द्रोणागिरि – यहां वर्जित है हनुमान जी की पूजा

 हम सब जानते है हनुमान जी हिन्दुओं के प्रमुख आराध्य देवों में से एक है, और सम्पूर्ण भारत में इनकी पूजा की जाती है।  लेकिन बहुत काम लोग जानते है की हमारे भारत में ही एक जगह ऐसी है जहां हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती है।  ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ के रहवासी हनुमान जी द्वारा किए गए एक काम से आज तक नाराज़ हैं। यह जगह है उत्तराखंड स्तिथ द्रोणागिरि गांव। द्रोणागिरि गांव –द्रोणागिरि गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ प्रखण्ड में जोशीमठ नीति मार्ग पर है। यह गांव लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था। चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठा ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती। यहां तक कि इस गांव में लाल रंग का झंडा लगाने पर पाबंदी है। द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार –द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार जब हनुमान बूटी लेने के लिये इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस पर्वत पर संजीवनी बूटी हो सकती है। तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? वृद्धा ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया। हनुमान उड़कर पर्वत पर गये पर बूटी कहां होगी यह पता न कर सके। वे फिर गांव में उतरे और वृद्धा से बूटीवाली जगह पूछने लगे। जब वृद्धा ने बूटीवाला पर्वत दिखाया तो हनुमान ने उस पर्वत के काफी बड़े हिस्से को तोड़ा और पर्वत को लेकर उड़ते बने। बताते हैं कि जिस वृद्धा ने हनुमान की मदद की थी उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। आज भी इस गांव के आराध्य देव पर्वत की विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलायें इस पूजा में मुखर होकर भाग लेती हैं। इस घटना से जुड़ा प्रसंग –यूँ तो राम के जीवन पर अनेकों रामायण लिखी गई है पर इनमे से दो प्रमुख है एक तो वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और एक तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस। इनमे से जहाँ वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है वही तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस सबसे अधिक पढ़ा जाता है। पर जैसा की हमने हमारे एक पिछले लेख में आप सब को बताया था की रामायण और रामचरितमानस में कई घटनाओं में, कई प्रसंगो में अंतर है। ऐसा ही कुछ अंतर दोनों किताबों में इस प्रसंग के संबंध में भी है।  यहाँ हम आपको दोनों किताबो में वर्णित प्रसंग के बारे में बता रहे है। वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसारहनुमानजी द्वारा पर्वत उठाकर ले जाने का प्रसंग वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चलाकर श्रीराम व लक्ष्मण सहित समूची वानर सेना को घायल कर दिया। अत्यधिक घायल होने के कारण जब श्रीराम व लक्ष्मण बेहोश हो गए तो मेघनाद प्रसन्न होकर वहां से चला गया। उस ब्रह्मास्त्र ने दिन के चार भाग व्यतीत होते-होते 67 करोड़ वानरों को घायल कर दिया था। हनुमानजी, विभीषण आदि कुछ अन्य वीर ही उस ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से बच पाए थे। जब हनुमानजी घायल जांबवान के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा – इस समय केवल तुम ही श्रीराम-लक्ष्मण और वानर सेना की रक्षा कर सकते हो। तुम शीघ्र ही हिमालय पर्वत पर जाओ और वहां से औषधियां लेकर आओ,  जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं। जांबवान ने हनुमानजी से कहा कि- हिमालय पहुंचकर तुम्हें ऋषभ तथा कैलाश पर्वत दिखाई देंगे। उन दोनों के बीच में औषधियों का एक पर्वत है, जो बहुत चमकीला है। वहां तुम्हें चार औषधियां दिखाई देंगी, जिससे सभी दिशाएं प्रकाशित रहती हैं। उनके नाम मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी है। हनुमान तुम तुरंत उन औषधियों को लेकर आओ, जिससे कि श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना पुन: स्वस्थ हो जाएं। जांबवान की बात सुनकर हनुमानजी तुरंत आकाश मार्ग से औषधियां लेने उड़ चले। कुछ ही समय में हनुमानजी हिमालय पर्वत पर जा पहुंचे। वहां उन्होंने हनुमानजी ने अनेक महान ऋषियों के आश्रम देखे। हिमालय पहुंचकर हनुमानजी ने कैलाश तथा ऋषभ पर्वत के दर्शन भी किए। इसके बाद उनकी दृष्टि उस पर्वत पर पड़ी, जिस पर अनेक औषधियां चमक रही थीं। हनुमानजी उस पर्वत पर चढ़ गए और औषधियों की खोज करने लगे। उस पर्वत पर निवास करने वाली संपूर्ण महाऔषधियां यह जानकर कि कोई हमें लेने आया है, तत्काल अदृश्य हो गईं। यह देखकर हनुमानजी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने वह पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया, जिस पर औषधियां थीं। कुछ ही समय में हनुमान उस स्थान पर पहुंच गए, जहां श्रीराम-लक्ष्मण व वानर सेना बेहोश थी। हनुमानजी को देखकर श्रीराम की सेना में पुन: उत्साह का संचार हो गया। इसके बाद उन औषधियों की सुगंध से श्रीराम-लक्ष्मण व घायल वानर सेना पुन: स्वस्थ हो गई। उनके शरीर से बाण निकल गए और घाव भी भर गए। इसके बाद हनुमानजी उस पर्वत को पुन: वहीं रख आए, जहां से लेकर आए थे। लेकिन रामचरितमानस में कुछ अन्य प्रसंग है। तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसारगोस्वामी तुलसीदास द्वारा चरित श्रीरामचरितमानस के अनुसार रावण के पुत्र मेघनाद व लक्ष्मण के बीच जब भयंकर युद्ध हो रहा था, उस समय मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाकर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया। हनुमानजी उसी अवस्था में लक्ष्मण को लेकर श्रीराम के पास आए। लक्ष्मण को इस अवस्था में देखकर श्रीराम बहुत दु:खी हुए। तब जांबवान ने हनुमानजी से कहा कि लंका में सुषेण वैद्य रहता है, तुम उसे यहां ले आओ। हनुमानजी ने ऐसा ही किया। सुषेण वैद्य ने हनुमानजी को उस पर्वत और औषधि का नाम बताया और हनुमानजी से उसे लाने के लिए कहा, जिससे कि लक्ष्मण पुन: स्वस्थ हो जाएं। हनुमानजी तुरंत उस औषधि को लाने चल पड़े। जब रावण को यह बात पता चली तो उसने हनुमानजी को रोकने के लिए कालनेमि दैत्य को भेजा। कालनेमि दैत्य ने रूप बदलकर हनुमानजी को रोकने का प्रयास किया, लेकिन हनुमानजी उसे पहचान गए और उसका वध कर दिया। इसके बाद हनुमानजी तुरंत औषधि

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विष्णु पुत्रों का संहार करने के लिए लिया था भगवन शिव ने वृषभ अवतार

