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Dwadash Jyotirling | द्वादश ज्योतिर्लिंग

Dwadash Jyotirling द्वादश ज्योतिर्लिंग: द्वादश ज्योतिर्लिंग भगवान शिव की पूजा करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक शक्तिशाली भक्ति स्तोत्र है। ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के तेज चिन्ह को दर्शाता है। भारत में बारह पवित्र ज्योतिर्लिंग मंदिर हैं। शिव द्वादश ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के उन बारह ज्योतिर्लिंग मंदिरों की पूजा करने के लिए जप या जप किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग एक संस्कृत काव्य है। इस ज्योतिर्लिंग में भारत में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग का वर्णन किया गया है। द्वादश ज्योतिर्लिंग का पाठ हिंदू धर्म के अनुयायियों और शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस ज्योतिर्लिंग का नियमित जाप करना भगवान शिव को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने का सबसे शक्तिशाली तरीका है। इस ज्योतिर्लिंग के जाप से व्यक्ति को शिव और सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। Dwadash Jyotirling जो व्यक्ति नियमित रूप से इस स्तोत्र का जाप करता है, उसे महालक्ष्मी का आशीर्वाद हमेशा मिलता है। सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए आपको सुबह स्नान करने के बाद भगवान शिव की मूर्ति या चित्र के सामने ज्योतिर्लिंग का पाठ करना चाहिए। इसके प्रभाव को अधिकतम करने के लिए आपको सबसे पहले ज्योतिर्लिंग का हिंदी में अर्थ समझना चाहिए। Dwadash Jyotirling Ke labh द्वादश ज्योतिर्लिंग के लाभ इस ज्योतिर्लिंग का नियमित पाठ करने से मन को शांति मिलती है और आपके जीवन से सभी बुराइयाँ दूर रहती हैं और आप स्वस्थ, धनवान और समृद्ध बनते हैं।जो भी व्यक्ति प्रतिदिन इस द्वादश ज्योतिर्लिंग का जाप करता है, उसे बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन के समान फल मिलता है। यह एकमात्र ऐसा स्तोत्र है, जिसके जाप से व्यक्ति को भगवान शिव के आशीर्वाद के साथ-साथ अन्य सभी देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है।यदि कोई व्यक्ति इस दिव्य ज्योतिर्मय शिव लिंग के शब्दों का भक्तिपूर्वक पाठ करता है, तो उसे इनके दर्शन का फल प्राप्त होता है।इस ज्योतिर्लिंग के रचयिता श्री शंकराचार्य हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग भगवान शिव को समर्पित है। यह एक ऐसा काव्य है, Dwadash Jyotirling जिसमें भगवान शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों के बारे में बताया गया है। इस स्तोत्र का नियमित जाप करने से भगवान शिव की कृपा तो प्राप्त होती ही है, साथ ही अन्य सभी देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है। किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ: Dwadash Jyotirling जिन व्यक्तियों को लगातार स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां रहती हैं, जीवन में लगातार असफलता का सामना करना पड़ता है, उन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग का पाठ अवश्य करना चाहिए। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् | Dwadash Jyotirling Stotra सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् ।भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥1॥ श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् ।तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥2॥ अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् ।अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥3॥ कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय ।सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥4॥ पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् ।सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ॥5॥ याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः ।सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥6॥ महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः ।सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥7॥ सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे ।यद्धर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥8॥ सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः ।श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥9॥ यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च ।सदैव भीमादिपदप्रसिद्दं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ॥10॥ सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् ।वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥11॥ इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् ।वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणम् प्रपद्ये ॥12॥ ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण ।स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥13॥ ॥ इति द्वादश ज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

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Devya Aratrikam:देव्या अरात्रिकम् 

Devya Aratrikam (देव्या अरात्रिकम्) प्रवरातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाद्येपारावारविहारिणि नारायणि हृद्ये।प्रपञ्चसारे जगदाधारे श्रीविद्येप्रपन्नपालननिरते मुनिवृन्दाराध्ये॥जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे।मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे॥१॥ pravarātīranivāsini nigamapratipādyepārāvāravihāriṇi nārāyaṇi hṛdye।prapañcasāre jagadādhāre śrīvidyeprapannapālananirate munivṛndārādhye॥jaya devi jaya devi jaya mohanarūpe।māmiha janani samuddhara patitaṃ bhavakūpe॥1॥ हे प्रवरानदीतीरवासिनी, वेदों से प्रतिपादित, क्षीरसागरविहारिणी, नारायणप्रिया, मनोहारिणी, संसार की सार और आधाररूपिणी, लक्ष्मी और विद्यास्वरूपिणी, शरणागत की रक्षा में तत्पर, मुनिगणों से आराधित हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! हे मनोहर रूपवाली! तुम्हारी जय हो! हे मातः! इस संसारकूप में पड़े हुए मेरा उद्धार करो॥१॥ ध्रुवपदम्॥ दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोज्ज्वलरदनेपदनखनिर्जितमदने मधुकैटभकदने।विकसितपङ्कजनयने पन्नगपतिशयनेखगपतिवहने गहने सङ्कटवनदहने॥जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे।मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे॥२॥ dhruvapadam॥ divyasudhākaravadane kundojjvalaradanepadanakhanirjitamadane madhukaiṭabhakadane।vikasitapaṅkajanayane pannagapatiśayanekhagapativahane gahane saṅkaṭavanadahane॥jaya devi jaya devi jaya mohanarūpe।māmiha janani samuddhara patitaṃ bhavakūpe॥2॥ पूर्णचन्द्र के समान दिव्य मुखवाली, कुन्दपुष्प के-से स्वच्छ दाँतों वाली, अपने पैरों की नख-ज्योति से मदन को पराजित करने वाली, मधुकैटभ का संहार करने वाली, प्रफुल्लित कमल-समान नेत्रोंवाली, Devya Aratrikam शेषशायिनी, गरुडवाहिनी, दुराराध्या, संकट वन को भस्म करने वाली (हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! हे मातः! इस संसारकूपमें पड़े हुए मेरा उद्धार करो) ॥ २॥ मञ्जीराङ्कितचरणे मणिमुक्ताभरणेकञ्चुकिवस्त्रावरणे वक्त्राम्बुजधरणे।शक्रामयभयहरणे भूसुरसुखकरणेकरुणां कुरु मे शरणे गजनक्रोद्धरणे॥जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे।मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे॥३॥ mañjīrāṅkitacaraṇe maṇimuktābharaṇekañcukivastrāvaraṇe vaktrāmbujadharaṇe।śakrāmayabhayaharaṇe bhūsurasukhakaraṇekaruṇāṃ kuru me śaraṇe gajanakroddharaṇe॥jaya devi jaya devi jaya mohanarūpe।māmiha janani samuddhara patitaṃ bhavakūpe॥3॥ चरणों में नूपुर धारण करने वाली, मणि और मोतियों के आभूषण धारण करने वाली, चोली और वस्त्रों से सुसज्जित, कमलमुखी, इन्द्र के विघ्न बाधाओं को दूर करने वाली, ब्राह्मणों के लिये आनन्ददायिनी, Devya Aratrikam गज और ग्राह का उद्धार करने वाली हे देवि! Devya Aratrikam मुझ शरणागतपर कृपा करो। (हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! जय हो! हे मातः ! इस संसार कूप में पड़े हुए मेरा उद्धार करो) ॥३॥ छित्त्वा राहुग्रीवां पासि त्वं विबुधान्ददासि मृत्युमनिष्टं पीयूषं विबुधान्।विहरसि दानवऋद्वान् समरे संसिद्धान्मध्वमुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान्॥जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे।मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे॥४॥ chittvā rāhugrīvāṃ pāsi tvaṃ vibudhāndadāsi mṛtyumaniṣṭaṃ pīyūṣaṃ vibudhān।viharasi dānavaṛdvān samare saṃsiddhānmadhvamunīśvaravarade pālaya saṃsiddhān॥jaya devi jaya devi jaya mohanarūpe।māmiha janani samuddhara patitaṃ bhavakūpe॥4॥ तुम राहु की ग्रीवा काटकर देवों की रक्षा करती हो, असुरों को उनकी इच्छा के विपरीत मृत्यु और देवताओं को अमृत देती हो, युद्धकुशल और वीर दैत्यों से रण-क्रीडा कराने वाली हो। Devya Aratrikam हे मध्वमुनीश्वर को वर देने वाली! भक्तों का पालन करो। (हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! जय हो! हे मातः! इस संसार कूप में पड़े हुए मेरा उद्धार करो) ॥ ४॥ इति देव्या आरात्रिकं समाप्तम्।

