने अपने सबसे छोटे बेटे शकुनि को प्रतिशोध के लिये तैयार किया। सब लोग अपने हिस्से के चावल शकुनि को देते थे ताकि वह जीवित रह कर कौरवों का नाश कर सके। मृत्यु से पहले सुबाला ने ध्रतराष्ट्र से शकुनि को छोड़ने की बिनती की जो ध्रतराष्ट्र ने मान ली। सुबाला ने शकुनि को अपनी रीढ़ की हड्डी क पासे बनाने के लिये कहा, वही पासे कौरव वंश के नाश का कारण बने। शकुनि ने हस्तिनापुर मैं सबका विश्वास जीता और 100 कौरवों का अभिवावक बना। उसने ना केवल दुर्योधन को युधिष्ठिर के खिलाफ भडकाया बल्कि महाभारत के युद्ध का आधार भी बनाया। एक वरदान के कारण द्रोपदी बनी थी पांच पतियों की पत्नी : द्रौपदी अपने पिछले जन्म मैं इन्द्र्सेना नाम की ऋषि पत्नी थी। उसके पति संत मौद्गल्य का देहांत जल्दी ही हो गया था। अपनी इच्छाओं की पूर्ति की लिये उसने भगवान शिव से प्रार्थना की। जब शिव उसके सामने प्रकट हुए तो वह घबरा गयी और उसने 5 बार अपने लिए वर मांगा। भगवान शिव ने अगले जन्म मैं उसे पांच पति दिये। एक श्राप के कारण धृतराष्ट्र जन्मे थे अंधे : धृतराष्ट्र अपने पिछले जन्म मैं एक बहुत दुष्ट राजा था। एक दिन उसने देखा की नदी मैं एक हंस अपने बच्चों के साथ आराम से विचरण कर रहा हे। उसने आदेश दिया की उस हंस की आँख फोड़ दी जायैं और उसके बच्चों को मार दिया जाये। इसी वजह से अगले जन्म मैं वह अंधा पैदा हुआ और उसके पुत्र भी उसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुये जैसे उस हंस के। अभिमन्यु था कालयवन राक्षस की  आत्मा : कहा जाता हे की अभिमन्यु एक कालयवन नामक राक्षस की आत्मा थी। कृष्ण ने कालयवन का वध कर, उसकी आत्मा को अपने अंगवस्त्र मैं बांध लिया था। वह उस वस्त्र को अपने साथ द्वारिका ले गये और एक अलमारी मैं रख दिया। सुभद्रा (अर्जुन की पत्नी) ने गलती से जब वह अलमारी खोली तो एक ज्योति उसके गर्भ मैं आगयी और वह बेहोश हो गयी। इसी वजह से अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदने का सिर्फ आधा ही तरीका बताया गया था। एकलव्य ही बना था द्रोणाचार्ये की मृत्यु का कारण : एकलव्य देवाश्रवा का पुत्र था। वह जंगल मैं खो गया था और उसको एक निषद हिरण्यधनु ने बचाया था। एकलव्य रुक्मणी स्वंयवर के समय अपने पिता की जान बचाते हुए मारा गया।  उसके इस बलिदान से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उसे वरदान दिया की वह अगले जन्म मैं द्रोणाचर्य से बदला ले पायेगा। अपने अगले जन्म मैं एकलव्य द्रष्टद्युम्न बनके पैदा हुआ और द्रोण की मृत्यु का कारण बना। पाण्डु की इच्छा अनुसार पांडवो ने खाया था अपने पिता के मृत शरीर को : पाण्डु ज्ञानी थे।  उनकी अंतिम इच्छा थी की उनके पांचो बेटे उनके म्रत शरीर को खायैं ताकि उन्होने जो ज्ञान अर्जित किया वो उनके पुत्रो मैं चला जाये। सिर्फ सहदेव ने पिता की इच्छा का पालन करते हुए उनके मस्तिष्क के तीन हिस्से खाये। पहले टुकड़े को खाते ही सहदेव को इतिहास का ज्ञान हुआ, दूसरे टुकड़े को खाने पे वर्तमान का और तीसरे टुकड़े को खाते ही भविष्य का।  हालांकि ऐसी मान्यता भी है की पांचो पांडवो ने ही मृत शरीर को खाया था पर सबसे ज्यादा हिस्सा सहदेव ने खाया था। कुरुक्षेत्र में आज भी है मिट्टी अजीब : कुरुक्षेत्र मैं एक जगह हे, जहां माना जाता हे की महाभारत का युध् हुआ था। उस जगह कुछ 30 किलोमीटर के दायरे में  मिट्टी संरचना बहुत अलग हे। वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे की यह कैसे संभव हे क्यूंकि इस तरह की मिट्टी सिर्फ तब हो सकती हे अगर उस जगह पे बहुत ज़्यादा तेज़ गर्मी हो। बहुत से लोगों का मानना हे की लड़ाई की वजह से ही मिट्टी की प्रवर्ती बदली हे। श्री कृष्ण ने ले लिया था बर्बरीक का शीश दान में : बर्बरीक भीम का पोता और घटोत्कच का पुत्र था।  बर्बरीक को कोई नहीं हरा सकता था क्योंकि उसके पास कामाख्या देवी से प्राप्त हुए तीन तीर थे, जिनसे वह कोई भी युध् जीत सकता था। पर उसने शपथ ली थी की वह सिर्फ कमज़ोर पक्ष के लिये ही लड़ेगा। अब चुकी बर्बरीक जब वहां पहुंचा तब कौरव कमजोर थे इसलिए उसका उनकी तरफ से लड़ना तय था।  जब यह बात श्री कृष्ण को पता चली तो उन्होंने उसका शीश ही दान में मांग लिया।  तथा उसे वरदान दिया की तू कलयुग  में मेरे नाम से जाना जाएगा। इसी बर्बरीक का मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के खाटूश्यामजी में है जहाँ उनकी बाबा श्याम के नाम से पूजा होती है। हर योद्धा का अलग था शंख : सभी योधाओं के शंख बहुत शक्तिशाली होते थे। भागवत गीता के एक श्लोक मैं सभी शंखों के नाम हैं। अर्जुन के शंख का नाम देवदत्त था। भीम के शंख का

महाभारत की 10 अनसुनी कहानियाँ  Read More »

कैसे खत्म हुआ श्रीकृष्ण सहित पूरा यदुवंश?

अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में रक्तपात के सिवाय कुछ हासिल नहीं हुआ। इस युद्ध में कौरवों के समस्त कुल का नाश हुआ, साथ ही पाँचों पांडवों को छोड़कर पांडव कुल के अधिकाँश लोग मारे गए। लेकिन इस युद्ध के कारण, युद्ध के पश्चात एक और वंश का खात्मा हो गया वो था ‘श्री कृष्ण जी का यदुवंश’। गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप : महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। गांधारी के श्राप से विनाशकाल आने के कारण श्रीकृष्ण द्वारिका लौटकर यदुवंशियों को लेकर प्रयास क्षेत्र में आ गये थे। यदुवंशी अपने साथ अन्न-भंडार भी ले आये थे। कृष्ण ने ब्राह्मणों को अन्नदान देकर यदुवंशियों को मृत्यु का इंतजार करने का आदेश दिया था। कुछ दिनों बाद महाभारत-युद्ध की चर्चा करते हुए सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हो गया। सात्यकि ने गुस्से में आकर कृतवर्मा का सिर काट दिया। इससे उनमें आपसी युद्ध भड़क उठा और वे समूहों में विभाजित होकर एक-दूसरे का संहार करने लगे। इस लड़ाई में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और मित्र सात्यकि समेत सभी यदुवंशी मारे गये थे, केवल बब्रु और दारूक ही बचे रह गये थे। यदुवंश के नाश के बाद कृष्ण के ज्येष्ठ भाई बलराम समुद्र तट पर बैठ गए और एकाग्रचित्त होकर परमात्मा में लीन हो गए। इस प्रकार शेषनाग के अवतार बलरामजी ने देह त्यागी और स्वधाम लौट गए। बहेलिये का तीर लगने से हुई श्रीकृष्ण की मृत्यु बलराम जी के देह त्यागने के बाद जब एक दिन श्रीकृष्ण जी  पीपल के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे, तब उस क्षेत्र में एक जरा नाम का बहेलिया आया हुआ था। जरा एक शिकारी था और वह हिरण का शिकार करना चाहता था। जरा को दूर से हिरण के मुख के समान श्रीकृष्ण का तलवा दिखाई दिया। बहेलिए ने बिना कोई विचार किए वहीं से एक तीर छोड़ दिया जो कि श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा। जब वह पास गया तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में उसने तीर मार दिया है। इसके बाद उसे बहुत पश्चाताप हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने बहेलिए से कहा कि जरा तू डर मत, तूने मेरे मन का काम किया है। अब तू मेरी आज्ञा से स्वर्गलोक प्राप्त करेगा। बहेलिए के जाने के बाद वहां श्रीकृष्ण का सारथी दारुक पहुंच गया। दारुक को देखकर श्रीकृष्ण ने कहा कि वह द्वारिका जाकर सभी को यह बताए कि पूरा यदुवंश नष्ट हो चुका है और बलराम के साथ कृष्ण भी स्वधाम लौट चुके हैं। अत: सभी लोग द्वारिका छोड़ दो, क्योंकि यह नगरी अब जल मग्न होने वाली है। मेरी माता, पिता और सभी प्रियजन इंद्रप्रस्थ को चले जाएं। यह संदेश लेकर दारुक वहां से चला गया। इसके बाद उस क्षेत्र में सभी देवता और स्वर्ग की अप्सराएं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि आए और उन्होंने श्रीकृष्ण की आराधना की। आराधना के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए और वे सशरीर ही अपने धाम को लौट गए। श्रीमद भागवत के अनुसार जब श्रीकृष्ण और बलराम के स्वधाम गमन की सूचना इनके प्रियजनों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस दुख से प्राण त्याग दिए। देवकी, रोहिणी, वसुदेव, बलरामजी की पत्नियां, श्रीकृष्ण की पटरानियां आदि सभी ने शरीर त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने यदुवंश के निमित्त पिण्डदान और श्राद्ध आदि संस्कार किए। इन संस्कारों के बाद यदुवंश के बचे हुए लोगों को लेकर अर्जुन इंद्रप्रस्थ लौट आए। इसके बाद श्रीकृष्ण के निवास स्थान को छोड़कर शेष द्वारिका समुद्र में डूब गई। श्रीकृष्ण के स्वधाम लौटने की सूचना पाकर सभी पाण्डवों ने भी हिमालय की ओर यात्रा प्रारंभ कर दी थी। इसी यात्रा में ही एक-एक करके पांडव भी शरीर का त्याग करते गए। अंत में युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग पहुंचे थे। वानर राज बाली ही था ज़रा बहेलिया संत लोग यह भी कहते हैं कि प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।

कैसे खत्म हुआ श्रीकृष्ण सहित पूरा यदुवंश? Read More »

