पितरपक्ष के दौरान क्या करना चाहिए? जानें Vedic प्रमाण सहित (What to Do During Pitru Paksha in Hindi)

पितरपक्ष के दौरान क्या करना चाहिए? जानें Vedic प्रमाण सहित (What to Do During Pitru Paksha in Hindi) पितरपक्ष (Pitru Paksha) हिंदू धर्म में पितरों (Ancestors) को समर्पित एक विशेष अवधि होती है, जब श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए अनुष्ठान और कर्मकांड करते हैं। इस दौरान पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध (श्राद्ध), तर्पण (Tarpan), और दान (Daan) जैसे कर्म किए जाते हैं। ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्र शास्त्री जी ने बताया पितरपक्ष का महत्व वेदों और शास्त्रों में उल्लेखित है। इस ब्लॉग में जानें कि पितरपक्ष के दौरान क्या करना चाहिए और इसके लिए वेदिक प्रमाण (Vedic References) क्या हैं। पितरपक्ष के दौरान क्या करना चाहिए? (What to Do During Pitru Paksha) “तस्मात् स्वधाकृतं श्राद्धं पितृणां त्रिप्तिकरं भवेत्।” (महाभारत, अनुशासन पर्व, 88.23)अर्थ: श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। “तर्पणेन पितरः तृप्यन्ति, पिण्डदानेन च मोदन्ते।”अर्थ: तर्पण और पिंडदान से पितर संतुष्ट होते हैं। “पितरः दानेन तृप्यन्ति, तर्पणेन च देवताः।” (विष्णु धर्मसूत्र, 74.31)अर्थ: दान से पितर संतुष्ट होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। “श्राद्ध भोजनेन पितरः तृप्यन्ति, ब्राह्मण भोजनादपि।” (वायु पुराण, अध्याय 10)अर्थ: श्राद्ध और ब्राह्मण भोजन से पितर तृप्त होते हैं। “ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।”इस मंत्र का जप पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा को प्रकट करता है। पितरपक्ष में क्या नहीं करना चाहिए? (What Not to Do During Pitru Paksha) पितरपक्ष के लाभ (Benefits of Observing Pitru Paksha) वेदिक प्रमाण (Vedic References for Pitru Paksha) “पुत्रेण कृतं श्राद्धं पितृणां तृप्तिकारकं भवति।”अर्थ: पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध पितरों की आत्मा को तृप्त करता है। “पिण्डदानेन तृप्ताः सन्ति पितरः पुत्रपौत्रादिकं वंशं पुष्टिं कुर्वन्ति।”अर्थ: पिंडदान से तृप्त पितर अपने वंश को आशीर्वाद देते हैं और उसकी उन्नति करते हैं। “श्राद्धेन पितरः तृप्यन्ति, ब्राह्मण भोजनेन च।”अर्थ: श्राद्ध और ब्राह्मण भोजन से पितर संतुष्ट होते हैं और संतोष प्राप्त करते हैं। निष्कर्ष (Conclusion): पितरपक्ष हमारे पितरों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का महत्वपूर्ण समय है। इस दौरान श्राद्ध, तर्पण, और दान जैसे कर्मकांड पितरों की आत्मा को तृप्त करते हैं और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का साधन होते हैं। वेदिक प्रमाणों के अनुसार, पितरपक्ष के अनुष्ठान का पालन करने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है, साथ ही पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। यदि आप भी पितरपक्ष में सही कर्मकांड करना चाहते हैं, तो इन उपायों का पालन करें और अपने जीवन को सुखमय बनाएं। FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

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श्राद्ध किसे करना चाहिए? जानें Vedic प्रमाण सहित (Shradh Kise Karna Chahiye)

