MANDIR

वैष्णो धाम मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

माता का यह मंदिर कटरा के वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर ही बना हुआ है। इंदौर मध्यप्रदेश में ऐसे भी मंदिर है जो धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखते है। उनमे से एक है माँ वैष्णो धाम मंदिर। यह मंदिर गुरु नानक कॉलोनी लालबाग में है। जो लोग इंदौर घूमने आते है वह इस मंदिर के दर्शन करने जरूर जाते है। माता का यह मंदिर कटरा के वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर ही बना हुआ है। इस मंदिर के दर्शन करने से ऐसा लगता है मानों कटरा में स्थित मां वैष्णो देवी मंदिर के साक्षात् दर्शन हो रहे हों। वैष्णो धाम मंदिर का इतिहास Vaishno Dham Temple:एक बार श्रीमती सुरिंदर कौर ग्रोवर के सपने में माँ वैष्णो माता प्रकट हुईं और उन्होंने इंदौर शहर में भव्य मंदिर निर्माण की इच्छा प्रकट की और उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीमती सुरिंदर कौर ग्रोवर ने माता की इच्छा अनुसार सन 2009 में मंदिर निर्माण करवाया। “वैष्णव धाम” को पूर्ण होने में चार साल का समय लगा। गुफाओं के निर्माण में सात महीनों का समय लगा। 2 अखंड ज्योति मंदिर के गर्भगृह में सदैव जलती रहती है। वैष्णो धाम मंदिर का महत्व पहाड़ियों पर गुफाओं से होते हुए मां वैष्णोदेवी के दर्शन करने से मन को असीम शांति मिलती है। गुफाओं में अंदर मां वैष्णो के दर्शन से पहले रिद्धि-सिद्धि के साथ भगवान श्री गणेश के दर्शन होते हैं। गुफाओं में जाते समय झरने, पक्षियों का कोलाहल मन को आनंदित कर देता है। गुफाओं से होते हुए शिवधाम पहुंचते हैं जहां भगवान शिव के साथ विराजमान संपूर्ण शिव परिवार के भव्य दर्शन होते हैं। माता की प्रतिमा के समीप ही परम भक्त हनुमान जी के दर्शन होते हैं। माता की तीनों पिण्डियों को कटरा से लाया गया है। साथ ही अखंड ज्योति भी कटरा से लायी गयी है। जो आज भी जल रही है। वैष्णो धाम मंदिर की वास्तुकला मंदिर की वास्तुकला हूबहू माता वैष्णो देवी के मंदिर से मिलती जुलती है। मंदिर में कई गुफाएं है। जिसमे में गुजरते हुए आप माता के दर्शन कर सकते हैं। यह गुफा भव्य और सुन्दर बनाई गई है। जिसकी खूबसूरती देखते ही बनती है। गुफा के रास्ते में आकर्षक जलप्रपात भी बने हुए हैं। जो मंदिर की खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं। मंदिर में महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती पिंड स्वरुप में विराजित है। मंदिर में माता के साथ साथ अन्य देवता गणेश जी, भगवान शिव, हनुमान जी, कालभैरव और साईं बाबा भी विराजित हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:00 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 06:00 PM – 10:00 PM मंदिर का प्रसाद वैष्णो धाम मंदिर लड्डू, पेड़ा, चना- चिरौंजी आदि का भोग लगाया जाता है। साथ ही माता को चुनरी भी चढ़ाई जाती है।

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नवग्रह शनि मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