3 पौराणिक कहानियां- इसलिए भगवान विष्णु ने लिया राम अवतार

पहला प्रसंग- जय-विजय को दिया था सनकादि मुनि ने श्राप एक बार सनकादि मुनि भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ आए। उस समय वैकुंठ के द्वार पर जय-विजय नाम के दो द्वारपाल पहरा दे रहे थे। जब सनकादि मुनि द्वार से होकर जाने लगे तो जय-विजय ने हंसी उड़ाते हुए उन्हें बेंत अड़ाकर रोक लिया। क्रोधित होकर सनकादि मुनि ने उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया। क्षमा मांगने पर सनकादि मुनि ने कहा कि तीनों ही जन्म में तुम्हारा अंत स्वयं भगवान श्रीहरि करेंगे। इस प्रकार तीन जन्मों के बाद तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। पहले जन्म में जय-विजय ने हिरण्यकशिपु व हिरण्याक्ष के रूप में जन्म लिया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का तथा नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। दूसरे जन्म में जय-विजय ने रावण व कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया। इनका वध करने के लिए भगवान विष्णु को राम अवतार लेना पड़ा। तीसरे जन्म में जय-विजय शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्मे। इस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण ने इनका वध किया। दूसरा प्रसंग- मनु-शतरूपा को भगवान विष्णु ने दिया था वरदान मनु और उनकी पत्नी शतरूपा से ही मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। इन दोनों पति-पत्नी के धर्म और आचरण बहुत ही पवित्र थे। वृद्ध होने पर मनु अपने पुत्र को राज-पाठ देकर वन में चले गए। वहां जाकर मनु और शतरूपा ने कई हजार साल तक भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और वर मांगने के लिए कहा। मनु और शतरूपा ने श्रीहरि से कहा कि हमें आपके समान ही पुत्र की अभिलाषा है। उनकी इच्छा सुनकर श्रीहरि ने कहा कि संसार में मेरे समान कोई और नहीं है। इसलिए तुम्हारी अभिलाषा पूरी करने के लिए मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूंगा। कुछ समय बाद आप अयोध्या के राजा दशरथ के रूप में जन्म लेंगे, उसी समय मैं आपका पुत्र बनकर आपकी इच्छा पूरी करूंगा। इस प्रकार मनु और शतरूपा को दिए वरदान के कारण भगवान विष्णु को राम अवतार लेना पड़ा। तीसरा प्रसंग- नारद मुनि को हो गया था घमंड देवर्षि नारद को एक बार इस बात का घमंड हो गया कि कामदेव भी उनकी तपस्या और ब्रह्मचर्य को भंग नहीं कर सके। नारदजी ने यह बात शिवजी को बताई। देवर्षि के शब्दों में अहंकार भर चुका था। शिवजी यह समझ चुके थे कि नारद अभिमानी हो गए हैं। भोलेनाथ ने नारद से कहा कि भगवान श्रीहरि के सामने अपना अभिमान इस प्रकार प्रदर्शित मत करना। इसके बाद नारद भगवान विष्णु के पास गए और शिवजी के समझाने के बाद भी उन्होंने श्रीहरि को पूरा प्रसंग सुना दिया। नारद भगवान विष्णु के सामने भी अपना घमंड प्रदर्शित कर रहे थे। तब भगवान ने सोचा कि नारद का घमंड तोड़ना होगा, यह शुभ लक्षण नहीं है। जब नारद कहीं जा रहे थे, तब रास्ते में उन्हें एक बहुत ही सुंदर नगर दिखाई दिया, जहां किसी राजकुमारी के स्वयंवर का आयोजन किया जा रहा था। नारद भी वहां पहुंच गए और राजकुमारी को देखते ही मोहित हो गए। यह सब भगवान श्रीहरि की माया ही थी। राजकुमारी का रूप और सौंदर्य नारद के तप को भंग कर चुका था। इस कारण उन्होंने राजकुमारी के स्वयंवर में हिस्सा लेने का मन बनाया। नारद भगवान विष्णु के पास गए और कहा कि आप अपना सुंदर रूप मुझे दे दीजिए, जिससे कि वह राजकुमारी स्वयंवर में मुझे ही पति रूप में चुने। भगवान ने ऐसा ही किया, लेकिन जब नारद मुनि स्वयंवर में गए तो उनका मुख वानर के समान हो गया। उस स्वयंवर में भगवान शिव के दो गण भी थे, वे यह सभी बातें जानते थे और ब्राह्मण का वेष बनाकर यह सब देख रहे थे। जब राजकुमारी स्वयंवर में आई तो बंदर के मुख वाले नारदजी को देखकर बहुत क्रोधित हुई। उसी समय भगवान विष्णु एक राजा के रूप में वहां आए। सुंदर रूप देखकर राजकुमारी ने उन्हें अपने पति के रूप में चुना लिया। यह देखकर शिवगण नारदजी की हंसी उड़ाने लगे और कहा कि पहले अपना मुख दर्पण में देखिए। जब नारदजी ने अपने चेहरा वानर के समान देखा तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। नारद मुनि ने उन शिवगणों को राक्षस योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया। शिवगणों को श्राप देने के बाद नारदजी भगवान विष्णु के पास गए और क्रोधित होकर उन्हें बहुत भला-बुरा कहने लगे। माया से मोहित होकर नारद मुनि ने श्रीहरि को श्राप दिया कि- जिस तरह आज मैं स्त्री के लिए व्याकुल हो रहा हूं, उसी प्रकार मनुष्य जन्म लेकर आपको भी स्त्री वियोग सहना पड़ेगा। उस समय वानर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। भगवान विष्णु ने कहा-ऐसा ही हो और नारद मुनि को माया से मुक्त कर दिया। तब नारद मुनि को अपने कटु वचन और व्यवहार पर बहुत ग्लानि हुई और उन्होंने भगवान श्रीहरि से क्षमा मांगी। भगवान श्रीहरि ने कहा कि- ये सब मेरी ही इच्छा से हुआ है अत: तुम शोक न करो। उसी समय वहां भगवान शिव के गण आए, जिन्हें नारद मुनि ने श्राप दिया था। उन्होंने नारद मुनि ने क्षमा मांगी। तब नारद मुनि ने कहा कि- तुम दोनों राक्षस योनी में जन्म लेकर सारे विश्व को जीत लोगे, तब भगवान विष्णु मनुष्य रूप में तुम्हारा वध करेंगे और तुम्हारा कल्याण होगा।नारद मुनि के इन्हीं श्रापों के कारण उन शिव गणों ने रावण व कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया और श्रीराम के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु को स्त्री वियोग सहना पड़ा।

3 पौराणिक कहानियां- इसलिए भगवान विष्णु ने लिया राम अवतार Read More »

राधा के कहने पर श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाई, फिर तोड़कर फेंक दी, पढ़ें राधा-कृष्ण के प्रेम के अंत की कहानी

श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम कहानी हम अक्सर सुनते हैं। राधा-कृष्ण की कहानी सिर्फ प्रेम ही नहीं बल्कि त्याग की सीख भी देती है। क्या आपको पता है कि राधा के अंतिम समय में श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी बांसुरी की मधुर धुन सुनाई। फिर राधा की मृत्यु के बाद अपनी बांसुरी तोड़कर फेंक दी। पढ़िए राधा-कृष्ण के प्रेम के अंत की ये अनोखी कहानी। श्रीकृष्ण भले ही राधा से प्रेम करते थे लेकिन उनका मिलन नहीं हो पाया। कृष्ण द्वारिका में जाकर बस गए। राधा भी ज्यादा समय तक कृष्ण से दूर नहीं रह सकीं और एक दिन द्वारिका पहुंच गई। श्रीकृष्ण ने जब उन्हें देखा तो वह बहुत खुश हुए। दोनों ने संकेतों से ढेर सारी बातें कीं। हालांकि राधा को वहां कोई नहीं जानता था।  राधा के कहने पर श्रीकृष्ण ने उनको महल में काम पर रख लिया। राधा महल में ही रहने लगीं। वह जब भी मौका मिलता चुपके से कृष्ण को देखतीं और खुश हो लेतीं। ऐसा लंबे समय तक चलता रहा। एक दिन राधा अचानक महल से चली गईं। उन्होंने किसी को नहीं बताया कि वह कहां जा रही हैं। मगर श्रीकृष्ण जानते थे कि वह कहां जा रही हैं। राधा का शरीर अब जवाब दे रहा था। उनका अंतिम समय निकट आ रहा था। इसलिए वह श्रीकृष्ण से दूर रहने लगीं। एक दिन उन्हें श्रीकृष्ण की बहुत याद आई। वह बस अपने कान्हा की एक झलक पाना चाहती थीं। जब कृष्ण को पता चला तो वे तुरंत राधा के पास पहुंच गए। राधा अपने कृष्ण को सामने देखकर बहुत खुश हुई। राधा की मृत्यु को करीब देखते हुए श्रीकृष्ण ने उनसे कुछ मांगने के लिए कहा। मगर राधा ने इनकार कर दिया। राधा बोलीं कि आप मेरे सामने हैं, इसके अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए। कृष्ण के बार-बार कहने पर राधा ने कहा कि वे उन्हें एक बार बांसुरी की धुन सुनाएं। राधा के कहने पर श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाई। बांसुरी की मधुर धुन सुनते हुए ही राधा ने अपने प्राण त्याग दिए। राधा की मृत्यु पर श्रीकृष्ण को गहरा आघात लगा। उन्होंने दुख में अपनी प्रिय बांसुरी को तोड़कर फेंक दिया।

