Navratri 2023 Day 8 : चैत्र नवरात्रि आठवां दिन, आज महागौरी की पूजा विधि, भोग, मंत्र इनकी पूजा से लाभ जानें

Navratri 2023 Day 8 Maa Mahagauri : आज नवरात्रि का आठवां दिन है और आज मां दुर्गा की आठवीं शक्ति महागौरी की पूजा की जाएगी। इसके साथ आज रवि योग का भी प्रभाव बना रहेगा। माता महागौरी की विधिवत पूजा अर्चना करने से जीवन का हर कष्ट दूर होता है और माता की कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते हैं चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन कैसे पूजा करें, आरती और मंत्र… चैत्र नवरात्रि अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके हैं और आज मां दुर्गा की आठवीं शक्ति महागौरी की पूजा की जाएगी। नवरात्रि के आठवें दिन की पूजा का विशेष महत्व है, इस दिन कन्या पूजन भी किया जाता है। माता के कुछ भक्त जो पूरे 9 दिन व्रत नहीं रख पाते, वे प्रतिपदा और अष्टमी तिथि को व्रत रखते हैं। देवीभगवत् पुराण में बताया गया है कि आठवें दिन की पूजा मां दुर्गा के मूल भाव को दर्शाता है और महादेव के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में महागौरी ही सदैव विराजमान रहती हैं, इसलिए माता का एक नाम शिवा भी है। महागौरी की पूजा करने से सोमचक्र जागृत हो जाता है और इनकी कृपा मात्र से हर असंभव कार्य पूरा हो जाता है। आइए जानते हैं मां महागौरी का स्वरूप, भोग, आरती और मंत्र.. Navratri 2023 9 Day: नवरात्रि के नौवें दिन ऐसे करें मां सिद्धिदात्री की पूजा, जानें-विधि और महत्व इस तरह पड़ा महागौरी नाम (Maa Mahagauri Ki Katha) देवीभागवत पुराण में बताया गया है कि देवी पार्वती का जन्म राजा हिमालय के यहां हुआ था। माता को मात्र 8 वर्ष की आयु में ही अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का आभास हो गया था। मात्र 8 वर्ष की आयु में ही माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या भी शुरू कर दी थी। इसलिए नवरात्रि की अष्टमी तिथि को महागौरी की पूजा की जाती है। अपनी तपस्या के दौरान माता ने केवल वायु पीकर तप करना शुरू कर दिया था। तपस्या से माता पार्वती को महान गौरव प्राप्त हुआ था इसलिए माता पार्वती का नाम महागौरी पड़ा। मां महागौरी का प्राकट्य (Importance of Maa Mahagauri Puja) तपस्या से माता पार्वती का शरीर काला पड़ गया था। तब भगवान शिव ने तपस्या से प्रसन्न होकर महागौरी से गंगा स्नान के लिए कहा। जिस समय माता पार्वती ने गंगा में डूबकी लगाई तब देवी का एक स्वरूप श्याम वर्ण के साथ प्रकट हुईं, जो कौशिकी के नाम से जानी गईं और एक स्वरूप उज्जवल चंद्र के समान प्रकट हुआ, वह महागौरी कहलाईं। महागौरी अपने भक्तों की हर मुरादों को पूरा करती हैं और उनकी राह में आ रही अड़चनों को दूर करती हैं। मां की कृपा से कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती। ऐसा है मां महागौरी का स्वरूप देवीभागवत पुराण में बताया गया है कि मां महागौरी के सभी वस्त्र और आभूषण सफेद रंग के हैं इसलिए माता को श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है। अपनी तपस्या से इन्होंने गौर वर्ण प्राप्त किया था। उत्पत्ति के समय यह आठ वर्ष की थीं, इसलिए इन्हें नवरात्र के आठवें दिन पूजा जाता है। अपने भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप हैं। यह धन, वैभव और सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं। सांसारिक रूप में इनका स्वरूप बहुत ही उज्जवल कोमल, श्वेतवर्ण और श्वेत वस्त्रधारी है। देवी एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू लिए हुए हैं। वहीं एक हाथ अभय और एक हाथ वरमुद्रा में है। देवी महागौरी को गायन-संगीत प्रिय है और यह सफेद वृषभ यानि बैल पर सवार हैं। चैत्र नवरात्रि अष्टमी तिथि कन्या पूजन (Navratri Ashtami Tithi Kanya Pujan) अष्टमी पर कन्या पूजन का भी विधान है। हालांकि कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं। लेकिन, अष्ठमी के दिन कन्या पूजन करना भी श्रेष्ठ रहता है। कन्याओं की संख्या 9 हो तो अति उत्तम है अन्यथा दो कन्याओं के साथ भी पूजा की जा सकती है। कन्याओं के साथ एक लांगूरा (बटुक भैरव) भी होना चाहिए। कन्याओं को घर पर बुलाकर उनके पैरों को धुलकर कुमकुम का टिका लगाएं और फिर पूजन में कन्याओं को हलवा-चना, सब्जी, पूड़ी आदि चीजें होनी चाहिए और सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिणा भी दें। इसके बाद पूरे परिवार के साथ चरण स्पर्श करें और माता के जयाकरे लगाते हुए कन्याओं को विदा करें। मां महागौरी पूजा विधि (Maa Mahagauri Puja Vidhi) नवरात्रि की अष्टमी तिथि की पूजा भी अन्य तिथियों की तरह ही की जाती है। जिस तरह सप्तमी तिथि को माता की शास्त्रीय विधि से पूजा की गई, उसी तरह अष्टमी तिथि की भी पूजा होगी। इस दिन देसी घी का दीपक जलाते हुए मां के कल्याणकारी मंत्र ओम देवी महागौर्यै नम: मंत्र का जप करें और माता को लाल चुनरी अर्पित करें। इसके बाद रोली, अक्षत, सफेद फूल, नारियल की मिठाई आदि पूजा की चीजें अर्पित करें। अगर आप अग्यारी कर रहे हैं तो रोज की चरह लौंग, बताशे, इलायची, हवन सामग्री आदि चीजें अर्पित करें। इसके बाद कपूर या दीपक से पूरे परिवार के साथ महागौरी की आरती करें और माता के जयाकरे लगाएं। इसके बाद दुर्गा मंत्र, दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती आदि का पाठ करें और शाम के समय में भी पूजा करें। मां महागौरी के मंत्र (Maa Mahagauri Puja Mantra) श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥ या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ महागौरी माता की आरती (Maa Mahagauri Arti जय महागौरी जगत की माया। जया उमा भवानी जय महामाया।। हरिद्वार कनखल के पासा। महागौरी तेरा वहां निवासा।। चंद्रकली और ममता अंबे। जय शक्ति जय जय मां जगदंबे।। भीमा देवी विमला माता। कौशिकी देवी जग विख्याता।। हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा। महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा।। सती ‘सत’ हवन कुंड में था जलाया। उसी धुएं ने रूप काली बनाया।। बना धर्म सिंह जो सवारी में आया। तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया।। तभी मां ने महागौरी नाम पाया। शरण आनेवाले का संकट मिटाया।। शनिवार को तेरी पूजा जो करता। मां बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता।। भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो। महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो।।