नवग्रह शनि मंदिर में शनि देव सौम्य और प्रसन्ना मुद्रा में विराजमान है। नवग्रह शनि मंदिर शनि देव का नाम सुनते ही आम जन के मन में सबसे पहले डर बैठ जाता है। लेकिन शनि को एक न्याय प्रिय देवता माना गया है। शनि जातक को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। बुरे कुकर्म करने वालों को शनि दंडित करते हैं। अच्छे कर्म करने वालों पर शनि अपनी कृपा बरसाते हैं। नवग्रह शनि मंदिर में शनि देव सौम्य और प्रसन्ना मुद्रा में विराजमान है। सोने-चांदी के आभूषणों से शनि देव को सुसज्जित किया जाता है। जैसे राजाधिराज होते है वैसे ही उनका पूजन-अर्चन किया जाता है। शनि देव के इस स्वरूप को देख भक्तों को भय नहीं लगता है बल्कि भक्तों को प्रेम की अनुभूति होती है। शनि देव के दर्शन मात्र से ही भक्तों की मनोकामना पूर्ण हो जाती है। माना जाता है कि मंदिर में पहुंचकर नवग्रह की आराधना करने से कुंडली दोष, शनि दोष, राहु की दशा, साढ़ेसाती, ढैय्या और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग नवग्रह शनि मंदिर में पहुंचकर शनिदेव और नवग्रह की की विशेष आराधना एक साथ करते हैं और अपने ग्रहों को शांत करते हैं। नवग्रह शनि मंदिर का इतिहास Navagraha Shani Temple:नवग्रह शनि मंदिर करीब 450 साल से भी ज्यादा पुराना है। यहं भगवान की प्रतिमा स्वयंभू है। यह भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान शनिदेव का 16 श्रृंगार किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि शनि देव का नाम सुनकर लोगों के मन में भगवान की काले पाषण की प्रतिमा उत्पन्न होती है। वहीं भारत के मध्य प्रदेश के इंदौर में स्थित नवग्रह शनि मंदिर इसी भक्ति का उदाहरण हैं जिससे लोगों की भारी आस्था जुड़ी हुई है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग इस मंदिर में पहुंचकर नवग्रह की पूजा करते हैं। मंदिर का महत्व शनिदेव की प्रतिमा के साथ इस मंदिर में होने वाली पूजा विधि भी अनोखी है। यहां तेल से नहीं बल्कि दूध और जल से शनिदेव के प्रसन्न होने की मान्यता है। मंदिर में शनि देव को फूलों और शाही पोशाकों से सजाया जाता है। शनिदेव के शृंगार में करीब छह घंटों का समय लगता है। इस शनि मंदिर में आरती से ठीक पहले शहनाई बजाई जाती है, जो आरती पूरी होने तक लगातार बजती रहती है। नवग्रह शनि मंदिर में श्रद्धालु स्नान के बाद पनोती के रूप में अपने जूते चप्पल वही छोड़कर चले जाते है। मंदिर की वास्तुकला नवग्रह शनि मंदिर के निर्माण में मराठा और आधुनिक वास्तुकला की झलक देखने को मिलती है। मंदिर को मजबूत स्तंभों पर बनाया गया है। नवग्रह शनि मंदिर में विशाल परिसर बना है जहां भक्त आकर नवग्रहों की शांति के लिए पूजा अर्चना करते हैं। मंदिर के गर्भ गृह में शनि देव की प्रसन्न मुद्रा में प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में एक प्रवेश द्वार है। नवग्रह शनि मंदिर में नवग्रहों की प्रतिमाओं के साथ शिव जी और हनुमान जी की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:30 AM – 12:00 PM सायंकाल आरती का समय Invalid date – 08:00 PM सायंकाल मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM मंदिर का प्रसाद नवग्रह शनि मंदिर में शनि देव को फल, फूल, तेल, तिल और गुड चढ़ाया जाता है। साथ ही शनि देव का दूध का भी भोग चढ़ाया जाता है।

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भूतेश्वर मंदिर:मथुरा, उत्तरप्रदेश, भारत Bhuteshwar Temple: Mathura, Uttar Pradesh, India

भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर दिव्य शिवलिंग के रूप में भी जाना जाता है। भूतेश्वर मंदिर भगवान श्री कृष्ण की पावन नगरी मथुरा में स्थित है भूतेश्वर मंदिर। यह मंदिर शहर के प्राचीन शिव मंदिर में शामिल है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर दिव्य शिवलिंग के रूप में भी जाना जाता है। इसके अलावा भूतेश्वर महादेव को मथुरा का रक्षक और क्षेत्रपाल भी कहते है। आपको बता दे कि मथुरा में महादेव मंदिर चार हैं। इन्हें मथुरा नगरी के रक्षक माना जाता है। पूर्व में पिघलेश्वर, पश्चिम में भूतेश्वर, उत्तर में गोकर्णेश्वर और दक्षिण में रंगेश्वर दिशा के क्षेत्रपाल माने जाते हैं । प्रतिवर्ष इस मंदिर में भाद्रपद मास के दौरान बृज चौरासी कोस की परिक्रमा आरम्भ होती है और यहीं पर समाप्त होती है। शहर की सीमा के भीतर स्थित यह मंदिर लोकप्रिय तीर्थ स्थल है। भूतेश्वर मंदिर का इतिहास प्राचीन मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार, मंदिर की उत्पत्ति मथुरा की स्थापना से ही मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मथुरा की स्थापना तब हुई जब शत्रुघ्न ने राक्षस मधु का वध किया। शत्रुघ्न भगवान राम के छोटे भाई थे। इस महत्वपूर्ण घटना की स्मृति में भूतेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया, जिससे यह शहर का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि भूतेश्वर महादेव के इस प्राचीन शिवलिंग को नाग शासकों द्वारा स्थापित किया था। भूतेश्वर मंदिर का महत्व भूतेश्वर महादेव मंदिर स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों के लिए धार्मिक महत्व रखता है। ऐसा माना जाता है कि भूतेश्वर महादेव मथुरा शहर को बुरी ताकतों से बचाते हैं। मथुरा के लोगों, ब्रजवासियों द्वारा रक्षक के रूप में भूतेश्वर भगवान की पूजा अर्चना की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भूतेश्वर भगवान हर संकटों से उनकी रक्षा करते हैं। भूतेश्वर मंदिर एक शक्तिपीठ है ऐसा कहा जाता है कि यह वह जगह है जहाँ पर माता सती के शरीर के नष्ट होने के बाद उनकी अंगूठी गिरी थी। यह मंदिर सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के पाताल देवी गुफा में राजा कंस द्वारा पूजा की जाती थी। भूतेश्वर मंदिर की वास्तुकला भूतेश्वर मंदिर अद्भुत स्थापत्य शैली द्वारा निर्मित है। इस मंदिर में एक मुख्य गर्भगृह और पाताल देवी गुफा है। मंदिर का गर्भगृह 100 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। मंदिर में एक नाली है, जो साइड गेट के बाहरी हिस्से को अंदर से जोड़ती है, जिससे भक्त शिवलिंग का अभिषेक कर सकते हैं। इसके अलावा मुख्य प्रवेश द्वार के बाईं ओर कई छोटे-छोटे शिवलिंग हैं। जहाँ भक्त बिना किसी परेशानी के फूल चढ़ा सकते है। मंदिर परिसर में पाताल देवी, काली देवी, गिरिराज महाराज और अन्य सुंदर मंदिर स्थित हैं। मंदिर का समय भूतेश्वर मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 01:00 PM सुबह की आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM शाम को भूतेश्वर मंदिर खुलने का समय 04:30 PM – 10:30 PM संध्या आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद भूतेश्वर महादेव को दूध, दही, शहद, जल और पेड़े का भोग लगाया जाता है। साथ ही मंदिर में शिवलिंग पर फूल भी अर्पित किए जाते हैं।