श्राद्ध किसे करना चाहिए? जानें Vedic प्रमाण सहित (Shradh Kise Karna Chahiye) हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जो पितरों (Ancestors) को तृप्त करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्र शास्त्री जी ने बताया यह कर्मकांड विशेष रूप से पितरपक्ष (Pitru Paksha) में किया जाता है। परंतु प्रश्न यह है कि किसे करना चाहिए और इसका सही ढंग क्या है? इस ब्लॉग में हम विस्तार से जानेंगे कि किन लोगों को करना चाहिए और इसके पीछे वेदिक प्रमाण (Vedic References) क्या हैं। श्राद्ध किसे करना चाहिए? (Who Should Perform Shradh) “सर्वेषां तु पितृणां तु पुत्रैः श्राद्धं विधीयते।” (मनुस्मृति 3.203)अर्थ: पितरों के लिए श्राद्ध पुत्रों द्वारा किया जाना चाहिए। “तस्य पौत्रो वा पौत्रादिकं वंशं तृप्तिं कुर्वन्ति।”अर्थ: पौत्र द्वारा श्राद्ध करने से भी पितर संतुष्ट होते हैं और वंश को आशीर्वाद देते हैं। “श्राद्धं कुटुंबस्य अन्यैः भी विधीयते।”अर्थ: परिवार के अन्य सदस्य भी कर सकते हैं जब पुत्र अनुपस्थित हो। समाज में बदलते नियमों के अनुसार, पितृ कर्म में पुत्रियों की भागीदारी को भी स्वीकार किया गया है। श्राद्ध का महत्व (Importance of Shradh) “पितरः पुत्रेण दत्तं श्राद्धं पितृऋणमपि नाशयति।”अर्थ: पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध पितृ ऋण को समाप्त करता है। “श्राद्धेन पितरः तृप्यन्ति, तर्पणेन च देवताः।” (गर्ग संहिता, 1.11.23)अर्थ: श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं और तर्पण से देवता प्रसन्न होते हैं। वेदिक प्रमाण (Vedic References for Shradh) 1. मनुस्मृति (Manusmriti ) “यस्तु पुत्रः स पितृणां श्राद्धं विधिवत् करोति। तेन पितरः तृप्यन्ति।”अर्थ: जो पुत्र श्राद्ध करता है, उससे पितर संतुष्ट होते हैं और उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं। 2. महाभारत (Mahabharata, Anushasan Parva ) “श्राद्धं पुत्रकृतं पितृणां मोक्षाय भवति।”अर्थ: पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध पितरों को मोक्ष प्रदान करता है। 3. विष्णु धर्मसूत्र (Vishnu Dharmasutra 74.31) “पुत्रैः कृतं तिलजलं श्राद्धं पितृणां तृप्तिकरं भवेत्।”अर्थ: पुत्रों द्वारा किया गया तिलयुक्त जल से श्राद्ध पितरों को तृप्त करता है। करने के नियम (Rules for Performing Shradh) “श्राद्ध भोजनेन पितरः तृप्यन्ति।” (वायु पुराण, 10.32)अर्थ: श्राद्ध भोज से पितर तृप्त होते हैं। निष्कर्ष (Conclusion): महत्वपूर्ण धार्मिक कर्मकांड है, जो पितरों की आत्मा की तृप्ति और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। वेदिक प्रमाणों के अनुसार, अधिकार मुख्य रूप से पुत्रों को होता है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में परिवार के अन्य सदस्य भी इसे कर सकते हैं। न केवल पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि परिवार में सुख-शांति और समृद्धि भी आती है। FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

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पितरों को प्रसन्न करने के उपाय क्या हैं? जानें Vedic प्रमाण सहित (Pitron Ko Prasanna Karne Ke Upay in Hindi)

पितरों को प्रसन्न करने के उपाय क्या हैं? जानें Vedic प्रमाण सहित (Pitron Ko Prasanna Karne Ke Upay in Hindi) पितर (Ancestors) हमारे पूर्वज होते हैं, जिनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय पितरपक्ष या श्राद्ध पक्ष (Shradh Paksha) के रूप में मनाया जाता है। यह समय पितरों की आत्मा की शांति और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यदि पितर प्रसन्न (Happy Ancestors) होते हैं, तो परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे पितरों को प्रसन्न करने के उपाय (Ways to Please Ancestors) और उनके वेदिक प्रमाण (Vedic References) के बारे में। पितरों को प्रसन्न करने के उपाय (Pitron Ko Prasanna Karne Ke Upay) “तस्मात् स्वधाकृतं श्राद्धं पितृणां त्रिप्तिकरं भवेत्।” (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 88)अर्थ: श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। “श्राद्धकाले पितरः स्वर्गलोकात् पृथिवीं समायान्ति, पुत्रैः दत्तं तिलजलं तृप्तिं कुर्वन्ति।” (विष्णु धर्मसूत्र, 74.31)अर्थ: श्राद्ध के समय पितर पृथ्वी पर आते हैं और तिलयुक्त जल से तृप्त होते हैं। “पिण्डदानेन तृप्ताः सन्ति पितरः पुत्रपौत्रादिकं वंशं पुष्टिं कुर्वन्ति।” (वायु पुराण, 70.21)अर्थ: पिंडदान से तृप्त पितर अपने वंश को आशीर्वाद देते हैं और समृद्धि प्रदान करते हैं। “पितरः दानेन तृप्यन्ति, तर्पणेन च देवताः।” (गर्ग संहिता, 1.11.23)अर्थ: दान से पितर और तर्पण से देवता तृप्त होते हैं। “ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।”इस मंत्र का उच्चारण पितरों के प्रति श्रद्धा को प्रकट करता है। “श्राद्धेन पितरः तृप्यन्ति, ब्राह्मण भोजनादपि।” (विष्णु पुराण, अध्याय 10)अर्थ: श्राद्ध और ब्राह्मण भोजन से पितर संतुष्ट होते हैं। पितरों को प्रसन्न करने के लाभ (Benefits of Pleasing Ancestors) निष्कर्ष (Conclusion): पितरों को प्रसन्न करने के उपाय हमारे जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि लाने के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। वेदिक प्रमाण के अनुसार, श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, और दान जैसे कर्मकांड पितरों की आत्मा को तृप्त करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं। यदि आप भी प्रसन्न करना चाहते हैं, तो इन उपायों को विधिपूर्वक करें और अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बनाएं। FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

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Pitru Paksha:पितरपक्ष में कौन से कर्मकांड किए जाते हैं? जानें वेदिक प्रमाण सहित

