Bhai Dooj 2024 Date: 2 या 3 नवंबर कब है भाई दूज ? यहां जानें सही तिथि और महत्व

Bhai Dooj 2024:यह पर्व दिवाली के दो दिन बाद मनाया जाता है, जब बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भाई दूज के दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक करती हैं और उनकी आरती उतारती हैं, वहीं भाई अपनी बहनों को उपहार और सुरक्षा का वचन देते हैं। Bhai Dooj 2024:भाई दूज का पर्व बहन और भाई के प्रति विश्वास और प्रेम का होता है। इस साल भाई दूज का पर्व किस दिन मनाया जाएगा इस बात को लेकर लोगों के बीच, थोड़ी दुविधा है। ऐसे में आइए जानते हैं इस साल भाई दूज का पर्व किस दिन मनाया जाता है।  Bhai Dooj 2024: भाई दूज के साथ ही पांच दिवसीय दिवाली उत्सव का समापन होता है। भाई दूज का पर्व बहन और भाई के प्रति विश्वास और प्रेम का होता है। हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन भाई दूज के पर्व मनाया जाता है। देशभर में भाई दूज के पर्व को अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। यह दिन भाई बहन के प्यार और स्नेह के रिश्ते का प्रतीक होता है। हालांकि इस साल भाई दूज का पर्व किस दिन मनाया जाएगा इस बात को लेकर लोगों के बीच, थोड़ी दुविधा है। ऐसे में आइए जानते हैं इस साल भाई दूज का पर्व किस दिन मनाया जाता है। Bhai Dooj 2024:कब है भाई दूज 2024? कार्तिक मास द्वितीया तिथि का आरंभ 2 नवंबर को रात 8:22 बजे हो जाएगा और कार्तिक द्वितीया तिथि 3 नवंबर को रात में 10:06 बजे तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार 3 नवंबर को भाई दूज का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन सुबह में 11 बजकर 39 मिनट तक सौभाग्य योग रहेगा। इसके बाद शोभन योग शुरू हो जाएगा। इसलिए भाई दूज के दिन पूजा के लिए सबसे उत्तम मुहूर्त 11:45 मिनट तक रहेगा। भाई दूज का महत्व:Bhai Dooj 2024 MAHETWA हिंदू धर्म में भाई दूज एक प्रमुख त्यौहार है। यह भाई बहन के बीच मान सम्मान और प्रेम प्रकट करने का दिन होता है। शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि पर यम अपनी बहन के घर गए थे। वहां उनकी बहन ने उनका खूब आदर सत्कार किया था, जिससे प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि, जो भाई बहन इस दिन यमुना में स्नान करके यम पूजा करेंगे। वह मृत्यु के बाद यमलोक नहीं जाएगा। भाई दूज को लेकर एक अन्य पौराणिक कथा यह भी है कि भगवान कृष्ण जब नरकासुर राक्षस का वध करके द्वारका लौटे थे, तो भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा ने फूल, मिठाई और अनेकों दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। इस दिन सुभद्रा ने भगवान कृष्ण के मस्तक पर टीका लगाकर उनकी लंबी आयु की कामना की थी। तभी से भाई दूज का पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है। गोवर्धन पूजा पर भूल से भी न करें ये 8 अशुभ काम

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गोवर्धन पूजा पर भूल से भी न करें ये 8 अशुभ काम

गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है. इस  पूजा की शुरुआत भगवान श्री कृष्ण ने की थी. इस दिन प्रकृति के आधार के रूप में गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है और समाज के आधार के रूप में गाय की पूजा होती है.  अगर आप भी गोवर्धन पूजा करते हैं और परिक्रमा पर जाते हैं तो कुछ बातों का ध्यान जरूर रखें. गोवर्धन पूजा पर कुछ ऐसे कार्य हैं जिन्हें अशुभ माना जाता है और इनसे बचना चाहिए। यहां आठ ऐसे कार्य दिए गए हैं जिन्हें गोवर्धन पूजा के दिन भूल से भी नहीं करना चाहिए: 1. जूठे या अशुद्ध स्थान पर पूजा न करें पूजा स्थान और स्वयं को शुद्ध करके ही पूजा करनी चाहिए। अशुद्धता से भगवान की कृपा नहीं मिलती। गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का आयोजन बंद कमरे में न करें. गायों की पूजा करते हुए ईष्टदेव या भगवान कृष्ण की पूजा करना न भूलें. 2. अहंकार से बचें इस दिन अहंकार और घमंड से बचना चाहिए, क्योंकि भगवान कृष्ण ने इंद्रदेव के अहंकार को तोड़ने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था। विनम्रता और भक्ति के साथ पूजा करें। परिवार के सभी लोग अलग अलग होकर पूजा ना करें, एक साथ ही पूजा-अर्चना करें. 3. प्रकृति का अनादर न करें गोवर्धन पूजा में प्रकृति और पर्यावरण का सम्मान किया जाता है। इस दिन जल, वायु, पेड़-पौधों, और जीव-जंतुओं का अनादर नहीं करना चाहिए। पूजन में सम्मिलित लोग काले रंग के कपड़े न पहनें. हल्के पीले या नारंगी रंग के वस्त्र पहनें तो उत्तम रहेगा. 4. गायों को परेशान न करें गोवर्धन पूजा पर गायों का विशेष महत्व है, इसलिए उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए। बल्कि उनकी सेवा और पूजा करें। गोवर्धन पूजा के दिन गाय या जीवों की सेवा करें और उन्हें खाना खिलाएं. 5. अन्न का अपमान न करें गोवर्धन पूजा पर अन्नकूट का भोग तैयार किया जाता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के अन्न का उपयोग होता है। अन्न का अपमान करना अशुभ माना जाता है, इसलिए अन्न का आदर करें। परिक्रमा करते समय जूते, चप्पल न पहनें. अगर कोई व्यक्ति कमजोर हो या फिर कोई छोटा बच्चा साथ में हो तो रबड़ की चप्पल या फिर कपड़े के जूते पहन सकते हैं. 6. लड़ाई-झगड़ा न करें गोवर्धन पूजा का उद्देश्य शांति और भाईचारे का संदेश देना है, इसलिए इस दिन किसी भी प्रकार का वाद-विवाद या झगड़ा नहीं करना चाहिए। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा कभी भी अधूरी नहीं छोड़नी चाहिए. 7. दुर्व्यवहार या कठोर वाणी का प्रयोग न करें इस दिन विशेष रूप से मधुर और विनम्र वाणी का प्रयोग करना चाहिए। कठोर वाणी का प्रयोग भगवान की कृपा में बाधा डाल सकता है। किसी भी प्रकार का धूम्रपान या कोई भी नशीली वस्तु का प्रयोग नहीं करना चाहिए. Govardhan Puja 2024: गोवर्धन पूजा में क्यों करते हैं गायों की पूजा, क्यों बनता है अन्नकूट का भोग? 8. बड़ों का अपमान न करें इस दिन अपने से बड़े और बुजुर्गों का आदर करना चाहिए। उनका अपमान करने से पुण्य की हानि होती है और भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होती। इन सभी बातों का ध्यान रखते हुए गोवर्धन पूजा में श्रद्धा और समर्पण के साथ पूजा करें, जिससे भगवान कृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त हो सके। गोवर्धन पूजा पर क्या करना चाहिए गोवर्धन पूजा में कुछ विशेष कार्य और विधियाँ हैं जिन्हें करने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। यहां बताया गया है कि गोवर्धन पूजा में क्या करना चाहिए: 1. पूजा स्थल की सफाई और सजावट सबसे पहले पूजा स्थान को अच्छे से साफ करें और गंगाजल या साफ जल से शुद्ध करें। रंगोली बनाएं और फूलों से सजाएं, जिससे पूजा स्थल का वातावरण पवित्र और सुंदर बने। 2. गाय और बछड़ों की पूजा करें गोवर्धन पूजा पर गायों का विशेष महत्व है। इस दिन गायों को नहलाकर सजाएं, उनके सींगों पर हल्दी और सिंदूर लगाएं, और उन्हें फूलों की माला पहनाएं। गायों को ताजे हरे चारे, गुड़, और मिठाई का भोग लगाएं और उनकी पूजा करें। 3. गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाएं घर में गोबर से गोवर्धन पर्वत का छोटा सा प्रतीकात्मक ढेर बनाएं और इसे फूलों से सजाएं। इसे गोवर्धन पर्वत का प्रतीक मानकर भगवान कृष्ण की पूजा करें। 4. अन्नकूट का भोग तैयार करें अन्नकूट का भोग तैयार करें जिसमें चावल, दाल, सब्जियाँ, मिठाई, रोटी और अन्य व्यंजन बनाएं। इन पकवानों को गोवर्धन पर्वत के प्रतीक और भगवान कृष्ण को अर्पित करें। भोग में पकवानों का ढेर बनाकर पर्वत का रूप दें। 5. भगवान कृष्ण की पूजा करें भगवान कृष्ण की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं, चंदन, फूल, धूप, और तुलसी दल अर्पित करें। भगवान कृष्ण को भोग लगाने के बाद उनकी आरती करें और भक्ति भाव से उनकी प्रार्थना करें। 6. गोवर्धन परिक्रमा करें गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाकर उसकी परिक्रमा करें। इसे 3 या 7 बार घूमें, और गोवर्धन पर्वत की महिमा का स्मरण करते हुए भक्ति भाव से परिक्रमा करें। 7. भोग और प्रसाद का वितरण करें अन्नकूट के भोग को परिवार और समुदाय में बाँटें। इसे प्रसाद के रूप में सभी के बीच वितरित करें। इससे समाज में एकता और प्रेम का संदेश मिलता है। 8. गायों की सेवा और दान करें इस दिन गायों की सेवा करें और उन्हें अच्छे भोजन का दान करें। इसके साथ ही जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, और धन का दान करें। यह कार्य पुण्य का कारक माना जाता है। इन सभी विधियों के साथ श्रद्धा और विश्वास के साथ गोवर्धन पूजा करें। भगवान कृष्ण की कृपा से परिवार में सुख-समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।

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Govardhan Puja 2024: गोवर्धन पूजा में क्यों करते हैं गायों की पूजा, क्यों बनता है अन्नकूट का भोग?