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काल भैरव मंदिर, इंदौर मध्य प्रदेश, भारत:Kaal Bhairav ​​Temple, Indore Madhya Pradesh, India

यहां हादसों के पहरेदार हैं भैंरव बाबा काल भैरव मंदिर मध्य प्रदेश के इंदौर में भैरव घाट, खण्डवा रोड पर काल भैरव मंदिर स्थित है। यह मंदिर बहुत ही चमत्कारिक है। भैरव अष्टमी पर इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ लगी रहती है। जिस दौरान विशाल भंडारा और महा आरती का आयोजन किया जाता है। जिसमें हजारों संख्या में लोग शामिल होते है। वहीं भैंरव बाबा को छप्पन भोग भी लगाए जाते हैं। काल भैरव मंदिर का इतिहास भैरव घाट के भैरव मंदिर के इतिहास की कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु मंदिर के पुजारियों द्वारा बताया जाता है कि काल भैरव के इस मंदिर का इतिहास करीब 500 वर्ष पुराना है। यह प्राचीन काल से ही अपनी चमत्कारिक शक्तियों के लिए जाना जाता है। इन्हें यहां के रक्षक के रूप में भी पूजते हैं। काल भैरव मंदिर का महत्व भैरव घाट एक ऐसा खतरनाक घाट है। जहाँ पर अधिकांशत: दुर्घटनाएं होती रहती हैं। ऐसा माना जाता है कि जो लोग इस घाट पर जाने से पहले भैरव मंदिर में रूककर दर्शन करते हैं, तो बाबा उन्हें दुर्घटनाओं से बचाते हैं। भैरव मंदिर में दर्शन करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। यह घाट बहुत ही सुन्दर है साथ ही आपको रोड के दोनों तरफ प्राकृतिक नज़ारे भी देखने को मिलेंगे। खासकर बारिश के मौसम में यहाँ का वातावरण बहुत शानदार होता है। ऐसा भी बताया जाता है कि इस घाट पर दुर्घटनाओं के कारण कई नकारात्मक शक्तियां भटकती रहती हैं। जो दुर्घटनाओं का कारण बनती है। इसलिए भैरव बाबा के दर्शन के बाद ही इस घाट की चढ़ाई करनी चाहिए। भैरव घाट पर स्थित भगवान भैरव को हादसों का पहरेदार भी कहते है। काल भैरव मंदिर की वास्तुकला इस मंदिर में भगवान भैरव की विशाल पत्थर पर प्रतिमा स्थापित है। जो देखने में बहुत ही आकर्षक है। काल भैरव एक छोटे से पुल नुमा रास्ते से होते हुए मंदिर के दर्शन के लिए भक्त यहां पहुंचते है। भैंरव बाबा की प्रतिमा का रंग सिंदूरी रहता है। प्रतिदिन इनका शृंगार भी किया जाता है। जिसमें बाबा के कई रूपों के दर्शन अलग अलग दिन करने को मिलते हैं। मंदिर में भैंरव बाबा की प्रतिमा के ठीक सामने उनके वाहन श्वान की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। काल भैरव मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 09:00 PM सायंकाल आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद भैंरव बाबा को दही-इमरती का भोग लगाया जाता है। साथ ही भक्त लोग पान, तंबाकू, सिगरेट, शराब जैसी सभी चीजें भैंरव बाबा को अर्पण करते है। साथ ही नारियल और अगरबत्ती भी बाबा को चढ़ाई जाती है।

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बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