पितरपक्ष में कौन से कर्मकांड किए जाते हैं? जानें वेदिक प्रमाण सहित पितरपक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय होता है। ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्र शास्त्री जी ने बताया इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे महत्वपूर्ण कर्मकांड किए जाते हैं, जिनसे पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि पितरपक्ष के दौरान कौन-कौन से कर्मकांड किए जाते हैं और उनके वेदिक प्रमाण क्या हैं। पितरपक्ष के प्रमुख कर्मकांड वेदिक प्रमाण वेदों और धर्मशास्त्रों में पितरपक्ष और इसके दौरान किए जाने वाले कर्मकांडों का विशेष उल्लेख किया गया है। कुछ वेदिक प्रमाण निम्नलिखित हैं: 1. विष्णु धर्मसूत्र (74.31): “श्राद्धकाले पितरः स्वर्गलोकात् पृथिवीं समायान्ति, पुत्रैः दत्तं तिलजलं तृप्तिं कुर्वन्ति।”अर्थ: श्राद्ध के समय पितर स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आते हैं और पुत्रों द्वारा दी गई तिलयुक्त जल से तृप्त होते हैं। 2. महाभारत (आनुशासन पर्व, अध्याय 88.22): “तस्माद् यत्नेन कुर्वीत पितृणां तु विशेषतः। तस्मात् स्वधाकृतं श्राद्धं पितृणां त्रिप्तिकरं भवेत्।”अर्थ: पितरों के लिए विशेष रूप से श्राद्ध कर्म करना चाहिए, जिससे पितर संतुष्ट होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। 3. गर्ग संहिता (1.11.23): “श्राद्धेन पितरः तृप्यन्ति, तर्पणेन च देवताः।”अर्थ: श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं और तर्पण से देवता प्रसन्न होते हैं। 4. मनुस्मृति (3.203): “यत्तु श्राद्धं पितृणां क्रियते नियमपूर्वकम्। तेन पितृणां प्रसादो भवति।”अर्थ: जो श्राद्ध नियमपूर्वक पितरों के लिए किया जाता है, उससे पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। 5. वायु पुराण (70.21): “पितरः श्राद्ध तृप्ताः पुत्र-पौत्रादिकं वंशं पुष्टिं कुर्वन्ति।”अर्थ: श्राद्ध से तृप्त पितर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं और उनके वंश की समृद्धि करते हैं। पितरपक्ष में क्या करना चाहिए? पितरपक्ष में क्या नहीं करना चाहिए? निष्कर्ष: पितरपक्ष का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, जिसमें पितरों की आत्मा की शांति के लिए विभिन्न कर्मकांड किए जाते हैं। श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान जैसे अनुष्ठान पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किए जाते हैं। वेदों और शास्त्रों में पितरपक्ष और इन कर्मकांडों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यदि आप भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण करना चाहते हैं, तो किसी योग्य पंडित से संपर्क करें और विधिपूर्वक इन कर्मकांडों का पालन करें। FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

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Pitru Paksha:पितरपक्ष क्या है? जानें इसका महत्व, विधि, और वेदिक प्रमाण

पितरपक्ष क्या है? जानें इसका महत्व, विधि, और वेदिक प्रमाण Introduction:पितरपक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में अत्यधिक पवित्र और महत्वपूर्ण समय होता है।ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्र शास्त्री जी ने बताया यह वह समय है जब हम अपने पूर्वजों (पितरों) की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। पितरों को समर्पित यह विशेष पक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक चलता है। इस ब्लॉग में हम वेदिक प्रमाण, महत्व, और श्राद्ध की विधि के बारे में विस्तार से जानेंगे। पितरपक्ष क्या है? 15 दिनों की वह अवधि होती है जब हिंदू परिवार अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए कर्मकांड करते हैं। इसे ‘महालय पक्ष’ भी कहा जाता है। यह भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलता है। इस दौरान, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। पितरपक्ष का महत्व हिंदू मान्यता के अनुसार, पितरपक्ष के दौरान पितरों की आत्माएं पृथ्वी पर आती हैं और अपने वंशजों से तर्पण की अपेक्षा करती हैं। सही विधि से किया गया श्राद्ध उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का मार्ग है, जिससे परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। वेदों और शास्त्रों के महत्व को विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। वेदिक प्रमाण: 1. गर्ग संहिता (1.11.23): “श्राद्धेन पितरः तृप्यन्ति, तर्पणेन च देवताः।”अर्थ: श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं और तर्पण से देवता प्रसन्न होते हैं। 2. विष्णु धर्मसूत्र (74.31): “श्राद्धकाले पितरः स्वर्गलोकात् पृथिवीं समायान्ति, पुत्रैः दत्तं तिलजलं तृप्तिं कुर्वन्ति।”अर्थ: श्राद्ध के समय पितर स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आते हैं और पुत्रों द्वारा दी गई तिलयुक्त जल से तृप्त होते हैं। 3. महाभारत (आनुशासन पर्व, अध्याय 88.22): “तस्माद् यत्नेन कुर्वीत पितृणां तु विशेषतः। तस्मात् स्वधाकृतं श्राद्धं पितृणां त्रिप्तिकरं भवेत्।”अर्थ: पितरों के लिए विशेष रूप से श्राद्ध कर्म करना चाहिए, जिससे पितर संतुष्ट होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पितरपक्ष में क्या करें: पितरपक्ष के दौरान कुछ विशेष कर्मकांड करने की परंपरा है, जिनसे पितरों को प्रसन्न किया जाता है: पितरपक्ष में क्या नहीं करना चाहिए: पितरपक्ष में कुछ कार्य करने से बचना चाहिए, ताकि श्राद्ध कर्म का फल पूरी तरह से प्राप्त हो सके: पितरपक्ष और विज्ञान: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पितरपक्ष के दौरान पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। यह समय हमें अपने पूर्वजों के साथ जुड़े रहने और उनके योगदान को सम्मानित करने का अवसर प्रदान करता है। निष्कर्ष: पितरपक्ष हमारे पूर्वजों के प्रति आस्था और कृतज्ञता प्रकट करने का समय है। वेदों और शास्त्रों में इसका विशेष उल्लेख मिलता है। श्राद्ध, तर्पण, और पिंडदान के माध्यम से हम अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, जिससे उनका आशीर्वाद हमें और हमारे परिवार को प्राप्त होता है। पितरपक्ष का पालन सही विधि से करने से जीवन में समृद्धि, सुख, और शांति का आगमन होता है। यदि आप भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध या तर्पण करना चाहते हैं, तो किसी योग्य पंडित से संपर्क करें और विधिपूर्वक इन कर्मकांडों का पालन करें। FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