राधा के कहने पर श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाई, फिर तोड़कर फेंक दी, पढ़ें राधा-कृष्ण के प्रेम के अंत की कहानी Read More »

आखिरी सांस ले रही राधा के लिए श्रीकृष्ण ने अंतिम बार बजाई थी बांसुरी

कृष्ण की बांसुरी की तान पर गोपियों समेत पूरा गोकुल झूम उठता था. श्रीकृष्ण ने अंतिम बार राधा के लिए बांसुरी की तान छेड़ी थी, जिनके निधन के बाद कृष्ण ने बांसुरी का पूरी उम्र के लिए त्याग कर दिया. कृष्ण की कल्पना उनकी मुरली बिना मुश्किल है. इसकी तान पर गोपियां सुध-बुध खोकर खिचीं चली आती थीं. प्रेम और श्रृंगार की प्रतीक बांसुरी कृष्ण को तोहफे में मिली थी. कृष्ण ने भी अपनी बांसुरी अपनी याद के तौर पर भेंट स्वरूप दे दी. द्वापरयुग में जब श्री कृष्ण जन्मे तो सभी देवी-देवता भेष बदल-बदलकर उनके दर्शन को आ रहे थे. भोलेनाथ भी उनके दर्शन के लिए आना चाहते थे, लेकिन अब प्रभु के दर्शन को आना था तो भला वो खाली हाथ कैसे जा सकते हैं? शंकरजी के पास दधीचि ऋषि की अस्थि थी, जिससे उन्हें एक बांसुरी बनाई. कृष्ण से मिलते हुए उन्होंने कृष्ण को यह बांसुरी भेंट स्वरूप दी. इसके बाद कृष्ण ने बांसुरी को जिंदगी का अहम हिस्सा बना लिया और इस तरह वह मुरलीधर बन गए. कृष्ण गोकुल से जब मथुरा जा रहे थे, इससे पहले महारास हुई. इसके बाद कृष्ण ने अपनी बांसुरी प्रेयसी राधा को देते हुए बांसुरी बजाना छोड़ दिया.  आखिरी बार द्वारिका में मिले थे राधा-कृष्णकहा जाता है कि राधा कृष्ण की आखिरी मुलाकात द्वारिका में हुई. तब राधा ने अंतिम इच्छा के तौर पर कृष्ण से बांसुरी बाजने का आग्रह किया. राधा के अनुरोध को कृष्ण ने मान लिया और एक बार फिर बांसुरी की मधुर तान छेड़ी. कृष्ण की बांसुरी की धुन में खोकर राधा ने वहीं अपनी देह त्याग दी. यह अंतिम मौका था, जब कृष्ण ने बांसुरी बजाई थी. राधा वियोग के चलते दुखी होकर कृष्ण ने अपनी बांसुरी सदा के लिए तोडक़र झाडिय़ों में फेंक दी.

आखिरी सांस ले रही राधा के लिए श्रीकृष्ण ने अंतिम बार बजाई थी बांसुरी Read More »

फूलों संग राधा-कृष्ण ने खेली होली

11 दिवसीय रासलीला का गुरुवार की रात चोपन बैरियर स्थित रामलीला मैदान में समापन हो गया। वृंदावन से पधारे रासलीला के कलाकारों ने भगवान श्रीकृष्ण के लीलाओं का सजीव मंचन कर लोगों को भक्ति सागर में गोते लगवाए। नगर सहित आस पास के इलाकों से भारी संख्या में लोग उपस्थित रहकर भगवान के लीला का रसपान देर रात तक करते रहे।खचाखच भरे पंडाल में जैसे ही बरसाने की प्रसिद्ध लट्ठमार होली की शुरुआत हुई पूरा पंडाल राधे-राधे के नारों के साथ गुंजायमान हो गया। श्रीकृष्ण और राधारानी के बीच होली खेलने को लेकर दर्शाए गए अनेक प्रकार के नोकझोंक पर दर्शकों ने खूब आनंद उठाया। दो कुंतल फूलों संग श्रीकृष्ण और राधारानी के साथ जमकर होली खेली गई। इस मनोहारी दृश्य को देख सभी लोग बाग-बाग हो गए। इस दौरान आनंद अग्रवाल, रामसुंदर, राजेश साहनी, विमल साह, सत्यप्रकाश तिवारी, सुनील सिंह, अजयलक्ष्मी श्रीवास्तव, मीना देवी आदि रहीं।

फूलों संग राधा-कृष्ण ने खेली होली Read More »

राधा-कृष्ण की रासलीला के गवाह बनते हैं तुलसी के पौधे, रात होते ही बदल लेते हैं रूप

नई दिल्ली। भारत को मान्यताओं और आस्था का केंद्र माना जाता है। ऐसे में देश में कई ऐसी रहस्यमयी जगह हैं जहां आज भी भगवान के अस्तित्व की झलक देखने को मिलती हैं। इन्हीं जगहों में से एक है वृंदावन का निधि वन। जानकारों के मुताबिक इस जगह राधा और कृष्ण (Radha- Krishna) शाम के अंधेरे में रास रचाने आते हैं और उनका साथ देने के लिए वन में मौजूद पेड़ गोपियां बन जाती हैं। कोबरा सांप के पास मिली नागमणि, सिर से निकल रही थी लाल रंग की रौशनीपौराणिक मान्यता के तहत हर शाम आरती के बाद निधिवन (NIdhivan) को बंद कर दिया जाता है, उसके बाद वहां कोई नहीं रहता। यहां तक कि पशु-पक्षी भी अपना ठिकाना कहीं और बसा लेते हैं। कहा जाता है कि जो भी मनुष्य रासलीला देखने की कोशिश करता है, वह या तो पागल हो जाता है या उसकी मौत हो जाती है।निधिवन की एक और बात बेहत आश्चर्यजनक है, वो है यहां लगे तुलसी के पौधे। निधिवन में तुलसी का हर पौधा जोड़े में है। कहते हैं जब राधा-कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर ये तुलसी के पौधे में बदल जाती हैं।

राधा-कृष्ण की रासलीला के गवाह बनते हैं तुलसी के पौधे, रात होते ही बदल लेते हैं रूप Read More »

