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Chitragupta Puja

Chitragupta Puja 2025 Date And Time: चित्रगुप्त पूजा 2025 में कब है? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और संपूर्ण पूजा विधि

Chitragupta Puja:हिंदू धर्म में, भगवान चित्रगुप्त (Bhagwan Chitragupta) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन्हें 33 कोटि देवी-देवताओं में से एक माना जाता है, जिन्हें ‘देवताओं का लेखपाल’ (Accountant of the Gods) भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान चित्रगुप्त का जन्म ब्रह्म जी के चित्त से हुआ था। इनका मुख्य कार्य मनुष्यों के कर्मों का हिसाब रखना है। Chitragupta Puja मृत्यु के बाद, ये उसी के अनुसार जीवों को दंडित या पुरस्कृत करते हैं। इन्हें मृत्यु के देवता यमराज का सहायक (Assistant of Yamraj) और आकाशीय अभिलेखों के रक्षक के रूप में भी जाना जाता है। चित्रगुप्त पूजा 2025 कब है? (Chitragupta Puja 2025 Date) चित्रगुप्त पूजा विशेष रूप से पंचदिवसीय दीपावली पर्व के आखिरी दिन, यानी भाई दूज (Bhai Dooj) के साथ की जाती है। इसे यम द्वितीया (Yama Dwitiya) के नाम से भी जाना जाता है। हर साल यह पूजा कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर की जाती है। साल 2025 में भगवान चित्रगुप्त की पूजा गुरुवार 23 अक्टूबर 2025 को की जाएगी। चित्रगुप्त पूजा 2025 शुभ मुहूर्त (Chitragupta Puja Shubh Muhurat) पूजा के लिए शुभ समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए। विवरण (Details) समय (Time) स्रोत (Source) कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि का आरंभ 22 अक्टूबर 2025 को रात 8 बजकर 16 मिनट पर कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि का समापन 23 अक्टूबर 2025 को रात 10 बजकर 46 मिनट पर चित्रगुप्त पूजा अपराह्न मुहूर्त (Shubh Muhurat) दोपहर 1 बजकर 13 मिनट से दोपहर 3 बजकर 28 मिनट तक पूजा की कुल अवधि 2 घंटे 15 मिनट चित्रगुप्त पूजा का महत्व (Significance of Chitragupta Puja) यह पर्व विशेष रूप से कायस्थ समुदाय (Kayastha community) के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो भगवान चित्रगुप्त की पूजा इष्ट और कुलदेवता के रूप में करते हैं। Chitragupta Puja इस पूजा को मस्याधार पूजा या दावत पूजन (Dawat Pujan) भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन कलम (Pen) और दवात (Inkpot) की पूजा की जाती है। भगवान चित्रगुप्त कलम और दवात की सहायता से ही समस्त जीवों के कर्मों का विवरण लिखते हैं। इस पूजा से मिलने वाले लाभ: 1. ज्ञान और बुद्धि: भगवान चित्रगुप्त की पूजा करने से ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि होती है। 2. सफलता: साधक को विद्या, बुद्धि, साहस और लेखन के क्षेत्र में सफलता मिलने की मान्यता है। 3. दरिद्रता का निवारण: माना जाता है कि इनकी पूजा से अशिक्षा और दरिद्रता दूर होती है। 4. कर्मों की समीक्षा: इस दिन लोग पूजा पाठ करने के साथ ही आत्मचिंतन और अपने कर्मों की समीक्षा करते हैं, और ईमानदारी की राह पर चलने का प्रण लेते हैं। 5. व्यापार में उन्नति: कारोबारियों के लिए इस दिन का विशेष महत्व होता है। नई पुस्तकों पर ‘श्री’ लिखकर काम की शुरुआत की जाती है और आय-व्यय का विवरण चित्रगुप्त जी के सामने रखा जाता है। भगवान चित्रगुप्त की पूजा विधि (Chitragupta Puja Vidhi) चित्रगुप्त पूजा Chitragupta Puja के दिन कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है: 1. तैयारी: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पूजाघर के पास अच्छी तरह से साफ-सफाई करें। 2. स्थापना: पूजा स्थल में वेदी पर भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। पूजा करते समय आपका मुख पूर्व दिशा (East) की ओर होना चाहिए। 3. अर्घ्य और दीपक: सबसे पहले मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएं। इसके बाद दही, दूध, घी, चीनी और शहद से पंचामृत बनाकर अर्पित करें। 4. सामग्री अर्पण: एक पानी से भरा कलश पास में रखें, जिसमें तुलसी के कुछ पत्ते डालें। भगवान को हल्दी, चंदन, फूल, फल, भोग और मिठाई आदि अर्पित करें। 5. लेखन सामग्री की पूजा: ध्यान रखें कि पूजा में कलम, एक डायरी या खाली कागज और दवात जरूर लेकर बैठें। 6. मंत्र लेखन: पूजा के दौरान, खाली पन्ने पर रोली और घी से स्वास्तिक (Swastik) बनाएं। इसके बाद, नए कलम से डायरी पर “श्री गणेशाय नमः” और “ॐ चित्रगुप्ताय नमः” लिखें। कुछ स्रोतों के अनुसार, आप देवी-देवताओं के नाम भी लिख सकते हैं। 7. प्रार्थना: अपने पिछले सभी कार्यों का विवरण चित्रगुप्त जी के सामने रखें। शिक्षा, बुद्धि और जीवन में उन्नति के लिए भगवान से प्रार्थना करें। 8. समापन: अंत में, चित्रगुप्त कथा का पाठ करें और फिर भगवान चित्रगुप्त की आरती करें। पूजा समाप्ति के बाद सभी लोगों में प्रसाद बांटें। नरक चतुर्दशी 2025: कब है छोटी दिवाली? जानें तारीख, महत्व, यम दीया जलाने के नियम और भूलकर भी न करने वाले 4 काम

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Govardhan Puja

Govardhan Puja 2025 Date And Time: कब है गोवर्धन और अन्नकूट पूजा? जानिए शुभ मुहूर्त, विधि और पौराणिक कथा