Govardhan Puja 2024: हर साल बड़े ही धूमधाम से दीपोत्सव मनाया जाता है. इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है और पांच दिनों दिवाली मनाई जाती है. इसके ठीक बाद गोवर्धन पूजा करने की परंपरा है, लेकिन क्या आप इसके पीछे की वजह जानते हैं? Govardhan Puja 2024: वैसे तो सनातन धर्म में हर त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन दीपों के उत्सव दीपावली की अलग ही रौनक होती है. ये त्योहार धनतेरस से शुरू होकर पांच दिनों तक मनाया जाता है. जैसे ही ये त्योहार खत्म होता है, उसके ठीक बाद गोवर्धन की पूजा की जाती है. इसके पीछे की वजह भी बेहद खास है. दरअसल, हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा होती है. इस दौरान घर के बाहर गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पूजा की जाती है. गोवर्धन पूजा में गायों की पूजा का भी खास महत्व है. क्यों मनाया जाता है ये पर्व?गोवर्धन पूजा भागवत पुराण में बताई गई पौराणिक कथाओं पर आधारित है. मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने वृंदावन वासियों से इंद्रदेव को प्रसाद चढ़ाने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए कहा था. जब इस बात की जानकारी वर्षा के देवता इंद्रदेव को हुई तब वो क्रोधित होकर वृंदावन पर मूसलाधार बारिश करने लगे. इस बारिश ने देखते ही देखते भयावह रूप ले लिया. जिससे वृंदावन वासियों और जानवरों को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया. Govardhan Puja 2024: कब और क्यों मनाई मनाया जाता है गोवर्धन पूजा का पर्व? क्या है इस दिन का शुभ मुहूर्त इंद्रदेव ने मांगी श्रीकृष्ण से माफीसात दिनों तक गोवर्धन पर्वत के नीचे ही वृंदावन वासियों ने शरण ली. इसके बाद ब्रह्मजी ने इंद्रदेव को बताया कि भगवान विष्णु ने ही पृथ्वी लोक पर श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया है. उनसे बैर लेना ठीक नहीं है. जब ये बात इंद्रदेव को पता चली तो उन्होंने श्रीकृष्ण से माफी मांगी. इसके बाद भगवान ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रख दिया. फिर हर साल गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा श्रीकृष्ण ने दी. जिसके बाद गोवर्धन पूजा का उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा. इस दिन घरों में अन्नकूट का भोग बनाया जाता है. हर घर में गाय के गोबर से गोवर्धन महाराज की प्रतिमा बनाकर पूरे परिवार के साथ पूजा अर्चना की जाती है. गायों की पूजा का महत्व गायों को भारतीय संस्कृति में “माता” का दर्जा दिया गया है, और इन्हें समृद्धि, शांति, और पालन-पोषण का प्रतीक माना जाता है। गोवर्धन पूजा के दिन गायों को सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है, क्योंकि भगवान कृष्ण भी ग्वालों और गायों के साथ जुड़े हुए थे और वे उन्हें बहुत प्रिय थे। गायों की पूजा करने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। अन्नकूट भोग का महत्व अन्नकूट का अर्थ है “अन्न का ढेर।” गोवर्धन पूजा के दिन विभिन्न प्रकार के अन्न, सब्जियाँ, मिठाई, और पकवान बनाकर भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत को अर्पित किए जाते हैं। यह भोग भगवान को प्रकृति से मिली संपदा का धन्यवाद देने के उद्देश्य से चढ़ाया जाता है। अन्नकूट भोग में पकवानों का ढेर बनाकर उसे पर्वत के आकार में सजाया जाता है, जो गोवर्धन पर्वत का प्रतीक है। इस भोग को बाँटकर प्रसाद के रूप में सभी में वितरित किया जाता है, जिससे समाज में एकता और भाईचारे का संदेश भी मिलता है। गोवर्धन पूजा की कथा पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने गोकुलवासियों को इंद्रदेव की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा करने के लिए प्रेरित किया। जब इंद्रदेव ने इस बात पर क्रोधित होकर भारी वर्षा की, तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर सभी की रक्षा की। इस घटना के बाद गोवर्धन पूजा का प्रचलन हुआ, जिसमें प्रकृति, गोवर्धन पर्वत, और गायों का महत्व प्रतिपादित होता है।

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Govardhan Puja 2024: कब और क्यों मनाई मनाया जाता है गोवर्धन पूजा का पर्व? क्या है इस दिन का शुभ मुहूर्त

Govardhan Puja:गोवर्धन पूजा का पर्व भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत को समर्पित है। यह पर्व हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि (Govardhan Puja Date 2024) को मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा-अर्चना और 56 भोग अर्पित करने से साधक को समस्त दुख और संताप से छुटकारा मिलता है। Govardhan puja 2024: हिंदू धर्म में दीपावली (Diwali) का त्योहार 5 दिन तक मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत धनतेरस के साथ होती है. इसके बाद रूप चौदस, दीपावली, गोवर्धन और भाई दूज का पावन त्योहार मनाया जाता है, लेकिन इस बार दीपावली की डेट को लेकर बहुत असमंजस चल रहा है. जिसके कारण आगे और पीछे के त्योहारों को लेकर भी कंफ्यूजन है, तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा (Govardhan puja) कब की जाएगी. बता दें कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण (Lord Shri Krishna) की पूजा अर्चना की जाती है, साथ ही गोवर्धन पर्वत बनाकर उसकी भी आराधना होती है. आइए जानें इसकी सही तारीख क्या है और इस दिन आप किस तरीके से पूजा अर्चना कर सकते हैं. Govardhan Puja:गोवर्धन पूजा 2024 Date हिन्दू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व होता है, जो हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है. कहते हैं कि इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर भगवान श्री कृष्ण की पूजा अर्चना की जाए तो सभी दुख और संताप दूर हो जाते हैं. इस बार गोवर्धन पूजा का पावन त्योहार 2 नवंबर 2024 को मनाया जाएगा, हालांकि इसकी तिथि 1 नवंबर 2024 को शाम 6:16 को शुरू हो जाएगी और इसका समापन 2 नवंबर को रात 8:21 पर होगा, ऐसे में उदिया तिथि के अनुसार गोवर्धन पूजा का त्योहार 2 नवंबर को ही मनाया जाएगा. Govardhan Puja Subh Muhurat:गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त  ज्योतिषों के अनुसार, गोवर्धन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त 2 नवंबर 2024 को सुबह 6 बजे से लेकर 8:00 तक रहेगा. इसके बाद दोपहर में 3:23 से लेकर 5:35 के बीच में भी पूजा अर्चना की जा सकती है. गोवर्धन पूजा के लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गोबर से गोवर्धन पर्वत और भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति बनाई जाती है, मूर्ति को फूलों और रंगों से सजाया जाता है. इसके बाद गोवर्धन पर्वत और भगवान श्री कृष्ण की पूजा अर्चना की जाती है, भगवान को फल, फूल, मिष्ठान आदि अर्पित किए जाते हैं. इस दौरान कढ़ी और अन्नकूट, चावल का भोग जरूर लगाया जाता है. इसके बाद इस दिन गाय, बैल और भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी की जाती है, पूजा करने के बाद घर में बनाए गए गोवर्धन पर्वत की सात परिक्रमा की जाती है और आखिर में आरती करके पूजा को संपन्न किया जाता है. Govardhan Puja:गोवर्धन पूजा विधि Govardhan Puja ka mahetwa:गोवर्धन पूजा का महत्व गोवर्धन पूजा के दिन को हिंदू धर्म में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपने उंगली पर उठाकर इंद्र देव की घमंड को चूर-चूर किया था। इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा तो की ही जाती है, साथ ही यह त्योहार मानव और प्रकृति के बीच के संबंध को भी दर्शाता है। इस दिन दान-पुण्य करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है और आपके जीवन में सकारात्मकता आती है। गोवर्धन महाराज की पूजा के साथ ही इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा आराधना करने से भी आपको लाभ मिलता है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है.KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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Tulsi Aarti – Maharani Namo Namo:(तुलसी आरती – महारानी नमो-नमो)

