आखिर कहां-कहां जाता है व्यक्ति का पाप, पढ़ें यह पौराणिक कथा

 आज की पौराणिक कथा का सार है कि आखिर पाप कहां-कहां जाता है। इसी संदर्भ में एक बार एक ऋषि ने सोचा की लोग पाप धोने के लिए सभी लोग गंगा जाते हैं। ऐसे में सारे पार गंगा में ही समा जाते हैं। आज की पौराणिक कथा का सार है कि आखिर पाप कहां-कहां जाता है। इसी संदर्भ में एक बार एक ऋषि ने सोचा की लोग पाप धोने के लिए सभी लोग गंगा जाते हैं। ऐसे में सारे पार गंगा में ही समा जाते हैं। इस तरह तो गंगा भी पापी हो जाएगी। उस ऋषि ने यह जानने के लिए आखिर पाप जाता कहां है, तपस्या की। तपस्या करने के फलस्वरूप देवगण प्रकट हुए। तब ऋषि ने उनसे पूछा कि गंगा में जो पापा धोया जाता है वह कहां जाता है। तब भगवान ने कहा कि चलो गंगा जी से ही पूछते हैं इस बारे में। ऋषि और भगवान दोनों ने ही गंगा जी से पूछा कि हे गंगे! सब लोग तुम्हारे यहां पाप धोते हैं तो इसका मतलब क्या आप भी पापी हुईं? तब गंगा ने कहा कि मैं कैसे पापी हो गई। मैं तो सभी पाप लेकर समुद्र को अर्पित कर देती हूं। इसके बाद ऋषि और भगवान समुद्र के पास गए और उनसे पूछा कि हे सागर! गंगा सभी पाप आपको अर्पित कर देती है तो क्या ऐप आप पापी हो गए? तब समुद्र ने कहा कि वो कैसे पापी हुआ। वो सभी सभी पाप को भाप बनाकर बादल बना देता है। अब ऋषि और भगवान दोनों ही बाद के पास गए। उनसे पूछा कि हे बादल! समुद्र पापों को भाप बनाकर बादल बना देते हैं तो क्या आप पापी हुए? बादलों ने कहा, मैं कैसे पापी हुआ। मैं तो सभी पाप को वापस पानी बना देता हूं और धरती पर गिरा देता हूं। इससे ही अन्न उपजता है। इसे ही मानव खाता है। उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है उसी के आधार पर मानव की मानसिकता बनती है।यही कारण है कि कहा जाता है कि ‘जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन।’ जिस वृत्ति से अन्न प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसा ही विचार मानव का बन जाता है। ऐसे में हमेशआ भोजन शांत रहकर ही ग्रहण करना चाहिए। अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए। 

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आपके घर में भी उग गया है पीपल का पेड़ तो करें ये उपाय, दूर होगी आर्थिक संकट

हिन्दू धर्म में पीपल के वृक्ष को बहुत ही पूजनीय स्थान प्राप्त है. ऐसा माना जाता है कि पीपल के पेड़ पर सभी देवी-देवताओं का वास होता है. पीपल के पेड़ को सभी अन्य पेड़ों में श्रेष्ठ बताया गया है. ज्योतिष शास्त्र में भी पीपल के वृक्ष का बहुत महत्व है. भगवान कृष ने गीता के उपदेश में अपने आप को वृक्षों में पीपल का वृक्ष बताया है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी पीपल का वृक्ष हमारे पर्यावरण के लिए बहुत उपयोगी बताया जाता है. इन्ही सभी मान्यताओं के कारण पीपल के पेड़ की हिन्दू धर्म में पूजा होती है और इसे काटा नहीं जाता है. भोपाल के रहने वाले ज्योतिषी एवं पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा बता रहे हैं यदि आपके घर में भी पीपल का पेड़ उग जाए तो क्या करें. घर में भी पीपल का पेड़ उगने पर करें ये उपाय -वैसे तो पीपल का पेड़ बहुत शुभ होता है, लेकिन इसका घर में उगना अशुभ माना गया है. यदि यह आपके घर में उग गया है तो पीपल के पेड़ को थोड़ा बड़ा होने दें. इसके बाद इसे मिट्टी सहित खोदकर किसी दूसरी जगह पर लगा सकते हैं. ऐसा करने से ये पेड़ नष्ट नहीं होगा और दूसरी जगह यह अच्छी तरह से बड़ा भी हो जाएगा. वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में पीपल का पेड़ नहीं होना चाहिए. यदि पीपल का पेड़ बार-बार एक ही जगह पर उग रहा है तो आप 45 दिन तक पीपल के उस पौधे की पूजा करें और उस पर कच्चा दूध चढ़ाते रहें. इसके बाद पीपल के पौधे को जड़ सहित उखाड़ कर किसी दूसरे स्थान पर लगा सकते हैं. -ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, घर में पीपल के पेड़ होना या पीपल के पेड़ की छाया पड़ना अशुभ होता है. इससे घर परिवार के सदस्यों की तरक्की में बाधा आती है और घर पर आर्थिक संकट आ सकता है. ऐसे में यदि आपके घर में भी पीपल का पेड़ उग गया है तो रविवार के दिन आप पीपल के पेड़ की पूजा करके उसे कटवा सकते हैं.-यदि किसी व्यक्ति के घर में पूर्व दिशा की तरफ पीपल का पेड़ लगा हो तो ऐसा होने से घर में डर और निर्धनता आती है. इसके लिए आप पीपल के पेड़ की विधि विधान से पूजा करवा कर उसे कटवा सकते हैं. अगर पीपल का छोटा पौधा है तो आप उसे एक गमले में लगाकर किसी मंदिर में रख दें.

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मां कालरात्रि की पूजा विधि, मंत्र, आरती, प्रिय भोग और महत्व, जानें नवरात्रि सातवें दिन की जरूरी बातें

आज शारदीय नवरात्रि का सातवां दिन है. आज मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं. मां कालरात्रि का स्वरूप बहुत ही विकराल और डरावना है. उनका वर्ण काला है. वह शत्रुओं में भय पैदा कर देने वाली देवी हैं. शत्रुओं का काल हैं. इस वजह से उनको कालरात्रि कहा जाता है. काशी के ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट बताते हैं कि मां दुर्गा ने रक्तबीज के वध के समय कालरात्रि का स्वरूप धारण किया था. गर्दभ पर सवार, खुले केश वाली, हाथों में कटार और व्रज धारण करने वाली मां कालरात्रि की पूजा करने से भय दूर होता है, संकटों से रक्षा होती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है. शुभफल प्रदान करने के कारण इनका एक नाम शुभंकरी भी है. इस देवी की आराधना से अकाल मृत्यु का डर भी भाग जाता है, रोग और दोष भी दूर होते हैं. यहां जानते हैं मां कालरात्रि की पूजा विधि, मंत्र, भोग आदि के बारे में. मां कालरात्रि पूजा का मंत्रज्वाला कराल अति उग्रम शेषा सुर सूदनम।त्रिशूलम पातु नो भीते भद्रकाली नमोस्तुते।। या ओम देवी कालरात्र्यै नमः। मां कालरात्रि का प्रिय फूल और रंगइस देवी को लाल रंग प्रिय है. इसलिए इनकी पूजा में लाल गुलाब या लाल गुड़हल का फूल अर्पित करना चाहिए. हालांकि इनको रातरानी का फूल भी चढ़ाना शुभ होता है. मां कालरात्रि का प्रिय भोगनवरात्रि के सातवे दिन की पूजा में माता कालरात्रि को आप गुड़ का भोग लगाएं. इससे देवी कालरात्रि प्रसन्न होती है. मां कालरात्रि की पूजा का महत्व1. मां कालरात्रि भयानक ​दिखती हैं लेकिन वे शुभ फल देने वाली हैं.2. मां कालरात्रि से काल भी भयभीत होता है. ये देवी अपने भक्तों को भय ये मुक्ति और अकाल मृत्यु से भी रक्षा करती हैं.3. शत्रुओं के दमन के लिए भी इस देवी की पूजा की जाती है. मां कालरात्रि की पूजा विधिआज प्रात:स्नान के बाद व्रत और मां कालरात्रि के पूजन का संकल्प लें. उसके बाद मां कालरात्रि को जल, फूल, अक्षत्, धूप, दीप, गंध, फल, कुमकुम, सिंदूर आदि अर्पित करते हुए पूजन करें. इस दौरान मां कालरात्रि के मंत्र का उच्चारण करते रहें. उसके बाद मां को गुड़ का भोग लगाएं. फिर दुर्गा चालीसा, मां कालरात्रि की कथा आदि का पाठ करें. फिर पूजा का समापन मां कालरात्रि की आरती से करें. पूजा के बाद क्षमा प्रार्थना करें और जो भी मनोकामना हो, उसे मातारानी से कह दें. मां कालरात्रि की आरतीकालरात्रि जय-जय-महाकाली।काल के मुह से बचाने वाली॥ दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा।महाचंडी तेरा अवतार॥ पृथ्वी और आकाश पे सारा।महाकाली है तेरा पसारा॥ कालरात्रि जय… खडग खप्पर रखने वाली।दुष्टों का लहू चखने वाली॥ कलकत्ता स्थान तुम्हारा।सब जगह देखूं तेरा नजारा॥ कालरात्रि जय… सभी देवता सब नर-नारी।गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥ रक्तदंता और अन्नपूर्णा।कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥ कालरात्रि जय… ना कोई चिंता रहे बीमारी।ना कोई गम ना संकट भारी॥ उस पर कभी कष्ट ना आवें।महाकाली माँ जिसे बचाबे॥ कालरात्रि जय… तू भी भक्त प्रेम से कह।कालरात्रि माँ तेरी जय॥ कालरात्रि जय-जय-महाकाली।कालरात्रि जय-जय-महाकाली।