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 Navratri 2023 Day 7: माता कालरात्रि की पूजा से आसुरीय प्रभावों से मिलती है मुक्ति, जानें पूजा विधि

 Navratri 2023 Day 7 शारदीय नवरात्र के सातवें दिन माता कालरात्रि की विधिवत पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार माता कालरात्रि सभी सिद्धियों की देवी हैं यही कारण है कि इस दिन इनकी आराधना करने से व्यक्ति को बहुत लाभ मिलता है। Navratri 2023 Day 7: नवरात्र पर्व में मां दुर्गा के सातवें सिद्ध स्वरूप माता कालरात्रि की पूजा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। शारदीय नवरात्र की सप्तमी तिथि के दिन मां दुर्गा के सबसे शक्तिशाली स्वरूप की विधि-विधान से पूजा की जाती हैं। मान्यता है कि आज के दिन माता (Mata Kalratri Puja) की पूजा करने से और मंत्रों का जाप करने से सभी प्रकार के दुःख-दर्द दूर हो जाते हैं। माता कालरात्रि को को सभी सिद्धियों की देवी के रूप में भी जाना जाता है इसलिए इस दिन तंत्र-मंत्र से भी माता की पूजा की जाती है। शास्त्रों में इस बात का भी वर्णन मिलता है कि माता कालरात्रि के मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करने से भूत-बाधाओं से मुक्ति मिलती है और घर से इस प्रकार की नकारात्मक शक्तियां भाग जाती हैं। आइए जानते हैं माता कालरात्रि का स्वरूप, पूजा विधि और ,मंत्र। कैसा है मां कालरात्रि का स्वरूप आपको बता दें कि मां कालरात्रि का रंग रात के समान काला है। मां के चार हाथ है। मां  कालरात्रि के दो हाथों में वज्र और खडग है और उनके अन्य दो हाथ अभय यानि रक्षा और वरदा यानि आशीर्वाद की स्थिति में हैं । मां कालरात्रि के लंबे और खुले बाल हैं। देवी कालरात्रि का वाहन गधा है। बता दें कि देवी कालरात्रि अपने भक्तों को सभी बुराईयों से बचाती हैं और उनपर कृपा करती हैं । नवरात्रि के सातवे दिन उनकी पूजा कि जाती है, क्योंकि वह सभी अंधकारों को नष्ट कर सकती है और दुनिया में शांति लाती है। मां कालरात्रि की पूजा का महत्व  मां कालरात्रि को मां काली भी कहा जाता है । ये देवी दुर्गा का  सातवां अवतार है । शास्त्रों  में इन्हें संकटों और विघ्न को दूर करने वाली देवी माना गया है। आपको बता दे कि नवरात्रि में मां कालरात्रि की पूजा करने से तनाव, अज्ञात भय और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है । इसके साथ ही मां कालरात्रि को शत्रु और दुष्टों का संहार करने वाला भी कहा जाता है। आपको बता दें कि मां कालरात्रि पूर्णता का प्रतीक है वो अपने भक्तों को पूर्णता और खुशी पाने में मदद करती हैं । वो अपने भक्तों को बिना भय के जीवन जीने में मदद करती हैं और उन्हें बुरी शक्तियों और आत्माओं से बचाती हैं। Navratri 2023 Day 8 : चैत्र नवरात्रि आठवां दिन, आज महागौरी की पूजा विधि, भोग, मंत्र इनकी पूजा से लाभ जानें करें इस मंत्र का जाप या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।। पूजा की विधि मां कालरात्रि की पूजा के लिए सुबह 6 बजे का समय उत्तम माना जाता है।  इस दिन सुबह जल्दी स्नान करके मां की पूजा के लिए लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए।  इसके बाद मां के सामने दीप जलाएं। अब फल-फूल, मिठाई आदि से विधिपूर्वक मां कालरात्रि की आराधना करें। पूजा के समय मंत्रों का जाप करना चाहिए उसके बाद आरती करनी चाहिए। मां कालरात्रि के इन मंत्रों का उच्चारण करें। ‘ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। ‘दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते।  इस दिन काली चालीसा, सिद्धकुंजिका स्तोत्र, अर्गला स्तोत्रम आदि चीजों का पाठ करना चाहिए।  इन सब के साथ नवरात्रि के सातवें दिन रात्रि में तिल के तेल या सरसों के तेल की अखंण्ड ज्योत जलाएं। माता कालरात्रि की आरती (Mata Kalratri Aarti) कालरात्रि जय-जय-महाकाली । काल के मुह से बचाने वाली ।। दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा । महाचंडी तेरा अवतार ।। पृथ्वी और आकाश पे सारा । महाकाली है तेरा पसारा ।। खड्ग-खप्पर रखने वाली । दुष्टों का लहू चखने वाली ।। कलकत्ता स्थान तुम्हारा । सब जगह देखूं तेरा नजारा ।। सभी देवता सब नर-नारी । गावें स्तुति सभी तुम्हारी ।। रक्तदंता और अन्नपूर्णा । कृपा करे तो कोई भी दुःख ना ।। ना कोई चिंता रहे बीमारी । ना कोई गम ना संकट भारी ।। उस पर कभी कष्ट ना आवें । महाकाली मां जिसे बचाबे ।। तू भी भक्त प्रेम से कह । कालरात्रि मां तेरी जय ।।

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Navratri 2023 Day 6: माता कात्यायनी की पूजा से हो जाते हैं सभी दुःख दूर, जानें पूजा विधि और मंत्र

