Shardiya Navratri 2023 Date: शारदीय नवरात्रि कब से हो रहे शुरू, जानें महत्व, कलश स्थापना का मुहूर्त

सनातन धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शारदीय नवरात्रि में मां शक्ति के 9 स्वरूपों की उपासना करने से साधक को विशेष लाभ प्राप्त होता है। साथ ही जीवन में आ रही सभी समस्या दूर हो जाती है। हिंदू धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। बता दें कि हर वर्ष दो नवरात्रि पर मनाए जाते हैं। एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में। आश्विन मास में पड़ने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हो जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शारदीय नवरात्रि में घटस्थापना और नौ दिनों तक देवी दुर्गा की उपासना करने से साधक को सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए यहां शारदीय नवरात्रि 2023 तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 14 अक्टूबर रात्रि 11 बजकर 24 मिनट से शुरू होगी और 16 अक्टूबर मध्य रात्रि 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। ऐसे में शारदीय नवरात्रि पर्व का शुभारंभ 15 अक्टूबर 2023, रविवार के दिन होगा। इस विशेष दिन पर चित्रा नक्षत्र और स्वाति नक्षत्र का निर्माण हो रहा है, जिसे शुभ कार्यों के लिए बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है। शारदीय नवरात्रि 2023 घटस्थापना समय शास्त्रों में बताया गया है कि शारदीय नवरात्रि के शुभ अवसर पर घटस्थापना मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त के दौरन तय होता है। घट स्थापना का समय निश्चित चित्रा नक्षत्र के दौरन ही होता है। ऐसे में इस दिन चित्रा नक्षत्र 14 अक्टूबर को शाम 04 बजकर 24 मिनट से 15 अक्टूबर शाम 06 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 04 मिनट से सुबह 11 बजकर 50 मिनट के बीच रहेगा, इसलिए घटस्थापना पूजा भी इसी अवधि में की जाएगी। शारदीय नवरात्रि का धार्मिक महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पहले चैत्र नवरात्रि को ही बहुत धूमधाम से मनाया जाता था लेकिन जब भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की तब वह चैत्र नवरात्रि का इंतजार नहीं करना चाहते थे और आश्विन मास की प्रतिपदा को दुर्गा पूजा आयोजित की। तभी से शारदीय नवरात्रि की धूम होने लगी। देवी भागवत पुराण में भी भगवान श्रीराम द्वारा शारदीय नवरात्रि का व्रत और शक्ति पूजन करने का वर्णन मिलता है। इसके साथ ही आश्विन मास में ही मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस पर आक्रमण कर दिया और उससे नौ दिन तक युद्ध किया और दसवें दिन राक्षस का वध कर दिया इसलिए नौ दिन तक मां दुर्गी की पूजा शक्ति के रूप में की जाती है। कलश स्थापना का मुहूर्त शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि यानी पहले दिन कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा की पूजा शुरू होती है। शक्ति पूजा से पहले मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त 15 अक्टूबर को 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक है। ऐसे में कलश स्थापना के लिए 46 मिनट का समय दिया गया है। नवरात्रि में इस दिन करें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा नवरात्रि का पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा – 15 अक्टूबर 2023नवरात्रि का दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा – 16 अक्टूबर 2023नवरात्रि का तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा – 17 अक्टूबर 2023नवरात्रि का चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा – 18 अक्टूबर 2023नवरात्रि का पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा – 19 अक्टूबर 2023 नवरात्रि का छठवें दिन मां कात्यायनी की पूजा – 20 अक्टूबर 2023नवरात्रि का सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा – 21 अक्टूबर 2023नवरात्रि का आठवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा – 22 अक्टूबर 2023नवरात्रि का नौवें दिन मां महागौरी की पूजा – 23 अक्टूबर 2023विजयदशमी या दशहरा पर्व – 24 अक्टूबर 2023

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Chandra Darshan 2023: आज कब और कैसे करें चंद्र दर्शन, जानें चंद्रमा की पूजा विधि और उपाय

ज्येष्ठ मास की अमावस्या के बाद चंद्र देवता के दर्शन का सौभाग्य कब प्राप्त होगा और क्या है इसकी पूजा विधि, मंत्र और धार्मिक महत्व, विस्तार से जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. सनातन परंपरा में किसी भी मास की अमावस्या के बाद होने वाले चंद्र दर्शन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व माना गया है. यही कारण है कि जीवन में शुभता और सौभाग्य की कामना लिए लोग इस दिन का बहुत बेसब्री से इंतजार करते हैं. ज्योतिष में जिस चंद्रमा को मन का कारक माना गया है, उसका दर्शन महीने की 20 तारीख को होगा. चंद्र दर्शन करना किस समय बहुत ज्यादा शुभ रहता है? चंद्र दर्शन की पूजा विधि और मंत्र क्या है? आइए इन सभी बातों के साथ चंद्र देवता की पूजा का पुण्य लाभ दिलाने वाला महाउपाय को विस्तार से जानते हैं. Vishwakarma Jayanti 2023 Date:  कब है विश्वकर्मा जयंती, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त चंद्र दर्शन की पूजा विधि हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्र दर्शन करने के लिए व्यक्ति को शाम के समय तन और मन से पवित्र होकर इस पूजा को करना चाहिए. यदि संभव हो तो चंद्र दर्शन करते समय व्यक्ति को सफेद कपड़े पहनना चाहिए. चंद्र दर्शन की पूजा में सबसे पहले दूध और उसके बाद शुद्ध जल चंद्र देवता को अर्पित करें. इसके बाद उन्हें खीर का भोग लगाकर धूप-दीप दिखाएं और चंद्र देवता के मंत्र ‘ॐ सों सोमाय नम:’ अथवा ‘ॐ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नम:’का जप करें. मान्यता है कि यह पूजा और मंत्र जप पति और पत्नी दोनों साथ मिलकर करें तो वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है. इसी तरह चंद्र दर्शन से व्यक्ति मन से जुड़ी चिंताएं दूर होती है और घर-परिवार में सुख-सौभाग्य बना रहता है. चंद्र दर्शन का महत्व चंद्र ग्रह को ज्ञान, बुद्धि और मन का स्वामी ग्रह माना जाता है. चंद्र दर्शन के दिन चंद्रमा के दर्शन से विशेष लाभ मिलते हैं. लोग भगवान की कृपा पाने के लिए कठोर व्रत और तपस्या करते हैं. चंद्र दर्शन और पूजा से भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है. जीवन से नकारात्मकता को कम करने के लिए चंद्र यंत्र की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से लाभ मिलता है. इस दिन ब्रह्मणों को दान करने से भी लाभ मिलता है.