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आखिर कैसे एक जनजातीय नायक श्रीकृष्ण हमारे परमपिता परमेश्वर बन गए?

कृष्ण की कहानी ईसापूर्व छठी शताब्दी में एक जनजाति विशेष के नायक के तौर पर शुरू होती है और ईसवी की पांचवीं सदी आते-आते विष्णु के अवतार के रूप में पूरी हो जाती हैहिंदू धर्मग्रंथों में जितने भी देवी-देवताओं का जिक्र मिलता है, उनमें श्रीकृष्ण सबसे लोकप्रिय हैं – ग्वालों के बालगोपाल, प्रेम के देवता, धर्मोपदेशक और एक अजेय योद्धा. उनकी पूरी कहानी, जिसे कृष्णगाथा भी कह सकते हैं, कई बिलकुल अलग-अलग तरह के तत्वों को बडी सुंदरता से जोड़ने पर बनी है. यह करीब 800-900 साल के लंबे अंतराल में विकसित हुई. दिलचस्प बात यह है कि इस गाथा का विकास उल्टे क्रम में हुआ है. इसमें पहले पांडवों के मित्र और द्वारका के संस्थापक के रूप में युवा कृष्ण सामने आते हैं फिर गायें चराने वाले बाल कृष्ण और ग्वालिनों के साथ रास रचाने वाले प्रेम के प्रतीक कृष्ण का वर्णन आता है. वासुदेव और कृष्ण ब्रिटेन में लैंकैस्टर विश्वविद्यालय के धार्मिक अध्ययन विभाग में मानद शोधकर्ता रहीं फ्रीडा मैशे ने एक किताब लिखी है – ‘कृष्ण, ईश्वर या अवतार? कृष्ण और विष्णु के बीच संबंध’. इसमें वे लिखती हैं कि कृष्ण-वासुदेव, पहले यादव समुदाय की सत्वत्त और वृष्णि जनजातियों के नायक हुआ करते थे. इन्हें समय के साथ-साथ देवता मान लिया गया. फिर दोनों एक हो गए. कृष्ण का सबसे पहला जिक्र छठी शताब्दी ईसापूर्व में ‘छंदोग्य उपनिषद’ में मिलता है. इसमें उन्हें एक साधु और उपदेशक बताया गया है. साथ ही इसमें उनका देवकीपुत्र के रूप में भी उल्लेख है. चौथी शताब्दी ईसापूर्व में पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ (संस्कृत व्याकरण का ग्रंथ) में कृष्ण को एक देव की तरह प्रस्तुत किया गया है. साथ ही इसमें वृष्णिवंशी यादव जनजाति के बारे में भी विस्तार से बताया गया है, जिससे कृष्ण जुड़े हुए थे. मौर्य राजदरबार में यूनान (ग्रीस) के दूत रहे मेगस्थनीज की किताब ‘इंडिका’ में बताया गया है कि किस तरह शूरसेनियों (वृष्णिवंशी यादवों की ही एक शाखा) ने मथुरा में कृष्ण को देवता की तरह पूजना शुरू किया. इस तरह चौथी शताब्दी ईसापूर्व में कृष्ण-वासुदेव न सिर्फ नायक से देवता के रूप में परिवर्तित हुए, बल्कि काफी लोकप्रिय भी हो चुके थे. विष्णु रूप कृष्ण दूसरी शताब्दी ईसापूर्व तक वैदिक पूजा पद्धति कठोर हो चुकी थी और उसके धार्मिक संस्कार महंगे. इसी दौरान सम्राट अशोक के समर्थन और प्रचार कार्य की वजह से बौद्ध दर्शन अपना आधार बढ़ाता जा रहा था. इसी बीच, बड़े पैमाने पर विदेशी आक्रमणकारियों (जैसे शक आदि) का भारत में आगमन शुरू हो गया. वे बौद्ध दर्शन आदि से ज्यादा सहानुभूति रखते थे. ऐसे में, पुरोहित वर्ग के अधिकार और असर में कमी आने लगी. निचले वर्णों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर हुई और उन्होंने वर्ण व्यवस्था को चुनौती देना शुरू कर दिया. और जैसा कि सुवीरा जायसवाल अपनी किताब ‘वैष्णववाद की उत्पत्ति और विकास’ में लिखती हैं – ‘ब्राह्मणों ने कृष्ण-वासुदेव के भक्ति-पंथ पर कब्जा कर लिया. वे कृष्ण को नारायण-विष्णु का स्वरूप बताने लगे. इसके पीछे उनका मकसद संभवत: सामाजिक आचार-व्यवहार में अपना अधिकार और प्रभुत्व एक बार फिर से स्थापित करना था.’ यहां जिक्र करना दिलचस्प होगा कि नारायण और विष्णु भी पहले अलग देवों की तरह पूजे जाते थे. बाद में दोनों को एक ही मान लिया गया.यानी इस काल में कृष्ण-वासुदेव का नारायण-विष्णु के साथ घालमेल हो गया. उन्हें महाभारत के युद्ध के नायक का दर्जा मिला. साथ ही भगवद् गीता का उपदेश देने वाले उपदेशक के रूप में भी मान्यता मिली. हालांकि महाभारत में ही तमाम जगहों पर इस असमंजस या दुविधा का भी जिक्र मिलता है कि किसी अनार्य जनजातीय देव (कृष्ण) को परमेश्वर का दर्जा कैसे दिया जाए. इसीलिए शुरू-शुरू में कृष्ण-वासुदेव का विवरण नारायण-विष्णु के अंशावतार के रूप में ही दिया जाता है. बाल कृष्ण इस तरह, पहली शताब्दी ईसापूर्व तक कृष्ण की पूजा सिर्फ उनके युवा स्वरूप में ही होती थी. वे पांडवों के मित्र, एक उपदेशक, वृष्णिवंशी यादवों के नायक और विष्णु के अंशावतार माने जा चुके थे. लेकिन उनकी महागाथा में एक सबसे अहम चीज अब भी नदारद थी – उनका बचपन. जबकि आज उनके बारे में सबसे ज्यादा जिक्र उनके बचपन का ही होता है. कालांतर में जब कृष्ण को अभीर (अहीर) जनजाति के देव का दर्जा मिला तो यह कमी भी पूरी हो गई. कृष्ण के साथ गोपाल (गाय चराने और पालने वाले) का मेल भी हो गया. हालांकि यह अब तक साफ नहीं है कि अभीर जनजाति भारतीय उपमहाद्वीप की ही मूल निवासी थी या किसी और जगह से आकर यहां बसी थी. लेकिन इतना साफ है कि पहली सदी ईसवी में यह जनजाति सिंधु घाटी के निचले इलाकों में निवास करती थी और बाद में पलायन कर सौराष्ट्र (अब गुजरात) में जा बसी. शक और सातवाहन के शासनकाल में यह जनजाति राजनीतिक रूप से भी सक्रिय हुई. वृष्णिवंशी यादवों और अभीरों में काफी समानताएं थीं. खासकर दोनों समाजों में महिलाओं को किस तरह देखा जाता था. संभवत: इन्हीं समानताओं की वजह से वृष्णिवंशियों के कृष्ण-वासुदेव को अभीरों का आराध्य भी मान लिया गया. उदाहरण के लिए दो प्रसंग सामने रखे जा सकते हैं. पहला, महाभारत में अर्जुन को कृष्ण अपनी बहन का हरण कर लेने की सलाह देते हैं. इसके पक्ष में वे यह दलील देते हैं कि इस तरह धर्म की रक्षा होगी. यह शायद इस बात का संकेत भी है कि महिलाओं का हरण करना वृष्णिवंशियों में एक सामान्य परंपरा रही होगी. दूसरा, कृष्ण के श्रीधाम सिधारने के बाद जब अर्जुन अपनी छत्रछाया में वृष्णिवंशी महिलाओं को लेकर मथुरा की ओर जाते हैं, तो उन पर अभीरों का हमला हो जाता है और हमलावर उनके काफिले में शामिल कई महिलाओं का अपहरण कर लेते हैं.बहरहाल, कृष्ण-वासुदेव को अभीरों के देव की मान्यता मिलते ही गोपियों के साथ उनके हास-परिहास-रास की कहानियां और प्रसंग भी सामने आने लगते हैं. चूंकि अभीर खानाबदोश किस्म की जनजाति थी, इसलिए उनकी संस्कृति में महिलाओं-पुरुषों के लिए ज्यादा उन्मुक्तता का माहौल था. अभीरों में उन्मुक्तता की यही संस्कृति कृष्ण की रासलीलाओं का आधार भी बनी. परमपिता परमेश्वर श्रीकृष्ण हम जानते हैं कि कृष्ण की कहानी में कृष्ण-गोपाल का सम्मिश्रण बाद में हुआ. क्योंकि महाभारत की मूल कहानी में कहीं भी कृष्ण के बचपन का जिक्र नहीं मिलता.

