MADHYA PRADESH

भारत माता मन्दिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर को बनाने के पीछे लोगों के मन में राष्ट्रधर्म की भावना विकसित करना मकसद है। भारत माता मन्दिर भारत में मंदिरों में आमतौर पर देवी देवताओं के साथ लोग अपने आराध्य की मूर्ति स्थापित कर उनकी पूजा अर्चना की जाती है, लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर में एक ऐसा मंदिर है, जहां भारत माता की मूर्ति स्थापित है। यहां भारत माता की पूजा होती है। भारत माता मंदिर बाकी मंदिरों से इसलिए भी अलग है क्योंकि इस मंदिर में अन्य मंदिरों की तरह न कोई आरती होती है न ही शंक और घंटी बजती है। यहां सिर्फ राष्ट्रभक्ति गीतों की गूंज सुनाई देती है। इस मंदिर को बनाने के पीछे लोगों के मन में राष्ट्रधर्म की भावना विकसित करना मकसद है, इसी बात को ध्यान में रखकर भारत माता मंदिर का निर्माण कराया है। Bharat Mata Mandir:भारत माता मन्दिर का इतिहास इंदौर के भारत माता मंदिर का भूमि पूजन 11 सितंबर 2000 को हुआ था। मंदिर को पूरा बनने में दो साल का समय लगा था, इस मंदिर को आम जनता के लिए जनवरी 2002 में खोला गया था। सद्गुरु धार्मिक एवं परमार्थिक ट्रस्ट ने आम जन में राष्ट्रीय भावना जागृत करने के लक्ष्य से सुखलिया इलाके में भारत माता मंदिर का निर्माण कराया। वैसे तो यह बाहर से आम मंदिर की तरह नजर आता है, मगर भीतर से ऐसा नहीं है। यह ऐसा मंदिर है, जिसमें न तो घंटी की गूंज सुनाई देती है और न ही पूजा-पाठ के लिए हवन कुंड है, अगर कुछ है तो हाथ में तिरंगा लिए भारत माता की मूर्ति। भारत माता मन्दिर का महत्व 15 अगस्त के स्वतंत्रता दिवस पर देवी-देवताओं की तरह विधि-विधान से भारत माता की पूजा अर्चना होती है। स्वतंत्रता दिवस के पर राष्ट्रध्वज वंदन के साथ युवाओं को राष्ट्रभाव की प्रतिज्ञा दिलाई जाती है और प्रतिमा की महाआरती होती है। भारत माता मंदिर में पूजा अर्चन के लिए कोई पुजारी या महंत बैठते। मंदिर में आने वाले देश भक्त और पर्यटक मंदिर में आकर भारत माता के आगे शीश झुका कर देश भक्ति के नारे लगाते हैं। भारत माता मन्दिर की वास्तुकला भारत माता मंदिर को मराठा शैली में बनाया गया है। दो मंजिला मंदिर के शीर्ष पर विशाल शिखर बना है, जिसके गर्भ गृह में भारत माता की मूर्ति स्थापित है। बॉर्डर वाली गहरे रंग की साड़ी पहने हाथ में तिरंगा थामे स्थापित भारत माता की प्रतिमा के पीछे भारत का नक्शा बना हुआ है। मंदिर परिसर में बगीचा बना हुआ है, जहां अलग-अलग प्रजाति के फूल वाले पौधे लगे हैं। भारत माता मन्दिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 11:00 AM शाम को मन्दिर खुलने का समय 05:00 PM – 10:00 PM

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राधा गोविंद मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

यह मंदिर युगल राधा-कृष्ण को समर्पित मंदिर है। राधा गोविंद मंदिर:मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के निपानिया में स्थित है इस्क़ॉन राधा गोविंद मंदिर। यह मंदिर शहर से केवल 11 किलोमीटर की दूरी पर निर्मित भव्य मंदिर है। रविवार और विशेष त्योहार के दिनों में मंदिर में अधिक संख्या में भीड़ होती है। यह मंदिर युगल राधा-कृष्ण को समर्पित है। मंदिर का इतिहास राधा गोविंद मंदिर का इतिहास स्पष्ट नहीं है। इस मंदिर के निर्माण का कार्य सन् 2004 से अस्थायी रूप से शुरू हुआ था। साथ ही भव्य मंदिर के निकट, बड़ा गेस्टहाउस, थीम पार्क और गोविंदा रेस्तरां का निर्माण भी किया गया है। इसका भूमिपूजन 2014 में हुआ था। मंदिर का महत्व राधा गोविंद मंदिर के दर्शन करने से मन को आत्म शांति मिलती है। शांत वातावरण में बना यह मंदिर भक्तों को सुकून प्रदान करता है। त्योहारों के समय मंदिर में बहुत भीड़ रहती है। मंदिर में विशाल आयोजन किया जाता है। भगवान को छप्पन भोग लगाया जाता है। मंदिर के पास जो भोग और भोजन मिलता है वह सात्विक भोजन होता है। जो लोग दर्शन करने आते है वह यहाँ का प्रसाद जरूर खा कर जाते हैं। मंदिर की वास्तुकला मंदिर में पारंपरिक भारतीय मंदिर डिजाइनों से प्रेरित सुंदर वास्तुकला की गयी है। यह जटिल नक्काशी और जीवंत चित्रों से सुसज्जित है। मंदिर की वास्तुकला भारत की समृद्ध संस्कृति और आध्यात्मिकता को दर्शाता है। मंत्रमुग्ध कर देने वाली सुंदर राधा और कृष्ण की मूर्तियाँ पूर्ण रूप से संगमरमर से बनी हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 04:30 AM – 01:00 PM शाम को मन्दिर खुलने का समय 04:15 PM – 09:00 PM मंगला आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM तुलसी आरती का समय 05:00 AM – 05:30 AM श्रृंगार आरती का समय 07:30 AM – 08:00 AM राजभोग आरती का समय 12:30 PM – 01:00 PM संध्या आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM उत्थान आरती का समय 04:15 PM – 04:30 PM मंदिर का प्रसाद राधा गोविंद मंदिर चिरौंजी, माखन मिश्री, लड्डू, मिठाई आदि का भोग लगाया जाता है। साथ ही पुष्प भी अर्पित किए जाते हैं।