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Pitru Paksha:पितरपक्ष का महत्व क्या है? जानें इसका धार्मिक और वेदिक प्रमाण

पितरपक्ष का महत्व क्या है? जानें इसका धार्मिक और वेदिक प्रमाण (श्राद्ध पक्ष) हिंदू धर्म में पूर्वजों (पितरों) के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण समय है। यह समय पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए विशेष रूप से समर्पित होता है।श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस ब्लॉग में हम पितरपक्ष का महत्व, उसके धार्मिक और वेदिक प्रमाणों के बारे में विस्तार से जानेंगे। पितरपक्ष का महत्व हिंदू धर्म में यह माना जाता है कि पितरों का आशीर्वाद परिवार के लिए अत्यंत शुभ होता है। पितरपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। यह समय पूर्वजों की आत्मा को शांति देने और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक दृष्टिकोण से पितरपक्ष का महत्व: वेदिक प्रमाण से पितरपक्ष का महत्व वेदों और शास्त्रों में विशेष रूप से उल्लेखित किया गया है। यहां कुछ वेदिक प्रमाण दिए जा रहे हैं जो इस पक्ष की महत्ता को दर्शाते हैं: 1. विष्णु धर्मसूत्र (74.31): “श्राद्धकाले पितरः स्वर्गलोकात् पृथिवीं समायान्ति, पुत्रैः दत्तं तिलजलं तृप्तिं कुर्वन्ति।”अर्थ: श्राद्ध के समय पितर स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आते हैं और पुत्रों द्वारा दी गई तिलयुक्त जल से तृप्त होते हैं। 2. महाभारत (आनुशासन पर्व, अध्याय 88.22): “तस्माद् यत्नेन कुर्वीत पितृणां तु विशेषतः। तस्मात् स्वधाकृतं श्राद्धं पितृणां त्रिप्तिकरं भवेत्।”अर्थ: पितरों के लिए विशेष रूप से श्राद्ध कर्म करना चाहिए, जिससे पितर संतुष्ट होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। 3. मनुस्मृति (3.203): “यत्तु श्राद्धं पितृणां क्रियते नियमपूर्वकम्। तेन पितृणां प्रसादो भवति।”अर्थ: जो श्राद्ध नियमपूर्वक पितरों के लिए किया जाता है, उससे पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। 4. गर्ग संहिता (1.11.23): “श्राद्धेन पितरः तृप्यन्ति, तर्पणेन च देवताः।”अर्थ: श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं और तर्पण से देवता प्रसन्न होते हैं। 5. वायु पुराण (70.21): “पितरः श्राद्ध तृप्ताः पुत्र-पौत्रादिकं वंशं पुष्टिं कुर्वन्ति।”अर्थ: श्राद्ध से तृप्त पितर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं और उनके वंश की समृद्धि करते हैं। पितरपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण विधि पितरपक्ष में पालन करने योग्य बातें: निष्कर्ष: पितरपक्ष का धार्मिक और वेदिक महत्व अत्यधिक है। यह समय हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का होता है। वेदों और शास्त्रों में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है कि कैसे श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितर तृप्त होते हैं और उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है। यदि आप भी अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध करना चाहते हैं, तो किसी योग्य पंडित से संपर्क करें और विधिपूर्वक इन कर्मकांडों का पालन करें। FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

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Aaj Ka Panchang (आज का पंचांग) 18/09/2024