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Vishwakarma Jayanti 2023 Date:  कब है विश्वकर्मा जयंती, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त

भगवान विश्वकर्मा को प्राचीन काल का सबसे पहला इंजीनियर कहा जाता है। उन्होंने भगवान शिव के त्रिशूल से लेकर कई और भी चीजों का निर्माण किया था। आइए जानते हैं इस साल कब है विश्वकर्मा जयंती और पूजा के लिए शुभ मुहूर्त कब से कब तक रहेगा। विश्वकर्मा की जयंती हर साल कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।। भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान शिव की त्रिशूल, लंका महल, द्वारका और देवताओं के अस्त्र और शस्त्र का निर्माण किया था। आइए जानते हैं इस साल कब मनाई जाएगी भगवान विश्वकर्मा की जयंती। करवा चौथ व्रत कथा | Karwa Chauth Vrat Katha In Hindi कब मनाई जाएगी विश्वकर्मा जयंती विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर 2023 को मनाई जाएगी। इसी के साथ पूजा के लिए सुबह 7 बजकर 50 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 26 मिनट तक का शुभ मुहूर्त है। विश्वकर्मा पूजा महत्व ऋषियों-मुनियों ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ विश्वकर्मा जी की पूजा आराधना का प्रावधान है। विश्वकर्मा जी को ही प्राचीन काल का पहला इंजीनियर माना जाता है। इस दिन औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़े उपकर औजार, की पूजा की करने से कार्य में कुशलता आती है। साथ ही आपके कारोबार में बढ़ोतरी होती है। इतना ही नहीं आपके घर में धन धान्य और सुख समृद्धि का आगमन होता है। विश्वकर्मा ने की थी पुष्पक विमान की रचना विश्वकर्मा पुराण के अनुसार, नारायण ने सर्वप्रथम ब्रह्माजी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना की थी। ब्रह्माजी के दिशा निर्देश के अनुसार, ही उन्होंने पुष्पक विमान की रचना की थी। इन सबके अलावा भगवान विश्वकर्मा को वास्तु शास्त्र का ज्ञान, यंत्र का निर्माण, विमान विद्या आदि के बारे में भी कई जानकारी प्राप्त हैं। विश्वकर्मा पूजन विधि विश्वकर्मा जयंती के दिन प्रतिमा को विराजित करके पूजा की जाती है। जिस व्यक्ति के प्रतिष्ठान में पूजा होनी है, वह प्रात:काल स्नान आदि करने के बाद अपनी पत्नी के साथ पूजन करें। हाथ में फूल, चावल लेकर भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए घर और प्रतिष्ठान में फूल व चावल छिड़कने चाहिए। इसके बाद पूजन कराने वाले व्यक्ति को पत्नी के साथ यज्ञ में आहुति देनी चाहिए। पूजा करते समय दीप, धूप, पुष्प, गंध, सुपारी आदि का प्रयोग करना चाहिए। पूजन से अगले दिन प्रतिमा का विसर्जन करने का विधान है।  पूजन के मंत्र भगवान विश्वकर्मा की पूजा में ‘ॐ आधार शक्तपे नम: और ॐ कूमयि नम:’, ‘ॐ अनन्तम नम:’, ‘पृथिव्यै नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। जप के लिए रुद्राक्ष की माला होना चाहिए।  जप शुरू करने से पहले ग्यारह सौ, इक्कीस सौ, इक्यावन सौ या ग्यारह हजार जप का संकल्प लें। चूंकि इस दिन प्रतिष्ठान में छुट्टी रहती है तो आप किसी पुरोहित से भी जप संपन्न करा सकते हैं।

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2023 गणेश उत्सव के दस दिनों में लगाएं इन 10 चीजों का भोग, बप्पा पूरी करेंगे आपकी हर मनोकामना

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन सुख-समृद्धि के देवता भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इसी उपलक्ष्य में हर साल गणेश उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व पूरे दस दिनों तक चलता है। गणेश उत्सव का यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तिथि के दिन तक चलता है। इस साल गणेश उत्सव की शुरुआत 19 सितंबर को हो रही है। वहीं इसका समापन 28 सितंबर 2023 को अनंत चतुर्थी वाले दिन होगा। गणेश उत्सव के इन 10 दिनों में गणपति बप्पा को 10 अलग-अलग चीजों का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इन दिनों भगवान गणेश को उनकी प्रिय चीजों का भोग लगाने से गणपति बप्पा अति प्रसन्न होते हैं। आइए जानते हैं गणेश उत्सव के दौरान बप्पा को कौन से भोग लगाने चाहिए….. गणेश चतुर्थी पर इस मुहूर्त में घर लाएं गणपति, जानिए गणपति स्थापना और पूजा विधि गणेश उत्सव पर गणपति बप्पा को  अर्पित करने योग्य चीजें पहला दिन उन्हें मोदक बहुत प्रिय है, इसलिए गणेश उत्सव के पहले दिन मोदक चढ़ाने से भी उन्हें अत्यंत प्रसन्नता होती है। दूसरा दिन  गणेश जी को मोतीचूर के लड्डू भी बहुत प्रिय हैं. ऐसे में गणेश उत्सव के दूसरे दिन भगवान गणेश को मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाना सर्वोत्तम होता है। तीसरा दिन  विघ्नहर्ता गणेश को बेसन के लड्डू भी पसंद हैं. इसलिए गणेश उत्सव के तीसरे दिन लड्डुओं का भोग लगाने की सलाह दी जाती है। दिन 4  भगवान गणेश को केले का भोग लगाना सर्वोत्तम प्रसादों में से एक है। इसलिए गणेश उत्सव के चौथे दिन प्रसाद में केले का फल जरूर शामिल करें। दिन 5  धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश जी को मखाने की खीर भी बहुत पसंद है. इसलिए पांचवें दिन बप्पा को प्रसाद के रूप में मखाना खीर का भोग अवश्य लगाएं। दिन 6  हिंदू धर्म में, नारियल का उपयोग अक्सर पूजा के दौरान किया जाता है और अधिकांश पूजा थालियों, यज्ञ, हवन आदि पर देखा जाता है। नारियल को प्रसाद के रूप में भी वितरित और खाया जाता है। ऐसे में छठे दिन बप्पा को नारियल का भोग लगा सकते हैं. दिन 7  पूजा के दौरान गुड़ का भोग लगाना भी बहुत शुभ माना जाता है. यह एक पारंपरिक प्रसाद है जो भगवान गणेश को बहुत प्रिय है। इसलिए सातवें दिन बप्पा को घी और गुड़ का भोग लगाना अच्छा विचार है। दिन 8 ऐसा कहा जाता है कि भगवान गणेश को मोदक और लड्डू बहुत पसंद हैं. इसलिए आठवें दिन मोतीचूर और बेसन का भोग लगाने के अलावा आप मावा के लड्डू का भी भोग लगा सकते हैं. दिन 9 दूध से बनी कलाकंद और खोपरपाक जैसी स्वादिष्ट मिठाइयाँ भी गौरी पुत्र गणेश को बहुत प्रिय हैं। ऐसे में नौवें दिन भगवान गणेश को दूध और घी से बनी मिठाई का भोग लगाना बहुत शुभ होता है। दिन 10 – हिंदू धर्म में 56 भोग का बहुत महत्व है. ऐसे में गणेशोत्सव के दसवें यानी आखिरी दिन बप्पा को 56 भोग लगाना चाहिए।