नवरात्र महापर्व के छठे दिन मां दुर्गा के सिद्ध स्वरूप माता कात्यायनी की पूजा का विधान है। इस दिन माता के प्रिय रंग पसंदीदा भोग और मंत्रों को जानना बहुत आवश्यक होता है।  माता कात्यायनी को भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्री के रूप में भी जाना जाता है। माता कात्यायनी (Navratri 2023 Day 6 Puja) का रूप सबसे सुंदर है और  बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में इन्हें छठ मैया के रूप में भी जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार नवरात्र के छठे दिन माता कात्यायनी की विधि-विधान से भक्तों को विशेष लाभ प्राप्त होता है। जानिए माता कात्यायनी का स्वरूप, पूजा विधि, पूजा मंत्र और आरती- मां कात्यायनी का स्वरूप शास्त्रों के अनुसार माता का स्वरूप स्वर्ण के समान चमकीला है और उनकी चार भुजाएं हैं। प्रत्येक भुजा में माता ने तलवार, कमल, अभय मुद्रा और वर मुद्रा धारण किया है। माता कात्यायनी को लाल रंग सर्वाधिक पसंद है। किंवदंतियों के अनुसार महर्षि कात्यायन की तपस्या के बाद माता कात्यायनी ने उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया था। मां दुर्गा इन्हीं के रूप में महिषासुर का वध कर उसके आतंक से देव और मनुष्यों को भय मुक्त किया था। मां कात्यायनी पूजा विधि (Maa Katyayani Puja Vidhi) नवरात्रि पर्व के छठे दिन सबसे पहले स्नान-ध्यान के बाद कलश पूजा करें और इसके बाद मां दुर्गा की और माता कात्यायनी की पूजा करें। पूजा प्रारंभ करने से पहले मां को स्मरण करें और हाथ में फूल लेकर संकल्प जरूर लें। इसके बाद वह फूल मां को अर्पित करें। फिर कुमकुम, अक्षत, फूल आदि और सोलह श्रृंगार माता को अर्पित करें। उसके बाद उनके प्रिय भोग शहद को अर्पित करें और मिठाई इत्यादि का भी भोग लगाएं। फिर जल अर्पित करें और घी के दीपक जलाकर माता की आरती करें। आरती से पहले दुर्गा चालीसा व दुर्गा सप्तशती का पाठ करना ना भूले। करें इन मंत्रों का जाप (Maa Katyayani Mantra) 1. या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।। 2. चंद्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवर वाहना । कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानवघातिनि ।। माता कात्यायनी की आरती (Maa Katyayani Aarti) जय जय अम्बे, जय कात्यायनी। जय जग माता, जग की महारानी। बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहां वरदाती नाम पुकारा। कई नाम हैं, कई धाम हैं। यह स्थान भी तो सुखधाम है। हर मंदिर में जोत तुम्हारी। कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी। हर जगह उत्सव होते रहते। हर मंदिर में भक्त हैं कहते। कात्यायनी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की। झूठे मोह से छुड़ाने वाली। अपना नाम जपाने वाली। बृहस्पतिवार को पूजा करियो। ध्यान कात्यायनी का धरियो। हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी। जो भी मां को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे।

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Navratri 2023 Day 5: स्कंदमाता की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजन विधि, मंत्र और भोग

नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। माना जाता है कि स्कंदमाता संतान देने के साथ सभी इच्छाएं पूरी करती हैं। जानिए मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप की कैसे करें पूजा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन के साथ शारदीय नवरात्र का पांचवा दिन है। नवरात्र के पांचवें दिन मां दुर्गा के स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है। माना जाता है कि स्कंदमाता की विधिवत पूजा करने से सुख-समृद्धि के साथ-साथ संतान प्राप्ति होती है। जानिए नवरात्र के पांचवें दिन कैसे करें स्कंदमाता की पूजा, साथ ही जानिए शुभ मुहूर्त, भोग और मंत्र। Navratri 2023 Day 6: माता कात्यायनी की पूजा से हो जाते हैं सभी दुःख दूर, जानें पूजा विधि और मंत्र कैसा है मां स्कंदमाता का स्वरूप स्कंदमाता की स्वरूप काफी प्यारा है। मां दुर्गा की स्वरूप स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, जिसमें दो हाथों में कमल लिए हैं, एक हाथ में कार्तिकेय बाल रूप में बैठे हुए हैं और एक अन्य हाथ में मां आशीर्वाद देते हुए नजर आ रही हैं। बता दें कि मां का वाहन सिंह है, लेकिन वह इस रूप में कमल में विराजमान है। स्कंदमाता का पूजा विधि नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा की पूजा करने से पहले कलश की पूजा करें। इसके बाद मां दुर्गा और उनके स्वरूप की पूजा आरंभ करें। सबसे पहले जल से आचमन करें। इसके बाद मां को फूल, माला चढ़ाएं। इसके बाद सिंदूर, कुमकुम, अक्षत आदि लगाएं। फिर एक पान में सुपारी, इलायची, बताशा और लौंग रखकर चढ़ा दें। इसके बाद मां स्कंदमाता को भोग में फल में केला और इसके अलावा मिठाई चढ़ा दें। इसके बाद जल अर्पित कर दें। इसके बाद घी का दीपक, धूप जलाकर मां के मंत्र का जाप करें। इसके बाद दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और अंत में दुर्गा मां के साथ स्कंदमाता की आरती करें। मां स्कंदमाता का मंत्र (Maa Skandmata Mantra) ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम: या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:। सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।। मां स्कंदमाता के उपाय (Maa Skandmata Upay) संतान प्राप्ति की कामना के लिए एक चुनरी में नारियल बांध लें और “नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भ सम्भवा. ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी”. ये मंत्र बोलते हुए देवी को नारियल और चुनरी को देवी स्कंदमाता का ध्यान करते हुए माता के चरणों में चढ़ाएं. इसके बाद इसे शयनकक्ष में सिरहाने पर रखें. मान्यता है कि स्कंदमाता की पूजा से संतान की प्राप्ति में आ रही बाधाओं का अंत होता है.

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Navratri 2023 Day 4: नवरात्र में चौथे दिन होती है मां कूष्‍मांडा की पूजा, जानें पूजाविधि, भोग और मंत्र