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भैरवी साधना के लाभ क्या हैं?

भैरवी साधना एक तीव्र प्रक्रिया है, जिससे लिंग भैरवी देवी की कृपा पाने के लिये जरूरी ग्रहणशीलता बढ़ती है। स्त्री, पुरुष, दोनों ही इसे कर सकते हैं। यहां इस साधना का महत्व बताते हुए, सदगुरु इस साधना से मिलने वाले फायदे भी बता रहे हैं।सदगुरु : आज के तथाकथित आधुनिक समाजों में समय समय पर की जाने वाली साधना को लोग समझ नहीं रहे हैं, जानते ही नहीं हैं – लोग साधना को भूलते जा रहे हैं। आजकल सिर्फ अनपढ़ लोग और गाँवों में रहने वाले लोग ही ऐसी साधना करते हैं। जब लोग पढ़ लिख जाते हैं तो कोई सही काम नहीं करते। आधुनिक शिक्षण लोगों को इधर उधर बिखेरने वाला बना रहा है। ये लोग समूहों में आने से कतराते हैं। उन्हें लगता है कि वे बाकी सब से बेहतर हैं। पर, हर चीज़ के बारे में वे उलझन में होते हैं। जिस बात को अनपढ़ किसान जानते, समझते हैं, ये पढ़े लिखे लोग नहीं जानते पर फिर भी मानते हैं कि वे श्रेष्ठ हैं, सभी लोगों से बेहतर हैं। वे निश्चित तौर पर कहीं गहरे स्तर की उलझन में हैं। साधना एक ऐसा साधन है जो आपको जीवन की लहरों पर सवार होने के काबिल बनाता है। कुछ समय के लिये की जाने वाली साधना का महत्व यही है कि आपके जीवन को आसान बनाने के लिये आपके तंत्र में जैविक बुद्धिमानी को लाया जाये, बढ़ाया जाये। आपको ऐसी कल्पना करने की ज़रूरत नहीं है कि ये सृष्टि कोई समस्या है जिसे आपको सुलझाना है। सृष्टि में कोई समस्या नहीं है। ये एक जबर्दस्त अद्भुत घटना है। आप चाहें तो इस पर सवारी कर सकते हैं या इसके नीचे कुचले जा सकते हैं। चुनना आपको है। अगर आप इस पर सवारी कर लेते हैं तो ये ऐसी अद्भुत घटना है जो किसी की भी कल्पना में न आ सके। अगर आप इसके नीचे कुचले जाते हैं तो ये एक भयानक चीज़ है। 1. साधना – जीवन की लहरों पर सवार होने का तरीका सीखना जीवन की लहरों पर सवार होने का तरीका सीखना ही साधना है। साधना शब्द का शाब्दिक मतलब है कोई साधन या उपकरण। ये एक ऐसा साधन है जो आपको जीवन की लहरों पर सवार होने के काबिल बनाता है। कुछ दिनों पहले, मैं एक अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर था जहाँ एक युवा स्त्री हॉल के अंदर, आने जाने के रास्ते पर बैठी थी, किसी कुर्सी पर नहीं बल्कि अपने बैग पर। हजारों लोग अपनी ट्रॉलियां ले कर इधर उधर आ जा रहे थे, कोई हवाई जहाज पकड़ने के लिये दौड़ रहा था, कोई उतर कर बाहर जा रहा था – पर उसे इन सब से कोई परेशानी नहीं थी, वो अशांत नहीं हो रही थी बल्कि एक छोटा शीशा और बाल तोड़ने की एक छोटी चिमटी ले कर बैठी थी और अपनी भौंहों के फालतू बाल बड़ी कुशलता से निकाल रही थी। मुझे लगा कि उसका फोकस बहुत ऊँचे स्तर का था। छोटा सा वो साधन महत्वपूर्ण था जिसे वो हवाईअड्डे की भीड़भाड़ वाली जगह पर, बीचोबीच बैठी, बड़ी कुशलता से इस्तेमाल कर रही थी जहाँ हज़ारों लोग उसके चारों ओर, इधर उधर आ जा रहे थे। एकदम छोटे में छोटे उपकरण से लेकर बड़े से बड़े उपकरण के इस्तेमाल करने में फोकस और पूरी तरह से शामिल होना ही वो दो बातें हैं जो उपकरण को असरदार बनाती हैं। हाँ, साधन की डिज़ाइन महत्वपूर्ण है, पर फिर भी, जब इतने सारे लोग आपके आसपास घूम रहें हो तो उस छोटी सी चिमटी को आप अपनी आँखों में भी घोंप सकते हैं – यानि आपके शामिल होने का स्तर बहुत अहम हो जाता है। सवाल बस यही है कि यह सब आपके लिये कितना अहम है! आपकी भौंहें नहीं, आपकी आध्यात्मिक प्रक्रिया। अगर आप कोई तीसरी आँख बढ़ा लें, तो ठीक करने के लिये एक और चीज़ होगी। पर, वास्तविकता में, आध्यात्मिक प्रक्रिया से भौंह नहीं आती, सिर्फ आँख आती है। 2. भैरवी साधना से महत्तम फायदा कैसे उठायें साधना की प्रक्रिया को इस तरह बनाया गया है कि कम से कम प्रयास में ज्यादा से ज्यादा परिणाम मिलें। साधना भौहों के बाल तोड़ने की छोटी सी चिमटी की तरह है – अगर आप इसे बहुत ध्यान दे कर, सावधानी से और पूरी तरह शामिल हो कर इस्तेमाल करेंगे तो ये अच्छी तरह काम करेगा, नहीं तो आप अपनी आँखें भी फोड़ सकते हैं। ये उस तरह के परिणाम के लिये नहीं बनाया गया है। इसे बहुत ध्यान दे कर सावधानी से और पूरी तरह शामिल हो कर काम करने के लिये बनाया गया है जिससे आपको सही परिणाम मिलें। उपकरण/ साधन महत्वपूर्ण है पर आप उसको किस तरह इस्तेमाल करते हैं वो ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर मैं आपको किसी चीज़ को सही ढंग से फिट करने को कहूँ और आप पेंचकस का गलत सिरा उस पर लगायें तो शायद आप खुद को ही नुकसान पहुँचायेंगे। भैरवी साधना बहुत सरल है। हम इसे ज्यादा जटिल बना सकते थे पर अगर हम इसे बहुत पेंचीदा और जटिल बना दें तो बहुत से लोग ये नहीं समझेंगे कि ये सब क्या है! पर, आप इसकी सरलता से गफलत में मत आ जाईये। अगर आप खुद को इसमें पूरी तरह से झोंक दें तो आप जिनकी कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसे परिणाम आपको मिलेंगे। यही सब जीवन के साथ भी होता है क्योंकि हमें जीवन को बनाना नहीं है, ये तो पहले से ही है। हमें इसे बस ऐसा कर देना है कि ये सबसे ऊँचे स्तर पर, सही ढंग से, कुशलता से काम करे। अगर आपको जीवन बनाना होता तो ये एक अलग तरह की चुनौती होती। पर सब कुछ यहाँ है। आपको इसे सही स्थिति में रखना है, बस यही करना है। और, ये तो साधना करने से ही होगा। 3. भैरवी साधना का महत्व इस साधना की संरचना इरादतन इस तरह से की गयी है कि इसका कुछ भाग आपको पसंद आयेगा और कुछ नापसंद होगा। जो भाग आपको झुका, थका या तोड़ नहीं देगा उसमें तो आप आराम से रहेंगे पर जो आपको पसंद नहीं है, वो ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। आपको जो पसंद है उसे अगर आप 100% शामिल हो