जब श्रीकृष्ण से नाराज़ होकर राधा रानी ने बोल दिए ये वचन

कहा जाता है सावन का महीना अपने साथ कई त्यौहार लेकर आता है। ये अपने साथ सावन  की झड़ी के साथ-साथ त्यौहारों की भी झड़ी लेकर आता है। कल यानि 15 अगस्त पूर्णिमा के दिन श्रावण के महीने का तो समापन हो जाएगा। लेकिन त्यौहारों की झड़ी अभी लगी रहेगी। इस महीने की 24 अगस्त को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। इस पर्व को श्री कृष्ण के जन्म दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन देश का माहौल बहुत ही अद्भुत होता ह। श्री कृष्ण के मंदिरों में उन्हें माक्खन खिलाने के लिए उनकी भक्तों की लंबी कतारे देखने को मिलती हैं। इसके अलावा सड़कों पर राधा-कृष्ण की झांकियां निकाली जाती हैं।जन्माष्टमी के आने से पहले आज हम आपको श्रीकृष्ण व राधा से जुड़ी एक कथा बताने जा रहे हैं। राध-कृष्ण के प्रेम की अनोखी गाथा सब जानते हैं। बल्कि कहा जाता था कि राधा-कृष्ण के केवल शरीर दो थे लेकिन उनकी आत्मा एक ही थी। एक-दूसरे से ज़रा सी भी दूरी इन्हें बर्दाश नहीं होती थी। लेकिन क्या आपको पता है कि एक बार श्री कृष्ण ने कुछ ऐसा कर दिया था कि राधा समेत सभी गोपियां उनसे नाराज़ हो गई थी। बल्कि राधा रानी ने उन्हें ये तक कह दिया था कि मुझ छूना मत। आइए जानते हैं क्या था ये किस्सा-कहा जाता है इस घटना के बाद श्री कृष्ण ने जो किया उसकी निशानी आज भी गोवर्धन पर्वत की तलहटी में कृष्ण कुंड के रूप में मौजूद है। माना जाता है राधा-कृष्ण का ये संवाद ही कुंड के निर्माण का मुख्य कारण था। राधा रानी द्वारा श्री कृष्ण को उनको स्पर्श करने से मना कर देने की वजह थी भगवान श्री कृष्ण द्वारा कंस के भेजे हुए असुर अरिष्टासुर का वध करना। शास्त्रों के अनुसार अरिष्टासुर बैल के रूप में व्रजवासियों को कष्ट देने आया था। मगर इस सब से अंजान राधा व सभी गोपियां बैल की हत्या करने के कारण श्री कृष्ण को गौ का हत्यारा मान रही थी।  जिसके बाद श्री कृष्ण ने राधा को खूब समझाने की कोशिश की उन्होंने बैल की मृत्यु नहीं बल्कि असुर का वध किया है। जब खूब समझाने के बाद भी राधा रानी नहीं मानी तो श्री कृष्ण ने जोर ज़मीन पर अपनी ऐड़ी पटकी, जिससे वहां जल की धारा बहने लगी।कहा जाता है इस जलधारा से एक कुंड बन गया। श्री कृष्ण ने सभी तीर्थों को गोवर्धन पर्वत की तलहटी में बने इस जलकुंड में आने को कहा। इनके आदेश पर सभी तीर्थ राधा कृष्ण के सामने उपस्थिति हो गए, और सभी कुंड में प्रवेश कर गए। जिसके बाद श्री कृष्ण ने इस कुंड में स्नान किया और कहा कि जो भी इस कुंड में स्नान करेगा उसे एक ही बार में सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होगा।

जब श्रीकृष्ण से नाराज़ होकर राधा रानी ने बोल दिए ये वचन Read More »

जान‍िए, धरती पर राधा-कृष्‍ण का प्रेम कहां से और कब शुरू हुआ था?

राधा-कृष्‍ण के अलौक‍िक प्रेम को तो सभी जानते हैं। यह उनके प्रेम की ही पराकाष्‍ठा है कि चोट कान्‍हा को लगे तो पीर राधा को होती है। पुराणों में श्री राधारानी को कृष्‍ण की शाश्‍वत जीवन संग‍िनी कहा जाता है। लेकिन क्‍या आप जानते कि इस प्रेम की शुरुआत धरती पर कब और कहां से हुई? 11 माह में हुई थी कान्‍हा से पहली मुलाकात कथा मिलती है कि श्रीराधा रानी की कान्‍हा से पहली मुलाकात तब हुई थी जब वह स्‍वयं 11 महीने की थीं। तब श्रीकृष्‍ण महज एक द‍िन के थे। उस समय उनका जन्‍मोत्‍सव मनाया जा रहा था। कहा जाता है क‍ि उस समय राधाजी अपनी मां कीर्ती के साथ नंदगांव आई थीं। तब वह अपनी माता की गोद में थीं और कन्‍हैया पालने में। तो ऐसे राधाजी की गोद में पहुंच गए कान्‍हा गर्ग संहिता में उल्‍लेख मिलता है कि जन्‍मोत्‍सव के बाद कान्‍हा दूसरी बार राधाजी से तब मिले तब वह अपने पिता नंद बाबा के भांडीर वन से गुजर रहे थे। कहा जाता है कि उसी समय नंदबाबा जी के सामने एक द‍िव्‍य ज्‍योति प्रकट हुई। बताया जाता है कि जो स्वयं श्री राधारानी थीं। उन्‍होंने नंदबाबा से कहा क‍ि वह कन्‍हैया को उन्‍हें दे दें। तब नंदबाबा ने कान्‍हाजी को राधा रानी की गोद में डाल द‍िया। कहा जाता है कि यह मुलाकात लौकिक नहीं बल्कि अलौकिक थी। राधा रानी के पास जाकर त्‍याग दिया बाल रूप कथा के अनुसार, जब नंदबाबा ने राधाजी की गोद में कन्‍हैया को सौंपा तब कान्‍हा ने अपना बाल रूप त्‍याग द‍िया। कुछ ही देर में वह किशोर रूप में आ गए। उसी समय ब्रह्माजी उपस्थित हुए और उन्‍होंने कृष्‍ण-राधा का व‍िवाह संपन्‍न कराया। कथा के अनुसार कुछ द‍िनों तक राधा-कृष्‍ण एक साथ उसी वन में रहे और फिर राधारानी ने पुन: बालरूप के श्रीकृष्‍ण को नंदबाबा को सौंप द‍िया। तो यहां से शुरू हुई थी कन्‍हैया की प्रेम कहानी कहा जाता है कि वन की मुलाकात के बाद राधाजी और कान्‍हा संकेत नाम की जगह पर हुई थी। यह स्‍थान नंद गांव और बरसाना जो कि राधा जी की जन्‍मस्‍थली थी उसके बीच में है। यह एक छोटा सा गांव है। मान्‍यता है कि इसी स्‍थान पर मुरलीधर और राधा की अद्भुद प्रेम कहानी शुरू हुई थी। बता दें क‍ि हर साल भाद्र शुक्‍ल अष्‍टमी से चतुर्दशी तिथ‍ि तक संकेत गांव में राधा-कृष्‍ण के प्रेम को याद‍ किया जाता है। उनकी याद में उत्‍सव का आयोजन क‍िया