Govardhan Puja 2025 Date And Time: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव का महत्व हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja 2025) का पर्व अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे अन्नकूट पूजा (Annakut Puja 2025) के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर मनाया जाता है। यह मुख्यतः दिवाली के अगले दिन पड़ता है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को घनघोर वर्षा से बचाने के लिए Govardhan Puja गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर धारण किया था। मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल और बरसाना जैसे स्थानों पर इस पर्व की भव्यता विशेष तौर पर देखने को मिलती है। गोवर्धन पूजा 2025 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja Shubh Muhurat 2025) वर्ष 2025 में गोवर्धन पूजा की सही तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: 1. गोवर्धन पूजा की तिथि (Govardhan Puja Date 2025) पंचांग के अनुसार, गोवर्धन पूजा बुधवार, 22 अक्टूबर 2025 को की जाएगी। प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ: 21 अक्टूबर 2025 को शाम 05:54 बजे से। प्रतिपदा तिथि समाप्त: 22 अक्टूबर 2025 को रात्रि 08:16 बजे समाप्त। नोट: उदयातिथि के अनुसार, गोवर्धन एवं अन्नकूट पूजा 22 अक्टूबर 2025 को होगी। 2. गोवर्धन पूजा के शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja Shubh Muhurat) गोवर्धन पूजा के लिए तीन प्रमुख शुभ मुहूर्त बताए गए हैं: 1. गोवर्धन पूजा प्रातःकाल मुहूर्त: सुबह 6 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। 2. गोवर्धन पूजा सायाह्नकाल/संध्या काल मुहूर्त: दोपहर 3 बजकर 29 मिनट से शाम 5 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। 3. गोवर्धन पूजा गोधूली मुहूर्त: शाम को 05:44 से 06:10 के बीच रहेगा। क्यों कहा जाता है इसे अन्नकूट पूजा? (Why is it called Annakut Puja?) गोवर्धन पूजा के दिन को अन्नकूट पूजा (Annakut Puja) भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन भक्त तरह-तरह के भोजन तैयार करते हैं। अन्नकूट का अर्थ: अन्नकूट का अर्थ ‘अन्न का ढेर’ या ‘कई प्रकार के अन्न का मिश्रण’ होता है। सजावट: भक्त इन तैयार किए गए भोजनों को गोवर्धन पर्वत के आकार में सजाते हैं। भोग: इस अन्नकूट को भोग के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है और इसके बाद प्रसाद के रूप में अन्य लोगों को बांटा जाता है। प्रसाद: कई स्थानों पर इस दिन बाजरे की खिचड़ी या कड़ी बाजरे का भोग लगाकर लोगों में बांटा जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों में विशेष रूप से अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव की पौराणिक कथा (Govardhan Puja Katha) गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण और इंद्रदेव से जुड़ी हुई है: इंद्र का मान-मर्दन: द्वापर युग में, ब्रजवासी इंद्र की पूजा करके उन्हें छप्पन भोग अर्पित करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रथा को बंद करने और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए कहा, क्योंकि पर्वत, खेत और गाय ही उनका जीवन चला रहे थे। इंद्र का क्रोध: जब ब्रजवासियों ने इंद्र उत्सव मनाना छोड़ दिया, तो इंद्रदेव क्रोधित हो गए और ब्रजमंडल में मूसलधार वर्षा करने लगे। गिरिराज का रक्षण: ब्रजवासियों को इस वर्षा से बचाने के लिए, श्रीकृष्ण ने अपने वाम हस्त की कनिष्ठा (छोटी) अंगुली के नाखून पर गोवर्धन पर्वत को 7 दिन तक उठाकर इंद्र का मान-मर्दन किया था। सभी ग्रामीण, गोप और गोपिकाएं पर्वत की छाया में सुखपूर्वक रहे। इंद्र की क्षमा: सातवें दिन, ब्रह्माजी के कहने पर इंद्रदेव ने श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की। उत्सव की शुरुआत: भगवान श्रीकृष्ण ने 7वें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव ‘अन्नकूट’ के नाम से भी मनाया जाने लगा। बाद में, गोवर्धन के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन भोग लगाने का प्रचलन हुआ। गोवर्धन पूजा की सरल विधि (Govardhan Puja Vidhi) गोवर्धन पूजा के दिन साधक को धन, संतान और गौ रस में वृद्धि प्राप्त होती है। पूजा विधि इस प्रकार है: 1. गिरिराज महाराज का निर्माण: सबसे पहले गोबर से गिरिराज महाराज (गोवर्धन पर्वत) की आकृति तैयार की जाती है। 2. पूजन सामग्री: इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल आदि चढ़ाए जाते हैं। 3. नाभि पूजा: गोवर्धन जी की नाभि के स्थान पर मिट्टी का दीपक या कोई अन्य पात्र रखा जाता है। इस पात्र में दूध, दही, गंगाजल, शहद और बताशे डाले जाते हैं। 4. पशुओं की पूजा: इस दिन कृषि के काम में आने वाले पशुओं जैसे गाय और बैल की पूजा का भी विधान है। 5. परिक्रमा और प्रसाद: पूजा समाप्त होने के बाद, गोवर्धन जी की सात बार परिक्रमा की जाती है। नाभि में रखे पात्र की सामग्री को पूजा के बाद प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है।

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Bhai Dooj 2025

Bhai Dooj 2025 Date And Time: किस दिशा में बिठाकर करें भाई का तिलक? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त और नियम

भाई दूज का महत्व (Importance of Bhai Dooj) भाई दूज (Bhai Dooj 2025 Kab Hai?) का पर्व भाई-बहन के पवित्र प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता है, जिसे यम द्वितीया या भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है। यह त्योहार दीपावली के दो दिन बाद, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। Bhai Dooj 2025 इस शुभ दिन पर, बहनें अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं। वहीं, भाई अपनी बहन की सदैव रक्षा करने का वचन देते हैं और उन्हें उपहार भेंट करते हैं। भाई दूज 2025 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त (Bhai Dooj 2025 Exact Date and Shubh Muhurat) Bhai Dooj: भाई दूज 2025 की सही तारीख जानना हर भाई-बहन के लिए महत्वपूर्ण है। Bhai Dooj ज्योतिषीय दृष्टि से इस वर्ष कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि की शुरुआत 22 अक्टूबर 2025 की रात 08 बजकर 16 मिनट पर होगी। Bhai Dooj 2025 यह तिथि 23 अक्टूबर 2025 की रात 10 बजकर 46 मिनट पर समाप्त होगी। पंचांग और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, भाई दूज का पर्व 23 अक्टूबर 2025 (गुरुवार) को मनाया जाएगा। तिलक करने का शुभ समय (Tilak Shubh Muhurat) तिलक करने का शुभ मुहूर्त (Bhai Dooj 2025 Shubh Muhurat) दोपहर के समय रहेगा। Bhai Dooj 2025 इस समय किया गया तिलक अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। तिलक करने का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 13 मिनट से 03 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। तिलक के दौरान भाई-बहन के बैठने की सही दिशा और नियम (Bhai Dooj 2025 Disha And Niyam) तिलक समारोह के दौरान सही दिशा में बैठना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। भाई का मुख किस दिशा में हो? (Brother’s Direction) तिलक करते समय भाई का मुख उत्तर (North) या उत्तर-पश्चिम (North-West) दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा माना जाता है, जबकि उत्तर-पश्चिम दिशा वायु की दिशा है। इन दिशाओं की ओर मुख करने से भाई के जीवन में स्थिरता और उन्नति आती है। बहन का मुख किस दिशा में हो? (Sister’s Direction) बहन को अपने भाई का तिलक करते समय उत्तर-पूर्व (North-East) या पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। इस दिशा की ओर मुख करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भाई दूज Bhai Dooj पर तिलक करने के महत्वपूर्ण नियम (Bhai Dooj 2025 Rituals) भाई दूज के दिन तिलक करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:It is mandatory to follow some special rules while doing Tilak on the day of Bhai Dooj: 1. आसन का उपयोग: भाई को हमेशा किसी आसन पर बिठाकर ही तिलक करना चाहिए; उन्हें सीधे जमीन पर नहीं बिठाना चाहिए। 2. पूजा की थाली: पूजा की थाली में रोली या कुमकुम, अक्षत (चावल), मिठाई, सुपारी, सूखा नारियल (नारियल का गोला), और एक दीपक अवश्य रखें। 3. शुभ मुहूर्त का पालन: तिलक हमेशा शुभ मुहूर्त और भद्राकाल से बाहर के समय में ही करें, क्योंकि भद्राकाल में किए गए किसी भी शुभ काम का फल नहीं मिलता है। 4. सिर ढकना: तिलक करते समय बहनें अपना सिर चुनरी से और भाई अपना सिर रुमाल से ढककर रखें। Bhai Dooj बिना सिर ढके तिलक नहीं करना चाहिए। 5. सात्विक भोजन: इस दिन भाई और बहन दोनों को सात्विक भोजन ही करना चाहिए। 6. उपहार और भेंट: तिलक करने के बाद बहन भाई को नारियल का गोला या मिठाई अवश्य खिलाएं। Bhai Dooj इसके साथ ही, भाई अपनी बहन को वस्त्र, मिठाई, ड्राई फ्रूट्स, चॉकलेट या पर्सनलाइज्ड गिफ्ट उपहार के रूप में दें।

