आज का पंचांग

आज शुक्रवार को पौष माह की पूर्णिमा तिथि है। आज पूर्णिमा का व्रत भी रहेगा। पूर्णिमा तिथि अगले दिन 7 जनवरी 2023 को सुबह 4.37 बजे तक रहेगी। आज पूरे दिन आर्द्रा और पुनर्वसु नक्षत्र रहेंगे। पंचांग के अनुसार सूर्योदय सुबह 7.17 बजे एवं सूर्यास्त सायं 5.48 बजे होगा। चन्द्रोदय 5.11 बजे होगा तथा चन्द्रास्त नहीं होगा। शुभ-अशुभ मुहूर्त एवं राहुकाल (Aaj ka Rahukaal) आज दुष्ट मुहूर्त सुबह 9.19 बजे से 10.01 बजे तक एवं दोपहर 12.47 बजे से 1.29 बजे तक रहेगा। कुलिक योग सुबह 9.19 बजे से 10.01 बजे तक एवं कंटक योग दोपहर 1.29 बजे से 2.10 बजे तक रहेगा। कालवेला/ अर्द्धयाम का समय दोपहर 2.52 बजे से 3.34 बजे तक रहेगा। यमघण्ट योग दोपहर 4.15 बजे से 4.57 बजे तक एवं यमगंड योग दोपहर 3.02 बजे से 4.20 बजे तक रहेगा। आज राहुकाल सुबह 11.08 बजे से दोपहर 12.26 बजे तक रहेगा। इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य करने से बचें। शुक्रवार, 06 जनवरी 2023  तिथि पूर्णिमा नक्षत्र आर्द्रा करण विष्टि पक्ष शुक्ल पक्ष योग इंद्र till 08:54:59 AM, 07 जनवरी दिन शुक्रवार सूर्य एवं चन्द्र गणना सूर्योदयसूर्यास्त 07:05:49 AM05:40:04 PM चंद्र उदयचन्द्रास्त 05:03:15 PM06:39:02 AM चंद्र राशि मिथुन ऋतु हेमंत हिन्दू मास एवं वर्ष शक संवत् 1944 विक्रम संवत् 2079 माह-अमान्ता पौष माह-पुर्निमान्ता पौष अशुभ मुहूर्त राहु कालं 11:03:39 AM to 12:22:56 PM यंमघन्त कालं 03:01:30 PM to 04:20:47 PM गुलिकालं 08:25:005 AM to 09:44:22 AM शुभ मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त 12:01:00 PM to 12:43:00 PM

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आज का पंचांग रविवार, 25 दिसम्बर 2022 

आज का पंचांग यानि दैनिक पंचांग अंग्रेंजी में Daily Panchang भी कह सकते हैं। दिन की शुरुआत अच्छी हो, जो काम हम आज करने वाले हैं उसमें हमें सफलता मिले। घर से लेकर दफ्तर तक, पर्सनल से लेकर प्रोफेशनल लाइफ में आज हम जो निर्णय लेने वाले हैं उनके परिणाम हमें सकारात्मक मिलें इसके लिये जरुरी है कि वह कार्य शुभ समय, शुभ मुहूर्त में शुरु किये जायें। महत्व पूर्ण निर्णय लेने के समय ग्रह, नक्षत्र एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हमारे लिये कर रहे हों। इसी की जानकारी हमें आज का पंचांग से मिलती है। रविवार, 25 दिसम्बर 2022  तिथि शुक्ल तृतीया नक्षत्र उत्तराषाढ़ा करण तैतिल पक्ष शुक्ल पक्ष योग व्याघात till 12:58:24 AM, 26 दिसम्बर दिन रविवार सूर्य एवं चन्द्र गणना सूर्योदयसूर्यास्त 07:02:07 AM05:32:18 PM चंद्र उदयचन्द्रास्त 09:01:06 AM07:41:29 PM चंद्र राशि मकर ऋतु हेमंत हिन्दू मास एवं वर्ष शक संवत् 1944 विक्रम संवत् 2079 माह-अमान्ता पौष माह-पुर्निमान्ता पौष अशुभ मुहूर्त राहु कालं 04:13:31 PM to 05:32:18 PM यंमघन्त कालं 12:17:12 PM to 01:35:58 PM गुलिकालं 02:54:45 PM to 04:13:31 PM शुभ मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त 11:56:00 AM to 12:38:00 PM पौष शुक्ल पक्ष द्वितीया, राक्षस संवत्सर विक्रम संवत 2079, शक संवत 1944 (शुभकृत् संवत्सर), पौष | द्वितीया तिथि 08:24 AM तक उपरांत तृतीया तिथि 04:51 AM तक उपरांत चतुर्थी | नक्षत्र उत्तराषाढ़ा 07:21 PM तक उपरांत श्रवण | व्याघात योग 12:58 AM तक, उसके बाद हर्षण योग | करण कौलव 08:24 AM तक, बाद तैतिल 06:36 PM तक, बाद गर 04:51 AM तक, बाद वणिज |

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घर के दरवाजे पर लटका दीजिए ये छोटी सी चीज, आर्थिक तंगी हो जाएगी दूर