महादेव का यह एक ऐसा मंदिर है जहां सिर्फ एक बेलपत्र से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर देवभूमि उत्तराखंड में वैसे तो भगवान शिव के कई मंदिर हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर लेकिन आज हम महादेव के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां सिर्फ एक बेलपत्र से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं व कुंवारी कन्याओं को विवाह का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माता पार्वती ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या कर भोलेनाथ को पति के रूप में पाया था। हरिद्वार में बिल्व पर्वत पर स्थित है बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर। बिल्वकेश्वर महादेव बिल्व का अर्थ होता है (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के रूप में फल देने वाला स्थल। इसी पर्वत के नाम पर मंदिर का नाम पड़ा। नीम के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है,बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर जिसकी अराधना बिल्वकेश्वर या बिल्केश्वर महादेव के रूप में की जाती है। चारों तरफ हरे-भरे जंगलों से घिरे इस प्राचीन मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। सावन महीने में यहां जल चढ़ाने के लिए कांवड़ियों की भारी भीड़ आती है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास स्कंद पुराण के केदारखंड में इस मंदिर का सबसे पहले जिक्र आया है। इसे माता पार्वती की तपोस्थली भी माना जाता है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर जैसा की प्रचलित है कि माता पार्वती दो बार भगवान शिव की अर्द्धांगिनी बनीं थीं, यानी 2 बार इनका विवाह हुआ था। पहला जब भगवान ने दक्षेश्वर के राजा दक्ष की पुत्री सती को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। बिल्वकेश्वर महादेव जिसके बाद माता सती ने यज्ञ कुंड में भस्म होकर हिमालय राजा के घर पार्वती रूप में जन्म लिया था। माता पार्वती ने ऋषि नारद मुनि की सलाह पर बिल्व पर्वत पर आकर कठोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न कर दोबारा उनकी अर्द्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। बताया जाता है कि माता पार्वती ने बिल्व पर्वत पर 3000 साल तक तपस्या की थी, जिसमें 1 हजार साल वो बिना अन्न व जल पीये रहीं थीं। माता की कठोर तपस्या देख महादेव ने उन्हें वृक्ष की शाखा के रूप में दर्शन दिए और माता पार्वती को विवाह का वरदान दिया। बेलपत्रों से घिरे मनोरम बिल्व पर्वत पर बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर के पास एक गौरी कुंड है। इसको लेकर बताया जाता है बिल्वकेश्वर महादेव कि भगवान शिव की उपासना के दौरान माता पार्वती बेलपत्र खाकर अपनी भूख शांत की थी। लेकिन जब उन्हें प्यास लगी तो स्वयं ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमंडल से पानी दिया, जोकि एक कुंड के रूप में आज भी है। बिल्वकेश्वर महादेव माता पार्वती के इस कुंड से पानी पीने के कारण इसका नाम गौरी कुंड पड़ा। कहते हैं कि इस कुंड का जल गंगा की तरह पवित्र है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर का महत्व माना जाता है कि कुंवारी कन्याओं द्वारा इस मंदिर में बेलपत्र चढ़ाने से उनके विवाह की मनोकामना पूरी होती है। मंदिर के पास बने गौरी कुंड के जल को छू लेने मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। कहा जाता है कि मंदिर में मणिधारक अश्वतर नाम का महानाग रहता है, जो कभी कभी शिवलिंग के पास दिखाई देता है। माना जाता है कि महानाग के दर्शन से हर मनोकामना पूरी होती है। ऐसी भी मान्यता है कि यहां बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ साल तक स्वर्ग में निवास करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर की वास्तुकला बिल्व पर्वत पर स्थित यह मंदिर काफी सुंदर तरीके से बनाया गया है। मंदिर में नीम के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है। बताया जाता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग है। यानी इसे कहीं से लाकर स्थापित नहीं किया गया बल्कि यह अपने आप यहां प्रकट हुआ। नीम के पेड़ को काटे बिना मंदिर के गर्भगृह को बनाया गया है। कई एकड़ में फैले इस मंदिर में भगवान शंकर पार्वती के अलावा गणेश जी, हनुमानजी व अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के पीछे करीब 50 कदम पर गौरी कुंड है। उसी के ठीक बगल में एक गुफा भी है। बताया जाता है कि इसी गुफा में माता पार्वती विश्राम करती थीं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM सुबह की आरती का समय 05:30 AM – 06:30 AM शाम को आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद महादेव की इस मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्र चढ़ाया जाता है। इसके अतिरिक्त भक्त पंचामृत, धतूरा, दूध, घी, शहर, फल व फूल भगवान को अर्पित करते हैं।

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खजराना गणेश मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

देश के सबसे धनी गणेश मंदिरों में खजराना गणेश मंदिर का नाम सबसे पहले आता है। खजराना गणेश मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में स्थित है। देश के सबसे धनी गणेश मंदिरों में खजराना गणेश मंदिर का नाम सबसे पहले आता है। यहां भक्तों की ओर से चढ़ाए हुए चढ़ावे के कारण मंदिर की कुल चल और अचल संपत्ति बेहिसाब है। श्रद्धालु खजराना गणेश मंदिर में ऑनलाइन दान भी करते हैं। हर साल मंदिर की दान पेटियों मे से विदेशी मुद्राएं भी निकलती हैं। मंदिर का इतिहास Khajrana Ganesh Mandir:खजराना गणेश मंदिर का निर्माण 1735 में होलकर वंश की महारानी अहिल्या बाई ने करवाया था, जिन्होंने भगवान गणेश की मूर्ति को एक कुएं से प्राप्त किया था। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर में प्राचीन मूर्ति एक स्थानीय पुजारी पंडित मंगल भट्ट के सपने में देखी गई थी। मंदिर का प्रबंधन आज भी भट्ट परिवार द्वारा किया जाता है। मंदिर का महत्व खजराना गणेश मंदिर में पूजा करने पर भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस मंदिर का मुख्य त्योहार विनायक चतुर्थी है और इसे अगस्त और सितंबर के महीने में भव्य तरीके से आयोजित किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि खजराना गणेश मंदिर में प्रभु अपने दरबार में मनोकामना लेकर आने वाले हर भक्त की इच्छा पूरी करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब भी भक्त पर कोई विपत्ति आती है तो यहां पुजारियों के द्वारा एक विशेष अनुष्ठान और पूजन किया जाता है, जिससे भगवान गणेश अपने भक्त का विघ्न हर लेते हैं। मंदिर की वास्तुकला खजराना गणेश मंदिर की वास्तुकला में नागर शैली की झलक देखने को मिलती है। मंदिर के गर्भ गृह के बाहरी गेट और दीवार का निर्माण चांदी से हुआ है। भगवान की प्रतिमा की आँख हीरे से बनी हुई है। खजराना गणेश मंदिर परिसर में 33 छोटे-बड़े मंदिर बने हुए हैं। यहां भगवान राम, शिव, मां दुर्गा, साईं बाबा, हनुमान जी सहित अनेक देवी-देवताओं के मंदिर हैं। खजराना गणेश मंदिर के बारे में उलटे स्वास्तिक के आधार पर इच्छा पूर्ति की एक अलग महिमा है। इसके अनुसार जो भी भक्तगण गणेश जी की पीठ पर उल्टा स्वास्तिक बनाकर अपनी मन्नत बोलता है, कुछ ही समय में उसके मनोरथ पूर्ण होते हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM सायंकाल मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM शयन आरती का समय 09:00 PM – 09:40 PM सायंकाल आरती का समय 08:00 PM – 08:40 PM सुबह की आरती 08:30 AM – 09:30 AM मंदिर का प्रसाद खजराना गणेश मंदिर में गणेश जी को लड्डू का भोग लगाया जाता है। जिन भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है,वे अपने वजन के बराबर लड्डू को दान देते हैं।

