Ganesha Mahimna Stotra | गणेशमहिम्न: स्तोत्र

गणेश महिम्न स्तोत्र (गणेशमहिम्न: स्तोत्र): गणेश महिम्न स्तोत्र भगवान गणेश के लोकप्रिय मंत्रों में से एक है। गणेश महिम्न स्तोत्र में उल्लेख है कि सभी महान मंत्र भगवान गणेश से उत्पन्न हुए हैं। यह आम तौर पर भगवान की आराधना में भक्तों द्वारा दैनिक आधार पर जप किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि गणेश महिम्न स्तोत्र के उचित पाठ से व्यक्ति को समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद मिलता है। गणेश महिम्न स्तोत्र का जाप करने वाले को भौतिक धन और उसके परिवार में खुशियाँ भी मिलती हैं। भक्ति भजन गाकर उपासक भगवान गणेश की स्तुति करता है और उनसे बाधाओं और अन्य बुराइयों से रक्षा करने का अनुरोध करता है। ब्रह्मांड हाथी के सिर वाले भगवान से उत्पन्न हुआ है और उन्हीं के भीतर सीमित है। यहां तक ​​​​कि वेद भी गणपति को नमन करते हैं जो परिभाषा से परे हैं। देवता को गणपति द्वारा भगवान गणेश के रूप में पूजा जाता है सौरस द्वारा भगवान सूर्य (सूर्य) के रूप में। शक्तिवाद के अनुयायी भगवान को ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में मानते हैं। उन्हें शाश्वत ब्रह्म का एक रूप माना जाता है। गणेश महिम्न स्तोत्र (गणेशमहिम्न: स्तोत्र) का जाप करने वाले को भी अपने परिवार में भौतिक धन और खुशी की प्राप्ति होगी। भक्ति भजन गाकर उपासक भगवान गणेश की स्तुति करता है और उनसे बाधाओं और अन्य बुराइयों से रक्षा करने का अनुरोध करता है। भगवान महागणेश का आशीर्वाद व्यक्ति को भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष (आध्यात्मिक प्राप्ति) दोनों प्रदान करने में सक्षम है। महागणपति की साधना का उद्देश्य व्यक्ति के पिछले जन्मों के सभी पापों और बुराइयों को बेअसर करना है ताकि व्यक्ति जीवन में धन, समृद्धि और सभी सुखों का भरपूर आनंद लेने के योग्य बन सके, इस प्रकार पूर्ण तृप्ति और अंततः आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त हो सके। गणपति स्तोत्र का जाप करने से निम्नलिखित लाभ अवश्य प्राप्त होते हैं। भारतीयों में किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले भगवान गणपति की प्रार्थना करने की परंपरा है। गणेश महिम्न स्तोत्र भगवान गणेश के लोकप्रिय मंत्रों में से एक है। आम तौर पर भगवान की आराधना में भक्तों द्वारा इसका जाप प्रतिदिन किया जाता है। गणेश महिम्न स्तोत्र के लाभऐसा माना जाता है कि गणेश महिम्न स्तोत्र के उचित पाठ से व्यक्ति को समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।भगवान गणेश महिम्न स्तोत्र बाधाओं और अन्य बुराइयों से रक्षा करता है।गणेश महिम्न स्तोत्र का जाप करने वाले को भौतिक धन और परिवार में खुशियाँ भी प्राप्त होती हैं।इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए:जो लोग जीवन में सफलता, समृद्धि और कृपा चाहते हैं, उन्हें नियमित रूप से इस गणेश महिम्न स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। Ganesha Mahimna Stotra | गणेशमहिम्न: स्तोत्र अनिर्वाच्यं रूपं स्तवननिकरो यत्र गणितस्तथा वक्ष्ये स्तोत्रं प्रथमपुरुषस्यात्र महत: । यतो जातं विश्र्वंस्थितमपि सदा यत्र विलय: स कीद्रग्गीर्वाण: सुनिगमनुत: श्रीगणपति ।।1।। गणेशं गाणेशा: शिवमिति च देवाश्र्च विबुधा रविं सौरा विष्णुं प्रथमपुरुषं विष्णुभजका: । वदंत्येके शाक्ता जगदुदयमूलां परशिवां न जाने किं तस्मै नम इति परं ब्रह्म सकलम् ।।2।। तथेशं योगज्ञा गणपतिमिमं कर्म निखिलं समीमांसा वेदांतिन इति परं ब्रह्म सकलम् । अजां सांख्यो ब्रूते सकलगुणरूपां च सततं प्रकर्तारं न्यायस्त्वथ जगति बौद्धा धियमिति ।।3।। कथं ज्ञेयो बुद्धे: परतर इयं बाज्झसरणिर्यथा धीर्यस्य स्यात्स च तदनुरुपो गणपति: । महत्क्रत्यं स्वयमपि महान् सूक्ष्ममणुवद्ध्वनिज्र्योतिर्बिन्दुर्गगनसद्रश: किंच सदसत् ।।4।। अनेकास्योऽपाराक्षिकरचरणोऽनन्तह्र्दयस्तथा नानारूपो विविधवदन: श्रीगणपति: । अनंताह्व: शक्त्या विविधगुणकर्मैकसमये त्सवंख्यातानंताभिमतफलदोऽनेकषिये ।।5।। न यस्यांतो मध्यो न च भवति चादि: सुमहतामलिप्ता: कृत्वेत्थं सकलमपि खंवत्स च पृथक । स्मृत: संस्मर्तृणां सकलह्रदस्थ: प्रियकरो नमस्तस्मै देवाय सकलसुरवंद्याय महते ।।6।। गणेशाद्यं बीजं दहनवनितापल्लवयुतं मनुश्र्चैकार्णोऽयं प्रणवसहितोऽभीष्टफलद: । सबिंदुश्र्चांगाद्यं गणकऋषिछन्दोऽस्य च निच्रत्स देव: प्राग्बीजं विपदपि च शक्तिर्जपकृताम् ।।7।। गकारो हेरंब: सगुण इति पुंनिर्गुणमयो द्विधाऽप्येको जात: प्रक्रतिपुरुषो ब्रह्म हि गण: । स चेशश्र्चोत्पत्तिस्थितिलयकरोऽयं प्रथमको यतो भूतं भव्यं भवति पतिरीशो गणपति: ।।8।। गकार: कण्ठोधर्वं गजमुखसमो मत्र्यसद्रशो णकार: कंठाधो जठरसदृशाकार इति च । अधोभाग: कटयां चरण इति हीशोऽस्य च तनुर्विभातीत्थंनाम त्रिभुवनसमं भूर्भुव:सुव: ।।9।। गणेशेति त्रयर्णात्मकमपि वरं नाम सुखदं सक्रत्प्रोच्चैरुच्चारितमिति न्रभि: पावनकरम् । गणेशस्यैकस्य प्रतिजपकरस्यास्य सुक्रतं न विज्ञातो नाम्न: सकलमहिमा कीदृशविध: ।।10।। गणेशेत्याह्वां य: प्रवदति मुहुस्तस्य पुरत: प्रपश्यंस्तद्वक्त्रं स्वयमपि गणस्तिष्ठति तदा । स्वरूपस्य ज्ञानं त्वमुक इति नाम्नाऽस्य भवति प्रबोध: सुप्तस्य त्वखिलमिह सामर्थ्यममुना ।।11।। गणेशो विश्र्वस्मिन्स्थित इह च विश्र्वं गणपतौ गणेशो यत्रास्ते धृतिमतिरनैश्र्वर्यमखिलम् । समुक्तं नामैकं गणपतिपदं मंगलमयं तदैकास्यं दृष्टे: सकलविबुधास्येक्षणसमम् ।।12।। बहुक्लेशैव्र्याप्त: स्मृत उत गणेशे च ह्रदये क्षणात्क्लेशान्मुक्तो भवति सहसा त्वभ्रचयवत् । वने विद्यारम्भे युधि रिपुभये कुत्र गमने प्रवेशे प्राणांते गणपतिपदं चाशु विशति ।।13।। गणाध्यक्षो ज्येष्ठ: कपिल अपरो मंगलनिधि्र्दयालुर्हेरंबो वरद इति चिंतामणिरज: । वरानीशो ढुंढिर्गजवदननामा शिवसुतो मयूरेशो गौरीतनय इति नामानि पठति ।।14।। महेशोऽयं विष्णु: सकविरविरिन्दु: कमलज: क्षितिस्योयं वह्नि: श्र्वसन इति खं त्वद्रिरुदधि: । कुजस्तार: शुक्रो गुरुरुडुबुधोऽगुश्र्च धनदो यम: पाशी काव्य: शनिरखिलरूपो गणपति: ।।15।। मुखं वहिन पादौ हरिरपि विधाता प्रजननं रविर्नेत्रे चन्द्रो ह्रदयमपि कामोऽस्य मदन: । करे शक्र: कट्यामवनिरुदरं भाति दशनं गणेशस्यासन्वै क्रतुमयवपुश्र्चैव सकलम् ।।16।। अनघ्र्यालंकारैररुणवसनेर्भूषिततनु: करीन्द्रास्य: सिंहासनमुपगतो भाति बुधराट् ।स्मित: स्यात्तन्मध्येऽप्युदितरविबिंबपोमरूचि: स्थिता सिद्धिर्वामे मतिरितरगा चामरकरा ।।17।। समंतात्तस्यासंप्रवरमुनिसिद्धा: सुरगणा: प्रशंसंतीत्यग्रे विविधनुतिभि: सांजलिपुटा: । विडौजाद्यैर्ब्रह्मादिभिरनुवृतो भक्तनिकरैर्गणक्रीडामोदप्रमुदविकटाद्यै: सहचरै: ।।18।। वशित्वादयष्टादशदिगखिलाल्लोलमनुवाग्ध्रति: पादू:खंगोऽञज्नरसबला: सिद्धय इमा: । सदा पृष्ठे तिष्ठन्तयनिमिषदृशस्तन्मुखलया गणेशं सेवंतेऽप्यतिनिकटसूपायनकरा: ।।19।। मृगांकास्या रंभाप्रभ्रतिगणिका यस्य पुरत: सुसंगीतं कुर्वन्त्यपि कुतुकगन्ध्र्वसहिता: । मुद: पारो नात्रेत्यनुपममदे दोर्विगलिता स्थिरं जातं चित्तं चरणमवलोक्यास्य विमलम् ।।20।। हरेणायं ध्यातस्त्रिपुरमथने चासुरवधे गणेश: पार्वत्या बलिविजयकालेऽपि हरिणा । विधात्रा संसृष्टावुरगपतिना क्षोणिवरणे नरै: सिद्धौ मुक्तौ त्रिभुवनजये पुष्पधनुषा ।।21।। अयं सुप्रासादे सुर इव निजानंदभुवने महान् श्रीमानाद्यो लघुतरग्रहे रंकसद्रश: । शिवद्वारे द्वा:स्थो न्रप इव सदा भूपतिगृहे स्थितो भूत्वोमांके शिशुगणपतिर्लालनपर: ।।22।। अमुष्मिन्संतुष्टे गजवदन एवापि विबुधे ततस्ते संतुष्टास्त्रिभुवनगता: स्युर्बुधगणा: । दयालुर्हेरंबो न च भवति यस्मिंश्र्च पुरुषे वृथा सर्वं तस्य प्रजननमत: सांद्रतमसि ।।23।। वरेण्यो भूशुंडीर्भ्रगुगुरुकुजा मुदगलमुखा ज्झपारास्तद्भक्ता जपहवनपूजास्तुतिपरा: । गणेशोऽयं भक्तप्रिय इति च सर्वत्र गदितं विभक्तिर्यत्रास्ते स्वयंमपि सदा निष्ठति गण: ।।24।। मृद: काश्चिद्धातोश्छदविलिखता वापि दृषद: स्मृता व्याजान्मूर्ति: पथि यदि बहिर्येन महसा । अशुद्धोऽद्धा द्रष्टा प्रवदति तदाह्वा गणपते: श्रुत: शुद्धो मत्र्यो भवति दूरिताद्विस्मय इति ।।25।। बहिर्द्वारस्योध् गघवदनवष्र्मेन्धनमयं प्रशस्तं वा कृत्वा विविधकुशलस्तत्र निहितम् । प्रभावात्त न्मूत्र्या भवति सदनं मंगलमयं त्रिलोक्यानंदस्तां भवति जगतो विस्मय इति ।।26।। सिते भाद्रे मासे प्रतिशरदि मध्याह्नसमये मृदो मूर्तिं कृत्वा गणपतितिथौ ढुण्ढिसद्रशीम् । समर्चंत्युत्साहै: प्रभवति महान् सर्वसदने विलोक्यानंदस्तां प्रभवति न्रणां विस्मय इति ।।27।। तथा ह्मेक: श्लोको वरयति महिम्नो गणपते: कथं स श्लोकेऽस्मिन् स्तुत इति भवेत्संप्रपठिते । स्मृतं नामास्यैकं सक्रदिदमनंताह्वयसमं यतो यस्यैकस्य स्तवनसद्रशं नान्यदपरम् ।।28।। गजवदन विभोयद्वर्णितं वैभवं ते त्विह जनुषि ममेत्थं चारु तद्दर्शयाशु । त्वमसि च  करुणाया: सागर: क्रत्स्न्नदाताप्यति तव भृतकोऽहं सर्वदा चिंतकोऽस्मि ।।29।। सुस्तोत्रं प्रपठतु नित्यमेतदेव स्वानंदं प्रतिगमनेऽप्ययं सुमार्ग: । संचिंत्य स्वमनसि तत्पदारविन्दं