आर्थिक परेशानी और नकारात्मकता को घर से दूर करने के लिए ज्योतिष और वास्तु में कई उपायों के बारे में बताया गया है। ज्योतषशास्त्र के नियम घर पर सुख-समृद्धि व संपन्नता के लिए बहुत ही कारगर माने जाते हैं। ज्योतिष में भी ऐसी छोटी-छोटी चीजों से जुड़े उपायों के बारे में बताया गया है जिसे करने के बाद आप बड़ी से बड़ी समस्या से मुक्ति पा सकते हैं। इसी तरह घोड़े की नाल को कर्ज मुक्ति और आर्थिक तंगी से छुटकारा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। यदि तमाम कोशिशों के बाद भी आप कर्ज से मुक्त नहीं हो पाते या नौकरी व्यापार में खूब तरक्की के बाद भी घर पर आर्थिक समस्या बनी रहती है तो इसके लिए घोड़े की नाल को लाभकारी माना गया है। जानते हैं पैसों से जुड़ी समस्या से मुक्ति के लिए कैसे करें घोड़े की नाल का इस्तेमाल। घोड़े के नाल के उपाय और लाभ घोड़े के नाल को लोग मुख्य द्वार पर टांगते हैं। इससे हर समस्या से मुक्ति मिलती है और घर पर नकारात्मक शक्तियों से बचाव होता है। जिस घर पर हमेशा ही पैसों की तंगी बनी रहती है, वहां घर के दरवाजे पर घोड़े की नाल लटकाना चाहिए। इससे घर पर बरकत बनी रहती है। घोड़े की नाल को काले रंग के कपड़े में लपेटकर यदि आप तिजोरी या धन रखने वाले स्थान पर रखते हैं तो इससे धन का अभाव दूर होता है और तिजोरी कभी खाली नहीं रहती है। घोड़े की नाल शनि के प्रकोप से भी बचाती है। जो लोग शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से परेशान होते हैं उन्हें काले घोड़े की नाल का छल्ला (अंगूठी) दाएं हाथ की मध्यमा उंगली में पहनना चाहिए। घोड़े की नाल का महत्व घोड़े की नाल मजबूत लोहे की होती है, जिसका कार्य होता है घोड़े के पैरों की सुरक्षा करना। वास्तु में माना जाता है कि जिस तरह घोड़े की नाल से घोड़े के पैरों की सुरक्षा होती है।

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द‍िवाली की व्रत कथा, दीपावली की पौराणिक कहानी-कार्तिक मास की अमावस्या को क्यों होता है पर्व?

भारत देश में रोशनी का पर्व दीपावली का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं। इसे खुशियों का त्योहार माना जाता है। शास्त्र के अनुसार इसी दिन भगवान श्री राम 14 वर्ष का वनवास काट कर अयोध्या लौटे थे। दीपावली के दिन सभी घरों में मां लक्ष्मी और भगवान श्री गणेश की पूजा अर्चना श्रद्धा पूर्वक की जाती हैं। हिन्दू धर्म में मां लक्ष्मी को धन और वैभव की देवी के रूप में पूजा जाता हैं। ऐसी मान्यता है कि मां लक्ष्मी की सच्चे मन से दीपावली के दिन पूजा करने से जीवन में धन का अभाव कभी नहीं होता।  हिन्दू शास्त्र के अनुसार इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करने आती है। लोग मुख्य द्वार पर तरह-तरह की रंगोली बनाकर मां लक्ष्मी का स्वागत करते हैं। भारत में यह त्योहार हर साल कार्तिक माह की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। यहां जानें दीपावली हर साल कार्तिक माह की अमावस्या तिथि को ही क्यों मनाई जाती है।  एक बार की बात है एक जंगल में एक साहूकार रहता था। उसकी बेटी प्रतिदिन पीपल पर जल चढ़ाया करती थी। जिस पीपल के पेड़ पर वह जल चढ़ाया करती थी उस पर पर मां लक्ष्मी निवास करती थी। एक दिन मां लक्ष्मी ने साहूकार की बेटी से कहा मैं तुम्हारी मित्र बनना चाहती हूं। यह सुनकर साहूकार की बेटी ने कहा मैं अपने पिता से पूछकर आपको बताऊंगी।  बाद में साहूकार की बेटी अपने पिता के पास गई और अपने पिता से सारी बात कह डाली। दूसरे दिन साहूकार की बेटी है मां लक्ष्मी से दोस्ती करने के लिए हां कर दी। दोनों अच्छे मित्र भी बन गए। दोनों एक दूसरे के साथ खूब बातचीत करने लगे। एक दिन मां लक्ष्मी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गई। मां लक्ष्मी ने साहूकार की बेटी का खूब स्वागत किया। उन्होंने उसे अनेकों तरह का भोजन खिलाया। जब साहूकार की बेटी मां लक्ष्मी के घर से वापस लौटी तो, मां लक्ष्मी ने उससे एक प्रश्न पूछा कि अब तुम मुझे कब अपने घर ले जाओगी। यह सुनकर साहूकार की बेटी ने मां लक्ष्मी को अपने घर आने को तो कह दिया लेकिन अपने घर की आर्थिक स्थिति को देखकर वह उदास हो गई। उसे डर लगने लगा कि क्या वह अपने दोस्त का अच्छे से स्वागत कर पाएगी। यह सोचकर वह मन ही मन दुखी हो गई। सहूकार अपनी बेटी के उदास चेहरे को देखकर समझ गया। तब उसने अपनी बेटी को समझाया कि तुम फौरन मिट्टी से चौका बनाकर साफ सफाई करो। चार बत्ती के मुख वाला दिया जलाकर मां लक्ष्मी का नाम लेकर वहां उनका स्मरण करों। पिता की यह बात सुनकर  उसने वैसा ही किया। उसी समय एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर उड़ रहा था। अचानक वह हार सहूकार की बेटी के सामने गिर गया। तब साहूकार की बेटी ने जल्दी से वह हार बेचकर भोजन की तैयारी की। थोड़ी देर बाद भगवान श्री गणेश के साथ मां लक्ष्मी साहूकार की बेटी के घर आई। साहूकार की बेटी ने दोनों की खूब सेवा की। उसकी सेवा को देखकर मां लक्ष्मी बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने उसकी सारी पीड़ा को दूर कर दिया। इस तरह से साहूकार और उसकी बेटी अमीरों की तरह जीवन व्यतीत करने लगी।