धर्म ग्रंथो के अनुसार भगवान शिव के 19 अवतार हुए है। इन्हीं में से एक है भगवान शिव का ‘वृषभ अवतार’। जहाँ भगवान शिव ने कई अवतार दानवों का विनाश करने के लिए लिये थे वही वृषभ अवतार, विष्णु पुत्रों का संहार करने के लिए लिया था। आइए जानते है आखिर क्यों भगवान शिव को विष्णु पुत्रों के संहार जरुरत पड़ी। शिवजी के वृषभ अवतार की पौराणिक कथा समुद्र मंथन के उपरांत जब अमृत कलश उत्पन्न हुआ तो उसे दैत्यों की नजर से बचाने के लिए श्री हरि विष्णु ने अपनी माया से बहुत सारी अप्सराओं की सर्जना की। दैत्य अप्सराओं को देखते ही उन पर मोहित हो गए और उन्हें जबरन उठाकर पाताल लोक ले गए। उन्हें वहां बंधी बना कर अमृत कलश को पाने के लिए वापिस आए तो समस्त देव अमृत का सेवन कर चुके थे। जब दैत्यों को इस घटना का पता चला तो उन्होंने पुन: देवताओं पर चढ़ाई कर दी। लेकिन अमृत पीने से देवता अजर-अमर हो चुके थे। अत: दैत्यों को हार का सामना करना पड़ा। स्वयं को सुरक्षित करने के लिए वह पाताल की ओर भागने लगे। दैत्यों के संहार की मंशा लिए हुए श्री हरि विष्णु उनके पीछे-पीछे पाताल जा पहुंचे और वहां समस्त दैत्यों का विनाश कर दिया। देवताओं को विष्णु पुत्रों के आतंक से मुक्त करवाने के लिए भगवान शिव एक बैल यानि कि ‘वृषभ’ के रूप में पाताल लोक पहुंचे और वहां जाकर भगवान विष्णु के सभी पुत्रों का संहार कर डाला। तभी श्री हरि विष्णु आए आपने वंश का नाश हुआ देख वह क्रुद्ध हो उठे और भगवान शिव रूपी वृषभ पर आक्रमण कर दिया लेकिन उनके सभी वार निष्फल हो गए। मान्यता है कि शिव व विष्णु शंकर नारायण का रूप थे इसलिए बहुत समय तक युद्ध चलने के उपरांत भी दोनों में से किसी को भी न तो हानि हुई और न ही कोई लाभ। अंत में जिन अप्सराओं ने श्री हरि विष्णु को अपने वरदान में बांध रखा था उन्होंने उन्हें मुक्त कर दिया। इस घटना के बाद जब श्री हरि विष्णु को इस घटना का बोध हुआ तो उन्होंने भगवान शिव की स्तुति की।भगवान शिव के कहने पर श्री हरि विष्णु विष्णुलोक लौट गए। जाने से पूर्व वह अपना सुदर्शन चक्र पाताल लोक में ही छोड़ गए। जब वह विष्णुलोक पहुंचे तो वहां उन्हें भगवान शिव द्वारा एक और सुदर्शन चक्र की प्राप्ति हुई।

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बभ्रुवाहन ने क्यों किया था अपने पिता अर्जुन का वध?