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Narak Chaturdashi

Narak Chaturdashi 2025 Date:नरक चतुर्दशी 2025: कब है छोटी दिवाली? जानें तारीख, महत्व, यम दीया जलाने के नियम और भूलकर भी न करने वाले 4 काम

हर साल कार्तिक मास में आने वाला दीपों का त्योहार दिवाली बहुत खास होता है। दिवाली से ठीक एक दिन पहले मनाया जाने वाला पर्व नरक चतुर्दशी (Narak Chaturdashi) जिसे छोटी दिवाली (Chhoti Diwali) भी कहा जाता है, शास्त्रों में विशेष महत्व रखता है। Narak Chaturdashi इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा करने का विधान है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह त्योहार कब मनाया जाता है, इसका महत्व क्या है और Narak Chaturdashi इस दिन यमराज की नाराजगी से बचने के लिए कौन से काम नहीं करने चाहिए? आइए, उज्जैन के आचार्यों से प्राप्त जानकारी के आधार पर जानते हैं सबकुछ… 1. कब मनाई जाएगी नरक चतुर्दशी (Narak Chaturdashi 2025 Date) हिंदू धर्म में, नरक चतुर्दशी हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। तिथि और समय 2025: • चतुर्दशी तिथि की शुरुआत: 19 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 51 मिनट पर होगी। • चतुर्दशी तिथि का समापन: 20 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर होगा। • उत्सव की तारीख: इस साल 19 अक्टूबर को नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली मनाई जाएगी। 2. नरक चतुर्दशी का महत्व और पौराणिक कथा (Religious Significance) सनातन धर्म में इस त्योहार का खास महत्व है। नरक चतुर्दशी मनाए जाने के पीछे दो प्रमुख कारण और धार्मिक मान्यताएं हैं: भगवान कृष्ण ने किया था नरकासुर का संहार धार्मिक मान्यता के अनुसार, छोटी दिवाली के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का संहार किया था। चिरकाल में नरकासुर का आतंक बहुत बढ़ गया था और उसने बलपूर्वक सोलह हजार स्त्रियों को बंदी बना लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर से भीषण युद्ध किया था और कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि तक चले इस युद्ध में उन्हें विजयश्री मिली। उन्होंने नरकासुर का वध कर सोलह हजार स्त्रियों को मुक्त कराया था। इसलिए इस दिन लोग राक्षस पर भगवान कृष्ण की जीत का जश्न मनाते हैं, और इसी कारण इसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। यमराज की पूजा और मोक्ष की प्राप्ति इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विशेष विधान है। Narak Chaturdashi शास्त्र भी इस दिन यम दीप जलाने की आज्ञा देते हैं। यम दीया का महत्व: 1. अकाल मृत्यु का भय खत्म: मान्यता के अनुसार, नरक चतुर्दशी के दिन यम के नाम का दीपक जलाने से व्यक्ति का अकाल मृत्यु का भय खत्म होता है। 2. नरक द्वार बंद: दीपक जलाकर यमराज से यह प्रार्थना की जाती है कि वे नरक के द्वार सदा हमारे लिए बंद रखें, ताकि हमें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। 3. सकारात्मकता का स्वागत: इस दिन बुराई के अंधेरे को दूर करने और जीवन में सकारात्मकता का स्वागत करने के लिए भी दीपक जलाए जाते हैं। 3. नरक चतुर्दशी पर क्या करें और कैसे करें स्नान? यह पर्व भगवान कृष्ण को समर्पित होता है। इस दिन घरों की साफ-सफाई की जाती है और उन्हें फूलों या लाइटों से सजाया जाता है। स्नान और पूजा विधि: • साधक प्रातः काल में सूर्योदय से पहले उठकर घर की साफ-सफाई करते हैं। • नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद स्नान-ध्यान करते हैं। • इस दिन गंगाजल युक्त पानी से स्नान करना शुभ माना जाता है। • सुविधा होने पर अपामार्ग युक्त पानी से स्नान करने की सलाह दी जाती है। कहते हैं कि इससे व्यक्ति को जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। • इसके बाद भक्ति भाव से भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं, जिससे हर मनोकामना पूरी होती है। 4. भूल से भी न करें ये 4 काम, यमराज होंगे नाराज! चूँकि इस दिन यमलोक के देवता यमराज की पूजा की जाती है, Narak Chaturdashi इसलिए कुछ कार्यों को वर्जित माना गया है। यमराज की नाराजगी से बचने के लिए, नरक चतुर्दशी के दिन भूल से भी ये काम न करें: 1. जीव हत्या: इस दिन किसी भी जीव की हत्या न करें। 2. दक्षिण दिशा की सफाई: यम की दिशा दक्षिण मानी गई है, इसलिए इस दिन घर की दक्षिण दिशा को भूल से भी गंदा न रखें। 3. तेल का दान: शास्त्रों में तेल का दान विशेष महत्व रखता है, लेकिन इस दिन तेल का दान नहीं करना चाहिए। Narak Chaturdashi मान्यता है कि ऐसा करने से देवी लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं। 4. तामसिक भोजन: इस दिन तामसिक भोजन नहीं खाना चाहिए। Narak Chaturdashi नरक चतुर्दशी के दिन भगवान कृष्ण की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है और जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।

Narak Chaturdashi 2025 Date:नरक चतुर्दशी 2025: कब है छोटी दिवाली? जानें तारीख, महत्व, यम दीया जलाने के नियम और भूलकर भी न करने वाले 4 काम Read More »

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Dhanteras 2025 mein Kya Khariden :धरतेरस के दिन नहीं खरीद सकते सोना या चांदी, तो इन 5 उपाय से भी होगा धन लाभ !

Dhanteras 2025 :हिंदू धर्म में धनतेरस के त्योहार को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन सोना या चांदी खरीदने की परंपरा है. मगर कोई यह नहीं खरीद सकता, तो उसकी जगह क्या खरीदना चाहिए, आइए जानते हैं. Dhanteras 2025:हिंदू धर्म में Dhanteras धनतेरस का त्योहार का विशेष महत्व है. यह पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है, जो इस बार 18 अक्टूबर 2025 को है. इस दिन विशेष रूप से सोना या चांदी खरीदने से घर-परिवार में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य का आगमन होता है, मगर कोई व्यक्ति इस दिन सोना या चांदी नहीं खरीद पाता तो वे कई अन्य चीजें भी खरीद सकता है. जिसे शास्त्रों में शुभ माना गया है. Dhanteras 2025 mein Kya Khariden- धनतेरस Dhanteras पर पीतल के बर्तन खरीदने की परंपरा पुरानी है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पीतल को भगवान धन्वंतरि की धातु माना गया है. ऐसा करने से घर में स्वास्थ्य, सौभाग्य और धन में वृद्धि होती है. माना जाता है कि पीतल खरीदने से तेरह गुना लाभ प्राप्त होता है और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है. इस शुभ दिन पर नया झाड़ू लाना भी बेहद मंगलकारी माना जाता है. झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे खरीदने से घर की नकारात्मकता दूर होती है. धनतेरस पर लाए गए झाड़ू की पहले पूजा की जाती है और फिर इसका प्रयोग घर में किया जाता है, ताकि मां लक्ष्मी का स्थायी वास बना रहे. धनतेरस Dhanteras पर धनिया खरीदने की परंपरा भी खास महत्व रखती है. धनिया के बीज को मां लक्ष्मी को अर्पित करने के बाद तिजोरी या धन रखने की जगह पर रखा जाता है. ऐसा करने से घर में समृद्धि आती है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है. यह बीज केवल धन का प्रतीक ही नहीं, बल्कि शुभ ऊर्जा का वाहक भी माना जाता है. गोवत्स द्वादशी 2025 (बछ बारस): जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और व्रत के नियम गोमती चक्र को पवित्र और चमत्कारी वस्तु माना गया है. धनतेरस के दिन 11 गोमती चक्र खरीदकर उन्हें लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखना शुभ माना गया है. ऐसा करने से धन की कमी दूर होती है और घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी होती है. यह उपाय विशेष रूप से व्यापारियों के लिए लाभकारी माना गया है. पीली कौड़ी मां लक्ष्मी से जुड़ा माना जाता है. Dhanteras धनतेरस पर इसे हल्दी में रंग कर या पहले से रंगी हुई खरीदकर दीवाली की रात पूजा में शामिल किया जाता है. इसके बाद इसे तिजोरी में रखने से धन का प्रवाह बना रहता है. यह छोटा-सा उपाय परिवार में समृद्धि और खुशहाली लाने के लिए बेहद प्रभावी माना गया है.