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दिवाली से पहले शनि देव इन 3 राशि वालों की चमका सकते हैं किस्मत, धनलाभ के साथ तरक्की के प्रबल योग

ज्योतिष शास्त्र अनुसार हर ग्रह एक निश्चित समय अवधि पर राशि परिवर्तन करता है। साथ ही ग्रह समय- समय पर वक्री और मार्गी भी होते हैं। आपको बता दें कि शनि देव दिवाली से पहले मतलब 23 अक्टूबर को मार्गी होने जा रहे हैं। मार्गी होने का मतलब है कि वह अपनी सीधी चाल चलेंगे।  जिसका प्रभाव सभी राशियों पर पड़ेगा, लेकिन 3 राशियां ऐसीं हैं, जिनको शनि का मार्गी होना लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। आइए जानते हैं ये 3 राशियां कौन सीं हैं। मेष शनि देव का मार्गी होना आप लोगों को लाभप्रद साबित हो सकता है। क्योंकि शनि ग्रह आपकी गोचर कुंडली से दशम भाव में मार्गी होने जा रहे हैं, जिसे बिजनेस और नौकरी का भाव माना जाता है। इसलिए इस दौरान आपको व्यापार में अच्छा लाभ होने की संभावना है। साथ ही अगर आप स्टॉक मार्केट, सट्टा और लॉटरी में निवेश करना चाहते हैं तो कर सकते हैं। साथ ही दौरान आपको नई जॉब का ऑफर आ सकता है या फिर आपका प्रमोशन और इंक्रीमेंट भी हो सकता है। वहीं व्यापार में आपको इस दौरान अच्छा मुनाफा होने योग हैं। इस दौरान आपकी काम करने की शैली में भी निखार देखने को मिलेगा। आप ऑफिस में टारगेट को अचीव कर सकते हैं। जिससे कार्यस्थल पर आपकी तारीफ हो सकती है। मीन राशि:  शनि देव के दिवाली से मार्गी होने से आपको जबरदस्त धनलाभ हो सकता है। क्योंकि आपकी राशि से शनि ग्रह 11वें स्थान में मार्गी होंगे। जिसे आय और लाभ का स्थान माना गया है। इसलिए इस दौरान आपकी इनकम में अच्छी बढ़ोतरी होने की संभावना है। साथ ही इस समय इनकम के नए- नए माध्यम से आप धन कमाने में कामयाब रहेंगे। वहीं इस समय आपके नए व्यापारिक संबंध बन सकते हैं। इस दौरान आप व्यापार में नई डील फाइनल कर सकते हैं। जिससे आपको भविष्य में विशेष लाभ होने के आसार हैं। साथ ही इस दौरान नए ऑर्डर आने से कारोबार में धनलाभ अच्छा होगा। वहीं शेयर बाजार, सट्टा या लॉटरी में इस समय आपको अच्छा धनलाभ हो सकता है। वहीं अगर आपका कारोबार शराब, पेट्रोल, खनिज और लोहा से संबंधित है तो आपको अच्छा धनलाभ हो सकता है। धनु राशि: शनि देव के मार्गी होने से आप लोगों के अच्छे दिन शुरू हो सकते हैं। क्योंकि शनि देव आपकी गोचर कुंडली से दूसरे भाव में मार्गी होंंगे। जिसे ज्योतिष में धन और वाणी का स्थान माना गया है। इसलिए इस दौरान आपको आकस्मिक धनलाभ हो सकता है। साथ ही आपको इस दौरान अटका हुआ धन भी प्राप्त हो सकता है। बिजनेस में अच्छा धनलाभ होने की संभावना है। इस समय आपकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। वहीं जिन लोगों का कार्यक्षेत्र और करियर वाणी और मार्केटिंग से जुड़ा हुआ है। उन लोगों के लिए समय बेहतर रहने वाला है। अगर आप राजनीति में सक्रिय हैं तो आपको सफलता मिलने के आसार हैं। हालांकि आपके ऊपर साढ़ेसाती का तीसरा चरण चल रहा है। इसलिए आप लोगों को थोड़ा स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। लेकिन शनि देव के मार्गी होने से आपको साढ़ेसाती में कुछ राहत जरूर मिलेगी।