महाभारत की कथा में एक प्रसंग आता है जब बभ्रुवाहन एक युद्ध में अपने पिता अर्जुन का वध कर देता है।अर्जुन ने द्रोपदी और सुभद्रा के अलावा दो अन्य विवाह और किए थे। एक नाग कन्या उलूपी से जिससे की पुत्र अरावन पैदा हुआ था जिसने महाभारत युद्ध में अपनी स्वैचिछक बलि दी थी। तथा दूसरा विवाह किया था मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से जिससे की पुत्र बभ्रुवाहन पैदा हुआ था, जिसने एक युद्ध में स्वयं अपने पिता का वध किया था। आइए विस्तारपूर्वक पढ़ते है की आखिर क्यों बभ्रुवाहन ने अपने पिता अर्जुन का वध किया तथा अर्जुन पुनः कैसे जीवित हुए। युधिष्ठिर ने किया अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह की मृत्यु से युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ। तब महर्षि वेदव्यास व श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया और धर्मपूर्वक शासन करने के लिए कहा। शोक निवारण के लिए महर्षि वेदव्यास ने युधिष्ठिर से अश्वमेध यज्ञ करने के लिए भी कहा। तब युधिष्ठिर ने कहा कि इस समय राजकोष खाली हो चुका है। अश्वमेध यज्ञ करने के लिए बहुत से धन की आवश्यकता होती है, जो अभी उपलब्ध नहीं है। युधिष्ठिर की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने बताया कि पूर्व काल में राजा मरुत्त ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया था। उस यज्ञ में उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत सा सोना दिया था। बहुत अधिक मात्रा में होने के कारण ब्राह्मण वह सोना अपने साथ नहीं ले जा पाए। वह सोना आज भी हिमालय पर पड़ा है। उस धन से अश्वमेध यज्ञ किया जा सकता है। युधिष्ठिर ने ऐसा ही करने का निर्णय लिया। महर्षि वेदव्यास के कहने पर पांडव हिमालय गए और वहां राजा मरुत्त के धन को प्राप्त कर लिया। उस धन को ढोने के लिए पांडव बहुत से हाथी-घोड़े व सेना लेकर गए थे। उनकी संख्या इस प्रकार है- साठ हजार ऊंट, एक करोड़ बीस लाख घोड़े, एक लाख हाथी, रथ और छकड़े। इनके अलावा गधों और मनुष्यों की तो गिनती ही नहीं थी। इस प्रकार इतना सारा धन पांडव हस्तिनापुर लेकर आए। अर्जुन को बनाया था यज्ञ के घोड़े का रक्षक पांडवों ने शुभ मुहूर्त देखकर यज्ञ का शुभारंभ किया और अर्जुन को रक्षक बना कर घोड़ा छोड़ दिया। वह घोड़ा जहां भी जाता, अर्जुन उसके पीछे जाते। अनेक राजाओं ने पांडवों की अधीनता स्वीकार कर ली। वहीं, कुछ ने मैत्रीपूर्ण संबंधों के आधार पर पांडवों को कर देने की बात मान ली। किरात, मलेच्छ व यवन आदि देशों के राजाओं ने यज्ञ को घोड़े को रोक लिया। तब अर्जुन ने उनसे युद्ध कर उन्हें पराजित कर दिया। इस तरह विभिन्न देशों के राजाओं के साथ अर्जुन को कई बार युद्ध करना पड़ा। उलूपी ने उकसाया था बभ्रुवाहन को युद्ध के लिए यज्ञ का घोड़ा घूमते-घूमते मणिपुर पहुंच गया। यहां की राजकुमारी चित्रांगदा से अर्जुन को बभ्रुवाहन नामक पुत्र था। बभ्रुवाहन ही उस समय मणिपुर का राजा था। जब बभ्रुवाहन को अपने पिता अर्जुन के आने का समाचार मिला तो उनका स्वागत करने के लिए वह नगर के द्वार पर आया। अपने पुत्र बभ्रुवाहन को देखकर अर्जुन ने कहा कि मैं इस समय यज्ञ के घोड़े की रक्षा करता हुआ तुम्हारे राज्य में आया हूं। इसलिए तुम मुझसे युद्ध करो। जिस समय अर्जुन बभ्रुवाहन से यह बात कह रह था, उसी समय नागकन्या उलूपी भी वहां आ गई। उलूपी भी अर्जुन की पत्नी थी। उलूपी ने भी बभ्रुवाहन को अर्जुन के साथ युद्ध करने के लिए उकसाया। अपने पिता अर्जुन व सौतेली माता उलूपी के कहने पर बभ्रुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो गया। अर्जुन और बभ्रुवाहन में भयंकर युद्ध होने लगा। अपने पुत्र का पराक्रम देखकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए। बभ्रुवाहन उस समय युवक ही था। अपने बाल स्वभाव के कारण बिना परिणाम पर विचार कर उसने एक तीखा बाण अर्जुन पर छोड़ दिया। उस बाण को चोट से अर्जुन बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े। बभ्रुवाहन भी उस समय तक बहुत घायल हो चुका था, वह भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। तभी वहां बभ्रुवाहन की माता चित्रांगदा भी आ गई। अपने पति व पुत्र को घायल अवस्था में धरती पर पड़ा देख उसे बहुत दुख हुआ। चित्रांगदा ने देखा कि उस समय अर्जुन के शरीर में जीवित होने के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे। अपने पति को मृत अवस्था में देखकर वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसी समय बभ्रुवाहन को भी होश आ गया। जब उसने देखा कि उसने अपने पिता की हत्या कर दी है तो वह भी शोक करने लगा। अर्जुन की मृत्यु से दुखी होकर चित्रांगदा और बभ्रुवाहन दोनों ही आमरण उपवास पर बैठ गए। संजीवन मणि द्वारा पुनर्जीवित हो गए थे अर्जुन जब नागकन्या उलूपी ने देखा कि चित्रांगदा और बभ्रुवाहन आमरण उपवास पर बैठ गए हैं तो उसने संजीवन मणि का स्मरण किया। उस मणि के हाथ में आते ही उलूपी ने बभ्रुवाहन से कहा कि यह मणि अपने पिता अर्जुन की छाती पर रख दो। बभ्रुवाहन ने ऐसा ही किया। वह मणि छाती पर रखते ही अर्जुन जीवित हो उठे। अर्जुन द्वारा पूछने पर उलूपी ने बताया कि यह मेरी ही मोहिनी माया थी। उलूपी ने बताया कि छल पूर्वक भीष्म का वध करने के कारण वसु (एक प्रकार के देवता) आपको श्राप देना चाहते थे। जब यह बात मुझे पता चली तो मैंने यह बात अपने पिता को बताई। उन्होंने वसुओं के पास जाकर ऐसा न करने की प्रार्थना की। तब वसुओं ने प्रसन्न होकर कहा कि मणिपुर का राजा बभ्रुवाहन अर्जुन का पुत्र है यदि वह बाणों से अपने पिता का वध कर देगा तो अर्जुन को अपने पाप से छुटकारा मिल जाएगा। आपको वसुओं के श्राप से बचाने के लिए ही मैंने यह मोहिनी माया दिखलाई थी। इस प्रकार पूरी बात जान कर अर्जुन, बभ्रुवाहन और चित्रांगदा भी प्रसन्न हो गए। अर्जुन ने बभ्रुवाहन को अश्वमेध यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया और पुन: अपनी यात्रा पर चल दिए। इस प्रकार अर्जुन अन्य देशों के राजाओं को पराजित करते हुए पुन: हस्तिनापुर आए। अर्जुन के आने की खबर सुनकर युधिष्ठिर आदि पांडव व श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए। तय समय पर उचित स्थान देखकर यज्ञ के लिए भूमि का चयन किया गया। शुभ मुहूर्त में यज्ञ प्रारंभ किया गया। यज्ञ को देखने के लिए दूर-दूर से राजा-महाराजा आए।

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लोहार्गल – यहां पानी में गल गए थे पांडवों के अस्त्र-शस्त्र, मिली थी परिजनों की हत्या के पाप से मुक्ति

राजस्थान के शेखावटी इलाके के झुंझुनूं जिले से 70 कि. मी. दूर अरावली पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे से करीब दस कि.मी. की दूरी पर स्थित है लोहार्गल। जिसका अर्थ होता है जहां लोहा गल जाए। यह राजस्थान का पुष्कर के बाद दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ है। इस तीर्थ का सम्बन्ध पांडवो, भगवन परशुराम, भगवान सूर्य और भगवान विष्णु से है। यहाँ गले थे पांडवों के हथियार- महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन जीत के बाद भी पांडव अपने परिजनों की हत्या के पाप से चिंतित थे। लाखों लोगों के पाप का दर्द देख श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि जिस तीर्थ स्थल के तालाब में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।  घूमते-घूमते पाण्डव लोहार्गल आ पहुँचे तथा जैसे ही उन्होंने यहाँ के सूर्यकुण्ड में स्नान किया, उनके सारे हथियार गल गये। इसके बाद शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधि से विभूषित किया। सूर्यकुंड व सूर्य मंदिर की कहानी – महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन जीत के बाद भी पांडव अपने परिजनों की हत्या के पाप से चिंतित थे। लाखों लोगों के पाप का दर्द देख श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि जिस तीर्थ स्थल के तालाब में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।  घूमते-घूमते पाण्डव लोहार्गल आ पहुँचे तथा जैसे ही उन्होंने यहाँ के सूर्यकुण्ड में स्नान किया, उनके सारे हथियार गल गये। इसके बाद शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधि से विभूषित किया। सूर्यकुंड व सूर्य मंदिर की कहानी – यहां प्राचीन काल से निर्मित सूर्य मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसके पीछे भी एक अनोखी कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा हुए थे, जिन्हें वृद्धावस्था में अपंग लड़की के रूप में एक संतान हुई। राजा ने भूत-भविष्य के ज्ञाताओं को बुलाकर उसके पिछले जन्म के बारे में पूछा। तब विद्वानों ने बताया कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी अर्थात बंदरिया थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी। शिकारी उस मृत बंदरिया को एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया, क्योंकि बंदरिया का मांस अभक्ष्य होता है। हवा और धूप के कारण वह सूख कर लोहार्गल धाम के जलकुंड में गिर गई किंतु उसका एक हाथ पेड़ पर रह गया। बाकी शरीर पवित्र जल में गिरने से वह कन्या के रूप में आपके यहाँ उत्पन्न हुई है। विद्वानों ने राजा से कहा, आप वहां पर जाकर उस हाथ को भी पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची का अंपगत्व समाप्त हो जाएगा। राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया। जिससे उनकी पुत्री का हाथ स्वतः ही ठीक हो गया। राजा इस चमत्कार से अति प्रसन्न हुए। विद्वानों ने राजा को बताया कि यह क्षेत्र भगवान सूर्यदेव का स्थान है। उनकी सलाह पर ही राजा ने हजारों वर्ष पूर्व यहां पर सूर्य मंदिर व सूर्यकुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया। यहां भगवान विष्णु ने लिया था मतस्य अवतार – यह क्षेत्र पहले ब्रह्मक्षेत्र था। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने शंखासूर नामक दैत्य का संहार करने के लिए मत्स्य अवतार लिया था। शंखासूर का वध कर विष्णु ने वेदों को उसके चंगुल से छुड़ाया था। इसके बाद इस जगह का नाम ब्रह्मक्षेत्र रखा। परशुराम  जी ने भी किया था यहां प्रायश्चित – विष्णु के छठें अंशअवतार भगवान परशुराम ने क्रोध में क्षत्रियों का संहार कर दिया था, लेकिन शान्त होने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। तब उन्होंने यहां आकर पश्चाताप के लिए यज्ञ किया तथा पाप मुक्ति पाई थी। मालकेतु बाबा की चौबीस कोसी परिक्रमा – यहाँ एक विशाल बावड़ी भी है जिसका निर्माण महात्मा चेतनदास जी ने करवाया था। यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। पहाड़ी पर सूर्य मंदिर के साथ ही वनखण्डी जी का मन्दिर है। कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव मन्दिर, हनुमान मन्दिर तथा पाण्डव गुफा स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढ़ियाँ चढने पर मालकेतु जी के दर्शन किए जा सकते हैं। श्रावण मास में भक्तजन यहाँ के सूर्यकुंड से जल से भर कर कांवड़ उठाते हैं। यहां प्रति वर्ष माघ मास की सप्तमी को सूर्यसप्तमी महोत्सव मनाया जाता है, जिसमें सूर्य नारायण की शोभायात्रा के अलावा सत्संग प्रवचन के साथ विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।भाद्रपद मास में श्रीकृषण जन्माष्टमी से अमावस्या तक प्रत्येक वर्ष लोहार्गल के पहाडो में हज़ारों लाखों नर-नारी 24 कोस की पैदल परिक्रमा करते हैं जो मालकेतु बाबा की चौबीस कोसी परिक्रमा के नाम से प्रसिद्ध है। पुराणों में परिक्रमा का महात्म्य अनंत फलदायी बताया है। अब यह परिक्रमा और ज्यादा प्रासंगिक है। हरा-भरा वातावरण। औषधि गुणों से लबरेज पेड़-पौधों से आती शुद्ध-ताजा हवा और ट्रैकिंग का आनंद यहां है। और फिर खुशहाली की कामना से अनुष्ठान तो है ही। अमावस्या के दिन सूर्यकुण्ड में पवित्र स्नान के साथ यह परिक्रमा विधिवत संपन्न होती है।