Navratri 2023 Day 4 Maa Kushmanda Puja Vidhi : आज चैत्र नवरात्र का चौथा दिन है और आज मां कूष्‍मांडा की पूजा होगी। कूष्‍मांडा देवी को आदिशक्ति मां का अवतार माना गया है। मान्‍यता है कि मां कूष्‍मांडा की पूजा करने से आपकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। Navratri 2023 Day 4 : नवरात्रि के चौथे दिन देवी के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा होती है। देवी कूष्मांडा आदिशक्ति का वह स्वरूप है जिनकी मंद मुस्कान से इस सृष्टि ने सांस लेना आरंभ किया, यानी इस सृष्टि का आरंभ किया। देवी कूष्मांडा का निवास स्थान सूर्यमंडल के बीच में माना जाता है। देवी का तेज ही इस संसार को तेज बल और प्रकाश प्रदान करता है। देवी कूष्मांडा मूल प्रकृति और आदिशक्ति हैं। जब सृष्टि में चारों तरफ अंधकार फैला था। उस समय देवी ने जगत की उत्पत्ति की इच्छा से मंद मुस्कान किया इस सृष्टि में अंधकार का नाश और सृष्टि में प्रकाश फैल गया। कहते हैं कि देवी के इस तेजोमय रूप की जो भक्त श्रद्धा भाव से भक्ति करते हैं और नवरात्रि के चौथे दिन इनका ध्यान करते हुए पूजन करते हैं उनके लिए इस संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता है। माता अपने भक्त की हर चाहत को पूरी करती हैं और भोग एवं मोक्ष प्रदान करती हैं। मां कूष्मांडा का स्वरूप और शक्ति इस दिन उपासक का मन अनाहत चक्र में उपस्थित रहता है जो हृदय के मध्य स्थित होता है। इस देवी की उपासना के लिए भक्तों को हल्के नीले रंग के वस्त्रों को धारण करना चाहिए। जो इस चक्र को जागृत करने में सहायक होता है। मां कूष्मांडा के स्वरूप के बारे में कहा जाता है कि यह अष्ट भुजाओं वाली देवी हैं। इनकी भुजाओं में बाण, चक्र, गदा, अमृत कलश, कमल और कमंडल शोभा पाते हैं। वहीं दूसरी भुजा में वह सिद्धियों और निधियों से युक्‍त माला धारण करती हैं। मां कूष्‍मांडा की सवारी सिंह है। Navratri 2023 Day 5: स्कंदमाता की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजन विधि, मंत्र और भोग देवी कूष्मांडा का ध्यान मंत्र देवी कूष्मांडा का ध्यान करते हुए भक्तों को बोलना चाहिए – या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ जबकि देवी की पूजा में समस्त वस्तु, ओम देवी कूष्माण्डायै नमः॥ नाम से अर्पित करना चाहिए। मां कूष्मांडा की पूजा विधि भक्तों को चाहिए कि सुबह स्‍नानादि से निवृत्त होकर देवी कूष्मांडा का ध्यान करे। इसके बाद दुर्गा के कूष्‍मांडा रूप की पूजा करें। पूजा में मां को लाल रंग के पुष्‍प, गुड़हल या गुलाब अर्पित करें। इसके साथ ही सिंदूर, धूप, दीप और नैवेद्य भी माता को चढ़ाएं। माता के इस स्वरूप का ध्यान स्थान अनाहत चक्र है इसलिए देवी की उपासना में अनाहत चक्र के मिलते रंग जो हल्का नील रंग है उसी रंग के वस्त्रों को धारण करे। इससे माता के स्वरूप में ध्यान लगाना आसान होगा। माता कूष्मांडा के लिए भोग और प्रसाद देवी कूष्मांडा को कुम्हरा यानी पेठा प्रिय है। देवी की प्रसन्नता के लए आप सफेद पेठे के बलि दे सकते हैं। इसके साथ ही देवी को मालपुए और दही हलवे का भोग लगाएं। इस तरह आप देवी कूष्मांडा की कृपा का लाभ पा सकते हैं। देवी कूष्मांडा की पूजा के लाभ देवी कूष्मांडा की साधना और पूजा से आरोग्य की प्राप्ति होती है। देवी अपने भक्तों को हर संकट और विपदा से निकालकर सुख वैभव प्रदान करती हैं। साथ ही जो देवी कूष्मांडा की भक्ति करते हैं माता उसके लिए मोक्ष पाने का मार्ग सहज कर देती हैं। माता के भक्तों में तेज और बल का संचार होता है। इन्हें किसी प्रकार का भय नहीं रहता है। इस विधि से मां कूष्मांडा को करें याद सबसे पहले स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद मां कूष्मांडा का ध्यान कर उनको धूप, गंध, अक्षत्, लाल पुष्प, सफेद कुम्हड़ा, फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान अर्पित करें। इसके बाद मां कूष्मांडा को हलवे और दही का भोग लगाएं। आप फिर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकते हैं। मां का अधिक से अधिक ध्यान करें और उनके मंत्रों का जाप करें पूजा के अंत में मां की आरती करें और मन में ऐसा विचार करें कि मां हम पर कृपा बरसाएं।

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Navratri 2023 Day 3:मां चन्द्रघंटा की पूजा क्यों होती है?

मां दुर्गा के नौ रुपों में तीसरा रुप है देवी चन्द्रघंटा का। नवरात्र के तीसरे दिन दुर्गा के इन्हीं चन्द्रघंटा रुप की पूजा की जाती है। माता का यह रुप लोक परलोक के कष्टों से मुक्ति प्रदान करने वाला है। चन्द्रघंटा रुप में माता पहली बार आदिशक्ति की भांति दस हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए नजर आती हैं। माता के हाथों में कमल, शंख, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल, गदा है। माता के कंठ में सफेद फूल की माला है। माना जाता है कि माता के इस रुप की आराधना करने से मन को असीम शांति मिलती है और भय का नाश होता है। माता का यह रुप अहंकार, लोभ से मुक्ति प्रदान करता है। Navratri 2023 Day 4: नवरात्र में चौथे दिन होती है मां कूष्‍मांडा की पूजा, जानें पूजाविधि, भोग और मंत्र मां का नाम चंद्रघंटा क्यों है? मां दुर्गा का तीसरा रुप चन्द्रघंटा कहलाता है, इसका कारण यह है कि माता के सिर पर रत्नजड़ित मुकुट है। इस मुकुट में अर्ध चंद्रमा मंदिर के घंटे के आकार में सुशोभित हो रहा जिसके कारण यह देवी चन्द्रघंटा कहलाती है। मां चन्द्रघंटा के सिर पर स्थित चन्द्रमा भक्तों और संतों के मन को शांति और शीतलता प्रदान करने वाला है।चंद्रघंटा माता का ध्यान मंत्रवन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥ मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥ प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥ तीसरे दिन मां चन्द्रघंटा की पूजा क्यों? नवरात्र के तीसरे दिन मां चन्द्रघंटा की पूजा होती है। इसका कारण यह है कि माता का पहला रुप और दूसरा रुप भगवान शिव को पाने के लिए है। जब माता भगवान शिव को पति रुप में प्राप्त कर लेती हैं तब वह अपने आदिशक्ति रुप में आ जाती हैं। इसलिए माता लाल वस्त्रों में शोभा पा रही हैं। माता के सिर पर रत्नजड़ित मुकुट है। देवी पार्वती के जीवन की तीसरी बड़ी घटना है मां को उनका प्रिय वाहन बाघ प्राप्त होना। इसलिए इस रुप में माता बाघ पर सवार हैं और अपने आदिशक्ति रुप में भक्तों को दर्शन दे रही हैं। नवरात्र के तीसरे दिन कुण्डली साधना करने वाले साधक अपना मन मणिपूरक चक्र में स्थित करने का प्रयास करते हैं। देवी चंद्रघंटा की पंचोपचार सहित पूजा करने से भक्तों को अपने प्रयास में आसानी से सफलता मिलती है। मां चंद्रघंटा की पूजा का महत्वहिंदू शास्त्रों के अनुसार मां चंद्रघंटा के दस हाथ हैं. इनके चार हाथों में कमल का फूल, धनुष, माला और तीर हैं. पांचवें हाथ में अभय मुद्रा है. जबकि अन्य चार हाथों में त्रिशूल, गदा, कमंडल और तलवार है. दसवां हाथ वरद मुद्रा में रहता है. मां चंद्राघंटा भक्तों का कल्याण करती हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं. मां चंद्रघंटा का विशेष भोगमान्यता है कि मां चंद्रघंटा की पूजा में विशेष प्रकार का भोगा चढ़ाया जाता है. मां को मीठी खीर बेहद प्रिय है और इस दिन पूजा में गाय के दूध से बनी खीर का भोग लगाएं. इससे मां प्रसन्न होंगी और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाएंगी. यह भी कहा जाता है​ कि यदि इस दिन कन्याओं को खीर, हलवा या मिठाई ​खिलाई जाए तो मां प्रसन्न होती हैं.