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गणेश चतुर्थी पर इस मुहूर्त में घर लाएं गणपति, जानिए गणपति स्थापना और पूजा विधि

गणेश उत्सव का यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तिथि के दिन तक चलता है. 10 दिन तक चलने वाला यह उत्सव बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है. करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए यहां धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन सुख-समृद्धि के देवता भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था। इसी उपलक्ष्य में हर साल गणेश उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व पूरे दस दिनों तक चलता है। गणेश उत्सव का यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तिथि के दिन तक चलता है। 10 दिन तक चलने वाला यह उत्सव बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इस दौरान घरों और बड़े-बड़े पूजा पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इस दिन शुभ मुहूर्त में ही बप्पा का स्वागत किया जाता है। ऐसे में यदि आप भी अपने घर में गणपति स्थापित करने जा रहे हैं शुभ मुहूर्त जरूर देख लें। चलिए जानते हैं गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त और विधि.. गणेश चतुर्थी तिथि 2023 इस साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 18 सितंबर 2023 को दोपहर 02 बजकर 9 मिनट पर हो रही है। इसका समापन 19 सितंबर 2023 को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर होगा। उदया तिथि के आधार पर गणेश चतुर्थी 19 सितंबर को मनाई जाएगी। इसी दिन से 10 दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव की शुरुआत भी होगी। गणेश स्थापना की विधि गणपति की स्थापना करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. स्नान करने के बाद साफ वस्त्र पहनें और इसके बाद अपने माथे पर तिलक लगाएं और पूर्व दिशा की ओर मुख कर आसन पर बैठ जाएं. आपका आसन बिल्कुल शुद्ध होना चाहिए. इसके बाद गणेश जी की प्रतिमा को किसी लकड़ी के पटरे या गेहूं, मूंग, ज्वार के ऊपर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें. गणपति की प्रतिमा के दाएं-बाएं रिद्धि-सिद्धि को भी स्थापित करें और साथ में एक-एक सुपारी रखें. गणेश चतुर्थी पूजा विधि गणेश चतुर्थी तिथि पर शुभ मुहूर्त को ध्यान में रखकर सबसे पहले अपने घर के उत्तर भाग, पूर्व भाग या पूर्वोत्तर भाग में गणेश जी की प्रतिमा रखें. पूजन सामग्री लेकर शुद्ध आसन पर बैठें. गणेश भगवान की प्रतिमा की पूर्व दिशा में कलश रखें और दक्षिण पूर्व में दीया जलाएं. अपने ऊपर जल छिड़कते हुए ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः मंत्र का जाप करें. भगवान गणेश को प्रणाम करें और तीन बार आचमन करें तथा माथे पर तिलक लगाएं. आसन के बाद गणेश जी को पंचामृत से स्नान कराएं. उन्हें वस्त्र, जनेऊ, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य और फल चढ़ाएं. गणेश जी की आरती करें और मनोकामना पूर्ति के लिए आशीर्वाद मांगे. 

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करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए यहां

प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन सुहागिन महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रहने के बाद शाम को चांद देखकर व्रत  का पारण करती हैं। इस बार करवा चौथ का व्रत 13 अक्टूबर 2022 को रखा जाएगा। इस दिन सोलह श्रृंगार करने का बहुत महत्व माना जाता है। महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाती हैं, सोलह श्रृंगार करके पूजा करती हैं। हिंदू धर्म में करवा चौथ का व्रत सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को कुछ काम को करने से बचना चाहिए, क्योंकि इसे शुभ नहीं माना जाता है। चलिए जानते हैं उन कार्यों के बारे में करवा चौथ व्रत के दौरान क्या करें? करवा चौथ के दिन पूजा के समय मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें। मान्यता है कि ऐसा करने से मां पार्वती प्रसन्न होती हैं और आपका दांपत्य जीवन खुशियों से भर देती हैं। करवा चौथ के दिन लाल रंग के ही कपड़े पहनें, क्योंकि लाल रंग सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। करवा चौथ की पूजा से पहले और बाद में भजन-कीर्तन जरूर करें।  करवा चौथ व्रत के दिन क्या न करें? करवा चौथ व्रत के दौरान दिन में न सोएं। व्रत के दौरान झूठ बोलने से बचें।  सुहागिन महिलाएं इस दिन अपनी श्रृंगार की चीजें किसी को भी न दें।  करवा चौथ के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को किसी भी नुकीली चीज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। करवा चौथ के दिन किसी भी महिला को अपनी सास, मां या फिर दूसरी महिला का अपमान नहीं करना चाहिए।  इस दिन महिलाएं काले, नीले और भूरे रंग के कपड़े पहन कर पूजा न करें। नव विवाहिता के हाथों पर नहीं रचती मेंहदी करवा चौथ पर्व पर यहां सबसे ज्यादा करवा चौथ न मनाने की टीस नव विवाहिता के मन में होती है। करवा चौथ पर्व पर नव विवाहिता न हाथों में मेंहदी रचाती हैं और न ही श्रृंगार करती हैं। नव विवाहिता रेखा ने बताया कि उसका पहला करवा चौथ है मन में बहुत आस थी। लेकिन जब ससुराल आई तब पता चला कि करवा चौथ का व्रत नहीं रखते। यह सुनकर मन में उदासी छा गयी। इस त्योहार पर हाथों में मेंहदी नहीं लगाते न शृंगार करते। किसने रखा था सबसे पहले करवा चौथ का व्रत? जानें पौराणिक कथा सती का बनाया मंदिर बघा मोहल्ले में हो रही अनहोनी रोकने के लिए गांव के बुजुर्गों ने निर्णय लिया कि मोहल्ले में सती का मंदिर बनाया जाये और उनकी पूजा अर्चना कर माफ़ी मांगी जाये। मोहल्ले में सती का मंदिर बनाया गया और शुरू कर दी पूजा अर्चना। जिसका नतीजा यह हुआ कि मोहल्ले में हो रही अनहोनी घटनाओं में कमी आई। ग्रामीणों ने सती का श्राप मानते हुए करवा चौथ पर सुहागिन महिलाओं के व्रत न रखने और उस दिन शृंगार न करने की बात कही। इसके अलावा करवा चौथ पर सती की पूजा करने का निर्णय लिया। 250 वर्षों से नहीं मनाया जाता करवा चौथ सुरीर कस्वे के बघा मोहल्ले में 250 वर्षों से सती के श्राप के कारण सुहागिन महिला करवा चौथ का व्रत नहीं रखतीं। गांव की वृद्ध महिला सरोज ने बताया कि पहले सती के श्राप को अनदेखा कर सुहागिन महिला व्रत रखती लेकिन उनका सुहाग एक वर्ष तक जीवित नहीं रहे। मोहल्ले में अनहोनी होने लगी। जिसके बाद महिलाओं ने शृंगार बंद कर दिया और करवा चौथ का व्रत नहीं रहने लगी। यह है सती का श्राप सुरीर कस्बे में करवा चौथ का पर्व क्यों नहीं मनाया जाता तो पता चला कि इसका कारण सती का श्राप है। करीब ढाई सौ वर्ष पूर्व राम नगला का एक युवक अपनी पत्नी को भैंसा गाड़ी से विदा कराकर लौट रहे थे। सुरीर कस्वे के बघा मोहल्ले में जब पहुंचे तो वहां के लोगों ने भैंसा को अपना बताते हुए युवक से झगड़ा करना शुरू कर दिया। वाद विवाद के दौरान लाठी डंडे चले जिसमें युवक की मौत हो गयी। जिसके बाद युवक की पत्नी ने मोहल्ले वालों को श्राप दिया कि यहां की महिलाएं कभी शृंगार नहीं करेंगी और न ही करवा चौथ का व्रत रखेंगी। इसके बाद विवाहिता पति की चिता पर लेट गयीं और सती हो गयी। चांद तो निकलेगा पर नहीं खिलेगी चांदनी गुरुवार को करवा चौथ पर चांद निकलेगा महिलाएं अर्घ देंगी और कामना करेंगी अपने पति की लम्बी आयु की। लेकिन मथुरा के सुरीर में महिलाओं की चांद को अर्घ देने की ख्वाशिस अधूरी है। यहां तो चांद तो निकलेगा लेकिन गांव की परंपरा के बंधन में बंधी चांदनी पर मायूसी ही छाई रहेगी। नव विवाहिताएं गांव की इस रूढ़िवादी परम्परा के कारण बिना शृंगार के रहेंगी। सुरीर में नहीं मनातीं महिलाएं करवा चौथ मथुरा से करीब 40 किलोमीटर दूर मांट तहसील में स्थित है क़स्बा सुरीर। यहां करवा चौथ पर्व पर अजीब सा सन्नाटा पसर जाता है,महिलाएं अनजाने डर से सहमी नजर आती हैं। यहां के बघा मोहल्ले में करवा चौथ पर महिलाएं न व्रत रखती हैं और न ही शृंगार करती हैं। नव विवाहिता हो या फिर शादी के 50 वर्ष गुजार चुकीं महिलाएं। यहां सुहागिन महिला छोटे से मंदिर में बने सती के मंदिर में पूजा करती हैं और उनसे मांगती हैं अपने जीवन साथी की लंबी उम्र की कामना।

