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Papankusha Ekadashi

Papankusha Ekadashi 2025: पापांकुशा एकादशी व्रत में करें इन चीजों का सेवन, पापों से मिलेगा छुटकारा

Papankusha Ekadashi 2025: पंचांग के अनुसार आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी व्रत (Papankusha Ekadashi 2025) एकादशी व्रत को अधिक शुभ माना जाता है। व्रत (Papankusha Ekadashi 2025 Vrat Niyam) के दौरान चावल और अन्न का सेवन वर्जित है। इससे भगवान विष्णु जी नाराज हो सकते हैं। आइए जानते हैं एकादशी में किन चीजों का सेवन कर सकते हैं। सनातन धर्म में जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी का विशेष महत्व है। एकादशी व्रत हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर किया जाता है। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पापांकुशा एकादशी (Ekadashi Vrat Kab Hai) के नाम से जाना जाता है। इस दिन जीवन में सभी तरह के सुखों की प्राप्ति के लिए व्रत भी किया जाता है। साथ ही भगवान विष्णु की पूजा करने से साधक को सभी पापों से छुटकारा मिलता है। व्रत के दौरान खानपान के नियम का पालन जरूर करना चाहिए। माना जाता है कि नियम का पालन न करने से साधक शुभ फल की प्राप्ति से वंचित रहता है और जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में आइए जानते हैं पापंकुशा एकादशी व्रत (Papankusha Ekadashi Vrat Me kya khayen) में क्या खाएं और क्या न खाएं? Papankusha Ekadashi 2025: पापांकुशा एकादशी व्रत में करें इन चीजों का सेवन पापों से मिलेगा छुटकारा एकादशी व्रत में करें इन चीजों का सेवन:Consume these things during Ekadashi fast पापांकुशा एकादशी व्रत में दही, दूध, फल का सेवन किया जा सकता है। इसके अलावा आलू साबूदाने की सब्जी, कुट्टू के आटे की रोटी, मिठाई और पंचामृत भी भोग थाली में शामिल कर सकते हैं। जरूर लगाएं भोग:Please enjoy एक बात का विशेष ध्यान रखें कि इन चीजों का सेवन करने से पहले प्रभु को भोग जरूर लगाएं। साथ ही तुलसी दल को शामिल करें, लेकिन एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते भूलकर भी न तोड़ें। मान्यता है कि एकादशी का धन की देवी मां लक्ष्मी व्रत करती हैं। ऐसे में तुलसी के पत्ते तोड़ने से उनका व्रत खंडित हो सकता है। इसलिए एकादशी से एक दिन पहले ही तुलसी के पत्ते तोड़कर रख लें। न करें इन चीजों का सेवन:Do not consume these things यदि आप पापांकुशा एकादशी व्रत में व्रत रख रहे हैं, तो खानपान का विशेष ध्यान रखें। व्रत के दौरान अन्न और चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा मांस-मदिरा और तामसिक चीजों के सेवन से भी दूर रहना चाहिए। साथ ही भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस मंत्र का करें जप:Chant this mantra भोग लगाते समय निम्न मंत्र का जप करें। मान्यता है कि मंत्र के जप के बिना प्रभु भोग स्वीकार नहीं करते हैं। त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ।।