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Navratri 2023 Day 2: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, आरती, भोग और व्रत कथा

पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने के बाद, हम नवरात्रि 2023 (द्वितीया तिथि) के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं. इसलिए, आइए मां ब्रह्मचारिणी पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, भोग और आरती के बोलों पर एक नजर डालते हैं. मां ब्रह्मचारिणी से जुड़े रोचक तथ्य  मां ब्रह्मचारिणी ने राजा हिमालय के घर जन्म लिया था. नारदजी की सलाह पर उन्होंने कठोर तप किया, ताकि वे भगवान शिव को पति स्वरूप में प्राप्त कर सकें. कठोर तप के कारण उनका ब्रह्मचारिणी या तपश्चारिणी नाम पड़ा. भगवान शिव की आराधना के दौरान उन्होंने 1000 वर्ष तक केवल फल-फूल खाए तथा 100 वर्ष तक शाक खाकर जीवित रहीं. ब्रह्मचारिणी इस लोक के समस्त चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता हैं। इनका स्वरूप श्वेत वस्त्र में लिपटी हुई कन्या के रूप में है, जिनके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे में कमंडल है। यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रह्मचारिणी नामक दुर्गा शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त हैं.  Navratri 2023 Day 3:मां चन्द्रघंटा की पूजा क्यों होती है? मां ब्रह्मचारिणी की पुजा विधि नवरात्रि के दूसरे दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान-ध्यान करने के बाद मांं ब्रह्मचारिणी की फोटो को चौकी में रखकर गंगाजल छिड़ककर स्नान कराएं और उसके बाद देवी को वस्त्र, पुष्प, फल, आदि अर्पित करें. देवी की पूजा में आज विशेष रूप से सिन्दूर और लाल पुष्प जरूर अर्पित करें. मान्यता है कि नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में केसर की खीर, हलवा या फिर चीनी का भोग लगाने पर शीघ्र ही देवी कृपा प्राप्त होती है और साधक को सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं. मां ब्रह्मचारिणी का पसंदीदा रंग  ऐसा माना जाता है कि देवी ब्रह्मचारिणी को लाल रंग पसंद है, जिसे आमतौर पर इस दिन के भक्तों द्वारा सजाया जाता है। इसे प्यार और समृद्धि का रंग माना जाता है.  मां ब्रह्मचारिणी के लिए भोग और मंत्र  मां ब्रह्मचारिणी के भोग के लिए पंचामृत अर्पित कर सकते हैं । फिर फल, एक पूरा नारियल, केला, पान और सुपारी, हल्दी और कुमकुम चढ़ाएं। आरती गाकर ब्रह्मचारिणी पूजा का समापन करें और कपूर जलाकर देवी को प्रणाम करें या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥  मां ब्रह्मचारिणी की आरती  जय अम्बे ब्रह्मचारिणी माता,  जय चतुरानन प्रिया सुख दाता।  ब्रह्मा जी के मन भाते हो,  ज्ञान सभी को सिखाते हो।  ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा,  जिसको जपे सकल संसार।  जय गायत्री वेद की माता,  जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।  कमी कोई रहाणे न पाए,  कोई भी दुख सहने ना पाए।  मां दुर्गा मंत्र  सर्व मंगला मंगल्ये, शिव सर्वार्थ साधिका   शरण्ये त्रयम्बके गौरी, नारायणी नमोस्तुते   सर्व स्वरूपे सर्वेशे, सर्व शक्ति समन्वयते   भये भ्यस्त्राही नो देवी, दुर्गे देवी नमोस्तुते   एतत्ते वदनं सौम्यं लोचना त्रयभुषितम्   पातु नः सर्वभितिभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते   ज्वाला करला मत्युग्राम शेषासुर सुदानम्   त्रिशूलं पातु नो भितर भद्रकाली नमोस्तुते   या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थितः   नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः   

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Navratri 2023 Day 1: मां शैलपुत्री की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, आरती, भोग और पापन व्रत कथा

Navratri 2023 First Day Puja नवरात्रि के 9 दिन मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा होती है. नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है. मां शैलपुत्री हिमालयराज की पुत्री हैं. मां दुर्गा के 9 स्वरूप व्यक्ति को जीवन जीने की सीख देते हैं. शैल का अर्थ होता है पत्थर या पहाड़. पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा इसलिए की जाती है, ताकि व्यक्ति जीवन में मां शैलपुत्री के नाम की तरह स्थिरता बनी रहे. अपने लक्ष्य को पाने के लिए जीवन में अडिग रहना जरूरी है, जो कि हमें मां शैलपुत्री की पूजा से मिलता है.  बता दें कि नवरात्रि के दिन कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. इस दिन स्थापना के बाद दुर्गासप्तशती का पाठ किया जाता है. धार्मिक शास्त्रों के अनुसार कलश को भगवान गणेश का स्वरूप माना गया है. जैसे किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी से होती है वैसे ही पूजा में कलश पूजा से ही शुरुआत होती है. नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री की ये कथा श्रवण करने या सुनने से  घर में सुख-समृद्धि आती है और मां शैलपुत्री का आशीर्वाद प्राप्त होता है.  माता शैलपुत्री की पूजा सामग्री एक छोटी चुनरी, एक बड़ी चुनरी, कलावा, चौकी, कलश, कुमकुम, पान, सुपारी, कपूर, जौ, नारियल, लौंग. बताशे, आम के पत्ते, केले का फल, देसी घी, धूप, दीपक, अगरबत्ती, माचिस. मिट्टी का बर्तन, माता का श्रृंगार का सामान, देवी की प्रतिमा या फोटो, फूलों की माला. गोबर का उपला, सूखे मेवा, मावे की मिठाई, लाल फूल, एक कटोरी गंगाजल और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा स्तुति आदि का पाठ जरूर करें. Navratri 2023 Mata Shailputri puja vidhi नवरात्रों की शुरुआत कलश स्थापना और 9 दिन जलने वाली अखंड ज्योति से होती है. वहीं पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है. नवरात्रि का पहला दिन माता शैलपुत्री को समर्पित है. इस दिन न केवल हवन और पूजा होती है बल्कि शैलपुत्री से जुड़ी कथा सुननी भी जरूरी होती है. ऐसे में शैलपुत्री की कथा के बारे में पता होना जरूरी है. आज का हमारा लेख शैलपुत्री की कथा पर ही है. आज हम आपको अपने लेख के माध्यम से बताएंगे कि पूजा विधि और शैलपुत्री की कथा पढ़ते हैं आगे… Navratri 2023 Day 2: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, आरती, भोग और व्रत कथा मां शैलपुत्री कथा Navratri Maa Shailputri Katha ज्योतिष अनुसार मां शैलपुत्री का वाहन वृषभ (बैल) है. हिमालयराज पर्वत की बेटी मां शैलपुत्री हैं. आइए जानें इनके पीछे की कथा के बारे में. एक बार प्रजापति दक्ष (सती के पिता) ने यज्ञ के दौरान भगवान शिव और सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया था. लेकिन सती बिना बुलाए ही यज्ञ में जाने को तैयार थीं. लेकिन भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि ऐसे बिना बुलाए जाना सही नहीं. लेकिन सती नहीं मानी. ऐसे में सती की जिद्द के आगे भगवान शिव ने उन्हें जाने की इजाजत दे दी.  पिता के यहां यज्ञ में सती बिना निमंत्रण पहुंच गई. सती के साथ वहां बुरा व्यवहार किया गया . वहां सती ने अपनी माता के अलावा किसी से सही से बात नहीं की. इतना ही नहीं, सती की बहनें भी यज्ञ में उनका उपहास उड़ाती रहीं. ऐसा कठोर व्यवहार  और पति का अपमान सती बर्दाश नहीं कर पाईं और क्रोधित उन्होंने खुद को यज्ञ में भस्म कर दिया. भगवान शिव को जैसे ही ये समाचार मिला उन्होंने अपने गणों को दक्ष के यहां भेजा यज्ञ विध्वंस करा दिया. शास्त्रों के अनुसार अगले जन्म में सती ने हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और इनका नाम शैलपुत्री रखा गया. अतः नवरात्रि के पहले मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. 