Aaj Ka Panchang Aaj Ka Panchang🌞~ आज का हिन्दू पंचांग ~🌞⛅दिनांक – 19 सितम्बर 2024⛅दिन – गुरूवार⛅विक्रम संवत् – 2081⛅अयन – दक्षिणायन⛅ऋतु – शरद⛅मास – आश्विन⛅पक्ष – कृष्ण⛅तिथि – द्वितीया रात्रि 12:39 सितम्बर 20 तक तत्पश्चात तृतीया⛅नक्षत्र – उत्तर भाद्रपद प्रातः 08:04 तक तत्पश्चात रेवती प्रातः 05:15 सितम्बर 20 तक तत्पश्चात अश्विनी⛅योग – वृद्धि शाम 07:19 तक तत्पश्चात ध्रुव Aaj Ka Panchang⛅राहु काल – दोपहर 02:05 से दोपहर 03:36 तक⛅सूर्योदय – 06:31⛅सूर्यास्त – 06:36⛅दिशा शूल – दक्षिण दिशा में⛅ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:53 से 05:40 तक⛅अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:09 से दोपहर 12:57 तक⛅निशिता मुहूर्त- रात्रि 12:10 सितम्बर 20 से रात्रि 12:57 सितम्बर 20 तकव्रत पर्व विवरण – द्वितीया श्राद्ध, सर्वार्थ सिद्धि योग (प्रातः 08:04 से प्रातः 06:28 सितम्बर 20 तक)⛅विशेष – द्वितीया को बृहती (छोटा बैगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) 🔹स्नान कैसे करना चाहिये ??🔹 🔸जहाँ से प्रवाह आता हो वहाँ पहले सिर की डुबकी मारें । घर में भी स्नान करे तो पहले जल सिर पर डालें…. पैरों पर पहले नहीं डालना चाहिए । शीतल जल सिर को लगने से सिर की गर्मी पैरों के तरफ जाती है । 🔸और जहाँ जलाशय है, स्थिर जल है वहाँ सूर्य पूर्वमुखी होकर स्नान करें । 🔸घर में स्नान करें तो उस बाल्टी के पानी में जौ और तिल अथवा थोड़ा गोमूत्र अथवा तिर्थोद्क पहले (गंगाजल आदि) डाल कर फिर बाल्टी भरें तो घर में भी तीर्थ स्नान माना जायेगा l Aaj Ka Panchang🔹 गुरुवार विशेष 🔹 🔸 हर गुरुवार को तुलसी के पौधे में शुद्ध कच्चा दूध गाय का थोड़ा-सा ही डाले तो, उस घर में लक्ष्मी स्थायी होती है और गुरूवार को व्रत उपवास करके गुरु की पूजा करने वाले के दिल में गुरु की भक्ति स्थायी हो जाती है । 🔸 गुरुवार के दिन देवगुरु बृहस्पति के प्रतीक आम के पेड़ की निम्न प्रकार से पूजा करें : 🔸 एक लोटा जल लेकर उसमें चने की दाल, गुड़, कुमकुम, हल्दी व चावल डालकर निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए आम के पेड़ की जड़ में चढ़ाएं । Aaj Ka Panchang:ॐ ऐं क्लीं बृहस्पतये नमः । फिर उपरोक्त मंत्र बोलते हुए आम के वृक्ष की पांच परिक्रमा करें और गुरुभक्ति, गुरुप्रीति बढ़े ऐसी प्रार्थना करें । थोड़ा सा गुड़ या बेसन की मिठाई चींटियों को डाल दें । 🌹पितृ-पक्ष कैलेंडर 2024 (तिथि अनुसार श्राद्ध) (श्राद्ध पक्ष – 17 सितम्बर से 2 अक्टूबर 2024) 🔸 17 सितम्बर 2024, मंगलवार- पूर्णिमा का श्राद्ध महालय श्राद्धारम्भ🔸 18 सितम्बर 2024, बुधवार – प्रतिपदा का श्राद्ध🔸 19 सितम्बर 2024, गुरुवार – द्वितीया का श्राद्ध🔸 20 सितम्बर 2024, शुक्रवार – तृतीया का श्राद्ध🔸 21 सितम्बर 2024, शनिवार – चतुर्थी का श्राद्ध🔸 22 सितम्बर 2024, रविवार – पंचमी का श्राद्ध🔸 23 सितम्बर 2024, सोमवार – षष्ठी व सप्तमी का श्राद्ध 🔸 24 सितम्बर 2024, मंगलवार – अष्टमी का श्राद्ध🔸 25 सितम्बर 2024, बुधवार – नवमी का श्राद्ध🔸 26 सितम्बर 2024, गुरुवार – दशमी का श्राद्ध🔸 27 सितम्बर 2024, शुक्रवार – एकादशी का श्राद्ध🔸 29 सितम्बर 2024, रविवार – द्वादशी का श्राद्ध🔸 30 सितम्बर 2024, सोमवार – त्रयोदशी का श्राध्द🔸 1 अक्टूबर 2024, मंगलवार- चतुर्दर्शी का श्राध्द आग-दुर्घटना-अस्त्र-शस्त्र- अपमृत्यु से मृतक का श्राद्ध🔸 2 अक्टूबर 2024, बुधवार- अमावश्या * का* श्राध्द व सर्वपित्री अमावस्या (अज्ञात तिथीवालों का श्राध्द) 🔸 श्राद्ध पक्ष में पालनीय आवश्यक नियम व श्राद्ध संबंधित सम्पूर्ण जानकारी के लिए पढ़े आश्रम सत्साहित्य “श्राद्ध महिमा” में…🚩🚩 ” ll जय श्री राम ll ” 🚩🚩