Tulsi Aarti:तुलसी आरती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है, और इसके कई फायदे भी होते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख फायदे दिए गए हैं: इन सबके अलावा, तुलसी की आरती करने से भक्ति का भाव भी गहरा होता है, जिससे व्यक्ति के जीवन में संतोष और खुशी बनी रहती है। Tulsi Aarti – Maharani Namo Namo:(तुलसी आरती – महारानी नमो-नमो) Tulsi Aarti:माँ तुलसी पूजन, तुलसी विवाह एवं कार्तिक माह में माँ तुलसी की आरती सबसे अधिक श्रवण की जाती है। तुलसी महारानी नमो-नमो,हरि की पटरानी नमो-नमो । धन तुलसी पूरण तप कीनो,शालिग्राम बनी पटरानी ।जाके पत्र मंजरी कोमल,श्रीपति कमल चरण लपटानी ॥ तुलसी महारानी नमो-नमो,हरि की पटरानी नमो-नमो । धूप-दीप-नवैद्य आरती,पुष्पन की वर्षा बरसानी ।छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन,बिन तुलसी हरि एक ना मानी ॥ तुलसी महारानी नमो-नमो,हरि की पटरानी नमो-नमो । सभी सखी मैया तेरो यश गावें,भक्तिदान दीजै महारानी ।नमो-नमो तुलसी महारानी,तुलसी महारानी नमो-नमो ॥ तुलसी महारानी नमो-नमो,हरि की पटरानी नमो-नमो ।

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Dhanteras ke din deepak kaha jalaye : धनतेरस के दिन इन जगहों पर दीपक जलाने से घर में होगा मां लक्ष्मी का वास!

deepak:lighting lamp on dhanteras : हिंदू धर्म में धनतेरस के पर्व से साथ ही रोशनी का त्योहार माने जाने वाले 5 दिन के उत्सव दिवाली की शुरुआत हो जाती है. धनतेरस के दिन मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए लोग तरह तरह की खरीदारी करते हैं और अपने घर को दीपक से सजाते हैं. deepak:धनतेरस पर दीप जलाने की परंपरा माँ लक्ष्मी और भगवान धन्वंतरि का स्वागत करने के लिए की जाती है, ताकि घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो। यहाँ कुछ विशेष स्थान दिए जा रहे हैं जहाँ दीपक जलाने से घर में माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है: इस वर्ष कब है धनतेरस? (Dhanteras 2024 Date) deepak:वैदिक पंचांग के अनुसार, त्रयोदशी तिथि का आरंभ मंगलवार 29 अक्टूबर 2024 की सुबह 10 बजकर 31 मिनट पर होगा, और त्रयोदशी तिथि का समापन अगले दिन बुधवार 30 अक्टूबर 2024 की दोपहर 1 बजकर 15 मिनट पर होगा. उदया तिथि के अनुसार, इस वर्ष धनतेरस का त्योहार 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा. धनतेरस के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त (Dhanteras 2024 Puja Shubh Muhurat) हिंदू पंचांग के अनुसार, धनतेरस पूजा के लिए शुभ मुहूर्त की शुरुआत मंगलवार 29 अक्टूबर शाम 6 बजकर 31 मिनट से लेकर 8 बजकर 13 मिनट तक रहेगा, इस बार धनतेरस की पूजा के लिए कुल 1 घंटा 41 मिनट का समय मिलेगा. 1. मुख्य द्वार पर दीपक deepak 2. पूजा स्थल या मंदिर में 3. तिजोरी या धन रखने की जगह 4. रसोईघर में 5. पानी की टंकी के पास 6. द्वार पर मांडवा या तुलसी के पौधे के पास 7. छत पर दीपक 8. घर के प्रत्येक कोने में 9. द्वार पर रंगोली के साथ दीपक deepak 10. बगीचे या आंगन में इन विशेष स्थानों पर दीपक जलाने से घर में माँ लक्ष्मी का वास होता है और सुख-समृद्धि बनी रहती है। ध्यान रहे कि दीपक नियमित रूप से जलते रहें ताकि माँ लक्ष्मी की कृपा अनवरत बनी रहे।

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Diwali Celebrations: दिवाली पर घर को सजाने के लिए रंगोली के ये डिजाइन हैं बेस्ट