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14 October 2023 Aaj Ka Panchang आज का पंचांग

🌞~ आज का हिन्दू पंचांग ~🌞⛅दिनांक – 14 अक्टूबर 2023⛅दिन – शनिवार⛅विक्रम संवत् – 2080⛅शक संवत् – 1945⛅अयन – दक्षिणायन⛅ऋतु – शरद⛅मास – आश्विन⛅पक्ष – कृष्ण⛅तिथि – अमावस्या रात्रि 11:24 तक तत्पश्चात प्रतिपदा⛅नक्षत्र – हस्त शाम 04:24 तक तत्पश्चात चित्रा⛅योग – इन्द्र सुबह 10:25 तक तत्पश्चात वैधृति⛅राहु काल – सुबह 09:31 से 10:58 तक⛅सूर्योदय – 06:36⛅सूर्यास्त – 06:15⛅दिशा शूल – पूर्व दिशा में⛅ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:57 से 05:46 तक⛅निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:01 से 12:50 तक⛅व्रत पर्व विवरण – आश्विन अमावस्या, सर्वपित्री अमावस्या का श्राद्ध, महालय समाप्त, अज्ञात तिथिवालों का श्राद्ध⛅विशेष – अमावस्या के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38) 🔹सर्वपित्री अमावस्या : 14 अक्टूबर 2023🔹 🔸जो जाने-अनजाने रह गये हों, जिनके मरण की तिथि का पता न हो उन सभीका श्राद्ध सर्वपित्री अमावस्या को होता है । 🔸अमावस्या के दिन पितृगण वायुरूप में घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं । जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तब तक वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं । सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं । अतः अमावस्या के दिन प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए । – गरुड़ पुराण 🔹आश्विन अमावस्या🔹 🔸13 अक्टूबर रात्रि 09:50 से 14 अक्टूबर रात्रि 11:24 तक अमावस्या । 🔹नकारात्मक ऊर्जा मिटाने के लिए🔹 🔹घर में हर अमावस्या अथवा हर १५ दिन में पानी में खड़ा नमक (१ लीटर पानी में ५० ग्राम खड़ा नमक) डालकर पोछा लगायें । इससे नेगेटिव एनर्जी चली जाएगी । अथवा खड़ा नमक के स्थान पर गौझरण अर्क भी डाल सकते हैं । 🔹अमावस्या विशेष🔹 🌹1. जो व्यक्ति अमावस्या को दूसरे का अन्न खाता है उसका महीने भर का किया हुआ पुण्य दूसरे को (अन्नदाता को) मिल जाता है ।(स्कंद पुराण, प्रभास खं. 207.11.13) 🌹2. अमावस्या के दिन पेड़-पौधों से फूल-पत्ते, तिनके आदि नहीं तोड़ने चाहिए, इससे ब्रह्महत्या का पाप लगता है ! (विष्णु पुराण) 🌹4. अमावस्या के दिन श्रीमद्भगवद्गीता का सातवाँ अध्याय पढ़ें और उस पाठ का पुण्य अपने पितरों को अर्पण करें । सूर्य को अर्घ्य दें और प्रार्थना करें । आज जो मैंने पाठ किया मेरे घर में जो गुजर गए हैं, उनको उसका पुण्य मिल जाए । इससे उनका आर्शीवाद हमें मिलेगा और घर में सुख-सम्पत्ति बढ़ेगी । 🔹गरीबी भगाने का शास्त्रीय उपाय🔹 🌹गरीबी है, बरकत नहीं है, बेरोजगारी ने गला घोंटा है तो फिक्र न करो । हर अमावस्या को घर में एक छोटा सा आहुति प्रयोग करें । 🔹सामग्री : १. काले तिल २. जौ ३. चावल ४. गाय का घी ५. चंदन पाउडर ६. गूगल ७. गुड़ ८. देशी कपूर एवं गौ चंदन या कण्डा । 🌹विधि: गौ चंदन या कण्डे को किसी बर्तन में डालकर हवन कुण्ड बना लें, फिर उपरोक्त ८ वस्तुओं के मिश्रण से तैयार सामग्री से, घर के सभी सदस्य एकत्रित होकर नीचे दिये गये मंत्रों से ५ आहुति दें ।आहुति मंत्र🌹 १. ॐ कुल देवताभ्यो नमः🌹 २. ॐ ग्राम देवताभ्यो नमः🌹 ३. ॐ ग्रह देवताभ्यो नमः🌹 ४. ॐ लक्ष्मीपति देवताभ्यो नमः🌹 ५. ॐ विघ्नविनाशक देवताभ्यो नमः 🌹इस प्रयोग से थोड़े ही दिनों में स्वास्थ्य, समृद्धि और मन की प्रसन्नता दिखायी देगी । 🔹सूर्यग्रहण : 14 अक्टूबर 2023🔹 🔸भारतीय समय अनुसार, सूर्य ग्रहण रात में 8:34 मिनट से आरंभ होगा और मध्य रात्रि 2:25 मिनट तक रहेगा । 🔸यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा । 🔸सूर्यग्रहण दक्षिण अमेरिका के क्षेत्रों को छोड़कर उत्तर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटिश, वर्जिन, आइलैंड, ग्वाटेमाला, मैक्सिको, अर्जेटीना, कोलंबिया, क्यूबा, बारबाडोस, पेरु, उरुग्वे, एंटीगुआ, वेनेजुएला, जमैका, हैती, पराग्वे, ब्राजील, डोमिनिका, बहामास, आदि जगहों पर दिखाई देगा । 🔹जहाँ पर सूर्यग्रहण दिखेगा वहाँ सूतक माना जायेगा । 🌞🚩🚩 ” ll जय श्री राम ll ” 🚩🚩🌞 14 October 2023 Aaj Ka Panchang English me 🌞~Today’s Hindu Almanac~🌞⛅Date – 14 October 2023⛅Day – Saturday⛅Vikram Samvat – 2080⛅Shaka Samvat – 1945⛅Ayan – Dakshinayan⛅Season – Autumn⛅Month – Ashwin⛅ Side – Krishna⛅ Date – Amavasya till 11:24 pm and then Pratipada⛅Nakshatra – Hasta till 04:24 pm and then Chitra⛅Yoga – Indra till 10:25 in the morning and then Vaidhriti⛅Rahu Kaal – 09:31 to 10:58 in the morning⛅Sunrise – 06:36⛅Sunset – 06:15⛅Disha Shool – East direction⛅Brahmamuhurta – 04:57 to 05:46 in the morning⛅ Nishita Muhurta – 12:01 to 12:50 in the night⛅Vrat festival details – Ashwin Amavasya, Shraddha of Sarvapitri Amavasya, Mahalaya ends, Shraddha of unknown dates.⛅ Special – On the day of Amavasya, sexual intercourse with a woman and eating and applying sesame oil are prohibited. (Brahmavaivarta Purana, Brahma Khand: 27.29-38) 🔹Sarvapitri Amavasya: 14 October 2023🔹 🔸Shraddha of all those who are left behind knowingly or unknowingly, whose date of death is not known, is performed on Sarvapitri Amavasya. 🔸 On the day of Amavasya, the ancestors are present at the door of the house in the form of air and wish for Shraddha from their relatives. They stand there, distraught with hunger and thirst, until the sun sets. After the sunset, they become dejected and go to their respective worlds with a sad heart. Therefore, Shraddha must be performed with effort on the day of Amavasya. – Garuda Purana 🔹Ashwin Amavasya🔹 🔸Amavasya from 09:50 pm on 13th October to 11:24 pm on 14th October. 🔹To remove negative energy🔹 🔹 Mop the house every Amavasya or every 15 days by adding standing salt in water (50 grams of standing salt in 1 liter of water). This will remove negative energy. Or you can also add cowdung extract instead of salt. 🔹Amavasya special🔹 🌹1. The person who eats someone else’s food on Amavasya, his good deeds done during the month are passed on to the other person (the food giver).(Skanda Purana, Prabhas Volume 207.11.13) 🌹2. On the day of Amavasya, flowers, leaves, straws etc. should not be plucked from trees, this leads to the sin of Brahmahatya. (Vishnu Purana) 🌹4. On the day of Amavasya, read the seventh chapter of Shrimadbhagvadgita and offer the virtue of that chapter to your ancestors. Offer water to the Sun and pray. May those who have