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कंकाली माता मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश , भारत

हरे भरे जंगलों के बीच आस्था का केंद्र बने इस मंदिर के आसपास शांत वातावरण व ताज़ी हवा सुखद अहसास कराती है। कंकाली माता मंदिर देशभर में मां दुर्गा के कई ऐसे चमत्कारी मंदिर हैं जिनकी महिमा पूरे विश्व में विख्यात है। ऐसा ही एक मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 20 किलोमीटर दूर रायसेन के गुदावल गांव में स्थित है। इसे कंकाली माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां विराजित मां काली की देशभर में एक मात्र ऐसी प्रतिमा है जिसकी गर्दन एक तरफ करीब 45 डिग्री झुकी हुई है। ऐसी मान्यता है कि दशहरे के दिन मां काली की गर्दन सीधी होती है, जिसे देखने के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी लोग आते हैं, लेकिन ऐसा सौभाग्य हजारों भक्तों में सिर्फ एक को ही प्राप्त होता है। नवरात्रि के दिनों में यहां भक्तों की ऐसी भीड़ जुटती है कि मानो मेला लगा हो। हरे भरे जंगलों के बीच आस्था का केंद्र बने इस मंदिर के आसपास शांत वातावरण व ताज़ी हवा सुखद अहसास कराती है। कंकाली माता मंदिर का इतिहास इस प्राचीन मंदिर की स्थापना 1731 के आसापास की मानी जाती है। बताया जाता है कि गुदावल गांव के रहने वाले हरलाल मेडा को एक रात सपना आया कि जमीन की नीचे माता की मूर्ति है। जिसके बाद जमीन की खुदाई कराई गई तो मां काली की प्रतिमा मिली, जिसे वहीं स्थापित कर ​दिया गया। तभी से यहां मंदिर विस्तार व पूजा अर्चना का सिलसिला जारी है। दशहरे के दिन मंदिर में विशाल मेला लगता है। नवरात्रि में दशहरे पर मंदिर क्षेत्र के सभी गांव में स्थापित की गईं दुर्गा जी की झाकियां विसर्जन से पहले मंदिर लाई जाती हैं, यहां सभी झाकियों का स्वागत कर मां अम्बे की आरती की जाती है, जिसके बाद झाकियों को विसर्जन के लिए भेज दिया जाता है। मंदिर का महत्व माना जाता है कि मां काली की सीधी गर्दन के दर्शन से बिगड़े काम बन जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां दर्शन से महिलाओं की सूनी गोद भर जाती है। महिलाएं अपने उल्टे हाथ से गोबर का निशान लगाती हैं और मनोकामना पूरी होने पर सीधे हाथों के निशान बना दिए जाते हैं। मंदिर में हजारों हाथों के निशान देखने को मिलते हैं। मंदिर में भक्त चुनरी बांधकर मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरी होने के बाद मंदिर आकर चुनरी खोलते हैं। मंदिर की वास्तुकला कंकाली माता मंदिर में मुख्य रूप से मां काली की पूजा अर्चना की जाती है। यहां 20 भुजाओं वाली देश की पहली तिरछी गर्दन वाली मां काली की मूर्ति विराजमान है। प्रतिमा पांडव कालीन बताई जाती है। मंदिर परिसर में भगवान ब्रहमा, विष्णु व महेश की प्रतिमा भी विराजमान है। कंकाली माता मंदिर परिसर के अंदर के हिस्से में 10 हजार वर्गफीट का एक हॉल बनाया गया है, जिसमें एक भी पिलर नहीं है। यह अपने आप में ही कला का अद्भुत नमूना है। फिलहाल, मंदिर का विस्तार किया जा रहा है, जिसका निर्माण जारी है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 10:00 PM सुबह आरती का समय 08:00 AM – 09:00 AM संध्या आरती का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद कंकाली माता मंदिर में मां काली को नारियल, फूल, चुनरी, मिश्री, लईया, बताशा आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