Diwali Celebrations:दिवाली साल के मुख्य सबसे बड़े त्योहारों में से एक है. इस दिन हर तरफ लाइटिंग, जगमगाते हुए दीपक, आतिशबाजी, घरों में व्यंजनों की खुशबू दिल खुश कर देती है. इस बार दिवाली का फेस्टिवल 31 अक्टूबर को सेलिब्रेट किया जाएगा. आप इस खास दिन अपने आंगन में मां लक्ष्मी का स्वागत करने के लिए खूबसूरत और आसान Diwali Celebrations रंगोली डिजाइन बना सकते हैं. तो चलिए देख लेते हैं. दिवाली के दिन अगर ज्यादा समय नहीं है तो अपने आंगन में गेंदे और गुलाब के फूलों से ये फटाफट बनने वाली रंगोली डिजाइन बना सकती हैं. कुछ फूलों की पत्तियों को तोड़ लें तो कुछ फूलों का साबुत रखें, बीच में गोलाई बनाकर पत्तियां बना दें और फिर उसके ऊपर गेंदे के फूलों से गोलाई बनाएं. खाली बैकग्राउंड को फूलों की पंखुड़ियों से भरकर रंगोली कंप्लीट करें. रात में जब इस रंगोली पर दिए जलाएंगे तो यह बेहद खूबसूरत दिखेगी.  दिवाली पर घर को सजाने के लिए रंगोली एक प्रमुख परंपरा है, जिससे घर में सकारात्मकता और शुभता का वातावरण बनता है। यहाँ कुछ बेहतरीन रंगोली डिज़ाइन्स दिए जा रहे हैं जो दिवाली पर विशेष रूप से सुंदर और आकर्षक लगते हैं: 1. फूलों की रंगोली Diwali Celebrations 2. मोर रंगोली डिज़ाइन Diwali Celebrations 3. गणेश जी का डिज़ाइन Diwali Celebrations 4. मांडला रंगोली डिज़ाइन Diwali Celebrations 5. दीपक और कमल डिज़ाइन Diwali Celebrations 6. धन लक्ष्मी रंगोली डिज़ाइन Diwali 2024 Date and Time : दीपावली कब है, जानें धनतेरस, दिवाली, भाई दूज की सही तारीख 7. राधा-कृष्ण रंगोली 8. साधारण ज्योमेट्रिक डिज़ाइन Diwali Celebrations 9. पारंपरिक रंगोली 10. 3D रंगोली डिज़ाइन दिवाली पर रंगोली बनाते समय इसे दीपों और फूलों से सजाएं ताकि यह और भी आकर्षक लगे। ये डिज़ाइन न केवल सुंदर लगते हैं बल्कि घर में सुख-शांति और समृद्धि भी लाते हैं।

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Don’t make these mistakes on Diwali: दिवाली के दिन भूल से भी न करें ये गलतियां, जानें क्या करें और क्या नहीं ?

Diwali Puja ke Niyam: दिवाली, हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार है. इस दिन हम सभी लक्ष्मी माता की पूजा करते हैं और घरों को रोशनी से जगमगाते हैं. लेकिन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दिवाली के दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए. आइए जानते हैं दिवाली के दिन क्या करें और क्या नहीं? Diwali 2024 : दिवाली हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे पूरे भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है. इस दिन लक्ष्मी पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जो सुख-समृद्धि लाने के उद्देश्य से किए जाते हैं. Diwali दिवाली के शुभ मौके पर माता लक्ष्मी की और गणेश जी की विधि विधान से पूजा का नियम हैं. मान्यता के अनुसार, इस दिन माता लक्ष्मी और गणेश जी पूजा और दान पुण्य करने से कई गुना पुण्य फल की प्राप्ति होती है. लेकिन इस दिन विधिवत पूजा करने के साथ कुछ नियमों का पालन करना बेहद जरूरी माना जाता है. आइए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जानते हैं कि दिवाली के दिन क्या करना जरूरी होता है और किन कामों को करने से बचना चाहिए. दिवाली के दिन शुभता और सकारात्मकता बनाए रखने के लिए कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए। इस दिन कुछ गलतियाँ होती हैं जिनसे बचना चाहिए, ताकि पर्व का पूर्ण लाभ मिल सके। आइए जानते हैं कि दिवाली के दिन क्या करें और क्या नहीं। Diwali Pe kya kare:क्या करें Diwali Pe Kya Nahi Kare:क्या नहीं करें इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर आप दिवाली का आनंद पूरी शुभता और सकारात्मकता के साथ उठा सकते हैं। दिवाली की पूजा विधि शुभ मूहुर्त और विधानों का पालन करके सम्पन्न की जाती है, जिसमें माँ लक्ष्मी, भगवान गणेश और अन्य देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। यहाँ पर एक सरल पूजा विधि दी जा रही है: Diwali 2024: इस दिन मनाई जाएगी दीपावली, जानें शुभ मुहूर्त और ऐतिहासिक महत्व Diwali Ke Din Pujan Sammgri:दिवाली पूजन सामग्री: Diwali Puja Vidhi:दिवाली पूजन विधि:

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धनतेरस पर खास उपाय: पूरे साल रहें निरोगी और खुशहाल