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Shat Tila Ekadashi:षटतिला एकादशी व्रत कब रखा जाएगा? जानें सही तारीख, मंत्र, पूजाविधि और पारण का समय

Shattila Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, 25 जनवरी 2025 को षटतिला एकादशी व्रत रखा जाएगा। यह दिन विष्णुजी की पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन तिल का उपयोग और तिल का दान पुण्य फलदायी माना गया है। एकादशी के व्रत का सम्वन्ध तीन दिनों की दिनचर्या से है। भक्त उपवास के दिन, से एक दिन पहले दोपहर में भोजन लेने के उपरांत शाम का भोजन नहीं ग्रहण करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले दिन पेट में कोई अवशिष्ट भोजन न बचा रहे। भक्त एकादशी के दिन उपवास के नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं। तथा अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास समापन करते हैं। एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित होता है। जो लोग किसी कारण एकादशी व्रत नहीं रखते हैं, उन्हें एकादशी के दिन भोजन में चावल का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा झूठ एवं परनिंदा से बचना चाहिए। जो व्यक्ति एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है, उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। जब एकादशी दो दिन की होती है तब दूजी एकादशी एवं वैष्णव एकादशी एक ही दिन अर्थात दूसरे दिन मनाई जाती है। Shattila Ekadashi 2025:हिंदू धर्म में हर महीने में आने वाली एकादशी तिथि को विष्णुजी की पूजा-उपासना का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत रखने से जीवन के सभी दुख-कष्ट दूर होते हैं और साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। माघ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी व्रत रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, षटतिला एकादशी व्रत बहुत पवित्र माना गया है। इस दिन विष्णुजी के पूजन और व्रत से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। षटतिला एकादशी व्रत में तिल का उपयोग अत्यंत शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं षटतिला एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजाविधि और पारण टाइमिंग… कब है षटतिला एकादशी 2025? दृक पंचांग के अनुसार, माघ महीने शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जनवरी 2025 को रात 07:25 बजे होगी और अगले दिन 25 जनवरी 2025 को रात 08:31 बजे समाप्त होगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, 25 जनवरी 2025 दिन शनिवार को षटतिला एकादशी मनाया जाएगा। पारण का समय: एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। 25 जनवरी को एकादशी व्रत रखने वाले जातक 26 जनवरी को द्वादशी तिथि में सुबह 7:12 बजे से सुबह 9:21 बजे तक व्रत का पारण कर सकते हैं। षटतिला एकादशी के दिन तिल स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का तर्पण, तिल का भोजन और तिल का दान समेत 6 प्रकार से तिल का उपयोग करना पुण्य फलदायी माना गया है। षटतिला एकादशी 2025: पूजाविधि षटतिला एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें। सफेद तिल का उबटन लगाकर पानी में तिल मिलाकर स्नान करें। स्नानादि से निवृत्त होने के बाद एकादशी व्रत का संकल्प लें और विष्णुजी की पूजा करें। विष्णुजी को फल, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। एकादशी व्रत का पाठ करें। विष्णुजी के मंत्रों का जाप करें। अंत में विष्णुजी समेत सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें। पूजा के दौरान जाने-अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा-प्रार्थना मांगे। इस दिन रात्रि को जागरण करना शुभ माना गया है। षटतिला एकादशी 2025: मंत्र 1.ऊँ नारायणाय नमः 2.ऊँ हूं विष्णवे नमः 3.ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Masik Kalashtami 2025: माघ माह में कब है कालाष्टमी? एक क्लिक में पढ़ें पूजा का सही समय