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बड़ा गणपति मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर को “बड़ा गणपति मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। बड़ा गणपति मंदिर मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर के सुभाषचंद्र मार्ग पर स्थित है बड़ा गणपति मंदिर। यह मंदिर इंदौर के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में स्थापित गणेश जी की प्रतिमा एशिया की सबसे बड़ी प्रतिमा है। इस कारण इसे “बड़ा गणपति मंदिर” कहा जाता है। Shree Bada Ganpati Mandir:मंदिर का इतिहास बड़ा गणपति मंदिर का इतिहास बहुत रोचक है। ऐसा बताया जाता है कि एक बार उज्जैन निवासी दाधीच परिवार के मुखिया को भगवान गणेश जी का स्वप्न आया। उन्होंने मंदिर निर्माण की इच्छा रखी। तभी इस मंदिर को बनाने का निर्णय लिया गया। मंदिर का निर्माण 1875 में हुआ। जिसे बनने में तीन साल का समय लगा था। मंदिर का महत्व इस प्रतिमा के विषय में खास बात यह है कि इसे बनाने के लिए तीर्थ स्थानों जैसे उज्जैन, अयोध्या, मथुरा, वाराणसी (काशी) से मिट्टी और पानी लाया गया था। ऐसी मान्यता है की भगवान गणेश जी की यह मूर्ति विश्व में सबसे विशाल है। इस मूर्ति के निर्माण में सोना, चाँदी, नवरत्न और अष्टधातु का भी उपयोग किया गया है। बड़ा गणपति मंदिर में साल में चार बार भगवान गणेश जी का चोला बदला जाता है। प्रतिमा के बड़े होने के कारण फिर से चोले को चढ़ाने में 15 दिन का समय लगता है। 15 किलो घी और 25 किलो सिंदूर में यह चोला पूर्ण होता है। मंदिर की वास्तुकला जैसे ही आप मंदिर के प्रवेश द्वार से अंदर जाते हैं तो आपको भगवान गणेश जी की विशाल प्रतिमा दिखाई देगी। मंदिर में विराजमान गणपति जी की प्रतिमा की ऊंचाई 25 फ़ीट है। यह प्रतिमा 14 फ़ीट ऊँचे एक चबूतरे पर स्थापित है। राजस्थान के कारीगरों द्वारा इस भव्य प्रतिमा को बनवाया गया था। गणेश जी की इस विशाल मूर्ति का रंग सिंदूरी है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM सुबह की आरती 08:00 AM – 08:30 AM सायंकाल मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM सायंकाल आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद बड़ा गणपति मंदिर में लड्डू, मोदक, पेड़ा, मिठाई का भोग लगता है। पुष्प भी अर्पण किये जाते है।

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चौबीस अवतार मंदिर इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