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इस दिन रखा जाएगा भौम प्रदोष व्रत, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व

हर माह में दो बार प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस तरह से साल में कुल 24 प्रदोष व्रत पड़ते हैं। शिव भक्तों के लिए यह व्रत बहुत खास माना जाता है। इस दिन भगवान शंकर और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है। यह व्रत मां पार्वती और भगवान शिव के व्रतों में सर्वोत्तम माना गया है। मान्यता है जो भक्त पूरी श्रद्धा से भगवान शिव का यह प्रदोष व्रत रखता है, उसके जीवन के समस्त कष्टों का निवारण होता है। इस समय भाद्रपद का महीना चल रहा है और इस माह का पहला प्रदोष व्रत 12 सितंबर 2023, मंगलवार के दिन रखा जा रहा है, जिसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाएगा। ऐसे में चलिए जानते है भौम प्रदोष व्रत की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त भौम प्रदोष व्रत 2023 तिथिभाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत 12 सितंबर 2023, मंगलवार को रखा जा रहा है। इसकी शुरुआत 11 सितंबर 2023 को रात 11 बजकर 52 मिनट पर शुरू हो रही है और समापन 13 सितंबर 2023 को प्रात: 02 बजकर 21 मिनट पर होगा। नवरात्रि की शुरूआत के पीछे की पौराणिक कथा क्या है भौम प्रदोष व्रत 2023 पूजा का मुहूर्तभौम प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 06 बजकर 30 मिनट से रात 08 बजकर 49 मिनट तक है। प्रदोष व्रत की पूजा सामग्रीपांच फल, पांच मेवा, दक्षिणा, पूजा के बर्तन, कुश से बने आसन, दही, शुद्ध देशी घी, शहद, गंगाजल, धूप दीप, रोली, मौली, पांच मिष्ठान्न, बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, तुलसी दल, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, कपूर, चंदन, शिव व माता पार्वती के श्रृंगार की सामग्री आदि भौम प्रदोष व्रत की पूजा विधि भौम प्रदोष व्रत दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर लें। इसके उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके उपरांत घर के मंदिर में दीप जलाएं और व्रत लेने का संकल्प लें। फिर सायं काल में पुनः मंदिर में दीप जलाएं। इसके उपरांत सर्वप्रथम भगवान भोलेनाथ का गंगा जल से अभिषेक करें, उन्हें पुष्प अर्पित करें। भौम प्रदोष व्रत के दिन भगवान भोलेनाथ के साथ माता पार्वती और भगवान गणेश की भी आराधना करें। भगवान शिव को पांच फल, पंच मेवा और पंच मिष्ठान का भोग लगाएं। आखिर में भगवान शिव की आरती करें। संभव हो तो पूजन और अभिषेक के दौरान भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप करते रहें। भौम प्रदोष व्रत का महत्व भाद्रपद में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का खास महत्व होता है. भाद्रपद मास भगवान विष्णु को समर्पित है. ऐसे में इस माह में प्रदोष व्रत करने से भोलेनाथ के साथ-साथ भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. वहीं भौम प्रदोष व्रत में भगवान शंकर के साथ हनुमान जी की पूजा करना भी बेहद शुभ माना जाता है. दरअसल हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है. ऐसे में भौम प्रदोष व्रत के दिन हनुमान जी और भगवान शिव की पूजा करने से हर कष्ट से मुक्ति मिलती है. कुंडली में मांगलिक दोष वाले लोगों के लिए ये व्रत काफी लाभदायक है. इसके अलावा मंगल ग्रह शांति के लिए भी ये व्रत काफी शुभ है. इस व्रत को करने से बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है. पूजा विधि भौम प्रदोष व्रत के दिन सुबह उठकर स्नान करें और हनुमान जी की विधि विधान से पूजा करें. इसके बाद मंदिर में जाकर चोला चढ़ाएं. प्रदोष व्रत की पूजा शाम को होती है, ऐसे में शाम को एक बार फिर नहाएं और भगवान शिव की पूजा करें. शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें और फूल अर्पित करें. भगवान शिव के साथ-साथ मां पार्वती और भगवान गणेश की भी पूजा करें.

