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Lalita Panchami 2025 Date And Time: ललिता पंचमी 2025: तिथि,महत्व और उपांग ललिता व्रत की संपूर्ण जानकारी

Lalita Panchami: हिंदू धर्म में, ललिता पंचमी का त्योहार देवी ललिता को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस विशेष दिन को ‘उपांग ललिता व्रत’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसे भक्तजन अपनी देवी के सम्मान में रखते हैं। यह पर्व विशेष रूप से गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों में अत्यधिक लोकप्रिय है। आइए, 2025 में Lalita Panchami ललिता पंचमी कब है, इसका क्या महत्व है और इसे कैसे मनाया जाता है, इसकी विस्तृत जानकारी प्राप्त करते हैं। Lalita Panchami 2025 kab Hai: ललिता पंचमी 2025 कब है? साल 2025 में Lalita Panchami ललिता पंचमी शुक्रवार, 26 सितंबर को मनाई जाएगी। यह दिन शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन पड़ता है, जब देवी दुर्गा के पांचवें स्वरूप देवी स्कंदमाता की भी पूजा की जाती है। महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त:Important dates and auspicious times: • ललिता पंचमी 2025: 26 सितंबर, शुक्रवार • पंचमी तिथि प्रारंभ: 26 सितंबर, सुबह 09:33 बजे • पंचमी तिथि समाप्त: 27 सितंबर, दोपहर 12:04 बजे • सूर्योदय (उज्जैन के अनुसार): 26 सितंबर, सुबह 06:20 बजे • सूर्यास्त (उज्जैन के अनुसार): 26 सितंबर, शाम 06:15 बजे Who is Goddess Lalita: कौन हैं देवी ललिता? देवी ललिता Lalita Panchami को दस महाविद्याओं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण देवी माना जाता है। उन्हें ‘षोडशी’ और ‘त्रिपुर सुंदरी’ के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी ललिता को देवी दुर्गा या शक्ति का अवतार माना जाता है। उन्हें ‘पंच महाभूतों’ (पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश) से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक कथाएं: • एक मान्यता के अनुसार, देवी ललिता का प्राकट्य ‘भंडा’ नामक राक्षस का वध करने के लिए हुआ था, जो कामदेव की राख से उत्पन्न हुआ था। इसलिए ललिता पंचमी को देवी ललिता की ‘जयंती’ या प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। • एक अन्य कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी द्वारा छोड़े गए चक्र से पाताल लोक समाप्त होने लगा और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगी, तब सभी ऋषि-मुनियों ने माता ललिता देवी की उपासना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं और इस विनाशकारी चक्र को थाम लिया, जिससे सृष्टि को नवजीवन मिला। • पुराणों में यह भी वर्णित है कि जब सती अपने पिता दक्ष द्वारा अपमानित होकर अपने प्राण त्याग देती हैं, तो भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठाकर चारों दिशाओं में घूमने लगते हैं। इस महाविपत्ति को देखकर भगवान विष्णु अपने चक्र से सती की देह को विभाजित कर देते हैं। तत्पश्चात भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर इन्हें ललिता के नाम से पुकारा जाने लगा। • कालिका पुराण जैसे विभिन्न हिंदू धर्मग्रंथों में देवी ललिता के महत्व का वर्णन मिलता है। देवी ललिता गौर वर्ण की हैं, दो भुजाएं धारण करती हैं, और लाल कमल पर विराजमान हैं। ललिता पंचमी का महत्व और उपांग ललिता व्रत के लाभ:Importance of Lalita Panchami and benefits of Upang Lalita Vrat ललिता पंचमी Lalita Panchami का व्रत ‘उपांग ललिता व्रत’ के नाम से जाना जाता है और इसे अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन देवी की पूजा और व्रत करने से भक्तों को immense शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त होता है। यह व्रत रखने के कई लाभ बताए गए हैं: • सुख, ज्ञान और धन की प्राप्ति: माना जाता है कि देवी की पूजा और व्रत से जीवन में सुख, ज्ञान और धन की वृद्धि होती है। • समस्त कष्टों का निवारण: देवी ललिता के दर्शन मात्र से या उनकी पूजा से जीवन के सभी व्यक्तिगत और व्यावसायिक कष्ट तुरंत दूर हो जाते हैं। • शक्ति और सामर्थ्य: यह व्रत भक्तों को अपार शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है। • संतोष और खुशी: देवी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को संतोष और खुशी का आशीर्वाद देती हैं। • समृद्धि: देवी ललिता की पूजा से समृद्धि की प्राप्ति होती है। उपांग ललिता व्रत और पूजा विधि:Upang Lalita fast and worship method ललिता पंचमी के दिन भक्त पूरी श्रद्धा के साथ देवी ललिता का व्रत रखते हैं और पवित्र अनुष्ठान करते हैं। पूजा के प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं:The major rituals of puja are as follows: 1. व्रत और उपवास: भक्तजन इस दिन कठोर व्रत और उपवास का पालन करते हैं। 2. देवी ललिता के साथ अन्य देवताओं की पूजा: देवी ललिता के साथ-साथ भगवान शिव और स्कंदमाता की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है। 3. विशेष पूजा और मंत्र पाठ: देवी के सम्मान में विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए जाते हैं। देवी ललिता को समर्पित वैदिक मंत्रों का पाठ या जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 4. सामुदायिक पूजा और मेले: कुछ स्थानों पर सामुदायिक पूजाएं आयोजित की जाती हैं, जहाँ सभी महिलाएं एक साथ प्रार्थना करती हैं। कई जगहों पर भव्य मेलों का आयोजन भी किया जाता है, जहाँ हजारों श्रद्धालु बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं। 5. ललिता सहस्रनाम और ललिता त्रिशती का पाठ: गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, देवी ललिता की पूजा देवी चंडी के समान ही ‘ललिता सहस्रनाम’, ‘ललितोपाख्यान’ और ‘ललिता त्रिशती’ जैसे पूजा अनुष्ठानों के साथ की जाती है। 6. षोडषोपचार विधि: भक्तगण इस दिन षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते हैं। देशभर में ललिता पंचमी का उत्सव:Celebration of Lalita Panchami across the country ललिता पंचमी का त्योहार पूरे भारतवर्ष में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र में इसकी लोकप्रियता विशेष रूप से अधिक है। इस दिन देवी ललिता के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो दूर-दूर से पूजा अनुष्ठानों में भाग लेने आते हैं। निष्कर्ष ललिता पंचमी 2025, एक बार फिर देवी ललिता की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक शुभ अवसर लेकर आएगी। यह दिन न केवल आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामुदायिक सद्भाव और सांस्कृतिक उत्सवों का भी प्रतीक है। सच्चे मन और श्रद्धा से देवी की आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि और संतोष की प्राप्ति होती है।

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Durga Panchami

Durga Panchami 2025 Start Date: दुर्गा पूजा 2025: कब से शुरू होगी यह महापर्व, जानें शुभ तिथियां और महत्व !