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कृष्ण लीला – कृष्ण भगवान की सम्पूर्ण जीवन गाथा

श्री कृष्ण लीला अध्यात्म की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। कृष्ण को लोग बिलकुल अलग अलग रूपों में देखते थे। आइये पढ़ते हैं कृष्ण की कहानियाँ और जानते हैं कि दुर्योधन, शकुनी और शिखंडी जैसे लोग उनके बारे में क्या कहते थे। साथ ही जानते हैं उनकी कुछ लीलाएं। कृष्ण इतने बहुआयामी हैं, कि उनके आस-पास रहने वाले लोगों ने उन्हें बिलकुल अलग-अलग रूप में देखा था। आइये जानते हैं कि दुर्योधन, शकुनी और शिखंडी जैसे लोग उनके बारे में क्या कहते थे। साथ ही जानते हैं उनकी कुछ लीलाएं कृष्ण एक बहुत नटखट बच्चे हैं। वे एक बांसुरी वादक हैं और बहुत अच्छा नाचते भी हैं। वे अपने दुश्मनों के लिए भयंकर योद्धा हैं। कृष्ण एक ऐसे अवतार हैं जिनसे प्रेम करने वाले हर घर में मौजूद हैं। वे एक चतुर राजनेता और महायोगी भी हैं। वो एक सज्जन पुरुष हैं, और ऐसे अवतार हैं जो जीवन के हर रंग को अपने भीतर समाए हुए हैं। जानते हैं उनके आस-पास के लोग उन्हें किस रूप में देखते थे। 1. कृष्ण के बारे में दुर्योधन, शकुनी और अन्य की राय दुर्योधन कृष्ण को अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग तरीकों से देखा और अनुभव किया है। इसे समझने के लिए दुर्योधन का उदाहरण लेते हैं। वह अपनी पूरी जिंदगी एक खास तरह की स्थितियों से घिरा रहा। इतिहास उसे एक ऐसे शख़्स की तरह देखता है, जो बहुत ही गुस्सैल, लालची और असुरक्षित था। वह हमेशा सब से ईर्ष्या करता रहा और सबका बुरा चाहता रहा। अपनी ईर्ष्या और लालच में उसने जो भी काम किये, वे उसके और उसके कुल के विनाश की वजह बन गए। ऐसा दुर्योधन कृष्ण के बारे में कहता है – “कृष्ण एक बहुत ही आवारा और मूढ़ व्यक्ति है, जिसके चेहरे पर हमेशा एक शरारती मुस्कान रहती है। वह खा सकता है, पी सकता है, गा सकता है, प्रेम कर सकता है, झगड़ा कर सकता है, बड़े उम्र की महिलाओं के साथ वह गप्पें मार सकता है, और छोटे बच्चों के साथ खेल भी सकता है। ऐसे में कौन कहता है कि वह ईश्वर है?” शकुनी महाभारत का ही एक और चरित्र है – शकुनि। शकुनि को कपट और धोखेबाजी का प्रतीक माना जाता है। वह कहता है – “अगर हम मान लें कि वह भगवान है तो इससे क्या फर्क पढ़ता है। आखिर भगवान कर क्या सकता है? भगवान बस अपने उन भक्तों को खुश कर सकता है, जो उसकी पूजा करते हैं और उसे प्रसन्न रखते हैं। होने दो उसे भगवान, लेकिन मैं तो उसे बिलकुल पसंद नहीं करता। जब आप किसी को बिलकुल पसंद नहीं करते, तब भी आपको उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।” राधा कृष्ण की बचपन की सखी और प्रेमिका राधे उनको बिलकुल अलग तरीके से देखती थी। राधा कौन थी? एक साधारण सी गांव की लड़की, जो दूध का काम करती थी। लेकिन राधा के नाम के बिना कृष्ण का नाम अधूरा माना जाता है, क्योंकि कृष्ण के प्रति उनमें अत्यंत श्रद्धा और प्रेम था। हम कृष्ण-राधे कभी नहीं कहते हैं; हम कहते हैं राधे-कृष्ण। एक साधारण सी गांव की लड़की इतनी महत्वपूर्ण हो गयी, जितने कि स्वयं कृष्ण।और कहीं-कहीं तो वे कृष्ण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है। कृष्ण के बारे में राधा कहती है – “कृष्ण मेरे भीतर हैं। मैं कहीं भी रहूँ, वे हमेशा मेरे साथ हैं। वे किसीके भी साथ रहें, तो भी वे मेरे साथ हैं।” गरुड़ के पुत्र वेन्तेय गोमांतक पर्वत पर रहने वाले गरूड़ के पुत्र थे – वेन्तेय। वे किसी बीमारी की वजह से पूरी तरह अपंग हो गए थे। जब वे कृष्ण से मिले तो उनकी बीमारी पूरी तरह ठीक हो गयी, और वे अपने दम पर चलने लगे। वे कहते हैं – “मेरे लिए तो कृष्ण भगवान हैं।” कृष्ण के चाचा अक्रूर कृष्ण के चाचा अक्रूर एक बुद्धिमान और सज्जन पुरुष थे। उन्होंने कृष्ण के बारे में अपनी सोच को इस तरह बताया है – “इस युवा बालक को देखकर मुझे लगता है मानो सूर्य, चन्द्र, तारे सब कुछ उसके चारों तरफ चक्कर काट रहे हों। जब वो बोलता है तो ऐसा लगता है, मानो कोई शाश्वत और अविनाशी आवाज़ सुनाई दे रही हो। अगर इस संसार में आशा नाम की कोई चीज़ है, तो वह स्वयं कृष्ण ही है। “ शिखंडी शिखंडी के बारे में तो हम सभी जानते हैं कि उसकी स्थितियां कुछ अलग तरह की थीं। बचपन से ही उन्हें काफी सताया गया था। उनकी सुनिए – “वैसे तो कृष्ण ने मुझे उम्मीद की कोई किरण नहीं दिखाई है। लेकिन वह जहां भी होते हैं, आशा की एक लहर चलती है जो सबको छूती है। और सबका जीवन बदल देती है।” 2.श्री कृष्ण की बचपन की कहानी कृष्ण जन्म वसुदेव ने अपने आठवें पुत्र को नंद और यशोदा की पुत्री के स्थान पर रख दिया और उस नन्ही बच्ची को लेकर वापस आ गए। जब कंस वहाँ पहुंचा तो वसुदेव और देवकी ने उसे कहा इसे छोड़ दो ये तो लड़की है। पर कंस नहीं माना उर उसने उस बच्ची को जमीन पर पटकना चाहा। पर वो बच्ची जमीन पर नहीं गिरी उसने एक अलग ही रूप धारण कर लिया… कृष्ण का बाल्यकाल कृष्ण माखन चुराया करते थे, और माखन ही गोप गोपियों की आजीविका थी। ऐसे में वे कृष्ण की माँ से शिकायत करतीं थीं। पर कृष्ण मासूम बनकर उन्हें फिर से मना लेते थे। कृष्ण की मधुर मुस्कान कृष्ण के सांवले होने पर भी हर कोई उनपर मुग्ध था। ऐसा इसलिए था क्योंकि वे हर समय मुस्कुराते रहते थे। कृष्ण ने उठाया गोवेर्धन पर्वत गोकुल के लोगों में इन्द्रोत्सव मनाने की परंपरा थी। पर कृष्ण के कहने पर उन्होंने गोपोत्सव मनाने का फैसला किया। उसी समय गोकुल में भारी वर्षा हुई और यमुना का स्तर इतना बढ़ गया कि सब कुछ डूबने लगा। ऐसे में कृष्ण सभी को गोवेर्धन पर्वत की गुफाओं तक ले गए। तभी अचानक एक च्चम्त्कार हुआ और पर्वत जमीन से ऊपर उठ गया। 3.कृष्ण – एक गुरु के रूप में भक्ति योग का महत्व श्रीमद भगवद गीता के बारहवे अध्याय में कृष्ण से अर्जुन ने चैतन्य के निराकार और साकार स्वरुप के अंतर के बारे में पूछा था।