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Dhanteras 2025 Date: धनतेरस पर भूलकर भी ना खरीदें ये चीजें, उड़ जाएगी घर की बरकत

Dhanteras 2025 Shopping: धनतेरस हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो दिवाली की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. यह दिन नई शुरुआत और समृद्धि का प्रतीक है. इस शुभ अवसर पर माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है, Dhanteras जिससे घर में धन-धान्य और सौभाग्य का वास बना रहे. मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि पर उनकी पूजा करने से व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है. Dhanteras 2025 Date ऐसे में आइए जानते हैं कि धनतेरस के दिन किन चीजों को नहीं खरदीना चाहिए.  Dhanteras 2025 Date:धनतेरस 2025 की तिथि और समय:Dhanteras 2025 Date:Date and time of Dhanteras 2025 Dhanteras 2025 Date: पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 18 अक्टूबर दोपहर 12 ब जकर 18 मिनट से आरंभ होकर 19 अक्टूबर दोपहर 1 बजकर 51 मिनट तक रहेगी. प्रदोष काल के आधार पर धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर 2025, शनिवार को मनाया जाएगा. पूजा और खरीदारी का शुभ मुहूर्त:Auspicious time for worship and shopping धनतेरस पूजा मुहूर्त- शाम 7:16 से रात 8:20 बजे तकब्रह्म मुहूर्त- सुबह 4:43 से 5:33 बजे तकअभिजीत मुहूर्त- सुबह 11:43 से दोपहर 12:29 बजे तक नुकीली या धारदार वस्तुएं जैसे चाकू, कैंची और सुई न खरीदें। इनसे घर में कलह और नकारात्मकता बढ़ने की आशंका रहती है. चमड़े से बनी वस्तुएं या काले रंग के वाहन, कपड़े व अन्य वस्तुएं भी इस दिन नहीं खरीदनी चाहिए। Dhanteras ऐसा करने से दरिद्रता और दुर्भाग्य का प्रवेश माना जाता है.प्लास्टिक की वस्तुएं जैसे डिब्बे या सजावटी सामान भी घर में न लाएं। ऐसा करने से बरकत में कमी और धन-संचय में बाधा उत्पन्न हो सकती है. धनतेरस 2025 की तिथि और समय:Dhanteras 2025 date and time पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 18 अक्टूबर दोपहर 12 ब जकर 18 मिनट से आरंभ होकर 19 अक्टूबर दोपहर 1 बजकर 51 मिनट तक रहेगी. प्रदोष काल के आधार पर धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर 2025, शनिवार को मनाया जाएगा. Govatsa Dwadashi 2025 Date And Time: गोवत्स द्वादशी 2025 (बछ बारस): जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और व्रत के नियम धनतेरस पर क्या खरीदना होगा शुभ:What to buy on Dhanteras? Dhanteras:इस दिन झाड़ू खरीदना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक है. इसके अलावा, सोना-चांदी के आभूषण, चांदी के सिक्के, देवी-देवताओं की मूर्तियां, नए वाहन या गैजेट्स की खरीदारी भी मंगलकारी मानी जाती है. इन वस्तुओं को घर लाने से जीवन में समृद्धि, सौभाग्य और सकारात्मकता का संचार होता है. धनतेरस के दिन की पूजा विधि:Worship method on Dhanteras day Dhanteras 2025 Date:धनतेरस के दिन शाम के वक्त शुभ मुहूर्त में उत्तर की ओर कुबेर और धन्वंतरि की स्थापना करें।साथ ही मां लक्ष्मी, गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद दीप जलाकर पूजा करें।तिलक करने के बाद पुष्प, फल आदि का भोग लगाएं।कुबेर देवता को सफेद मिठाई और धन्वंतरि देव को पीली मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के दौरान ‘ऊँ ह्रीं कुबेराय नमः’ इस मंत्र का जाप करते रहें।भगवान धन्वंतरि को प्रसन्न करने के लिए इस दिन धन्वंतरि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।धनतेरस के दिन से दिवाली मनाई जाती है और देवी लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी की जाती है। लक्ष्मी के चरणों की निशानी के रूप में रंगोली से लेकर घर के अंदर तक छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं। शाम को 13 दीये जलाकर लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन लक्ष्मी पूजा से समृद्धि, सुख और सफलता मिलती है। धनतेरस के दिन का महत्व:Importance of Dhanteras day Dhanteras:मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से घर में धन की कमी नहीं होती है। Dhanteras 2025 Date इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है। इसके ठीक दो दिन बाद दिवाली मनाई जाती है। ‘धन’ का अर्थ है समृद्धि और ‘तेरस’ का अर्थ है तेरहवां दिन।’ दक्षिण भारत में इस दिन गायों को सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। गायों को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। जो प्राणी कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात यमराज के नाम से पूजा करता है और दक्षिण दिशा में दीपमाला के दर्शन करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं होता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक रखते हैं।

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Govatsa Dwadashi

Govatsa Dwadashi 2025 Date And Time: गोवत्स द्वादशी 2025 (बछ बारस): जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और व्रत के नियम