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इस धनतेरस इन 5 राशि के लोगों पर लक्ष्मी जी रहेंगी मेहरबान, जानिये क्या कहता है ज्योतिष शास्त्र

धार्मिक मान्यता के अनुसार धनतेरस कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हर वर्ष मनाया जाता है। इस दिन धन की देवी मां लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार इन दिन कोई भी नया सामान खरीदने से घर में बढ़ोतरी होती है और सुख-समृद्धि का वास होता हैवहीं इस दिन शनि देव मकर राशि में मार्गी हो रहे हैं। जिसका प्रभाव सभी राशि के जातकों पर पड़ेगा। वहीं इस दौरान कई राशि के लोगों की आर्थिक बढ़ोतरी भी हो सकती है। आइए जानते हैं इस दौरान किन-किन राशि के लोगों पर धन की देव मां लक्ष्मी की विशेष कृपा होने वाली है और किन्हें आर्थिक बढ़ोतरी मिल सकती है। मिथुन राशिमिथुन राशि के जातकों के लिए शनि देव आठवें और नौवें भाव के स्वामी होते हैं। इस अवधि में इस राशि के जातकों को पैतृक संपत्ति से लाभ हो सकता है। निवेश से भी धन लाभ हो सकता है। मेष राशिजातकों को करियर में सफलता मिल सकती है। सामाजिक पद-प्रतिष्ठा भी बढ़ सकती है। विदेश जमीन आदि से भी लाभ मिल सकता है। साझेदारी में कोरोबार करने के लिए यह समय उत्तम हो सकता है। पेशेवर जीवन में समय आपके लिए अनुकूल हो सकता है। धनु राशिइस राशि के जातकों के लिए शनि देव दूसरे और तीसरे भाव के स्वामी हैं। जातकों के आय बढ़ सकते हैं और बचत करने भी सफलता मिल सकती है। लंबति कार्य भी पूरे हो सकते हैं। सामाजित छवि में इस दौरान सुधर सकती है और मान-सम्मान में भी बढ़ोतरी हो सकती है। मीन राशिइस राशि के जातकों पर भी शनि देव की कृपा रहेगी। आर्थिक कमी जैसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। कार्यस्थल पर भी समय आपके पक्ष में रहेगा। व्यवसाय में भी सफलता मिल सकती है। तुला राशिइस राशि के जातकों के पुराने विवाद खत्म हो सकते हैं। कई जातकों को भौतिक लाभ भी मिल सकता है। जमीन भी इस अवधि में कई जातकों खरीद सकते हैं।

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करवा चौथ व्रत की पौराणिक कथा

करवा चौथ व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखमय दांपत्य जीवन के लिए रखती हैं।इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और चंद्रोदय के बाद चंद्र दर्शन करके व्रत खोलती हैं। इस व्रत में शाम के समय विधि विधान से पूजा की जाती है। जिसके बाद व्रत कथा सुनना बेहद अनिवार्य माना जाता है। मान्यता है इस कथा को पढ़ने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन थी जो सभी की लाडली थी। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी जहां उसने अपनी भाभियों के साथ करवाचौथ का व्रत रखा लेकिन शाम होते-होते वह भूख से व्याकुल हो उठी। सभी भाई खाना खाने बैठे और उन्होंने अपनी बहन से खाने का आग्रह किया लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जला व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्र दर्शन कर और उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूंकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।सबसे छोटे भाई से अपनी बहन की ये हालत देखी नहीं गयी और उसने दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख दिया। दूर से देखने पर वह चांद जैसा प्रतीत हो रहा था। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि देखो चांद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देकर भोजन कर सकती हो। बहन ने खुशी से चांद को देखा और उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ गई। वह जैसे ही पहला टुकड़ा मुंह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालते ही उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही वह तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने को होती है तो उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे भाई द्वारा की गई हरकत की सच्चाई बताती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है। सच्चाई जानने के बाद वो निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रही। उसकी देखभाल करती रही। उसके ऊपर उगने वाली घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। सभी भाभियां करवा चौथ का व्रत रखती हैं और जब उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उस भाभी से भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूंकि सबसे छोटे भाई के कारण उसका यह व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे छोड़ना नहीं। ऐसा कह कर वह चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह इधर-उधर की बात करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। उसकी भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी का मन पसीज जाता है और वह अपनी छोटी अंगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुंह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ जीवित हो जाता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। तभी से हर सुहागिन महिला करवा चौथ का व्रत पूर नियम के साथ रखती है।

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श्रीराम ने रावण को मारने से पहले की थी अपराजिता देवी की पूजा, जानें कारण