चौबीस अवतार मंदिर को देश का पांचवा धाम कहा जाता है। चौबीस अवतार मंदिर, भारत के मध्य प्रदेश राज्य के इंदौर शहर से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। चौबीस अवतार मंदिर देपालपुर में बना हुआ है। चौबीस अवतार को देश का पांचवा धाम कहा जाता है। दूर-दूर से लोग इस मंदिर के दर्शन करने के लिए आते हैं। अवतार मंदिर की भव्यता और सुंदरता लोगों को आकर्षित करती है। इस मंदिर में भगवन विष्णु के अलग-अलग 24 अवतार की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। देश-विदेश से श्रद्धालु मंदिर में आकर भगवान विष्णु के अवतार के दर्शन करते हैं। 24 Avtar Mandir :मंदिर का इतिहास चौबीस अवतार मंदिर की नींव 1968-69 में रखी गई थी। 1968-69 में देपालपुर में गुरुदेव जयकरणदास भक्तमाली परमहंस ने विष्णु महायज्ञ करवाया था। उस समय इस मंदिर की नींव रखी गई थी। चौबीस अवतार मंदिर के लिए सवा छह फीट का कलश इसके लिए बनाया गया है। छोटे मंदिरों पर सवा तीन-तीन फीट के कलश बनाए गए है। भगवान विष्णु-लक्ष्मी का मुख्य मंदिर आठ लाख ईंटों से बना है। चौबीस अवतार का निर्माण कार्य अभी जारी है, अप्रैल तक इस मंदिर का कार्य पूरा कर दिया जाएगा। मंदिर का महत्व चौबीस अवतार मंदिर के पहले चरण के निर्माण कार्य करने के बाद मंदिर के दूसरे चरण में 11 रुद्र अवतार और मां के नौ अवतारों का मंदिर भी बनेगा। भगवान विष्णु-लक्ष्मी का मुख्य मंदिर आठ लाख ईंटों से बना है। खास बात ये है इस पूरे मंदिर में कहीं भी लोहे का उपयोग नहीं किया गया है। चौबीस अवतार मंदिर में भगवन विष्णु के अलग-अलग 24 अवतार की प्रतिमाएं स्थापित की जा रहीं हैं। हर अवतार के अलग अलग मंदिर बनाए जा रहे हैं। मंदिर की वास्तुकला चौबीस अवतार मंदिर को चालुक्य शैली की वास्तुकला में बनाया गया है। मंदिर का 90 प्रतिशत काम पूरा हो गया है। 30 बीघा जमीन पर बनने वाले इन मंदिरों में मुख्य मंदिर विष्णु-लक्ष्मी का है जो सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर बन रहा है। इस मंदिर की ऊंचाई 121 फीट है। यहां पर सवा नौ फीट लंबी और सवा सात फीट ऊंची भगवान विष्णु-लक्ष्मी की मूर्ति प्रतिष्ठित की गई है। बाकि अन्य मंदिरों की ऊंचाई 52-52 फीट है। चौबीस अवतार मंदिर के शिखर पर सवा 6 फुट का कलश स्थापित किया जाएगा। साथ ही अन्य मंदिरों पर सवा 3-3 फुट के कलश स्थापित किए जा रहे हैं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 10:00 PM सायंकाल आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद चौबीस अवतार मंदिर में भगवान विष्णु-लक्ष्मी को गुड़ एवं चने की दाल का भोग लगाया जाता है। भक्त मंदिर में फल, ड्राई फ्रूटस और लड्डू का भोग लगाया जाता है।

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प्रियकांत जू मंदिर वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