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अचलेश्वर महादेव – अचलगढ़ – एक मात्र मंदिर जहां होती है शिव के अंगूठे की पूजा

अचलेश्वर महादेव के नाम से भारत में कई मंदिर है जिसमे से एक धौलपुर के अचलेश्वर महादेव के बारे में हम आपको बता चुके है जहाँ पर दिन में तीन बार रंग बदलने  वाला शिवलिंग है। आज हम आपको माउंट आबू के अचलेश्वर महादेव के बारे में बताएंगे जो की दुनिया का ऐसा इकलौत मंदिर है जहां पर शिवजी के पैर के अंगूठे की पूजा होती है। भगवन शिव के अंगूठे का निशान राजस्थान के एक मात्र हिल स्टेशन माउंट आबू को अर्धकाशी के नाम से भी जाना जाता है क्योकि यहाँ पर भगवान शिव के कई प्राचीन मंदिर है। स्कंद पुराण के मुताबिक वाराणसी शिव की नगरी है तो माउंट आबू भगवान शंकर की उपनगरी ।अचलेश्वर माहदेव मंदिर माउंट आबू से लगभग 11 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में अचलगढ़ की पहाड़ियों पर अचलगढ़ के किले के पास स्तिथ है। अचलेश्वर महादेव मंदिर में प्रवेश करते ही पंच धातु की बनी नंदी की एक विशाल प्रतिमा है, जिसका वजन चार टन हैं। मंदिर के अंदर गर्भगृह में शिवलिंग पाताल खंड के रूप में दृष्टिगोचर होता है, जिसके ऊपर एक तरफ पैर के अंगूठे का निशान उभरा हुआ है, जिन्हें स्वयंभू शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। यह देवाधिदेव शिव का दाहिना अंगूठा माना जाता है।  पारम्परिक मान्यता है की इसी अंगूठे ने पुरे माउंट आबू के पहाड़ को थाम रखा है जिस दिन अंगूठे का निशाँ गायब हो जाएगा, माउंट आबू का पहाड़ ख़त्म हो जाएगा। नंदी की प्रतिमा मंदिर परिसर के विशाल चौक में चंपा का विशाल पेड़ अपनी प्राचीनता को दर्शाता है। मंदिर की बायीं बाजू की तरफ दो कलात्मक खंभों का धर्मकांटा बना हुआ है, जिसकी शिल्पकला अद्भुत है। कहते हैं कि इस क्षेत्र के शासक राजसिंहासन पर बैठने के समय अचलेश्वर महादेव से आशीर्वाद प्राप्त कर धर्मकांटे के नीचे प्रजा के साथ न्याय की शपथ लेते थे। मंदिर परिसर में द्वारिकाधीश मंदिर भी बना हुआ है। गर्भगृह के बाहर वाराह, नृसिंह, वामन, कच्छप, मत्स्य, कृष्ण, राम, परशुराम, बुद्ध व कलंगी अवतारों की काले पत्थर की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। नंदी प्रतिमा मंदिर की पौराणिक कथा (Mythological Story of Achleshwar Temple) :पौराणिक काल में जहां आज आबू पर्वत स्थित है, वहां नीचे विराट ब्रह्म खाई थी। इसके तट पर वशिष्ठ मुनि रहते थे। उनकी गाय कामधेनु एक बार हरी घास चरते हुए ब्रह्म खाई में गिर गई, तो उसे बचाने के लिए मुनि ने सरस्वती गंगा का आह्वान किया तो ब्रह्म खाई पानी से जमीन की सतह तक भर गई और कामधेनु गाय गोमुख पर बाहर जमीन पर आ गई। एक बार दोबारा ऐसा ही हुआ। इसे देखते हुए बार-बार के हादसे को टालने के लिए वशिष्ठ मुनि ने हिमालय जाकर उससे ब्रह्म खाई को पाटने का अनुरोध किया। हिमालय ने मुनि का अनुरोध स्वीकार कर अपने प्रिय पुत्र नंदी वद्र्धन को जाने का आदेश दिया। अर्बुद नाग नंदी वद्र्धन को उड़ाकर ब्रह्म खाई के पास वशिष्ठ आश्रम लाया। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार आश्रम में नंदी वद्र्धन ने वरदान मांगा कि उसके ऊपर सप्त ऋषियों का आश्रम होना चाहिए एवं पहाड़ सबसे सुंदर व विभिन्न वनस्पतियों वाला होना चाहिए। वशिष्ठ ने वांछित वरदान दिए। उसी प्रकार अर्बुद नाग ने वर मांगा कि इस पर्वत का नामकरण उसके नाम से हो। इसके बाद से नंदी वद्र्धन आबू पर्वत के नाम से विख्यात हुआ। वरदान प्राप्त कर नंदी वद्र्धन खाई में उतरा तो धंसता ही चला गया, केवल नंदी वद्र्धन का नाक एवं ऊपर का हिस्सा जमीन से ऊपर रहा, जो आज आबू पर्वत है। इसके बाद भी वह अचल नहीं रह पा रहा था, तब वशिष्ठ के विनम्र अनुरोध पर महादेव ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे पसार कर इसे स्थिर किया यानी अचल कर दिया तभी यह अचलगढ़ कहलाया। तभी से यहां अचलेश्वर महादेव के रूप में महादेव के अंगूठे की पूजा-अर्चना की जाती है। इस अंगूठे के नीचे बने प्राकृतिक पाताल खड्डे में कितना भी पानी डालने पर खाई पानी से नहीं भरती। इसमें चढ़ाया जानेवाला पानी कहा जाता है यह आज भी एक रहस्य है। अचलगढ़ किले के अवशेष अचलगढ़ का किला (Achalgarh Fort) :अचलेश्वर महादेव मंदिर अचलगढ़ की पहाड़ियों पर अचलगढ़ के किले के पास स्तिथ है।  अचलगढ़ का किला जो की अब खंडहर में तब्दील हो चूका है,का निर्माण परमार राजवंश द्वारा करवाया गया था।  बाद में 1452 में महाराणा कुम्भा ने इसका पुनर्निर्माण करवाया तथा इसे अचलगढ़ नाम दिया। महाराणा कुम्भा ने अपने जीवन काल में अनेकों किलों का निर्माण करवाया जिसमे सबसे प्रमुख है जिसकी दीवार को विशव की दूसरी सबसे लम्बी दीवार होने का गौरव प्राप्त है।