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Devyapradh Kshamapan Stotra:देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम्

Devyapradh Kshamapan Stotra (देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम्) Devyapradh Kshamapan Stotra:न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम ॥१॥ विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥ पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥ जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥ परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पच्चाशीतेरधिकमपनीते Devyapradh Kshamapan Stotra तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम ॥५॥ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥ चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम ॥७॥ न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे Devyapradh Kshamapan Stotra जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥ नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥ आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥ जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम ॥११॥ मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥ ॥इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्॥

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देवी क्षमा प्रार्थना स्तोत्र | Devi Kshama Prarthana Stotram

देवी क्षमा प्रार्थना स्तोत्र (Devi Kshama Prarthana Stotram) अपराध सहस्राणि कृयन्थे आहर्निसं मया, दासो आयमिथि मां मथ्व क्शमस्व परमेश्वरि ॥१॥ आवजनं न जानामि, न जानामि विसर्जनम्, पूजां चैव न जानामि, क्षंयथं अरमेश्वरि ॥२॥ मन्थ्रहीनम् , क्रियाहीनं, भक्थिहीनं, श्रुरेस्वरि, यतः पूजिथं मया देवी परिपूर्णं थादस्थुथे ॥३॥ आपराध स्थं क्रुथ्व जगदंबेथि चो उचरतः, यं गथिं संवप्नोथे न थां ब्रह्मदाय सुरा ॥४॥ सपरधोस्मि सरणं प्रथस्थ्वं जगदम्बिके, इधनी मनु कंप्योऽहं यदेच्छसि तदा कुरु ॥५॥ अज्ञान स्मृथेर्ब्रन्थ्य यन्यूनं अधिकं कर्थं, ततः सर्व क्षंयधं देवी प्रसीध परमेश्वरि ॥६॥ ख़मेश्वरि जगन्मथ सचिदनन्द विग्रहे, ग़्रहनर्चमीमम् प्रीथ्य प्रसीद परमेश्वरि ॥७॥ गुह्यधि गुह्य गोप्थ्री ग्रहण अस्मद कर्थं जपं, सिधिर भवथु मेय देवी थ्वत् प्रसादतः सुरेश्वरि ॥८॥

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Devi Apradh Kshamapan Stotra | देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्

Devi Apradh Kshamapan Stotra (देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्): देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् माँ दुर्गा का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, यदि आपसे माँ दुर्गा की पूजा में कोई त्रुटी हो जाए है, आपको लगे की किसी ने आपके उपर तंत्र प्रयोग कर दिया है, जिसके कारण आपकी शक्ति काम नही कर रही है या नष्ट हो हई है, तो आप रात्रि के समय, 9 बजे से 11 बजे के बीच लाल के ऊनि आसन पर बैठकर, पूर्व दिशा की और मुख करके, देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् के 1,3, या 5 पाठ अवश्य ही करे, उसके बाद आप माँ दुर्गा की आरती करे। Devi Apradh Kshamapan Stotra:इस तरह पाठ करने से माँ प्रसन्न होती है, और आपकी गलती को क्षमा करके माँ आपकों आशिर्वाद प्रदान करती है। यदि आप (Devi Apradh Kshamapan Stotra) देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् को संस्कृत में नही पाठ कर सकते तो, हिंदी में पाठ करे, तब भी आपको देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् का पूर्ण लाभ मिलेगा। न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्।।1।। अर्थ – हे मातः ! मैं तुम्हारा मन्त्र, यंत्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता, परन्तु सब प्रकार के क्लेशों को दूर करने वाला आपका अनुसरण करना ही जानता हूँ. विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव  चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।2।। अर्थ: Devi Apradh Kshamapan Stotra सबका उद्धार करने वाली हे करुणामयी माता ! तुम्हारी पूजा की विधि न जान्ने के कारण, धन के आभाव में, आलस्य से और उन विधियों को अच्छी तरह न कर सकने के कारण, तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती. पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला: परं  तेषां  मध्ये  विरलतरलोSहं  तव  सुत:। मदीयोSयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।3।। Devi Apradh Kshamapan Stotra:अर्थ: माँ ! भूमण्डल में तुम्हारे सरल पुत्र अनेको है पर उनमे एक मैं विरला ही बड़ा चंचल हूँ, तो भी हे शिवे ! मुझे त्याग देना तुम्हे उचित नहीं, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती. जगन्मातर्मातस्तव  चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।4।। अर्थ:  हे जगदम्ब ! हे मातः ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की Devi Apradh Kshamapan Stotra अथवा तुम्हारे लिए प्रचुर धन भी समर्पण नहीं किया तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है की क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती. परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्।।5।। अर्थ:  हे गणेश जननी ! मैंने अपनी पचासी वर्ष से अधिक आयु बीत जाने पर Devi Apradh Kshamapan Stotra विविध विधियों द्वारा पूजा करने से घबड़ा कर सब देवों को छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किस की शरण में जाऊं? श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै:। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ।।6।। अर्थ: हे माता अपर्णे ! यदि तुम्हारे मंत्राक्षरों के कान में पड़ते ही चांडाल भी मिठाई के समान सुमधुरवाणी से युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी करोड़पति बन कर चिरकाल तक निर्भय विचरता है तो उसके जप का अनुष्ठान करने पर जपने से जो फल होता है, उसे कौन जान सकता है? चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्।।7।। अर्थ: जो चिता का भस्म रमाए है, विष खाते है, नंगे रहते है, जटाजूट बांधे है, गले में सर्पमाला पहने है, Devi Apradh Kshamapan Stotra हाथ में खप्पर लिए है, पशुपति और भूतों के स्वामी है, ऐसे शिवजी ने भी जो एकमात्र जगदीश्वर की पदवी प्राप्त की है, वह हे भवानि ! तुम्हारे साथ विवाह होने का ही फल है. न मोक्षस्याकाड़्क्षा भवविभववाण्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन:। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत:।।8।। अर्थ: हे चंद्रमुखी माता ! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है, सांसारिक वैभव की भी लालसा नहीं है, विज्ञान तथा सुख की भी अभिलाषा नहीं है, इसलिए मैं तुमसे यही मांगता हूँ कि मेरी साड़ी आयु मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी आदि नामो के जपते-जपते ही बीते. नाराधितासि विधिना विविधोपचारै: किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि:। श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव।।9।। अर्थ: हे श्याम ! मैंने अनेको उपचारों से तुम्हारी सेवा नहीं कि (यही नहीं, इसके विपरीत) Devi Apradh Kshamapan Stotra अनिष्ट चिंतन में तत्पर अपने वचनों से मैंने क्या नहीं किया? (अर्थात अनेकों बुराइयाँ कि है) फिर भी मुझ अनाथ पर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह तुम्हे बहुत ही उचित है, क्योंकि तुम मेरी माता हो. आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथा: क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति।।10।। अर्थ – हे दुर्गे ! हे दयासागर माहेश्वरी ! जब मैं किसी विपत्ति में पड़ता हूँ तो तुम्हारा ही स्मरण करता हूँ, इसे तुम मेरी दुष्टता मत समझना, क्योंकि भूखे-प्यासे बालक अपनी माँ को याद किया करते हैं. जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम्।।11।। अर्थ:  हे जगज्जननी ! मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है, इसमें आश्चर्य ही क्या है? क्योंकि अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देती. मत्सम: पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु।।12।। अर्थ: हे महादेवी ! Devi Apradh Kshamapan Stotra मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप नाश करने वाली नहीं है, यह जानकार जैसा उचित समझो, वैसा करो. इति श्रीमच्छंकराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्।