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Geeta Bhawan Mandir:गीता भवन मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर में महाभारत, रामायण और पुराणों के चित्रण है Geeta Bhawan Mandir :गीता भवन मंदिर इंदौर मध्यप्रदेश के आगरा मुम्बई रोड, मनोरमागंज में स्थित है। यह वास्तविक रूप से एक मंदिर की तरह है। परन्तु यह मंदिर किसी विशेष संप्रदाय का नहीं है। यहाँ पर सभी धर्मों के लोग आ सकते हैं। क्योंकि यह मंदिर लोगों की भावनाओं को समर्पित है। यहाँ पर सभी धर्मों के लोग एकत्रित होते हैं Geeta Bhawan Mandir :का इतिहास गीता भवन मंदिर का निर्माण सन् 1960 में बाबा लाल मुकुंद द्वारा करवाया गया था। गीता भवन मंदिर गीता भवन ट्रस्ट, इंदौर की सहायक कंपनी द्वारा संचालित होता है। जो कि ट्रस्ट, स्कूल, अस्पताल, हॉस्टल और रिसॉर्ट भी चलाता है। Geeta Bhawan Mandir गीता भवन का विशेष अस्पताल भी गीता भवन मंदिर में स्थित है। Geeta Bhawan Mandir :का महत्व गीता जयंती पर यहाँ विशेष आयोजन होता है। भक्तों की भीड़ उमड़ती है। आपको यहाँ पर साधु संतों के दर्शन भी बड़ी आसानी से हो जायेंगे। गीता भवन मंदिर के प्रवचन चलते ही रहते है। आप यदि यहाँ पर जाते है तो समय निकालकर साधु संतों के प्रवचन का आनंद अवश्य लें। गीता भवन की एक विशेषता इसका पुस्तकालय भी है, जिसमें धार्मिक पुस्तकों, धर्मग्रंथों और अन्य साहित्य का एक बड़ा संग्रह है। यहाँ पर आप अपनी पसंद के अनुसार पुस्तक को पढ़ सकते हैं। गीता भवन में पूरे वर्ष विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिनमें संगीत समारोह, नृत्य प्रदर्शन और थिएटर शो शामिल हैं। मंदिर में अपनी आस्था के अनुसार आप प्रार्थना भी कर सकते है क्योंकि यहाँ पर कई भक्तों के लिए एक विशाल प्रार्थना कक्ष भी है। Geeta Bhawan Mandir :की वास्तुकला गीता भवन मंदिर के वास्तुकला की बात की जाए तो यह एक बड़ी ईमारत है। जहाँ पर सभी धर्मों से सम्बंधित मूर्तियां है। इस भवन में एक शानदार केंद्रीय हॉल है जिसमे महाभारत, रामायण और पुराणों जैसे कथाओं को चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है। गीता भवन में आपको एक ही स्थान पर सभी देवी – देवताओं के दर्शन हो जायेंगे। यहाँ सभी भगवानों की बहुत ही सुन्दर प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही आपको विशाल हॉल दिखेगा। चारों तरफ नजरें घुमाने पर आपको बहुत सारे देवी -देवताओं की प्रतिमाओं के साथ दीवालों पर कलाकृति भी दिखाई देगी। मंदिर का समय सुबह मन्दिर का समय 07:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद गीता भवन मंदिर में सभी धर्मों के भगवान है। इसलिए यहाँ पर भक्त अपनी श्रद्धानुसार प्रसाद अर्पित कर सकते हैं।

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श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश , भारत

श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर मुख्य रूप से भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। यह मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के अरेरा कॉलोनी में एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर मुख्य रूप से भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। दक्षिण भारत के ​मंदिर की तरह बना यह मंदिर देखने में काफी खूबसूरत लगता है। मलाई मंदिर से कई लोग अंदाजा लगाते हैं कि यहां भगवान को मलाई का भोग लगाया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि तमिल भाषा में पहाड़ी को मलाई कहा जाता है। श्री मध्य स्वामी मंदिर पहाड़ी पर बने होने के कारण इसके नाम के साथ मलाई शब्द जोड़ा गया है। मंदिर में रोजाना हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यह मंदिर खासतौर पर दक्षिण भारतीय समुदाय द्वारा पुजनीय है। मंदिर में ज्यादातर तमिल, तेलगू, मलयालम व कन्नड़ समुदाय के लोग पूजन व दर्शन करने आते हैं। मंदिर में दिव्य भावनाएं व शांति का अनुभव होता है। Sri Madhya Swami Malai Temple:मंदिर का इतिहास बताया जाता है कि श्री मध्य स्वामीमलाई मंदिर की नींव श्री कांची कामकोटि पीठम के पूज्यश्री जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीजी के आशीर्वाद से साल 1978 में रखी गई थी। 6 साल में यह मंदिर बनकर तैयार हुआ। साल 1984 में मंदिर को कुंभाभिषेकम के साथ पवित्र किया गया। इसके बाद साल 1997 व 2008 में मंदिर में कुंभाभिषेकम किए गए। कुंभाभिषेकम का अर्थ है अभिषेक समारोह, जोकि हिंदू मंदिरों में किया जाता है। इसका आध्यात्मिक व ऐतिहासिक महत्व होता है। आमतौर पर कुंभाभिषेकम 12 साल में एक बार आयोजित किया जाता है। इसमें भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर का महत्व माना जाता है कि भगवान कार्तिकेय के आशीर्वाद से मनुष्य अपने शत्रु पर विजय हासिल करता है। मंदिर में दर्शन-पूजन से कार्यों में आ रही सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती है। मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय के इस मंदिर में दर्शन से भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद मिलता है। भगवान कार्तिकेय का दूध से अभिषेक कराने पर शारीरिक कष्‍ट दूर हो जाते हैं। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर की वास्तुकला श्री मध्य स्वामीमलाई मंदिर को चोला शैली के अनुरूप बनाया गया है, जिसमें दक्षिण भारतीय वास्तुकला की झलक दिखाई देती है। मंदिर में स्थापित सभी मुख्य प्रतिमाएं काले ग्रेनाइट पत्थर से बनाई गई हैं। मंदिर की दीवारों पर छतों पर अद्भुत कलाकृतियां की गई हैं। दीवारों पर देवी-देवताओं की प्रतिमा व परिसर में लगे खंभों पर दक्षिण भारतीय कला का प्रदर्शन किया गया है। श्री मध्य स्वामी मलाई भगवान स्वामीनाथ या कार्तिकेय मंदिर के पीठासीन देवता हैं। आमतौर पर भगवान स्वामीनाथ को भगवान मुरुगन के रूप में जाना जाता है। हिंदू धर्म में मोर को भगवान स्वामीनाथ का वाहन माना जाता है इसलिए मंदिर में मोरों को पाला जाता है। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर परिसर में अन्य देवी देवताओं के भी मंदिर हैं। इनमें गणेश जी, शिवजी, कामाक्षी देवी, नौ दिव्य ग्रह, हनुमान जी, भगवान वेंकटेश्वर, नाग देवता, श्रीकृष्ण व पादुका मंदिर शामिल है। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:00 PM मंगलवार को भगवान कार्तिकेय विशेष अभिषेक का समय 09:30 AM – 10:00 AM एकादशी के दिन भगवान बालाजी के विशेष अभिषेक का समय 08:30 AM – 09:00 AM पूर्णिमा के दिन देवी कामाक्षी के विशेष अभिषेक का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद भगवान कार्तिकेय का दूध से अभिषेक किया जाता है। भक्त भगवान को फूल व दक्षिण भारतीय परंपररागत कपड़ों में शामिल शॉल अर्पित करते हैं। इसके अतिरिक्त मंदिर में स्थापित अन्य देवी देवताओं को नारियल, लड्डू, बताशा आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

