Shukra Pradosh Vrat:शुक्र प्रदोष व्रत कब है दिसंबर महीने का पहला प्रदोष व्रत? नोट करें शुभ मुहूर्त एवं योग

Shukra Pradosh Vrat:माह की त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल मे होना, प्रदोष व्रत होने का सही कारण है। प्रदोष काल सूर्यास्त से 45 मिनट पहिले प्रारम्भ होकर सूर्यास्त के बाद 45 मिनट होता है।प्रदोष का दिन जब साप्ताहिक दिवस सोमवार को होता है उसे सोम प्रदोष कहते हैं, मंगलवार को होने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष तथा शनिवार के दिन प्रदोष को शनि प्रदोष कहते हैं। प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त (Pradosh Vrat Shubh Muhurat) वैसे तो त्रयोदशी तिथि ही भगवान शिव की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ है। परंतु प्रदोष के समय शिवजी की पूजा करना और भी लाभदायक है। ध्यान देने योग्य तथ्य: प्रदोष व्रत एक ही देश के दो अलग-अलग शहरों के लिए अलग हो सकते हैं। चूँकि प्रदोष व्रत सूर्यास्त के समय, त्रयोदशी के प्रबल होने पर निर्भर करता है। तथा दो शहरों का सूर्यास्त का समय अलग-अलग हो सकता है, इस प्रकार उन दोनो शहरों के प्रदोष व्रत का समय भी अलग-अलग हो सकता है। इसीलिए कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि, प्रदोष व्रत त्रयोदशी से एक दिन पूर्व अर्थात द्वादशी तिथि के दिन ही हो जाता है। सूर्यास्त होने का समय सभी शहरों के लिए अलग-अलग होता है अतः प्रदोष व्रत करने से पूर्व अपने शहर का सूर्यास्त समय अवश्य जाँच लें, चाहे वो शहर एक ही देश मे क्यों ना हों। Shukra Pradosh Vrat प्रदोष व्रत चन्द्र मास की शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष की दोनों त्रयोदशी के दिन किया जाता है। Shukra Pradosh Vrat:शुक्र प्रदोष व्रत वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 12 दिसंबर को देर रात 10 बजकर 26 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, 13 दिसंबर को शाम 07 बजकर 40 मिनट पर त्रयोदशी तिथि समाप्त होगी। इस प्रकार 13 दिसंबर को मार्गशीर्ष मास का अंतिम प्रदोष व्रत मनाया जायेगा। इस दिन प्रदोष काल संध्याकाल 05 बजकर 26 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 40 मिनट तक है। शुक्रवार के दिन पड़ने के चलते यह शुक्र प्रदोष व्रत कहलाएगा। साधक अपनी सुविधा के अनुसार समय पर शिव शक्ति की पूजा उपासना कर सकते हैं। माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर भगवान शिव संग मां पार्वती की पूजा की जाती है। इसके साथ ही मनचाहा वर पाने के लिए भगवान शिव संग मां पार्वती के निमित्त प्रदोष व्रत (December Pradosh Vrat 2024) रखा जाता है। Shukra Pradosh Vrat इस व्रत को करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। अतः साधक भक्ति भाव से शिव-शक्ति की पूजा-उपासना करते हैं। आइए, शुभ मुहूर्त एवं शुभ योग जानते हैं- Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत की पूजा कब करनी चाहिए? Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत की पूजा अपने शहर के सूर्यास्त होने के समय के अनुसार प्रदोष काल मे करनी चाहिए। Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष में क्या न करें? भगवान शिव की प्रदोष काल में पूजा किए बिना भोजन ग्रहण न करें. व्रत के समय में अन्न, नमक, मिर्च आदि का सेवन नहीं करें। Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत मे पूजा की थाली में क्या-क्या रखें? Shukra Pradosh Vrat:पूजा की थाली में अबीर, गुलाल, चंदन, काले तिल, फूल, धतूरा, बिल्वपत्र, शमी पत्र, जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, अगरबत्ती एवं फल के साथ पूजा करें। Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत की विधि ❀ प्रदोष व्रत करने के लिए मनुष्य को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए।❀ नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्री भोले नाथ का स्मरण करें।❀ इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है।❀ पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किए जाते है।❀ पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है।❀ अब इस मंडप में पांच रंगों का उपयोग करते हुए रंगोली बनाई जाती है। ❀ प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है।❀ इस प्रकार पूजन की तैयारियां करके उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए।❀ पूजन में भगवान शिव के मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिव को जल चढ़ाना चाहिए। Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत की महिमा Shukra Pradosh Vrat प्रदोष व्रत को रखने से दो गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी। व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यों को अधिक करेगा। उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी। इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म-जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत का महत्व ❀ मान्यता और श्रध्दा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों यह व्रत करते हैं। कहा जाता है Shukra Pradosh Vrat कि इस व्रत से कई दोषों की मुक्ति तथा संकटों का निवारण होता है. यह व्रत साप्ताहिक महत्त्व भी रखता है।❀ रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है।❀ सोमवार के दिन त्रयोदशी पड़ने पर किया जाने वाला व्रत आरोग्य प्रदान करता है और इंसान की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।❀ मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो तो उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।❀ बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपासक की सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। ❀ गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत पड़े तो इस दिन के व्रत के फल से शत्रुओं का विनाश होता है।❀ शुक्रवार के दिन होने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए किया जाता है।❀ संतान प्राप्ति की कामना हो तो शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए।❀ अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किए जाते हैं तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है। प्रदोष व्रत का उद्यापन ❀ इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद

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Gita Jayanti 2024:गीता जयंती जीवन को सरल बनाती हैं गीता में लिखी ये पांच बातें, आप भी करें इनका पालन