Kalashtami कालाष्टमी प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला एक हिंदू त्यौहार है जोकि भगवान शिव के ही एक रौद्र रूप भगवान भैरव को समर्पित है। प्रत्येक माह में आने के कारण यह त्यौहार एक वर्ष में कुल 12 बार, तथा अधिक मास की स्थिति में 13 बार मनाया जाता है। काल भैरव को पूजे जाने के कारण इसे काल भैरव अष्टमी अथवा भैरव अष्टमी भी कहा जाता है। कालाष्टमी (Masik Kalashtami 2025) का त्योहार काल भैरव देव को प्रसन्न करने के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस पर्व को हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर कालाष्टमी मनाया जाता है। इस दिन काल भैरव की पूजा करने से घर में उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। आइए जानते हैं माघ माह में कब मनाई जाएगी कालाष्टमी। सनातन धर्म में मासिक कालाष्टमी Masik Kalashtami 2025 के पर्व को अधिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव देव की विधिपूर्वक उपासना करने का विधान है। साथ ही विशेष चीजों का दान करने से अन्न और धन की कमी नहीं होती है। इस दिन सभी सुखों को पाने के लिए व्रत भी किया जाता है। आइए, माघ माह में पड़ने वाली कालाष्टमी (Kalashtami 2025) की डेट, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में जानते हैं। मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष को आने वाली मास में पड़ने वाली कालाष्टमी सबसे अधिक प्रसिद्ध है जिसे कालभैरव जयंती Kalbherav Jayanti के नाम से जाना जाता है। कालाष्टमी के रविवार अथवा मंगलवार के दिन पड़ने पर इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि साप्ताह के ये दिन भी भगवान भैरव को समर्पित माने जाते हैं। मासिक कालाष्टमी शुभ मुहूर्त Masik Kalashtami 2025 Subh Muhurat पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 21 जनवरी को दोपहर में 12 बजकर 39 मिनट से शुरू हो रही है। वहीं, अष्टमी तिथि 22 जनवरी को दोपहर में 03 बजकर 18 मिनट पर खत्म होगी। ऐसे में माघ माह की कालाष्टमी 21 जनवरी (Kalashtami 2025 Date) को मनाई जाएगी। शुभ समय subh samay ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 05 बजकर 27 मिनट से 06 बजकर 20 मिनट तकविजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 19 मिनट से 03 बजकर 01 मिनट तकगोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 49 मिनट से 06 बजकर 16 मिनट तकसूर्योदय – सुबह 07 बजकर 14 मिनट परसूर्यास्त – शाम 05 बजकर 51 मिनट परचंद्रोदय- रात 12 बजकर 41 मिनट परचंद्रास्त- सुबह 11 बजकर 20 मिनट पर इस विधि से करें पूजा इन कामों को करने से बचें पूजा के दौरान करें इन मंत्रो का जप

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Ghost Dreams Meaning : ऐसे सपने बताते हैं आत्मा करना चाहती हैं आपसे कनेक्ट, स्वप्न शास्त्र से जानें सपनों का रहस्य

Ghost Dream Meaning: सपने में बुरी आत्मा देखना अशुभ माना जाता है। मतलब आने वाले दिनों में आपको कोई अशुभ समाचार मिल सकता है… Ghost Dream Meaning: सपने आमतौर पर हर इंसान देखता है। वहीं सपने वहीं कुछ सपने देखकर हम डर का अनुभव करते हैं तो कुछ सपने हमको बहुत सुखद अनुभव कराते हैं। लेकिन आपको बता दें कि ये जरूरी नहीं कि जो सपना आपने देखा हो उसका असल जिंदगी में वो ही मतलब हो। यहां हम बात करने जा रहे हैं कि अगर सपने में भूत-प्रेत और आत्माओं से जुड़े सपनों के बारे में जो सपने लगभग हर किसी को आ जाते हैं। आइए जानते हैं सपने में भूत- प्रेत और आत्माओं देखने का क्या होता है मतलब… सपनों की दुनिया बहुत ही रंगीन और विचित्र है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने आपको भविष्य, वर्तमान और भूतकाल के बारे जानकारी देते हैं। सपनों को समझ पाना कई बार व्यक्ति के लिए बहुत ही मुश्किल हो जाता है। लेकिन, स्वप्न शास्त्र में सभी तरह के सपनों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई है। कई बार सपने में अजीब आते हैं कि व्यक्ति खुद असमंजस की स्थिति में पड़ जाता है। जैसे सपने में कई बार लोगों को ऐसा अहसास होता है कि कोई आपको छुने की कोशिश कर रहा है। या कोई मरा हुआ व्यक्ति सपने में आपसे कोई बात कर रहा है। इस तरह के नकारात्मक सपनों को लेकर स्वप्न शास्त्र में पूरी जानकारी दी गई है। आइए जानते हैं स्वप्न शास्त्र के अनुसार, कौनसी ऐसे सपने है जिनके आने पर पता लगता है की क्या कोई आत्मा आपसे कनेक्ट होना चाहती है। सपने में पूर्वजों को खुश देखना Sapne me purbajo ko kush dekhna यदि आपको सपने में अपना कोई पूर्वज स्वर्ग में या किसी अन्य स्थान पर आनंद मनाते हुए देखते हैं तो इस तरह का सपने का मतलब है कि वह आपसे कनेक्ट होकर आपको बताना चाहते हैं की वह जहां है खुश हैं। आपको उन्हें लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा वह आपको बताना चाहते हैं कि आने वाले समय में आपको कोई बड़ी खुशखबरी मिलने वाली है। सपने में कोई गला दबाए तो मतलब sapne me koi gala dabaye to matlab कई बार व्यक्ति को सोते समय ऐसा एहसास होता है की कोई उसका गला दबाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, वह उस समय सपने में होते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपनों का अर्थ है कि कोई बुरी आत्मा आपसे कनेक्ट करना चाहती है। कोई है जो आपके जीवन पर कंट्रोल करना चाहता है जिससे आप परेशान महसूस कर रहे है। साथ ही इस तरह के सपनों का अर्थ यह भी है कि आने वाले भविष्य में आपसे कोई आपकी स्वतंत्रता को छीन सकता है। सपने में डर कर उठ जाने का क्या है मतलब sapne me dar kar uth jane ka kya matlab कई बार लोगों के साथ ऐसा होता है कि वह सपने देखते देखते डर कर उठ जाते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपनों का अर्थ है कि कोई नेगेटिव एनर्जी आपसे कनेक्ट होना चाहती है। इस तरह के सपने आने पर आपको घबराने की जरूरत नहीं है बल्कि आपको कुछ उपाय करने चाहिए। जिसे करने से आपको लाभ मिलेगा। इस तरह के सपने आने पर आपको अपनी बेडशीट को हर दो से तीन दिन में बदलते रहना चाहिए। साथ ही आपको अपने सिरहाने पर मोर रखकर सोना चाहिए। साथ ही रात के समय पैर धोकर ही अपने बेड पर जाएं। सपने में खुद को तेल लगाते देखने का क्या है मतलब sapne me khud ko tel lagate dekhne ka kya matlab स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आप सपने में खुद को तेल लगाते हुए देखते हैं आ गंजा देखते हैं तो इस तरह के सपने बेहद अशुभ माने गए हैं। इस तरह के सपनों का अर्थ है कि आने वाला समय आपके लिए बहुत ही कष्टकारी होने वाला है। या फिर कोई नेगेटिव एनर्जी आपकी तरफ आकर्षित हो रही है। इसलिए इस तरह के सपने आने पर आपको तुलसी की विधि विधान से पूजन करना चाहिए। यह आपके लिए लाभकारी रहने वाला है। सपने में मृत जोड़े को देखना sapne me mrat jode ko dekhna स्वप्न शास्त्र अनुसार यदि आप सपने में किसी मृत जोड़े या फिर एक स्त्री और पुरुष की आत्मा को देखते हैं तो ये सपना बेहद शुभ है। इसका मतलब है कि आपको आकस्मिक धन की प्राप्ति हो सकती है। साथ ही आपका कोई मनोरथ पूर्ण हो सकता है।  आत्मा को अपने पास खड़ा देखना atma ko apne pas khada dekhna स्वप्न शास्त्र अनुसार यदि आप सपने में किसी आत्मा को अपने पास खड़ा देखते हैं तो यह एक शुभ सपना है। इसका मतलब है कि आपको कोई मनोरथ पूर्ण हो सकता है। साथ ही आपको धनलाभ हो सकता है। वहीं आपको करियर और व्यापार में तरक्की मिल सकती है। साथ ही कार्यों में सिद्धि हो सकती है।