महर्षि वेद व्यास ने अपराजिता देवी को आदिकाल की श्रेष्ठ फल देने वाली, देवताओं द्वारा पूजित और त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) द्वारा नित्य ध्यान में लाई जाने वाली देवी कहा है। राम-रावण युद्ध नवरात्रों में हुआ। रावण की मृत्यु अष्टमी-नवमी के संधिकाल में और दाह संस्कार दशमी तिथि को हुआ। इसके बाद विजयदशमी मनाने का उद्देश्य रावण पर राम की जीत यानी असत्य पर सत्य की जीत हो गया। आज भी संपूर्ण रामायण की रामलीला नवरात्रों में ही खेली जाती है और दसवें दिन सायंकाल में रावण का पुतला जलाया जाता है। इस दौरान यह ध्यान रखा जाता है कि दाह के समय भद्रा न हो। देवी अपराजिता के पूजन का आरंभ तब से हुआ है जब से चारों युगों की शुरुआत हुई। नवदुर्गाओं की माता अपराजिता संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्तिदायिनी और ऊर्जा उत्सर्जन करने वाली हैं। विजयदशमी को प्रातःकाल अपराजिता लता का पूजन, अतिविशिष्ट पूजा-प्रार्थना के बाद विसर्जन और धारण आदि से महत्वपूर्ण कार्य पूरे होते हैं। ऐसी पुराणों में मान्यता हैं। देवी अपराजिता को देवताओं द्वारा पूजित, महादेव, सहित ब्रह्मा विष्णु और विभिन्न अवतार के द्वारा नित्य ध्यान में लाई जाने वाली देवी कहा है।विजय दशमी के दिन ‘माता अपराजिता’ का पूजन किया जाता है। विजयदशमी का पर्व उत्तर भारत में आश्विन शुक्ल पक्ष के नवरात्र संपन्न होने के उपरांत मनाया जाता है। शास्त्रों में दशहरे का असली नाम विजयदशमी है, जिसे ‘अपराजिता पूजा’ भी कहते हैं। अपराजिता देवी सकल सिद्धियों की प्रदात्री साक्षात माता दुर्गा का ही अवतार हैं। भगवान श्री राम ने माता अपराजिता का पूजन करके ही राक्षस रावण से युद्ध करने के लिए विजय दशमी को प्रस्थान किया था। यात्रा के ऊपर माता अपराजिता का ही अधिकार होता है।ज्योतिष के अनुसार माता अपराजिता के पूजन का समय अपराह्न अर्थात दोपहर के तत्काल बाद का है। अत: अपराह्न से संध्या काल तक कभी भी माता अपराजिता की पूजा कर यात्रा प्रारंभ की जा सकती है। यात्रा प्रारंभ करने के समय माता अपराजिता की यह स्तुति करनी चाहिए, जिससे यात्रा में कोई विघ्न उत्पन्न नहीं होता- शृणुध्वं मुनय: सर्वे सर्वकामार्थसिद्धिदाम्।असिद्धसाधिनीं देवीं वैष्णवीमपराजिताम्।।नीलोत्पलदलश्यामां भुजङ्गाभरणोज्ज्वलाम्।बालेन्दुमौलिसदृशीं नयनत्रितयान्विताम्।।पीनोत्तुङ्गस्तनीं साध्वीं बद्धद्मासनां शिवाम्।अजितां चिन्येद्देवीं वैष्णवीमपराजिताम्।। अपराजिता देवी का पूजन करने से देवी का यह रूप पृथ्वी तत्त्व के आधार से भूगर्भ से प्रकट होकर, पृथ्वी के जीवों के लिए कार्य करता है । अष्टदल पर आरूढ़ हुआ यह त्रिशूलधारी रूप शिव के संयोग से, दिक्पाल एवं ग्राम देवता की सहायता से आसुरी शक्तियां अर्थात बुरी शक्तियों का नाश करता है। दशमी तिथि की संज्ञा ‘पूर्ण’ है, अत: इस दिन यात्रा प्रारम्भ करना श्रेष्ठ माना जाता है। श्री वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रवण नक्षत्र युक्त विजय दशमी को ही भगवान श्री राम ने किष्किंधा से दुराचारी राक्षस रावण का विनाश करने के लिए हनुमानादि वानरों के साथ प्रस्थान किया था। आज तक रावण वध के रूप में विजय दशमी को अधर्म के विनाश के प्रतीक पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।

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क्यों मनाया जाता है दशहरा, जानें इससे जुड़ी परंपरा और पौराणिक कथा