Gita Jayanti 2024: पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। इस साल 11 दिसंबर 2024 को गीता जयंती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान प्रदान किया था। यह वह समय था, जब अर्जुन के कदम महाभारत युद्ध के लिए डगमगाने लगे थे। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के उपदेशों को सुनकर ही अर्जुन अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हुए थे। हिंदू धर्म में गीता को पवित्र ग्रंथ माना गया है, जिसका पाठ करने पर मनुष्य की तमाम समस्याओं का निवारण होता है। कहते हैं कि गीता में आत्मा, परमात्मा, भक्ति, कर्म और जीवन से जुड़े सभी विषयों का उल्लेख है। इन उपदेशों का अध्ययन करने से मनुष्य का जीवन सरल और सुखी बनता है। ऐसे में आइए इन उपदेशों के बारे में जानते हैं। गीता जयंती को हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाया जाता है क्योंकि हिंदू पौराणिक मान्यता के Gita Jayanti 2024 अनुसार गीता स्वयं एक बहुत ही पवित्र ग्रंथ है जिसे स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था। गीता जयंती हर साल शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ भगवद गीता का जन्म हुआ था। इस दिन को मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है। Gita Jayanti 2024:अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2024 Gita Jayanti 2024:अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2024 कार्यक्रम : 28 November – 15 December 2024 प्रतिदिन केवल ऑनलाइन: कला, शिल्प, व्यंजन, संस्कृति, इतिहास, धरोहर और आध्यात्मिकता के अनोखे संगम के अवसर पर धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में आयोजन किया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड, हरियाणा पर्यटन, Gita Jayanti 2024 जिला प्रशासन, उत्तरीय सांस्कृतिक केंद्र पटियाला और सूचना और जनसंपर्क विभाग हरियाणा द्वारा आयोजित किया जाता है। गीता महोत्सव में लाखों लोग शिल्प मेला, यज्ञ, गीता पाठ, भजन, आरती, नृत्य, नाटक आदि में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव के बारे में और जानकारी के लिए उसकी ऑफिसियल वेबसाइट पर विजिट करें internationalgitamahotsav.in। Gita Jayanti 2024:इस्कॉन में गीता जयंती समारोह Gita Jayanti 2024:गीता जयंती हर साल दिसंबर के महीने में मनाया जाता है। इस्कॉन में इस महीने के दौरान, भक्त भगवद गीता को निवासियों और आसपास के क्षेत्रों में वितरित करके भगवान की सेवा करते हैं। इस दिन, भक्त भगवान और उनके प्रिय भक्त के बीच इस पवित्र वार्तालाप को याद करते हुए सभी 700 श्लोकों को एक साथ पढ़ने के लिए इकट्ठा होते हैं। इस्कॉन हर साल गीता दान यज्ञ महोत्सव का आयोजन करता है, जो 30 दिनों का उत्सव है, जिसके दौरान 1 लाख गीता वितरित करने का लक्ष्य रखते हैं। इस्कॉन का मानना ​​है कि भगवद् गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो कोई भी मेरा संदेश दुनिया में फैलाता है, वह मुझे सबसे प्रिय व्यक्ति है। इसलिए, भगवान कृष्ण की दया पाने के लिए, भक्त निःस्वार्थ रूप से भगवद गीता वितरण करते हैं। Gita Jayanti 2024:श्रीमद् भगवद् गीता श्रीमद्भागवत गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है। भगवत गीता के सभी 18 अध्याय के नाम.. अध्याय १: अर्जुनविषादयोगः – कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षणअध्याय २: साङ्ख्ययोगः – गीता का सारअध्याय ३: कर्मयोगः – कर्मयोगअध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः – दिव्य ज्ञानअध्याय ५: कर्मसंन्यासयोगः – कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्मअध्याय ६: आत्मसंयमयोगः – ध्यानयोगअध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोगः – भगवद्ज्ञानअध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोगः – भगवत्प्राप्तिअध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोगः – परम गुह्य ज्ञानअध्याय १०: विभूतियोगः – श्री भगवान् का ऐश्वर्यअध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोगः – विराट रूपअध्याय १२: भक्तियोगः – भक्तियोगअध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः – प्रकृति, पुरुष तथा चेतनाअध्याय १४: गुणत्रयविभागयोगः – प्रकृति के तीन गुणअध्याय १५: पुरुषोत्तमयोगः – पुरुषोत्तम योगअध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोगः – दैवी तथा आसुरी स्वभावअध्याय १७: श्रद्धात्रयविभागयोगः – श्रद्धा के विभागअध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोगः – उपसंहार-संन्यास की सिद्धि भगवत गीता का प्रथम श्लोक:धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे् समवेता युयुत्सवः ।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥१॥

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Pramukh Swami Maharaj Jayanti:प्रमुख स्वामी महाराज जयन्ती

Pramukh Swami Maharaj Jayanti:बोचासनवासी अक्षर पुरूषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) के प्रमुख स्वामी महाराज का जन्म 7 दिसंबर 1922 को हुआ था, लेकिन तिथि के अनुसार यानी मगशर सूद अथम को उनके जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। प्रमुख स्वामी महाराज हिंदू धर्म के एक महान संत हैं। उनका जन्म वडोदरा जिले और पादरा तहसील के चांसद गांव में हुआ था। Pramukh Swami Maharaj Jayanti:स्वामी महाराज ने युवावस्था में ही अपना घर छोड़कर आध्यात्म का मार्ग अपना लिया था। Pramukh Swami Maharaj Jayanti वह शास्त्री महाराज के शिष्य बन गए और 10 जनवरी 1940 को नारायण स्वरूप दासजी के रूप में अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की। लगभग 74 साल पहले, 1950 में, महज 28 साल की उम्र में, उन्होंने बीएपीएस प्रमुख का पद संभाला था। इस समय BAPS में कई ऐसे संत थे जो उनकी उम्र से बड़े थे, लेकिन प्रमुख स्वामी की साधुता, विनम्रता, करुणा और सेवा भावना के कारण ही संस्था ने उन्हें इस पद पर नियुक्त किया। Pramukh Swami Maharaj Jayanti प्रमुख स्वामी महाराज जयंती तिथि: सोमवार, 9 दिसंबर 2024 प्रमुख स्वामी महाराज जयंती का महत्वआज प्रमुख स्वामी महाराज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध आध्यात्मिक नेता हैं। उन्होंने देश-विदेश में 1100 भव्य मंदिरों का निर्माण कराया है और कई विशाल मंदिरों का निर्माण कार्य चल रहा है। अमेरिका के न्यू जर्सी में बना BAPS मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है, जिसकी शुरुआत स्वामी जी ने ही की थी। प्रमुख स्वामी महाराज जयंती कैसे मनाई जाती है?स्वामी नारयण संस्था द्वारा इस अबसर को बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। सारे अनुयायी इस महान गुरु को याद करते हैं और उनके बचन का पालन करते हैं। इस महत्वपूर्ण अवसर को मनाने के लिए, बीएपीएस मंदिर में वीडियो, Pramukh Swami Maharaj Jayanti स्वामी के कथन और सांस्कृतिक प्रदर्शन का एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है और लाइव वेबकास्ट के माध्यम से स्ट्रीम किया जाता है। यह यूके के साथ-साथ यूरोप, भारत के सभी BAPS मंदिरों और केंद्रों के लिए राष्ट्रीय त्योहार के रूप में कार्य करता है।