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Ganesha Ashtottara Shatnam Stotra | गणेशाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र

गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र: भगवान गणेश को सभी देवी-देवताओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। उन्हें कई उपाधियाँ और विशेषण दिए गए हैं। उन्हें आरंभ के देवता और बाधाओं को दूर करने वाले के रूप में भी जाना जाता है। कई धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष अवसरों पर उनकी पूजा की जाती है, खासकर वाहन खरीदने या उद्यम शुरू करने जैसे उपक्रमों की शुरुआत में। उन्हें चार भुजाओं और हाथी के सिर वाले एक घड़े के रूप में दर्शाया गया है, जो एक चूहे पर सवार हैं। भगवान गणेश के 108 नाम हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से भगवान गणेश की अष्टोत्तर शतनामावली के रूप में जाना जाता है। भगवान गणेश जीवन में सभी बाधाओं को दूर करने वाले हैं। भगवान गणेश इच्छाओं को पूरा करते हैं और जीवन में सफलता तक पहुँचने के लिए ज्ञान प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र जीवन में समृद्धि लाने के लिए एक बहुत शक्तिशाली स्तोत्र है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन स्तोत्र का अभ्यास करता है, देवी लक्ष्मी उसके घर में निवास करती हैं और उसे स्वास्थ्य, खुशी और समृद्धि प्राप्त होती है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान गणपति को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए नियमित रूप से स्तोत्र का जाप करना सबसे शक्तिशाली तरीका है। जो कोई भी स्तोत्र का पाठ करता है, उसके सभी भय दूर हो जाते हैं। यह संस्कृत में मूल गणपति स्तोत्र है जिसे नारद मुनि ने बनाया था। ये भगवान गणेश के 108 नाम हैं। जो कोई भी छह महीने तक रोजाना गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करता है; तो भगवान गणेश की कृपा से उसकी सभी परेशानियाँ, कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। अगर कोई एक साल तक रोजाना गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करता है तो उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र के लाभ: गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का नियमित जाप करने से मन को शांति मिलती है और आपके जीवन से सभी बुराइयाँ दूर रहती हैं और आप स्वस्थ, धनवान और समृद्ध बनते हैं।जो लोग भक्ति भाव से महान गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करते हैं।और सुबह-सुबह अपने हृदय में श्री गणेश का ध्यान करते हुए गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का उच्चारण करते हैं।वे रोगों और बुराइयों से मुक्त हो जाएँगे, उन्हें अच्छे जीवनसाथी और अच्छे पुत्र मिलेंगे।और इसके साथ ही उन्हें शीघ्र ही दीर्घायु और आठ शक्तियाँ प्राप्त होंगी। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिन व्यक्तियों को जीवन में बार-बार बाधाएं और असफलताएं आ रही हैं, उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार नियमित रूप से गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। गणेशाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र | Ganesha Ashtottara Shatnam Stotra ।। श्रीगणेशाय नम: ।। यम उवाच गणेश हेरंब गजाननेति महोहदर स्वानुभवप्रकाशिन् । वरिष्ठ सिद्धिप्रिय बुद्धिनाथ वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।1।। अनेकविघ्नांतक वक्रतुंड स्वसंज्ञवासिंश्र्च चतुर्भुजेति । कवीश देवांतकनाशकारिन् वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।2।। महेशसूनो गजदैत्यशत्रो वरेण्यसूनो विकट त्रिनेत्र । वरेश पृथ्वीधर एकदंत वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।3।। प्रमोद मोदेतिनरांतकारे शडूर्मिहंतर्गजकर्ण ढुण्ढे । द्वे द्वारिसिन्धो स्थिरभावकारिन् वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।4।। विनायक ज्ञानविघातशत्रो पराशरस्यात्मज विष्णुपुत्र । अनादिपूज्याखुग सर्वपूज्य वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।5।। वैरिंच्य लम्बोदर धूम्रवर्ण मयूरपालेति मयूरवाहिन् । सुरासुरै: सेवितपादपद्म वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।6।। वरिन्महाखुध्वज शूर्पकर्ण शिवाज सिंहस्थ अनंतवाह । दितौज विघ्नेश्वर शेषनाभे वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।7।। अणोरणीयो महतो महीयो रवेर्ज योगेशज ज्येष्ठराज । निधीश मन्त्रेश च शेषपुत्र वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।8।। वरप्रदातरदितेश्र्च सूनो परात्पर ज्ञानद तारवक्त्र । गुहाग्रज ब्रह्मप पार्श्रवपुत्र वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।9।। सिन्धोश्र्च शत्रो परशुप्रयाणे शमीशपुष्पप्रिय विघ्नहारिन् । दूर्वाभरैरर्चित देवदेव वदंत त्यजत प्रभीता: ।।10।। धिय: प्रदातश्र्च शमीप्रियेति सुसिद्धिदातश्र्च सुशांतिदात: । अमेयमायामितविक्रमेति वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।11।। द्विधा चतुर्थिप्रिय कश्यपाच्य धनप्रद ज्ञानपदप्रकाशिन् । चिंतामणे चित्तविहारकारिन् वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।12।। यमस्य शत्रो ह्माभिमानशत्रो विधेर्ज हंत: कपिलस्य सूनो । विदेह स्वानंदज योगयोग वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।13।। गणस्य शत्रो कपिलस्य शत्रो समस्तभावज्ञ च भालचन्द्रं । अनादिमध्यांतमय प्रचारिन् वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।14।। विभो जगद्रूप गणेश भूमन् पुष्टे: पते आखुगतेति बोध: । कर्तुश्र्च पातुश्च तु संहरेति वदंतमेवं त्यजत प्रभीता: ।।15।। इदमष्टोत्तरशतं नाम्नां तस्य पठंति ये । श्रृण्वंति तेषु वै भीता: कुरुध्वं मा प्रवेशनम् ।।16।। भुक्तिमुक्तिप्रदं ढुण्ढेर्धनधान्यप्रवर्धनम् । ब्रह्मभूतकरं स्तोत्रं जपन्तं नित्यमादरात् ।।17।। यत्र कुत्र गणेशस्य चिन्हयुक्तानि वै भटा: । धामानि तत्र संभीता: कुरुध्वं माप्रवेशनम् ।।18।।

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Ganesha Ashtottara: गणेश अष्टोतर