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Siddha Kunjika Stotram सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्

Siddha Kunjika Stotram:सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्: एक शक्तिशाली मंत्र Siddha Kunjika Stotram:सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् देवी दुर्गा का एक अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमय स्तोत्र है। यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का मूल मंत्र माना जाता है और इसमें कई प्रभावशाली बीज मंत्र भी शामिल हैं। इस स्तोत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति को कई लाभ प्राप्त होते हैं। Siddha Kunjika Stotram:स्तोत्र का महत्व Siddha Kunjika Stotram:स्तोत्र का पाठ कैसे करें Siddha Kunjika Stotram:स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण श्लोक स्तोत्र का लाभ ध्यान दें: सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram) ॥ दुर्गा सप्तशती: सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥शिव उवाच:शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत ॥1॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥2॥ कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥3॥ गोपनीयं प्रयत्‍‌नेनस्वयोनिरिव पार्वति ।मारणं मोहनं वश्यंस्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।पाठमात्रेण संसिद्ध्येत्कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥4॥ ॥ अथ मन्त्रः ॥ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे ॥ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालयज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वलऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वलहं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥ ॥ इति मन्त्रः ॥नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि ।नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥1॥ नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे ॥2॥ ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥ चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥4॥ धां धीं धूं धूर्जटेः पत्‍‌नी वां वीं वूं वागधीश्‍वरी ।क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥5॥ हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥6॥ अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं ।धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥7॥ पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ॥8॥ इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रंमन्त्रजागर्तिहेतवे ।अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति ॥यस्तु कुञ्जिकाया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।न तस्य जायतेसिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra) (Maa Durga Maa Kali Aarti) अम्बे तू है जगदम्बे काली माँ दुर्गा, माँ काली आरती दुर्गा कवच (Durga Kavach) श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name)

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सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra)

सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् Saptashloki Durga Stotra Saptashloki Durga Stotra॥ अथ सप्तश्लोकी दुर्गा ॥शिव उवाच:देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥ देव्युवाच:शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम् ।मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥ विनियोग:ॐ अस्य श्री दुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः । ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हिसा ।बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥1॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोःस्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।दारिद्र्‌यदुःखभयहारिणि त्वदन्यासर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥2॥ सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ॥3॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते ॥4॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते ॥5॥ रोगानशोषानपहंसि तुष्टा रूष्टातु कामान्‌ सकलानभीष्टान्‌ ।त्वामाश्रितानां न विपन्नराणांत्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति ॥6॥ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्र्वरि ।एवमेव त्वया कार्यमस्यद्वैरिविनाशनम्‌ ॥7॥ ॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा संपूर्णम्‌ ॥ (Maa Durga Maa Kali Aarti) अम्बे तू है जगदम्बे काली माँ दुर्गा, माँ काली आरती दुर्गा कवच (Durga Kavach) श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name)

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(Maa Durga Maa Kali Aarti) अम्बे तू है जगदम्बे काली माँ दुर्गा, माँ काली आरती

Maa Durga Maa Kali Aarti:माँ दुर्गे का साप्ताहिक दिन शुक्रवार, दोनों नवरात्रि, अष्टमी, माता की चौकी एवं जगराते में सबसे अधिक गाई जाने वाली आरती। Maa Durga Maa Kali Aarti Maa Durga Maa Kali Aarti:अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ तेरे भक्त जनो पर,भीर पडी है भारी माँ ।दानव दल पर टूट पडो,माँ करके सिंह सवारी ।सौ-सौ सिंहो से बलशाली,अष्ट भुजाओ वाली,दुष्टो को पलमे संहारती ।ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ माँ बेटे का है इस जग मे,बडा ही निर्मल नाता ।पूत – कपूत सुने है पर न,माता सुनी कुमाता ॥सब पे करूणा दरसाने वाली,अमृत बरसाने वाली,दुखियो के दुखडे निवारती ।ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ नही मांगते धन और दौलत,न चांदी न सोना माँ ।हम तो मांगे माँ तेरे मन मे,इक छोटा सा कोना ॥सबकी बिगडी बनाने वाली,लाज बचाने वाली,सतियो के सत को सवांरती ।ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ चरण शरण मे खडे तुम्हारी,ले पूजा की थाली ।वरद हस्त सर पर रख दो,मॉ सकंट हरने वाली ।मॉ भर दो भक्ति रस प्याली,अष्ट भुजाओ वाली,भक्तो के कारज तू ही सारती ।ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ Durga Kavach:दुर्गा कवच: देवी का अचूक कवच

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दुर्गा कवच (Durga Kavach)