Govatsa Dwadashi 2025 Mein Kab Hai: क्या आप जानते हैं कि भारतीय संस्कृति में गौमाता को सर्वोच्च तीर्थस्थान और देवताओं का निवास क्यों माना जाता है? गोवत्स द्वादशी एक ऐसा ही पावन पर्व है जो गाय और उनके बछड़ों के प्रति हमारी कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है, जिसे ‘नंदिनी व्रत’ या ‘बछ बारस’ के नाम से भी जाना जाता है गोवत्स द्वादशी और वसु बारस का अर्थ और महत्व:Meaning and significance of Govatsa Dwadashi and Vasu Baras Govatsa Dwadashi:गोवत्स द्वादशी हिंदू कैलेंडर के अनुसार अश्विन माह (अक्टूबर और नवंबर के बीच) के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि (12वें दिन) को मनाई जाती है। कई क्षेत्रों में, यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। नाम: इसे नंदिनी व्रत भी कहा जाता है। महाराष्ट्र में इसे ‘वसु बारस’ कहते हैं, जो दीवाली उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। ‘वसु’ का अर्थ गाय और ‘बारस’ का अर्थ बारहवाँ दिन होता है। Govatsa Dwadashi गुजरात में इसे ‘वाघ बारस’ के नाम से जाना जाता है। Govatsa Dwadashi उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में इसे ‘वाघ’ भी कहते हैं, जिसका अर्थ है वित्तीय ऋण चुकाना, इसलिए इस दिन व्यापारी अपने खाते की किताबें साफ करते हैं। महत्व: यह पर्व गौमाता को समर्पित है, जिन्हें हिंदू धर्म में पवित्र माता माना जाता है क्योंकि वे मानव जाति को पोषण प्रदान करती हैं।  संतान सुख: माताएँ इस दिन अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और कल्याण के लिए उपवास रखती हैं।   संतान प्राप्ति: यह माना जाता है कि यदि कोई निसंतान दंपत्ति श्रद्धापूर्वक गोवत्स द्वादशी का व्रत और पूजा करता है, तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।   पापों से मुक्ति: इस दिन गाय की सेवा और पूजा करने से व्यक्ति को जाने-अनजाने में हुए गौ-अनादर या पापों से मुक्ति मिलती है। गोवत्स द्वादशी 2025: शुभ तिथि और मुहूर्त:Govatsa Dwadashi 2025: Auspicious date and time गोवत्स द्वादशी का पर्व धनतेरस से ठीक एक दिन पहले आता है। विवरण तिथि और समय गोवत्स द्वादशी 2025 की तिथि 17 अक्टूबर 2025, शुक्रवार द्वादशी तिथि प्रारम्भ 17 अक्टूबर, 2025 को 11:12 ए एम बजे से द्वादशी तिथि समाप्त 18 अक्टूबर, 2025 को 12:18 पी एम बजे तक प्रदोषकाल गोवत्स द्वादशी मुहूर्त (श्री मंदिर) 05:29 पी एम से 07:59 पी एम तक (अवधि: 02 घण्टे 30 मिनट्स) प्रदोषकाल गोवत्स द्वादशी मुहूर्त (गणेशस्पीक्स) 06:05 PM to 08:30 PM (Duration: 02 Hours 25 Mins) गोवत्स द्वादशी पूजा विधि और व्रत के नियम:Govatsa Dwadashi puja method and fasting rules इस दिन गाय और बछड़े की पूजा के लिए शुद्धता और श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण है। पूजा की विधि (Puja Vidhi) 1. व्रत का संकल्प: व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और संतान की दीर्घायु या अन्य मनोकामनाओं के लिए व्रत का संकल्प लें। 2. गौ-स्नान और सज्जा: गाय और बछड़े को साफ पानी से स्नान कराएं और उन्हें नए वस्त्र या कपड़े से सजाएं। 3. तिलक: उनके माथे पर कुमकुम, हल्दी, अक्षत (चावल) और बाजरे या मूंग से तिलक लगाएं। 4. भोग: उन्हें श्रद्धा से हरा चारा, अंकुरित मूंग-मौठ, भीगे चने, गुड़ और मीठी रोटी खिलाएं। (यह भोग नंदिनी की पृथ्वी पर उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है।) 5. आरती और प्रार्थना: दीपक जलाकर गाय की आरती उतारें। उनके चरण स्पर्श करें, सहलाएं और जाने-अनजाने में हुए पापों के लिए क्षमा याचना करते हुए परिक्रमा करें। 6. प्रतिकात्मक पूजा: यदि आपके पास गाय और बछड़े उपलब्ध न हों, तो शुद्ध गीली मिट्टी से उनकी प्रतीकात्मक प्रतिमा बनाकर भी पूजा की जा सकती है। 7. श्रीकृष्ण की पूजा: इस दिन भगवान श्रीकृष्ण (जिन्हें गायों के प्रति अपने गहरे प्रेम के लिए जाना जाता है) की भी पूजा की जाती है। गोवत्स द्वादशी व्रत के दौरान क्या न करें (वर्जित कार्य):What not to do during Govatsa Dwadashi fast (forbidden actions) गोवत्स द्वादशी Govatsa Dwadashi के दिन व्रत के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। वर्जित वस्तु/कार्य कारण और स्पष्टीकरण गाय के दूध से बने उत्पाद इस दिन गाय का दूध, दही, घी या पनीर जैसी वस्तुएं नहीं खानी चाहिए। चाकू से कटी वस्तुएँ व्रत रखने वाली महिलाएं चाकू से कटी हुई फल, कंद-मूल या सब्जियां नहीं खाती हैं। केवल बिना कटे फल और कंद-मूल का सेवन करें। गेहूं से बना भोजन इस दिन गेहूं से बने खाद्य पदार्थों को ग्रहण करना भी वर्जित माना जाता है। बाजरे से बना खाना ग्रहण किया जा सकता है. गौमाता को कष्ट किसी भी गाय या बछड़े को मारना, भगाना या कष्ट देना अत्यंत पाप माना गया है। शारीरिक श्रम व्रत करने वाले को अत्यधिक शारीरिक श्रम से बचना चाहिए और रात भर जागरूक रहना चाहिए। गोवत्स द्वादशी की पौराणिक कथा:Mythology of Govatsa Dwadashi गोवत्स द्वादशी के महत्व का उल्लेख ‘भविष्य पुराण’ में भी मिलता है, जिसमें दिव्य गाय नंदिनी और उनके बछड़ों की कहानी बताई गई है। एक समय सुवर्णपुरा नामक राज्य था, जिसके राजा देवदानी की दो रानियां (सीता और गीता) थीं। रानी सीता को भैंस प्रिय थी, जबकि रानी गीता गाय और उसके बछड़े को प्रेम करती थी। एक दिन ईर्ष्यावश भैंस के कहने पर रानी सीता ने क्रोध में आकर गाय के बछड़े को मार डाला और उसे गेहूं के ढेर में दबा दिया। जब राजा भोजन करने बैठे, तो उन्हें चारों ओर रक्त और मांस के टुकड़े दिखाई देने लगे; यहाँ तक कि उनके थाल का भोजन भी मलिन हो गया और पूरे राज्य में रक्त की वर्षा होने लगी। चिंतित राजा ने एक आकाशवाणी सुनी, जिसमें उन्हें रानी सीता के पाप के बारे में पता चला। आकाशवाणी ने राजा से कहा कि इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए, उन्हें अगले दिन गोवत्स द्वादशी का व्रत करना होगा। Govatsa Dwadashi आकाशवाणी ने यह भी बताया कि यदि राजा चाकू से कटे फल और दूध का सेवन नहीं करेंगे, तो उन्हें पापों से मुक्ति मिल जाएगी और बछड़ा जीवित हो जाएगा। राजा ने वैसा ही किया। परिणामस्वरूप, बछड़ा जीवित हो उठा। तब राजा ने तुरंत पूरे राज्य में गोवत्स द्वादशी का व्रत और पूजन करने का आदेश दिया, और तभी से यह परंपरा

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Rama Ekadashi 2025

Rama Ekadashi 2025: बंद किस्मत के दरवाजे खोल देगा ये मंत्र, रमा एकादशी पर जरूर करें जाप