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Mitra Saptami:मित्र सप्तमी शुभ तिथि और महत्त्व

Mitra Saptami:मित्र सप्तमी के दिन भगवान श्रीहरि के अवतार सूर्य देव की उपसना की जाती है। मित्र, सूर्य देव के कई नामों में से एक है। तथा भानु सप्तमी एवं रथ सप्तमी की ही तहत अन्य हिंदू माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी भगवान सूर्य को समर्पित मानी जाती है। अतः मार्गशीर्ष माह की शुक्ला सप्तमी को मित्र सप्तमी मनाई जाती है।मित्र सप्तमी के दिन पवित्र नदी में स्नान करते हुए भगवान सूर्य को जल समर्पित करते हुए आराधना करने की विशेष महत्ता है। सृष्टि में सकारात्मकता के देव सूर्यदेव को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है। मित्र सप्तमी के दिन भगवान सूर्य की आराधना करने से सभी सुख, नेत्र ज्योति एवं चर्म रोंगों से मुक्ति मिलती है। दिसंबर 2024 में भानु सप्तमी 8 दिसंबर को है Mitra Saptami:मित्र सप्तमी पर कैसे करें पूजा? ❀ मित्र सप्तमी के दिन पवित्र नदियों में स्नान करें और सूर्य देव को जल अर्पित करें।❀ मित्र सप्तमी के दिन व्रत रखें और केवल फल खाएं और नमक का सेवन बिल्कुल न करें।❀ मित्र सप्तमी के दिन लाल चंदन की माला या रुद्राक्ष की माला से गायत्री मंत्र का जाप करने से मानसिक सुख, शांति और शारीरिक शक्ति मिलती है। ❀ उगते सूर्य को अर्घ्य देने और जल की गिरती धारा के बीच सूर्य देव के दर्शन करने से नेत्र रोग दूर होते हैं।❀ मित्र सप्तमी के दिन सात घोड़ों पर बैठे सूर्य देव की तस्वीर या मूर्ति की पूजा करने से त्वचा रोग ठीक हो जाते हैं।❀ यदि कुंडली में सूर्य खराब स्थिति में है और सूर्य नीच राशि में स्थित है तो 10 किलो गेहूं में सवा किलो गुड़ मिलाकर किसी गरीब व्यक्ति को दान कर दें।❀ इस दिन माथे और हृदय पर लाल चंदन का तिलक लगाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। Mitra Saptami:मित्र सप्तमी करने के लाभ मित्र सप्तमी के दिन भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर उनकी पूजा करने से सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत को करने से आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। इस दिन सूर्य की किरणों को अवश्य ग्रहण करना चाहिए। इस व्रत को करने से घर में धन की वृद्धि होती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। Mitra Saptami:मित्र सप्तमी मंत्र मित्र सप्तमी के दिन आदित्य हृदय स्तोत्र या सूर्य देव के मंत्र ॐ मित्राय नमः का जाप करें और गायत्री मंत्र का जाप करने से सभी रोगों से मुक्ति मिलती है।

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Margashirsha Ashtami Vrat:मार्गशीर्ष अष्टमी व्रत महत्व, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

Margashirsha Ashtami Vrat:हिन्दू पंचांग के अनुसार हर माह शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को दुर्गा अष्टमी का व्रत किया जाता है। इस दिन देवी दुर्गा के भक्त उनकी पूजा करते हैं और पूरे दिन उपवास रखते हैं। हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है, कहा जाता है कि मां दुर्गा के सभी रूपों की व्यवस्थित तरीके से पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। मासिक दुर्गाष्टमी को मास दुर्गाष्टमी या मासिक दुर्गाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानते हैं इस मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत के महत्व और मान्यताओं के बारे में Margashirsha Ashtami Vrat:मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत का महत्व ऐसे में इस दिन देवी दुर्गा का व्रत करने से जगदंबा माता की कृपा प्राप्त होती है.भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। घर में सुख-समृद्धि आती है, सुख-समृद्धि आती है, धन-लक्ष्मी आती है। मासिक दुर्गा अष्टमी शुभ मुहूर्त (Masik Durga Ashtami Shubh Muhurat) Margashirsha Ashtami Vrat:ज्योतिषियों की मानें तो मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 08 दिसंबर को भारतीय समयानुसार सुबह 09 बजकर 44 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, अष्टमी तिथि का समापन 09 दिसंबर को सुबह 08 बजकर 02 मिनट पर होगा। मासिक दुर्गाष्टमी पर निशा काल में जगत की देवी मां दुर्गा की पूजा की जाती है। अत: 08 दिसंबर को मासिक दुर्गा अष्टमी मनाई जाएगी। मासिक दुर्गा अष्टमी शुभ योग (Masik Durga Ashtami Shubh Yog) ज्योतिषियों की मानें तो मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर शतभिषा योग का निर्माण हो रहा है। इस दिन अभिजीत मुहूर्त का संयोग बन रहा है। इसके साथ ही वणिज योग का भी निर्माण हो रहा है। इन योग में मां दुर्गा की पूजा करने से साधक ही हर मनोकामना पूरी होगी। साथ ही जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के दुख एवं संकट दूर हो जाते हैं। Margashirsha Ashtami Vrat:दुर्गा अष्टमी का महत्व मासिक दुर्गा अष्टमी पर जगत की देवी मां दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। विशेष कार्य में सिद्धि पाने के इच्छुक साधक मासिक दुर्गा अष्टमी पर मां दुर्गा की कठिन साधना करते हैं। कठिन साधना से प्रसन्न होकर मां दुर्गा मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। मां की कृपा से साधक को सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। Margashirsha Ashtami Vrat:दुर्गा अष्टमी पूजा विधि ❀ दुर्गा अष्टमी के दिन सुबह उठकर गंगाजल डालकर स्नान करें।❀ लकड़ी का पाठ लें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं।❀ फिर मां दुर्गा के मंत्र का जाप करते हुए उनकी प्रतिमा या फोटो स्थापित करें।❀ लाल या उधल के फूल, सिंदूर, अक्षत, नैवेद्य, सिंदूर, फल, मिठाई आदि से मां दुर्गा के सभी रूपों की पूजा करें।❀ फिर धूप-दीप जलाकर दुर्गा चालीसा का पाठ करें और आरती भी करना न भूलें।❀ इसके बाद हाथ जोड़कर उनके सामने अपनी इच्छाएं रखें। पंचांग Margashirsha Ashtami Vrat सूर्योदय – सुबह 07 बजकर 02 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 05 बजकर 24 मिनट पर चन्द्रोदय- दोपहर 12 बजकर 27 मिनट पर चंद्रास्त- देर रात 12 बजकर 09 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 05 बजकर 13 मिनट से 06 बजकर 07 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 01 बजकर 57 मिनट से 02 बजकर 38 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 22 मिनट से 05 बजकर 49 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 11 बजकर 46 मिनट से 12 बजकर 41 मिनट तक