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शीतला माता मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

Sheetla Mata Mandir:शीतला माता का यह मंदिर “शीतला माता वाटरफॉल “के नाम से भी जाना जाता है। Sheetla Mata Mandir:शीतला माता मंदिर इंदौर से 55 किमी की दूरी पर मानपुर के रामपुरिया बुजर्ग गांव में स्थित है शीतला माता मंदिर। इस मंदिर से केवल 3 किमी की दूरी पर है शीतला माता जलप्रपात। जो भक्त यहाँ माता के दर्शन करने आते हैं। वह दर्शन के साथ साथ प्रकृति का भी आनंद लेते हैं। माता का यह मंदिर अति प्राचीन है और यह हजारों फ़ीट नीचे खाई में एक गुफा में स्थित है। शीतला माता का यह मंदिर “शीतला माता वाटरफॉल “के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का इतिहास शीतला माता मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। मंदिर के स्थापत्य की कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु ऐसा कहा जाता है कि माता की प्रतिमा स्वयं से प्रकट हुई हैं। यह प्रतिमा 1000 साल पुरानी है। किदवंती यह भी है कि इस मंदिर का जीर्वोद्धार सन् 1857 में किया गया था। मंदिर का महत्व इस मंदिर कि ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर माता के दर्शन करने के लिए शेर आता है और वह माता के दर्शन करके चला जाता है। कहा जाता है कि माता भक्तों के दुःख और मुसीबतों को दूर करती हैं। इस स्थान पर तीन खूबसूरत गुफाएं भी हैं और यह भी माना जाता है कि होल्कर राज्य के पिंडारी यहीं छिपे थे। स्कंद पुराण के अनुसार शीतला माता चेचक रोग की देवी हैं, जो सभी भक्तों के चेचक रोग को हर लेती हैं। मंदिर की वास्तुकला मंदिर की वास्तुकला की बात करें तो मंदिर बहुत ही प्राचीन है और यह एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है। इस कारण यहाँ पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं हो सकता है। वहीं पाषाण रूप में शीतला माता विराजित है। उनका रंग सिंदूरी है। गुफा में प्रवेश करने पर आप माता के दर्शन कर सकते है। मंदिर के पास ही बहुत खूबसूरत झरनें भी है। मंदिर में भगवान शिव की पिंडी भी विराजित हैं। साथ ही नंदी जी भी विराजमान हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव का यह रूप नेपाल के पशुपतिनाथ के जैसा ही है। मंदिर का समय शीतला माता मंदिर खुलने का समय 08:00 AM – 05:00 PM मंदिर का प्रसाद मंदिर में चना चिरौंजी ,लड्डू का भोग लगाया जाता है। आप माता को चुनरी भी चढ़ा सकते है। पुष्प भी अर्पण किये जाते है।

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इस्कॉन मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश , भारत