Rama Ekadashi 2025: हिंदू धर्म में एकादशी को बहुत शुभ और खास माना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से दरिद्रता और आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं।  Rama Ekadashi 2025: इस विशेष अवसर पर कुछ विशेष मंत्रों का जप करने से शुभ फल कई गुना बढ़ जाते हैं और Rama Ekadashi 2025 मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। Rama Ekadashi 2025 तो आइए जानते हैं कि रमा एकादशी के दिन कौन से मंत्रों का जाप करना चाहिए। Rama Ekadashi 2025:एकादशी मंत्र ऊँ श्री त्रिपुराय विद्महे तुलसी पत्राय धीमहि तन्नो: तुलसी प्रचोदयात।ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ।। तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी।धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया ।। लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्।तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया ।। वृंदा,वृन्दावनी,विश्वपुजिता,विश्वपावनी |पुष्पसारा,नंदिनी च तुलसी,कृष्णजीवनी || एत नाम अष्टकं चैव स्त्रोत्र नामार्थ संयुतम |य:पठेत तां सम्पूज्य सोभवमेघ फलं लभेत || महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी ।आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते । देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः !नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये।। दन्ताभये चक्र दरो दधानं, कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।। शांताकारम भुजङ्गशयनम पद्मनाभं सुरेशम।विश्वाधारं गगनसद्र्श्यं मेघवर्णम शुभांगम। लक्ष्मी कान्तं कमल नयनम योगिभिर्ध्यान नग्म्य्म।वन्दे विष्णुम भवभयहरं सर्व लोकेकनाथम। ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि। मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वजः।मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥ ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा ।बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात् ।करोमि यद्यत्सकलं परस्मै ।नारायणयेति समर्पयामि ॥ भगवान विष्ण के मंत्र अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव।अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते।। कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् || ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् || श्री विष्णु स्तोत्र किं नु नाम सहस्त्राणि जपते च पुन: पुन: ।यानि नामानि दिव्यानि तानि चाचक्ष्व केशव: ।। मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ।। पदनाभं सहस्त्राक्षं वनमालिं हलायुधम् ।गोवर्धनं ऋषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ।। विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।दामोदरं श्रीधरं च वेदांग गरुड़ध्वजम् ।। अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् ।गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ।। कन्यादानसहस्त्राणां फलं प्राप्नोति मानव:अमायां वा पौर्णमास्यामेकाद्श्यां तथैव च ।। संध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रात:काले तथैव च ।मध्याहने च जपन्नित्यं सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।

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दिवाली

Diwali Special: दिवाली तक जपें ये मंत्र, घर में आएगी खुशहाली और समृद्धि

Diwali Mantra: दिवाली मंत्र दिवाली, वह दिन जब भगवान राम अपनी जन्मभूमि और राज्य अयोध्या लौटे थे, सदियों से दीये, दीप जलाकर और आस-पड़ोस को रोशन करके मनाया जाता रहा है। दिवाली वह समय भी है जब चारों ओर की ऊर्जाएँ इतनी सकारात्मक, ऊर्जा से भरपूर होती हैं और लोगों को अंदर से बाहर तक आनंदित करती हैं। और यह वह समय भी है जब आध्यात्मिक ऊर्जा अपने चरम पर होती है और इसलिए लोग पूजा-अर्चना में अधिक से अधिक संलग्न होते हैं। इसलिए, यहाँ हम इस दिवाली और उसके बाद के दिनों में जपने के लिए 6 मंत्रों का उल्लेख कर रहे हैं, क्योंकि माना जाता है कि ये घर में सुख-समृद्धि लाते हैं। OM:ओम दिवाली किसी भी अवसर, दिन या त्योहार पर जपने के लिए सबसे आसान, लेकिन सबसे शक्तिशाली मंत्रों में से एक है ‘ॐ’ का जाप। ब्रह्मांड की आदि ध्वनि, वह कंपन जिससे समस्त जीवन की उत्पत्ति हुई, ॐ ऊर्जा से भरपूर है। ऐसा माना जाता है कि नियमित रूप से ॐ का जाप करने से आंतरिक ऊर्जा और स्वर ब्रह्मांड की प्राकृतिक लय के साथ संरेखित होते हैं, और हमें तन और मन में शांति का अनुभव होता है। ऐसा भी कहा जाता है कि प्रतिदिन 108 बार ॐ का जाप, ध्यान के साथ, आपके मस्तिष्क को केंद्रित करने, आपको सहज महसूस कराने और आपके तन और मन को आपके भीतर मौजूद ‘प्रचुरता’ की मानसिकता के साथ तालमेल बिठाने में मदद करता है, जो सक्रिय होने का इंतज़ार कर रही है। इसमें घर में सकारात्मकता, शांति और खुशियों का संचार करने की शक्ति है। Ganesh Mantra: गणेश मंत्र मंत्र – वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभा, निर्विघ्नं कुरु मे देवा, सर्व कार्येषु सर्वदाएक सरल अर्थ वाला एक सरल मंत्र, इसका अर्थ है – हे भगवान गणेश, एक घुमावदार सूंड और एक शक्तिशाली शरीर वाले, एक लाख सूर्यों की तरह उज्ज्वल, मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप मेरे मार्ग से सभी बाधाओं को दूर करें और मुझे जो कुछ भी मैं करूं उसमें सफलता का आशीर्वाद दें। दिवाली के दौरान, माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा लोगों द्वारा गहरी श्रद्धा और सम्मान के साथ की जाती है। जबकि माँ लक्ष्मी धन, संपत्ति और प्रचुरता का दाता हैं, भगवान गणेश वह हैं जो अपने भक्तों के मार्ग से बाधाओं और बाधाओं को दूर करते हैं ताकि वे सुख और समृद्धि प्राप्त कर सकें। ऐसा कहा जाता है कि ध्यान करते समय या सुबह की पूजा के दौरान प्रतिदिन 20 बार भी इस मंत्र का जाप करने से लोगों को नकारात्मकता को दूर करने और अच्छी चीजों को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है। Maa Lakhmi Mantra:माँ लक्ष्मी मंत्र मंत्र – ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्नीयै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात। यह देवी लक्ष्मी के सबसे सरल मंत्रों में से एक है, जो अपने भक्तों को धन और समृद्धि प्रदान करती हैं। इस मंत्र का अर्थ है – माँ लक्ष्मी, हम आपका ध्यान करते हैं, आप भगवान विष्णु की अर्धांगिनी हैं, और आप हमें बुद्धि, धन और सुख प्रदान करें। शुद्ध, पवित्र हृदय और माँ लक्ष्मी के प्रति पूर्ण श्रद्धा के साथ इस मंत्र का जाप करने से भक्त उनका आशीर्वाद और सकारात्मकता प्राप्त कर सकते हैं। और जैसा कि ऐसा माना जाता है कि माँ लक्ष्मी दिवाली के दौरान अपने भक्तों के घर आती हैं, यदि लोग प्रतिदिन पूरे मन से इस मंत्र का जाप करें, तो वे निश्चित रूप से प्रसन्न होंगी। Karwa chauth 2025 Subh Muhurat: करवा चौथ की सरगी में खाएं ये 3 चीजें, दिन भर नहीं लगेगी भूख, मजे-मजे में हो जाएगा व्रत ‘ह्रीं श्रीं’ लक्ष्मी मंत्र माँ लक्ष्मी को समर्पित एक और शक्तिशाली मंत्र है ‘ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मी भ्यो नमः’। इसका सीधा सा अर्थ है, ‘मैं माँ लक्ष्मी को नमन करता हूँ, जो समृद्धि और धन की अवतार हैं।’ यह ‘ह्रीं और श्रीं’ के बीज मंत्र वाला एक विशेष रूप से शक्तिशाली मंत्र है, ये दो अक्षर समृद्धि, सफलता और सुरक्षा को आकर्षित करने के लिए जाने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भक्त प्रतिदिन प्रातःकाल की प्रार्थना के बाद इस मंत्र का 108 बार जाप करते हैं, तो इससे माँ लक्ष्मी की ऊर्जा का आध्यात्मिक संबंध बनता है और यह उनके जीवन में समृद्धि और समृद्धि के रूप में आती है। Kuber Mantra:कुबेर मंत्र दिवाली के बाद के दिनों में धन और वैभव के देवता भगवान कुबेर की भी पूजा की जाती है। मंत्र है – ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।’ इसका मूल अर्थ है कि मैं भगवान कुबेर का आशीर्वाद प्राप्त करता हूँ, जो लोगों को धन और सुरक्षा प्रदान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि दिवाली या अन्य अवसरों पर इस मंत्र का जाप करने से लोगों को भगवान कुबेर की सकारात्मकता और ऊर्जा आकर्षित करने में मदद मिलती है। ऐसा कहा जाता है कि यह मंत्र न केवल धन को आकर्षित करने में मदद करता है, बल्कि किसी भी वित्तीय बोझ और ऋण को दूर करने में भी मदद करता है, और कहीं अटके हुए धन का मार्ग प्रशस्त करता है।