Durga Kavach:दुर्गा कवच: देवी का अचूक कवच Durga Kavach:दुर्गा कवच एक शक्तिशाली मंत्र है जो देवी दुर्गा की स्तुति करता है। Durga Kavach यह कवच भक्तों को दुष्ट शक्तियों से बचाने और जीवन में सफलता प्राप्त करने में मदद करता है। यह माना जाता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से दुर्गा कवच का पाठ करता है, उसे देवी दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है और वह सभी प्रकार के संकटों से मुक्त हो जाता है। Durga Kavach:दुर्गा कवच का महत्व श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name) Durga Kavach:दुर्गा कवच का पाठ कैसे करें Durga Kavach:दुर्गा कवच के लाभ Durga Kavach:दुर्गा कवच के श्लोक Durga Kavach:दुर्गा कवच के श्लोक बहुत लंबे और जटिल होते हैं। इन्हें किसी अनुभवी पंडित या गुरु से सीखना चाहिए। ध्यान दें: दुर्गा कवच का पाठ करते समय सही उच्चारण का बहुत महत्व होता है। Durga Kavach इसलिए किसी अनुभवी व्यक्ति से मार्गदर्शन लेना जरूरी है। देवी कवच | श्री दुर्गा कवच Durga Kavachकवच का अर्थ होता है रक्षा करने वाला, अपने चारों ओर एक प्रकार का आवरण बना देना। यह बहुत अच्छा / उत्तम है। देवी कवच के तहत हम देवी माँ के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हैं, जो हमारे इर्द-गिर्द, हमारे शरीर के चारो ओर एक कवच का निर्माण कर देते हैं। इसका अनुष्ठान विशेष कर नवरात्रि के सभी नवों दिन में किया जाता है Durga Kavach देवी कवच पाठ से शरीर के सभी अंगों की रक्षा होती है, यह पाठ महामारी से बचाव की शक्ति भी प्रदान करता है, देवी कवच पाठ सम्पूर्ण आरोग्य के लिए मानवता पर शुभ वरदान है। देवी कवच को पूरी पवित्रता के साथ पाठ करना चाहिए। ॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।ॐ नमश्‍चण्डिकायै ॥ मार्कण्डेय उवाचॐ यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥ ब्रह्मोवाचअस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥ प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥ अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥ न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥ यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥ प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥ माहेश्‍वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना।लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥ श्‍वेतरुपधरा देवी ईश्‍वरी वृषवाहना।ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥ इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥ दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥ खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥ दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥ नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥ त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥ दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥ उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥ एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥ अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥ मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥ शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥ नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥ दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥ कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥ नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।स्कन्धयोः खङ्‍गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥ हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।नखाञ्छूलेश्‍वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्‍वरी॥२८॥ स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥ नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्‍वरी तथा।पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥ कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥ गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥ नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्‍चैवोर्ध्वकेशिनी।रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्‍वरी तथा॥३३॥ रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।अन्त्राणि कालरात्रिश्‍च पित्तं च मुकुटेश्‍वरी॥३४॥ पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥ शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्‍वरी तथा।अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥ प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥ रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।सत्त्वं रजस्तमश्‍चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥ आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥ गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥ पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥ रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥ पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥ तत्र तत्रार्थलाभश्‍च विजयः सार्वकामिकः।यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्‍चितम्।परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥ निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥ इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥ दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। ४७॥ नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥ अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।भूचराः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेशिकाः॥४९॥ सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्‍च महाबलाः॥५०॥ ग्रहभूतपिशाचाश्‍च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥ नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥ यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥ यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥ देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥ लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥ इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।

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श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name)

Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा के 108 नाम: देवी के विभिन्न रूपों का मंत्र Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा हिंदू धर्म की एक प्रमुख देवी हैं और उन्हें शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनके 108 नाम उनके विभिन्न रूपों और गुणों को दर्शाते हैं। इन नामों का जाप करने से भक्तों को शक्ति, ज्ञान और मोक्ष प्राप्त होता है। Shri Durga 108 Name:108 नामों का महत्व Shri Durga 108 Name:जाप करने का तरीका Shri Durga 108 Name:कब करें आप किसी भी समय श्री दुर्गा के 108 नामों का जाप कर सकते हैं। लेकिन नवरात्रि जैसे विशेष अवसरों पर इनका जाप करना और भी अधिक फलदायी होता है। Shri Durga 108 Name:ध्यान रखें Shri Durga 108 Name:अतिरिक्त जानकारी श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name) 1. सती- अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली2. साध्वी- आशावादी3. भवप्रीता- भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली4. भवानी- ब्रह्मांड की निवास5. भवमोचनी- संसार बंधनों से मुक्त करने वाली6. आर्या- देवी7. दुर्गा- अपराजेय8. जया- विजयी9. आद्य- शुरूआत की वास्तविकता10. त्रिनेत्र- तीन आँखों वाली11. शूलधारिणी- शूल धारण करने वाली12. पिनाकधारिणी- शिव का त्रिशूल धारण करने वाली13. चित्रा- सुरम्य, सुंदर14. चण्डघण्टा- प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली, घंटे की आवाज निकालने वाली15. महातपा- भारी तपस्या करने वाली16. मन – मनन- शक्ति17. बुद्धि- सर्वज्ञाता 18. अहंकारा- अभिमान करने वाली19. चित्तरूपा- वह जो सोच की अवस्था में है20. चिता- मृत्युशय्या21. चिति- चेतना22. सर्वमन्त्रमयी- सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली23. सत्ता- सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है24. सत्यानन्दस्वरूपिणी- अनन्त आनंद का रूप25. अनन्ता- जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं26. भाविनी- सबको उत्पन्न करने वाली, खूबसूरत औरत27. भाव्या- भावना एवं ध्यान करने योग्य28. भव्या- कल्याणरूपा, भव्यता के साथ29. अभव्या – जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं30. सदागति- हमेशा गति में, मोक्ष दान31. शाम्भवी- शिवप्रिया, शंभू की पत्नी32. देवमाता- देवगण की माता33. चिन्ता- चिन्ता34. रत्नप्रिया- गहने से प्यार35. सर्वविद्या- ज्ञान का निवास36. दक्षकन्या- दक्ष की बेटी 37. दक्षयज्ञविनाशिनी- दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली38. अपर्णा- तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली39. अनेकवर्णा- अनेक रंगों वाली40. पाटला- लाल रंग वाली41. पाटलावती- गुलाब के फूल या लाल परिधान या फूल धारण करने वाली42. पट्टाम्बरपरीधाना- रेशमी वस्त्र पहनने वाली43. कलामंजीरारंजिनी- पायल को धारण करके प्रसन्न रहने वाली44. अमेय- जिसकी कोई सीमा नहीं45. विक्रमा- असीम पराक्रमी46. क्रूरा- दैत्यों के प्रति कठोर47. सुन्दरी- सुंदर रूप वाली48. सुरसुन्दरी- अत्यंत सुंदर49. वनदुर्गा- जंगलों की देवी50. मातंगी- मतंगा की देवी 51. मातंगमुनिपूजिता- बाबा मतंगा द्वारा पूजनीय52. ब्राह्मी- भगवान ब्रह्मा की शक्ति53. माहेश्वरी- प्रभु शिव की शक्ति54. इंद्री- इन्द्र की शक्ति55. कौमारी- किशोरी56. वैष्णवी- अजेय57. चामुण्डा- चंड और मुंड का नाश करने वाली58. वाराही- वराह पर सवार होने वाली59. लक्ष्मी- सौभाग्य की देवी60. पुरुषाकृति- वह जो पुरुष धारण कर ले61. विमिलौत्त्कार्शिनी- आनन्द प्रदान करने वाली62. ज्ञाना- ज्ञान से भरी हुई63. क्रिया- हर कार्य में होने वाली64. नित्या- अनन्त 65. बुद्धिदा- ज्ञान देने वाली66. बहुला- विभिन्न रूपों वाली67. बहुलप्रेमा- सर्व प्रिय68. सर्ववाहनवाहना- सभी वाहन पर विराजमान होने वाली69. निशुम्भशुम्भहननी- शुम्भ, निशुम्भ का वध करने वाली70. महिषासुरमर्दिनि- महिषासुर का वध करने वाली71. मधुकैटभहंत्री- मधु व कैटभ का नाश करने वाली72. चण्डमुण्ड विनाशिनि- चंड और मुंड का नाश करने वाली73. सर्वासुरविनाशा- सभी राक्षसों का नाश करने वाली74. सर्वदानवघातिनी- संहार के लिए शक्ति रखने वाली75. सर्वशास्त्रमयी- सभी सिद्धांतों में निपुण76. सत्या- सच्चाई77. सर्वास्त्रधारिणी- सभी हथियारों धारण करने वाली78. अनेकशस्त्रहस्ता- हाथों में कई हथियार धारण करने वाली79. अनेकास्त्रधारिणी- अनेक हथियारों को धारण करने वाली80. कुमारी- सुंदर किशोरी81. एककन्या- कन्या 82. कैशोरी- जवान लड़की83. युवती- नारी84. यति- तपस्वी85. अप्रौढा- जो कभी पुराना ना हो86. प्रौढा- जो पुराना है87. वृद्धमाता- शिथिल88. बलप्रदा- शक्ति देने वाली89. महोदरी- ब्रह्मांड को संभालने वाली90. मुक्तकेशी- खुले बाल वाली91. घोररूपा- एक भयंकर दृष्टिकोण वाली92. महाबला- अपार शक्ति वाली93. अग्निज्वाला- मार्मिक आग की तरह94. रौद्रमुखी- विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा95. कालरात्रि- काले रंग वाली 96. तपस्विनी- तपस्या में लगे हुए97. नारायणी- भगवान नारायण की विनाशकारी रूप98. भद्रकाली- काली का भयंकर रूप99. विष्णुमाया- भगवान विष्णु का जादू100. जलोदरी- ब्रह्मांड में निवास करने वाली101. शिवदूती- भगवान शिव की राजदूत102. करली – हिंसक103. अनन्ता- विनाश रहित104. परमेश्वरी- प्रथम देवी105. कात्यायनी- ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय106. सावित्री- सूर्य की बेटी107. प्रत्यक्षा- वास्तविक108. ब्रह्मवादिनी- वर्तमान में हर जगह वास करने वाली

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