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Champa Shashthi:चम्पा षष्ठी: 2024: तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Champa Shashthi:चंपा षष्ठी व्रत भगवान शिव एवं माता पार्वती के बड़े पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित है। यह पर्व मार्गशीर्ष मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। चंपा षष्ठी को स्कंद षष्ठी के नाम से जाना जाता है। भगवान कार्तिकेय जी को चंपा पुष्प अत्यंत प्रिय है, अतः इसे चंपा षष्ठी के नाम से जाना जाता है। स्कंद षष्ठी व्रत मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों में अत्यधिक लोकप्रिय है। चंपा षष्ठी व्रत प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भी रखा जाता है एक अन्य मान्यता के अनुसार, यह त्यौहार भगवान शिव के माने गये अवतार खंडोबा जी को समर्पित है। भगवान शिव का यह खंडोबा रूप किसानों, चरवाहों और शिकारियों का स्वामी माना जाता है। Champa Shashthi:किस दिन है चम्पा षष्ठी चम्पा षष्ठी 07 दिसंबर, शनिवार को मनाई जाएगी.  चंपा षष्ठी का उत्सव विशेष रूप से पुणे और महाराष्ट्र के क्षेत्रों में मनाया जाता है. Champa Shashthi:चम्पा षष्ठी शुभ मुहूर्त षष्ठी तिथि 06 दिसम्बर 2024 को दोपहर 12 बजकर 07 मिनट पर प्रारंभ होगी.षष्ठी तिथि का समापन 08 दिसम्बर 2024 को सुबह 11 बजकर 05 मिनट पर होगा. यहां होता है चम्पा षष्ठी  पर मेले का आयोजन जेजुरी में स्थित खंडोबा मंदिर में इस पर्व का आयोजन बड़े धूमधाम से किया जाता है. इस अवसर पर हल्दी, फल, सब्जियां आदि खंडोबा देव को समर्पित की जाती हैं. यहां मेले का भी आयोजन किया जाता है. मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान शिव की पूजा की जाती है, जिसमें भगवान शिव के मार्तण्ड रूप की विशेष आराधना की जाती है. Champa Shashthi:चंपा षष्ठी पर्व का महत्व Champa Shashthi:चंपा षष्ठी का पर्व अत्यंत शुभ माना जाता है. इस दिन, मार्तण्ड भगवान सूर्य का पूजन विशेष रूप से किया जाता है. सूर्योदय से पूर्व स्नान करने के बाद सूर्यदेव को नमस्कार किया जाता है और उनकी पूजा की जाती है. इस अवसर पर शिव का ध्यान भी किया जाता है और शिवलिंग की पूजा की जाती है, जिसमें दूध और गंगाजल अर्पित किया जाता है. भगवान को चंपा के फूल चढ़ाने की परंपरा है. इस दिन भूमि पर शयन करने का भी महत्व है. मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा और व्रत से पापों का नाश होता है, परेशानियों का समाधान होता है और जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होती है. चंपा षष्ठी के प्रारंभ और इसकी मान्यताओं के बारे में विभिन्न मत प्रचलित हैं. इस दिन किए गए पूजा-पाठ और दान से मोक्ष की प्राप्ति में भी सहायता मिलती है. चंपा षष्ठी की कथाओं को स्कंद षष्ठी से जोड़ा जाता है, और इसे खंडोबा देव या षष्ठी तिथि से भी संबंधित माना जाता है. Champa Shashthi:प्रचलित कथा एक कथा के अनुसार मल्ल और मणि नाम के दो राक्षस भाई हुआ करते थे। दोनों राक्षसों द्वारा संतों, देवताओं एवं जन-मानस के जीवन में अत्यधिक उत्पात मचाया गया था। राक्षसों के आतंक से तंग आकर सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुँचे लेकिन भगवान विष्णु ने उनकी मदद के लिए ब्रह्मा जी के पास जाने को कहा। फिर, सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए, ब्रह्मा जी ने भी उनकी मदद करने से इनकार कर दिया। सभी देवता भगवान शिव की ओर बढ़े और उन्हें सब कुछ बताया। तब, भगवान शिव ने राक्षसों को मारने के लिए खुद को विशाल योद्धा के रूप में खंडोबा अवतार लिया। यह योद्धा सोने और सूरज की तरह चमकता हुआ दिखाई देते थे। इस योद्धा का चेहरा हल्दी से ढका हुआ था। इसके बाद भगवान शिव दोनों राक्षसों से युद्ध करने चले गए। जब मणि की मृत्यु होने वाली थी, तो उन्होंने खंडोबा को अपना सफेद घोड़ा दिया और अपने पूर्व कर्मों के लिए क्षमा मांगी, तथा वरदान माँगा कि जहाँ भगवान शिव की पूजा की जाती है, वहाँ उनके चरणों में उनकी भी उपस्थिति हो। Champa Shashthi:खंडोबा मंदिर हल्दी उत्सव के लिए प्रसिद्ध खंडोबा मंदिर 100 सीढ़ियों की चढ़ाई वाली एक छोटी-सी पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर के प्रांगण में स्थित दीपमाला यहाँ का सबसे मनमोहक दृश्य माना जाता है। हल्दी उत्सव से पहले यहाँ खंडोबा भगवान की शोभायात्रा भी निकाली जाती है।