ISKCON Temple:इस्कॉन को एक और नाम से जाना जाता है, हरे कृष्णा आंदोलन। ISKCON Temple: Bhopal, Madhya Pradesh, India:मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल को वैसे तो झीलों का शहर कहा जाता है, लेकिन इस शहर में कई ऐसे मंदिर हैं, जोकि आस्था का केंद्र बनते जा रहे हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक है पटेल नगर स्थित इस्कॉन मंदिर। इस्कॉन को एक और नाम से जाना जाता है, हरे कृष्णा आंदोलन। पूरा आंदोलन श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित है। मंदिर से हरे कृष्णा मंत्र का प्रचार प्रसार किया जाता है। मंदिर में आध्यात्म की शिक्षा दी जाती है। यह मंदिर आधुनिक सभ्यता के लोगों के लिए एक मॉडल की तरह भी है कि कैसे बिना सुख सुविधाओं के वैदिक सभ्यता में रहा जाता है। मंदिर में बिजली का प्रयोग न के बराबर होता है। पूरे परिसर में कहीं भी कूलर, पंखा या एसी नहीं लगा है। मंदिर आने वाले भक्तों को श्रीमद्भगवद्गीता, शास्त्रों व भगवान के बारें में ज्ञान मिलता है। आध्यात्मिक शांति के लिए यहां दूर-दूर से लोग आते हैं। Iskcon Temple:मंदिर का इतिहास इस्कॉन को पूरा नाम है इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस, यानी अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ। परम पूज्य ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने साल 1966 में न्यूयॉर्क शहर में पहले इस्कॉन मंदिर की स्थापना की थी, जिसके बाद इस मंदिर की श्रृंखला बढ़ती चली गई। उन्होंने 11 साल में ही पूरे विश्व में 108 इस्कॉन मंदिर स्थापित कर दिए थे। वर्तमान समय में विश्व में 500 से अधिक इस्कॉन मंदिर हैं। भोपाल में इस्कॉन मंदिर की स्थापना 2018 में की गई। हालांकि, कम समय में ही इस मंदिर से बड़ी संख्या में भक्त जुड़ गए हैं। पुरी की तर्ज पर भोपाल में इस साल इस्कॉन मंदिर द्वारा भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भी निकाली गई थी। मंदिर का महत्व माना जाता है कि हरे कृष्णा मंत्र से कलयुग के कलमस से बचा जा सकता है। इस्कॉन मंदिर से जुड़े लोगों को 4 नियमों का पालन करना पड़ता है। जैसे- अवैध स्‍त्री संग संबंध न रखना, मांसाहार न करना, नशा से दूर रहना व जुआ न खेलना। ऐसा माना जाता है कि यह 4 पाप के स्तंभ होते हैं। इन कार्यों को करने से मनुष्‍य भगवान से दूर होता है। माना जाता है कि मंदिर के जरिए भगवान से जुड़ने का रास्ता मिलता है, इसी वजह से देश ही नहीं विदेशों में भी बड़ी संख्या में इस्कॉन के भक्त मिलते हैं। इस्कॉन मंदिर के भक्त सिर्फ चीजों को अपना धर्म मानते हैं- दया, तपस्या, सत्य और शुद्ध मन। मंदिर की वास्तुकला 3 एकड़ भूमि पर इस्कॉन मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। इसका प्रथम भाग बनकर तैयार हो चुका है। इसे बनाने में सबसे ज्यादा लकड़ी का प्रयोग किया गया है। मंदिर में रहने वाले शिष्यों के लिए साथ ही अन्य कमरे लकड़ी से बनाए गए हैं। भगवान के प्रसाद व भोजन तैयार करने के लिए मिट्टी के चूल्हे का प्रयोग किया जाता है। मंदिर में मुख्य रूप से राधा-कृष्ण की भक्ति की जाती है। मंदिर में प्रवेश करते ही एक बड़ा हॉल है, जहां भगवान राधा-कृष्ण की प्रतिमा विराजमान है। हॉल की छत भी लकड़ी की बनाई गई है। मंदिर परिसर में रसोई घर व शिष्यों व धर्मगुरुओं के रहने के लिए कमरे बनाए गए हैं। इस्कॉन गौड़ीय-वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है, जोकि वैदिक या हिंदू संस्कृति में एक एकेश्वरवादी परंपरा है। हर जीव की वास्तविक चेतना को जागृत करना, मनुष्यों को श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा देना, भक्ति क्या है? भगवान कौन हैं? हम कौन हैं? हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है? हमारा भगवान का संबंध क्या है? भगवान श्रीकृष्ण से कैसे संबंध को स्थापित किया जाए, यह इस्कॉन मंदिर का मुख्य उद्देश्य है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 04:00 AM – 01:00 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:30 PM मंगल आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM तुलसी आरती का समय 05:00 AM – 05:30 AM उत्थापन आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM संध्या आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद इस्कॉन मंदिर में भगवान राधा कृष्ण को लगने वाला भोग मंदिर में ही तैयार किया जाता है। भक्त अपनी श्रृद्धा अनुसार दानपात्र में राशि दान करते हैं।

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खटलापुरा मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत

यह राम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, यहां मुख्य रूप से भगवान हनुमानजी विराजमान हैं। मध्यप्रदेश के भोपाल शहर में छोटा तालाब के किनारे स्थि​त प्राचीन खटलापुरा मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह राम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, यहां मुख्य रूप से भगवान हनुमानजी विराजमान हैं। मंदिर का ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सुखद अहसास की अनुभूति कराता है। हर साल मंदिर में लगने वाला डोल-ग्यारस का मेला एक और मुख्य आकर्षण है। खटलापुरा मंदिर में भगवान राम, शिव, गणेशजी, लक्ष्मण व माता सीता की प्रतिमा भी स्थापित है। हनुमान जयंती पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर के पिछले हिस्से में एक घाट है, जहां हर साल पितृपक्ष में लोग विधि विधान से पिंड दान करते हैं और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण करते हैं। तालाब किनारे बना यह मंदिर किसी के भी मन को मोह लेता है। इसी कारण यह स्थल आस्था के साथ साथ पिकनिक स्पॉट भी बनता जा रहा है। Khatlapura Mandir:मंदिर का इतिहास इस मंदिर का इतिहास अयोध्या से जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि मंदिर की स्थापना 1840 में अयोध्या से आए संतों ने की थी। साल 1969 में उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर में सबसे पहले हनुमानजी को स्थापित किया गया था। मंदिर विस्तार के बाद यहां अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गईं। मंदिर के पुजारी बाबा प्रेमदासजी बताते हैं कि मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था के लिए अखाड़ा बनाया गया था। हालांकि, अब अखाड़े की जगह बजरंग व्यायाम शाला संचालित की जाती है। मंदिर का महत्व हनुमान जयंती पर बजरंगबली के दर्शन से हर कष्ट दूर होते हैं। माना जाता है कि मंदिर में विराजमान हनुमानजी की पूजा अर्चना से भक्तों पर भगवान राम की कृपा बरसती है। नवरात्रि व गणेश चतुर्थी पर भी खटलापुरा मंदिर में विषेष पूजा-अर्चना होती है। भाग्योदय के लिए इस मंदिर में दर्शन करने की मान्यता भी है। मंदिर की वास्तुकला तालाब के किनारे बना खटलापुरा मंदिर मन को शांति की अनुभूति कराता है। मंदिर को वास्तुदोष को देखते हुए बनाया गया है। यहां मुख्य रूप से भगवान हनुमान जी की बड़ी प्रतिमा विराजमान है। इनके साथ मंदिर में शीतला माता, मां दुर्गा, शिवलिंग, राम दरबार, श्रीगणेश, सांई बाबा की प्रतिमा के भी दर्शन होते हैं। परिसर में वर्षों पुराना एक विशालकाय पीपल का पेड़ है। ​मंदिर के पिछले हिस्से में तालाब किनारे एक घाट बना है, जहां हर वर्ष भारी संख्या में गणेश व दुर्गा विसर्जन होता है। मंदिर का समय सुबह मंदिर में होने वाली आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM खटलापुरा मंदिर प्रतिदिन 24 घंटे खुला रहता है 12:00 AM – 12:00 PM मंदिर का प्रसाद खटलापुरा मंदिर में मुख्य रूप से विराजमान हनुमान जी को बेसन के लड्डू व दूध से बने पेड़े का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त मंदिर में विराजमान अन्य देवी-देवताओं को नारियल, मिश्री, बताशा, फूल आदि अर्पित किया जाता है।