धनतेरस पर खास उपाय: पूरे साल रहें निरोगी और खुशहाल धनतेरस का त्यौहार न केवल धन और समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह हमारे जीवन में स्वास्थ्य और शांति बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण समय भी है। यदि आप इस धनतेरस पर कुछ खास उपाय अपनाते हैं, तो सालभर निरोगी और खुशहाल जीवन जी सकते हैं। इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपके साथ कुछ ऐसे खास और सरल Health Tips for Dhanteras साझा करेंगे, जो आपको पूरे साल एनर्जी और स्वास्थ्य से भरपूर बनाए रखेंगे। 1. धातु का बर्तन खरीदें (Buy Metal Utensils on Dhanteras) धनतेरस पर धातु (Metal) का बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। यह न केवल समृद्धि का प्रतीक है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। विशेषकर तांबे और पीतल के बर्तनों में पानी पीना स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी होता है। Copper और Brass बर्तन में पानी पीने से पाचन तंत्र मजबूत होता है और शरीर में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। Keyword: Dhanteras Metal Benefits, Health Tips for Dhanteras, तांबे के बर्तन के फायदे 2. धन्वंतरि पूजा (Dhanvantari Puja for Health) धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा (Dhanvantari Puja) करना शुभ माना जाता है। भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं और उनकी पूजा करने से शरीर निरोगी रहता है। स्वास्थ्य की देवी मानी जाने वाली तुलसी के पौधे का भी पूजा में प्रयोग करें। यह उपाय रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है। Keyword: Dhanteras Puja Benefits, Dhanvantari Worship, आयुर्वेदिक पूजा धनतेरस 3. आयुर्वेदिक स्नान (Ayurvedic Bath for Health) इस धनतेरस पर नीम, तुलसी, हल्दी और गंगाजल को स्नान के पानी में मिलाकर स्नान करें। इस आयुर्वेदिक स्नान (Ayurvedic Bath) से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है और स्किन भी ग्लो करती है। नीम और तुलसी के गुणों से त्वचा के रोग दूर होते हैं और हल्दी से शरीर की अशुद्धियाँ निकलती हैं। Keyword: Ayurvedic Bath Benefits, Neem Bath Dhanteras, Health Tips on Dhanteras 4. घी का दीपक जलाएं (Light a Ghee Lamp) धनतेरस की रात को घर में घी का दीपक जलाएं। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और वातावरण शुद्ध होता है। माना जाता है कि घी का दीपक (Ghee Lamp) जलाने से रोगों से मुक्ति मिलती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है। Keyword: Ghee Lamp Benefits, Dhanteras Rituals, Positive Energy Tips 5. तुलसी का पौधा लगाएं (Plant a Tulsi for Health) तुलसी का पौधा न केवल एक पवित्र पौधा है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बहुत फायदेमंद है। धनतेरस पर तुलसी का पौधा लगाने से पूरे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। तुलसी के पत्तों का सेवन भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। Keyword: Tulsi Benefits, Health Tips Dhanteras, तुलसी के फायदे 6. रात में चांदी का गिलास पास रखें (Keep Silver Glass Near Bed) रात में अपने बिस्तर के पास चांदी का गिलास रखें। चांदी (Silver) शरीर को ठंडक प्रदान करती है और नींद में सुधार करती है। यह मेटल स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है और इसके संपर्क से तनाव कम होता है। Keyword: Silver Health Benefits, Dhanteras Silver Tips, चांदी के फायदे 7. आरोग्य यंत्र की स्थापना (Place Arogya Yantra for Health) धनतेरस पर आरोग्य यंत्र (Arogya Yantra) की स्थापना करने से वर्षभर स्वास्थ्य में सुधार होता है। इसे पूजा स्थल में स्थापित करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और घर में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दूर रहती हैं। Keyword: Arogya Yantra Benefits, Health Yantra Dhanteras, आरोग्य यंत्र के लाभ निष्कर्ष धनतेरस (Dhanteras) पर इन छोटे-छोटे उपायों को अपनाकर आप अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं। भगवान धन्वंतरि की कृपा से और इन हेल्दी रिचुअल्स (Healthy Rituals) को अपनाकर इस वर्ष को निरोगी, सुखी और खुशहाल बना सकते हैं। धनतेरस का यह अवसर आपको न सिर्फ आर्थिक समृद्धि बल्कि अच्छे स्वास्थ्य का वरदान भी दे सकता है। इस धनतेरस पर स्वास्थ्य और समृद्धि का स्वागत करें और सालभर खुशहाल जीवन जीएं। Happy Dhanteras!

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Diwali 2024: इस दिन मनाई जाएगी दीपावली, जानें शुभ मुहूर्त और ऐतिहासिक महत्व

Diwali 2024:दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, भारत का एक प्रमुख और बेहद खास त्योहार है। यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञानता पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है। Diwali 2024 दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है और इसे रोशनी, रंगोली, मिठाइयाँ और पटाखों से सजाया जाता है। Diwali 2024 इस दिन लोग अपने घरों को दीपों और रंगीन लाइट्स से सजाते हैं, लक्ष्मी पूजा करते हैं, और परिवार व दोस्तों के साथ इस पावन पर्व का आनंद उठाते हैं। Diwali 2024:पौराणिक कथाओं के अनुसार, दीपावली के दिन भगवान राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे थे, और उनके स्वागत के लिए नगरवासियों ने दीप जलाए थे। यह दिन इसलिए भी खास माना जाता है कि इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है, ताकि घर में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहे। दीपावली का पांच दिनों का यह त्योहार धनतेरस से शुरू होता है और भाई दूज पर समाप्त होता है। इस दौरान लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों को उपहार देते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं, और साथ में खुशियाँ मनाते हैं। Diwali 2024 Date and Time : दीपावली कब है, जानें धनतेरस, दिवाली, भाई दूज की सही तारीख दिवाली 2024 कब है? (When is Diwali 2024 दिवाली हमेशा कार्तिक अमावस्या की रात्रि के समय मनाई जाती है। दीपोत्सव हमेशा रात में ही किया जाता है। इस साल कार्तिक अमावस्या 31 अक्टूबर को दिन में 2 बजकर 40 मिनट से लग रही है, दीपावली के त्यौहार में रात्रि के समय अमावस्या होना जरूरी है। 1 नवम्बर की रात्रि को अमावस्या तिथि समाप्त हो जाएगी। साथ ही इसमें उदया तिथि की मान्यता नहीं होती; इसलिए इस साल दीपावली 31 अक्टूबर को मनाई जाएगी। दीपावली का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व दीपावली का धार्मिक महत्व रामायण से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस दिन Diwali 2024 भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण चौदह वर्षों का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में पूरे नगर को दीपों से सजाया था और तभी से दीपावली का पर्व मनाया जाने लगा। इसके साथ ही, इस दिन भगवान विष्णु ने नरकासुर का वध कर 16,000 कन्याओं को उसके कैद से मुक्त कराया था, इसलिए इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का दिन भी कहा जाता है। लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त (Laxmi puja 2024 shubh muhurat) दीपावली के अवसर पर धन की देवी माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। लोग इस दिन माँ लक्ष्मी से अपने घर में धन, समृद्धि और शांति की कामना करते हैं। इस बार लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त 31 अक्टूबर 2024 को शाम 5 बजे से रात्रि 10 बजकर 30 मिनट तक है। कहा जाता है कि कार्तिक मास की अमावस्या पर समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसलिए इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा का खास महत्व है। Diwali 2024 इस दिन माता लक्ष्मी घर-घर जाकर अपने भक्तों को सुख-समृद्धि और धन-दौलत का आशीर्वाद देती हैं। भगवान गणेश और माता लक्ष्मी को लगाएं ये भोग माता लक्ष्मी और भगवान गणेश को भोग में खीर, बूंदी के लड्डू, सिंघाड़ा, अनार, नारियल, पान का पत्ता, हलवा, मखाने, सफेद रंग की मिठाई, खील, चूरा, इलायची दाने का भोग लगाएं। दीपावली का सामाजिक महत्व दीपावली सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज को एकजुट करने वाला पर्व भी है। इस पर्व के पहले लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, उन्हें सजाते हैं और विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार करते हैं। यह पर्व परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर खुशी मनाने का भी अवसर है। लोग एक-दूसरे को मिठाइयाँ और उपहार देते हैं, Diwali 2024 जिससे रिश्तों में मिठास और निकटता बढ़ती है। इसके साथ ही लोग इस दिन लोग जरूरतमंदों का भी ध्यान रखते हैं, इस दिन लोग उन जरूरतमंदों की सहायता करते हैं जो अपनी आर्थिक परेशानियों के कारण इस उत्सव में पूरे मन के साथ भाग नहीं ले पाते। इस दिन लोग जरूरतंमंदों को दीये, कपड़े, पटाखे, पूजा का समान और मिठाई आदि उपहार में देते हैं, ताकि हर घर खुशियों की दीपवाली मनाई जा सके। सामाजिक दृष्टि से दीपावली एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। दीपों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि जीवन में चाहे कितना भी अंधकार हो, एक छोटा सा दीप भी उसे दूर कर सकता है। यह हमें यह सिखाता है कि हमें अपने जीवन में हर प्रकार के नकारात्मकता और बुराई को हटाकर अच्छाई की ओर बढ़ना चाहिए। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Bhagwan Shri Sheetalnath Ji Chalisa:चालीसा: भगवान श्री शीतलनाथ जी