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Bihar Panchami:बिहार पंचमी,”माता लक्ष्मी के आगमन का शुभ पर्व”

Bihar Panchami:बिहार पंचमी 2024 का पावन पर्व इस वर्ष शुक्रवार, 6 दिसंबर 2024 को मनाया जाएगा। Bihar Panchami:विक्रम संवत 1562 में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को स्वामी हरिदास की सघन-उपासना के फलस्वरूप वृंदावन के निधिवन में श्री बांके बिहारी जी महाराज का प्राकट्य हुआ। बिहारी जी के इस प्राकट्य उत्सव को बिहार पंचमी के नाम से जाना जाने लगा। बिहार पंचमी के दिन ठाकुर जी के बाल रूप को पीत वस्त्र, श्रृंगार हेतु स्वर्ण आभूषण, विभिन्न प्रकार के सुगंधित पुष्प, मेवा-युक्त हलवा-खीर एवं 56 भोग अर्पित किए जाते हैं। बिहार पंचमी के दिन श्री बांके बिहारी जी के प्राकट्य के साथ-साथ ही स्वामी हरिदास जी महाराज की बिहारीजी के प्रति अनन्य भक्ति को भी याद करने का दिन है। स्वामी हरिदास जी का संक्षिप्त परिचय – विक्रम संवत 1560 में स्वामी हरिदास अपने पिता श्री आशुघीर जी से युगल-मंत्र की दीक्षा लेकर विरक्त होकर वृंदावन चले आए और यमुना-तट के सधन वन-प्रान्तर में जिस स्थान को अपनी साधना का केंद्र बनाया, आज यह स्थान निधिवन के नाम से विख्यात है। निधिवन की सघन कुंजें स्वामी हरिदास जी महाराज के मधुर गायन से गूँज उठीं। Bihar Panchami:बिहार पंचमी: माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति का शुभ पर्व Bihar Panchami:बिहार पंचमी हिंदू धर्म का एक पवित्र पर्व है, जो हर साल मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन को विशेष रूप से माता लक्ष्मी की उपासना के लिए जाना जाता है, जो धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी मानी जाती हैं। बिहार पंचमी का पर्व देश के कई हिस्सों में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन यह खासतौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश में अत्यंत लोकप्रिय है। Bihar Panchami:बिहार पंचमी का महत्व Bihar Panchami:बिहार पंचमी का दिन देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि लाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दिन उन लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है जो अपने जीवन में आर्थिक स्थिरता और खुशहाली की कामना करते हैं। माना जाता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करने से न केवल धन-धान्य की वृद्धि होती है, बल्कि परिवार में सुख-शांति का भी वास होता है। यह पर्व व्यापारियों और व्यवसायियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे इस दिन अपने व्यवसाय में सफलता और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। Bihar Panchami:बिहार पंचमी की पौराणिक कथा Bihar Panchami:पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को समर्पित किया और उनके साथ आनंदमय जीवन की शुरुआत की। कहा जाता है कि मार्गशीर्ष माह की पंचमी तिथि को देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। इसलिए, इस दिन को उनकी पूजा और उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। Bihar Panchami:बिहार पंचमी की पूजा विधि बिहार पंचमी का सांस्कृतिक महत्व बिहार पंचमी का पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी बेहद खास है। इस दिन लोग एक-दूसरे के घरों में जाकर शुभकामनाएं देते हैं। कई जगहों पर सामूहिक भजन-कीर्तन और भंडारे का आयोजन भी किया जाता है। बिहार पंचमी पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है, और श्रद्धालु बड़ी संख्या में देवी लक्ष्मी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इस दिन नई फसल का पहला अंश देवी को अर्पित करते हैं, जिससे उनकी कृपा बनी रहे। वर्तमान समय में बिहार पंचमी का महत्व आज के आधुनिक युग में भी बिहार पंचमी का महत्व कम नहीं हुआ है। लोग इस दिन अपने घरों और व्यापारिक स्थलों को सजाते हैं, ताकि देवी लक्ष्मी का आगमन हो सके। ऑनलाइन माध्यम से भी लोग पूजा-अर्चना का आयोजन करते हैं। कई व्यवसायी इस दिन अपने नए कार्यों की शुरुआत करते हैं, जैसे दुकान या कार्यालय का उद्घाटन। डिजिटल युग में बिहार पंचमी के पर्व ने आध्यात्मिकता और भक्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। बिहार पंचमी और समाज सेवा इस पर्व पर लोग जरूरतमंदों को दान-पुण्य करते हैं। अन्नदान, वस्त्रदान, और धन का दान बिहार पंचमी के शुभ अवसर पर अत्यधिक पुण्यदायक माना जाता है। निष्कर्ष बिहार पंचमी का पर्व माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का सुनहरा अवसर है। यह न केवल धन और समृद्धि की कामना को पूरा करता है, बल्कि समाज में एकता, प्रेम, और करुणा का संदेश भी देता है। ऐसे शुभ अवसर पर हमें न केवल अपने परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, बल्कि समाज के हर वर्ग की भलाई का ध्यान रखना चाहिए। आप भी इस बिहार पंचमी पर माता लक्ष्मी की पूजा करके उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुख-समृद्धि और शांति से भर सकते हैं। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Vivah Panchami:विवाह पंचमी,”प्रभु श्रीराम और माता सीता के पवित्र मिलन का पर्व”