इसलिए मनाया जाता है दशहरा दशहरा का त्यौहार मनाये जाने के पीछे जो पौराणिक कहानी है उसके अनुसार, भगवान श्री राम के 14 वर्ष के वनवास के दौरान रावण द्वारा मां सीता का हरण कर लिया गया था. अपनी पत्नी सीता को बचाने और अधर्मी रावण का नाश करने के लिए, भगवान श्री राम ने रावण के साथ कई दिनों तक युद्ध किया था. इस युद्ध के दौरान शारदीय नवरात्रि के दिनों में भगवान राम ने लगातार नौ दिनों तक शक्ति की देवी मां दुर्गा की अराधना की थी. जिसके बाद मां दुर्गा के आशीर्वाद से भगवान श्री राम ने युद्ध के दसवें दिन रावण का वध कर अपनी पत्नी और सभी लोगों को उनके अत्याचारों से बचाया था. इसी परंपरा को मानते हुए हर वर्ष दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन रावण, मेघनाथ और कुम्भकर्ण को बुराई का प्रतीक मानकर उनके पुतले जलाये जाते हैं. ये भी मानी जाती है वजह एक अन्य पौराणिक कहानी के अनुसार नवरात्रि के बाद दशहरा मनाये जाने की एक और वजह है. इसके अनुसार असुर महिषासुर और उसकी सेना द्वारा देवताओं को परेशान किये जाने की वजह से, मां दुर्गा ने लगातार नौ दिनों तक महिषासुर और उसकी सेना से युद्ध किया था. मां दुर्गा ने दसवें दिन महिषासुर का वध कर विजय प्राप्त की थी. इसी वजह से इस त्यौहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है और दशहरा मनाया जाता है. शारदीय नवरात्रि की स्थापना के दिन स्थापित किये गए कलश, मां की मूर्तियों और बोये गए ज्वारों का विसर्जन भी इसी दिन किया जाता है

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रामनवमी कथा

रामनवमी कथा रामनवमी हिंदुओं धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसे भगवान राम के जन्म दिन के रूप में पूरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है, कि असुरों के राजा रावण को मारने के लिए भगवान विष्णु ने त्रेता युग में राम के रूप में विष्णु का सातवां अवतार लिया था। वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, राम का जन्म चैत्र मास की नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में अयोध्या के राजा दशरथ की पहली पत्नी कौशल्या के गर्भ से हुआ था। तब से यह दिन समस्त भारत में रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। रामनवमी एक धार्मिक त्यौहार है, जो हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा पूरे उत्साह के साथ हर साल मनाया जाता है। यह अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के पुत्र भगवान राम, के जन्म दिन के रुप में मनाया जाता है। भगवान राम, हिन्दू देवता, भगवान विष्णु के दशावतार में से 7वें अवतार थे। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, यह त्यौहार हर वर्ष चैत्र मास (महीने) के शुक्ल पक्ष के 9वें दिन पड़ता है। रामनवमी को चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी भी कहा जाता है, जो नौ दिन लम्बें चैत्र-नवरात्री के त्यौहार के साथ समाप्त होती है। हिन्दू धर्म के लोग इसे नौ दिन के त्यौहार के रुप में, पूरे नौ दिनों पर राम चरित्र मानस के अखंड पाठ, धार्मिक भजन, हवन, पारम्परिक कीर्तन और पूजा व आरती के बाद प्रसाद के वितरण आदि का आयोजन करने के द्वारा मनाते हैं। भक्त भगवान राम के शिशु रुप में मूर्ति बनाते हैं और उसके सामने की पूजा करते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि, भगावन विष्णु के 7वें अवतार भगवान राम थे और उन्होंने सामान्य लोगों के बीच में उनकी समस्याएं हटाने के लिए जन्म लिया था। लोग अपनी समस्याओं को दूर करने और बहुत अधिक समृद्धि व सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से मन्दिरों और अन्य धार्मिक स्थलों को अपने पारम्परिक अनुष्ठान करने के लिए सुसज्जित करते हैं, और प्रभु को फल व फूल अर्पण करते हैं। वे सब इस दिन वैदिक मंत्रों का जाप, आरती और अन्य बहुत से धार्मिक भजनों का गान करने के लिए मन्दिरों या अन्य धार्मिक स्थलों पर एकत्रित होते हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार राम राज्य ग्यारह हजार वर्ष तक चला था। राम का जन्म लगभग 1 करोड़ 25 लाख 58 हजार 98 वर्ष पूर्व हुआ था। श्रीराम की कुंडली का विवेचन करने से यह तो पता चला कि किन-किन ग्रहों के कारण उनको भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं हुई। लेकिन हमें स्मरण रखना चाहिए कि श्रीराम ने त्याग और संघर्ष जैसे कष्टमय मार्ग पर चलकर स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम के स्वरूप में प्रस्तुत किया। सत्य के मार्ग पर हमेशा चलते रहे, अनेक कष्ट सहे मगर फिर भी लोक कल्याण के लक्ष्य से डिगे नहीं, हरदम आगे बढ़ते रहे। इसका कारण लग्न में गुरु एवं चन्द्र की युति का होना है। जीवन में मर्यादा का पालन करने की वजह से वह ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के नाम से जाने गए। अयोध्या के राजकुमार होते हुए भी उन्होंने अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिए वैभव का त्याग कर 14 वर्ष का वनवास व्यतीत किया, और इन्हीं गुणों से भगवान राम युगों-युगों तक भारतीय जन-मानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ते आए हैं। गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के अनुसार चैत्र शुक्ल की नवमी तिथि तथा पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण एवं कर्क लग्न में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। श्रीरामजी मंगली थे। ग्रह स्थितियों के प्रभाव वश श्रीराम को दाम्पत्य, मातृ, पितृ एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं हो सकी। यद्यपि दशम भाव में उच्च राशि मेष में स्थित सूर्य ने श्रीराम को एक ऐसे सुयोग्य शासक के रूप में प्रतिष्ठित किया कि उनके अच्छे शासनकाल राम राज्य की आज भी दुहाई दी जाती है। रामनवमी (Ram Navami) के दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर उनकी जन्मस्थली अयोध्या नगरी में उत्सव का माहौल रहता है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस अवसर पर प्रात:काल सरयू नदी में स्नान कर पूजा-अर्चना शुरू कर देते हैं तथा दोपहर बारह बजे से पहले उनके जन्म दिन की प्रतीकात्मक तैयारी के लिए यह कार्यक्रम रोक दिया जाता है और बारह बजते ही अयोध्या नगरी में उनके नाम की जय जयकार शुरू हो जाती है। अयोध्या के प्रसिद्ध कनक भवन मंदिर में भगवान राम के जन्म को भव्य तरीके से मनाये जाने का रिवाज है। उनके जन्म के प्रतीक के रूप में विभिन्न मंदिरों में बधाई गीत और रामचरित मानस के बालकांड की चौपाइयों का पाठ किया जाता है। किन्नरों के समूह भी भगवान राम के आगमन को महसूस करते हुए सोहर गाते हैं और नृत्य करते हैं। अयोध्या के साथ ही पूरे देश में इस दिन भगवान राम, उनकी पत्नी सीता, छोटे भाई लक्ष्मण और भक्त हनुमान की रथ यात्राएं निकाली जाती हैं। उत्तर एवं पूर्वी भारत में कच्चे बांस के सहारे लाल रंग का ध्वज श्रद्धालु अपने घरों एवं मंदिरों में लगाते हैं जिसमें भक्त हनुमान की आकृति बनी होती है। इस अवसर पर पूजा के अलावा व्रत का भी विधान है जिसका सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक दोनों महत्व है। आमतौर पर घरों एवं मंदिरों में रामदरबार का आयोजन कर उनकी पूजा की जाती है। माना जाता है कि इस व्रत से श्रद्धालु भक्ति के साथ मुक्ति भी प्राप्त करते हैं।