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शिव का रहस्य

महाशिवपुराण जैसे अनेक ग्रंथ जहाँ हमें शिव सागर की गहराइयों में ले जाते हैं। वहीं भगवान शिव के अनगिनत रहस्यों से परिचित कराते है़। आज भगवान शिव के रहस्यों से आपको हम परिचित करायेंगे। पशुपति नाथ की अदभुत लीला को जानकर हर कोई भगवान महाकाल के चरणों में नतमस्तक हो जाता है़। क्योंकि तीनों लोकों के स्वामी भगवान गंगा धर वास्तव में बहुत महिमामयी हैं। जिनकी महिमा आज तक कोई जान न पाया। महादेव के त्रिशूल के वार से जहाँ दानव थर-थर काँपते थे। वहीं उनका तांडव नृत्य प्रलयंकारी है़ और उनके तीसरे नेत्र का खुलना तो पूरी सृष्टि के लिए विनाशकारी है़। अपना डमरू बजाकर सबको मंत्र मुग्ध करने वाले भोले बाबा आज भी  कैलाश पर्वत पर धूनी रमाये तपस्या में लीन हैं। कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के अवतरण की कथा यह शाश्वत सत्य है़ कि जो जन्म नहीं लेता उसकी मृत्यु भी नहीं होती। त्रिनेत्रधारी भगवान शिव एक ऐसे ही भगवान हैं, जो अनादिकाल से अस्तित्व में हैं और अनंतकाल तक रहेंगे। यदि शिव इस धरती पर नहीं आते तो पृथ्वी पर बड़ी उथल-पुथल हो जाती। ब्रम्हा जी और विष्णु जी के सृष्टि निर्माण की सारी योजना विफल हो जाती। भगवान शिव को धरती पर लाने के पीछे क्या उद्देश्य था ? हम उसकी चर्चा करेंगे। आखिर परम पिता परमेश्वर को भगवान शिव के रूप में प्रकट करने के पीछे ब्रम्हा जी और विष्णु भगवान की क्या मंशा थी। यह बड़ी रोचक कथा है़। भगवान शिव कब और कैसे इस धरती पर प्रकट हुये, यह पौराणिक घटना हर किसी को आश्चर्य चकित करने वाली है़। हिन्दू धर्म के तीन प्रमुख देवताओं में ब्रह्मा, विष्णु और महेश अर्थात भगवान शिव का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। जिसमें ब्रह्मा जी को सृजक, विष्णु जी को रक्षक और भगवान शिव को संहारक कहा जाता है। कहा जाता है कि इस सृष्टि की रचना से भी पहले सर्वप्रथम परमेश्वर विष्णु जी के रूप में प्रकट हुए फिर उनके नाभिकमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। योजना के अनुसार भगवान ब्रह्मा जी सृजन करते रहे और विष्णु जी संरक्षण प्रदान करते रहे। लेकिन एक दिन ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने विचार किया कि यदि इसी तरह हम दोनों सृष्टि के लिए सृजन और रक्षा का कार्य करते रहे और बीच-बीच में विनाश नहीं हुआ तो यह जगत (ब्रह्माण्ड) असंतुलित हो जायेगा। इस ब्रह्माण्ड का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए उन्हें अब ऐसे देव की आवश्यकता थी जो विनाशकारी देवता हों। तब ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु ने आपस मे मंत्रणा की और योजना के अनुसार कैलाश पर्वत पर जाकर परमपिता परमेश्वर की तपस्या में लीन हो गये। कैलाश पर्वत पर जाकर ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु ने प्रणव यानी ॐ मंत्र का जाप करना आरंभ कर दिया। वह मंत्र पूरे कैलाश पर्वत पर गूंजने लगा। ॐ मंत्र के प्रभाव से कैलाश पर्वत पर एक इन्द्रधनुषी रंग बिखर गया। जिसकी आभा बड़ी दिव्य थी। पढ़िए कथा आदि शंकराचार्य जी की कैलाश पर्वत पर ध्यान मुद्रा में बैठकर ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने लगभग 21 वर्षों तक ओम का उच्चारण किया। देखते ही देखते आसमान में घटायें  घिरने लगीं। बिजली कड़कने लगी। आकाशीय बिजली की आवाज इतनी तेज थी कि कैलाश पर्वत की जीव- जंतु वहाँ से भाग निकले। चारों तरफ एक भयभीत कर देने वाला वातावरण उत्पन्न हो गया था। अब तक जो  वहाँ इन्द्रधनुषी रंग बिखरा हुआ था। वह  गायब हो चुका था। उसका स्थान नील वर्ण ने ले लिया था। अब आकाश का नीला रंग था जिसमें एक चमकदार रौशनी छिटकी हुई थी। अब कैलाश पर्वत पर कोई नहीं था। केवल ब्रह्मा जी और विष्णु जी आश्चर्य से आकाश की तरफ देख रहे थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आज क्या होने वाला है। तभी आसमान में एक विशालकाय आकृति ने अपना रूप लेना आरंभ कर दिया। इस विशालकाय आकृति के केश इतने बड़े थे कि नभ में चारों तरफ अंधेरा छा गया, क्योंकि परमपिता परमेश्वर, देवों के देव महादेव के रूप में, ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के सामने प्रकट हो चुके थे। ब्रम्हा जी और भगवान विष्णु के मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु की अपेक्षा के अनुकूल भगवान शिव की उत्पत्ति हो चुकी थी। लेकिन भगवान शिव के केशों के कारण चारों ओर अंधकार था। तब भगवान विष्णु ने चंद्रदेव को आदेश दिया कि भगवान शिव के मस्तक पर धारण हों जायें। चंद्रदेव भगवान विष्णु का आदेश पाकर शिव के मस्तक पर धारण हो गये, जिससे चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश हो गया। यह प्रकाश था एक अभूतपूर्व शक्ति का जिसकी सृष्टि के लिए नितांत आवश्यकता थी। इस प्रकार भगवान शिव की उत्पत्ति ॐ से हुई। देवी सती क्यों चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो ? देवी सती दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं। वह बहुत सुंदर और बुद्धिमान थीं। एक दिन उन्हें स्वप्न में कैलाश पर्वत दिखाई दिया। उस कैलाश पर्वत पर भगवान शिव विराजमान थे। उनका भव्य स्वरूप देखकर देवी सती उन पर मोहित हो गईं और उन्हें ही अपना स्वामी बनाने की बात सोंची। एक दिन देवी सती ने इस बात जिक्र अपने पिता दक्ष से किया। लेकिन उनके पिता को भगवान शंकर का फक्कड़ स्वरूप पसंद नहीं था। लेकिन सती न मानी। क्योंकि वह मन ही मन भगवान शिव को अपना वर मान चुकीं थीं। इसलिए देवी सती ने भगवान शिव की आराधना आरंभ कर दी। जब उनके पिता दक्ष प्रजापति को इस बात की जानकारी मिली तो वह अत्यंत क्रोधित हुये। उन्होंने अपनी बेटी सती को बहुत समझाने का प्रयास किया । लेकिन सती टस से मस न हुईं। वे रात- दिन भगवान शिव की तपस्या में लीन रहने लगीं। एक दिन जब सती भगवान शिव की पूजा में तल्लीन थीं। तब उनके पिता दक्ष प्रजापति ने सोंचा कि आज वह स्वयं उनकी तपस्या भंग कर देंगे। यह सोच कर वह उस स्थान पर पहुँचे जहाँ सती आराधना कर रहीं थीं। लेकिन उस स्थान पर पहुँच कर राजा दक्ष प्रजापति ने जो कुछ देखा तो आश्चर्य चकित रह गये। उन्होंने देखा कि उनकी बेटी सती जिस स्थान पर भगवान शिव के ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप