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अजा एकादशी पर बन रहे हैं 2 शुभ संयोग, जानें मुहूर्त, महत्व, पारण का समय और पूजा विधि

हिंदू शास्त्रों के अनुसार हर व्रत का अपना महत्व और लाभ होता है। ऐसा माना जाता है कि व्रत रखने से भगवान का दिव्य आशीर्वाद मिलता है और भक्तों पर सुख और समृद्धि की वर्षा होती है। सभी व्रतों में एकादशी व्रत का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। हर वर्ष 24 एकादशियां  होती हैं। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी या 11वें दिन को अजा एकादशी मनाई जाती है। इस बार 10 सितंबर, रविवार को अजा एकादशी पड़ रही है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और उन्हें समर्पित व्रत रखा जाता है। इस व्रत को करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। दृक पंचांग के अनुसार, इस साल अजा एकादशी के दिन 2 खास संयोग बनने जा रहा है। आइए जानते हैं कि अजा एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा? व्रत के नियम क्या हैं और इसके लिए शुभ मुहूर्त क्या है। किसने रखा था सबसे पहले करवा चौथ का व्रत? जानें पौराणिक कथा अजा एकादशी 2023 कब है?साल 2023 में अजा एकादशी व्रत 10 सितंबर, रविवार को है।एकादशी तिथि प्रारंभ: 09 सितंबर 2023 को शाम 07:17 बजे सेएकादशी तिथि समाप्त: 10 सितंबर 2023 को रात 09:28 बजेपारण का समय 11 सितंबर: प्रातः 06:04 बजे से प्रातः 08:33 बजे तक अजा एकादशी 2023 पर बन रहे ये 2 शुभ संयोगइस साल अजा एकादशी के दिन दो शुभ संयोग बन रहे हैं। पहला रवि पुष्य योग और दूसरा सर्वार्थसिद्धि योग है। रवि पुष्य योग: सायं 05: 06 मिनट से अगले दिन  प्रातः  06:0 4 मिनट तक सर्वार्थ सिद्धि योग: सायं 05: 06 मिनट से 11 सितंबर प्रातः 06 बजकर 04 मिनट तक  अजा एकादशी व्रत का महत्व और लाभअजा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और इससे उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से भक्तों को भूत-प्रेतों के भय से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस दिन अजा एकादशी व्रत कथा सुनने और व्रत रखने से अश्वमेघ यज्ञ करने से मिलने वाले लाभ के समान लाभ मिलता है। अजा एकादशी पूजा विधि अजा एकादशी एक ऐसा त्योहार है जिसमें व्रत नियम और अनुष्ठान के साथ रखा जाता है। एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले स्नान कर लें। पूजा स्थल को साफ करें और भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें। पूरी श्रद्धा से व्रत करने का संकल्प लें। कुछ पूजा सामग्री जैसे फूल, नारियल, सुपारी, फल, लौंग, अगरबत्ती, घी, पंचामृत भोग, तेल का दीपक तुलसी, दाल, चंदन आदि रखना जरूरी है। फिर भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएं। सुबह-शाम आरती करें। अजा एकादशी अत्यंत फलदायी मानी गई है इसलिए इसकी व्रत कथा पढ़ें। कुछ भक्त पूरी रात जागते हैं और भगवान को समर्पित भक्ति गीत, भजन और कीर्तन गाते हैं। द्वादशी के दिन सुबह गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें। इसके बाद फल कहकर व्रत का पारण करें।  अजा एकादशी व्रत कथा ऐसा कहा जाता है कि राजा हरिश्चन्द्र अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्वामित्र को उन्होंने अपना राजपाट दान कर दिया है। जब अगले दिन राजा हरिश्चन्द्र विश्वामित्र को अपना समस्त राज-पाठ को सौंप कर जाने लगे तो विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से दक्षिणा स्वरुप 500 स्वर्ण मुद्राएं दान में मांगी। राजा ने उनसे कहा कि पांच सौ क्या, आप जितनी चाहे स्वर्ण मुद्राएं ले लीजिए। इस पर विश्वामित्र हँसने लगे और राजा को याद दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं की जाती। तब राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं हासिल की, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला और सोने की सभी मुद्राएं विश्वामित्र को दान में दे दीं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को जहां बेचा था वह श्मशान का चांडाल था। चांडाल ने राजा हरिश्चन्द्र को श्मशान भूमि में दाह संस्कार के लिए कर वसूली का काम दे दिया। एक दिन राजा हरिश्चंद्र ने एकादशी का व्रत रखा हुआ था। आधी रात का समय था और राजा श्मशान के द्वार पर पहरा दे रहे थे। बेहद अंधेरा था, इतने में ही वहां एक लाचार और निर्धन स्त्री बिलखते हुए पहुंची जिसके हाथ में अपने पुत्र का शव था। राजा हरिश्चन्द्र ने अपने धर्म का पालन करते हुए पत्नी से भी पुत्र के दाह संस्कार हेतु कर मांगा। पत्नी के पास कर चुकाने के लिए धन नहीं था इसलिए उसने अपनी साड़ी का आधा हिस्सा फाड़कर राजा का दे दिया। उसी समय भगवान प्रकट हुए और उन्होंने राजा से कहा, “हे हरिश्चंद्र, इस संसार में तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है, तुम इतिहास में अमर रहोगे।” इतने में ही राजा का बेटा रोहिताश जीवित हो उठा। ईश्वर की अनुमति से विश्वामित्र ने भी हरिश्चंद्र का राजपाट उन्हें वापस लौटा दिया।

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नवरात्रि की शुरूआत के पीछे की पौराणिक कथा क्या है ? 