गणेश अष्टोत्तर: भगवान गणेश को सभी देवी-देवताओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। उन्हें कई उपाधियाँ और विशेषण दिए गए हैं। उन्हें आरंभ के देवता और बाधाओं को दूर करने वाले के रूप में भी जाना जाता है। कई धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष अवसरों पर उनकी पूजा की जाती है, खासकर किसी उद्यम की शुरुआत में जैसे वाहन खरीदना या कोई उद्यम शुरू करना। उन्हें चार भुजाओं और हाथी के सिर वाले एक घड़े के रूप में दर्शाया गया है, जो एक चूहे पर सवार हैं। भगवान गणेश के 108 नाम हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से भगवान गणेश के अष्टोत्तर शतनामावली के रूप में जाना जाता है। गणेश अष्टोत्तर एक बहुत ही उपयोगी और लाभकारी स्तोत्र है जहाँ आप अपनी समस्याओं के बारे में समाधान पा सकते हैं और आप जटिल समय से छुटकारा पा सकते हैं और आप अपने जीवन को खुशहाल बना सकते हैं और अपनी पसंद के अनुसार अपना जीवन खुशहाल बना सकते हैं। गणेश अष्टोत्तर भगवान गणेश के मुख्य रूप से सफल स्तोत्रों में से एक है। गणेश अष्टोत्तर सभी प्रकार के क्लेशों को मिटाता है। मूल्यांकन गणेश अष्टोत्तर का प्रतिदिन पाठ करने से मनुष्य को सभी प्रकार की परेशानियों से मुक्ति मिलती है। भगवान गणेश सभी कष्टों का निवारण करते हैं और जीवन में समृद्धि और संतोष लाते हैं। किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। प्राचीन पूजा में भगवान गणेश का महत्वपूर्ण स्थान है। वेदों और पुराणों में भगवान गणेश की पूजा के कई लाभ बताए गए हैं। गणेश अष्टोत्तर लाभ: भगवान गणेश को ब्रह्मा, विष्णु और शिव से जुड़ा माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि अन्य सभी देव भगवान गणेश से ही प्रेरित हैं। भगवान गणेश की कृपा से व्यक्ति का जीवन स्वस्थ और खुशहाल बनता है। ऐसा व्यक्ति सभी कष्टों पर विजय पाने में सक्षम होता है। भगवान गणेश के पास अपार ज्ञान है और वे सभी कष्टों को दूर करते हैं। हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार, किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए भगवान गणेश की पूजा की जाती है। शास्त्रों में भगवान गणेश की पूजा करने के कई तरीके बताए गए हैं। ऐसी ही एक विधि है गणेश अष्टोत्तर। भगवान गणेश की पूजा के दौरान उन्हें दूर्वा, फूल, सिंदूर, घी, दीपक और मोदक अवश्य अर्पित करना चाहिए। इस अष्टोत्तर का पाठ किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है उसे बेहतर परिणामों के लिए गणेश अष्टोत्तर का पाठ अवश्य करना चाहिए। गणेश अष्टोत्तर | Ganesha Ashtottara विनायकॊ विघ्नराजॊ गौरीपुत्रॊ गणॆश्वरः ।  स्कन्दाग्रजॊव्ययः पूतॊ दक्षॊज़्ध्यक्षॊ द्विजप्रियः ॥ 1 ॥  अग्निगर्वच्छिदिन्द्रश्रीप्रदॊ वाणीप्रदॊज़्व्ययः  सर्वसिद्धिप्रदश्शर्वतनयः शर्वरीप्रियः ॥ 2 ॥  सर्वात्मकः सृष्टिकर्ता दॆवॊनॆकार्चितश्शिवः ।  शुद्धॊ बुद्धिप्रियश्शान्तॊ ब्रह्मचारी गजाननः ॥ 3 ॥  द्वैमात्रॆयॊ मुनिस्तुत्यॊ भक्तविघ्नविनाशनः ।  ऎकदन्तश्चतुर्बाहुश्चतुरश्शक्तिसंयुतः ॥ 4 ॥  लम्बॊदरश्शूर्पकर्णॊ हरर्ब्रह्म विदुत्तमः ।  कालॊ ग्रहपतिः कामी सॊमसूर्याग्निलॊचनः ॥ 5 ॥  पाशाङ्कुशधरश्चण्डॊ गुणातीतॊ निरञ्जनः ।  अकल्मषस्स्वयंसिद्धस्सिद्धार्चितपदाम्बुजः ॥ 6 ॥  बीजपूरफलासक्तॊ वरदश्शाश्वतः कृती ।  द्विजप्रियॊ वीतभयॊ गदी चक्रीक्षुचापधृत् ॥ 7 ॥  श्रीदॊज उत्पलकरः श्रीपतिः स्तुतिहर्षितः ।  कुलाद्रिभॆत्ता जटिलः कलिकल्मषनाशनः ॥ 8 ॥  चन्द्रचूडामणिः कान्तः पापहारी समाहितः ।  अश्रितश्रीकरस्सौम्यॊ भक्तवांछितदायकः ॥ 9 ॥  शान्तः कैवल्यसुखदस्सच्चिदानन्दविग्रहः ।  ज्ञानी दयायुतॊ दान्तॊ ब्रह्मद्वॆषविवर्जितः ॥ 10 ॥  प्रमत्तदैत्यभयदः श्रीकण्ठॊ विबुधॆश्वरः ।  रमार्चितॊविधिर्नागराजयज्ञॊपवीतवान् ॥ 11 ॥  स्थूलकण्ठः स्वयङ्कर्ता सामघॊषप्रियः परः ।  स्थूलतुण्डॊज़्ग्रणीर्धीरॊ वागीशस्सिद्धिदायकः ॥ 12 ॥  दूर्वाबिल्वप्रियॊज़्व्यक्तमूर्तिरद्भुतमूर्तिमान् ।  शैलॆन्द्रतनुजॊत्सङ्गखॆलनॊत्सुकमानसः ॥ 13 ॥  स्वलावण्यसुधासारॊ जितमन्मथविग्रहः ।  समस्तजगदाधारॊ मायी मूषकवाहनः ॥ 14 ॥  हृष्टस्तुष्टः प्रसन्नात्मा सर्वसिद्धिप्रदायकः ।  अष्टॊत्तरशतॆनैवं नाम्नां विघ्नॆश्वरं विभुम् ॥ 15 ॥  तुष्टाव शङ्करः पुत्रं त्रिपुरं हन्तुमुत्यतः ।  यः पूजयॆदनॆनैव भक्त्या सिद्धिविनायकम् ॥ 16 ॥  दूर्वादलैर्बिल्वपत्रैः पुष्पैर्वा चन्दनाक्षतैः ।  सर्वान्कामानवाप्नॊति सर्वविघ्नैः प्रमुच्यतॆ ॥

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Sapne Me Bandar Dekhna: क्या आपको भी सपने में बार-बार दिखाई देते हैं बंदर? जानें ऐसा सपना शुभ है या अशुभ

Sapne me Bandar Dekhna: हिंदू धर्म में किसी भी सपने को देखने के पीछे एक कारण माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार ये सपने हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं के होने का संकेत देते हैं. आपके सपने में अक्सर बंदर दिखाई देते हैं तो जान लें कि सपने में बंदर का दिखना शुभ है या अशुभ. Monkey In Dream: सपने में बंदर को देखना कब शुभ होता है और कब अशुभ, इसके बारे में आज हम आपको अपने इस लेख में जानकारी देंगे। Monkey In Dream: स्वप्नशास्त्र की मानें तो सपने हमें कई तरह का संकेत देते हैं। कुछ सपनों का अर्थ स्वप्नशास्त्र में बेहद शुभ माना गया है, वहीं कुछ सपने जीवन में आने वाली चुनौतियों का संकेत भी देते हैं। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि अगर कभी आप सपने में बंदर देखते हैं तो असल जीवन में इस सपने का क्या अर्थ लगाया जाता है। किस स्थिति में बंदर को सपने में देखना शुभ माना जाता है और किन स्थितियों में अशुभ, आइए विस्तार से जानते हैं। सपने में बंदर Sapne Me Bandar अगर आप सपने में बंदर को देखते हैं तो ये आपके लिए अच्छा संकेत माना जाता है। इस सपने का अर्थ होता है कि आप कोई नई चीज सीखने के लिए प्रयास कर सकते हैं। आपके जीवन में नवीनता आ सकती है। साथ ही ये सपना दर्शाता है कि, आध्यात्मिक रूप से आप उन्नति के मार्ग पर चल सकते हैं। अगर सपने में बंदर किसी पत्थर पर शांतचित बैठा दिख रहा है तो ये सपना दर्शाता है कि आपके जीवन में स्थिरता आएगी। मन की चंचलता दूर होगी।  हिंदू धर्म में मान्यता रखने वाले लोग बंदर को हनुमान जी से जोड़कर देखते हैं। वहीं बंदर के स्वभाव पर नजर डालें तो ये चंचलता, नकल, मासूमियत, जिज्ञासा आदि को दर्शाता है। ऐसे में बंदर सपने में दिखे तो इसका अर्थ क्या होगा आइए जानते हैं।  बंदर को गुस्से में देखना bandar ko gusse me dekhna सपने में बंदर को गुस्से में देखना अशुभ माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार इसका मतलब होता है कि आपका किसी से झगड़ा हो सकता है और आपके मान में कमी आ सकती है और जीवन की परेशानियों का ये कारण भी बन सकता है. बंदर को खाते हुए देखना bandar ko khate huye dekhna स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में बंदर को कुछ खाते हुए देखना एक अशुभ सपना माना जाता है. यह सपना इस बात का संकेत करता है कि आपको भारी नुकसान होने वाला है और आने वाले समय में आपके परिवार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. साथ ही संकेत देता है कि आने वाले दिनों में हानि हो सकती है. सपने में बंदर को खुश या मस्ती करते हुए देखना sapne me bandar ko kush ya masti karte huye dekhna स्वप्न शास्त्र में बंदर को खुश देखने में देखना एक शुभ सपना होता है. इस सपने का अर्थ है कि आपकी जिसके साथ लड़ाई हुई थी, उससे आपकी दोबारा मित्रता हो जाएगी और आपका पुराना दोस्त आपको मिलने वाला है. साथ ही साथ यह सपना इस लिहाज़ से भी अच्छा होता है कि आपके मान सम्मान में वृद्धि होने वाली है. बंदर का झुंड में देखना bandar ko jhund me dekhna स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में बंदर को झुंड में देखना एक शुभ सपना माना जाता है. यह सपने देखने का मतलब होता है कि आपका परिवार आपके साथ है और आपको धन लाभ होने वाला है. साथ ही आने वाले समय में आपके परिवार का साथ बना रहेगा और आने वाला समय खुशहाल रहेगा. सपने में काट ले बंदर sapne me kat le bandar सपने में बंदर आपको काट ले तो अपने आर्थिक पक्ष पर विशेष ध्यान आपको देना चाहिए। ऐसा सपना आपकी जेब को ढीला कर सकता है। इस सपने के बाद संचित धन को खर्च करने से भी आपको बचना चाहिए।  सपने में बंदर के साथ खेलना sapne me bandar ke sath khelna अगर आप सपने में खुद को बंदर के साथ खेलते देखते हैं तो ये सपना बहुत अच्छा माना जाता है। इस सपने का अर्थ होता है कि आप अच्छी संगत में हैं और जीवन का आनंद ले रहे हैं। ऐसा सपना आपके व्यक्तित्व में अच्छे बदलाव लेकर आ सकता है। 