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सपने में मंदिर देखना

हमारी नींद में सपने क्यों आते हैं? सपनों के आने का वास्तविक कारण क्या है़ ? क्या उन सपनों का हमारे पूर्व जन्म या वर्तमान जन्म से कोई जुड़ाव होता है? नींद में दिखने वाले स्वप्न कितने सच होते हैं और कितने झूठ? हमारे जीवन से स्वप्नों का क्या संबंध है? कोई स्वप्न हमें क्या बताना चाहता हैं? ऐसे ही स्वप्न से जुड़े हुए तमाम प्रश्न हमारे मन-मस्तिष्क में उत्पन्न होते रहते हैं। जब हम नींद में दिखने वाले इन विभिन्न स्वप्नों के रहस्य को जानेंगे तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे। क्योंकि नींद में दिखने वाले यह स्वप्न कभी-कभी सुख और समृद्धि का द्वार खोलते हैं तो कभी हमें ये आने वाली मुसीबतों का संकेत भी देते हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है़ कि उन सपनों का हमारे जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता है। सपने में मंदिर देखना कितना शुभ है और कितना अशुभ, आज हम इस बात की विस्तार से चर्चा करेंगे। सीता जी के आँसू गिरे थे जहाँ श्री राम से बिछड़ के जब हम आपसे यह प्रश्न करेंगे कि यह स्वप्न हमें कब आते हैं? तो निश्चित रूप से आपका जवाब होगा कि स्वप्न हमें तब आते हैं जब हम नींद में होते हैं। लेकिन आपका यह उत्तर शत प्रतिशत  सत्य नहीं है। वास्तव में सपने हमें उस अवस्था में दिखाई देते हैं जब हम न सो रहे होते हैं और न ही जाग रहे होते हैं। मंदिर का सपना देखने से क्या होता है यह एक विशेष प्रकार की मानसिक अवस्था होती है जो सोने और जागने के बीच की होती है। आध्यात्म की भाषा में इसे तुरीय अवस्था कहते हैं। जहाँ तक स्वप्न में मंदिर देखने का प्रश्न है़ तो हम लोग अपने स्वप्न में तरह-तरह के मंदिर को देखा करते हैं। मंदिर का सपना देखने से हमारे जीवन में अच्छा परिणाम भी उपस्थित हो सकता है और बुरा परिणाम भी। ये इस पर निर्भर करता है कि हम सपने में किस प्रकार का मंदिर देखते हैं, अर्थात वो उजड़ा हुआ है या भव्य सजा हुआ है। सपने में हमने जिस मंदिर को देखा है वो अपने देवता या भगवान के साथ है या बिना देवता का मंदिर है, इस बात पर भी, मंदिर का सपना देखने का फल निर्भर करता है। इन सब के अतिरिक्त सपने में अलग-अलग देवता के मंदिर देखने के अलग-अलग फल होते हैं इसीलिए प्रत्येक मंदिरों के स्वप्न विचार की पृथक-पृथक चर्चा करेंगे। सपने में देवी देवता देखने से क्या होता है आम तौर पर लोग मानते हैं कि सपने में देवी देवता देखने से हमेशा अच्छा फल ही मिलता होगा किन्तु ऐसा नहीं है। कभ-कभी तो देवी देवता सपने में हमें संकेत देने आते हैं। कभी-कभी ये संकेत हमारे कर्मों से सम्बंधित होते है जिनमे वे हमारे बुरे कर्मों के प्रति सावधान कर रहे होते हैं और कभी-कभी ये संकेत हमारे उन प्रारब्ध से सम्बंधित होते है जिन्हे टाला नहीं जा सकता। सपने में देवी देवता कभी-कभी हमें किसी जटिल समस्या का समाधान बताने भी आ जाते हैं जिन्हे हम सामान्य जीवन में नहीं सुलझा सकते। ये समाधान अक्सर एक पहेली के रूप में होते हैं जिन्हे सपने से जागने पर हम अकस्मात् ही सुलझा लेते हैं। लेकिन कई बार सपने में सुलझाई गयी उस जटिल समस्या का समाधान बिलकुल स्पष्ट होता है। स्वप्न में देवी मंदिर देखना यदि आप अपने स्वप्न में किसी देवी मंदिर को देखते हैं तो यह स्वप्न इस बात को बताता है कि आपका, नारी जाति के प्रति अपार श्रद्धा एवं सम्मान है। साथ ही स्वप्न में देवी मंदिर देखना यह संकेत देता है़ कि निकट भविष्य में आपके जीवन में किसी स्त्री विशेष से आपको लाभकारी सहयोग मिलने वाला है। स्वप्न में देवी मंदिर का दिखना, देवी माँ द्वारा आपकी मनोकामना पूर्ण करने का भी संकेत देता है। स्वप्न में देवी मंदिर देखने के बाद आपको किसी शुक्रवार के दिन माँ दुर्गा देवी के मंदिर में जाकर उनको फूल-माला, लाल चुनरी, नारियल और मिष्ठान आदि अपनी श्रध्दा के अनुसार चढ़ाना चाहिए। साथ ही अपने सामर्थ्य के अनुसार 5 या 7 कन्याओं को भोजन कराना चाहिए। जिससे की भविष्य में भी देवी माँ की कृपा बनी रहे। स्वप्न में शिव मंदिर देखना यदि आप सपने में शिव मंदिर देखते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि आपके लिए सफलता का द्वार खुलने वाला है। भगवान शिव आप पर अपनी कृपा बरसाने वाले हैं। आपके करीयर या व्यवसाय संबंधी समस्या का निराकरण होने वाला है़। शिव मंदिर को स्वप्न में देखने के बाद आपको सोमवार के दिन शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल चढ़ाना चाहिए और शिवलिंग के सामने बैठकर पञ्चाक्षर मन्त्र ‘नमः शिवाय’ का जाप करना चाहिए। जिससे कि भगवान शंकर की कृपा जो आपको अभी तक नहीं मिल पाई है वह शीघ्र प्राप्त हो सके । उज्जैन का काल भैरव मंदिर, जिस मंदिर में प्रसाद के रूप में शराब बांटी जाती है स्वप्न में हनुमान मंदिर देखना स्वप्न में हनुमान मंदिर देखना इस बात का आभास कराता है कि अपने जीवन की विषम से विषम परिस्तिथियों का सामना करने के लिए आप मानसिक और शारीरिक रूप से बलवान हो चुके हैं। क्योंकि यह बल हनुमान जी ने आपको प्रदान कर दिया है। स्वप्न में हनुमान मंदिर देखने के बाद आप किसी मंगल या शनिवार के दिन हनुमान मंदिर जाकर बजरंगबली को बेसन के लड्डू चढ़ायें और पूरी श्रध्दा के साथ हनुमान चालीसा का पाठ करें। सपने में टूटा हुआ मंदिर देखना यदि आप स्वप्न में जीर्ण-क्षीर्ण स्थिति में पड़ा हुआ टूटा फूटा मंदिर देखते हैं तो यह आपके जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में आपके जीवन में कोई समस्या आने वाली है। ऐसी स्थिति में आप कहीं निर्माण हो रहे किसी मंदिर में अपनी क्षमता के अनुसार कुछ धनराशि के दान से, आने वाली समस्या से मुक्ति पा सकते हैं। बिना देवता वाला मंदिर देखना यदि आप अपने स्वप्न में एक ऐसा मंदिर देखते हैं जिसमें उस मंदिर के देवी या देवता की मूर्ति नहीं है। तो यह भी आपके भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। यह स्वप्न आपको इस बात का संकेत देता है कि आपके इष्ट देवता आपसे प्रसन्न नहीं है। आपके किसी कार्य से देवी या देवता रुष्ट हैं।