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Devkrit Laxmi Stotra | देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र

Devkrit Laxmi Stotra:देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र: महात्मा पुष्कर ने परशुराम को बताया कि भगवान इंद्र, देवी लक्ष्मी को राज्यलक्ष्मी के रूप में हमेशा के लिए इंद्रलोक में बनाए रखना चाहते हैं। इंद्र ने देवी महालक्ष्मी की उनके अंश से स्तुति की, जिससे उनका राज्य सुरक्षित हो गया और देवों और दानवों के बीच युद्ध में उनके शत्रुओं को परास्त कर दिया गया। जो लोग देवी लक्ष्मी के इस महास्तोत्र को पढ़ते और सुनते हैं, उन्हें समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है और इसलिए महात्मा पुष्कर ने परशुराम को सलाह दी कि वे देवी लक्ष्मी के स्तोत्र को यथासंभव बार-बार और प्रत्येक सप्ताह शुक्रवार को अवश्य पढ़ें। समृद्धि और समृद्धि प्राप्त करने के लिए यह देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र बहुत शक्तिशाली पाठ है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है, वह एक महीने में भगवान कुबेर बन जाता है। भगवान इस शक्तिशाली स्तोत्र से देवी Devkrit Laxmi Stotra महालक्ष्मी की स्तुति करते हैं। कोई भी साधक देवी लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए इस देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का प्रतिदिन 21 बार जाप कर सकता है। दीपावली के पावन अवसर पर देवी लक्ष्मी की पूजा की जा सकती है तथा इस देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का 108 बार जाप करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, Devkrit Laxmi Stotra देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का जाप करना सबसे शक्तिशाली उपाय है। सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए आपको प्रातः स्नान करने के पश्चात देवी लक्ष्मी की मूर्ति अथवा चित्र के समक्ष देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का जाप करना चाहिए। इसके प्रभाव को अधिकतम करने के लिए आपको सबसे पहले स्तोत्र का अर्थ हिंदी में समझना चाहिए। इस स्तोत्र की पूजा प्रतिदिन सभी धनवानों को धन-धान्य की प्राप्ति कराने के लिए करनी चाहिए। Devkrit Laxmi Stotra महालक्ष्मी की कृपा से हमें वैभव, सौभाग्य, स्वास्थ्य, ऐश्वर्य, शील, विद्या, विनय, ओज, गम्भीरी तथा कांति की प्राप्ति होती है। आश्चर्यजनक रूप से असीमित सम्पत्ति प्रदान करने वाला महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना सूत्र है, जिसमें श्री महालक्ष्मी की बहुत ही सुन्दर पूजा की गई है। Devkrit Laxmi Stotra:देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र के लाभ देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का नियमित जाप करने से मन को शांति मिलती है और आपके जीवन से सभी बुराइयाँ दूर रहती हैं और आप स्वस्थ, धनवान और समृद्ध बनते हैं।देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र श्री लक्ष्मी देवी जी को समर्पित है। देवी लक्ष्मी स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को सफलता मिलती है; उसे अपने जीवन में किसी भी मामले में धन के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता है। Devkrit Laxmi Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ धनहीन जीवन जी रहे व्यक्ति को वैदिक पद्धति के अनुसार इस देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। Devkrit Laxmi Stotra | देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र क्षमस्व भगवंत्यव क्षमाशीले परात्परे | शुद्धसत्त्वस्वरूपे च कोपादिपरिवर्जिते |1| उपमे सर्वसाध्वीनां देवीनां देवपूजिते | त्वया विना जगत्सर्वं मृततुल्यं च निष्फलम् |2| सर्वसंपत्स्वरूपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी | रासेश्वर्यधि देवी त्वं त्वत्कलाः सर्वयोषितः |3| कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका | स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं मर्त्यलक्ष्मीश्च भूतले |4| वैकुंठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सरस्वती | गंगा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मालोकतः |5| कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयम् | रासे रासेश्वरी त्वं च वृंदावन वने- वने |6| कृष्णा प्रिया त्वं भांडीरे चंद्रा चंदनकानने | विरजा चंपकवने शतशृंगे च सुंदरी |7| पद्मावती पद्मवने मालती मालतीवने | कुंददंती कुंदवने सुशीला केतकीवने |8| कदंबमाला त्वं देवी कदंबकाननेऽपि च | राजलक्ष्मी राजगेहे गृहलक्ष्मीगृहे गृहे |9| इत्युक्त्वा देवताः सर्वा मुनयो मनवस्तथा | रूरूदुर्नम्रवदनाः शुष्ककंठोष्ठ तालुकाः |10| इति लक्ष्मीस्तवं पुण्यं सर्वदेवैः कृतं शुभम् | यः पठेत्प्रातरूत्थाय स वै सर्वै लभेद् ध्रुवम् |11| अभार्यो लभते भार्यां विनीतां सुसुतां सतीम् | सुशीलां सुंदरीं रम्यामतिसुप्रियवादिनीम् |12| पुत्रपौत्रवतीं शुद्धां कुलजां कोमलां वराम् | अपुत्रो लभते पुत्रं वैष्णवं चिरजीविनम् |13 परमैश्वर्ययुक्तं च विद्यावंतं यशस्विनम् | भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भ्रष्टश्रीर्लभते श्रियम् |14| हतबंधुर्लभेद्बंधुं धनभ्रष्टो धनं लभेत् | कीर्तिहीनो लभेत्कीर्तिं प्रतिष्ठां च लभेद् ध्रुवम् |15| सर्वमंगलदं स्तोत्रं शोकसंतापनाशनम् | हर्षानंदकरं शश्वद्धर्म मोक्षसुहृत्प्रदम् |16| || इति श्रीदेवकृत लक्ष्मीस्तोत्रं संपूर्णम् ||