Shri Sheetalnath Ji Chalisa:शीतलनाथ जी की चालीसा:विभिन्न संप्रदायों में भिन्न चालीसें: जैन धर्म के भीतर विभिन्न संप्रदाय हैं, और प्रत्येक संप्रदाय के अपने विशिष्ट स्तोत्र और चालीसें हो सकती हैं। Shri Sheetalnath Ji Chalisa:लोकप्रियता: सभी देवताओं के लिए समान रूप से प्रचलित चालीसें नहीं होतीं। लिखित स्रोतों की सीमित उपलब्धता: सभी चालीसें लिखित रूप में उपलब्ध नहीं होतीं, कई बार ये मौखिक परंपराओं के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी передаई जाती हैं। Shri Sheetalnath Ji Chalisa:हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं? आपके पास चालीसे का कोई हिस्सा या भाव है जो आपको याद है? Shri Sheetalnath Ji Chalisa:अधिक विशिष्ट जानकारी आप किस संप्रदाय के अनुयायी हैं? आपको किस प्रकार की चालीसा चाहिए Shri Sheetalnath Ji Chalisa (भावनात्मक, ज्ञानवर्धक, या किसी विशेष उद्देश्य के लिए)? शीतलनाथ जी के बारे में सामान्य जानकारी शीतलनाथ जी जैन धर्म के तीर्थंकर हैं। उन्हें शांति और शीतलता के देवता माना जाता है। Shri Sheetalnath Ji Chalisa उनकी पूजा करने से मन को शांति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। Bhagwan Shri Sheetalnath Ji:चालीसा: भगवान श्री शीतलनाथ जी शीतल हैं शीतल वचन, चन्दन से अधिकाय।कल्प वृक्ष सम प्रभु चरण, हैं सबको सुखकाय॥ जय श्री शीतलनाथ गुणाकर, महिमा मंडित करुणासागर।भाद्दिलपुर के दृढरथ राय, भूप प्रजावत्सल कहलाये॥ रमणी रत्न सुनन्दा रानी, गर्भ आये श्री जिनवर ज्ञानी।द्वादशी माघ बदी को जन्मे, हर्ष लहर उठी त्रिभुवन में॥ उत्सव करते देव अनेक, मेरु पर करते अभिषेक।नाम दिया शिशु जिन को शीतल, भीष्म ज्वाल अध् होती शीतल॥ एक लक्ष पुर्वायु प्रभु की, नब्बे धनुष अवगाहना वपु की।वर्ण स्वर्ण सम उज्जवलपीत, दया धर्मं था उनका मीत॥ निरासक्त थे विषय भोगो में, रत रहते थे आत्म योग में।एक दिन गए भ्रमण को वन में, करे प्रकृति दर्शन उपवन में॥ लगे ओसकण मोती जैसे, लुप्त हुए सब सूर्योदय से।देख ह्रदय में हुआ वैराग्य, आत्म राग में छोड़ा राग॥ तप करने का निश्चय करते, ब्रह्मर्षि अनुमोदन करते।विराजे शुक्र प्रभा शिविका में, गए सहेतुक वन में जिनवर॥ संध्या समय ली दीक्षा अश्रुण, चार ज्ञान धारी हुए तत्क्षण।दो दिन का व्रत करके इष्ट, प्रथामाहार हुआ नगर अरिष्ट॥ दिया आहार पुनर्वसु नृप ने, पंचाश्चार्य किये देवों ने।किया तीन वर्ष तप घोर, शीतलता फैली चहु और॥ कृष्ण चतुर्दशी पौषविख्यता, केवलज्ञानी हुए जगात्ग्यता।रचना हुई तब समोशरण की, दिव्यदेशना खिरी प्रभु की॥ आतम हित का मार्ग बताया, शंकित चित्त समाधान कराया।तीन प्रकार आत्मा जानो, बहिरातम अन्तरातम मानो॥ निश्चय करके निज आतम का, चिंतन कर लो परमातम का।मोह महामद से मोहित जो, परमातम को नहीं माने वो॥ वे ही भव भव में भटकाते, वे ही बहिरातम कहलाते।पर पदार्थ से ममता तज के, परमातम में श्रद्धा कर के॥ जो नित आतम ध्यान लगाते, वे अंतर आतम कहलाते।गुण अनंत के धारी हे जो, कर्मो के परिहारी है जो॥ लोक शिखर के वासी है वे, परमातम अविनाशी है वे।जिनवाणी पर श्रद्धा धर के, पार उतारते भविजन भव से॥ श्री जिन के इक्यासी गणधर, एक लक्ष थे पूज्य मुनिवर।अंत समय में गए सम्म्मेदाचल, योग धार कर हो गए निश्चल॥ अश्विन शुक्ल अष्टमी आई, मुक्तिमहल पहुचे जिनराई।लक्षण प्रभु का कल्पवृक्ष था, त्याग सकल सुख वरा मोक्ष था॥ शीतल चरण शरण में आओ, कूट विद्युतवर शीश झुकाओ।शीतल जिन शीतल करें, सबके भव आतप।अरुणा के मन में बसे, हरे सकल संताप॥