नवरात्रि का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है. नवरात्रि में 9 दिनो तक माँ शक्ति की 9 रूपों में पूजा की जाती है. जिसके बारे में आमतौर पर सभी को पता होता है. लेकिन काफी लोगों के मन में सवाल होता है कि नवरात्रि की पूजा क्यों शुरू की गई थी. इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है. अगर आपके मन में भी ऐसा ही सवाल है, तो इस पोस्ट में इसी सवाल का जवाब जानते है. नवरात्रि की शुरूआत के पीछे की पौराणिक कथा  नवरात्रि का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है. नवरात्रि में 9 दिनो तक माँ शक्ति की 9 रूपों में पूजा की जाती है. जिसके बारे में आमतौर पर सभी को पता होता है. लेकिन काफी लोगों के मन में सवाल होता है कि नवरात्रि की पूजा क्यों शुरू की गई थी. इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है. अगर आपके मन में भी ऐसा ही सवाल है, तो इस पोस्ट में इसी सवाल का जवाब जानते है. नवरात्रि के पीछे की पहली पौराणिक कथा कि बात करें, तो ऐसा माना जाता है कि एक बार महिषासुर नाम का एक राक्षस होता था. जोकि ब्रह्मा की पूजा करता था. ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उसे वरदान मांगने को कहा. जिसके बाद उसने कहा कि मुझे कोई देव, दानव या फिर पृथ्वी पर रहने वाला मनुष्य नहीं मार सकता. ब्रह्माजी उसको यह वरदान दे देते हैं. वरदान मिलने के बाद वह बहुत ही निर्दयी हो जाता है तथा तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगता है. जिसके बाद ब्रह्मा , विष्णु तथा महेश ने उसके आतंक से छूटकारा दिलाने के लिए माँ शक्ति के रूप में दूर्गा को जन्म दिया. दूर्गा और महिषासुर के बीच घमासान युद्ध हुआ. यह युद्ध 9 दिनों तक चलता रहा. अंत में माँ दूर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया. ऐसा माना जाता है कि तभी से इन 9 दिनों को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर मनाया जाता है. नवरात्रि के पीछे कि दूसरी पौराणिक कथा कि बात करें, तो ऐसा माना जाता है कि रामायण में राम और रावण के बीच युद्ध हुआ था. उस युद्ध से पहले भगवान राम ने रावण के खिलाफ युद्ध जीतने के लिए रामेश्वरम में 9 दिनों तक माँ शक्ति की अराधना दी थी. जिससे प्रसन्न होकर माँ शक्ति ने राम को विजय श्री का आशिर्वाद दिया. जिसके बाद राम को रावण के खिलाफ विजय प्राप्त हुई. यहीं कारण है कि तब से नवरात्रि की पूजा का शुभारंभ हुआ तथा इन 9 दिनों को नवरात्रि के तौर पर मनाया जाना शुरू हुआ. पहली कथा- श्रीराम को मिला विजयश्री का आशीर्वाद लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण-वध के लिए चंडीदेवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ 108 नीलकमल की व्यवस्था की गई, वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुंचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासंभव पूर्ण होने दिया जाए। इधर हवन सामग्री में पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गया और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने लगा। भय इस बात का था कि देवी मां रुष्ट न हो जाएं। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग कमलनयन नवकंच लोचन कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राज जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट हो, हाथ पकड़कर कहा- राम, मैं प्रसन्न हूं और विजयश्री का आशीर्वाद दिया। दूसरी कथा – एक अक्षर ने बदली रावण के यज्ञ की दिशा  किसने रखा था सबसे पहले करवा चौथ का व्रत? जानें पौराणिक कथा  एक बार रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धरकर हनुमानजी सेवा में जुट गए। नि:स्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर मांगने को कहा।  इस पर हनुमानजी ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए। ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया।  मंत्र में जयादेवी… भूर्तिहरिणी में ‘ह’ के स्थान पर ‘क’ उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है।  ‘भूर्तिहरिणी’ यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और ‘करिणी’ का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया।  हनुमानजी ने श्लोक में ‘ह’ की जगह ‘क’ करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी। तीसरी कथा- महिषासुर का वध नवरात्रि पर्व से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंसरूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था।  पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। और प्रत्याशित  प्रतिफलस्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देखकर देवता विस्मय  की स्‍थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चंद्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और स्वयं  स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्‍वी पर विचरण करना पड़ रहा है।  तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था।  महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के  सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गई थीं। इन 9 दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अंतत: वे महिषासुरमर्दिनी कहलाईं।

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किसने रखा था सबसे पहले करवा चौथ का व्रत? जानें पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में करवा चौथ के व्रत का विशेष महत्व माना जाता है. करवा चौथ के दिन पत्नी अपने पति की लंबी आयु की कामना तथा उनकी दीर्घायु के लिए निर्जल का व्रत रखती है. लेकिन क्या आपको पता है कि सबसे पहले करवा चौथ का व्रत किसने रखा तो चलिए आज हम आपको बताएंगे. सबसे पहले करवा चौथ का व्रत शक्ति स्वरूपा माता पार्वती ने भोलेनाथ के लिए रखा था. इसी व्रत को रखने से उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति भी हुई थी. इसलिए विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए करवा चौध व्रत रखती हैं और भगवान शंकर माता पार्वती की पूजा अर्चना करते हैं. व्रत से जुड़ी देवता-दानव की कथा करवा चौथ को लेकर एक और कथा भी है. एक बार राक्षस और देवताओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ. उस समय देवताओं पर दानव हावी होते जा रहे थे. तब ब्रह्मा जी ने देवताओं की सभी पत्नियों को करवा चौथ का व्रत करने के लिए कहा था. तब देवताओं की सभी पत्नियों ने अपने पति की कामना तथा दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा. महाभारत काल से जुड़ी मान्यता करवा चौथ को लेकर महाभारत काल की भी एक कथा है. द्वापर युग में अर्जुन नीलगिरी पर्वत पर तपस्या करने गए. उस समय पांडव पर संकट को देखते हुए द्रोपदी ने भी पांडवों की रक्षा के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था . जिसके बाद पांडवों को संकट से मुक्ति मिली थी. कैसे शुरू हुई करवा चौथ व्रत की परंपरा करवा चौथ की परमंपरा कहाँ से शुरू हुई और सबसे पहले किसने इस वर्त को रखा था इसके बारे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित है। करवा चौथ मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा यह भी है जिसके अनुसार जब सत्यवान की आत्मा को लेने के लिए यमराज आए तो पतिव्रता सावित्री ने उनसे अपने पति सत्यवान के प्राणों की भीख मांगी और अपने सुहाग को न ले जाने के लिए निवेदन किया। यमराज के न मानने पर सावित्री ने अन्न-जल का त्याग दिया। और वह अपने पति के शरीर के पास विलाप करने लगीं। पतिव्रता स्त्री के इस विलाप से यमराज विचलित हो गए और उन्होंने सावित्री से कहा कि अपने पति सत्यवान के जीवन के अतिरिक्त वह कोई और वर मांग ले। तब सावित्री ने यमराज से कहा कि आप मुझे कई संतानों की मां बनने का वर दें, जिसे यमराज ने हां कह दिया। पतिव्रता स्त्री होने के नाते सत्यवान के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के बारे में सोचना भी सावित्री के लिए संभव नहीं था। अंत में अपने वचन में बंधने के कारण एक पतिव्रता स्त्री के सुहाग को यमराज लेकर नहीं जा सके और सत्यवान के जीवन को सावित्री को सौंप दिया। कहा जाता है कि तब से स्त्रियां अन्न-जल का त्यागकर अपने पति की दीर्घायु की कामना करते हुए करवाचौथ का व्रत रखती हैं। वैसे पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले यह व्रत शक्ति स्‍वरूपा देवी पार्वती ने भोलेनाथ के लिए रखा था। इसी व्रत से उन्‍हें अखंड सौभाग्‍य की प्राप्ति हुई थी। इसीलिए सुहागिनें अपने पतियों की लंबी उम्र की कामना से यह व्रत करती हैं और देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवताओं और राक्षसों के मध्‍य भयंकर युद्ध छिड़ा था। लाख उपायों के बावजूद भी देवताओं को सफलता नहीं मिल पा रही थी और दानव थे कि वह हावी हुए जा रहे थे। तभी ब्रह्मदेव ने सभी देवताओं की पत्नियों को करवा चौथ का व्रत करने को कहा। उन्‍होंने बताया कि इस व्रत को करने से उनके पति दानवों से यह युद्ध जीत जाएंगे। इसके बाद कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी ने व्रत किया और अपने पतियों के लिए युद्ध में सफलता की कामना की। कहा जाता है कि तब से करवा चौथ का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई। एक पौराणिक कथा यह भी है कि प्राचीन समय में करवा नाम की एक पतिव्रता स्‍त्री थी। एक बार उसका पति नदी में स्‍नान करने गया था। उसी समय एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। इस पर उसने मदद के लिए करवा को पुकारा। तब करवा ने अपनी सतीत्‍व के प्रताप से मगरमच्‍छ को कच्‍चे धागे से बांध दिया और यमराज के पास पहुंची। करवा ने यमराज से पति के प्राण बचाने और मगर को मृत्‍युदंड देने की प्रार्थना की। इसके बाद इस पर यमराज ने कहा कि मगरमच्छ की आयु अभी शेष है, समय से पहले उसे मृत्‍यु नहीं दे सकता। तभी करवा ने यमराज से कहा कि अगर उन्‍होंने उसके पति को चिरायु होने का वरदान नहीं दिया तो वह अपने तपोबल से उन्‍हें नष्‍ट होने का शाप दे देगी। इसके बाद यमराज ने करवा के पति को जीवनदान दे दिया और मगरमच्‍छ को मृत्‍युदंड। श्रीकृष्ण की 16108 पत्नियाँ क्यों थीं?’इसके पीछे की सच्ची कहानी छलनी में चाँद और पति का चेहरा देखकर यह व्रत पूरा किया जाता है करवा चौथ के व्रत में छलनी का खास महत्व है। इस दिन पूजा की थाली में सुहागिन महिलाएं पूजा की सामग्री के साथ छलनी भी रखती है। करवा चौथ की रात को सुहागिन महिलाएं चाँद और पति को छलनी में से देखकर अपना व्रत पूरा करती हैं। चाँद निकलने के बाद महिलाएं छलनी में पहले दीपक रख चांद को देखती हैं और फिर अपने पति को देखती हैं। इसके बाद पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर व्रत पूरा करवाते हैं। छलनी में चाँद और पति का चेहरा देखकर यह व्रत पूरा करने के पीछे की कहानी यह है कि हिंदू मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा को भगवान ब्रह्मा का रूप माना जाता है और चांद को लंबी आयु का वरदान मिला हुआ है। चांद में सुंदरता, शीतलता, प्रेम, प्रसिद्धि और लंबी आयु जैसे गुण पाए जाते हैं। इसीलिए सभी महिलाएं चांद को देखकर ये कामना करती हैं कि ये सभी गुण उनके पति में आ जाएं। करवा चौथ पूजन की विधि महिलाओं को चाहिए इस दिन करवाचौथ का कैलेन्डर अपने पूजा स्थान में रखे। अपने श्रृंगार की वस्तुओं को भी पूजा स्थान में रखें। गणेश भगवान, माँ काली, शिव, पार्वती, कार्तिकेय की बड़ी तन्मयता से भक्ति पूर्वक पूजा अर्चना करें। परिवार की सुख शान्ति के लिए