जान‍िए, धरती पर राधा-कृष्‍ण का प्रेम कहां से और कब शुरू हुआ था? Read More »

प्रेम दिवस: जानें राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी! मिलने से लेकर बिछड़ने तक

पश्चिमी संस्कृति के अनुसार इन दिनों प्यार का सप्ताह चल रहा है। ऐसे में जरूरी नहीं है कि हर किसी के लिए प्यार का यह सप्ताह हसीन ही हो। इसमें असफलता के चलते कई बार लोग गलत कदम भी उठा लेते हैं। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए आज हम आपको राधा कृष्ण की प्रेम कहानी के बारे में बता रहे हैं, जिससे आप पहचान सकते हैं कि सच्चा प्रेम क्या होता है? इसमें राधा जो बाल गोपाल के साथ बड़ी हुईं, उनके साथ खेला, कूदा, रास रचाए, इतना ही नहीं कृष्ण ने सबसे ज्यादा बंसी राधा के कहने पर बजाई। राधा-कृष्ण का प्रेम ऐसा था जिसकी आज भी मिसाल दी जाती है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात ये है कि इतने प्रेम के बाद भी कृष्ण राधा की मिलन नहीं हुआ, उनकी शादी नहीं हुई। कुल मिलाकर इसमें प्यार है तो एक दूसरे से दूर रहना भी… इस कथा को आपके सामने रखने का मकसद केवल प्यार में बिछड़ जानें वाले को गलत कदम उठाने से रोकने का है। दरअसल हिंदू धर्म में भी राधे-श्याम या राधे-कृष्ण … ये शब्द अटूट प्रेम का हिस्सा माने जाते हैं। भले ही ये एक दूसरे के कभी हो नहीं सके लेकिन फिर भी इनका एक दूसरे के साथ ही हमेशा नाम लिया जाता है। तो चलिए जानते हैं किराधा-कृष्ण की ये प्रेम कहानी अधूरी कैसे रह गई थी?एक ओर जहां कई लोग राधा सिर्फ काल्पनिक मानते हैं, इसका कारण ये है कि भागवत जिसने भी पढ़ी है उसका कहना है कि सिर्फ दशम स्कंद में ही जब महारास का वर्णन हो रहा है वहीं एक जगह राधा के बारे में बताया गया है कि वो भी रास कर रही हैं और आनंद ले रही हैं। जबकि अलग-अलग ग्रंथों में राधा और कृष्ण की गोपियों का अलग वर्णन है। एक जगह ये भी लिखा है कि कृष्ण की 64 कलाएं ही गोपियां थीं और राधा उनकी महाशक्ति यानि राधा और गोपियां कृष्ण की ही शक्तियां थीं, जिन्होंने स्त्री रूप ले लिया था। कुछ जानकारों के अनुसार तो गोपियों को ही भक्ति मार्ग का परमहंस (जिसके दिमाग में दिन रात परमात्मा रहता है) तक कहा गया है, क्योंकि उनके मन व दिमाग में 24 घंटे कृष्ण ही रहते थे। वहीं राधा और कृष्ण के प्रेम का असली वर्णन मिलता है गर्ग संहिता में, गर्ग संहिता के रचयिता यदुवंशियों (कंस) के कुलगुरु ( जो एक तरह से कृष्ण के भी कुलगुरु हुए) ऋषि गर्गा मुनि थे। जानकारों के अनुसार गर्ग संहिता में राधा और कृष्ण की लीलाओं के बारे में बताया गया है। इस संहिता में मधुर श्रीकृष्णलीला है। जहां राधा-कृष्ण के प्रेम के बारे में बताया गया है। वहीं इसमें राधाजी की माधुर्य-भाव वाली लीलाओं का भी वर्णन है। गर्ग-संहिता में श्रीमद्भगवद्गीता में जो कुछ सूत्ररूप से कहा गया है उसी का बखान किया गया है। जानकारों का ये तक कहना है कि अगर गर्ग मुनि यदुवंशियों के कुलगुरु थे तो वे अपने सामने चल रही कृष्ण लीला में किसी काल्पनिक किरदार का चित्रण करेंगे? ऐसा मुमकिन नहीं लगता, यहीं से राधा के सत्य होने का प्रमाण मिलता है। राधा से वादा और रुकमणी से विवाह…कहा जाता है कि भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण राधा से ये वादा करके गए थे कि वो वापस आएंगे, लेकिन कृष्ण राधा के पास वापस नहीं आए और चले गए। उनकी शादी भी माता लक्ष्मी के रूप रुकमणी से हुई। कहा जाता है कि रुकमणी ने कभी कृष्ण को देखा नहीं था फिर भी उन्हें अपना पति मानती थीं। जब रुकमणी के भाई रुकमी ने उनकी शादी किसी और से करनी चाही तो रुकमणी ने कृष्ण को याद किया और कहा कि अगर वो नहीं आएंगे तो वो अपनी जान दे देंगी। इसके बाद ही कृष्ण रुकमणी के पास गए और उनसे शादी कर ली। राधा ने कृष्ण से क्या कहा?…कृष्ण के वृंदावन छोड़ने के बाद से ही राधा का वर्णन बहुत कम हो गया। राधा और कृष्ण जब आखिरी बार मिले थे तो राधा ने कृष्ण से कहा था कि भले ही वो उनसे दूर जा रहे हैं, लेकिन मन से कृष्ण हमेशा उनके साथ ही रहेंगे… इसके बाद कृष्ण मथुरा गए और कंस और बाकी राक्षसों को मारने का अपना काम पूरा किया। इसके बाद प्रजा की रक्षा के लिए कृष्ण द्वारका चले गए और द्वारकाधीश के नाम से लोकप्रिय हुए। वहीं जब कृष्ण वृंदावन से निकल गए तब राधा की जिंदगी ने अलग ही मोड़ ले लिया था। कहते हैं कि राधा की शादी एक यादव से हो गई। राधा ने अपने दांपत्य जीवन की सारी रस्में निभाईं और बूढ़ी हुईं, लेकिन उनका मन तब भी कृष्ण के लिए समर्पित था। जानें कौन थे? राधा के पति…राधा के पति का वर्णन ब्रह्मावैवर्त पुराण में मिलता है। ये वेदव्यास द्वारा रचित 18 पुराणों में से एक है। वैसे राधा की शादी के बारे में भी अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। कुछ के अनुसार राधा की शादी अनय से हुई थी, अनय भी वृंदावन निवासी थे और राधा और अनय की शादी बृह्मा की एक परीक्षा के बाद हुई थी। एक कथा के अनुसार बृह्मा ने ये पता लगाने के लिए की कृष्ण वाकई विष्णु अवतार हैं उनके सारे दोस्तों को अगवा कर जंगल में छुपा दिया था। उस समय अनय भी जंगल में थे और गलती से वो भी अगवा हो गए थे। तब कृष्ण ने अपने सभी दोस्तों का रूप लिया (अनय के साथ) और फिर सभी बच्चों के घरों में रहने लगे। इसके बाद अनय रूपी कृष्ण की शादी राधा से हुई थी। वहीं एक अन्य कथा के अनुसार असल में राधा की शादी हुई ही नहीं थी। ब्रह्मावैवर्त पुराण के अनुसार राधा अपने घर को छोड़ते समय अपनी परछाई (छाया राधा/माया राधा) घर पर मां कीर्ती के साथ छोड़ गई थीं। छाया राधा की शादी रायान गोपा (यशोदा के भाई) से हुई थी और अनय से नहीं, इसीलिए कई बार ये भी कहा जाता है कि राधा रिश्ते में श्रीकृष्ण की मामी थीं। इनकी शादी साकेत गांव में हुई थी जो बरसाने और नंदगांव के बीच स्थित था, कहा जाता है कि राधा ने अपना शादीशुदा जीवन अच्छे से व्यतीत किया भले