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श्रीकृष्ण और राधा की भेंट | जानें राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी

एक दिन ग्वालों के मुखिया नंद बाबा को वृषभानु के घर पधारने का निमंत्रण मिला। नंद बाबा अपने परिवार के साथ उनके घर गए। वृषभानु अपने पिछले जन्म में महाराज सुचंद्र थे। एक राजा के रूप में वृषभानु तथा उनकी पत्नी कलावती को ब्रह्मा जी से यह वरदान मिला था कि अगले जन्म में उनके परिवार में राधा नामक एक कन्या का जन्म होगा। राधा स्वयं देवी लक्ष्मी का अवतार थीं। उनका गोरा रंग बहुत सुंदर लगता था। उनके बाल लंबे और आंखें हिरणी जैसी थीं। जब श्रीकृष्ण ने राधा को देखा, तो वे उन पर मोहित हो गए। उन्होंने राधा से पूछा, “क्या तुम मेरी मित्र बनोगी?” राधा मुस्कराकर बोलीं, “मैं इसी प्रतीक्षा में थी कि आप मुझसे ऐसा पूछे।” इस तरह दोनों बच्चों के बीच स्नेह और दोस्ती की शुरुआत हो गई। ज्यों-ज्यों श्रीकृष्ण बड़े होते गए, त्यों-त्यों राधा के प्रति उनका मोह बढ़ता गया।  जब भगवान कृष्ण युवा हो गए, तो राधा उनकी सबसे प्यारी मित्र बनीं। श्रीकृष्ण के साथ खेलने वाली दूसरी गोपियां यह शिकायत करती थीं, “भगवान कृष्ण तो हमेशा राधा से ही बातें करते रहते हैं। वे हमसे बातें क्यों नहीं करते?” एक गोपी ने कहा, “हाय! मैं तो कुछ भी देने को तैयार हूं। काश! कोई मुझे राधा बना दे।”  भगवान कृष्ण को राधा से बहुत प्रेम था, लेकिन उन्हें इस बात से जलन होती थी कि राधा उनसे गोरी क्यों हैं। एक दिन इसी बात के विरोध में भगवान कृष्ण ने अपने मुख पर रंग लगा लिया। यह देखकर राधा हंसने लगीं और उन्होंने भी श्रीकृष्ण के मुख पर रंग मल दिया। ऐसे में गोपियों को बहुत आनंद आया। भगवान कृष्ण बोले, “तुम लोग हंस रही हो। मैं भी तुम्हें रंग लगाता हूं।” इस तरह उन्होंने भी गोपियों के चेहरे रंग दिए। शीघ्र ही सभी लोग एक-दूसरे के मुख पर रंग लगाने लगे।  भगवान कृष्ण द्वारा मुख पर रंग लगाने का यह खेल गांव वालों को इतना भाया कि वे भी इस मौज-मस्ती में शामिल हो गए। चारों ओर हंसी-मजाक और ठहाके गूंजने लगे।  तत्पश्चात अगले साल बड़ी धूमधाम से इस दिन की तैयारियां की गईं। गोपियों ने वृक्षों और लताओं से प्राप्त किए टेसू के फूलों को पानी में घोलकर रंग तैयार किया। फिर पिचकारियों में उस रंगीन पानी को भरकर सबने खूब मौज-मस्ती की। इस तरह वृंदावन में भारतीय त्योहार होली का आरंभ हुआ। इस त्योहार में लोग रंगों से खेलते हैं तथा सभी पर रंग और गुलाल लगाते हैं।  एक दिन जब गोपियां नदी में स्नान कर रही थीं, तो भगवान कृष्ण चुपके से वहां गए और उनके कपड़े चुरा लिए। इसके बाद वे एक पेड़ की शाखा पर बैठ गए और सारे कपड़े वहीं रख दिए। गोपियों को उनके आने के बारे में पता नहीं चला। लेकिन जब वे नहाकर नदी के किनारे गईं, तो देखा कि उनके कपड़े वहां नहीं थे। तभी गोपियों ने भगवान कृष्ण के हंसने की आवाज सुनी। इस तरह उन्हें पता चल गया कि क्या हुआ होगा। उन्होंने पानी के भीतर से ही आग्रह किया, “कृष्ण! हमारे कपड़े वापस कर दो।” श्रीकृष्ण ने कहा, “मैं तुम्हारे कपड़े तभी वापस करूंगा, जब तुम लोग हाथ जोड़कर और हाथ को सिर के ऊपर उठाकर समर्पण कर दो।”  गोपियां ऐसा नहीं करना चाहती थी, क्योंकि उन्हें बहुत शर्म आ रही थी। फिर भी उन्होंने किसी तरह यह शर्त पूरी की और उन्हें उनके कपड़े वापस मिल गए। दरअसल, भगवान कृष्ण गोपियों को उनके अहं से मुक्त कराना चाहते थे। वे चाहते थे कि गोपियां प्रभु के आगे आत्म-समर्पण कर दें।  इसके साथ ही गोपियों को यह सबक भी मिल गया कि उन्हें पूरे वस्त्र उतारकर नदी में स्नान नहीं करना चाहिए। पूरे वस्त्र उतारकर नदी में स्नान करने से नदी का अपमान होता है। संकेत रूप में प्रभु के आगे आत्म-समर्पण करने वाली गोपियां सदा के लिए अपने कान्हा की प्यारी हो गईं।  जब श्रीकृष्ण और बलराम बड़े हो गए, तो नंद बाबा ने सोचा कि दोनों भाइयों को कोई काम सौंपा जाना चाहिए। गांव में किशोरों को यह जिम्मेदारी दी जाती थी कि वे गौओं के बछड़ों की देखरेख करें। नंद ने दोनों भाइयों को यही काम सौंप दिया और बोले, “आज से इन बछड़ों को संभालना तुम्हारी जिम्मेदारी है। तुम्हें इन्हें चारा खिलाना है और इनकी सुरक्षा भी करनी है।”  इस प्रकार अन्य किशोरों की तरह भगवान कृष्ण और बलराम भी अपने बछड़ों की देखरेख करने लगे। वे उन्हें प्रतिदिन घास चराने के लिए यमुना नदी के किनारे ले जाते और शाम के समय वापस ले आते।  जब वे बछड़ों को चराने ले जाते, तो भगवान कृष्ण प्रायः बांसुरी बजाया करते थे। उन्हें आंवला और बेल फल खाना बहुत अच्छा लगता था। वे अक्सर अपना मन बहलाने के लिए गौओं, बछड़ों और जंगल के अन्य पशु-पक्षियों की आवाजें निकाला करते थे तथा अपने दोस्तों का मनोरंजन करते थे।  हालांकि श्रीकृष्ण और बलराम के आसपास संकट मंडराया करते थे, लेकिन दोनों के साथ रहने पर ग्वालों को डरने की आवश्यकता नहीं थी। वे जानते थे कि भगवान कृष्ण उनकी रक्षा के लिए मौजूद थे।भगवान कृष्ण और बलराम के कारण गांव के ग्वाले भी बहुत साहसी तथा निडर हो गए थे। दोनों भाइयों ने सभी को लाठी भांजना अच्छी तरह सिखा दिया था। उन्हें भगवान कृष्ण और बलराम के साथ रहना बहुत अच्छा “लगता था। 