Vivah Panchami:विवाह पंचमी भगवान श्री राम और माता सीता की शादी की सालगिरह के रूप में मनाए जाने वाले एक लोकप्रिय हिंदू त्यौहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार, विवाह पंचमी मार्गशीर्ष के महीने के दौरान शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन मनाया जाता है। किसी भी हिंदू शादी के समान, विवाह पंचमी त्योहार कई दिनों पहले शुरू हो जाया करता है। सभी भक्त पूर्ण अनुग्रह, भक्ति और समर्पण के साथ इस अनुष्ठान का आनंद लेते हैं। विवाह पंचमी उत्सव के दिन भक्त विवाह के मंगल गीत तथा श्री राम भजन का गायन घर एवं मंदिरों में सामूहिक रूप से करते हैं। विवाह पंचमी के ही दिन वृंदावन के निधिवन में श्री बांके बिहारी जी महाराज का प्राकट्य उत्सव, Vivah Panchami बिहार पंचमी भी मनाया जाता है। Vivah Panchami:विवाह पंचमी कब है? पंचांग के अनुसार, 05 दिसंबर 2024 को दोपहर 12:49 पीएम पर मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष कीी पंचमी तिथि शुरुआत होगी और 06 दिसंबर 2024 को दोपहर 12:07 बजे समापन होगा। इसलिए उदयातिथि के अनुसार, 06 दिसंबर को Vivah Panchami विवाह पंचमी मनाई जाएगी। विवाह पंचमी के दिन ध्रुव योग,रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग बन रहा है। इससे इस दिन पूजा-आराधना का महत्व कहीं अधिक बढ़ जाता है। Vivah Panchami:पूजाविधि Vivah Panchami विवाह पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठें। स्नानादि के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें। एक छोटी चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और माता सीता और भगवान राम की प्रतिमा स्थापित करें। अब उन्हें लाल या पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें। माता सीता को श्रृंगार की सामग्री अर्पित करेंष विधि-विधान से पूजा करें और भगवान राम और मां सीता को पीले रंग के फूल अर्पित करें। प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाएं। उन्हें फल,फूल,धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। अंत में माता सीता और प्रभु श्रीराम की आरती उतारें। दान सामग्री- मैरिड लाइफ को खुशहाल बनाने के लिए विवाह पंचमी के दिन पालकी, कौड़ी, श्रृंगार सामग्री,गरीबों और जरुरतमंदो को कपड़े, अनाज और मिठाई का दान कर सकते हैं। Vivah Panchami:विवाह पंचमी का महत्व: त्रेता युग में भगवान राम का माता सीता संग विवाह संपन्न हुआ था। विवाह पंचमी के दिन बड़े धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ माता सीता और भगवान राम का विवाह वर्षगांठ मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन मां सीता और भगवान राम की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है। मैरिज में आ रही सभी परेशानियों से छुटकारा मिलता है और जीवन में सुख-समृद्धि और खुशियों का आगमन होता है। विवाह पंचमी कैसे मनाई जाती है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विवाह पंचमी के दिन भगवान राम और माता सीता का विवाह हुआ था। इसलिए विवाह पंचमी को भगवान राम और माता सीता की विवाह वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि यह वही शुभ दिन है जब तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को पूरा किया था। ❀ विवाह पंचमी के दिन श्री राम और माता सीता का विवाह अनुष्ठान करें।❀ माता सीता और राम जी की तस्वीर स्थापित करें और उन्हें माला पहनाएं।❀ अगर कुंवारी कन्याएं ॐ जानकी वल्लभाय नमः मंत्र का जाप 108 बार करें तो उन्हें राम जी जैसा सुयोग्य वर मिलता है।❀ इस दिन माता जानकी और राम जी की विवाह कथा सुनने का भी विधान है।❀ इस अवसर पर मंदिरों में भव्य आयोजन किये जाते हैं। लोग घर पर भी पूजा का आयोजन करते हैं। Vivah Panchami:विवाह पंचमी के दिन विवाह नहीं किया जाता है हिन्दू धर्म मैं भगवान राम और माता सीता की जोड़ी आदर्श जोड़ी मानी जाती है। भारतीय समाज में विवाहित महिलाओं को राम-सीता की तरह ही आशीर्वाद दिया जाता है। भगवान राम और माता सीता की कड़ी मेहनत की कहानी आज भी हर किसी को सुनाई जाती है। लेकिन फिर भी इनकी लग्न तिथि पर विवाह करना अशुभ माना जाता है। दरअसल, इसके पीछे का कारण यह है कि विवाह के बाद भगवान राम और माता सीता के जीवन में कई परेशानियां आईं। इन दोनों ने 14 वर्ष वनवास में भी बिताए। इसके अलावा माता सीता को भी अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा। धार्मिक ग्रंथो के अनुसार भगवान राम ने सामाजिक मान्यताओं और अपने निष्पक्ष सिद्धांतों के कारण गर्भवती माता सीता का त्याग कर दिया था। जिसके बाद माता सीता ने अपना आगे का जीवन अकेले ही जंगल में बिताया। उन्होंने अकेले ही अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। राम और सीता के वैवाहिक जीवन में इतने संघर्षों को देखते हुए ये लोग यह त्यौहार तो मनाते हैं लेकिन इस दिन अपने बच्चों की शादी नहीं करते हैं। ऐसा इसलिए ताकि उनके बच्चों को उतना कष्ट न सहना पड़े जितना भगवान राम और माता सीता को सहना पड़ा।

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Annapurna Vrat:अन्नपूर्णा व्रत,”समृद्धि और संतोष का मार्ग”