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महालक्ष्मी मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर में होलकर काल से चली आ रही परंपरा आज भी देखने को मिलती है। भारत के मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के हृदय स्थल राजवाड़ा में महालक्ष्मी मंदिर स्थित है। यह इंदौर के प्राचीन मंदिरों में से एक है। भक्त मंदिर में जो चावल चढ़ाते हैं, उनमें से कुछ चावल मन्नत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं और फिर उसे घर की तिजोरी और दुकान के गल्ले में रखते हैं ताकि वर्षभर बरकत बनी रहे। बताया जाता है कि यह सिलसिला मंदिर की स्थापना के बाद से लगातार जारी है। महालक्ष्मी मंदिर का इतिहास महालक्ष्मी मंदिर करीब 188 साल प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर होलकर कालीन मंदिर की स्थापना 1833 में इंदौर के राजा हरि राव होलकर ने की थी। उस दौर में यहां मंदिर नहीं था, प्रतिमा की स्थापना एक पुराने मकान में की गई थी। होलकर वंश के लोग उस समय नवरात्र और दिवाली पर माता के दर्शन करने आते थे। इसके साथ ही खजाना खोलने से पूर्व भी होलकर राजवंश मां महालक्ष्मी का आशीष लेता था। इस मंदिर में होलकर काल से चली आ रही परंपरा आज भी देखने को मिलती है। Mahalakshmi Temple:मंदिर का महत्व दिवाली के मौके पर भक्त मंदिर पहुंचकर माता लक्ष्मी को पीले चावल देकर अपने घर आने का आमंत्रण देते हैं। भक्त मां लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं कि हमारे घर पधारें और सुख-समृद्धि का आशीष दें। दिवाली के दिन मंदिर के पट सुबह तीन बजे खोल दिए जाते हैं। 11 पंडित मां लक्ष्मी का विशेष अभिषेक करते हैं और फिर श्रृंगार के बाद माता की महाआरती की जाती है। हर साल दीपावली के मौके पर मंदिर में 5 दिवसीय महोत्सव होता है। धनतेरस से शुरू होकर ये महोत्सव भाईदूज पर पूरा होता है। इस मौके पर यहां लाखों दर्शनार्थी मंदिर पहुंचते हैं। होलकर रियासत के दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी और क्षेत्र के व्यापारी अपने दिन की शुरुआत मंदिर में मां लक्ष्मी के दर्शन के साथ करते हैं। मंदिर की वास्तुकला होलकर कालीन महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण पूरी तरह से लकड़ी से हुआ था। 1933 में ये मंदिर तीन मंजिला था, लेकिन बाद में जर्जर होने के कारण ये गिर गया। 1942 में मंदिर जीर्णोद्धार कराया गया, जिसके बाद 2011 में मंदिर का पुन: जीर्णोद्धार कराया गया। इस मंदिर में माता की 21 इंच की प्राचीन मूर्ति प्रतिष्ठित है। गर्भ गृह में बड़े चबूतरे पर माता महालक्ष्मी की भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसके चारों ओर संगमरमर के आठ स्तम्भ लगे हुए हैं। साथ ही भगवान गणेश रिद्धि सिद्धि की काले पत्थरों से बनी मूर्ति है। मुंबई के महालक्ष्मी मंदिर के तर्ज पर इस मंदिर का विकास किया जा रहा है। मंदिर को मराठा शैली में बनाया गया है। मंदिर के दीवारों पर नक्काशी की गई, जिसे देख कर मन प्रसन्न हो जाता है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM सायंकाल मंदिर खुलने का समय 05:00 PM – 10:00 PM सुबह की आरती 07:00 AM – 07:30 AM सायंकाल आरती 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद महालक्ष्मी मंदिर में भक्त मां को फल, ड्राई फ्रूट्स, लड्डू का भोग लगाते हैं। कुछ श्रद्धालु मां को हलवा, चना और पूड़ी का भोग भी लगाते हैं।

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गायत्री मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत

मां गायत्री को समर्पित यह शक्तिपीठ भक्तों की धार्मिक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। गायत्री मंदिर:मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के महाराणा प्रताप नगर में स्थित है अद्भुत धार्मिक व आध्यात्मिक स्थल गायत्री मंदिर। यह गायत्री शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध है। मां गायत्री को समर्पित यह शक्तिपीठ भक्तों की धार्मिक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। भोपाल शहर में व्यायाम के लिए यह मंदिर मुख्य केंद्र माना जाता है। आध्यात्मिक शांति के लिए रोजाना यहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। मंदिर परिसर में एक्यूप्रेशर पार्क बना है, जहां कांटेदार ट्रेक पर चलने से शरीर स्वस्थ्य व निरोगी रहता है। शांतिकुंज हरिद्वार की तर्ज पर इस पार्क की शुरुआत की गई। गायत्री मंदिर में लोग विवाह व उपनयन संस्कार भी कराने आते हैं। Gayatri Mandir का इतिहास गायत्री मंदिर के इतिहास पर नजर डालें तो साल 1980 में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा मंदिर में मां गायत्री की प्राण प्रतिष्ठा की गई। तभी से मंदिर में मां गायत्री की पूजा व हवन संस्कार का कार्य किया जा रहा है। शांतिकुंज हरिद्वार के संस्थापक पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी ने ही गायत्री शक्तिपीठ की स्थापना की थी। इस शक्तिपीठ को बनाने का मुख्य उद्देश्य था कि हरिद्वार की शांतिकुंज आश्रम में होने वाली सभी गतिविधियों को देश के हर छोटे-बड़े गांव शहर कस्बों तक पहुंचाया जा सके। सभी जगहों पर हरिद्वार की तरह धार्मिक आयोजन किया जा सके। मंदिर का महत्व गायत्री मंदिर परिसर में लगे राशि वृक्षों की परिक्रमा से ग्रहों की स्थिति ठीक हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार बुद्ध पूर्णिमा के दिन गायत्री यज्ञ करने से अश्वमेध जैसा फल मिलता है। ऐसा माना जाता है की जो भी भक्त इस मंदिर में गायत्री यज्ञ करता है उसके जीवन से सभी कष्ट मिट हाते हैं। मंदिर की वास्तुकला चारों तरफ प्राकृतिक चीजों से घिरा गायत्री मंदिर देखने में काफी सुंदर लगता है। मंदिर में मां गायत्री की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर के पूरे परिसर में दीवारों पर गायत्री मंत्र व अच्छे विचार लिखे गए हैं, जिसे अगर मनुष्य अपना ले तो उसका जीवन सफल बन सकता है। मंदिर में एक बड़ी गौशाला भी है, यहां आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन के साथ गायों को घास खिलाकर परमसुख की अनुभूति करते हैं। मंदिर परिसर में पुस्तक प्रदर्शनी लगती है, जहां धार्मिक, अध्यात्मिक व साहित्य की पुस्तकें मिलती हैं। मंदिर परिसर में एक्यूप्रेशर पार्क सेंटर, स्वास्थ्य भवन सहित अन्य स्वास्थ्य संबंधी भवन बनाए गए हैं। पार्क में नक्षत्र व राशि वाटिका भी है। यानी हर राशि के अनुसार अलग-अलग वृक्ष लगे हैं। पार्क के अंदर ही मां भगवती प्राकृतिक रसाहार केंद्र भी है, जहां आंवला, एलोवेरा, ज्वारे का रस सहित अन्य प्रकार के जूस मिलते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद हैं। एक्यूप्रेशर ट्रेक के पास बहुत से औषधिय पौधें भी लगे हैं, जैसे: आंवला, तुलसी, एलोवेरा, नीम आदि। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM सुबह मां गायत्री की आरती का समय 05:30 AM – 06:00 AM शाम को मां गायत्री की आरती का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद गायत्री मंदिर में किसी प्रकार का कोई प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता है। मंदिर परिसर में बने हवन कुंड में हवन के लिए नारियल, घी, शहद सहित अन्य हवन सामग्री लगती है।

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भोजेश्वर मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत

इस मंदिर को भोजेश्वर मंदिर या भोजपुर मंदिर के नाम से जाना जाता है। Bhojeshwar Temple:महादेव का यह मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 30 किलोमीटर दूर भोजपुर में एक पहाड़ी पर स्थित है। इसे भोजेश्वर मंदिर या भोजपुर मंदिर के नाम से जाना जाता है। विशालकाय शिवलिंग व अधूरे मंदिर निर्माण के कारण यह देश ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है। जिस चबूतरे पर शिवलिंग टिका है, वहां तक पहुंचने के लिए पुजारी को सीढ़ी लगानी पड़ती है। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यह अधूरा है, यानी मंदिर का निर्माण आजतक पूरा नहीं हो सका। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग की छत तक अधूरी है, जोकि 4 विशालकाय स्तंभों पर टिकी है। कहा जाता है कि अगर भोजेश्वर मंदिर का निर्माण पूरा हो जाता तो यह उस समय का पूरे विश्व में सबसे बड़ा मंदिर होता। रहस्यों व अनसुलझी पहेलियों से घिरे इस मंदिर में दर्शन के लिए सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है। मंदिर का इतिहास भोजेश्वर मंदिर के निर्माण की कहानी काफी दिलचस्प है। मंदिर बनवाने का श्रेय 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोजदेव को दिया जाता है। कहा जाता है कि एक बार राजा भोज बहुत बीमार पड़ गए, उन्हें सलाह दी गई कि 9 नदियों व 19 तालाबों का पानी पीकर वो ठीक हो जाएंगे। राजा भोज ने बेतवा नदी पर एक बांध बनवाया, जिसने बहुत सी छोटी नदियों व तालाबों को जोड़ दिया। इसी बांध का पानी पीकर राजाभोज ठीक हो गए, तभी उन्होंने फैसला किया कि वह दुनिया का सबसे बड़ा व भव्य मंदिर बनवाएंगे, लेकिन किसी कारण मंदिर निर्माण पूरा न हो सका। कहा जाता है कि मंदिर को एक ही दिन में बनवाने का फैसला किया गया था। सूर्योदय होते ही मंदिर निर्माण को रोक दिया गया। हालांकि, पुरातत्व विभाग की तरफ से ऐसी किसी भी घटना की पुष्टि नहीं की गई है। भोजेश्वर मंदिर निर्माण की एक और कहानी है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा किया गया। अज्ञातवास के दौरान पांडव कुछ दिनों के लिए भोपाल के पास भीमबेटका में भी रुके थे। उसी दौरान भीम ने बेतवा नदी के पास विशालकाय शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव के मंदिर का निर्माण किया। ताकि माता कुंती नदी में स्नान करने के बाद मंदिर में भगवान शिव की उपासना कर सकें। यही मंदिर राजा भोज के समय विकसित होकर भोजेश्वर मंदिर बन गया। मंदिर का महत्व पांडवों की माता कुंती इस मंदिर में अराधना करती थीं। भोजेश्वर मंदिर में स्थापित विश्व के सबसे बड़े व प्राचीन शिवलिंग में से एक होने के कारण इसे उत्तर भारत का सोमनाथ भी जाता है। किसी संकल्प की वजह से इस मंदिर का निर्माण कार्य अधूरा रह गया, जिसे एक ही दिन में पूरा करना था। मंदिर के आसपास मौजूद मूर्तियां व पिलर इस बात की गवाही देते हैं। विशालकाय शिवलिंग होने के कारण भक्त शिवलिंग पर जलाभिषेक नहीं कर पाते। शिवलिंग का अभिषेक व पूजन इसकी जलहरी पर चढ़कर ही किया जाता है। मंदिर की वास्तुकला पहाड़ी पर 17 फुट ऊंचे एक चबूतरे पर भोजेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर 106 फुट लंबा व 77 फुट चौड़ा है। सबसे विशेष है गर्भगृह में स्थापित विशाल शिवलिंग, यह आधार सहित 22 फुट ऊंचा है। इसका व्यास 7.5 फुट है। शिवलिंग को बनाने में एक ही पत्थर का प्रयोग किया गया है जोकि चिकने बलुआ पत्थर से बना है। गर्भगृह की अधूरी छत 40 फुट ऊंचे 4 विशाल स्तंभों पर टिकी है। इन स्तंभों पर शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम व ब्रह्मा-सावित्री की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। मंदिर का दरवाजा देश में किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है। मंदिर परिसर में ही भक्तांबर स्त्रोत लिखने वाले आचार्य माटूंगा का समाधि स्थल भी है। भोजेश्वर मंदिर की वास्तुकला में गौर करने वाली बात यह है कि मंदिर की छत गुंबद आकार की है। जोकि प्रमाणित करती है कि भारत में गुंबद का निर्माण इस्लाम आने से पहले से किया जा रहा है। इतिहासकार इसे भारत की सबसे पहली गुंबदीय छत वाली इमारत मानते हैं। मंदिर के पीछे एक ढलान है। माना जाता है कि इसी ढलान का प्रयोग कर भारी पत्थरों को पहाड़ पर मंदिर निर्माण के लिए लाया गया होगा। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:00 AM मंदिर का प्रसाद महादेव के भोजेश्वर मंदिर में जल, दूध, घी, शहद, दही अर्पित किया जाता है। विशेष अवसरों पर भक्त बेलपत्र, फूल, नारियल व अन्य पूजन सामग्री भी चढ़ाते हैं।