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Durgashtotar Stotra | दुर्गाष्टोतर स्तोत्र

Durgashtotar Stotra दुर्गाष्टोतर स्तोत्र: दुर्गाष्टोतर स्तोत्र माता श्री दुर्गा को समर्पित है। इसमें श्री माँ दुर्गा के 108 नामों का वर्णन किया गया है। दुर्गाष्टोतर स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति के सभी दुख दूर हो जाते हैं। यह जीवन में आने वाली समस्याओं या परेशानियों से मुक्ति के लिए माँ दुर्गा से की जाने वाली प्रार्थना है। दुर्गाष्टोतर स्तोत्र श्री दुर्गा सप्तशती के आह्वान मंत्रों में से एक है। इसमें भगवान शिव माता पार्वती को दुर्गा माता के 108 नाम बताते हैं, जिनके माध्यम से दुर्गा या सती को प्रसन्न किया जा सकता है। जो लोग प्रतिदिन दुर्गा स्तोत्र के इन 108 नामों का पाठ करते हैं, उन्हें दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं लगता। उन्हें धन, विलासिता, संतान और वंश, हाथी, चार चीजें – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जैसे लाभ मिलते हैं और अंत में उन्हें हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती है। इसलिए हाथ जोड़कर और विनम्र भाव से हम देवी के शुभ दुर्गाष्टोत्र स्तोत्र का जाप करते हैं Durgashtotar Stotra जैसा कि मार्कंडेय पुराण में पाए जाने वाले 700 श्लोकों के चंडी पाठ (जिसे दुर्गा सप्तशती के नाम से भी जाना जाता है) में लिखा है। Durgashtotar Stotra:दुर्गाष्टोत्र स्तोत्र के लाभ दुर्गा का नियमित जाप मन को शांति देता है और आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है और आपको स्वस्थ, धनवान और समृद्ध बनाता है। दुर्गाष्टोत्र स्तोत्र Durgashtotar Stotra का उपयोग करने से सभी उपयोगकर्ताओं को ढेर सारा पैसा, ढेर सारी संपत्ति, तंदुरुस्ती और अच्छा स्वास्थ्य, चीजों को याद रखने के लिए बेहतरीन याददाश्त, चीजों के बारे में ढेर सारा ज्ञान, अपने जीवन में सफलता से भरपूर, अपने जीवन में आने वाली सभी बाधाओं पर विजय, बहुत अच्छा पारिवारिक जीवन और कई अन्य चीजें मिलेंगी। Durgashtotar Stotra दुर्गाष्टोत्र स्तोत्र का जाप करने से न केवल उनके जीवन की सभी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी बल्कि उनके जीवन से सभी भय, दुख और कमी भी दूर हो जाएगी जैसे कपड़े धोने के बाद धूल पानी में मिल जाती है। यह जीवन में दुर्गाष्टोत्र Durgashtotar Stotra स्तोत्र का महत्व है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। दुर्गाष्टोतर स्तोत्र के कई लाभ हैं जैसे कि अगर कोई व्यक्ति धन की कमी से जूझ रहा है तो उसे अपने जीवन में बहुत कुछ मिल सकता है, अगर कोई व्यक्ति व्यापार में नुकसान से जूझ रहा है तो वह अपने व्यापार में हुए नुकसान की भरपाई कर सकता है, अगर कोई व्यक्ति कई बीमारियों से पीड़ित है Durgashtotar Stotra और दुनिया के सबसे प्रसिद्ध डॉक्टर की मदद लेने के बाद भी उसे लाभ नहीं मिल रहा है तो वह दुर्गाष्टोतर स्तोत्र की मदद से न केवल बीमारी से उबर सकता है बल्कि अपना जीवन भी बीमारियों से पहले की तरह व्यतीत कर सकता है और भी बहुत कुछ। Durgashtotar Stotra:इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए जिन व्यक्तियों को बिना किसी कारण के जीवन में लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार दुर्गाष्टोतर स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। दुर्गाष्टोतर स्तोत्र | Durgashtotar Stotra ईश्वर उवाच शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने । यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती ॥ 1॥ ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी । आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी ॥ 2॥ पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः । मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः ॥ 3॥ सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्द स्वरूपिणी । अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः ॥ 4॥ शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा । सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥ 5॥ अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती । पट्टाम्बर परीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥ 6॥ अमेयविक्रमा क्रुरा सुन्दरी सुरसुन्दरी । वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता ॥ 7॥ ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा । चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः ॥ 8॥ विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा । बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहन वाहना ॥ 9॥ निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी । मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ 10॥ सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी । सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा ॥ 11॥ अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी । कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः ॥ 12॥ अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा । महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला ॥ 13॥ अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी । नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी ॥ 14॥ शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी । कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी ॥ 15॥ य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम् । नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ॥ 16॥ धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च । चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ॥ 17॥ कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् । पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ॥ 18॥ तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि । राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ॥ 19॥ गोरोचनालक्तककुङ्कुमेव सिन्धूरकर्पूरमधुत्रयेण । विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः ॥ 20॥ भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते । विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम् ॥ 21॥

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Digbandhan Raksha Stotra | दिग्बन्धन रक्षा स्तोत्र