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करवा चौथ

Karwa chauth 2025 Subh Muhurat: करवा चौथ की सरगी में खाएं ये 3 चीजें, दिन भर नहीं लगेगी भूख, मजे-मजे में हो जाएगा व्रत

Karwa chauth 2025 fasting tips in hindi: करवा चौथ व्रत शुरू करने से पहले चाय-कॉफी पीने के बजाय खाएं ये 3 चीजें, पूरे दिन नहीं लगेगी प्‍यास………. Karwa Chauth Vrat 2025: करवा चौथ का व्रत इस बार बुधवार यानि 1 नवंबर को मनाया जा रहा है. इस दिन सुहागिन स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु और उत्‍तम स्‍वास्‍थ्‍य की कामना लिए अन्‍न-जल त्‍याग कर व्रत करेंगी. हालांकि सुबह से भूखी-प्‍यासी रहकर व्रत करने वाली महिलाएं कई बार शाम होते होते बीमार भी हो जाती हैं. वे बेहोश हो जाती हैं, या उनका ब्‍लड प्रेशर लो हो जाता है या इनके शरीर में अचानक पानी की कमी हो जाती है. अगर आपके साथ भी ऐसा होता है तो इस बार यहां बताई जा रही डॉक्‍टर की सलाह मानकर व्रत शुरू कर सकती हैं. इससे आप बिना किसी अड़चन के व्रत रख पाएंगी और पूरे दिन पानी या खाने की कमी भी महसूस नहीं होगी. करवा चौथ का व्रत शुरू करने से पहले अधिकांश महिलाएं सुबह सरगी लेती हैं. इसमें घर में मौजूद सास अपनी बहुओं को सरगी में मिठाई और फल खाने के लिए देती हैं. कुछ जगहों पर एकदम सुबह महिलाएं पानी और फिर चाय पीती हैं. जबकि कुछ महिलाएं कॉफी भी पीती हैं. हालांकि ये सभी चीजें शरीर को नुकसान ही पहुंचाती हैं और दिनभर के व्रत में कठिनाई पैदा करती हैं. इस बार आप चाय-कॉफी छोड़कर ये 3 चीजें ट्राई कीजिए और फिर देखिए कैसे आप पूरे दिन तरोताजा बनी रहती हैं और आपको दिन भर प्‍यास नहीं लगेगी. करवा चौथ की सरगी में खाएं ये 3 चीजें करवा चौथ वाले दिन सुबह सरगी में 3 चीजें बहुतायत से लें.सरगी के दौरान सबसे पहला काम करें कि खूब पानी पीएं.दूसरा, कोई भी ताजा फल खाएं. इनमें खरबूज, तरबूज या पपीता ले सकते हैं, या कोई भी जूसी फल हो सकता है.इसके बाद तीसरी चीज, एक गिलास लस्‍सी या एक कटोरी दही, जो भी ले सकतें हैं जरूर लें. अगर लस्‍सी नहीं लेना चाह रहे तो मिल्‍कशेक या दूध ले सकते हैं. ये भी नहीं लेना तो फिर कम नमक और कम चीनी वाला नींबू पानी पी लें. इससे पूरे दिन प्‍यास नहीं लगेगी और शरीर डिहाइड्रेट नहीं होगा. भूलकर भी न खाएं ये चीजें सरगी में भूलकर भी फ्राइड फूड न खाएं. जैसे चिप्‍स, पापड़ आदि. या फिर चाय, कॉफी न पीएं. इसके अलावा बहुत ज्‍यादा मीठा भी न खाएं. सुबह सुबह नमकीन या मिर्च मसाले वाली चीजें खाने से प्‍यास जल्‍दी लगती है. व्रत पूरा होने पर भी बरतें सावधानी व्रत पूरा होने के बाद भी खाने पर एकदम से न टूटें और न ही बहुत ज्‍यादा तला भुना, मिर्च मसाले वाला बाहर का खाना खाएं. कोशिश करें कि व्रत पूरा होने पर पहले एक गिलास पानी पीएं. उसके कुछ देर बाद सादा खाना खाकर व्रत खोलें. इस वक्‍त फ्राइड फूड ज्‍यादा खाने से आपको एसिडिटी सहित अन्‍य परेशानियां भी हो सकती हैं. सरगी के दौरान खाएं ये चीजें, कमजोरी नहीं होगी महसूस:Eat these things during Sargi, you will not feel weakness 1.फल जरूर करें शामिल करवा चौथ की सरगी में आप फलों को जैसे सेब, अनार, केला, पपीता को जरूर शामिल करें. इनमें विटामिन और मिनरल्स होते हैं जो कि शरीर में कमजोरी नहीं आने देते हैं. 2.नारियल पानी करवा चौथ एक निर्जला व्रत होता है, ऐसे में दिन भर बिना पानी के रहना कठिन हो जाता है. शरीर में पानी की कमी से चक्कर तक आ सकते हैं. ऐसे में ये जरूरी है कि पूरे दिन आपका शरीर हाइड्रेटेड रहे. नारियल पानी पीकर पूरे दिन शरीर को हाइड्रेटेड रखा जा सकता है. इतना ही नहीं इसमें इलेक्ट्रोलाइट्स भी होते हैं. जो कि उर्जा बनाए रखते हैं   3. सूखे मेवे सूखे मेवे जैसे कि खजूर, बादाम, अखरोट, किशमिश ऊर्जा के अच्छे स्रोत माने जाते हैं और इन्हें खाने से लंबे समय तक पेट भरा रहता है और भूख भी नहीं लगती है. आप चाहे तो अपनी सरगी में इन्हें भी शामिल कर सकते हैं. अब जान लें उन चीजों के बारे में जिन्हें सरगी में शामिल करने से शरीर को नुकसान पहुंच सकते हैं. सरगी में तली-भुनी न खाएं. इन्हें खाने से पेट में भारीपन हो जाता है और प्यास बढ़ा सकती हैं. इसी तरह से मसालेदार खाना भी न करें.  Karwa Chauth 2025 Vrat Upay: करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए..