Durga Panchami: हिंदू धर्म में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। यह एक प्रमुख त्योहार है जो शारदीय नवरात्रि के दौरान मनाया जाता है और दुर्गोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। विशेष रूप से पूर्वी भारत, जैसे बंगाल, ओडिशा, असम, त्रिपुरा, बिहार और झारखंड में इसे बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। साल 2025 में दुर्गा पूजा कब से शुरू होगी, विसर्जन कब होगा, और इसके प्रमुख अनुष्ठान क्या हैं, आइए जानते हैं इस विस्तृत ब्लॉग पोस्ट में। Durga Puja 2025 Start date shubh muhurat : दुर्गा पूजा 2025 का शुभारंभ और समापन साल 2025 में दुर्गा पूजा का पर्व 27 सितंबर, शनिवार को पंचमी तिथि से शुरू होगा और 2 अक्टूबर, गुरुवार को विजयादशमी के साथ समाप्त होगा। यह छह दिवसीय उत्सव होगा, जिसमें देवी दुर्गा की आराधना और सांस्कृतिक उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। Importance of Shardiya Navratri 2025 and Mahalaya:शारदीय नवरात्रि 2025 और महालया का महत्व दुर्गा पूजा का आरंभ महालया के साथ होता है, जो पितृ पक्ष के अंत और देवी पक्ष की शुरुआत का प्रतीक है। 2025 में, महालया 21 सितंबर को मनाया जाएगा। इस दिन चंडी पाठ और भक्ति गीतों के साथ वातावरण में एक दिव्य उत्साह भर जाता है। शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर 2025, सोमवार से शुरू होकर 1 अक्टूबर 2025, बुधवार तक चलेगी। इस वर्ष नवरात्रि 10 दिनों की होगी क्योंकि तृतीया तिथि दो दिन रहेगी। Important dates and rituals of Durga Puja 2025: दुर्गा पूजा 2025 की महत्वपूर्ण तिथियां और अनुष्ठान आइए जानते हैं दुर्गा पूजा 2025 के प्रत्येक महत्वपूर्ण दिन की तिथि और उसके विशेष अनुष्ठान: पंचमी (27 सितंबर 2025, शनिवार): बिल्व निमंत्रण दुर्गा पूजा की शुरुआत बिल्व निमंत्रण के साथ होती है। इस दिन देवी दुर्गा को अनुष्ठानों के साथ पृथ्वी पर आमंत्रित किया जाता है। षष्ठी (28 सितंबर 2025, रविवार): कल्पारंभ और अकाल बोधन षष्ठी तिथि के दिन दुर्गा पूजा का विधिवत आरंभ होता है। Durga Panchami इस दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। कल्पारंभ अनुष्ठान के बाद अकाल बोधन होता है, जो देवी के आह्वान का प्रतीक है। इस दिन बिल्व निमंत्रण और पंडाल सजाने की परंपरा भी निभाई जाती है। मूर्ति स्थापना के लिए सुबह 06:08 बजे से 10:30 बजे तक का समय उत्तम मुहूर्त रहेगा। सप्तमी (29 सितंबर 2025, सोमवार): कोलाबौ पूजा इस दिन दुर्गा सप्तमी मनाई जाती है। कोलाबौ पूजा एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें एक छोटे केले के पौधे को साड़ी पहनाकर भगवान गणेश की पत्नी के रूप में पूजा जाता है। इसे दुर्गा पूजा का सबसे पवित्र भाग माना जाता है। अष्टमी (30 सितंबर 2025, मंगलवार): महा अष्टमी, कुमारी पूजा और संधि पूजा महा अष्टमी दुर्गा पूजा का सबसे शुभ दिन माना जाता है। इस दिन भक्त कुमारी पूजा करते हैं, जिसमें युवा लड़कियों को देवी के अवतार के रूप में पूजा जाता है। Durga Panchami अष्टमी और नवमी के संधिकाल में (रात्रि 07:36 से 08:24 बजे तक) संधि पूजा की जाती है। यह समय मां दुर्गा के चामुंडा रूप की आराधना के लिए अत्यंत विशेष होता है, जिसमें 108 दीपों और 108 कमल पुष्पों से मां की पूजा की जाती है। नवमी (1 अक्टूबर 2025, बुधवार): महा नवमी और नवमी होम महा नवमी के दिन, महिषासुर पर दुर्गा के युद्ध के अंतिम दिन का स्मरण किया जाता है। इस दिन नवमी होम (पवित्र अग्नि अनुष्ठान) और दुर्गा बलिदान बड़ी श्रद्धा के साथ किए जाते हैं। दशमी (2 अक्टूबर 2025, गुरुवार): विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन यह दुर्गा पूजा का अंतिम दिन है। Durga Panchami इस दिन सिंदूर उत्सव होता है, जहां विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमाओं का नदियों और तालाबों में विसर्जन किया जाता है। यह देवी के अपने स्वर्गीय निवास पर लौटने का प्रतीक है। Durga Panchami:देवी दुर्गा का आगमन और प्रस्थान 2025 Durga Panchami देवी दुर्गा का धरती पर आगमन देवी पक्ष के पहले दिन होता है और दुर्गा विसर्जन के दिन वह प्रस्थान करती हैं। Durga Panchami मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान वाले दिन महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि यह आने वाले समय का अनुमान लगाने में सहायक होते हैं। आगमन: 2025 में देवी दुर्गा हाथी पर सवार होकर आएंगी, जिसे अत्यधिक शुभ माना जाता है, Durga Panchami क्योंकि यह समृद्धि और अच्छी फसल का प्रतीक है। प्रस्थान: वह “नर” (मनुष्य) पर प्रस्थान करेंगी, जो आगे आने वाले संघर्षों और चुनौतियों का संकेत देता है, लेकिन उन्हें दूर करने के लिए मानवीय शक्ति को भी दर्शाता है। Why is Durga Puja celebrated: दुर्गा पूजा क्यों मनाई जाती है? दुर्गा पूजा देवी दुर्गा की महिषासुर नामक राक्षस राजा पर विजय का उत्सव है। Durga Panchami यह बुराई पर अच्छाई की जीत और स्त्री शक्ति के सर्वोच्च स्वरूप का प्रतीक है। धार्मिक भक्ति से परे, दुर्गा पूजा कला, संस्कृति, सामुदायिक बंधन, भोजन और आनंद का त्योहार भी है। निष्कर्ष दुर्गा पूजा 2025 एक बार फिर पूरे देश में भक्ति, अनुष्ठानों, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक उत्सवों के साथ छह दिनों तक मनाई जाएगी। Durga Panchami महालया से लेकर विजयादशमी तक, प्रत्येक अनुष्ठान का गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जो इस त्योहार को परंपरा और उत्सव का एक अद्भुत मिश्रण बनाता है। जैसे-जैसे गिनती शुरू हो रही है, भारत और दुनिया भर के भक्त खुशी, समृद्धि और शांति के लिए प्रार्थनाओं के साथ मां दुर्गा के आगमन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें और क्या नहीं

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Ekadashi Vrat Niyam

Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें और क्या नहीं

Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी का व्रत इस साल सितंबर के महीने में पितृ पक्ष के दौरान पड़ रहा है। इंदिरा एकादशी व्रत के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना अति आवश्यक है। जानिए इस दिन क्या करें, क्या नहीं… Indira Ekadashi 2024 : हर साल में इंदिरा एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत प्रभु विष्णु जी को समर्पित है। इंदिरा एकादशी का व्रत इस साल आश्विन मास की कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि पर रखा जाएगा। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन विष्णु भगवान के भक्त जन व्रत रख विधि-विधान के साथ पूजा करते हैं। एकादशी का व्रत काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना अति आवश्यक है। आइए जानते हैं इंदिरा एकादशी के दिन किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें  Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन शुभ मुहूर्त में विष्णु भगवान की पूजा करें। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन व्रत न रखा हो तो सात्विक भोजन करने की कोशिश करें। व्रत रखने से पूर्व व्रत रखने का संकल्प जरूर लें। व्रत के सभी नियमों का पालन करें। पारण सूर्योदय के पाश्चात्य करना उत्तम रहेगा। इस दिन भजन-कीर्तन भी किया जाता है।  Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या न करें मास-मदिरा- इंदिरा एकादशी के दिन मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नाराज हो सकते हैं। चावल- इंदिरा एकादशी के दिन चावल का सेवन करने की मनाही है। मान्यता है इंदिरा एकादशी के दिन चावल का सेवन करने से दोष लगता है। तुलसी– तुलसी की पत्तियां विष्णु भगवान को बेहद प्रिय हैं, जिसके बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जाता है। इसलिए इंदिरा एकादशी के दिन तुलसी की पत्तियों को न तो स्पर्श करना चाहिए और न ही इन्हें तोड़ना चाहिए। Ekadashi Vrat Niyam मन्यताओं के अनुसार, इस दिन तुलसी जी व्रत रखती हैं। इसलिए इन्हें सर्ष करने से बचना चाहिए।  काले वस्त्र– धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, इंदिरा एकादशी के दिन काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा दृष्टि बनाए रखने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा। Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

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Indira Ekadashi 2025 Date And Time: कब और क्यों मनाई जाती है इंदिरा एकादशी? यहां जानें धार्मिक महत्व