Digbandhan Raksha Stotra:दिग्बंधन रक्षा स्तोत्र: दिग्बंधन रक्षा स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने वाले व्यक्ति के चारों ओर एक अदृश्य दीवार बन जाती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि इस मंत्र का 6 महीने तक प्रतिदिन पाठ करने से सबसे शक्तिशाली काला जादू या बुरी ऊर्जा भी दूर हो जाती है। 6 महीने पूरे होने के बाद, इसे प्रतिदिन 32 बार पढ़ना चाहिए ताकि व्यक्ति पूरी तरह से सुरक्षित रहे। स्तोत्र का पूरा और जल्दी लाभ पाने के लिए, इसे पूरी आस्था और भक्ति के साथ पढ़ना चाहिए। इसे अधिमानतः सुबह के समय पढ़ना चाहिए लेकिन अगर आपके पास सुबह ज्यादा समय नहीं है तो आप इसे दिन के किसी भी समय कर सकते हैं। यह स्तोत्र बहुत शक्तिशाली स्तोत्र है जो भय, भय, सिज़ोफ्रेनिया, गंभीर मानसिक अवसाद, दुश्मनों से डर, सभी मनोवैज्ञानिक समस्याओं, भूत और बुरी आत्माओं, काले जादू और तांत्रिक गतिविधियों के खिलाफ बहुत प्रभावी है। स्तोत्र का पाठ करने से साधक अपने शत्रु की जिह्वा या अन्य किसी भी प्रकार की शक्ति को रोक सकता है। Digbandhan Raksha Stotra साधक का शत्रु कभी भी अपने कार्य में सफल नहीं हो सकता, शत्रु का समूल नाश हो जाता है। दिग्बंधन रक्षा स्तोत्र का पाठ करने से साधक आरोग्य, धन-धान्य आदि प्राप्त करते हैं। यह रुद्रयामल तंत्र नामक एक प्राचीन दुर्लभ ग्रंथ से लिया गया है। ऐसा साधक जो इस महास्तोत्र का पाठ करता है, वह हर ओर से सुरक्षित हो जाता है। कोई भी उसके मार्ग में बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। साधक के सभी विरोधी मूर्ति बन जाते हैं। इस दिग्बंधन रक्षा स्तोत्र में भाग्य के गुण देखे जा सकते हैं। यह एक अद्वितीय तांत्रिक अभिव्यक्ति है जो आम लोगों के भीतर भय, भ्रम और चिंता पैदा करती है। Digbandhan Raksha Stotra ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा ने इसकी कल्पना की थी और इसे मुनियों को सिखाया था। मुनियों ने इसे नारद को सिखाया जो दिग्बंधन रक्षा स्तोत्र बन गए। Digbandhan Raksha Stotra:दिग्बंधन रक्षा स्तोत्र के लाभ दिग्बंधन रक्षा स्तोत्र का जाप करने से शत्रुओं के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिलती है।जादू-टोने, काले जादू से प्रभावित व्यक्ति पर विजय मिलती है।मनोवैज्ञानिक समस्याएं दूर होती हैं।शत्रुओं का नाश होता है।व्यक्ति दुष्टों से सुरक्षित रहता है। Digbandhan Raksha Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ अल्जाइमर से पीड़ित, मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना कर रहे और जादू-टोने, काले जादू के प्रभाव में आए व्यक्तियों को नियमित रूप से दिग्बंधन रक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। दिग्बन्धन रक्षा स्तोत्र | Digbandhan Raksha Stotra आत्म रक्षार्थ तथा यज्ञ रक्षार्थ निम्न मन्त्र से जल, सरसों या पीले चावलों को(अपने चारों ओर) छोड़ें – मूल मन्त्र: ॐ पूर्वे रक्षतु वाराहः आग्नेयां गरुड़ध्वजः । दक्षिणे पदमनाभस्तु नैऋत्यां मधुसूदनः ॥ पश्चिमे चैव गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः । उत्तरे श्री पति रक्षे देशान्यां हि महेश्वरः ॥ ऊर्ध्व रक्षतु धातावो ह्यधोऽनन्तश्च रक्षतु । अनुक्तमपि यम् स्थानं रक्षतु ॥ अनुक्तमपियत् स्थानं रक्षत्वीशो ममाद्रिधृक् । अपसर्पन्तु ये भूताः ये भूताः भुवि संस्थिताः ॥ ये भूताः विघ्नकर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया । अपक्रमंतु भूतानि पिशाचाः सर्वतोदिशम् । सर्वेषाम् विरोधेन यज्ञकर्म समारम्भे ॥

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Daridraya Dahana Shiv Stotra | दारिद्रय दहन शिव स्तोत्र

Daridraya Dahana Shiv Stotra:दारिद्रय दहन शिव स्तोत्र: त्रिलोक में प्रत्येक व्यक्ति भगवान शिव का भक्त है। वे त्रिदेवों में अद्वितीय हैं, संसार से अज्ञेय हैं। उन्हें स्वयं सर्प की मृत्यु से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन संसार का सर्वोत्तम सुख और वैभव उनकी मुट्ठी में है। हाथ में त्रिशूल लिए वे संसार की तीन महान बाधाओं – क्रोध, मोह और लोभ पर अंकुश लगाते हैं। संसार की समस्त संपत्ति उनके चरणों में पलती है। जो व्यक्ति घोर आर्थिक संकट से जूझ रहा हो, कर्ज में डूबा हो, व्यापार का काम बार-बार उलझता हो, दरिद्रता और शोषण से ग्रस्त हो तो उसे शिव की आराधना करनी चाहिए। यह दारिद्रय दहन शिव स्तोत्र महर्षि वशिष्ठ द्वारा रचित है। दारिद्रय दहन का अर्थ है दरिद्रता का नाश। दरिद्रता केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी होती है। आज की कालिका में अधिकांश मनुष्य मानसिक दरिद्रता से ग्रसित है- नकारात्मक भावनाएं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, स्वार्थ, ईर्ष्या, भय आदि। भगवान शिव की पूजा मनुष्य को भौतिक सुख-समृद्धि के साथ ज्ञान प्रदान कर मन से समृद्ध बनाती है, अर्थात स्वस्थ मन प्रदान करती है, क्योंकि भगवान शिव के सिर पर चंद्रमा है और चंद्रमा मन का कारक है। इसलिए व्यक्ति को प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा के बाद या जब भी समय मिले, एक बार ‘बरीधा शास्त्र’ का पाठ अवश्य करना चाहिए क्योंकि ‘स्वस्थ मन ही स्वस्थ’ है। यह सभी सुखों और दुखों के नाश का आधार है। Daridraya Dahana Shiv Stotra:दारिद्रय दहन शिव स्तोत्र लाभ यह स्तोत्र दरिद्रता के दहन का स्त्रोत है। जो व्यक्ति नियमित रूप से इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवान शिव की पूजा करता है, उसे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और दरिद्रता का नाश होता है तथा धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है। ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित यह स्तोत्र समस्त रोगों को दूर करने वाला, शीघ्र ही समस्त सम्पत्तियों को देने वाला तथा पितृवंशीय परम्परा को बढ़ाने वाला है। जो व्यक्ति तीनों कालों में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे अवश्य ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। हमें प्रतिदिन श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता के साथ दारिद्रय दहन शिव स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से दारिद्रय दहन शिव स्तोत्र हमारी दरिद्रता को दूर करता है तथा हमें धन, सम्पत्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। हमारे सभी रोग दूर होते हैं तथा हमें उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। Daridraya Dahana Shiv Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ गरीबी का सामना कर रहे, शून्यता की भावना रखने वाले व्यक्तियों को नियमित रूप से दारिद्रय दहन शिव स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र | Daridraya Dahana Shiv Stotra विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कणामृताय शशिशेखरधारणाय | कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || 1|| गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय | गंगाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || 2|| भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय | ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || 3|| चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय | मंझीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || 4|| पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय | आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || 5|| भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय | नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || 6|| रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय | पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || 7|| मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय | मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || 8|| वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणं | सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् | त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् || 9|| || इति श्रीवसिष्ठविरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||