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Bishnoi Sthapana Divash

Bishnoi Sthapana Divash 2025: बिश्नोई स्थापना दिवस

Bishnoi Sthapana Divash Kab Hai: बिश्नोई स्थापना दिवस सन् 1485 से कार्तिक कृष्णा अष्टमी को बिश्नोई संप्रदाय के द्वारा मनाया जाता है। इस संप्रदाय की स्थापना गुरु जम्भेश्वर जी ने की थी। Bishnoi Sthapana Divash बिश्नोई शब्द को विष्णु से लिया गया, जिसका अर्थ है विष्णु के अनुयायी। विभिन्न विचारों के अनुसार बिश्नोई संप्रदाय में 2 9 सिद्धांतों का पालन किया जाता है। Bishnoi Sthapana Divash बिश का अर्थ है 20(बीस) और नोई का मतलब 9 (नौ)। इस प्रकार, बिश्नोई बीस-नियम के रूप में भी अनुवादित किया जाता है। बिश्नोई समाजी लोग प्रकृति एवं जंगली जानवरों के अत्यधिक प्रेमी होते हैं। प्रारंभ में, Bishnoi Sthapana Divash बिश्नोई सम्प्रदाय को अपनाने वाले अधिकतर लोग जाट समुदाय से थे। अतः बिश्नोई सम्प्रदाय को कुछ जगह बिश्नोई जाट भी बोला जाता है। Bishnoi Sthapana Divash 2025: बिश्नोई स्थापना दिवस अनुष्ठान सप्तमी से ही मुक्तिधाम मुकाम में जाम्भाणी सत्संग का आयोजन किए जाते हैं।अष्टमी को मुक्तिधाम मुकाम से शोभा यात्रा निकली जाती है। शोभा यात्रा में भगवें झण्डे के सात 29 नियमों की पट्टिकाओं के साथ बिश्नोई जन सम्मिलित होते हैं।बिश्नोईयों के‌ आद्य स्थल समराथल‌ धोरा पर जाम्भाणी यज्ञ के साथ पवित्र पाहल बनाया‌ जाता है, बिश्नोई जन अपने संकल्पों को दोहराएंगे।महासभा द्वारा तैयार प्रसाद-भोज‌ का भोजशाला में आकर ग्रहण करते हैं। Bishnoi Sthapana Divash: बिश्नोई समाजी लोग प्रकृति एवं जंगली जानवरों के अत्यधिक प्रेमी होते हैं। प्रारंभ में, बिश्नोई सम्प्रदाय को अपनाने वाले अधिकतर लोग जाट समुदाय से थे। अतः बिश्नोई सम्प्रदाय को कुछ जगह बिश्नोई जाट भी बोला जाता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने चैंपियन ऑफ अर्थ अवार्ड 2018 का श्रेय विश्नोई समाज को दिया ।तथा बिश्नोईयो के पर्यावरण के लिए बलिदान की परंपरा को विश्व इतिहास की अनोखी घटना भी बताया। संबंधित अन्य नाम बिश्नोई समाज स्थापना दिवस शुरुआत तिथि कार्तिक कृष्णा अष्टमी कारण बिश्नोई संप्रदाय स्थापना दिवस उत्सव विधि व्रत, भजन-कीर्तन, मंदिर में प्रार्थना

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Radha Kund Snan

Radha Kund Snan 2025 Date And Time: अहोई अष्टमी पर कब किया जाएगा राधा कुंड स्नान? जानें सही तिथि, मुहूर्त और संतान प्राप्ति का महत्व

Radha Kund Snan 2025 mein kab hai: अहोई अष्टमी का व्रत हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर किया जाता है। इस दिन, मथुरा के गोवर्धन में स्थित राधा कुंड में स्नान करने का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताएं कहती हैं कि इस पवित्र कुंड में डुबकी लगाने से निसंतान दंपत्ति (Childless couples) को संतान की प्राप्ति हो सकती है। यह पर्व केवल संतान की कामना रखने वाले जोड़ों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी साधकों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। Radha Kund Snan 2025 Date And Time:राधा कुंड स्नान 2025: सही तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की Radha Kund Snan अष्टमी तिथि पर अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। इसी दिन राधा कुंड में स्नान का विधान है। राधा कुंड स्नान की सही तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार है: विवरण तिथि और समय अष्टमी तिथि की शुरुआत 13 अक्टूबर, रात 12 बजकर 24 मिनट पर अष्टमी तिथि का समापन 14 अक्टूबर, सुबह 11 बजकर 09 मिनट पर राधा कुंड स्नान की तिथि सोमवार, 13 अक्टूबर (उदया तिथि के अनुसार) स्नान का शुभ मुहूर्त (निशिता काल) रात 11 बजकर 41 मिनट से रात 12 बजकर 30 मिनट तक यह स्नान अर्ध रात्रि यानी निशिता काल में किया जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस समय स्नान करने से संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी हो सकती है। Ahoi Ashtami 2025 Date: 13 या 14 अक्टूबर? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि राधा कुंड स्नान का महत्व: क्यों माना जाता है इसे वरदान:Importance of taking bath in Radha Kund: Why is it considered a boon: Radha Kund Snan: राधा कुंड गोवर्धन परिक्रमा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अहोई अष्टमी के दिन इस कुंड में डुबकी लगाने का विशेष महत्व है, खासकर उन विवाहित जोड़ों के लिए जो संतान सुख से वंचित हैं। 1. संतान प्राप्ति का वरदान: ऐसी मान्यता है कि अहोई अष्टमी के दिन अर्ध रात्रि (निशिता काल) में श्रद्धापूर्वक राधा कुंड में स्नान करने से निसंतान दंपत्ति की संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी हो जाती है। 2. मनोकामना पूर्ति: जो भी साधक इस दिन श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। 3. ईश्वरीय कृपा: इस कुंड में स्नान करने से साधक को न केवल राधा रानी की, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की कृपा की भी प्राप्ति होती है। संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होने के बाद, जोड़े दोबारा इस Radha Kund Snan कुंड में आकर स्नान करते हैं और राधा रानी जी का धन्यवाद प्रकट करते हैं। राधा कुंड में स्नान करने की विधि (Sacred Ritual) संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए राधा कुंड में स्नान करने की एक विशेष विधि है, जिसका पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है: 1. व्रत और संकल्प: संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए स्नान करने वाले जोड़े पूरे दिन व्रत रखते हैं। 2. मध्य रात्रि का स्नान: जोड़े मध्य रात्रि (निशिता काल) में कुंड में स्नान करते हैं। 3. विशेष सामग्री: स्नान के दौरान, कच्चा सफेद कद्दू, जिसे ‘पेठा’ भी कहा जाता है, उसे एक लाल कपड़े में बांधकर अपने हाथों में रखा जाता है। 4. ध्यान और कामना: स्नान करते समय साधक राधा रानी का ध्यान करते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ति की कामना करते हैं। 5. अर्पण: स्नान के बाद, यह ‘पेठा’ राधा रानी को अर्पित किया जाता है। राधा रानी की पूजा के समय मंत्रों का जप करना और श्रीजी की पूजा करना भी शुभ माना जाता है। Story of Radha Kund Bath:राधा कुंड स्नान की कहानी Radha Kund Snan राधा कुंड का निर्माण भगवान कृष्ण ने अरिस्तासुर को मारने के बाद किया था जोकि एक बैल रूपी राक्षस था। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, बैल धर्म का प्रतीक है क्योंकि यह गाय के परिवार से संबंधित है। इसलिए राधारानी और गोपीयों के अनुसार, भगवान कृष्ण ने बैल को मार कर धार्मिक अपराध किया था। Radha Kund Snan राधा जी ने कृष्ण से सभी पवित्र नदियों में पवित्र स्नान करके स्वयं को शुद्ध करने के लिए कहा। अतः राधारानी को खुश करने के लिए, भगवान कृष्ण ने सभी पवित्र स्थानों का पानी एक ही स्थान पर एकत्र किया। कृष्णा ने अपने कमल चरणों को जमीन पर मारा जिससे उस स्थान पर सभी अलौकिक और पवित्र नदियों का पानी एकत्रित हो गया, और उस समय से, यह स्थान श्याम कुंडा के रूप में जाना जाता है। यह देखकर, राधारानी ने अपनी चूड़ियों के साथ जमीन खोदकर श्याम कुंडा के पास एक और कुंड बनाया। सभी पवित्र जल निकायों ने राधा जी से अनुरोध किया कि वे बनाए गए कुंड में प्रवेश करें। Radha Kund Snan इसलिए, इस तरह राधा कुंड बनाया गया था। राधा कुंड के तट पर, राधा रानी के आठ प्रमुख सखियों के नाम पर कुल आठ कुंज भी स्थित हैं।

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