Indira Ekadashi: हिंदू धर्म में, एकादशी तिथि का विशेष महत्व है, और जब बात पितृपक्ष में आने वाली एकादशी की हो, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। Indira Ekadashi पितृपक्ष में आने वाली इस एकादशी को Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है, जिसे अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पुण्य कर्म करने से पितरों को मुक्ति मिलती है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम इंदिरा एकादशी 2025 की सही तिथि, इसका धार्मिक महत्व और पितरों की शांति व मोक्ष के लिए किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इंदिरा एकादशी 2025 कब है? जानें शुभ मुहूर्त : When is Indira Ekadashi 2025? Know the auspicious time पंचांग के अनुसार, Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी 2025 आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। इस वर्ष, यह शुभ तिथि 17 सितंबर 2025 को पड़ रही है। एकादशी तिथि का आरंभ और समापन इस प्रकार होगा:The beginning and end of Ekadashi Tithi will be as follows एकादशी तिथि का आरंभ: 17 सितंबर 2025 को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर (यानी 16 सितंबर की रात)। कुछ स्रोतों में यह 16 तारीख की रात 12 बजकर 23 मिनट भी दिया गया है। एकादशी तिथि का समापन: 17 सितंबर 2025 को देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर। कुछ स्रोतों में यह 17 तारीख की रात 11 बजकर 40 मिनट भी दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी तिथि का व्रत उस दिन किया जाता है, जिस दिन सुबह के समय एकादशी तिथि रहती है। इसलिए, 17 सितंबर को ही इंदिरा एकादशी का व्रत और श्राद्ध किया जाएगा। इस दिन एक विशेष संयोग भी बन रहा है: गौरी योग। चंद्रमा अपनी स्वराशि कर्क में विराजमान रहेंगे, जिससे यह शुभ गौरी योग बनेगा। ऐसे में व्रत और श्राद्ध कर्म करने वालों को विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होगी। ज्योतिषियों का मत है कि इन शुभ योग में पूजा करने से साधक पर लक्ष्मी नारायण जी की कृपा बरसती है और पितरों को नवजीवन प्राप्त होता है। इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व: पितरों को मिलता है मोक्ष:Importance of Indira Ekadashi fast: Ancestors get salvation इंदिरा एकादशी का हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्व बताया गया है, विशेषकर पितरों की शांति और मोक्ष के लिए। पितरों को मुक्ति और मोक्ष: यह माना जाता है कि इस दिन व्रत करने और पुण्य कार्य करने से पितरों को मुक्ति मिलती है Indira Ekadashi और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इंदिरा एकादशी के दिन पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से तीन पीढ़ी के पूर्वजों का उद्धार होता है। पापों का नाश: इंदिरा एकादशी के दिन व्रत और तर्पण करने से पितरों के पापों का नाश हो जाता है। नरक से मुक्ति: यदि किसी कारण से पितर नरक में पड़े हैं, तो इस व्रत को करने से उन्हें भी मुक्ति मिल जाती है। Indira Ekadashi बुरे कर्म करने वाले पूर्वजों को प्रेतयोनि में लंबे समय तक भटकना पड़ सकता है, और उनके लिए श्राद्ध और पिंडदान अनिवार्य है। वैकुंठ धाम की प्राप्ति: इस व्रत को करने से व्यक्ति को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु के शरण में रहने वाले साधकों को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति: जो लोग इस व्रत का पालन करते हैं, Indira Ekadashi उन्हें सुख, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। पितरों की शांति के लिए इंदिरा एकादशी पर क्या करें:What to do on Indira Ekadashi for the peace of ancestors Indira Ekadashi: इंदिरा एकादशी पर पितरों की शांति और मोक्ष के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं: 1. व्रत और पूजन: इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत अवश्य करें। अगर आप व्रत नहीं रख पा रहे हैं, तब भी भगवान विष्णु की पूजा अवश्य करनी चाहिए। 2. तर्पण और पिंडदान: इंदिरा एकादशी पितृपक्ष में आती है, इसलिए इस दिन पितरों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करना बेहद फलदायी होता है। इससे पितरों की आत्मा तृप्त होती है और उन्हें उच्च गति प्राप्त होती है। 3. काले तिल से तर्पण: यदि आप व्रत नहीं कर रहे हैं, तो भगवान विष्णु की पूजा के साथ काले तिल से तर्पण अवश्य करें। इतना करने से भी आपके पितरों को शांति मिलेगी। 4. दान-पुण्य: इस दिन पितरों के नाम से दान-पुण्य अवश्य करना चाहिए। पितृ पक्ष 2025: एक महत्वपूर्ण संदर्भ:Pitru Paksha 2025: An Important Context Indira Ekadashi: इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के दौरान मनाई जाती है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक पितृ पक्ष रहता है। इस दौरान रोजाना पितरों का तर्पण किया जाता है। इस साल पितृ पक्ष 07 सितंबर से लेकर 21 सितंबर तक है। पितरों के तर्पण और पिंडदान की पूरी विधि गरुड़ पुराण में बताई गई है। सर्व पितृ अमावस्या 2025: हर साल आश्विन अमावस्या के दिन सर्व पितृ का तर्पण किया जाता है। इस दिन ही पितर अपने लोक लौट जाते हैं। इस वर्ष 21 सितंबर को सर्व पितृ अमावस्या है।

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Sharadiya Navratri

Sharadiya Navratri 2025 Start Date: कब से शुरू हैं शारदीय नवरात्रि, पहले दिन इन मंत्रों का करें जप, माता शैलपुत्री की बरसेगी कृपा….

Sharadiya Navratri 2025 date and time:इस साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं। नवरात्रि में विधिवत 9 दिन की दुर्गा देवी की पूजा करने से सुख, धन व सौभाग्य बढ़ता है। kab se shuru hai Sharadiya Navratri 2025: हर साल पितृपक्ष समाप्त के बाद शारदीय नवरात्रि मनाई जाती है। नवरात्रि 9 दिनों का पावन पर्व है, जो मां दुर्गा देवी को समर्पित है। इस साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं। इन नौ रात्रियों एवं दस दिनों में देवी दुर्गा के 9 भिन्न-भिन्न रूपों की विधिवत आराधना की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। इस उत्सव के दसवें दिन को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है, जिसे दशहरा कहते हैं। इस साल की शारदीय नवरात्रि का समापन 2 अक्टूबर को होगा। Sharadiya Navratri नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना कर पूजा की शुरुआत होगी। आइए जानते हैं शारदीय नवरात्रि कब से शुरू हो रहे हैं- कब से शुरू हैं शारदीय नवरात्रि, जानें डेट व मुहूर्त:When does Sharadiya Navratri start, know the date and auspicious time प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – सितम्बर 22, 2025 को 01:23 ए एम बजे प्रतिपदा तिथि समाप्त – सितम्बर 23, 2025 को 02:55 ए एम बजे हिन्दू पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि का पहला दिन 22 सितंबर 2025 को है। इसी दिन कलश स्थापना की जाएगी। घटस्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि पर है। घटस्थापना मुहूर्त – 06:09 ए एम से 08:06 ए एम अवधि – 01 घण्टा 56 मिनट्स घटस्थापना अभिजित मुहूर्त – 11:49 ए एम से 12:38 पी एम अवधि – 00 घण्टे 49 मिनट्स कैसा है मां शैलपुत्री का स्वरुप:What is the nature of Mother Shailputri? Sharadiya Navratri नवरात्रि के पहले दिन पूजा जाने वाली देवी मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत शांत, सरल, सुशील और दया से पूर्ण है। मां का रूप दिव्य और आकर्षक है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प शोभायमान है, Sharadiya Navratri जो उनके अद्भुत और शक्ति से भरे स्वरूप का प्रतीक है। मां की सवाली वृषभ है । मां शैलपुत्री का तपस्वी रूप बहुत ही प्रेरणादायक है, उन्होंने घोर तपस्या की है और समस्त जीवों की रक्षिका हैं। नवरात्रि के पहले दिन का व्रत और पूजा विशेष रूप से कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है। विपत्ति के समय में मां शैलपुत्री अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और Sharadiya Navratri उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। मां शैलपुत्री साधक के मूलाधार चक्र को जागृत करने में भी सहायक होती हैं। मूलाधार चक्र हमारे शरीर का वह ऊर्जा केंद्र है, Sharadiya Navratri जो हमें स्थिरता, सुरक्षा और मानसिक शांति प्रदान करता है। इस चक्र के जागरण से जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि का प्रवाह होता है। मां शैलपुत्री पूजा विधि:Maa Shailputri puja method Sharadiya Navratri मां शैलपुत्री की पूजा विधि देवी भागवत पुराण में विस्तार से दी गई है। Sharadiya Navratri शारदीय नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा विधि इस प्रकार है:सुबह जल्दी उठें: नवरात्रि के पहले दिन पूजा का आरंभ ब्रह्म मुहूर्त में करें। Sharadiya Navratri इस समय वातावरण शुद्ध और आध्यात्मिक होता है।स्नान और शुद्ध वस्त्र पहनें: पूजा से पहले स्नान करके शुद्ध और स्वच्छ कपड़े पहनें।मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें: एक चौकी पर गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध करें और फिर उस पर मां शैलपुत्री की मूर्ति, तस्वीर या फोटो स्थापित करें।कलश स्थापना: पूरे परिवार के साथ विधिपूर्वक कलश की स्थापना करें। यह कार्य नवरात्रि पूजा का प्रमुख हिस्सा होता है।ध्यान और मंत्र जप: कलश स्थापना के बाद, मां शैलपुत्री का ध्यान मंत्र ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः, वंदे वाञ्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्, वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्, या देवी सर्वभूतेषु मां शैलपुत्री रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः जप करें। साथ ही, नवरात्रि व्रत का संकल्प लें।षोड्शोपचार पूजा विधि: मां शैलपुत्री की पूजा षोड्शोपचार विधि से करें। इसमें सभी नदियों, तीर्थों और दिशाओं का आह्वान किया जाता है।माता को फूल और कुमकुम अर्पित करें: सफेद, पीले या लाल फूल मां शैलपुत्री को अर्पित करें। साथ ही, कुमकुम का तिलक भी करें।धूप और दीप जलाएं: मां के समक्ष धूप और दीपक जलाएं। साथ ही, पांच देसी घी के दीपक भी जलाएं ताकि सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो।आरती करें: इसके बाद मां शैलपुत्री की आरती उतारें। मां की आरती करने से व्यक्ति को उनकी कृपा प्राप्त होती है।माता की कथा, दुर्गा चालिसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ: श्रीदुर्गासप्तश्लोकी Sharadiya Navratri पूजा के बाद, मां शैलपुत्री की कथा, दुर्गा चालिसा, दुर्गा स्तुति या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। Sharadiya Navratri इससे मां की आशीर्वाद प्राप्ति होती है।जयकारे लगाएं: परिवार के साथ “जय माता दी” के जयकारे लगाएं। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।भोग अर्पित करें: अंत में, मां शैलपुत्री को भोग अर्पित करें।शाम की पूजा: शाम के समय भी पूजा करें। इस समय भी मां की आरती उतारें और मंत्र जप करके ध्यान लगाएं।मां शैलपुत्री का भोग Sharadiya Navratri मां शैलपुत्री की पूजा में विशेष रूप से सफेद रंग का महत्व है, Sharadiya Navratri जो शांति और पवित्रता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए सफेद रंग की सामग्री का अर्पण करना आवश्यक होता है। मां शैलपुत्री को सफेद रंग के फूल अर्पित करें। पूजा में मां को सफेद मिठाई, जैसे खीर, खाजा, या सफेद लड्डू अर्पित करें। सफेद रंग की अन्य सामग्री जैसे दूध और दही भी अर्पण कर सकते हैंमां शैलपुत्री की पूजा से लाभ: मां शैलपुत्री का मंत्र वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम् ।कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम् ॥या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। मां शैलपुत्री व्रत कथा:Maa Shailputri fast story देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ आयोजित किया, जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया, सिवाय अपनी बेटी सती और उनके पति भगवान शिव के।सती को यज्ञ में भाग लेने की तीव्र इच्छा थी, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि शायद उन्हें जानबूझकर यज्ञ में नहीं बुलाया गया है। भगवान शिव से सती को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन सती अपनी ज़िद पर अड़ी रहीं। आखिरकार, भगवान शिव ने उन्हें