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Das Mahavidya Stotra | दस महाविद्या स्तोत्र

Das Mahavidya Stotra:दस महाविद्या स्तोत्र, 10 महाविद्या स्तोत्रम (दस महाविद्या स्तोत्र): पारलौकिक ज्ञान की दस वस्तुओं को दस महाविद्या के रूप में जाना जाता है। इनमें से प्रत्येक वस्तु को हिंदू पूजा की परंपरा में एक महिला देवता या देवी के रूप में दर्शाया गया है। सच में, ये देवी केवल समय, जीवन और ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के चक्र का प्रतिनिधित्व करती हैं जो हमारे जीवन और ब्रह्मांड में घटती-बढ़ती रहती हैं। इन दस ऊर्जाओं में सभी ज्ञान, सभी क्षमताएँ – भूत, वर्तमान और भविष्य समाहित हैं। इन शक्तिशाली देवी या प्रकृति की शक्तियों में से प्रत्येक के ब्रह्मांडीय चित्रमय निरूपण को यंत्र या रहस्यमय डिज़ाइन कहा जाता है। Das Mahavidya Stotra प्रत्येक अपनी शक्ति (बल) में अद्वितीय है और उन लोगों को अपनी अंतर्निहित शक्ति प्रदान करने में सक्षम है जो ध्यान करते हैं और प्रतिनिधि डिज़ाइनों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। दस देवियों या उनकी ज्यामितीय आकृतियों पर ध्यान करने से, ऐसा कहा जाता है कि प्रत्येक देवी अपनी ऊर्जा के अनुसार अपने उपहारों के साथ उपासक को आशीर्वाद देती है। इस देवी का ध्यान करने से आप सहज रूप से समय के अर्थ और इस तथ्य का अनुभव करेंगे कि समय ही सभी का भक्षक है। समय ही वह माध्यम है जिसके भीतर सभी चीजें जन्म लेती हैं और मरती हैं। इसलिए 10 महाविद्या स्तोत्रम साधक को निर्भयता, समय और मृत्यु पर विजय और अमरता प्रदान करता है। जो लोग इस यंत्र की पूजा करना चुनते हैं, वे दुनिया से अलग हो जाते हैं Das Mahavidya Stotra और इसलिए उन्हें इसकी शक्ति से जुड़ने का प्रयास करने से पहले पारंपरिक अर्थों में अपनी जिम्मेदारियों पर विचार करने की आवश्यकता होती है। तंत्र में, देवी-शक्ति की पूजा को विद्या कहा जाता है। सैकड़ों तांत्रिक साधनाओं में से, दस प्रमुख देवियों की पूजा को दस महाविद्या कहा जाता है। देवी के इन प्रमुख रूपों का वर्णन तोडाल तंत्र में किया गया है। Das Mahavidya Stotra वे हैं काली, तारा, महा त्रिपुर सुंदरी (या षोडशी-श्री विद्या), भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला। शक्ति के ये दस पहलू संपूर्ण सृष्टि का प्रतीक हैं। Das Mahavidya Stotra:दास महाविद्या स्तोत्र के लाभ: वैदिक विधि से दस महाविद्या स्तोत्र के कई “स्तर” हैं। जैसे कि दस महाविद्या स्तोत्र के पाठ Das Mahavidya Stotra के साथ यंत्र की सरल पूजा, उपचारात्मक ज्योतिषीय उपाय के रूप में, इस तंत्र से जुड़ी विभिन्न सिद्धियाँ प्राप्त करने और आध्यात्मिक मोक्ष के लिए सभी तांत्रिक अनुष्ठानों के साथ विस्तृत पूजा।आपकी सभी भौतिकवादी इच्छाएँ पूरी होंगी।आप मोक्ष प्राप्त करेंगे।आपको देवी पार्वती का आशीर्वाद मिलेगा।भक्त बीमारियों से सुरक्षित रहेगा और मौजूदा बीमारियों से राहत मिलेगी।दास महाविद्या स्तोत्र से आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा।10 महाविद्या स्तोत्रम, आपको धन, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होगी।यदि आप दस महाविद्या स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो आप अधिक साहसी बनेंगे। Das Mahavidya Stotra:किसको यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए: जो लोग धन, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें वैदिक नियम के अनुसार नियमित रूप से दस महाविद्या स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। Das Mahavidya Stotra | दस महाविद्या स्तोत्र नमस्ते चण्डिके । चण्डि । चण्ड-मुण्ड-विनाशिनि । नमस्ते कालिके । काल-महा-भय-विनाशिनी । ।।1।। शिवे । रक्ष जगद्धात्रि । प्रसीद हरि-वल्लभे । प्रणमामि जगद्धात्रीं, जगत्-पालन-कारिणीम् ।।2।। जगत्-क्षोभ-करीं विद्यां, जगत्-सृष्टि-विधायिनीम् । करालां विकटा घोरां, मुण्ड-माला-विभूषिताम् ।।3।। हरार्चितां हराराध्यां, नमामि हर-वल्लभाम् । गौरीं गुरु-प्रियां गौर-वर्णालंकार-भूषिताम् ।।4।। हरि-प्रियां महा-मायां, नमामि ब्रह्म-पूजिताम् । सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्ध-विद्या-धर-गणैर्युताम् ।।5।। मन्त्र-सिद्धि-प्रदां योनि-सिद्धिदां लिंग-शोभिताम् । प्रणमामि महा-मायां, दुर्गा दुर्गति-नाशिनीम् ।।6।। उग्रामुग्रमयीमुग्र-तारामुग्र – गणैर्युताम् । नीलां नील-घन-श्यामां, नमामि नील-सुन्दरीम् ।।7।। श्यामांगीं श्याम-घटिकां, श्याम-वर्ण-विभूषिताम् । प्रणामामि जगद्धात्रीं, गौरीं सर्वार्थ-साधिनीम् ।।8।। विश्वेश्वरीं महा-घोरां, विकटां घोर-नादिनीम् । आद्यामाद्य-गुरोराद्यामाद्यानाथ-प्रपूजिताम् ।।9।। श्रीदुर्गां धनदामन्न-पूर्णां पद्मां सुरेश्वरीम् । प्रणमामि जगद्धात्रीं, चन्द्र-शेखर-वल्लभाम् ।।10।। त्रिपुरा-सुन्दरीं बालामबला-गण-भूषिताम् । शिवदूतीं शिवाराध्यां, शिव-ध्येयां सनातनीम् ।।11।। सुन्दरीं तारिणीं सर्व-शिवा-गण-विभूषिताम् । नारायणीं विष्णु-पूज्यां, ब्रह्म-विष्णु-हर-प्रियाम् ।।12।। सर्व-सिद्धि-प्रदां नित्यामनित्य-गण-वर्जिताम् । सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्चितां सर्व-सिद्धिदाम् ।।13।। विद्यां सिद्धि-प्रदां विद्यां, महा-विद्या-महेश्वरीम् । महेश-भक्तां माहेशीं, महा-काल-प्रपूजिताम् ।।14।। प्रणमामि जगद्धात्रीं, शुम्भासुर-विमर्दिनीम् । रक्त-प्रियां रक्त-वर्णां, रक्त-वीज-विमर्दिनीम् ।।15।। भैरवीं भुवना-देवीं, लोल-जिह्वां सुरेश्वरीम् । चतुर्भुजां दश-भुजामष्टा-दश-भुजां शुभाम् ।।16।। त्रिपुरेशीं विश्व-नाथ-प्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम् । अट्टहासामट्टहास-प्रियां धूम्र-विनाशिनीम् ।।17।।  कमलां छिन्न-मस्तां च, मातंगीं सुर-सुन्दरीम् । षोडशीं विजयां भीमां, धूम्रां च बगलामुखीम् ।।18।। सर्व-सिद्धि-प्रदां सर्व-विद्या-मन्त्र-विशोधिनीम् । प्रणमामि जगत्तारां, सारं मन्त्र-सिद्धये ।।19।। ।।फल-श्रुति।। इत्येवं व वरारोहे, स्तोत्रं सिद्धि-करं प्रियम् । पठित्वा मोक्षमाप्नोति, सत्यं वै गिरि-नन्दिनि ।।1।। कुज-वारे चतुर्दश्याममायां जीव-वासरे । शुक्रे निशि-गते स्तोत्रं, पठित्वा मोक्षमाप्नुयात् ।।2।। त्रिपक्षे मन्त्र-सिद्धिः स्यात्, स्तोत्र-पाठाद्धि शंकरी । चतुर्दश्यां निशा-भागे, शनि-भौम-दिने तथा ।।3।। निशा-मुखे पठेत् स्तोत्रं, मन्त्र-सिद्धिमवाप्नुयात् । केवलं स्तोत्र-पाठाद्धि, मन्त्र-सिद्धिरनुत्तमा । जागर्ति सततं चण्डी-स्तोत्र-पाठाद्-भुजंगिनी ।।4।। श्रीमुण्ड-माला-तन्त्रे एकादश-पटले महा-विद्या-स्तोत्रम्।।