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कृष्ण भगवान की जन्म कथा | भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा

जब भगवान कृष्ण के जन्म का समय निकट आया, तो आकाश में रोहिणी नक्षत्र उभर आया और चमकने लगा। यह सितारा केवल शुभ अवसरों पर ही चमकता है। सारे ग्रह और नक्षत्र अनुकूल हो गए। नदियां शांत होकर ठहर गईं। दिव्य संगीत की लहरी पर अप्सराएं और देवता नाचने लगे।  देवकी सूरज की तरह जगमगा रही थीं, क्योंकि उनके गर्भ से भगवान विष्णु जन्म लेने वाले थे। उनकी आभा को देवकी सह नहीं पा रही थीं।  ज्यों ही अष्टमी की आधी रात को भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, त्यों ही आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। पृथ्वी भगवान के जन्म का समाचार सुनकर झूम उठी। वासुदेव अपनी आठवीं संतान को देखकर मंत्रमुग्ध हो उठे, जो दिव्य प्रभु का अवतार थी।  भगवान कृष्ण का जन्म होते ही वासुदेव सचेत हो गए। तभी प्रभु की कृपा से कारागार के दरवाजे अपने-आप खुल गए और सारे दरबान गहरी नींद में सो गए। “आप एक भी क्षण गंवाए बिना, अपने पुत्र कृष्ण को लेकर गोकुल रवाना हो जाएं।” देवकी ने पति से आग्रह किया। “तुम ठीक कहती हो। मुझे जल्दी से प्रभु के अवतार को सुरक्षित जगह पर पहुंचा देना चाहिए। दुष्ट कंस को पता नहीं चलना चाहिए कि हमारे पुत्र का जन्म हो चुका है, वरना वह उसे भी जान से मार डालेगा।” यह कहकर वासुदेव ने कांपते हाथों से शिशु को अपनी गोद में ले लिया। उनकी आंखों से प्रेम के आंसू उमड़ पड़े। देवकी और वासुदेव कुछ देर तक अपने बालक को प्यार से निहारते रहे। मां की ममता ने अपने दिल पर पत्थर रख लिया था। बालक की जान बचाने के लिए यह बहुत जरूरी था कि उसे अपने से दूर कर दिया जाए।  वासुदेव ने देवकी को गले से लगाकर दिलासा दिया, हालांकि वे स्वयं भी बहुत दुखी थे। अभी तो उन्होंने अपने बच्चे को जी भरकर देखा भी नहीं था कि उसे अपने से दूर करने का समय निकट आ गया। लेकिन इसके अलावा कोई अन्य रास्ता भी तो नहीं था।  वासुदेव ने शिशु को लिटाने के लिए एक टोकरी में नरम पुआल रखी, फिर देवकी की पुरानी साड़ी बिछाकर बिस्तर तैयार कर दिया। दोनों ने बालक का माथा चूमकर उसकी जान की सलामती की प्रार्थना की। तत्पश्चात वासुदेव बालक को टोकरी में लिटाकर बाहर की ओर चल दिए। प्रभु की कृपा से सारे दरबान अब भी गहरी नींद में सो रहे थे। यह भी एक चमत्कार था कि कारागार के सारे दरवाजे अपने-आप खुल गए थे। वासुदेव तेज कदमों से गोकुल की ओर रवाना हो गए। अब उनके मन में एक ही धुन सवार थी-उन्हें अपने बच्चे को सुरक्षित स्थान पर जल्दी से जल्दी पहुंचाना था।  जब वासुदेव  उफनती हुई यमुना नदी के किनारे पहुंचे, तो रुक गए। गोकुल जाने के लिए नदी पार करनी थी। तभी तेज वर्षा होने लगी। ऐसे में नदी पार करना बहुत कठिन था। लेकिन वासुदेव ने धीरज रखकर लहरों के बीच कदम बढ़ाया। आकाश में बिजली कड़क रही थी। वे सोच रहे थे कि बालक को सुरक्षित कैसे ले जा सकेंगे।  तभी भगवान कृष्ण को वर्षा और तूफान से बचाने के लिए शेषनाग ने उन पर अपना फन फैला दिया। नदी उफान पर थी और पानी का स्तर ऊंचा हो गया था। लेकिन ज्यों ही लहरों ने भगवान कृष्ण के पैरों को छुआ, पानी का स्तर अपने-आप नीचे उतर गया। वर्षा रुक गई और वासुदेव गोकुल के मुखिया नंद के महल की ओर बढ़ते चले गए। उन्होंने सोचा, ‘अगर नंद के महल के दरबानों ने मुझे मेरे पुत्र के साथ देख लिया, तो…।’ लेकिन नंद के महल में पहुंचकर उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु की कृपा से सारे दरबान गहरी नींद में सो रहे थे। वासुदेव ने सोते हुए दरबानों को पार किया और उस कक्ष में पहंच गए. जहां यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था।  वासुदेव ने नंद से भेंट की। नंद अपनी पुत्री के जन्म का समाचार पाकर बहुत प्रसन्न थे। वासुदेव ने सारी बात बताते हुए उन्हें अपना पुत्र सौंप दिया। नंद ने अपनी पुत्री योगमाया वासुदेव को दे दी। उन्होंने उस कन्या को उसी तरह टोकरी में रखा और मथुरा की ओर चल पड़े। शीघ्र ही वासुदेव कारागार में पहुंच गए और उन्होंने देवकी को कन्या सौंप दी। इसके साथ ही कारागार के सारे दरवाजे अपने-आप बंद हो गए। सभी दरबान जाग गए। उन्होंने एक कन्या को देखते ही शोर मचा दिया। मथुरा के दुष्ट राजा कंस को तत्काल देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना भेजी गई। वासुदेव ने देवकी को दिलासा दिया, “प्रिय! चिंता मत करो, भगवान कृष्ण गोकुल में बिल्कुल सुरक्षित हैं। दुष्ट राजा कंस कभी उन तक नहीं पहुंच सकेगा।”  जब कंस को यह समाचार मिला कि देवकी ने आठवीं संतान को जन्म दिया है, तो वह दौड़ता हुआ आया और गरजते हुए बोला, “आठवीं संतान कहां है?” देवकी ने विनती की, “भैया, वह तो नन्ही-सी बच्ची है। वह इतने बड़े राजा का क्या नुकसान कर सकती है? कृपया उसके प्राण मत लो।”  कंस ठहाका मारकर बोला, “देवकी बहन! मैंने भविष्यवाणी सुनी है। मैं नहीं चाहता कि इस धरती पर ऐसा कोई जीव जीवित रहे, जो मथुरा के राजा कंस के प्राण ले सके। यह कन्या ही आने वाले समय में मेरा काल बन सकती है, इसलिए मैं इसे जीवित नहीं छोडूंगा।”  तत्पश्चात दुष्ट कंस योगमाया को उठाकर जोर से गरजा, “तुझे मरना ही होगा।” यह कहते हुए उसने उसे जमीन पर पटक दिया, लेकिन कन्या हवा में उछली और अपने असली रूप में आ गई। वह देवी योगनिद्रा थी, जिसे भगवान विष्णु ने कंस को चेतावनी देने के लिए धरती पर भेजा था। देवी योगमाया बोली, “हे मूर्ख कंस! तुझे मारने वाला तो पहले ही इस धरती पर जन्म ले चुका है। अब तू नहीं बच सकता। मेरे शब्दों को याद रखना। तू शीघ्र ही मरने वाला है।” कंस आंखें फाड़े उसे देखता रह गया। योगमाया हंसी और शीघ्र ही आकाश में ओझल हो गई।  योगमाया के ओझल होने के बाद भी कारागार में एक अनूठा-सा प्रकाश फैला रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। कंस अपने दरबारियों और दरबानों सहित आश्चर्य चकित होकर खड़ा था। वह समझ ही नहीं पाया कि अचानक यह सब क्या हो गया।  इस घटना के बाद कंस ने सोचा कि अब