Annapurna Vrat:मां अन्नपूर्णा माता का महाव्रत मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष पंचमी से प्रारम्भ होता है और मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को समाप्त होता है। यह उत्तमोत्तम व्रत सत्रह दिनों तक चलने वाला व्रत है। व्रत के प्रारंभ के साथ भक्त 17 गांठों वाले धागे का धारण करते हैं। इस अति कठोर महाव्रत में व्रती 17 दिन तक अन्न का त्याग करते हैं। फलाहार भी एक ही वक्त किया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 6 दिसंबर 2024, शुक्रवार को पड़ रहा है। Annapurna Vrat:कई भक्त इस व्रत को 21 दिन तक भी पालन करते हैं, इस मान्यता के अनुसार व्रत मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा से प्रारंभ होकर मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को समापन होता है। Annapurna Vrat:मां अन्नपूर्णा माता का व्रत करने का पूजन विधि❀ अन्नपूर्णा माता के व्रत के दिनों प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।❀ इस प्रकर से सोलह दिन तक माता अन्नपूर्णा की कथा का श्रवण करें व डोरे का पूजन करें। फिर जब सत्रहवाँ दिन आये (मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की षष्ठी) को व्रत करनेवाला सफेद वस्त्र और स्त्री लाल वस्त्र धारण करें। रात्रि में पूजास्थल में जाकर धान के पौधों से एक कल्पवृक्ष बनाकर स्थापित करें और उस वृक्ष के नीचे भगवती अन्नपूर्णा की दिव्य मूर्ति स्थापित करें। ❀ पूरे घर और रसोई, चूल्हे की अच्छे से साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें।❀ खाने के चूल्हे पर हल्दी, कुमकुम, चावल पुष्प अर्पित करें। धूप दीप प्रज्वलित करें।❀ इसके साथ ही माता पार्वती और शिव जी की पूजा करें। माता पार्वती ही अन्नपूर्णा हैं।❀ विधिवत् पूजा करने के बाद माता से प्रार्थना करें कि हमारे घर में हमेशा अन्न के भंडारे भरे रहें मां अन्नपूर्णा हमपर और पूरे परिवार एवं समस्त प्राणियों पर अपनी कृपा बनाए रखें।❀ इन् दिनों मैं अन्न का दान करें जरूरतमंदो को भोजन करवाएं। Annapurna Vrat:इस व्रत में अगर व्रत न कर सकें तो एक समय भोजन करके भी व्रत का पालन किया जा सकता है। इस व्रत में सुबह घी का दीपक जला कर माता अन्नपूर्णा की कथा पढ़ें और भोग लगाएं ।अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे ।ज्ञान वैराग्य सिध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥माता च पार्वति देवी पिता देवो महेश्वरः ।बान्धवा शिव भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥ Annapurna Vrat:व्रत के दिनों में आहारव्रती को निम्न खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिये- मूँग की दाल,चावल, जौ का आटा,अरवी, केला, आलू, कन्दा,मूँग दाल का हलवा । इस व्रत में नमक का सेवन नहीं करना चाहिये। Annapurna Vrat:अन्नपूर्णा व्रत की पूजा विधि: अन्नपूर्णा व्रत का महत्व: क्या आप इस व्रत की कथा या अन्य जानकारी भी चाहते हैं?

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Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा,”विलक्कु पूजा: दीप साधना से समृद्धि और सुख-शांति का मार्ग”

Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा, भाग्य और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक है। एक समय में बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से महालक्ष्मी की पूजा दीप जलाकर किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है और दुनिया में शांति आती है। थिरु विलक्कु पूजा, ज्यादातर शुक्रवार को या तो सुबह या शाम को दीपक जलाकर की जाती है। यह मुख्य रूप से तमिल महीनों, चिथिरई और वैगासी के दौरान की जाती है, और यह पवित्र दीप पूजा अमावस और पूर्णिमा के दिनों में भी की जा सकती है। Vilakku Pooja:कुथु विलक्कू क्या होता है Vilakku Pooja:कुथु विलक्कू का मतलब है खड़ा हुआ तेल का दीपक, जो कि अज्ञानता को दूर करने और हमारे भीतर दिव्य प्रकाश के जागरण का प्रतीक है। Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा कौन करता है? Vilakku Pooja:दक्षिण भारत – तमिलनाडु में, अधिकांश गृहिणियां इस तिरुविलक्कू पूजा को 108 जाप के साथ घर पर नियमित रूप से करतीं हैं। दीपक की मंद-मंद चमक मंदिर तथा मंदिर के कमरे को रोशन करती है, जिससे वातावरण शुद्ध और निर्मल रहता है। Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा क्यों की जाती है? दक्षिण भारतीय हिंदुओं के घरों में थिरु-विलक्कू प्रतिदिन जलाया जाता है, क्योंकि थिरु-विलक्कू को माँ महालक्ष्मी का रूप माना जाता है, जो भाग्य और धन की देवी हैं। दिव्य मां लक्ष्मी देवी की कृपा पाने के लिए महिला भक्तों द्वारा थिरुविलक्कू पूजा की जाती है। यह पूजा परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए की जाती है और यह प्रत्येक सदस्य के लिए अच्छाई लाती है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग ईमानदारी से मंदिरों में दीया जलाकर थिरु विलक्कू पूजा करते हैं, मां महालक्ष्मी भी उस शुभ कार्यक्रम में उपस्थित होंगी, और वह दीप पूजा में भाग लेने वालों को आशीर्वाद देती हैं। Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा कैसे करें? ❀ इस पूजा की शुरुआत से पहले, पवित्र दीपक को अच्छी तरह से साफ किया जाना चाहिए, और इसकी पवित्रता बढ़ाने के लिए इसे हल्दी और कुमकुम लगाया जाता है।❀ भोग के लिए पवित्र प्रसाद भी तैयार कर सकते हैं जो माँ लक्ष्मी के लिए पसंदीदा मानी जाती हैं, जैसे कि शुद्ध गाय के घी से बनी मिठाई, मक्खन से बने प्रसाद और फल। और इसे देवी माँ लक्ष्मी को अर्पित करना चाहिए। ❀ पूजा संपन्न होने के बाद गायों को प्रसाद का सामान भी चढ़ा सकते हैं।❀ सामान्य तौर पर, यह पूजा विवाहित महिलाओं द्वारा अपनी पति की लंबी उम्र के लिए की जाती है।❀ इस पवित्र दीप पूजा के प्रदर्शन का विवरण हमारे हिंदू धर्म के कुछ पवित्र ग्रंथों में भी मिलता है। ॐ मां लक्ष्मी देवी नमः संबंधित जानकारियाँ आवृत्ति साप्ताहिक समय 1 दिन शुरुआत तिथि शुक्रवार मंत्र ॐ मां लक्ष्मी देवी नमः कारण माता लक्ष्मी उत्सव विधि मंदिर में प्रार्थना, घर में पूजा, समूह प्रार्थना महत्वपूर्ण जगह दक्षिण भारत थिरु विलक्कु पूजा  हर शुक्रवार को शाम की आरती के बाद  की जाती है । पूजा, विलक्कु पूजा (दीप-पूजा) पूरे तमिल समाज में महिलाओं के बीच प्रचलित है और आमतौर पर समूहों में की जाती है। यह सामूहिक पूजा तमिलनाडु के सैकड़ों गांवों और शहरों में होती है। महिलाओं के समूह, अक्सर 108, या 1008, या यहां तक ​​कि एक समय में 10008 थिरुविलक्कु, मंदिरों में अपने पवित्र दीपों की एक साथ पूजा करने के लिए इकट्ठा होते हैं। ‘थिरु-विलक्कु’ या ‘कुथु-विलक्कु’ एक कलात्मक रूप से तैयार किया गया दीपक (संस्कृत में दीपा) है, जिसका दक्षिण भारतीय घरों में मंदिरों में स्थान है। यह सौभाग्य और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक है। थिरुविलक्कु पूजा का उद्देश्य एक समय में बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से महालक्ष्मी की पूजा करना है। ऐसा कहा जाता है कि इससे घर में समृद्धि और दुनिया में शांति आती है। यह मुख्य रूप से महिला के परिवार की भलाई के लिए किया जाता है; यह प्रत्येक सदस्य के लिए सभी शुभ चीजें लाता है। साईं महालक्ष्मी दीपक जलाते ही किसी के भी घर आ जाती हैं और उनकी हर इच्छा पूरी करती हैं!