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Vishwakarma Jayanti

Vishwakarma Jayanti: विश्वकर्मा पूजा 2025: कब है भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती? जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि !

Vishwakarma Jayanti: सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा का विशेष महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का पहला वास्तुकार (आर्किटेक्ट) और शिल्पकार माना जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, इन्होंने भगवान ब्रह्मा के सातवें पुत्र के रूप में ब्रह्मांड के निर्माण में उनकी सहायता की थी। Vishwakarma Jayanti यह पर्व मुख्य रूप से कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक मजदूरों द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने औजारों और मशीनों की पूजा करके भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह त्योहार उस दिन मनाया जाता है जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है, जिसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है। आइए, जानते हैं विश्वकर्मा पूजा 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि के बारे में। Vishwakarma Jayanti 2025 date and auspicious time:विश्वकर्मा पूजा 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त विश्वकर्मा पूजा हर साल कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर करते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, विश्वकर्मा पूजा 2025 इस दिन मनाई जाएगी: विश्वकर्मा पूजा 2025 की तिथि: बुधवार, 17 सितंबर 2025 Vishwakarma Jayanti ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य देव 17 सितंबर 2025 को देर रात 01 बजकर 54 मिनट पर (कुछ स्रोतों में 01 बजकर 55 मिनट पर) सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करेंगे। सनातन धर्म में उदया तिथि का मान होता है, इसलिए 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी। Auspicious time of puja:पूजा के शुभ मुहूर्त विश्वकर्मा Vishwakarma Jayanti पूजा के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जिनमें पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। • पुण्य काल: सुबह 05 बजकर 36 मिनट से दिन में 11 बजकर 44 मिनट तक • महा पुण्य काल: सुबह 05 बजकर 36 मिनट से सुबह 07 बजकर 39 मिनट तक (अवधि: 02 घंटे 03 मिनट) • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 33 मिनट से सुबह 05 बजकर 20 मिनट तक • विजय मुहूर्त: दोपहर 02 बजकर 18 मिनट से 03 बजकर 07 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 24 मिनट से शाम 06 बजकर 47 मिनट तक • निशिता मुहूर्त: रात 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 39 मिनट तक Vishwakarma Puja 2025 Rahukaal Timings:विश्वकर्मा पूजा 2025 राहुकाल का समय Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा के दिन राहुकाल का समय दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से 01 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राहुकाल में पूजा या कोई भी शुभ कार्य करने से शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए इस समय से पहले या बाद में पूजा करना चाहिए। विश्वकर्मा पूजा पर बन रहे शुभ योग Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा के दिन शिव और परिघ योग समेत कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। परिघ योग के बाद शिव योग का संयोग बनेगा, और इसके साथ ही शिववास योग का भी निर्माण होगा। इन शुभ योगों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Significance) सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा की पूजा का विशेष महत्व है: • सृष्टि के निर्माता: भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला वास्तुकार और शिल्पकार माना जाता है। Vishwakarma Jayanti उन्होंने ब्रह्मांड के निर्माण में ब्रह्मा जी की सहायता की थी। • सुख और सौभाग्य: धार्मिक मान्यता है कि शिल्पकार विश्वकर्मा जी की पूजा करने से साधक के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। • सभी सुखों की प्राप्ति: भगवान विश्वकर्मा की कृपा से जीवन में सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। • कार्य बाधाओं से मुक्ति: उनकी आराधना करने से काम में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं। • कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा: ऐसा माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा से कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। • व्यापार में तरक्की: उनकी कृपा से कारोबार में तरक्की मिलती है। • घर-परिवार में खुशहाली: भगवान विश्वकर्मा की पूजा से घर-परिवार में खुशहाली आती है। •औजारों और मशीनों की पूजा: यह त्योहार कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक मजदूरों द्वारा अपने औजारों और मशीनों की पूजा करने के लिए मनाया जाता है, ताकि वे निर्बाध रूप से कार्य कर सकें। विश्वकर्मा पूजा 2025 पूजन विधि (Puja Vidhi) भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधिपूर्वक करने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है: 1. प्रातःकाल स्नान: पूजा करने से पहले, व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करना चाहिए। 2. सफाई: स्नान के बाद, अपने घर, कार्यस्थल, औजारों और मशीनों की अच्छी तरह से सफाई करें। 3. मूर्ति/चित्र स्थापना: एक चौकी पर भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। 4. पूजन सामग्री अर्पित करें: भगवान को फूल, धूप, दीप, चंदन, फल और प्रसाद अर्पित करें। 5. मंत्र जाप: भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद पाने के लिए उनके मंत्र ‘ॐ विश्वकर्मणे नमः’ का जाप अवश्य करें। मान्यता है कि इस मंत्र का जाप करने से पूजा का फल और अधिक बढ़ जाता है। 6. प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद, प्रसाद सभी में बांटकर स्वयं भी ग्रहण करें। निष्कर्ष Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा 2025 शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन न केवल हमारे औजारों और मशीनों के प्रति आदर भाव जगाता है, बल्कि हमें कार्य में कुशलता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने में भी मदद करता है। Vishwakarma Jayanti विधि-विधान से पूजा करके हम भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सफलता तथा खुशहाली ला सकते हैं। Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज !

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Indira Ekadashi

Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

Indira Ekadashi: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और इनमें इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi 2025) का स्थान अत्यंत पवित्र है। यह व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली यह एकमात्र एकादशी है, जो इसे पितरों के उद्धार और मोक्ष के लिए समर्पित एक खास अवसर बनाती है। Indira Ekadashi इस दिन भगवान लक्ष्मी नारायण जी की विधिवत पूजा करने और व्रत रखने से न केवल साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि पितरों को भी नरक की यातनाओं से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए, इंदिरा एकादशी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व को विस्तार से जानते हैं। इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त:Date and auspicious time of Indira Ekadashi 2025 वैदिक पंचांग के अनुसार, इंदिरा एकादशी 2025: इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि: बुधवार, 17 सितंबर 2025 एकादशी तिथि प्रारंभ: 17 सितंबर को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर (कुछ स्रोतों में 16 सितंबर 2025 को मध्य रात्रि 12:21 बजे से शुरू होने का भी उल्लेख है) एकादशी तिथि समाप्त: 17 सितंबर को देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर सनातन धर्म में उदया तिथि मान्य है, जिसके अनुसार सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसलिए, Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी 17 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी। पूजा के शुभ मुहूर्त:Auspicious time of puja • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 33 मिनट से सुबह 05 बजकर 20 मिनट तक • लाभ मुहूर्त (सुबह): सुबह 05:32 बजे से 07:04 बजे तक • अमृत मुहूर्त (सुबह): सुबह 07:04 बजे से 08:36 बजे तक • शुभ मुहूर्त (दोपहर): सुबह 10:08 बजे से 11:40 बजे तक • विजय मुहूर्त: दोपहर 02:18 बजे से दोपहर 03:07 बजे तक • लाभ मुहूर्त (शाम): शाम 04:15 बजे से 05:47 बजे तक • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:24 बजे से शाम 06:47 बजे तक (अन्य स्रोत में 05:45 बजे से 06:10 बजे तक) • चर मुहूर्त (मध्यरात्रि): रात 10:11 बजे से 11:40 बजे तक • निशिता मुहूर्त (मध्यरात्रि): रात 11:16 बजे से 12:03 बजे तक इंदिरा एकादशी पारण का समय:Time of Indira Ekadashi Paran • इंदिरा एकादशी का पारण 18 सितंबर 2025 को किया जाएगा। • पारण का शुभ मुहूर्त: सुबह 06 बजकर 07 मिनट से सुबह 08 बजकर 34 मिनट तक (अन्य स्रोत में 05:33 बजे से 07:04 बजे तक) इस दौरान साधक स्नान-ध्यान कर लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करें और अन्न व धन का दान कर व्रत खोलें। इंदिरा एकादशी का महत्व: Significance of Indira Ekadashi सनातन धर्म में Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी का खास महत्व है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और पितृ पक्ष में पड़ने के कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है। • पितरों को मोक्ष: धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से न केवल साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि उनके पितरों को भी मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। • पितृ दोष का निवारण: जिन व्यक्तियों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है, क्योंकि यह दोष को शांत करने में मदद करता है। इसे श्राद्ध एकादशी भी कहा जाता है, और इस दिन पितरों का श्राद्ध व तर्पण अत्यंत शुभ माना गया है। • पापों से मुक्ति: नारद मुनि ने राजा इंद्रसेन को बताया था कि यह व्रत न केवल पितरों को मुक्ति दिलाता है, बल्कि व्रत करने वाले के स्वयं के पापों का भी नाश करता है। • सुख-समृद्धि: मान्यता है कि इस व्रत को करने से साधक को जीवन में सुख-समृद्धि मिलती है और सभी सुखों को भोगकर वह बैकुंठ धाम को जाता है। • अश्वमेध यज्ञ के समान फल: शास्त्रों में कहा गया है कि Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। • अकाल मृत्यु से मुक्ति: मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों को भी मुक्ति मिल जाती है। इंदिरा एकादशी की पूजा विधि:Puja Vidhi of Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी Indira Ekadashi का व्रत दशमी तिथि से ही शुरू हो जाता है और द्वादशी तिथि तक चलता है। 1. दशमी तिथि के दिन: • एक समय भोजन: दशमी के दिन भक्त केवल एक समय सात्विक भोजन करते हैं। मांसाहारी भोजन, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज किया जाता है। • ब्रह्मचर्य का पालन: दशमी की रात से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। • पितृ तर्पण (वैकल्पिक): यदि संभव हो तो दशमी के दिन दोपहर में नदी या पवित्र सरोवर में पितरों के लिए तर्पण किया जा सकता है। इसमें जल और काले तिल से पितरों को अर्घ्य दिया जाता है। • घर की शुद्धि: घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें। 2. एकादशी तिथि के दिन • प्रातःकाल स्नान: सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र स्नान करें। • व्रत का संकल्प: स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु के सामने हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें। संकल्प लेते समय कहें कि “मैं इंदिरा एकादशी का व्रत अपने पितरों को मोक्ष दिलाने और अपने पापों का नाश करने के लिए कर रहा/रही हूं।” • भगवान शालिग्राम की पूजा: भगवान शालिग्राम (विष्णु का एक रूप) या भगवान विष्णु की मूर्ति/चित्र स्थापित करें। उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं। पीले वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य (फल, मिठाई) अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम या ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। • इंदिरा एकादशी व्रत कथा श्रवण: एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। • पितृ तर्पण: इस दिन दोपहर में पितरों के लिए विशेष तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। Indira Ekadashi इसमें जल, दूध, काले तिल और कुश से पितरों को तर्पण दिया जाता है। • ब्राह्मण भोजन: यदि संभव हो, तो ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दान-दक्षिणा दें। • रात्रि जागरण: रात में जागरण कर भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें और उनकी कथाएं सुनें। 3. द्वादशी तिथि के दिन (पारण) • प्रातःकाल पूजा: सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की पुनः पूजा करें। • ब्राह्मण को भोजन और दान: पारण से पहले ब्राह्मणों को भोजन कराएं

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Matra Navami

Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों को प्रसन्न करने के अचूक उपाय

Matra Navami: मातृ नवमी पितृ पक्ष के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन होता है, विशेषकर उन माताओं, बहुओं और बेटियों के लिए जिनका निधन सुहागिन के रूप में हुआ हो। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का इंतजार साल भर किया जाता है, क्योंकि यह पितरों की आत्मा की शांति के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। आइए, वर्ष 2025 में मातृ नवमी Matra Navami की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों के बारे में विस्तार से जानें ताकि आप अपने दिवंगत पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों When isMatra Navami 2025: मातृ नवमी 2025 कब है? हिंदी पंचांग के अनुसार, मातृ नवमी हर वर्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। साल 2025 में, मातृ नवमी श्राद्ध पूजा 15 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। • नवमी तिथि का प्रारम्भ: 15 सितंबर 2025 को सुबह 03 बजकर 06 मिनट पर। • नवमी तिथि की समाप्ति: 16 सितंबर 2025 को सुबह 01 बजकर 31 मिनट पर। मातृ नवमी 2025 के शुभ मुहूर्त:Auspicious time of Matra Navami 2025 श्राद्ध कर्म के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। मातृ नवमी पर आप इन शुभ मुहूर्तों में पूजा-पाठ कर सकते हैं: • अपराह्न काल पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 30 मिनट से लेकर शाम 03 बजकर 58 मिनट तक।     पूजा की कुल अवधि: 02 घण्टे 28 मिनट। • रोहिणी नक्षत्र में पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 12 बजकर 41 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 30 मिनट तक।     पूजा की कुल अवधि: 00:49 मिनट। हालांकि, यह भी मान्यता है कि मातृ नवमी का श्राद्ध दोपहर 12 बजे से पहले करना शुभ माना गया है। मातृ नवमी का महत्व:Importance of Matra Navami पितृ पक्ष में Matra Navami मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यह दिन दिवंगत माताओं, बहुओं और बेटियों का पिंडदान करने के लिए समर्पित है जिनकी मृत्यु सुहागिन के रूप में हुई थी। • आत्मा की शांति और आशीर्वाद: ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधि पूर्वक पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। • सुख-समृद्धि और सौभाग्य: मातृ नवमी का श्राद्ध करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है। जिस घर की महिला इस दिन पूजा-पाठ और व्रत रखती है, उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। दिवंगत माताओं का श्राद्ध करने से उनकी कृपा पूरे घर पर बनी रहती है। • विशेष विधान: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में सौभाग्यवती माताओं और स्त्रियों के श्राद्ध की तिथि Matra Navami मातृ नवमी को अलग से बताया गया है। पितृपक्ष में माताओं की पूजा की जाती है और माताओं तथा सुहागिन स्त्रियों के लिए श्राद्ध और तर्पण का विधान है। मातृ नवमी श्राद्ध पूजा विधि:Matra Navami Shraddha Puja Method मातृ नवमी Matra Navami पर पितरों को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए निम्नलिखित विधि से श्राद्ध कर्म करें: 1. सुबह का स्नान और संकल्प: मातृ नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत हो जाएं। स्नान आदि करने के बाद सफेद और साफ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें। 2. चौकी स्थापित करें: एक लकड़ी की चौकी को अपने घर के दक्षिण दिशा में रखें। उस चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर अपने पूर्वज मातृ पितरों की फोटो या प्रतीक के रूप में स्थापित करें। 3. तर्पण और पूजन: फोटो पर फूल माला चढ़ाएं, काले तिल का दीपक जलाएं, धूपबत्ती जलाकर इत्र आदि लगाएं। तस्वीर पर तुलसी की पत्तियां अवश्य अर्पित करें। 4. श्रीमद्भागवत गीता का पाठ: इस दिन श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 5. भोजन तैयार करें और गाय को खिलाएं: घर पर जो भी भोजन तैयार किया जाता है, उसमें से कुछ भोजन सबसे पहले गायों को खिलाना चाहिए। 6. पितरों के लिए भोजन: जिन पितरों का श्राद्ध करना है, उनके लिए भी भोजन निकालकर अपने घर के बाहर जाकर दक्षिण दिशा में साफ-सुथरी जगह पर रखें। 7. तुलसी पूजन: इस दिन घर में तुलसी के पौधे अवश्य लगाएं और उनकी पूजा-अर्चना करें। तुलसी के पास एक दीपक भी अवश्य जलाएं। 8. सूर्य देव को अर्घ्य और तर्पण: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान के बाद सूर्यदेव को जल का अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद किसी पवित्र नदी में तर्पण करना चाहिए, इससे पितृ प्रसन्न होते हैं। 9. पितरों को भोग: पितृ पक्ष के दौरान सात्विक भोजन बनाकर सबसे पहले पितरों को धूप दान करें। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें और उन्हें भोजन का भोग लगाएं। 10. पशु-पक्षियों को भोजन: मातृ नवमी के दिन बनाए गए भोजन में से कुत्ते, कौवे और गाय को खिलाएं, ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। 11. ब्राह्मणों को भोजन और दान: इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और अपनी श्रद्धा अनुसार दान-दक्षिणा देनी चाहिए। मातृ नवमी के दिन पितरों को खुश करने के खास उपाय: Special ways to please the ancestors on the day of Matra Navami पितृ पक्ष में मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यह दिन पितरों की आत्मा की शांति और उनको प्रसन्न करने का उत्तम दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों को खुश करने के लिए ये खास उपाय जरूर करें: • सुबह माता तुलसी की पूजा करें और उन्हें धूप-दीप जलाएं। • किसी भी गरीब और जरूरतमंद सुहागिन महिला को सुहाग का सामान जैसे – लाल साड़ी, कुमकुम, सिंदूर, चूड़ियां, अनाज, जूते-चप्पल आदि का दान जरूर करें। मातृ नवमी पर न करें ये भूल, वरना आ सकती है दरिद्रता:Do not make this mistake on Matra Navami , otherwise poverty may come. मातृ नवमी पर विशेष सावधानी रखनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन कुछ गलतियाँ करने से बचना चाहिए: • श्राद्ध न करना: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि सौभाग्यवती माता का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करने के बजाय नवमी तिथि को न किया जाए, तो पितृ प्रेत योनि में भटकते

Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों को प्रसन्न करने के अचूक उपाय Read More »

Surya Gochar 2025

Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज !

Surya Gochar 2025: सनातन धर्म में संक्रांति का विशेष महत्व है, और जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस दिन को संक्रांति कहा जाता है। वर्ष 2025 में, कन्या संक्रांति तब मनाई जाएगी जब सूर्य देव अपनी सिंह राशि को छोड़कर कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। यह दिन धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि इस वर्ष Surya Gochar 2025 कन्या संक्रांति के साथ ही विश्वकर्मा पूजा भी मनाई जाएगी, जिससे इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, इस दिन इंदिरा एकादशी भी मनाई जाएगी, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को और बढ़ा देती है। Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों….. कन्या संक्रांति 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त ज्योतिषियों के अनुसार, साल 2025 में कन्या संक्रांति की तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: • संक्रांति प्रवेश: 17 सितंबर 2025, देर रात 01:54 बजे • पुण्य काल: सुबह 05:36 बजे से दोपहर 11:44 बजे तक • महापुण्य काल: सुबह 05:36 बजे से 07:39 बजे तक • सूर्योदय: 05:36 AM • सूर्यास्त: 05:51 PM • ब्रह्म मुहूर्त: 04:02 से 04:49 बजे • विजय मुहूर्त: 01:46 से 02:35 PM • गोधूलि बेला: 05:51 से 06:15 PM • निशीथ काल: 11:20 से 12:07 AM कन्या संक्रांति का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति वह दिन है जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। यह घटना न केवल ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से भी विशेष मानी जाती है। कन्या राशि में सूर्य का गोचर बुद्धि, सेवा, व्यवस्था और कर्म का प्रतीक माना जाता है। यह दिन सकारात्मक ऊर्जा, आत्मशुद्धि और कर्मयोग की भावना को बढ़ाने वाला होता है। सनातन शास्त्रों के अनुसार, कन्या संक्रांति के दिन शिल्पकार विश्वकर्मा जी का अवतरण हुआ था, इसलिए हर साल कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा भी मनाई जाती है। Surya Gochar 2025 विशेष रूप से इंजीनियरिंग, तकनीकी और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह दिन अत्यंत पवित्र और फलदायक होता है। जो लोग मशीनरी, तकनीकी या कारीगरी से जुड़े हैं, Surya Gochar 2025 उनके लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। पूजन एवं दान विधि कन्या संक्रांति के शुभ अवसर पर सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने और पुण्य कमाने के लिए इन विधियों का पालन करें: • प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। • पूर्व दिशा की ओर मुख कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। • अपने पूजा स्थल और कार्यस्थल को स्वच्छ करके दीपक और पुष्प अर्पित करें। • लाल वस्त्र, तिल का तेल, घी, गुड़ आदि का दान करें। • आध्यात्मिक मंत्रों का जप करें, जैसे – “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”। • परिवार सहित सात्विक भोजन बनाएं और जरूरतमंदों में बांटें। • इस दिन क्रोध, विवाद और अहंकार से दूर रहें। सूर्य गोचर 2025: इन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज! Surya Gochar 2025 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, 17 सितंबर 2025 को सूर्य देव के सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करने से कुछ राशियों के जातकों को करियर में विशेष लाभ और मानसिक तनाव से मुक्ति मिल सकती है। आइए जानते हैं उन राशियों के बारे में: मेष राशि (Aries) सूर्य देव के राशि परिवर्तन से मेष राशि के जातकों को काफी हद तक लाभ मिलता दिख रहा है। सूर्य देव की दृष्टि षष्ठ भाव में होने से आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आपके शत्रुओं में आपका भय रहेगा, और आप कई मामलों में कठोर निर्णय ले सकते हैं। आपके भाग्य में वृद्धि होगी, लेकिन आपको धर्म पथ पर चलना होगा और माता-पिता का सम्मान करना होगा। आप न्यायप्रिय होंगे, जिससे समाज में आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। करियर और कारोबार में मनमुताबिक सफलता मिलेगी, और आप कुछ नया करने की योजना भी बना सकते हैं। धनु राशि (Sagittarius) सूर्य देव के कन्या राशि में गोचर करने से धनु राशि के जातकों को भी विशेष फायदा हो सकता है। सूर्य देव की दृष्टि आपके करियर भाव में रहेगी, जिससे आपको अनुकूल परिणाम मिल सकते हैं। Surya Gochar 2025 आपकी बुद्धि और प्रगाढ़ होगी, जिससे आप जीवन में कई सही फैसले ले पाएंगे। आपमें नेतृत्व करने की क्षमता बढ़ेगी और आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होगी, जिससे आप बड़ी सफलता पाने में सफल होंगे। पिता के साथ संबंध मधुर रहेंगे और सरकारी तंत्र से आपको सम्मान मिल सकता है। कई जातकों को सरकारी नौकरी से संबंधित कोई बड़ी खुशखबरी भी मिल सकती है। Surya Gochar 2025 आपके व्यवहार से लोग प्रभावित हो सकते हैं। माता का विशेष ख्याल रखने की सलाह दी गई है। निष्कर्ष कन्या संक्रांति 2025 एक अत्यंत शुभ और फलदायक तिथि है, खासकर जब यह विश्वकर्मा पूजा और इंदिरा एकादशी के साथ पड़ रही है। इस दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और सूर्य देव का आशीर्वाद मिलता है। यह गोचर कई राशियों के लिए करियर और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा। September 2025 Vrat Tyohar List: ये है सितंबर के व्रत की लिस्ट, जानिए कब से शुरू हो रहे हैं शारदीय नवरात्र ?