प्रेम दिवस: जानें राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी! मिलने से लेकर बिछड़ने तक Read More »

बच्चों के लिए कृष्ण के बालपन की 15 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

कहानी सुनाना न केवल माता–पिता और बच्चों के बीच संबंध को और गहरा करने का एक तरीका है, बल्कि नैतिकता पर चर्चा करने और मूल्यों को समझाने का एक आसान और मज़ेदार उपाय भी है। भगवान कृष्ण के बचपन की कहानियों को जानने के लिए आगे पढ़ें, जो निश्चित रूप से बच्चों को बहुत अच्छी लगेंगी। सीख के साथ बच्चों के लिए भगवान कृष्ण की कहानियाँ भगवान कृष्ण बच्चों और वयस्कों, सभी के बीच सबसे लोकप्रिय हिंदू भगवानों में से एक हैं। उनकी कहानियों में मज़ेदार, हँसी और अच्छे आदर्शों से भरे किस्से हैं। यहाँ बच्चों के आनंद के लिए भगवान के विशेष 15 कहानियाँ हैं: 1. कृष्ण के माता–पिता की कहानी प्राचीन काल में, ‘उग्रसेन’ नाम का एक राजा था, जिसके दो बच्चे थे – ‘कंस’ नाम का एक बेटा और ‘देवकी’ नाम की एक बेटी। देवकी नम्र और शांत स्वभाव की थी, लेकिन कंस दुष्ट था। जब वह बड़ा हुआ, तो उसने अपने पिता को क़ैदख़ाने में डाल दिया, और राजा की गद्दी खुद संभाली, जबकि उसकी बहन की शादी राजा ‘वासुदेव’ से हुई। एक दिन, कंस ने एक आकाशवाणी सुनी – तुम्हारी बहन का आठवाँ पुत्र बड़ा होने पर एक दिन तुम्हारी हत्या करेगा। इससे दुष्ट कंस डर के मारे अंदर तक हिल गया और वह अपनी बहन को मारना चाहता था। लेकिन वासुदेव ने देवकी को जिंदा रखने का आग्रह किया और कंस द्वारा देवकी के आठवें पुत्र को मारने के लिए सहमत हुए। कंस ने अपनी ही बहन और उसके पति को कैद कर लिया, दंपति की आठवीं संतान भगवान कृष्ण थे जो कंस द्वारा उन्हें मारने के लिए किए गए सभी प्रयासों से बच गए और अंत में उन्होंने अपने दुष्ट मामा को परास्त कर दिया। सीख – यदि आप बुरे हैं और आपके बुरे इरादे हैं, तो आपको अपने पापों की सज़ा ज़रूर मिलेगी। हमेशा सकारात्मक रहें और दूसरों का भला करने के बारे में सोचें। 2. भगवान कृष्ण का जन्म देवकी और वासुदेव उनके भाई कंस द्वारा कैद किए गए थे। हर बार जब देवकी एक बच्चे को जन्म देती, कंस खुद आ जाता और अपने हाथों से बच्चे को मार देता था । देवकी के सातवें बेटे का गर्भपात हुआ, लेकिन वह रहस्यमयी तरीके से वृंदावन की रानी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हो गया, जो कृष्ण के भाई – बलराम के रूप में दुनिया में आए। उनके आंठवे पुत्र का जन्म आधी रात को जेल के भीतर हुआ, यह भगवान कृष्ण थे और उस विशेष दिन को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। सीख – अगर कुछ अच्छा होना है, तो वह होकर रहेगा । अच्छाई हमेशा बुराई पर हावी होती है। 3. वासुदेव ने कृष्ण के जीवन को कैसे बचाया कृष्ण का जन्म विष्णु के रूप में हुआ था और उनके माता–पिता ने प्रार्थना की थी कि वह एक साधारण बच्चे में बदल जाएं, ताकि वे उसे कंस से छिपा सकें। प्रभु ने अपने पिता को उन्हें वृंदावन ले जाने और एक नवजात बच्ची के साथ अदला–बदली करने की सलाह दी। फिर, जादुई रूप से क़ैदख़ाने के पहरेदार सो गए और सभी ताले और जंजीरें अपने आप खुल गईं।वासुदेव छोटे कृष्ण को लेकर वृंदावन के लिए रवाना हो गए। जब वह यमुना नदी के तट पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि नदी में बाढ़ आई हुई थी।अपने सिर पर छोटे कृष्ण को रखते हुए, जैसे ही वासुदेव ने नदी को पार करने का प्रयास किया और पानी ने जैसे ही कृष्ण के पैर की अंगूठे को छुआ यहाँ पर भी रहस्यमयी तरीके से नदी का पानी पीछे हट गया जिससे वासुदेव अपनी यात्रा पूरी कर सके। वह फिर यशोदा के घर पहुँचे, बच्चों की अदला–बदली की और बच्ची के साथ वापस क़ैदख़ाने लौट आए। देवकी और वासुदेव को उम्मीद थी कि कंस लड़की को छोड़ देगा क्योंकि भविष्यवाणी थी कि एक लड़का कंस को मारेगा, लेकिन कंस ने परवाह नहीं की। उसने बच्चे को उनके हाथों से छीन लिया और उसे एक पत्थर पर फेंक कर मार दिया। लेकिन लड़की देवी दुर्गा में बदल गई और उन्होंने कंस को बताया कि कृष्ण जीवित हैं और उसे उसके बुरे कर्मों के लिए उसे दंडित करेंगे। सीख – कभी–कभी शक्तियाँ खुद के नियंत्रण से परे होती हैं। यदि आपके केवल बुरे इरादे हैं, तो आप कभी भी सफल नहीं होंगे। 4. कृष्ण और राक्षसी पुतना कृष्ण के मामा कंस उसे मारने के लिए बेताब थे, इसलिए उन्होंने ‘पुतना’ नामक एक राक्षसी को यह कार्य सौंपा। राक्षसी ने एक सुंदर महिला का रूप धारण किया और उस कमरे में जा पहुँची जहाँ कृष्ण थे। उसने अपने स्तनों पर जहर लेपा हुआ था और कृष्ण को दूध पिलाने का अनुरोध किया। कृष्ण की माँ को उसके असली इरादों का पता नहीं था और उन्होंने पुतना को दूध पिलाने की अनुमति दे दी। लेकिन कृष्ण ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस राक्षसी के जीवन को चूस लिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। विष ने कृष्ण का कुछ नहीं बिगाड़ा लेकिन कृष्ण को दूध पिलाने का अच्छा कर्म करने के कारण, पुतना की आत्मा को मुक्ति मिल गई। सीख – कभी भी किसी को जान–बूझकर चोट नहीं पहुँचानी चाहिए, क्योंकि आपको इसके लिए भुगतना पड़ सकता है। 5. भगवान कृष्ण का मक्खन पसंद करना भगवान कृष्ण को मक्खन खाना बहुत पसंद था, वृंदावन शहर में हर कोई उनकी शरारतों और मक्खन चुराने के प्रयासों से वाकिफ था इसीलिए उन्हें “माखन चोर” कहा जाता था। कृष्ण की माँ यशोदा कृष्ण से मक्खन को छुपाने के लिए इसे ऊँचाई पर बाँध देती थीं।एक बार, जब यशोदा आसपास नहीं थीं तो कृष्ण ने अपने दोस्तों को बुलाया। वे एक दूसरे के ऊपर चढ़ गए और कैसे भी वह मक्खन के बर्तन तक पहुँचने में कामयाब रहे। सभी ने मिलकर मक्खन से भरा बर्तन नीचे उतार लिया और बड़े मज़े से मक्खन को मिल–बाँट कर खाया। लेकिन दुर्भाग्य से, उन्हें एहसास नहीं हुआ कि यशोदा वापस आ गई हैं। कृष्ण के सभी दोस्त वापस अपने घरों में भाग गए, लेकिन कृष्ण को शरारती होने के लिए फटकार पड़ी। सीख – हमेशा अपने से बड़ों की बात मानें और कभी चोरी न करें। 6. भगवान कृष्ण और यशोदा भगवान कृष्ण शरारती थे और उनकी माँ यशोदा उनकी शरारतों से थक चुकी थीं। एक दिन, उन्होंने कृष्ण की हरकतों को रोकने के लिए उन्हें बाँधने का फैसला किया। यशोदा उन्हें बाँधने के लिए एक रस्सी लाईं, लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि रस्सी बहुत छोटी थी। वह फिर एक बड़ी रस्सी ले आईं , लेकिन वह भी