प्रिय यानी कि राधा जी और कांत यानी श्री कृष्ण के आधार पर ही इस मंदिर का नाम रखा गया है। प्रियकांत जू मंदिर उत्तर प्रदेश के पवित्र शहर मथुरा के वृन्दावन में स्थित है। यह मंदिर भगवान कृष्ण और राधा जी को समर्पित है। मंदिर में राधा कृष्ण की बहुत ही मनमोहक मूर्ति है। भक्त इनके दर्शन कर आनंदित हो जाते है। प्रिय यानी कि राधा जी और कांत यानी श्री कृष्ण के आधार पर ही इस मंदिर का नाम रखा गया है। प्रियकांत जू मंदिर का इतिहास PRIYAKANT JU MANDIR श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के निर्माण का संकल्प 2007 में विश्व शांति चैरिटेबल ट्रस्ट ने लिया था। इसके बाद 2009 में श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज द्वारा इसकी स्थापना की गयी थी। 2012 में इस मंदिर निर्माण के प्रथम चरण की शुरुआत हुयी। इस मंदिर को पूर्ण रूप से बनने में सात साल का समय लगा। 8 फरवरी 2016 में श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए इस मंदिर को खोला गया। प्रियकांत जू मंदिर का महत्व मंदिर में होली का त्यौहार बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। ब्रज की होली को देखने और इस त्यौहार को मनाने के लिए लोग दूर दूर से आते है। यहाँ आकर वह भी ब्रज के रंग में रंग जाते है। में यदि दर्शन करना चाहते है तो सबसे अच्छा समय शाम का होता है। क्योंकि शाम के समय मंदिर की भव्यता बहुत शानदार होती है। नीली रौशनी से मंदिर जगमगा उठता है और मंदिर में विराजित राधा कृष्ण की जोड़ी का यह स्वरुप देखने में बहुत ही मनमोहक लगता है। प्रियकांत जू मंदिर की वास्तुकला मंदिर की वास्तुकला मंदिर के बाहर से देखते ही बनती है। यह मंदिर कमल के आकार का बना हुआ है। इस मंदिर की ऊँचाई लगभग 125 फिट है। सड़क के समीप बना यह मंदिर बहुत ही शानदार है। मंदिर के दोनों तरफ फव्वारे लगाए गए है। इस मंदिर में राधा कृष्ण जी के अलावा भोलेनाथ, गणेश जी और हनुमान जी के छोटे छोटे मंदिर है। प्रियकांत जू मंदिर का निर्माण मकराना राजस्थान के संगमरमर से किया गया है। मंदिर का समय प्रियकांत जू मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:30 PM मंगला आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM प्रियकांत जू मंदिर के शाम को खुलने का समय 04:30 PM – 08:30 PM राजभोग का समय 11:45 AM – 12:00 PM मंदिर का प्रसाद प्रियकांत जू मंदिर में प्रसाद के रूप में पेड़ा, बूंदी, रेवडी, बेसन सेवैया का भोग लगता है। भगवान को पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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गोविंद देवी जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर को “राधा गोविंद देव मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। गोविंद देवी जी मंदिर श्री कृष्ण की नगरी मथुरा उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में स्थित है। यह मंदिर वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इस मंदिर को “राधा गोविंद देव मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर वृंदावन के प्राचीन मंदिरों में से एक है। यह भगवान कृष्ण के गोविंद देव जी स्वरूप को समर्पित मंदिर है।  Govind Dev Ji Temple:मंदिर का इतिहास इस मंदिर का निर्माण सन् 1590 में राजा मानसिंह ने करवाया था। इस मंदिर का निर्माण गुरु और महान कृष्णभक्त श्री कल्याणदास जी की निगरानी में किया गया। मंदिर का पूर्ण खर्च राजा मानसिंह द्वारा ही किया गया था। गोविंद देवी जी मंदिर जब यह मंदिर बना था तो यह सात मंजिला मंदिर था। इस मंदिर के सबसे ऊपरी भाग पर एक विशाल दीपक बनवाया गया था। यह दीपक इतना विशाल था कि इसमें हर रोज 50 किलोग्राम से ज्यादा देसी घी का इस्तेमाल कर इसे जलाया जाता था। इस दीपक की लौ कई किमी तक से भी दिखाई देती थी। मंदिर में जलते इस लौ को देखकर औरंगजेब के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी और वह इस मंदिर की सुंदरता को नष्ट करने का विचार करने लगा। अपनी सेना को भेजकर मंदिर को तुड़वाना चाहा। गोविंद देवी जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत भगवान की कृपा से मंदिर के पुजारी को इस बात का अंदेशा हो गया। उन्होंने तुरंत ही भगवान गोविंद की पुरातन प्रतिमा को वहां से हटा दिया और बहुत दूर ले गए। जयपुर के गोविंद वल्लभ मंदिर में वास्तविक प्रतिमाओं को स्थानांतरित कर दिया गया था। औरंगजेब की सेना इस मंदिर के 4 मंजिल को ही गिरा सकी। मंदिर को खंडित करने का भी प्रयास किया गया। 1873 तक मंदिर उसी अवस्था में रहा। औरंगजेब के जाने के बाद इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया गया। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि जब औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ दिया था। उसके बाद उस मंदिर में कोई भी भक्त दर्शन करने नहीं जाता था। इस कारण मंदिर खंडहर बन गया था। गोविंद देवी जी मंदिर वहां पर भूतों का निवास हो गया था। परन्तु इन भूत प्रेतों ने किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाया था। ऐसा भी कहा जाता है कि इस मंदिर का पुनः निर्माण भव्यता के साथ करना बहुत ही मुश्किल था। गोविंद देवी जी मंदिर इस मंदिर के निर्माण में यहाँ रहने वाले भूतों का भी योगदान है। वह इसलिए क्योंकि इस मंदिर की कारीगरी इस तरह की है जो कोई भी मनुष्य पांच से दस साल में नहीं बना सकता। मंदिर की वास्तुकला गोविंद देव जी मंदिर की वास्तुकला अन्य मंदिरों से अलग है। गोविंद देवी जी मंदिर यह मंदिर पहले सात मंजिला ईमारत थी। मंदिर में दोनों तरफ शानदार खम्भे बने हुए है जो गर्भगृह तक जाते है। यह मंदिर बहुत ही खूबसूरती से बनाया गया है। मंदिर का समय गर्मियों में मंदिर खुलने का समय 04:30 AM – 12:00 PM सर्दियों में गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:30 PM गर्मियों में मंगल आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM गर्मियों में शाम को गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:30 PM – 09:30 PM सर्दियों में शाम को गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:00 PM – 08:30 PM सर्दियों में मंगला आरती का समय 05:00 AM – 06:00 AM मंदिर का प्रसाद गोविंद देव जी मंदिर में लड्डू ,माखन और मिश्री का भोग लगाया जाता है।

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कात्यायनी पीठ वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