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नवरात्रि के 9 दिन का महत्व (Shardiya Navratri Importance)

नवरात्रि हिंदू धर्म में मनाए जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह नौ दिनों का त्योहार देवी दुर्गा की पूजा के लिए समर्पित है। नवरात्रि के नौ दिनों का प्रत्येक दिन एक विशेष महत्व रखता है। Shardiya Navratri पहला दिन: शैलपुत्री नवरात्रि का पहला दिन शैलपुत्री को समर्पित है। शैलपुत्री देवी दुर्गा का पहला रूप है। उन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना की जाती है। दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी नवरात्रि का दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा का दूसरा रूप है। उन्हें कठोर तपस्या करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है और उनसे मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना की जाती है। तीसरा दिन: चंद्रघंटा नवरात्रि का तीसरा दिन चंद्रघंटा को समर्पित है। चंद्रघंटा देवी दुर्गा का तीसरा रूप है। उनके माथे पर चंद्रमा होने के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इस दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है और उनसे बुरी शक्तियों से रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। चौथा दिन: कुष्मांडा नवरात्रि का चौथा दिन कुष्मांडा को समर्पित है। कुष्मांडा देवी दुर्गा का चौथा रूप है। उन्हें अन्नपूर्णा के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन देवी कुष्मांडा की पूजा की जाती है और उनसे सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। पांचवां दिन: स्कंदमाता नवरात्रि का पांचवां दिन स्कंदमाता को समर्पित है। स्कंदमाता देवी दुर्गा का पांचवां रूप है। उन्हें स्कंद की माता के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी स्कंदमाता की पूजा की जाती है और उनसे संतान प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है। छठा दिन: कात्यायनी नवरात्रि का छठा दिन कात्यायनी को समर्पित है। कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा रूप है। उन्हें भगवान शिव की पत्नी के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है और उनसे शक्ति और बुद्धि की प्रार्थना की जाती है। सातवां दिन: कालरात्रि नवरात्रि का सातवां दिन कालरात्रि को समर्पित है। कालरात्रि देवी दुर्गा का सातवां रूप है। उन्हें अंधकार का नाश करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है और उनसे बुरी शक्तियों से रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। आठवां दिन: महागौरी नवरात्रि का आठवां दिन महागौरी को समर्पित है। महागौरी देवी दुर्गा का आठवां रूप है। उन्हें सफेद रंग के कारण महागौरी कहा जाता है। इस दिन देवी महागौरी की पूजा की जाती है और उनसे मोक्ष की प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है। नौवां दिन: सिद्धिदात्री नवरात्रि का नौवां दिन सिद्धिदात्री को समर्पित है। सिद्धिदात्री देवी दुर्गा का नौवां और अंतिम रूप है। उन्हें सभी सिद्धियों की देवी के रूप में जाना जाता है। इस दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है और उनसे सभी मनोकामनाओं की सिद्धि की प्रार्थना की जाती है। नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान, भक्त देवी दुर्गा की पूजा करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों को आध्यात्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इन दिनों में भक्त अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने और देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रयास करते हैं।

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Navratri 2023: शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना के लिए मुहूर्त, जानें सभी तिथियां