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Harsha Richhariya: महाकुंभ में पॉपुलर होने से लेकर मैदान छोड़ने के संकल्प तक, सुंदर ‘साध्वी’ ने क्या-क्या कहा

Viral Sadhvi Harsha Richhariya Update: सोशल मीडिया सेंसेशन बन चुकीं वायरल साध्वी हर्षा रिछारिया ने महाकुंभ से वापस लौट जाने का ऐलान किया है. उन्होंने रोते हुए एक वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया है. आखिर क्यों यह ‘साध्वी’ महाकुंभ से पहले ही वापस लौट रही हैं. कहां से बवाल शुरू हुआ और क्या है पूरी कहानी चलिए जानते हैं आसान भाषा में… Viral Sadhvi In Mahakumbh: प्रयागराज महाकुंभ में अपनी खूबसूरती को लेकर वायरल हो रही साध्वी हर्षा रिछारिया ने कुंभ छोड़ने का ऐलान कर दिया है. लेकिन इस दौरान उन्होंने ट्रोलरों पर गंभीर आरोप लगा दिया है. Viral Sadhvi In Mahakumbh: महाकुंभ में पवित्र स्नान करने प्रयागराज Prayagrag पहुंची वायरल साध्वी हर्षा रिछारिया फूट-फूटकर रोने लगी. उन्होंने महाकुंभ छोड़ देने का ऐलान कर दिया है. रोते हुए हर्षा ने ट्रोलरों पर गंभीर आरोप लगा दिया. उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो रोते हुई दिख रही हैं. रोते हुए हर्षा ने कहा, “शर्म आनी चाहिए एक लड़की जो धर्म से जुड़ने के लिए यहां आई थी, धर्म को जानने आई थी, सनातन संस्कृति को जानने यहां आई थी. आपने उसे इस लायक भी नहीं छोड़ा, जो पूरे कुंभ में रूक पाए. वो कुंभ जो हमारे जीवन में एक बार आएगा. आपने वो कुंभ एक इंसान से छीन लिया. जिसने भी ऐसा किया है, उसे पाप लगेगा.” रथ पर बैठने से विवाद निरंजनी अखाड़े के छावनी प्रवेश के दौरान एक रथ पर संतों के साथ हर्षा रिछारिया के बैठने को लेकर विवाद पैदा हो गया. काली सेना के प्रमुख स्वामी आनंद स्वरूप ने इस पर आपत्ति जताई है. उन्होंने फेसबुक Fecbook पर लिखा है, “महाकुंभ मेले Mahakumbh Mela में निरंजनी अखाड़े के छावनी में अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी जी महाराज से भोजन प्रसाद पर चर्चा हुई. मैंने कहा कि यह कुंभ अखाड़ों को मॉडल दिखाने के लिए नहीं आयोजित है, यह कुंभ जप, तप और ज्ञान की गंगा के लिए है. इसलिए इस कुकृत्य पर आप कार्रवाई कीजिए.” जैसे मैंने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया’ वायरल साध्वी ने कहा, ‘कुछ लोगों ने मुझे धर्म से जुड़ने का मौका नहीं दिया. इस कॉटेज में रहते हुए मुझे ऐसा लग रहा है कि मैंने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया है. जबकि मेरी कोई गलती नहीं है, लेकिन फिर भी मुझे टारगेट किया जा रहा है. तो मैं पहले यहां पूरे महाकुंभ में रहने आई थी, लेकिन अब मैं यहां नहीं रह पाऊंगी. 24 घंटे इस रूम को देखना पड़ रहा है, इससे तो अच्छा है कि मैं यहां से चली जाऊं.’ किन लोगों ने जताई आपत्ति दरअसल, जब हर्षा का रथ पर बैठने वाला वीडियो सामने आया तो कई संत से लेकर अन्य लोग उन्हें ट्रोल करने लगे. हर्षा आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री कैलाशनंदगिरी जी महाराज की शिष्या हैं. वह महाकुंभ में निरंजनी अखाड़े से जुड़ी हैं. सबसे पहले ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि महाकुंभ में इस तरह की परंपरा शुरू करना पूरी तरह गलत है. यह विकृत मानसिकता का नतीजा है. महाकुंभ में चेहरे की सुंदरता नहीं बल्कि हृदय की सुंदरता देख जाना चाहिए था. उन्होंने कहा कि जो अभी यह नहीं तय कर पाया है कि संन्यास की दीक्षा लेनी है या शादी करनी है, उसे संत महात्माओं के शाही रथ पर जगह दिया जाना उचित नहीं है. श्रद्धालु के तौर पर शामिल होती तब भी ठीक था, लेकिन भगवा कपड़े में शाही रथ पर बिठाना पूरी तरह गलत है. इसके बाद शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने कहा कि यह बिल्कुल भी उचित नहीं है. इससे समाज में गलत संदेश फैलता है. काली सेना के प्रमुख स्वामी आनंद स्वरूप ने उनके आचरण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कुंभ का आयोजन ज्ञान और आध्यात्मिकता फैलाने के लिए किया जाता है. कहा- इसे मॉडलों द्वारा प्रचार कार्यक्रम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. महंत रवींद्र पुरी ने किया बचाव हालांकि, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने इस मुद्दे को ज्यादा तवज्जो न देते हुए कहा कि भगवा कपड़े पहनना कोई अपराध नहीं है और युवती ने निरंजनी अखाड़े के एक महामंडलेश्वर से मंत्र दीक्षा ली थी. उन्होंने हर्षा का बचाव किया और कहा- रिछारिया को लेकर कहा कि वह निरंजनी अखाड़े के एक महामंडलेश्वर से दीक्षा लेने आई थीं. वह एक मॉडल हैं और सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. उन्होंने रामनामी कपड़ा पहना हुआ था. हमारी परंपरा है कि जब भी सनातन का कोई कार्यक्रम होता है, तो हमारे युवा भगवा कपड़े पहनते हैं. यह कोई अपराध नहीं है. ‘गुरु की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं’ हर्षा को सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर जमकर ट्रोल किया जाने लगा. जिसके बाद हर्षा ने आखिरकार कुंभ से वापस जाने का ऐलान कर दिया है. उन्होंने कहा कि मैं अगले 3 दिन में महाकुंभ से उत्तराखंड जा रही हूं. क्योंकि बात अब मेरे गुरु तक आ गई है. मैं अपने गुरु की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं. मैं एक्टर और एंकर रह चुकी हूं, लेकिन मुझे मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है, जो गलत है.