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Shani Dashrath Stotra | शनि दशरथ स्तोत्र

Shani Dashrath Stotra:शनि दशरथ स्तोत्र: जब किसी जातक की कुंडली में शनि ग्रह गोचर में या शनि के गोचर में तथा शनि ग्रह की खराब स्थिति में बुरा प्रभाव दे रहा हो, तो शनि दशरथ स्तोत्र का प्रतिदिन जाप करने, प्रतिदिन पाठ करने से शनि अपना बुरा प्रभाव छोड़कर अच्छे परिणाम देने लगते हैं। जो लोग शनि ग्रह की महादशा, शनि साढ़ेसाती, शनि ढैय्या या शनि से पीड़ित हैं, Shani Dashrath Stotra उन्हें दशरथ कृत शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। इस पाठ को नियमित करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं तथा जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति दिलाते हैं और जीवन को सुखमय बनाते हैं। सम्राट दशरथ ही एकमात्र व्यक्ति थे, जिन्होंने भगवान शनिश्वर को द्वंद्वयुद्ध के लिए बुलाया था, क्योंकि उन्हें अपने देश से सूखा और दरिद्रता लेकर जाना था। भगवान शनिश्वर ने दशरथ के गुणों की प्रशंसा की और उन्हें उत्तर दिया कि मैं अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं हो सकता, लेकिन मैं आपके साहस से प्रसन्न हूं। महान ऋषि ऋष्यश्रृंग आपकी सहायता कर सकते हैं। स्कंद पुराण में कथा है कि काशी कुल में शनि ने अपने पिता भगवान सूर्य से प्रार्थना की थी कि मैं ऐसा पद पाना चाहता हूं जो अब तक किसी को नहीं मिला, मेरा पटल आपके पटल से सात गुना बड़ा है और मेरी गति का सामना कोई नहीं कर सकता, चाहे वह देवता, असुर, राक्षस, क्या नहीं। यह सुनकर सूर्य देव प्रसन्न हुए और कहा कि इसके लिए उन्हें काशी जाकर भगवान शंकर की आराधना करनी चाहिए। शनि ने अपने पिता की इच्छानुसार वैसा ही किया और शिव ने प्रसन्न होकर शनि को ग्रह स्थान देकर नए ग्रह मंडल में स्थापित कर दिया। जो लोग शनि ग्रह से पीड़ित हैं या उनकी कुंडली में शनि, साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही है तो उन्हें Shani Dashrath Stotra शनि दशरथ स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। शनि दशरथ स्तोत्र के नियमित पाठ से शनि प्रसन्न होते हैं और जीवन को सुखमय बनाते हैं। जिन लोगों को संस्कृत पढ़ने में परेशानी होती है, उनके लिए यह स्त्रोत है। ऐसा कहा जाता है कि Shani Dashrath Stotra राजा दशरथ के शासनकाल में जब शनि रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने वाले थे, तब राजा दशरथ ने शनि की पूजा की और उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर शनि ने राजा दशरथ के शासनकाल में रोहिणी में प्रवेश नहीं किया। इसलिए शनि दशरथ स्तोत्र को शनि संबंधी परेशानियों के लिए एक बेहतरीन उपाय माना जाता है। Shani Dashrath Stotra:शनि दशरथ स्तोत्र के लाभ: शनि दशरथ स्तोत्र उन लोगों के लिए बहुत मददगार है जो साढ़ेसाती, शनि ढैया या कंटक शनि के प्रभाव में हैं और यहां तक ​​कि उन लोगों के लिए भी जिनकी कुंडली में शनि अशुभ है या शनि की दशा चल रही है। Shani Dashrath Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र: शनि के बुरे प्रभाव में रहने वाले व्यक्ति को नियमित रूप से शनि दशरथ स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। Shani Dashrath Stotra | शनि दशरथ स्तोत्र नित्य इस स्तोत्र के पाठ मात्र से शनि ग्रह कितना भी अशुभ हो, निश्चित रूप से शांत हो कर शुभ परिणाम प्रदान करता ही है। नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च। नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।1।। नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च । नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।2।। नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:। नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते।।3।। नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम: । नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।4।। नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते। सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ।।5।। अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते । नमो मन्दगते तुभ्यं निरिाणाय नमोऽस्तुते ।।6।। तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च । नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।7।। ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे । तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।8।। देवासुरमनुष्याश्च सिद्घविद्याधरोरगा: । त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:।।9।। प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत । एवं स्तुतस्तद सौरिग्र्रहराजो महाबल: ।।10।।