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नवरात्र की नवमी या दशमी तिथि के दिन कैसे करें हवन, जानें पूजा विधि और सामग्री

 नवरात्र के 9 दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाती है। इस साल शारदीय नवरात्रि का समापन 05 सितंबर को दशहरा के साथ हो रहा है। नवरात्र का व्रत हवन के बिना अधूरा माना जाता है। जानिए हवन सामग्री और पूजा विधि।इस साल पूरे नौ दिनों के नवरात्र पड़े है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है। नवरात्र की शुरुआत में व्रत रखने वाले लोग कलश स्थापना भी करते हैं। वहीं नवमी तिथि को व्रत का पारण करने के बाद विसर्जन करने का विधान है। इसके साथ ही अंतिम दिन मां दुर्गा की पूजा के साथ हवन किया जाता है। कई जगहों पर महा अष्टमी, नवमी तो कहीं पर दशमी यानी दशहरा के दिन विसर्जन किया जाता है। अगर आप भी मां दुर्गा की पूजा करने के साथ कलश स्थापना किए हुए है, तो जानिए हवन की पूरी साम्रगी और विधि। नवरात्र में हवन करने की सामग्री नवरात्र में हवन कई लोग कुछ सामग्री को लेकर कर लेते हैं। इसके अलावा आप चाहे तो विधिवत तरीके से हवन सामग्री इकट्ठा करके हवन कर सकते हैं। नवरात्र में अंतिम दिन हवन के लिए एक सूखा नारियल, लाल रंग का कपड़ा, कलावा, एक हवन कुंड, सूखी आम की लकड़िया, इसके अलावा अश्वगंधा, ब्राह्मी, मुलैठी की जड़, चंदन, बेल, नीम, पीपल का तना ,छाल, गूलर की छाल और पलाश की लकड़ियां शामिल कर सकते हैं। हवन धूप में मिलाने के लिए काला तिल, कपूर, चावल, गाय का घी, लौंग, लोभान, इलायची, गुग्गल, जौ और शक्कर मिलाकर रखें। इसके अलावा इसमें पंच मेवा भी डाल सकते हैं। नवरात्र में हवन करने की विधि नवरात्र की नवमी तिथि को विधिवत तरीके से मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धादात्री की पूजा कर लें। इसके साथ ही कलश स्थापना की पूजा करें। इसके बाद पूजा स्थान या साफ-सुथरी जगह पर आटा से एक रंगोली बनाएं और उसके ऊपर हवन कुंड रख दें। इसके साथ ही पास में चौकी में मां दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति केसाथ कलश कर लें। अब हवन शुरू करें। इसके लिए हवन कुंड में लकड़ी रखें और थोड़ा सा कपूर या घी डालकर जला दें। इसके साथ ही एक आसन में बैठ जाएं और मंत्रों के साथ हवन आरंभ करें। जब हवन मंत्रों के साथ आहुति डाल दें, तो फिर खीर का भोग डालें। फिर सूखा नारियल में में बीच से किसी चीज की मदद से छेद कर दें और उसमें घी भर दें। अंत में इसे हवन कुंडल के बीच में दबा दें। इसके बाद अंत में बची हुआ हवन धूप को ऊपर से डालकर इस मंत्र को बोले- ऊं पूर्णमद: पूर्णमिदम् पुर्णात पूण्य मुदच्यते, पुणस्य पूर्णमादाय पूर्णमेल विसिस्यते स्वाहा। हवन करते समय इन मंत्रों के साथ दें आहुति ऊं आग्नेय नम: स्वाहा ऊं गणेशाय नम: स्वाहा ऊं गौरियाय नम: स्वाहा ऊं नवग्रहाय नम: स्वाहा ऊं दुर्गाय नम: स्वाहा ऊं महाकालिकाय नम: स्वाहा ऊं हनुमते नम: स्वाहा ऊं भैरवाय नम: स्वाहा ऊं कुल देवताय नम: स्वाहा ऊं न देवताय नम: स्वाहा ऊं ब्रह्माय नम: स्वाहा ऊं विष्णुवे नम: स्वाहा ऊं शिवाय नम: स्वाहा ऊं जयंती मंगलाकाली, भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमस्तुति स्वाहा। ऊं ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: शशि भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु स्वाहा। ऊं गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवा महेश्वर: गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा। ऊं शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे, सर्व स्थार्ति हरे देवि नारायणी नमस्तुते।