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बिजासन माता मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

माता को “राजराजेश्वरी बिजासन माता” के नाम से भी जाना जाता है। बिजासन माता मंदिर:क्लीन सिटी इंदौर, मध्यप्रदेश के एयरपोर्ट रोड के समीप पहाड़ी पर स्थित है बिजासन माता मंदिर। इस मंदिर में माता के नौ रूप विराजित है। यह मंदिर एक हजार वर्ष पुराना है। माता के दर्शन के लिए यहाँ प्रतिदिन श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। माता को “राजराजेश्वरी बिजासन माता” के नाम से भी जाना जाता है। Shree Bijasan Mata Mandir:मंदिर का इतिहास बिजासन माता मंदिर का निर्माण इंदौर के होलकर महाराजा शिवाजी राव होलकर ने सन 1760 में करवाया था। प्राचीन मंदिर में विजासन माता की प्रतिमा करीब 1000 साल से भी ज्यादा पुरानी है। मंदिर के निर्माण के 100 वर्ष पूरे होने पर सन 1860 में मंदिर में बहुत ही धूमधाम से उत्सव मनाया गया था। इस मंदिर का समय समय पर जीर्वोद्धार भी किया जाता रहा है। मंदिर का महत्व बिजासन माता मंदिर में माता की पाषाण पिंडियाँ विराजमान है। ये पिंडियां यहाँ पर कब विराजित हुयी है इसका कोई भी प्रमाण नहीं है। ऐसा माना जाता है कि ये पिंडियाँ स्वयंभू हैं। बिजासन माता संतान और सौभाग्य प्रदान करती है। इसलिए नवविवाहित जोड़े माता के दर्शन कर आशीर्वाद लेने आते है। माता सभी की मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। ऐसा कहा जाता है कि आल्हा-उदल ने मांडू के राजा को परास्त के लिए माता से प्रार्थना की थी। तंत्र-मंत्र और अनेकों प्रकार की सिद्धियों हेतु भी यह बिजासन माता मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। इस मंदिर के पीछे एक जलाशय है। ऐसा बताया जाता है कि पहले इस जलाशय में शेर पानी पीने आता था। वह माता के मंदिर के समीप कुछ देर खड़ा रहता और बिना किसी को नुकसान पहुँचाये चला जाता था। मंदिर की वास्तुकला माता का यह मंदिर ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ है। पहले यह मंदिर मिट्टी और पत्थरों से निर्मित था। इस मंदिर का सन् 1920 में मराठा शैली में जिर्णोद्धार करवाया गया। इस मंदिर में माता के अलावा आपको शिव जी, काल भैरव, हनुमान जी के भी दर्शन करने को मिलेंगे। माता का यह मंदिर ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ है। मंदिर के पास ही एक छोटा सा तालाब है जिसमे कई रंग की मछलियां है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:30 AM – 10:30 PM शनिवार और रविवार मंदिर का समय 05:30 AM – 11:00 PM सुबह की आरती 06:00 AM – 06:30 AM रात की आरती 09:00 AM – 10:00 PM

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