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Margashirsha Vinayak Chaturthi:मार्गशीर्ष विनायक चतुर्थी

Vinayak Chaturthi:गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार हर महीने दो चतुर्थी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हर महीने पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। Vinayak Chaturthi 2024 : दिसंबर महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाएगा। इस दिन संध्या में व्रती चंद्रमा को अर्घ्य देंगी और भगवान गणेश और चन्द्र देव की पूजा करेंगी। सभी देवताओं में गणेश जी का स्थान सर्वोपरि है। गणेश जी को सभी परेशानियों और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। भगवान गणेश की नियमित पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। Vinayak Chaturthi:विनायक चतुर्थी कब है? पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि दिसम्बर 04 को प्रारम्भ होगी दोपहर 1:10 मिनट पर। तिथि का समापन 5 दिसम्बर को दोपहर 12:49 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार, 5 दिसम्बर को विनायक चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। Vinayak Chaturthi:विनायक चतुर्थी पूजा विधि कैसे करें:मान्यता के अनुसार चतुर्थी तिथि की पूजा दोपहर के समय करनी चाहिए। क्योंकि शाम के समय चंद्रमा को नहीं देखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा को देखने से झूठा कलंक लगता है। मान्यता के अनुसार द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने विनायक चतुर्थी की रात को चंद्रमा देखा था, जिसके बाद उन्हें स्यामंतक मणि चोरी करने के लिए झूठा कलंक लगाया गया था। इस दिन प्रात:काल स्नान कर व्रत का संकल्प लें और पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र कर पूजा प्रारंभ करें। भगवान गणेश को पीले फूलों की माला अर्पित करने के बाद धूप-दीप, नैवेद्य, अक्षत और उनकी प्यारी दूर्वा घास अर्पित करें। इसके बाद मिठाई या मोदक का भोग लगाएं। अंत में व्रत कथा पढ़कर गणेश जी की आरती करें। मान्यता के अनुसार भगवान गणेश को सिंदूर बहुत प्रिय होता है इसलिए Vinayak Chaturthi विनायक चतुर्थी के दिन पूजा के समय गणेश जी को लाल रंग के सिंदूर का तिलक लगाएं। सिंदूर चढ़ाते समय निम्न मंत्र का जाप करें-सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ।शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥ Vinayak Chaturthi:पूजा-विधि 1- भगवान गणेश जी का जलाभिषेक करें 2- गणेश भगवान को पुष्प, फल चढ़ाएं और पीला चंदन लगाएं 3- मोदक का भोग लगाएं 4- मार्गशीर्ष विनायक चतुर्थी व्रत की कथा का पाठ करें 5- ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करें 6- पूरी श्रद्धा के साथ गणेश जी की आरती करें 7- चंद्रमा के दर्शन करें और अर्घ्य दें 8- व्रत का पारण करें 9- क्षमा प्रार्थना करें मंत्र– ॐ गणेशाय नमः Vinayak Chaturthi:गणेश जी की आरती जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी। माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Bhairav Aarti:भैरव आरती

Bhairav Aarti:भैरव आरती के लाभ Bhairav Aarti:भैरव जी को शिव जी का ही एक उग्र रूप माना जाता है। Bhairav Aarti वे रक्षकों के देवता हैं और उनके पास भयंकर शक्ति होती है। भैरव जी की आरती करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं। Bhairav Aarti:भैरव आरती के प्रमुख लाभ: Bhairav Aarti:भैरव आरती का महत्व कब करें आरती कैसे करें आरती निष्कर्ष भैरव जी की आरती करने से व्यक्ति को कई लाभ प्राप्त होते हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति को शक्ति, साहस, सुरक्षा और सुख-शांति मिलती है। Bhairav Aarti:भैरव आरती ॥ श्री भैरव देव जी आरती ॥जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ।जय काली और गौर देवी कृत सेवा ॥॥ जय भैरव देवा…॥ तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक ।भक्तो के सुख कारक भीषण वपु धारक ॥॥ जय भैरव देवा…॥ वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी ।महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी ॥॥ जय भैरव देवा…॥ तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे ।चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे ॥॥ जय भैरव देवा…॥ तेल चटकी दधि मिश्रित भाषावाली तेरी ।कृपा कीजिये भैरव, करिए नहीं देरी ॥॥ जय भैरव देवा…॥ पाँव घुँघरू बाजत अरु डमरू दम्कावत ।बटुकनाथ बन बालक जल मन हरषावत ॥॥ जय भैरव देवा…॥ बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावे ।कहे धरनी धर नर मनवांछित फल पावे ॥॥ जय भैरव देवा…॥

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