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पौराणिक रहस्य कथा

हमारे पौराणिक ग्रंथों को रचते समय विद्वान लेखकों ने ऐसे-ऐसे हैरतअंगेज रहस्यों का उल्लेख किया है़ कि जिसको जानने के बाद हर कोई आश्चर्य में पड़ जाता है़। तब सभी के मन में कौतूहल जन्म ले लेता है़ और हृदय में यही सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या ऐसा भी हो सकता है ? कहते हैं कि जब गोस्वामी तुलसीदास जी अपना ‘राम चरित मानस’ ग्रंथ लिखते- लिखते अरण्य कांड पर पहुँच गए थे। तब वह अरण्य कांड में सीता हरण वाले प्रसंग में पहुंचकर बड़े गंभीर सोच में पड़ गए। क्योंकि एक तरफ तो उन्हें अपना ग्रंथ पूरा करना था और दूसरी तरफ माता सीता की पवित्रता को गंगा की तरह निर्मल बनाये रखना था। अब वे अजीबोगरीब अनेक प्रकार के विचारों के जाल में उलझ गये। तब आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उस समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने विज्ञान का सहारा लिया। कहते हैं कि उन्होंने विज्ञान से जुड़ी हुईं तमाम पुस्तकों के पन्नों को पलट डाला। मानस मर्मज्ञ काव्या नंदन कहती हैं कि उन्होंने विज्ञान का विस्तार से अध्ययन ही नहीं किया बल्कि एक अनोखा शोध कार्य भी कर डाला। कहते हैं कि जिस रहस्य के बारे में लक्ष्मण जी को भी पता नहीं था, गोस्वामी तुलसी दास जी ने अपने ‘राम चरित मानस’ में विज्ञान के उस अनूठे रहस्य का सहारा लिया। निश्चय रूप से अरण्य कांड पढ़ते समय आपने यह दोहा अवश्य पढ़ा होगा कि लक्ष्मणहुँ यह मरम ना जाना । जा कुछ चरित रचा भगवाना ।। दरअसल गोस्वामी तुलसीदास जी इन दोनों पंक्तियों में रामचरितमानस के गूढ़ रहस्य को उजागर करना चाहते हैं। कहते हैं कि लक्ष्मण जी को भी उस रहस्य के बारे में जानकारी नहीं थी, जिस रहस्य की गाथा पहले ही विधाता लिख चुके थे। पुराणों में वर्णित है़ कि रामचरित मानस के अरण्य कांड में लंका पति रावण जब सीता जी का हरण करने आया तो उसकी यह पहली गलती नहीं थी बल्कि गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार यह उसका दूसरा दुस्साहस था। उसकी इस दूसरी गलती के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी लंकापति रावण की इस दुष्ट सोंच से छल पूर्वक निपटना चाहते थे, क्योंकि कहा जाता है़ कि इसी रावण ने एक बार ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की विद्वान पुत्री देवी वेदवती का भी शील भंग करने का प्रयास किया था, एवं उनके केशों को पकड़ कर घसीटा था। तब अपने अपमान से क्रोधित एवं दुखी होकर देवी वेदवती ने योगविद्या द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया था। कहते हैं कि स्वयं को अग्नि में समर्पित करते-करते वेदवती ने संकल्प ले लिया था कि वह एक न एक दिन इस दुष्ट रावण से उसके इस दुस्साहस का प्रतिशोध अवश्य लेगी। कहते हैं कि अपना मानव जीवन त्याग देने के पश्चात भी वेदवती जीवात्मा के रूप में अग्निदेव की शरण में रही, और लंकापति रावण से, अपने पति भगवान् विष्णु (वेदवती ने भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तप किया था एवं वे उन्हें मन ही मन अपना पति मान चुकी थी) द्वारा प्रतिशोध लेने के बाद ही मुक्ति प्राप्त की । लंकापति रावण जिस सीता जी को हरण करके ले गया वे सीता न होकर उनका क्लोन था गोस्वामी तुलसी दास जी के अनुसार अब वह समय आ चुका था जब रावण के बल को छल पूर्वक निपटा जाये। तब 14 वर्ष के वनवास के दौरान पंचवटी में सीताहरण के पूर्व अग्नि देव से प्रार्थना की गई वह लंकापति रावण को दण्ड देने के लिए सहायता करें। दरअसल अग्नि देव के पास अभी तक ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की पुत्री वेदवती की जीवात्मा समाहित थी। उस समय यह योजना बनायी गयी कि ब्रह्म ऋषि कुश ध्वज की पुत्री वेदवती की जीवात्मा को किसी तरह सीता जी के क्लोन में प्रविष्ट करा दिया जाये और असली सीता जी को कहीं छिपा दिया जाये। ताकि सीता जी 14 वर्ष के वनवास में सुरक्षित रह सकें और वनवास के पश्चात श्री राम के पास सकुशल पहुंचाया जा सके। पौराणिक रहस्य कथा, जिसे कम ही लोग जानते हैं कहते हैं कि तब ब्रह्मा जी ने सीता जी की उंगली से कोशिका लेकर सीता जी के सदृश्य ही एक पुतला तैयार कर दिया और योजना के अनुसार वेदवती की जीवात्मा को सीता जी के पुतले में प्रविष्ट करा दिया गया। इस प्रकार जब वन में पंचवटी कुटिया में श्री राम और श्री लक्ष्मण जी के जाने के बाद जो नारी अकेली आश्रम में रह गईं वह सीता जी न होकर उनकी क्लोन थी। क्योंकि असली सीता जी तो अग्नि देव के शरण में पहुंच गई थी । फिर विधाता को वेदवती द्वारा रावण से प्रतिशोध लेने के प्रण को पूरा जो कराना था। इसलिए उन्होंने रावण द्वारा सीता जी नहीं बल्कि उनके पुतले में स्थापित वेदवती की जीवात्मा का हरण करा दिया। उन वेदवती नामक देवी (जो स्वयं महामाया का ही अंश थीं) ने लंका पहुंचकर रावण के नाकों चने चबवा दिये। रावण क्यों भय खाता था सीता जी के पास जाने से  रामचरितमानस के कई प्रसंगों में सीता जी के क्लोन का रहस्य उजागर होता है। इस बात का तो पुराणों में स्पष्ट वर्णन भी किया गया है कि लंका पति रावण ने सीता जी को अपने महाद्वीप लंका में अशोक वाटिका में कैद करके रखा था । कहते हैं कि रावण जब भी सीता जी पर अत्याचार करने के लिए आगे कदम बढ़ाता था तो धरती में से एक अग्नि-ज्वार फूट पड़ता था, जिसमें भस्म हो जाने के भय से रावण वापस भाग जाता था । सीता जी के आस -पास अग्नि का पहरा होने का एक कारण यह भी बताया जाता है कि सीता जी के क्लोन मे रहने वाली देवी वेदवती की जीवात्मा के साथ सदैव अग्नि देव रहते थे। क्योंकि ब्रह्म ऋषि की पुत्री वेदवती, मृत्यु के पश्चात (जीवात्मा रूप में) उन्हीं अग्नि देव में समाहित थीं। कहते हैं कि एक बार दुष्ट रावण ने सीता जी को मार डालने का प्रयास किया । लेकिन उसी समय सीता जी के काया के अंदर उपस्थित विद्वान देवी वेदवती ने एक अमोघ महा मंत्र पढ़कर दुष्ट रावण की तरफ फेंका। जिसके कारण वह घास के तिनके के समान छिटक कर दूर जा गिरा। इसीलिए

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हनुमान जी की कथा-हनुमान

हनुमान जी की कथा-हनुमान वानरराज केसरी और अप्रतिम सुंदरी अंजना को शिव की कृपा से पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम अंजनेय था। अंजना को अपने पुत्र को छोड़कर वापस स्वर्ग जाना था। अंजनेय दुःखी थे। उन्होंने अपनी माँ से कहा, “माँ, तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूँगा? मैं क्या खाऊँगा?  अंजना ने प्यार से अपने पुत्र से कहा, “जब तुम्हें भूख लगेगी तब सूर्य की तरह लाल और पके फल तुम्हारा पोषण करेंगे।” अंजनेय ने सोचा, “सूर्य की तरह लाल और पका फल…? क्या सूर्य इतना पका फल है?” बालक अंजनेय ने सूर्य को खाने का सोचा। दैवीय बालक होने के कारण अंजनेय ने एक छलांग लगाई और सूर्य को पकड़ने के लिए उड़ने लगे।  सूर्य भगवान ने एक बंदर को अपनी ओर आता देखा। उसका आकार बढ़ता ही जा रहा था और सूर्य की तेज किरणों का उसपर कोई असर नहीं हो रहा था। सूर्य ने इन्द्र देव को सहायता के लिए पुकारा।  आसमान में अचानक काले बादल छा गए और सूर्य उसके पीछे छिप गए। इन्द्र अपने एरावत हाथी पर सवार होकर आए और उड़ते हुए बंदर से बोले, “ठहरो, कौन हो तुम? सूर्य को क्यों पकड़ना चाहते हो? अंजनेय ने कोई उत्तर नहीं दिया और अपना मुँह खोलकर सूर्य को निगल गए। संसार में अंधकार व्याप्त हो गया।  इन्द्र चिल्लाए, “नटखट बंदर, मैं तुम्हें सबक सिखाऊँगा।” यह कहकर उन्होंने अंजनेय के गाल पर वज्र प्रहार किया। सूर्य आज़ाद हो गए और अंजनेय का आकार छोटा होकर शरीर धरती पर गिर पड़ा। उनके गाल सूजकर दोगुने हो गए थे।  अंजनेय के अभिभावक, तथा जीवनदाता वायु देव ने छोटे बालक को अपने हाथों में उठाया और पाताल-लोक लेकर चले गए।  धरती वायुरहित हो गई। पशु-पक्षी- पौधे सबका दम घुटने लगा। सूर्य ने इन्द्रदेव से कहा, “हमें वायु देव से पृथ्वी पर आने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।” इन्द्र स्वयं पाताल लोक गए। वहाँ वायुदेव ने अंजनेय से उनका परिचय कराया। यह अंजना का पुत्र तथा शिव का अवतार… आपने इसे चोट कैसे पहुँचाई?”  क्षमाप्रार्थी इन्द्र ने कहा, “हे वायु देव, मेरी भूल की सजा पशु, मानव और पौधों को न दें। कृपया धरती पर वापस चलें।”  अपनी शक्ति से इन्द्र ने अंजनेय को ठीक कर दिया और आशीर्वाद देते हुए कहा, “तुम सदा जीवित रहोगे, तुम्हारी मृत्यु कभी नहीं होगी। मैंने तुम्हारे हनु (गाल) पर प्रहार किया था अतः अब से तुम साहसी हनुमान कहलाओगे।”  इस प्रकार अंजनेय हनुमान कहलाए। 