Shardiya Navratri 2023 शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म में मनाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह नौ दिनों का त्योहार देवी दुर्गा की पूजा के लिए समर्पित है। नवरात्रि के पहले दिन, कलश स्थापना की जाती है, जो एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। कलश स्थापना के लिए, एक मिट्टी का कलश लिया जाता है और उसे पानी से भर दिया जाता है। कलश के ऊपर आम के पत्ते, सुपारी, सिक्के और एक कलावा (पवित्र धागा) रखा जाता है। कलश के अंदर एक मुट्ठी जौ के बीज भी डाले जाते हैं। कलश को पूर्व या उत्तर दिशा में एक ऊंचे स्थान पर स्थापित किया जाता है। कलश को स्थापित करने से पहले, एक छोटी सी वेदी बनाई जाती है और उस पर देवी दुर्गा के प्रतीक चिन्ह, जैसे कि अष्टदल कमल, त्रिशूल, चक्र और शंख रखे जाते हैं। कलश स्थापना के बाद, देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। पूजा में देवी दुर्गा के मंत्रों का जाप किया जाता है और उन्हें फूल, मिठाई और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। कलश स्थापना का महत्व कलश स्थापना को नवरात्रि के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक माना जाता है। यह अनुष्ठान देवी दुर्गा की उपस्थिति को घर में आमंत्रित करने के लिए किया जाता है। कलश को देवी दुर्गा का प्रतीक माना जाता है, और यह माना जाता है कि कलश में देवी दुर्गा निवास करती हैं। कलश स्थापना के माध्यम से, भक्त देवी दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने की आशा करते हैं। वे नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान देवी दुर्गा की पूजा करके उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। शारदीय नवरात्रि 2023 में कलश स्थापना का मुहूर्त ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्र ने बताया कि पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि को यानी पहले दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त 15 अक्टूबर को 11:44 मिनट से दोपहर 12:30 तक है. ऐसे में कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त इस साल 46 मिनट ही रहेगा. कलश स्थापना की विधि कलश स्थापना की विधि इस प्रकार है: कलश स्थापना के बाद, आपको रोजाना कलश की पूजा करनी चाहिए। कलश की पूजा करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है। कलश स्थापना के लिए सामग्री कलश स्थापना के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है: कलश स्थापना का मंत्र कलश स्थापना के दौरान निम्नलिखित मंत्र का जाप किया जाता है: ऊँ देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। इस मंत्र का अर्थ है: हे देवी, जो सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हो। तुम्हें नमस्कार है, तुम्हें नमस्कार है, तुम्हें नमस्कार है, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।

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Dussehra 2024: दशहरा पर घर में रावण की अस्थियां लाना क्यों माना जाता है शुभ, जानिए इसके पीछे का कारण

आज दशहरे का पर्व मनाया जा रहा है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी या दशहरा का पर्व मनाया जाता है। सनातन धर्म में यह दिन अधर्म पर धर्म की जीत के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। हर साल लोग रावण का पुतला जलाकर बुराई के प्रतीक को जलाते हैं, लेकिन साथ ही रावण एक महान विद्वान और विद्वान था। रावण के ज्ञान और विद्वता की प्रशंसा स्वयं भगवान श्री राम ने की थी। विजयादशमी की तिथि बहुत ही शुभ मानी जाती है और इस दिन शस्त्र पूजन का भी विधान है। इसके अलावा भी इस तिथि को लेकर कई मान्यताएं हैं, उनमें से एक है रावण के दहन के बाद बची राख को अपने घर ले जाना। यह बहुत ही शुभ माना जाता है। तो आइए जानते हैं कि रावण की राख को घर ले जाना क्यों शुभ माना जाता है और कैसे शुरू हुई यह परंपरा। अधर्म और असत्य पर सत्य और सत्य की जीत के उपलक्ष्य में रावण का पुतला दहन किया जाता है। इस दिन भगवान राम ने लंकापति रावण का वध किया था और माता सीता को रावण से मुक्त कराया था। हर साल नवरात्रि से लेकर दशहरा तक देश के अलग-अलग हिस्सों में रावण के अंत को याद करने के लिए रामलीला का मंचन किया जाता है और दशहरे पर रावण दहन का त्योहार मनाया जाता है, लेकिन दिल्ली से सटे नोएडा के एक गांव बिसरख में रामलीला का मंचन किया जाता है. न तो किया जाता है और न ही रावण दहन। इसके पीछे एक पौराणिक मान्यता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी यहां रामलीला का आयोजन होता है या रावण दहन किया जाता है तो यहां किसी की मृत्यु हो जाती है। इस वजह से रामलीला हमेशा अधूरी रहती है, इसलिए लोगों ने रामलीला और रावण दहन का आयोजन हमेशा के लिए बंद कर दिया। शिव पुराण में भी बिसरख गांव का उल्लेख है। पुराणों के अनुसार त्रेता युग में इसी गांव में ऋषि विश्रवा का जन्म हुआ था। उन्होंने इसी गांव में शिवलिंग की स्थापना की थी। रावण का जन्म ऋषि विश्वास के घर हुआ था। रावण ने इस गांव में भगवान शिव की तपस्या भी की थी और इससे प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें बुद्धिमान और पराक्रमी होने का वरदान दिया था। दानव जाति बच गई यहां रहने वाले लोगों का तर्क है कि रावण ने राक्षस जाति को बचाने के लिए माता सीता का हरण किया था। इसके अलावा रावण को कहीं भी बुरा नहीं कहा गया है। रावण ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ से अपनी लंका भगवान शिव से छीन ली थी। इसलिए यह माना जाता है कि राख को लोगों के और हमारे जीवन से नकारात्मकता को दूर करके समृद्धि में वृद्धि के संकेत के रूप में लेना चाहिए। इस कथा से जुड़ी है रावण की अस्थियां घर लाने की परंपराप्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान श्री राम ने रावण का वध करके लंका पर विजय प्राप्त कर ली थी, तब उनकी सेना रावण वध और लंका पर विजय प्राप्ति के प्रमाण स्वरूप लंका की राख अपने साथ ले आई थी। यही वजह है कि लोग आज भी लंका और रावण दहन के बाद अवशेषों को अपने घर ले जाते हैं। क्या कहती हैं मान्यताएंपौराणिक ग्रंथों में जानकारी मिलती है कि स्वर्ग के कोषाध्यक्ष कुबेर रावण के भाई थे, और उन्होंने ही स्वर्ण की लंका बनाई गई थी, जिसमें रावण निवास करता था। इसलिए माना जाता है कि रावण की अस्थियां व लंका अवशेषों को घर में लाने से धन-धान्य की कमी नहीं रहती है और धन कोषाध्यक्ष कुबेर के द्वारा बनाई गई लंका के अवशेष घर में रखने से स्वयं कुबेर वास करते हैं, जिससे घर में धन स्थाई रूप से टिका रहता है। नकारात्मक ऊर्जा रहती है दूररावण के ज्ञान की प्रशंसा स्वयं भगवान श्री राम ने भी की थी और यही वजह थी कि उन्होंने अपने छोटे भ्राता लक्ष्मण को मृत्यु शैय्या पर लेटे रावण से ज्ञान लेने को को कहा था। कहा जाता है कि आज तक को रावण जैसा महाज्ञानी, पराक्रमी नहीं है। इसलिए मान्यता है कि यदि घर में रावण की अस्थियां हो तो भय से मुक्ति मिलती है और नकारात्मक ऊर्जा नहीं आती है।

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