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2023: जानिए कब है गोगा नवमी, इस दिन किस चीज का लगाया जाता है भोग

मान्यता है कि संतान सुख की प्राप्ति के लिए और घर में सुख समृद्धि लाने के लिए गोगा नवमी का दिन मनाया जाता है. सावन खत्म होने के साथ ही भाद्रपद माह की शुरुआत हो जाती है और भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को गोगा नवमी मनाई जाती है. गोगा नवमी वाल्मीकि समाज का एक प्रसिद्ध त्योहार है, इस दिन वाल्मीकि समाज के आराध्य गोगा देव यानी की जाहरवीर का जन्मोत्सव होता है. इस दिन विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है और नागों की पूजा भी होती है. इस दिन लोग व्रत रखकर गोगा देव से अपनी संतान की लंबी उम्र की कामना करते हैं, उसकी सुख समृद्धि और संतान सुख प्राप्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है. इस साल कब मनाई जाएगी गोगा नवमी 2023  अगर आप गोगा नवमी की पूजा करना चाहते हैं या व्रत रखना चाहते हैं तो इस साल गोगा नवमी 8 सितंबर 2023 को आएगी. गोगा नवमी का शुभ मुहूर्त सुबह 7:36 से सुबह 10:45 तक रहेगा, इसके बाद दोपहर का मुहूर्त 12:19 से 1:53 तक रहेगा, तो वहीं शाम की पूजा के लिए 5:01 से 6:35 तक शुभ मुहूर्त है. गोगा नवमी का महत्व भारत में खास तौर पर राजस्थान में गोगा नवमी धूमधाम से मनाई जाती है. इसके अलावा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी इसका खासा प्रभाव देखा जाता है. कहा जाता है कि गोगा देव को सांपों का देव भी कहा जाता है और इनकी पूजा करने से निसंतान दंपत्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती है. इतना ही नहीं ये भी माना जाता है कि गोगादेव के पास जहरीले से जहरीले सांपों को वश में करने की शक्ति होती है और उनकी पूजा करने से सर्प दोष और सांपों के डसने का डर भी दूर हो सकता है. गोगा नवमी पूजा विधि और भोग गोगा नवमी की पूजा करने के लिए सुबह सबसे पहले उठकर स्नान करें, मिट्टी से गोगादेव की मूर्ति बनाएं या फिर उनकी तस्वीर की पूजा करें. उन्हें चावल, रोली, वस्त्र आदि अर्पित करें. गोगा देव के भोग की बात की जाए तो उन्हें खीर, चूरमा के लड्डू या गुलगुला का भोग लगाया जाता है. इतना ही नहीं गोगा नवमी के दिन घोड़े को चने की दाल खिलाने की परंपरा भी है. गुलगुला बनाने के लिए आटे के साथ गड़ को मिलाकर गूंद लें और तेल में छोटा-छोटा गुलगुला तल लें.  नाग पूजा और उपचार गोगा जी को विशेष रूप से साँप के काटने और संबंधित बीमारियों से बचाने वाले के रूप में पूजा जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में सांपों को दिव्य प्राणी माना जाता है, और गोगा जी की सांप के काटने को नियंत्रित करने और ठीक करने की क्षमता स्थानीय परंपराओं में उनके महत्व को मजबूत करती है। भक्त सांप से संबंधित खतरों से बचने के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं। सांस्कृतिक उत्सव गोगा नवमी धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित नहीं है; इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम भी शामिल हैं। लोक संगीत, नृत्य और प्रदर्शन गोगा जी के जीवन और किंवदंतियों को दर्शाते हैं, जो उत्सव में एक जीवंत सांस्कृतिक आयाम जोड़ते हैं। श्रीकृष्ण की 16108 पत्नियाँ क्यों थीं?’इसके पीछे की सच्ची कहानी भक्तिपूर्ण प्रसाद भक्त गोगा जी की मूर्ति या चित्र पर दूध, मिठाई और बेसन चढ़ाते हैं। अनुष्ठानिक चढ़ावे श्रद्धा का प्रतीक हैं और सुरक्षा, कल्याण और बीमारियों के निवारण के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं। आध्यात्मिक महत्व गोगा नवमी उस वीरता और करुणा की याद के रूप में आध्यात्मिक महत्व रखती है जो गोगा जी के चरित्र के केंद्र में हैं। यह व्यक्तियों को बहादुरी, निस्वार्थता और मानवता की सेवा के गुणों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। पूजा विधान इस दिन दीवार पर गेरू से पोतकर दूध में कोयला पीसकर चाकोर घर बनाकर उसमें पांच सर्व बनाते हैं। इसके बाद इन सर्पों पर जल, कच्चा दूध, रोली-चावल, बाजरा, आटा, घी, चीनी मिलाकर चढ़ाना चाहिए और पण्डित को दक्षिणा देनी चाहिए। गुगा मारी मंदिरों में इस दिन विभिन्न पूजाओं और जुलूसों का आयोजन किया जाता है। गोगा नवमी पर, हिंदू भक्त किसी भी चोट या नुकसान से सुरक्षा के आश्वासन के रूप में भगवान गोगा को राखी या रक्षा स्तोत्र भी बांधते हैं। इस व्रत के करने से स्त्रियाँ सौभाग्यवती होती हैं। पति की विपत्तियों से रक्षा होती है और मनोकामना पूरी होती है। बहने भाइयों को टीका लगाती हैं तथा मिठाई खिलाती हैं। बदेल में भाई यथाशक्ति बहनों को रुपया देते हैं। गोगा नवमी क्या है और गोगा जी कौन हैं? गोगा नवमी एक हिंदू त्योहार है जो योद्धा-संत गोगा जी की याद में मनाया जाता है, जिन्हें गुग्गा जी या जाहर वीर गोगा के नाम से भी जाना जाता है। गोगा जी को उनकी बहादुरी, करुणा और लोगों को सांप के काटने और बीमारियों से बचाने की पौराणिक क्षमता के लिए सम्मानित किया जाता है। गोगा नवमी कब मनाई जाती है और इसमें क्या अनुष्ठान शामिल हैं? गोगा नवमी हिंदू माह भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) के शुक्ल पक्ष (शुक्ल पक्ष) के नौवें दिन (नवमी) को मनाई जाती है। भक्त गोगा जी के मंदिरों में इकट्ठा होते हैं, पूजा-अर्चना, फूल और भोजन चढ़ाते हैं। वे गोगा जी के भजन भी सुनाते हैं और उनके पौराणिक कार्यों को दोहराते हैं। गोगा नवमी के दौरान किस प्रकार का प्रसाद चढ़ाया जाता है? भक्त गोगा जी की मूर्ति या चित्र पर दूध, मिठाई और बेसन चढ़ाते हैं। ये प्रसाद श्रद्धा का प्रतीक हैं और सुरक्षा, कल्याण और बीमारियों के निवारण के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं।