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पाप की सजा: पाप की प्रबलता मनुष्य को दुखों की दलदल में धकेलती है

व्यक्ति पाप मानसिक और शारीरिक, दोनों रूप में करता है। इससे नैतिकता का हनन एवं व्यक्ति का मन कलुषित तथा वातावरण दूषित-कलंकित होता है। इसका परिणाम जीवन और समाज में अशांति, दुख, अनाचार, अत्याचार, प्राकृतिक आपदा के रूप में दृष्टिगोचर होता है पाप की सजा प्रकृति में ईश्वरीय विधान अकाट्य है। गलत की सजा गलत और अच्छाई का फल पुरस्कार के रूप में प्राप्त होता है। अर्थात पुण्य का फल कर्म के उपहार स्वरूप सुख-शांति के रूप में प्राप्त होता है और पाप की सजा कष्ट-दुख के रूप में भोगनी पड़ती है। पुण्यार्जन के लिए मनुष्य को सत्कर्म करने पड़ते हैं। सत्कर्म का मार्ग कठिन जरूर होता है, पर जिनका मन पवित्र और सच्चाई से सराबोर होता है, उनके लिए यह सरल हो जाता है। इसी के कारण उनकी गणना लौकिक संसार में अच्छे व्यक्तियों में की जाती है। उन्हें सदा मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती रहती है। पुण्य की प्रबलता ही व्यक्ति के जीवन को सफल और सार्थक बनाती है, जबकि पाप की प्रबलता मनुष्य को दुखों की दलदल में सजा भोगने के लिए धकेल देती है। निज स्वार्थ के लिए बेईमानी, हत्या, चोरी, निंदा और झूठ-फरेब का सहारा लेना सबसे बड़ा पाप है। प्रकृति में ईश्वरीय विधान अकाट्य है। गलत की सजा गलत और अच्छाई का फल पुरस्कार के रूप में प्राप्त होता है। अर्थात पुण्य का फल कर्म के उपहार स्वरूप सुख-शांति के रूप में प्राप्त होता है और पाप की सजा कष्ट-दुख के रूप में भोगनी पड़ती है। व्यक्ति पाप मानसिक और शारीरिक, दोनों रूप में करता है। इससे नैतिकता का हनन एवं व्यक्ति का मन कलुषित तथा वातावरण दूषित-कलंकित होता है। इसका परिणाम जीवन और समाज में अशांति, दुख, अनाचार, अत्याचार, प्राकृतिक आपदा के रूप में दृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति समझता है कि हम बुराई कर रहे हैं, कोई देख नहीं रहा है, पर हमारी गलती हमारे आत्मा से छुपी नहीं रहती है। हम पाप जितना भी छुपकर करें, पर ईश्वर व्यक्ति के अंतरात्मा की नेत्र से जरूर देख लेता है। जाहिर है व्यक्ति पाप करके पुलिस-कानून से भले बच जाए, पर ईश्वर से नहीं बच सकता है। हालांकि हमारा आत्मा पाप करने से हमें रोकता है, पर हमारा आसुरी मन लोभ-मोह और अहंकार में अंधा होकर पाप में प्रवृत्त हो जाता है। ऐसे में हमें अपने मन को नियंत्रण में रखने के प्रयास करने चाहिए। यह मानव जीवन पाप-कुकर्म के लिए नहीं, पुण्य-सत्कर्म करके निज का उद्धार, जन-जन की भलाई के लिए प्राप्त हुआ है।

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