ऐसा कहा जाता है कि यहां माता सती के केश गिरे थे, इसका प्रमाण शास्त्रों में भी मिलता है। कात्यायनी पीठ वृंदावन भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में मथुरा जिले के श्री वृंदावन धाम में स्थित है। भगवान कृष्ण की नगरी वृन्दावन में भी, देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक कात्यायनी पीठ स्थित है। यह एक बहुत ही प्राचीन सिद्ध पीठ है जो राधाबाग के पास है। यहाँ माता सती ‘उमा’ तथा भगवन शंकर ‘भूतेश’ के नाम से जाने जाते है। ऐसा कहा जाता है कि यहां माता सती के केश गिरे थे, इसका प्रमाण शास्त्रों में भी मिलता है। देवर्षि श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के 22वें अध्याय में उल्लेख किया है- कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नम:॥ katyayani peeth:मंदिर का इतिहास कात्यायनी पीठ का निर्माण स्वामी केशवानंद ने फरवरी 1923 में करवाया था। इस मंदिर में मां कात्यायनी के साथ पंचानन शिव, विष्णु, सूर्य तथा सिद्धिदाता श्री गणेशकी मूर्तियां हैं । कात्यायनी पीठ वृंदावन लोग मंदिर को मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण देखते ही श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और दिल और दिमाग में शांति पाते हैं। कात्यायनी पीठ में श्रद्धालुओं की भीड़ हमेशा लगी रहती है। बताया जाता है कि राधारानी ने भी श्रीकृष्ण को पाने के लिए इस शक्तिपीठ की पूजा की थी। कात्यायनी पीठ वृंदावन:मंदिर का महत्व कात्यायनी पीठ में अविवाहित युवक-युवती नवरात्र के मौके पर मनपसंद वर और वधु पाने के लिए कात्यायनी माता का आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं और उनकी मन की मुराद पूरी भी होती है। ऐसा कहा जाता है श्री कृष्ण ने कात्यायनी पीठ वृंदावन अपने मामा कंस का वध करने से कात्यायनी मां की पूजा की थी। कंस वध से पहले यमुना किनारे श्री कृष्ण मां कात्यायनी को कुलदेवी मानकर बालू से उनकी प्रतिमा बनाई और पूजा की। उसके बाद कंस का वध किया था। जिन लड़कियों या लड़को की शादी में किसी कारण कोई विलंब हो रहा होता है। कात्यायनी मां की कृपा से उनका भी विवाह जल्द से जल्द हो जाता है। मंदिर की वास्तुकला कात्यायनी पीठ मंदिर एक शांत और वास्तुकला की दृष्टि से अद्भुत मंदिर है। मंदिर की बनावट में राजस्थानी शैली की झलक देखने को मिलती है। मंदिर में एक विशाल परिसर है, जहां भक्त आकर मां की पूजा-अर्चना करते हैं। कात्यायनी पीठ वृंदावन उत्कृष्ट नक्काशी और पेंटिंग इसकी सुंदरता को और बढ़ाती हैं। मंदिर में कई स्तम्भ बने हैं, जिसपर कात्यायनी मां से जुड़े संस्कृत में मंत्र लिखे गए हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:00 PM सांय मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 07:30 PM

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दुर्गा मन्दिर गोरखपुर, उत्तरप्रदेश, भारत

यहाँ श्रद्धालु करते हैं माँ दुर्गा को रक्त अर्पित Durga Mandir:दुर्गा मन्दिर गोरखपुर भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक अद्रभुत माँ दुर्गा का मंदिर स्थित है। गोरखपुर शहर के बांसगांव में बने इस दुर्गा मंदिर में देवी को खुश करने के लिए श्रद्धालुओं द्वारा माँ को रक्त अर्पित किया जाता है। दुर्गा मन्दिर गोरखपुर माँ दुर्गा के इस मंदिर की अनोखी परंपरा आज से ही नहीं बल्कि सैकड़ों साल पूर्व से है। वैसे तो पूरे साल दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के दिनों में यहां रक्त चढ़ाने की विशेष परंपरा है। नवमी के दिन माँ दुर्गा को रक्त अर्पित करने की परंपरा को निभाने के लिए देश-विदेश में रहने वाले लोग भी आते हैं। नवजात बच्चों को भी लेकर श्रद्धालु मंदिर में पहुंचते हैं और उनके ललाट से रक्त लेकर माँ को अर्पित करते हैं। मंदिर का इतिहास गोरखपुर के बांसगांव तहसील स्थित दुर्गा मंदिर में पिछले 300 वर्षों से माँ दुर्गा को रक्‍त चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। यह परंपरा क्षेत्रियों के श्रीनेत वंश के लोगों द्वारा निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत 12 दिन के नवजात से लेकर 100 वर्ष के बुजुर्ग तक का रक्त चढ़ाया जाता है। उपनयन संस्कार के पहले तक एक जगह ललाट और जनेऊ धारण करने के बाद युवकों, दुर्गा मन्दिर गोरखपुर अधेड़ों व बुजुर्गों के शरीर से नौ जगहों पर एक ही उस्तरे से चीरा लगाकर खून निकाला जाता है। रक्त को बेलपत्र में लेकर माँ दुर्गा के चरणों में अर्पित किया जाता है और शरीर के कटे हुए हिस्से पर भभूत लगाई जाती है। मंदिर का महत्व माँ दुर्गा के इस मंदिर से जुड़ी ऐसी मान्यता है कि जिन नवजातों के ललाट से रक्त चढ़ाया जाता है, दुर्गा मन्दिर गोरखपुर उन्हें दुर्गा माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती हैं। श्रद्धालुओं का कहना है दुर्गा मन्दिर गोरखपुर कि ये माँ के आशीर्वाद का ही फल है कि आज तक किसी को न तो टिटनेस हुआ और न ही घाव भरने के बाद कहीं कटे का निशान पड़ा। मंदिर की वास्तुकला दुर्गा मंदिर की वास्तुकला बहुत ही सुंदर है। मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। सम्पूर्ण मंदिर को वर्गाकार और एक विशाल चबूतरे पर बनाया गया है। दुर्गा मंदिर में माँ के दर्शन के लिए एक प्रवेश द्वार है। वर्ष 2021 में माँ दुर्गा के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया और श्रद्धालुओं के लिए एक धर्मशाला का भी निर्माण किया गया। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सायंकाल आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 05:00 AM – 06:00 AM

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