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Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा

Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा: कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले देवता Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा हिंदू धर्म में चित्रगुप्त देवता की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। चित्रगुप्त जी को सभी मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाला माना जाता है। वे यमराज के सचिव हैं Chitragupt Chalisa और मृत्यु के बाद हर व्यक्ति के कर्मों के आधार पर उसके स्वर्ग या नर्क जाने का निर्णय लेते हैं। Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा का महत्व Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा के प्रमुख बिंदु Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा कैसे गाएं? चित्रगुप्त चालीसा को श्रद्धा और भक्ति भाव से गाया जाना चाहिए। Chitragupt Chalisa आप किसी अनुभवी व्यक्ति से मार्गदर्शन ले सकते हैं या फिर ऑनलाइन उपलब्ध वीडियो और ऑडियो का सहारा ले सकते हैं। यहां कुछ टिप्स दिए गए हैं जो आपको चित्रगुप्त चालीसा गाते समय मदद कर सकते हैं: Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा ॥ दोहा ॥सुमिर चित्रगुप्त ईश को, सतत नवाऊ शीश।ब्रह्मा विष्णु महेश सह, रिनिहा भए जगदीश॥करो कृपा करिवर वदन, जो सरशुती सहाय।चित्रगुप्त जस विमलयश, वंदन गुरूपद लाय॥ ॥ चौपाई ॥जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर।जय यमेश दिगंत उजागर॥ अज सहाय अवतरेउ गुसांई।कीन्हेउ काज ब्रम्ह कीनाई॥ श्रृष्टि सृजनहित अजमन जांचा।भांति-भांति के जीवन राचा॥ अज की रचना मानव संदर।मानव मति अज होइ निरूत्तर॥ ४ ॥ भए प्रकट चित्रगुप्त सहाई।धर्माधर्म गुण ज्ञान कराई॥ राचेउ धरम धरम जग मांही।धर्म अवतार लेत तुम पांही॥ अहम विवेकइ तुमहि विधाता।निज सत्ता पा करहिं कुघाता॥ श्रष्टि संतुलन के तुम स्वामी।त्रय देवन कर शक्ति समानी॥ ८ ॥ पाप मृत्यु जग में तुम लाए।भयका भूत सकल जग छाए॥ महाकाल के तुम हो साक्षी।ब्रम्हउ मरन न जान मीनाक्षी॥ धर्म कृष्ण तुम जग उपजायो।कर्म क्षेत्र गुण ज्ञान करायो॥ राम धर्म हित जग पगु धारे।मानवगुण सदगुण अति प्यारे॥ १२ ॥ विष्णु चक्र पर तुमहि विराजें।पालन धर्म करम शुचि साजे॥ महादेव के तुम त्रय लोचन।प्रेरकशिव अस ताण्डव नर्तन॥ सावित्री पर कृपा निराली।विद्यानिधि माँ सब जग आली॥ रमा भाल पर कर अति दाया।श्रीनिधि अगम अकूत अगाया॥ २० ॥ ऊमा विच शक्ति शुचि राच्यो।जाकेबिन शिव शव जग बाच्यो॥ गुरू बृहस्पति सुर पति नाथा।जाके कर्म गहइ तव हाथा॥ रावण कंस सकल मतवारे।तव प्रताप सब सरग सिधारे॥ प्रथम् पूज्य गणपति महदेवा।सोउ करत तुम्हारी सेवा॥ २४ ॥ रिद्धि सिद्धि पाय द्वैनारी।विघ्न हरण शुभ काज संवारी॥ व्यास चहइ रच वेद पुराना।गणपति लिपिबध हितमन ठाना॥ पोथी मसि शुचि लेखनी दीन्हा।असवर देय जगत कृत कीन्हा॥ लेखनि मसि सह कागद कोरा।तव प्रताप अजु जगत मझोरा॥ २८ ॥ विद्या विनय पराक्रम भारी।तुम आधार जगत आभारी॥ द्वादस पूत जगत अस लाए।राशी चक्र आधार सुहाए॥ जस पूता तस राशि रचाना।ज्योतिष केतुम जनक महाना॥ तिथी लगन होरा दिग्दर्शन।चारि अष्ट चित्रांश सुदर्शन॥ ३२ ॥ राशी नखत जो जातक धारे।धरम करम फल तुमहि अधारे॥ राम कृष्ण गुरूवर गृह जाई।प्रथम गुरू महिमा गुण गाई॥ श्री गणेश तव बंदन कीना।कर्म अकर्म तुमहि आधीना॥ देववृत जप तप वृत कीन्हा।इच्छा मृत्यु परम वर दीन्हा॥ ३६ ॥ धर्महीन सौदास कुराजा।तप तुम्हार बैकुण्ठ विराजा॥ हरि पद दीन्ह धर्म हरि नामा।कायथ परिजन परम पितामा॥ शुर शुयशमा बन जामाता।क्षत्रिय विप्र सकल आदाता॥ जय जय चित्रगुप्त गुसांई।गुरूवर गुरू पद पाय सहाई॥ ४० ॥ जो शत पाठ करइ चालीसा।जन्ममरण दुःख कटइ कलेसा॥ विनय करैं कुलदीप शुवेशा।राख पिता सम नेह हमेशा॥ ॥ दोहा ॥ज्ञान कलम, मसि सरस्वती, अंबर है मसिपात्र।कालचक्र की पुस्तिका, सदा रखे दंडास्त्र॥पाप पुन्य लेखा करन, धार्यो चित्र स्वरूप।श्रृष्टिसंतुलन स्वामीसदा, सरग नरक कर भूप॥ ॥ इति श्री चित्रगुप्त चालीसा समाप्त॥

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