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हनुमान जी को क्यों चढ़ाते है सिंदूर का चोला ?

हिन्दू धर्म में सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। प्रत्येक सुहागन स्त्री इसे अपनी मांग में लगाती है। सिंदूर का हिन्दू धर्म में पूजा पाठ में भी महत्तव है।  कई देवी देवताओं को सिंदूर चढ़ाया जाता है। लेकिन  गणेश जी, भैरू जी (भैरव जी) और हनुमान जी को तो सिंदूर का पूरा चोला चढाने की परम्परा है। हर परम्परा के पीछे कोई कारण, कहानी जरूर होती है। हनुमान जी को भी ऊपर से नीचे तक सिंदूर चढाने के पीछे एक कहानी है जिसका वर्णन तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस में किया है। रामचरित मानस के अनुसार जब राम जी लक्ष्मण और सीता सहित अयोध्या लौट आए तो एक दिन हनुमान जी माता सीता के कक्ष में पहुंचे। उन्होंने देखा कि माता सीता लाल रंग की कोई चीज मांग में सजा रही हैं। हनुमान जी ने उत्सुक हो माता सीता से पूछा यह क्या है जो आप मांग में सजा रही हैं। माता सीता ने कहा यह सौभाग्य का प्रतीक सिंदूर है। इसे मांग में सजाने से मुझे राम जी का स्नेह प्राप्त होता है और उनकी आयु लंबी होती है। यह सुन कर हनुमान जी से रहा न गया ओर उन्होंने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया तथा मन ही मन विचार करने लगे इससे तो मेरे प्रभु श्रीराम की आयु ओर लम्बी हो जाएगी ओर वह मुझे अति स्नेह भी करेंगे। सिंदूर लगे हनुमान जी प्रभु राम जी की सभा में चले गए। राम जी ने जब हनुमान को इस रुप में देखा तो हैरान रह गए। राम जी ने हनुमान से पूरे शरीर में सिंदूर लेपन करने का कारण पूछा तो हनुमान जी ने साफ-साफ कह दिया कि इससे आप अमर हो जाएंगे और मुझे भी माता सीता की तरह आपका स्नेह मिलेगा। हनुमान जी की इस बात को सुनकर राम जी भाव विभोर हो गए और हनुमान जी को गले से लगा लिया। उस समय से ही हनुमान जी को सिंदूर अति प्रिय है और सिंदूर अर्पित करने वाले पर हनुमान जी प्रसन्न रहते हैं इसके अलावा हनुमानजी की प्रतिमा को सिंदूर का चोला चढ़ाने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। हनुमानजी को सिंदूर लगाने से प्रतिमा का संरक्षण होता है। इससे प्रतिमा किसी प्रकार से खंडित नहीं होती और लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। साथ ही चोला चढ़ाने से प्रतिमा की सुंदरता बढ़ती है, हनुमानजी का प्रतिबिंब साफ-साफ दिखाई देता है। जिससे भक्तों की आस्था और अधिक बढ़ती है तथा हनुमानजी का ध्यान लगाने में किसी भी श्रद्धालु को परेशानी नहीं होती।

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पौराणिक कथा – गणेश चतुर्थी को क्यों नहीं करने चाहिए चंद्र दर्शन ?

 हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार गणेश चतुर्थी को चंद्र दर्शन नहीं करने चाहिए क्योंकि इस रात्रि को चंद्र दर्शन करने से झूठे आरोप लगते हैं। इस सम्बन्ध में हमारे धर्म ग्रंथों में दो कथाएं है। पहली कथा यह बताती है की चंद्र दर्शन क्यों नहीं करना चाहिए जबकि दूसरी कथा को सुनने से भूलवश हुए चंद्र-दर्शन का दोष नहीं लगता है। श्रीगणेश ने दिया था चंद्रमा को श्राप :भगवान गणेश को गज का मुख लगाया गया तो वे गजवदन कहलाए और माता-पिता के रूप में पृथ्वी की सबसे पहले परिक्रमा करने के कारण अग्रपूज्य हुए। सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की पर चंद्रमा मंद-मंद मुस्कुराता रहा। उसे अपने सौंदर्य पर अभिमान था। गणेशजी समझ गए कि चंद्रमा अभिमान वश उनका उपहास करता है। क्रोध में आकर भगवान श्रीगणेश ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि- आज से तुम काले हो जाओगे। चंद्रमा को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने श्रीगणेश से क्षमा मांगी तो गणेशजी ने कहा सूर्य के प्रकाश को पाकर तुम एक दिन पूर्ण होओगे यानी पूर्ण प्रकाशित होंगे। लेकिन आज का यह दिन तुम्हें दंड देने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इस दिन को याद कर कोई अन्य व्यक्ति अपने सौंदर्य पर अभिमान नहीं करेगा। जो कोई व्यक्ति आज यानी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन तुम्हारे दर्शन करेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा। इसीलिए भाद्रपद माह की शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन नहीं किया जाता। भगवान श्रीकृष्ण पर लगा था चोरी का आरोप :सत्राजित् नाम के एक यदुवंशी ने सूर्य भगवान को तप से प्रसन्न कर स्यमंतक नाम की मणि प्राप्त की थी। वह मणि प्रतिदिन स्वर्ण प्रदान करती थी। उसके प्रभाव से पूरे राष्ट्र में रोग, अनावृष्टि यानी बरसात न होना, सर्प, अग्नि, चोर आदि का डर नहीं रहता था। एक दिन सत्राजित् राजा उग्रसेेन के दरबार में आया। वहां श्रीकृष्ण भी उपस्थित थे। श्रीकृष्ण ने सोचा कि कितना अच्छा होता यह मणि अगर राजा उग्रसेन के पास होती। किसी तरह यह बात सत्राजित् को मालूम पड़ गई। इसलिए उसने मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। एक दिन प्रसेन जंगल गया। वहां सिंह ने उसे मार डाला। जब वह वापस नहीं लौटा तो लोगों ने यह आशंका उठाई कि श्रीकृष्ण उस मणि को चाहते थे। इसलिए सत्राजित् को मारकर उन्होंने ही वह मणि ले ली होगी। लेकिन मणि सिंह के मुंह में रह गई। जाम्बवान ने शेर को मारकर मणि ले ली। जब श्रीकृष्ण को यह मालूम पड़ा कि उन पर झूठा आरोप लग रहा है तो वे सच्चाई की तलाश में जंगल गए। वे जाम्बवान की गुफा तक पहुंचे और जाम्बवान से मणि लेने के लिए उसके साथ 21 दिनों तक घोर संग्राम किया। अंतत: जाम्बवान समझ गया कि श्रीकृष्ण तो उनके प्रभु हैं। त्रेता युग में श्रीराम के रूप में वे उनके स्वामी थे। जाम्बवान ने तब खुशी-खुशी वह मणि श्रीकृष्ण को लौटा दी तथा अपनी पुत्री जाम्बवंती का विवाह श्रीकृष्ण से करवा दिया।  श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित् को सौंप दी। सत्राजित् ने भी खुश होकर अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। ऐसा माना जाता है कि इस प्रसंग को सुनने-सुनाने से भाद्रपद मास की चतुर्थी को भूल से चंद्र-दर्शन होने का दोष नहीं लगता । चंद्र दर्शन होने पर करना चाहिए इस मन्त्र का जाप : यदि गणेश चतुर्थी को चंद्र दर्शन हो जाएं तो इस मंत्र का जाप करना चाहिए- सिंह: प्रसेन मण्वधीत्सिंहो जाम्बवता हत:।सुकुमार मा रोदीस्तव ह्येष: स्यमन्तक:।।

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कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक

कहते है की इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल इंसानो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है।  हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े।  ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा। भगवान गणेश का जन्म की कहानी :देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं।  देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे। यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा। तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ। कश्यप ऋषि ने दिया था शिव जी को शाप :ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया। यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था। इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि  मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं। तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे। अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा। यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए।

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शंख से नहीं चढ़ाते शिवलिंग पर जल, जानिए क्यों ?

हम सब जानते है की पूजन कार्य में शंख का उपयोग महत्वपूर्ण होता है। लगभग सभी देवी-देवताओं को शंख से जल चढ़ाया जाता है लेकिन शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना वर्जित माना गया है। आखिर क्यों शिवजी को शंख से जल अर्पित नहीं करते है ? इस संबंध में शिवपुराण में एक कथा बताई गई है। शिवपुराण की कथा शिवपुराण के अनुसार शंखचूड नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ। शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तब उसने भगवान विष्णु के लिए कठिन तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए। विष्णुजी ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने तीनों लोको के लिए अजेय एक महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा। श्रीहरि तथास्तु बोलकर अंतध्र्यान हो गए। तब दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम शंखचूड़ पड़ा। शंखचुड ने पुष्कर में ब्रह्माजी के निमित्त घोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा तब शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने तथास्तु बोला और उसे श्रीकृष्णकवच दिया। साथ ही ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। फिर वे अंतध्र्यान हो गए। ब्रह्मा की आज्ञा से तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए। परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु ने ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। इसके बाद शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। अब शिव ने शंखचूड़ को अपने त्रिशुल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड़ विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है।

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पौराणिक कहानी – शिव पूजा में क्यों काम में नहीं लेते केतकी के फूल (केवड़े के पुष्प)

हिन्दू धर्म में देवी – देवताओं के पूजन में सुगन्धित फूलो का बड़ा महत्व है, हम सभी देवी – देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पूजन में सुगंधित पुष्प काम में लेते है। पर क्या आपको पता है कि शिवजी कि पूजा में केतकी (केतकी संस्कृत का शब्द है हिंदी में इसे केवड़ा कहते है) के फूल का प्रयोग वर्जित है।  आखिर ऐसा क्यों है? इसके बारे में हमारे धर्म ग्रंथो में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है :-एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट ज्योतिर्मय लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सर्वानुमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा, उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा।अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग का छोर ढूढंने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्माजी भी सफल नहीं हुए, परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। केतकी के पुष्प ने भी ब्रह्माजी के इस झूठ में उनका साथ दिया।  ब्रह्माजी के असत्य कहने पर स्वयं भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की आलोचना की।दोनों देवताओं ने महादेव की स्तुति की, तब शिवजी बोले कि मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूँ। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है। शिव ने केतकी पुष्प को झूठा साक्ष्य देने के लिए दंडित करते हुए कहा कि यह फूल मेरी पूजा में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इसीलिए शिव के पूजन में कभी केतकी का पुष्प नहीं चढ़ाया जाता।

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