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भगवान शिव की कहानी-स्वयंभू और उनकी तीसरी आँख

भगवान शिव की कहानी-स्वयंभू और उनकी तीसरी आँख हिन्दू धर्म में तीन प्रमुख देव हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश, जो त्रिदेव के नाम से जाने जाते हैं। इन त्रिदेवों में ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और महेश अर्थात् शिव विनाश करते हैं।  हजारों वर्ष पूर्व की स्वर्ग की यह बात है… एक बार ब्रह्मा और विष्णु वार्ता में लीन थे तभी ब्रह्मा ने कहा, “हे विष्णु! सृष्टि का निर्माता होने के कारण मुझे यह सोचकर ही अच्छा लगता है कि मैं आपसे श्रेष्ठ हूँ।”  विष्णु भगवान ने इसे न माना और चुटकी लेते हुए कहा, “ब्रह्मदेव! निश्चय ही आपने सृष्टि की रचना करी है पर उसके पालन की भी तो आवश्यकता है और वह मेरा कार्य है… अतः निश्चित रूप से मेरा कार्य बड़ा और उत्तरदायित्वपूर्ण हुआ न…”  ब्रह्मा को कुतूहल हुआ। उन्होंने पूछा, “विष्णुदेव! आपका तात्पर्य क्या है?” मधुर मुस्कान के साथ विष्णु भगवान ने कहा, “यही कि मैं आपसे श्रेष्ठ ही नहीं श्रेष्ठतर  ब्रह्मा विष्णु से सहमत न हुए। दोनों अपनी-अपनी महत्ता और प्रभुता का बखान करते रहे। उत्तेजना बढ़ने लगी। तभी अचानक एक विशालकाय स्तम्भ उनके समक्ष प्रकट हुआ जिसे देखकर दोनों अवाक रह गए।  ब्रह्मा ने कहा, “अरे! यह क्या है? यह कहाँ से आ गया?” “क्या पता? मैंने भी इसे पहले नहीं देखा है…” आश्चर्यचकित विष्णु ने कहा।  ध्यान से स्तम्भ को निहारते हुए विष्णु ने पुनः कहा, “ब्रह्मदेव! आपने ध्यान दिया क्या… इस स्तम्भ के आदि  और अंत का तो पता ही नहीं चल रहा है…”  “अरे हाँ! आदि और अंत के बिना स्तम्भ?” ब्रह्मा सोच में पड़ गए।  सुझाव देते हुए विष्णु ने कहा, “ठीक है, चलिए ढूँढते हैं… मैं पक्षी का रूप धारण करता हूँ और आप जानवर का रूप धरे… दोनों मिलकर अन्वेषण करते हैं।” ऐसा निर्णय कर विष्णु ने हंस का रूप धरा और स्तम्भ की ऊँचाई ढूँढने उड़ चले। ब्रह्मा ने वराह (सूअर) का रूप धरा और स्तम्भ की जड़ पृथ्वी खोदकर ढूँढने लगे। कई वर्ष व्यतीत हो गए पर उन्हें स्तम्भ की थाह न मिली। असफल होकर दोनों वापस लौट आए।  विष्णु भगवान ने कहा, “ब्रह्मदेव! कितनी आश्चर्यजनक बात है… यह स्तम्भ मीलों तक ऊपर गया हुआ है… मुझे तो इसका छोर नहीं मिला, क्या आप सफल हुए?”  “विष्णुदेव, यहाँ भी वही हाल है। यह तो कोई रहस्यमय स्तम्भ लगता है जिसके मूल का कोई पता ही नहीं है…” ब्रह्मदेव ने स्वीकारा।  ब्रह्मा और विष्णु वार्ता में लीन थे तभी उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से शिव भगवान को स्तम्भ से प्रकट होते देखा। दोनों अचंभित थे… यह स्तम्भ उनकी समझ से परे था। शिव भगवान को देखकर दोनों ने उनके ब्रह्माण्डीय विराट शक्ति का लोहा माना जो कि उन दोनों की शक्ति से कहीं अधिक थी।  संस्कृत में शिव भगवान को स्वयंभू कहा गया है जिसका अर्थ है ‘स्वयं प्रकट हुआ’।  इस प्रकार प्रकट हुए शिव जी के तीन नेत्र हैं, गले में सर्प लिपटा हुआ है, वे जटाधारी हैं जिस पर अर्धचंद्राकार चाँद शोभता है और वहीं से गंगा नदी का उद्गम है। वल्कल के रूप में बाघ की खाल पहन रखा है और सम्पूर्ण शरीर पर राख का लेप लगा रहता है।  सृष्टि की बुराइयों का अंत करने के कारण शिव को ‘विनाशक’कहा गया है। इन्हीं के द्धारा युगों का अंत होता है। शिव नटराज के रूप में ताण्डव करते हैं, उनके तृतीय नेत्र से निकली हुई अग्नि सृष्टि की बुराइयों का नाश कर देती है और फिर एक नए युग का प्रारम्भ होता है। 

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गंगा जन्म की कहानी

गंगा नदी के धरती पर अवतरण, उनके अस्तित्व और शिव जी के संबंध में कई कथाएँ हैं। उनमें से प्रसिद्ध कथा यह बताती है कि गंगा नदी का उद्गम देवी पार्वती के पसीने से हुआ था।  पिछली कथा में हमने पढ़ा कि किस प्रकार देवी पार्वती ने अपने हाथों से शिव भगवान की आँखें बंद कर दी थीं जिससे संसार में अंधकार छा गया था और शिव भगवान ने अपने तृतीय नेत्र से जग उजागर कर दिया था।  जब देवी पार्वती ने अचानक तृतीय नेत्र एवं उसके प्रकाश को देखा तो वह भयभीत हो उठीं। उन्होंने झट से शिवजी की आँखों से अपने हाथ हटा लिए। ताप और घबराहट के कारण उनके हाथों से पसीने की बूंदें निकलकर नीचे गिरने लगी और गंगा नदी में बदल गईं। आगे चलकर नदी की कई शाखाएँ हो गईं और सारी पृथ्वी जलमग्न होने लगी। यह देखकर ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र घबराए हुए शिव भगवान के पास गए और प्रार्थना करने लगे, “हे महादेव! यह धरती पर क्या हो रहा है? नदी तो सारी सृष्टि को जलमग्न कर रही है… इसे कैसे रोका जाए?”  देवों को सांत्वना देकर शिव भगवान ने पूरी नदी को सोखकर अपनी जटा में रख लिया। अब जल के अभाव में तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। फलतः सभी देव पुनः शिव भगवान से जाकर प्रार्थना करने लगे, “हे महादेव! सम्पूर्ण नदी आपकी जटाओं में समाहित है… तीनों लोकों के लिए जल की तो आवश्यकता है… कृपया जल देने की अनुकंपा करें…”  शिव भगवान ने कहा, “एवमस्तु!”  तत्पश्चात् उन्होंने गंगा के एक भाग को मुक्त किया। इस प्रकार वैकुण्ठ में गंगा विरजा नदी के रूप में, सत्यलोक में मानस तीर्थ तथा इन्द्रलोक में देवगंगा के रूप में आईं। गंगा नदी के धरती पर अवतरण तथा शिव भगवान ने कैसे उन्हें अपनी जटाओं में संभाला इस बारे में एक अन्य कथा भी है। भागवत पुराण की यह कथा गंगा को वामन अवतार से जोड़ती है। उसके अनुसार धरती मापते समय वामन के पैर का नाखून धरती में घुस गया और वहीं से गंगा नदी का उद्गम हुआ। तीनों लोकों से होती हुई गंगा बह्मलोक पहुँचीं। बाद में राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को मुक्ति दिलाने राजा भगीरथ गंगा को ब्रह्मलोक से शिवजी की जटाओं से होते हुए पृथ्वी पर लाए।

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