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Vrat Tyohar List

September 2025 Vrat Tyohar List: ये है सितंबर के व्रत की लिस्ट, जानिए कब से शुरू हो रहे हैं शारदीय नवरात्र ?

September 2025 Vrat Tyohar List: सितंबर के महीने में त्योहारों की भरमार है, इसी महीने में शारदीय नवरात्र भी है तो वहीं ये महीना इस बार चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण दोनों का गवाह बनेगा। यहां हम लाए हैं सितंबर माह के व्रत-त्योहारों की लिस्ट, जिसे देखकर आप अपने पूरी महीने की प्लानिंग कर सकते हैं। कालाष्टमी प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला एक हिंदू त्यौहार है जोकि भगवान शिव के ही एक रौद्र रूप भगवान भैरव को समर्पित है। प्रत्येक माह में आने के कारण यह त्यौहार एक वर्ष में कुल 12 बार, तथा अधिक मास की स्थिति में 13 बार मनाया जाता है। काल भैरव को पूजे जाने के कारण इसे काल भैरव अष्टमी अथवा भैरव अष्टमी भी कहा जाता है। September 2025 Vrat Tyohar List: सितंबर माह के व्रत-त्योहारों की लिस्ट 3 सितंबर: परिवर्तिनी एकादशी, डोल ग्यारस, जलझूलनी एकादशी 4 सितंबर: वामन जयंती, भुवनेश्वरी जयंती, कल्की द्वादशी 5 सितंबर: शुक्र प्रदोष व्रत, ओणम 6 सितंबर: गणेश विसर्जन, अनन्त चतुर्दशी 7 सितंबर: भाद्रपद पूर्णिमा व्रत, साल का दूसरा चंद्र ग्रहण, 8 सितंबर से 21 सितंबर तक: पितृपक्ष का प्रारंभ, आश्विन माह का प्रारंभ जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत, कालाष्टमी व्रत (September 2025 Vrat Tyohar List) 10 सितंबर:संकष्टी चतुर्थी 14 सितंबर: महालक्ष्मी व्रत समापन, जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत, कालाष्टमी व्रत 17 सितंबर: इंदिरा एकादशी, विश्वकर्मा पूजा, एकादशी श्राद्ध, कन्या संक्रांति 19 सितंबर: शुक्र प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, त्रयोदशी श्राद्ध 21 सितंबर : सर्वपितृ अमावस्या, आश्विन अमावस्या 22 सितंबर: शारदीय नवरात्रि प्रारंभ, कलश स्थापना, महाराजा अग्रसेन जयंती 23 सितंबर: चन्द्र दर्शन 25 सितंबर: विनायक चतुर्थी 26 सितंबर : उपांग ललिता व्रत 27 सितंबर: स्कंद षष्ठी 30 सितंबर: दुर्गा अष्टमी, महा अष्टमी, संधि पूजा, मासिक दुर्गाष्टमी पितृपक्ष (September 2025 Vrat Tyohar List) Vrat Tyohar List पितृपक्ष हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पाठ है, इसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। यह काल श्राद्ध, तर्पण और पितरों को अर्पण करने के लिए समर्पित होता है। माना जाता है कि इस समय पितृ लोक के द्वार खुल जाते हैं Vrat Tyohar List और हमारे पूर्वज धरती पर अपने वंशजों के श्राद्ध को ग्रहण करने आते हैं। पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस काल का विशेष महत्व है। इस बार श्राद्ध के दिन 8 सितंबर से 21 सितंबर तक रहेंगे। पितृपक्ष में किए जाने वाले प्रमुख कार्य तिल, कुश और जल से तर्पण करना। पिंडदान और श्राद्ध विधि के अनुसार ब्राह्मण भोजन कराना। गाय, कुत्ते, कौवे और जरूरतमंदों को भोजन कराना। गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम, और पवित्र नदी में स्नान। शारदीय नवरात्र (September 2025 Vrat Tyohar List) हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व है। साल में चार नवरात्रि आते हैं – चैत्र, आषाढ़, आश्विन (शारदीय) और माघ। इनमें से शारदीय नवरात्रि को सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से मनाया जाता है। यह उत्सव आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर नौ दिनों तक चलता है और विजयादशमी के दिन इसका समापन होता है। शारदीय नवरात्रि को दुर्गा पूजा और दशहरा पर्व से भी जोड़ा जाता है। इस बार आदिशक्ति के पावन दिन 22 सितंबर से 2 अक्टूबर तक रहेंगे।

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Pitru Paksha

Pitru Paksha 2025 Date: पितृ पक्ष जानें क्या करें और क्या न करें, ताकि पितर रहें प्रसन्न और घर में आए सुख-समृद्धि !

Pitru Paksha 2025: सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। इसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है और यह अवधि हमारे पूर्वजों को समर्पित होती है। साल में ये 15 दिन पितरों के लिए होते हैं। मान्यता है कि इन दिनों हमारे पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने परिवार को आशीर्वाद देते हैं। अयोध्या के ज्योतिष पंडित कल्कि राम बताते हैं कि Pitru Paksha पितृपक्ष में पितरों के निमित्त श्राद्ध करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे खुश होकर अपने वंशज को आशीर्वाद भी देते हैं। अगर पितृपक्ष के दौरान कुछ बातों का ध्यान न रखा जाए, तो पूर्वज नाराज़ हो सकते हैं, जिससे घर में कई तरह की परेशानियां आ सकती हैं। ये परेशानियां शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से नज़र आ सकती हैं। आइए जानते हैं Pitru Paksha पितृ पक्ष 2025 कब से शुरू हो रहा है, क्या करना चाहिए और किन गलतियों से बचना चाहिए। पितृ पक्ष 2025 कब से शुरू हो रहा है?(When does Pitru Paksha 2025 start) Pitru Paksha: हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि को हो रही है। 7 सितंबर को रात 1:41 बजे पूर्णिमा तिथि का आरंभ होगा और इसका समापन 21 सितंबर को अमावस्या तिथि के दिन होगा। यह भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तिथि तक चलता है। पितृ पक्ष में क्या करना चाहिए? (Pitru Paksha mein kya karna chahiye) पितृपक्ष Pitru Paksha में पितरों की कृपा प्राप्त करने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ विशेष कार्य करने चाहिए: 1. श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान: पितृपक्ष के दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। अयोध्या के ज्योतिष पंडित कल्कि राम के अनुसार, इससे पितरों को मोक्ष मिलता है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। 2. दान-पुण्य: इस दौरान दान-पुण्य का विशेष विधान है। दान-पुण्य और तर्पण करने से परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है और सभी तरह के कष्ट दूर होते हैं।     ब्राह्मणों को भोजन: श्राद्ध के दिन किसी ब्राह्मण को घर पर बुलाकर भोजन कराना चाहिए। भोजन के बाद उन्हें अपनी समर्थ अनुसार दक्षिणा दें और उनकी पूजा-अर्चना करें। ऐसा करना बेहद शुभ माना जाता है।     गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद: गरीब और जरूरतमंद लोगों को अपनी समर्थ अनुसार दान देना चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए।     पक्षियों को दाना-पानी: पितृपक्ष के दौरान पक्षियों को कुछ दान देना भी बहुत शुभ माना जाता है। 3. दैनिक अनुष्ठान: प्रतिदिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना चाहिए। दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके जल में काला तिल डालकर तर्पण करना चाहिए। 4. सात्विक जीवन: पितृपक्ष के 15 दिनों तक घर में सात्विक भोजन ही करना चाहिए। इस दौरान घर में साफ-सफाई रखें और मन को पवित्र रखें। 5. पितृ दोष से मुक्ति: मान्यता है कि इस दौरान पितरों से जुड़े अनुष्ठान करने से पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है। पितृ पक्ष में भूलकर भी न करें ये काम! (Pitru Paksha mein kya na karein) पितृपक्ष में कुछ ऐसे काम हैं जो बिल्कुल भी नहीं किए जाने चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से पूर्वज नाराज़ हो सकते हैं और घर पर बुरा असर पड़ सकता है: 1. तामसिक भोजन और मदिरा सेवन: लहसुन, प्याज और मांसाहार से पूरी तरह बचना चाहिए। पितृपक्ष के दौरान इन चीजों का सेवन और मदिरापान वर्जित माना जाता है। 2. मांगलिक कार्य: पितृपक्ष के दौरान जनेऊ, शादी-विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश इत्यादि जैसे कोई भी मांगलिक कार्य बिल्कुल भी नहीं करने चाहिए। इसका बुरा प्रभाव झेलना पड़ सकता है. 3. नया निर्माण या खरीदारी: अगर आपने कहीं ज़मीन ली हो और नए घर का निर्माण करना चाह रहे हैं, तो पितृपक्ष में बिल्कुल भी शुरुआत न करें। नया घर, प्रॉपर्टी या नया वाहन भी बिल्कुल भी न खरीदें, इससे पितर नाराज़ हो सकते हैं। 4. पशु-पक्षियों को भूखा न लौटाएं: अगर पितृपक्ष के दौरान आपके घर की चौखट पर गाय, काला कुत्ता या काला कौवा आ जाए तो उन्हें भूखे बिल्कुल भी न लौटाएं। ऐसा करने से पितर नाराज़ हो सकते हैं। 5. केश और नख कर्तन: पितृपक्ष में दाढ़ी, मूंछ, बाल और नाखून नहीं काटना चाहिए। यह अशुभ माना जाता है। ऐसा करने से पितर नाराज़ हो जाते हैं। 6. जमीन में उगने वाली सब्जियां: पितृपक्ष में जमीन में उगने वाली सब्जियां जैसे आलू, बैंगन, खीरा, मूली, अरबी, साग ये सब नहीं खाना चाहिए। निष्कर्ष इन नियमों और सावधानियों का पालन करके आप पितृपक्ष के दौरान अपने पूर्वजों को प्रसन्न कर सकते हैं। इससे आपको पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होगा और घर में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली बनी रहेगी। इन दिनों श्रद्धा और विश्वास के साथ पितरों का स्मरण करना अत्यंत ज़रूरी है अनंत चतुर्दशी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और गणेश विसर्जन का सम्पूर्ण ज्ञान