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Magh Masik Krishna Janmashtami 2025: कब है साल की पहली मासिक कृष्ण जन्माष्टमी? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त

Krishna Janmashtami 2025 : भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रप्रद मास के कृष्ण पक्ष (KRISHNA JANMASTAMI) की अष्टमी तिथि को हुआ था। हिंदू धर्म में इस दिन को हर साल श्री कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। बाल गोपाल के भक्त भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव बहुत धूमधाम से मनाते हैं। भगवान कृष्ण की पूजा के लिए हर महीने मासिक कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। हिंदू धर्म में भगवान श्री कृष्ण की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। मासिक जन्माष्टमी हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। मासिक कृष्ण Krishna जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल की साधना या व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है। जिन लोगों को संतान प्राप्ति में दिक्कतें आती हैं, अगर वे इस दिन लड्डू गोपाल की पूजा करें तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है। Magh Masik Krishna Janmashtami 2025 Date: मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का दिन भगवान कृ्ष्ण को समर्पित है. यह दिन श्री कृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है. मासिक जन्माष्टमी का व्रत हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत और पूजन करने से व्यक्ति के घर में सुख-समृद्धि आती है. इसके आलावा इस दिन जीवन में सकारात्मकता आती है. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी कब है? (Magh Masik Krishna Janmashtami 2025 Date) हिंदू वैदिक पंचांग के अनुसार साल की पहली यानी माघ माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 21 जनवरी को रात 12 बजकर 39 मिनट होगी. वहीं तिथि का समापन अगले दिन 22 जनवरी रात 3 बजकर 18 मिनट पर होगी. जिसके अनुसार मासिक जन्माष्टमी का व्रत 21 जनवरी को रखा जाएगा. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त (Masik Krishna Janmashtami 2025 shubh Muhurat) पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म रात्रि में 12 बजे हुआ था. पंचांग के अनुसार मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त रात्रि 12 बजकर 6 मिनट से लेकर 12 बजकर 59 मिनट तक रहेगा. ऐसे में भक्तों को पूजा करने के लिए कुल 53 मिनट का समय मिलेगा. श्रीकृष्ण पूजा मंत्र ( Masik Krishna Janmashtami puja Mantra) मासिक कृष्ण जन्माष्टी का महत्व (Magh Masik Krishna Janmashtami Significance) धार्मिक मान्याता के अनुसार, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसके अलावा मान्यता है कि इस दिन कान्हा की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं भी पूरी होती है और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि भी आती है. Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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Gajendra Moksha Stotram:गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र (Gajendra Moksha Stotram) श्रीशुक उवाच एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो ह्रदि । जजाप परमं जाप्यं प्राक्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥  १ ॥ गजेन्द्र उवाच ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् । पुरुषायादिबीजाय परेशायाभीधीमहि ॥  २ ॥ यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् । योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्दे स्वयंभुवम् ॥ ३ ॥ यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितम् । क्वचिद्विभांतं क्व च तत्तिरोहितम् ।। अविद्धदृक् साक्ष्युभयम तदीक्षते । सआत्ममूलोऽवतु मां परात्पतरः ।। ४ ।। कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो । लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।। तमस्तदा ऽ ऽ सीद् गहनं गभीरम् । यस्तस्य पारे ऽ भिविराजते विभुः ॥ ५ ॥ न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुः । जन्तुः पुनः कोऽर्हति गंतुमीरितुम् ।। यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो । दुरत्ययानुक्रमणः स माऽवतु ॥ ६ ॥ दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम् । विमुक्तसंगा मुनयः सुसाधवः ।। चरंत्यलोकव्रतमव्रणं वने । भूतात्मभूतः सुह्रदः स मे गतिः ॥ ७ ॥- गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा । न नामरुपे गुणदोष एव वा ।। तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः । स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ ८ ॥ तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये । अरुपायोरुरुपाय नम आश्र्चर्य कर्मणे ॥ ९ ॥ नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने । नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ १० ॥ सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्र्चिता । नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ ११ ॥ नमः शांताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे । निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ १२ ॥ क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे । पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ १३ ॥ सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे । असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥ १४ ॥ नमो नमस्तेऽखिल कारणाय । निष्कारणायाद्भुत कारणाय ।। सर्वागमाम्नायमहार्णवाय । नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥ १५ ॥ गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय । तत्क्षोभ-विस्फूर्जितमानसाय ।। नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम । स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ १६ ॥ मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय । मुक्ताय भुरिकरुणाय नमोऽलयाय ।। स्वांशेनसर्वतनुभृत्मनसि-प्रतीत–प्रत्यग् दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥ १७ ॥ आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैः । दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।। मुक्तात्मभिः स्वह्रदये परिभाविताय । ज्ञानात्मने भगवते नमः ईश्र्वराय ॥ १८ ॥ यं धर्मकामार्थ-विमुक्तिकामाः । भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।। किंत्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययम् । करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ १९ ॥ एकांतिनो यस्य न कंचनार्थम् । वांछन्ति ये वै भगवत् प्रपन्नाः ।। अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलम् । गायन्त आनन्द समुद्रमग्नाः ॥ २० ॥ तमक्षरं ब्रह्म परं परेशम् । अव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।। अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरम् । अनंतमाद्यं परिपूर्णमिडे ॥ २१ ॥ यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्र्चराचराः । नामरुपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ २२ ॥ यथार्चिषोऽग्ने सवितुर्गभस्तयोः । निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।। तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो । बुद्धिर्मनः ख्रानि शरीरसर्गाः ॥ २३ ॥ स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ । न स्त्री न षंढो न पुमान् न जन्तुः ।। नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् । निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ २४ ॥ जिजी विषे नाहमियामुया किम् । अन्तर्बहिश्र्चावृतयेभयोन्या ।। इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवः । तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥ २५ ॥ सोऽहं विश्र्वसृजं विश्र्वमविश्र्वं विश्र्ववेदसम् । विश्र्वात्मानमजंब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥ २६ ॥ योगरंधितकर्माणो ह्रदि योग-विभाविते । योगिनो यं प्रपश्यति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥ २७ ॥ नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग–शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।। प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये । कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ २८ ॥ नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहं धिया हतम् । तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवंतमितोऽस्म्यहम् ॥ २९ ॥ श्रीशुक उवाच एवं गजेन्द्र मुपवर्णितनिर्विशेषम् । ब्रह्मादयो विविधलिंग भिदाभिमानाः ।। नैते यदोपससृपुनिंखिलात्मकत्वात् । तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥ ३० ॥ तं तद्वदार्तमुपलभ्य जगन्निवासः । स्तोत्रं निशम्य दिविजै सह संस्तुवद्भिः ।। छंदोमयेन गरुडेन समुह्यमानः । चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥ ३१ ॥ सोऽन्तः सरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो । दृष्टवा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् ।। उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रात् । नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥ ३२ ॥ तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य । सग्राहमाशु सरसः कृपायोज्जहार ।। ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रम् । संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम् ॥ ३३ ॥ योऽसौ ग्राहः स वै सद्यः परमाश्र्चर्य रुपधृक् । मुक्तो देवलशापेन हुहु-गंधर्व सत्तमः ।। सोऽनुकंपित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम् । लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्त-किल्बिषः ॥ ३४ ॥ गजेन्द्रो भगवत्स्पर्शाद् विमुक्तोऽज्ञानबंधनात् । प्राप्तो भगवतो रुपं पीतवासाश्र्चतुर्भुजः ।। एवं विमोक्ष्य गजयुथपमब्जनाभः । स्तेनापि पार्षदगति गमितेन युक्तः ॥ ३५ ॥ गंधर्वसिद्धविबुधैरुपगीयमान- कर्माभ्दुतं स्वभवनं गरुडासनोऽगात् ॥ ३६ ॥ ॥ इति श्रीमद् भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे गजेंन्द्रमोक्षणे तृतीयोऽध्यायः ॥

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Ganga Dussehra Stotra:गंगा दशहरा स्तोत्र