बच्चों के लिए कृष्ण के बालपन की 15 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ Read More »

जब श्रीकृष्ण ने दिया था अपने ही पुत्र को कोढ़ी होने का श्राप! पढ़ें यह कथा

जागरण अध्यात्म में हम लगातार आपके लिए पौराणिक कथाओं की जानकारी लेते आए हैं। आज भी हम आपको ऐसी ही एक पौराणिक कथा बता रहे हैं जिसमें भगवान कृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोढ़ी होने का श्राप क्यों दिया यह वर्णित है। भविष्य पुराण, स्कंद पुराण और वराह पुराण में बताया गया है कि श्री कृष्ण ने स्वयं ही अपने पुत्र सांबा को कोढ़ी होने का श्राप दिया था। इससे मुक्ति पाने के लिए सांबा ने सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर पाकिस्तान के मुलतान शहर में मौजूद है। इसे आदित्य मंदिर के नाम से जाना जाता है। स्थित है। इस सूर्य मंदिर को आदित्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता था। आइए जानते हैं कि इस पौराणिक कथा के पीछे क्या कहानी छिपी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण के 8 रानियां थीं। इनमें से एक का नाम जामवंती थी जो निषादराज जामवंत की पुत्री थीं। कहा जाता है कि जामवंत उन पात्रों में से एक हैं जो रामायण और महाभारत दोनों ही काल में उपस्थित थे। पुराणों में ऐसा कहा गया है कि एक बहुमुल्य मणि जीतने के लिए श्रीकृष्ण और जामवंत के बीच 28 दिनों तक युद्ध चला था। लेकिन युद्ध के बीच में ही जामवंत ने श्रीकृष्ण के स्वरूप को पहचान लिया था। इसके बाद उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह अपनी पुत्री जामवंती से कर दिया। श्रीकृष्ण और जामवंती के पुत्र का नाम सांबा था। वह बेहद ही आकर्षक था। उसे देख श्रीकृष्ण की कई छोटी रानियां उसके प्रति आकृष्ट रहती थीं। ऐसे में एक दिन ऐसा हुआ कि श्रीकृष्ण की एक रानी ने सांबा की पत्नी का रूप लिया और उसे आलिंगन में भर लिया। यह सब श्रीकृष्ण ने देख लिया। यह देख वे बेहद क्रोधित हुए। क्रोध में श्रीकृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोढ़ी हो जाने और मृत्यु के पश्चात् डाकुओं द्वारा उसकी पत्नियों को अपहरण कर ले जाने का श्राप दे दिया।पुराणों के अनुसार, सांबा को इस कोढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए महर्षि कटक ने सांबा को सूर्य देव की अराधना करने के लिए कहा। इसके बाद सांबा ने एक सूर्यदेव का मंदिर बनवाया। यह मंदिर चंद्रभागा नदी के किनारे मित्रवन में स्थित है। इसी मंदिर में सांबा ने 12 वर्षों तक सूर्य देव की कड़ी तपस्या की। बस तब से ही चंद्रभागा नदी को कोढ़ ठीक करने वाली नदी के रूप में ख्याति मिली है। ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस नदी में स्नान करता है उसका कोढ़ जल्दी ठीक हो जाता है।

जब श्रीकृष्ण ने दिया था अपने ही पुत्र को कोढ़ी होने का श्राप! पढ़ें यह कथा Read More »