Pitru Paksha 2025 Date: पितृ पक्ष जानें क्या करें और क्या न करें, ताकि पितर रहें प्रसन्न और घर में आए सुख-समृद्धि ! Read More »

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Pitru Paksha 2025: पितृ पक्ष कब से शुरू होगा पितृपक्ष? जानें सही तिथि, महत्व और श्राद्ध के नियम

Pitru Paksha 2025: हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। यह वह समय है जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनका सम्मान करते हैं, और उनकी आत्मा की शांति के लिए विभिन्न अनुष्ठान करते हैं। पितृ पक्ष Pitru Paksha के दौरान पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने का विधान है। यह माना जाता है कि ऐसा करने से पितरों को शांति मिलती है और उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम पितृ पक्ष 2025 की सही तिथियों, इसके महत्व और पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए किए जाने वाले महत्वपूर्ण उपायों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। पितृ पक्ष 2025 कब है? (Pitru Paksha 2025 Date) हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष Pitru Paksha की शुरुआत मानी जाती है और इसका समापन आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर होता है। इस साल पितृ पक्ष Pitru Paksha की शुरुआत कब होगी, इसे लेकर थोड़ी भ्रम की स्थिति हो सकती है, लेकिन पंचांग के अनुसार सही तिथियां इस प्रकार हैं: पितृ पक्ष 2025 की शुरुआत: वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि 07 सितंबर को देर रात 01 बजकर 41 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 07 सितंबर को ही रात 11 बजकर 38 मिनट पर होगा। ऐसे में रविवार, 07 सितंबर 2025 के दिन से ही पितृ पक्ष की शुरुआत होने जा रही है। पितृ पक्ष 2025 का समापन: पितृ पक्ष का समापन सर्व पितृ अमावस्या यानी 21 सितंबर 2025 को होगा। इस प्रकार, पितृ पक्ष Pitru Paksha के ये 15 दिन पूर्वजों को समर्पित होते हैं, जो भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलते हैं। पितृ पक्ष का महत्व (Significance of Pitru Paksha) पितृ पक्ष Pitru Paksha हिंदू धर्म में बेहद शुभ और महत्वपूर्ण अवधि मानी जाती है। इसका महत्व कई कारणों से है: पूर्वजों को शांति और मोक्ष: यह माना जाता है कि पितृ पक्ष Pitru Paksha में पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और परिवार को आशीर्वाद देते हैं। इस दौरान किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है। पितृ दोष से मुक्ति: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में पितरों से जुड़े अनुष्ठान करने से कुंडली से पितृ दोष समाप्त होता है। सुख-समृद्धि और खुशहाली: पितरों के प्रसन्न होने पर जीवन में खुशहाली और धन-दौलत आती है। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है और सभी तरह के कष्ट दूर होते हैं। देव तुल्य पूर्वज: हिंदू धर्म में पितरों को देव तुल्य माना गया है; उन्हें प्रसन्न रखना बहुत जरूरी होता है। यदि पितर नाराज हो जाएं, तो व्यक्ति का जीवन मुश्किलों से भर जाता है। पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए करें ये उपाय (Upay for Pitru Paksha) पितृ पक्ष के दौरान पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष उपाय और अनुष्ठान किए जाते हैं: 1. रोजाना जल अर्पित करें (तर्पण): जिनके माता-पिता जीवित हैं, उनके लिए तर्पण का नियम लागू नहीं होता है। वे रोज सुबह पितरों और इष्टदेवों का ध्यान करते हुए सूर्यदेव को जल अर्पित करें। जिनके माता-पिता जीवित नहीं हैं या दोनों में से एक नहीं है, वे हर रोज पितृ पक्ष Pitru Paksha में दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके तर्पण करें। तर्पण हमेशा जल में दूध और तिल मिलाकर करना चाहिए। स्नान करने के बाद, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काला तिल मिलाकर तर्पण करना शुभ माना जाता है। 2. गौ माता की सेवा: पितृ पक्ष में रोजाना गाय को चारा या भोजन बनाते समय पहली रोटी गाय को खिलाएं। ऐसा करने से देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रों में बताया गया है कि पितृ पक्ष में पूरी भावना के साथ गाय को चारा खिलाने से श्राद्धकर्म का पूरा फल मिलता है और पितर भी तृप्त होते हैं। 3. इस दिशा में जलाएं दीपक: पितृ पक्ष Pitru Paksha में हर रोज सुबह-शाम पितरों के नाम से एक दीप दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके जलाना चाहिए। मान्यता है कि पितृ पक्ष में दक्षिण दिशा से ही पितर पृथ्वी लोक पर अपने रिश्तेदारों के यहां आते हैं। जिस दिन पितरों का श्राद्ध कर्म कर रहे हों, उस दिन दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों का आह्वान करते हैं। 4. ब्राह्मणों को भोजन कराएं: श्राद्ध के दिन किसी ब्राह्मण को घर पर बुलाकर भोजन कराना शुभ माना जाता है। भोजन में खीर, पूड़ी और उनकी पसंद की अन्य चीजें शामिल करनी चाहिए। 5. जरूरतमंदों को दान दें: श्राद्ध के बाद जरूरतमंदों को अपनी क्षमतानुसार दान देना चाहिए। 6. सात्विक भोजन और पवित्रता: पितृ पक्ष के 15 दिनों तक घर में सात्विक भोजन ही बनाना चाहिए। लहसुन, प्याज और मांसाहार का सेवन पूरी तरह से वर्जित माना गया है। इस दौरान घर और मन दोनों को साफ और पवित्र रखना चाहिए। पितृ पक्ष में श्राद्ध की महत्वपूर्ण तिथियां (Important Shradh Dates in Pitru Paksha 2025) पितृ पक्ष की सभी तिथियों का अपना महत्व है, क्योंकि हर तिथि पर किसी न किसी के पितर की मृत्यु हुई होती है और वे उनके लिए श्राद्ध और तर्पण करते हैं। कुछ तिथियां विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं: पूर्णिमा श्राद्ध (7 सितंबर): इस दिन उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुई हो। प्रतिपदा श्राद्ध (8 सितंबर): इस दिन उन पितरों का तर्पण, पिंडदान, दान, श्राद्ध आदि होता है, जिनका किसी भी माह की प्रतिपदा तिथि को निधन हुआ होता है। द्वितीय श्राद्ध (9 सितंबर): जिन पितरों की मृत्यु किसी भी महीने के दूसरे दिन (द्वितीया) हुई हो उनका श्राद्ध पितृपक्ष की द्वितीया तिथि पर किया जाता है। तृतीया श्राद्ध (10 सितंबर): जिनकी मृत्यु तृतीया तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध तृतीया को किया जाता है। चतुर्थी श्राद्ध (10 सितंबर): अगर किसी के पिताजी की मृत्यु चतुर्थी को हुई हो तो उनका श्राद्ध भी उसी तिथि को किया जाता है। पंचमी या महाभरणी श्राद्ध (11 सितंबर): इस दिन अविवाहित पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु पंचमी तिथि पर हुई हो। भरणी नक्षत्र होने पर श्राद्ध का महत्व और भी

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