गंगा दशहरा स्तोत्र: यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से किसी पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करके गंगा दशहरा स्तोत्र का पाठ करता है, तो व्यक्ति के सभी दोष और पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही जातक को अग्नि, चोर, सांप आदि का भय नहीं रहता। भविष्य पुराण में इसके बारे में बताया गया है। इस दिन गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने के बाद मां गंगा स्तोत्र का पाठ करने से दस प्रकार के दोष नष्ट हो जाते हैं। भक्तिपूर्वक गंगा दशहरा स्तोत्र पढ़ने, सुनने और शरीर द्वारा किए जा रहे दस प्रकार के पापों से मुक्ति दिलाता है। गंगा दशहरा स्तोत्र जिसके घर में लिखकर रखा जाता है, उसे अग्नि, चोर, सांप आदि का कभी भय नहीं रहता। वैदिक शास्त्रों के अनुसार, राजा सगर सत्य युग में सूर्यवंश के एक प्रसिद्ध राजा थे। विदर्भ की राजकुमारी और शाही सिवी राजवंश की दूसरी राजकुमारी से विवाहित, राजा राजा भगीरथ, राजा दशरथ और राजकुमार राम (भगवान कृष्ण के अवतार) के पूर्वज थे। हिंदुओं का मानना ​​है कि इस दिन पवित्र नदी गंगा स्वर्ग से धरती पर उतरी थी। गंगा दशहरा स्तोत्र हिंदू कैलेंडर महीने ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष की दशमी (10वें दिन) को होता है। एक बार की बात है, राजा सगर ने योग्य ब्राह्मणों की मदद से अश्वमेध यज्ञ नामक एक यज्ञ किया। यह राजा की संप्रभुता को साबित करने के लिए था। स्वर्ग के राजा इंद्र को यज्ञ के परिणामों पर चिंता होने लगी और फिर उन्होंने अपनी रहस्यमय शक्तियों के माध्यम से घोड़ों को चुरा लिया। गंगा दशहरा स्तोत्र के लाभ वैदिक पुराण में लिखा है कि, जो व्यक्ति इस दशहरे के दिन गंगा के जल में खड़ा होकर इस स्तोत्र को दस बार पढ़ता है, भले ही वह दरिद्र हो, असमर्थ हो, वह भी प्रयास से गंगा की पूजा करके फल प्राप्त करता है। दशहरे पर स्नान की यह विधि पूरी हुई। स्कंद पुराण के वचनों को गंगा दशहरा स्तोत्र कहते हैं और इसके पढ़ने की विधि- सभी अवयवों से युक्त सुंदर तीन नेत्रों वाला चतुर्भुज, जो चार भुज, रत्न कुंभ, श्वेतकमल, वरद और अभय से सुशोभित है, श्वेत वस्त्र पहने हुए हैं। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए गंगा दशहरा स्तोत्र का जाप कोई भी व्यक्ति कर सकता है क्योंकि यह सार्वभौमिक है और इस मानव जीवन में जाने-अनजाने पाप होते हैं। वैदिक नियमानुसार गंगा दशहरा स्तोत्र का जाप करने से व्यक्ति सभी बुराइयों से मुक्त हो जाता है। Ganga Dussehra Stotra:गंगा दशहरा स्तोत्र ॐ नमः शिवायै गंगायै, शिवदायै नमो नमः। नमस्ते विष्णु-रुपिण्यै, ब्रह्म-मूर्त्यै नमोऽस्तु ते।। नमस्ते रुद्र-रुपिण्यै, शांकर्यै ते नमो नमः। सर्व-देव-स्वरुपिण्यै, नमो भेषज-मूर्त्तये।। सर्वस्य सर्व-व्याधीनां, भिषक्-श्रेष्ठ्यै नमोऽस्तु ते। स्थास्नु-जंगम-सम्भूत-विष-हन्त्र्यै नमोऽस्तु ते।। संसार-विष-नाशिन्यै, जीवानायै नमोऽस्तु ते। ताप-त्रितय-संहन्त्र्यै, प्राणश्यै ते नमो नमः।। शन्ति-सन्तान-कारिण्यै, नमस्ते शुद्ध-मूर्त्तये। सर्व-संशुद्धि-कारिण्यै, नमः पापारि-मूर्त्तये।। भुक्ति-मुक्ति-प्रदायिन्यै, भद्रदायै नमो नमः। भोगोपभोग-दायिन्यै, भोग-वत्यै नमोऽस्तु ते।। मन्दाकिन्यै नमस्तेऽस्तु, स्वर्गदायै नमो नमः। नमस्त्रैलोक्य-भूषायै, त्रि-पथायै नमो नमः।। नमस्त्रि-शुक्ल-संस्थायै, क्षमा-वत्यै नमो नमः। त्रि-हुताशन-संस्थायै, तेजो-वत्यै नमो नमः।। नन्दायै लिंग-धारिण्यै, सुधा-धारात्मने नमः। नमस्ते विश्व-मुख्यायै, रेवत्यै ते नमो नमः।। बृहत्यै ते नमस्तेऽस्तु, लोक-धात्र्यै नमोऽस्तु ते। नमस्ते विश्व-मित्रायै, नन्दिन्यै ते नमो नमः।। पृथ्व्यै शिवामृतायै च, सु-वृषायै नमो नमः। परापर-शताढ्यै, तारायै ते नमो नमः।। पाश-जाल-निकृन्तिन्यै, अभिन्नायै नमोऽस्तु ते। शान्तायै च वरिष्ठायै, वरदायै नमो नमः।। उग्रायै सुख-जग्ध्यै च, सञ्जीविन्यै नमोऽस्तु ते। ब्रह्मिष्ठायै-ब्रह्मदायै, दुरितघ्न्यै नमो नमः।। प्रणतार्ति-प्रभञजिन्यै, जग्मात्रे नमोऽस्तु ते। सर्वापत्-प्रति-पक्षायै, मंगलायै नमो नमः।। शरणागत-दीनार्त-परित्राण-परायणे। सर्वस्यार्ति-हरे देवि! नारायणि ! नमोऽस्तु ते।। निर्लेपायै दुर्ग-हन्त्र्यै, सक्षायै ते नमो नमः। परापर-परायै च, गंगे निर्वाण-दायिनि।। गंगे ममाऽग्रतो भूया, गंगे मे तिष्ठ पृष्ठतः। गंगे मे पार्श्वयोरेधि, गंगे त्वय्यस्तु मे स्थितिः। आदौ त्वमन्ते मध्ये च, सर्व त्वं गांगते शिवे! त्वमेव मूल-प्रकृतिस्त्वं पुमान् पर एव हि।। गंगे त्वं परमात्मा च, शिवस्तुभ्यं नमः शिवे।। ।।फल-श्रुति।। य इदं पठते स्तोत्रं, श्रृणुयाच्छ्रद्धयाऽपि यः। दशधा मुच्यते पापैः, काय-वाक्-चित्त-सम्भवैः।। रोगस्थो रोगतो मुच्येद्, विपद्भ्यश्च विपद्-युतः। मुच्यते बन्धनाद् बद्धो, भीतो भीतेः प्रमुच्यते।

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Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति पर ही भीष्म पितामह ने त्यागी थी देह, जानें क्या है पौराणिक महत्व

Makar Sankranti 2025: हिंदू धर्म में मकर संक्रांति काफी महत्व है. इस दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं. मान्यता है कि इसी दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है. वैसे मकर संक्रांति का महाभारत से भी गहरा संबंध है. भीष्म पितामह 58 दिनों तक बाणों की शैया पर रहे, लेकिन अपना शरीर नहीं त्यागा क्योंकि वे चाहते थे कि जिस दिन सूर्य उत्तरायण होगा तभी वे अपने प्राणों का त्याग करेंगे. मकर संक्रांति का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व भी है, खासकर महाभारत के संदर्भ में, जब भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया और इस दिन अपने प्राण का त्याग कर दिया था। हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति इस साल 14 जनवरी को मनाई जाएगी, जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इस दिन का विशेष महत्व है क्योंकि सूर्य के गोचर से खरमास समाप्त होता है और बसंत ऋतु का आगमन होता है। मकर संक्रांति का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व भी है, खासकर महाभारत के संदर्भ में, जब भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया और इस दिन अपने प्राण त्यागे। Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति आज है और आज सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं. वैदिक ज्योतिष के मुताबिक, सूर्य को सभी ग्रहों का राजा माना जाता है और इसलिए, इनका गोचर भी खास माना जाता है. मकर संक्रांति के दिन सूर्य के गोचर से खरमास का अंत हो जाता है और वसंत ऋतु के आगमन की आहट सुनाई देती है. इस पावन पर्व का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि भीष्म पितामह, जो 58 दिनों तक बाणों की शैय्या पर थे, उन्होंने अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी. इस अवसर से जुड़ी यह पौराणिक कथा आज भी लोगों के हृदय को छूती है. भीष्म पितामह bhishma pitamah की प्राण त्यागने की कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरायण के महत्व की व्याख्या भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरायण के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस समय पृथ्वी पर प्रकाश का वास होता है, और जो भी व्यक्ति इस समय शरीर त्यागता है, उसे पुनर्जन्म नहीं मिलता। वे सीधे ब्रह्मलोक में जाते हैं, यही कारण था कि भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया। मकर संक्रांति का सूर्य के गोचर से संबंध मकर संक्रांति का दिन सूर्य के गोचर का प्रतीक है, जब सूर्य अपनी राशि बदलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन से खरमास समाप्त होता है और वसंत ऋतु का आगमन होता है, जो जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रतीक मानी जाती है। इसके साथ ही, इस दिन को धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसे पुण्यकाल माना जाता है। मकर संक्रांति के पुण्यकाल और महापुण्य काल हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन पुण्यकाल सुबह 9 बजकर 3 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। वहीं, महापुण्य काल सुबह 9 बजकर 3 मिनट से लेकर 10 बजकर 48 मिनट तक रहेगा, जो विशेष रूप से शुभ और फलदायी माना जाता है। इस समय में धार्मिक क्रियाएं और दान आदि करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है।

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