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जन्माष्टमी पूजा के बाद जरूर पढ़ें श्री कृष्ण की जन्म कथा, सभी मनोकामनाएं होंगी पूरी

देशभर में कृष्ण जन्मोत्सव की तैयारियां जोरो-शोरों से शुरू हो गई हैं। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस साल जनमाष्टमी तिथि की शुरुआत 6 सिंतबर को दोपहर 3 बजकर 37 मिनट से शुरू होगी और 7 सिंतबर को शाम 4 बजकर 14 मिनट पर समाप्त होगी। लेकिन जन्माष्टमी को लेकर लोगों के बीच अभी भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। चलिए जन्माष्टमी पूजन का शुभ मुहूर्त और जन्माष्टमी की कथा जानते हैं। जन्माष्टमी की व्रत कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार, भाद्रपद माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कृष्ण ने माता देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया था। कृष्ण जी का जन्म मथुरा में कंस के कारागार में हुआ था। माता देवकी राजा कंस की बहन थी। कंस को सत्ता का लालच था। उसने अपने पिता राजा उग्रसेन की राजगद्दी छीनकर उन्हें जेल में बंद कर दिया था और स्वंय को मथुरा का राजा घोषित कर दिया था। राजा कंस अपनी बहद देवकी से बहुत प्रेम करते थे। उन्होंने अपनी बहन का विवाह वासुदेव से कराया था, लेकिन जब वह मां देवकी को विदा कर रहा था। तभी एक आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवा पुत्र कंस की मौत का कारण बनेगा। यह सुनकर कंस डर गया, उसने तुरंत अपनी बहन और उनके पति वासुदेव को जेल में बंद कर दिया। उनके आसपास सैनिकों की कड़ी पहरेदारी लगा दी। कंस अपनी मौत के डर से देवकी और वासुदेव की 7 संतानों को मार चुका था। कृष्णजी का जन्म इसके बाद भाद्रपद माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र अंधेरी रात में भगवान कृष्ण ने जानकी के आठवें संतान के रूप में जन्म लिया। श्री कृष्ण के जन्म लेते ही कोठरी प्रकाशमय हो गई। आकाशवाणी हुई कि विष्णुजी ने कृष्ण जी के अवतार में देवकी के कोख में जन्म लिया है उन्हें गोकुल में बाबा नंद के पास छोड़ आएं और उनके घर एक कन्या जन्मी है, उसे मथुरा ला कर कंस को सौंप दें। कान्हा चले गोकुलधाम आकाशवाणी सुनते हैं वासुदेव के हाथों की हथकड़ी खुल गई। सभी पहरेदार सोने लगे। कान्हा ने एक टोकरी में बाल गोपाल को रखकर सिर पर रख लिया और गोकुल की ओर चल पड़े। कान्हा को गोकुलधाम ले जाने में वासुदेव को कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा। यमुना नदी कृष्ण जी के चरणों को स्पर्श करने के लिए उफान पर आ गई, लेकिन चरण स्पर्श के बाद वह फिर से शांत पड़ गई। वह कान्हा को बाबा नंद के पास छोड़ आए और गोकुल से कन्या को लेकर वापस लौट आए। जेल अपने आप बंद हो गया और उनके हाथों में हथकड़ियां लग गई। कन्या की रोने की आवाज सुनते ही सभी पहरेदार उठ गए। कंस बंदीगृह आया। वह कन्या को देवकी और वासुदेव की आठवीं कन्या समझ उसे मारने चला। लेकिन वह आकाश में उड़ गई और फिर से आकाशवाणी हुई कि कंस को मारने वाला अब इस दुनिया में पैदा हो चुका है। भगवान कृष्ण की किस पूजा से कटेंगे आपके कष्ट और पूरी होंगी मनोकामनाएं बाबा नंद और उनकी पत्नी मां यशोदा ने कृष्ण जी का पालन-पोषण किया। राजा कंस ने कृष्ण जी का पता लगाकर उन्हें मारने की खूब कोशिश की। लेकिन कंस की सारी कोशिशें विफल हुई और कृष्ण जी को कोई मार नहीं सका। अंत में श्री कृष्ण ने कंस का वध किया। राजा उग्रसेन को फिर मथुरा की राजगद्दी सौंप दी। इस तरह से जन्माष्टमी की व्रत कथी पूरी हुई।

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