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Daridrta Naashak Stotra | दरिद्रता नाशक स्तोत्र

Daridrta Naashak Stotra:दरिद्रता नाशक स्तोत्र: दरिद्रता नाशक स्तोत्र महर्षि वशिष्ठ द्वारा रचित है। संकट बहुत अधिक हो तो शिव मंदिर में या शिव प्रतिमा के सामने प्रतिदिन तीन बार इसका पाठ करने से विशेष लाभ होगा। क्लेशग्रस्त व्यक्ति यदि स्वयं पाठ करे तो उसे उत्तम फल की प्राप्ति होती है, किन्तु यदि कोई स्वजन, पत्नी या माता-पिता आदि कोई व्यक्ति इसका पाठ करें तो अधिक लाभ होता है। यह स्तोत्र भगवान शिव जी को समर्पित है! नियमित रूप से इसका पाठ करने से पूर्व तीन बार विशेष रूप से भगवान शिव को दी जाने वाली दरिद्रता का नाश करने वाले स्तोत्र का जाप करना चाहिए। दरिद्रता नाशक स्तोत्र ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित है। दरिद्रता नाशक का अर्थ है दरिद्रता का नाश। दरिद्रता केवल शारीरिक ही नहीं मानसिक भी होती है। आज के कलिकाल में अधिकांश मनुष्य मानसिक दरिद्रता, नकारात्मक भावनाओं-काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, स्वार्थ, ईर्ष्या, भय आदि से ग्रसित हैं। भगवान शिव की पूजा मनुष्य को भौतिक सुख-समृद्धि के साथ ज्ञान प्रदान कर मन से समृद्ध बनाती है, अर्थात स्वस्थ मन प्रदान करती है, क्योंकि भगवान शिव के सिर पर चंद्रमा है और चंद्रमा मन का कारक है। इसलिए प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा के बाद या जब भी समय मिले, एक बार दारिद्रय नाशक स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए, क्योंकि ‘स्वस्थ मन ही स्वस्थ शरीर है।’ यह सभी सुखों के नाश और दुखों के निवारण का आधार है। यदि संकट बहुत अधिक हो तो शिव मंदिर में या शिव की प्रतिमा के समक्ष प्रतिदिन तीन बार इसका पाठ करने से विशेष लाभ होगा। क्लेशग्रस्त व्यक्ति यदि स्वयं पाठ करे तो उसे उत्तम फल की प्राप्ति होती है, परंतु इसके स्थान पर कोई व्यक्ति जैसे कि कोई परिजन या पत्नी या माता-पिता पाठ करें तो अधिक लाभ होता है। Daridrta Naashak Stotra:दरिद्र नाशक स्तोत्र के लाभ Daridrta Naashak Stotra:प्रतिदिन भगवान शिव के ‘दरिद्र नाशक स्तोत्र’ से अभिषेक करने से व्यक्ति को स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तथा दरिद्रता से मुक्ति मिलती है। जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए आप दरिद्र नाशक स्तोत्र का पाठ कर सफल हो सकते हैं। जीवन में ऊंचाइयों को छूने के लिए ये उपाय/सुझाव आपके लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित दरिद्र नाशक स्तोत्र समस्त रोगों को दूर करने वाला, शीघ्र ही समस्त सम्पत्तियों को देने वाला तथा पितृवंशीय परम्परा को बढ़ाने वाला है। जो व्यक्ति तीनों कालों में दरिद्र नाशक स्तोत्र का पाठ करता है, उसे निश्चित रूप से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। किसे करना चाहिए Daridrta Naashak Stotra:इस स्तोत्र का पाठ Daridrta Naashak Stotra:दरिद्रता से ग्रस्त तथा आय में कमी वाले व्यक्ति को परिस्थितियों में सुधार के लिए नियमित रूप से दरिद्र नाशक स्तोत्र का जाप करना चाहिए। दरिद्रता नाशक स्तोत्र | Daridrta Naashak Stotra जय देव जगन्नाथ, जय शंकर शाश्वत। जय सर्व-सुराध्यक्ष, जय सर्व-सुरार्चित।। जय सर्व-गुणातीत, जय सर्व-वर-प्रद। जय नित्य-निराधार, जय विश्वम्भराव्यय।। जय विश्वैक-वेद्येश, जय नागेन्द्र-भूषण। जय गौरी-पते शम्भो, जय चन्द्रार्ध-शेखर।। जय कोट्यर्क-संकाश, जयानन्त-गुणाश्रय। जय रुद्र-विरुपाक्ष, जय चिन्त्य-निरञ्जन।। जय नाथ कृपा-सिन्धो, जय भक्तार्त्ति-भञ्जन। जय दुस्तर-संसार-सागरोत्तारण-प्रभो।। प्रसीद मे महा-भाग, संसारार्त्तस्य खिद्यतः। सर्व-पाप-भयं हृत्वा, रक्ष मां परमेश्वर।। महा-दारिद्रय-मग्नस्य, महा-पाप-हृतस्य च। महा-शोक-विनष्टस्य, महा-रोगातुरस्य च।। ऋणभार-परीत्तस्य, दह्यमानस्य कर्मभिः। ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य, प्रसीद मम शंकर।। फलश्रुति दारिद्रयः प्रार्थयेदेवं, पूजान्ते गिरिजा-पतिम्। अर्थाढ्यो वापि राजा वा, प्रार्थयेद् देवमीश्वरम्।। दीर्घमायुः सदाऽऽरोग्यं, कोष-वृद्धिर्बलोन्नतिः। ममास्तु नित्यमानन्दः, प्रसादात् तव शंकर।। शत्रवः संक्षयं यान्तु, प्रसीदन्तु मम गुहाः। नश्यन्तु दस्यवः राष्ट्रे, जनाः सन्तुं निरापदाः।। दुर्भिक्षमरि-सन्तापाः, शमं यान्तु मही-तले। सर्व-शस्य समृद्धिनां, भूयात् सुख-मया दिशः।।

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