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Papankusha Ekadashi 2025

Papankusha Ekadashi 2025 Date And Time: कब मनाई जाएगी इस साल पापांकुशा एकादशी? नोट कर लें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Papankusha Ekadashi 2025 Date: पापांकुशा एकादशी, जिसे पुण्य व्रत या शरीर एकादशी भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में विशेष स्थान रखती है। यह एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन भक्त अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। पापांकुशा एकादशी का व्रत आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। Papankusha Ekadashi 2025 Kab Hai: सनातन धर्म में आश्विन माह का विशेष महत्व है. यह महीना मां दुर्गे की आराधना का है. देवी मां दुर्गा व उनके नौ रूपों की विधि विधान से पूजा कर भक्त उनका आशीर्वाद पाता है. वहीं नवरात्रि और दशमी तिथि के बाद हर साल आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर पापांकुशा एकादशी व्रत रखने का विधान है. Papankusha Ekadashi 2025 पापांकुशा एकादशी का व्रत का संकल्प करने से व्रती के सभी दुख दूर होते हैं और जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है. लक्ष्मी नारायण की विशेष कृपा पाने के लिए इस दिन भक्त पूरे विधि विधान से शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं. पापांकुशा एकादशी 2025 (Papankusha Ekadashi 2025) Papankusha Ekadashi 2025: वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल एकादशी तिथि 02 अक्टूबर की शाम को 07:10 बजे मिनट पर शुरू हो रही है और 03 अक्टूबर को शाम 06:32 पर तिथि का समापन हो रहा है. इस तरह उदयातिथि में 03 अक्टूबर को पापांकुशा एकादशी व्रत रखा जाएगा. 3 अक्टूबर को ही भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाएगी. वहीं पापांकुशा एकादशी पारण शुभ मुहूर्त में सुबह 06:15 बजे से लेकर 08:37 के बीच किया जा सकेगा. पापांकुशा एकादशी 2025 पर महत्वपूर्ण समय Papankusha Ekadashi Important Time सूर्योदय 03 अक्टूबर, 2025 सुबह 6:23 बजे सूर्यास्त 3 अक्टूबर, 2025 शाम 6:08 बजे एकादशी तिथि प्रारंभ 2 अक्टूबर, 2025 शाम 7:11 बजे एकादशी तिथि समाप्त 03 अक्टूबर, 2025 शाम 6:33 बजे हरि वासरा अंतिम क्षण 04 अक्टूबर, 2025 12:12 पूर्वाह्न द्वादशी समाप्ति क्षण 04 अक्टूबर, 2025 शाम 5:09 बजे पारणा समय 4 अक्टूबर, सुबह 6:23 – 4 अक्टूबर, सुबह 8:44 पापांकुशा एकादशी का महत्व (Papankusha Ekadashi Ka Mahatav) पापांकुशा एकादशी व्रत कथा (Papankusha Ekadashi Vrat Katha) Papankusha Ekadashi 2025 प्राचीन काल में देवों और असुरों के बीच एक महान युद्ध हुआ था। इस युद्ध में देवता हारे और वे पृथ्वी पर आने लगे। असुरों ने देवताओं की स्त्री रूपिणी शक्ति को बंदी बना लिया। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और पपांकुशा एकादशी के दिन देवताओं की स्त्री रूपिणी शक्ति को मुक्त किया। व्रत के प्रभाव से देवता और असुर दोनों का कल्याण हुआ और पापों का नाश हुआ। Papankusha Ekadashi 2025 इस दिन की विशेषता यह है कि यह व्रत पापों को समाप्त करने के लिए बहुत प्रभावी माना जाता है। पापांकुशा एकादशी व्रत विधि (Papankusha Ekadashi Vrat Vidhi) पापांकुशा एकादशी के लाभ (Papankusha Ekadashi Ke Labh) पापांकुशा एकादशी का संदेश (Papankusha Ekadashi 2025 Ka Sandesh) Papankusha Ekadashi 2025: पापांकुशा एकादशी हमें यह सिखाती है कि जीवन में पापों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है भगवान विष्णु की भक्ति और सच्ची श्रद्धा। इस व्रत से व्यक्ति अपने पापों को समाप्त करके मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। यह व्रत आत्मा की शुद्धि और जीवन की सही दिशा में चलने की प्रेरणा देता है Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

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Maa Kushmanda

Maa Kushmanda Worship Mantra:नवरात्रि का चौथा दिन: पढ़ें मां कूष्मांडा की पूजन विधि, श्लोक, मंत्र एवं भोग

Maa Kushmanda:हर साल चैत्र नवरात्रि के नौ पावन दिन हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखते हैं. इन दिनों में मां भवानी के विभिन्न रूपों की आराधना करने से भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन की तमाम बाधाएँ और परेशानियाँ दूर होती हैं. नवरात्रि का चौथा दिन विशेष रूप से मां दुर्गा के चौथे स्वरूप, मां कुष्मांडा को समर्पित है. ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा करने से व्यक्ति को अपार धन, शौर्य, सुख-समृद्धि, शक्ति और बुद्धि की प्राप्ति होती है, साथ ही सभी रोग, कष्ट और शोक भी समाप्त हो जाते हैं. Who is Maa Kushmanda:कौन हैं मां कुष्मांडा भगवती पुराण के अनुसार, देवी कुष्मांडा Maa Kushmanda अष्टभुजाओं वाली हैं. उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जप माला सुशोभित हैं. वह सिंह की सवारी करती हैं, और उनका यह स्वरूप शक्ति, समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है. अपनी मंद और हल्की हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण ही इन्हें कूष्मांडा देवी के रूप में पूजा जाता है. संस्कृत में कूष्मांडा का अर्थ ‘कुम्हड़ा’ होता है, और बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है. देवी कूष्मांडा योग-ध्यान की देवी भी हैं और अन्नपूर्णा का स्वरूप हैं, जो उदराग्नि को शांत करती हैं. मां कुष्मांडा की पूजा विधि (Maa Kushmanda Puja Vidhi) चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन Maa Kushmanda मां कुष्मांडा की पूजा के लिए इन चरणों का पालन करें: 1. स्नान और साज-सज्जा: सुबह उठकर स्नान करें और मंदिर की साफ-सफाई तथा साज-सज्जा करें. 2. ध्यान: मां कुष्मांडा का ध्यान करें और कलश की पूजा कर उन्हें नमन करें. 3. आसन: इस दिन पूजा में बैठने के लिए हरे रंग के आसन का प्रयोग करना बेहतर होता है. 4. अर्पण: श्रद्धापूर्वक कुमकुम, मौली (कलावा), अक्षत (चावल), लाल रंग के फूल, फल, पान के पत्ते, केसर और श्रृंगार का सामान मां को अर्पित करें. 5. कुम्हड़ा: यदि संभव हो, तो सफेद कुम्हड़ा या उसके फूल माता रानी को अर्पित करें, क्योंकि कुम्हड़ा मां को बहुत प्रिय है. 6. दुर्गा चालीसा पाठ: इसके बाद दुर्गा चालीसा का पाठ करें. 7. आरती: अंत में घी के दीप या कपूर से मां कुष्मांडा की आरती करें. 8. स्वास्थ्य की कामना: मां कुष्मांडा को जल-पुष्प अर्पित करते हुए निवेदन करें कि उनके आशीर्वाद से आपका और आपके स्वजनों का स्वास्थ्य अच्छा रहे. यदि घर में कोई लंबे समय से बीमार है, तो उनके अच्छे स्वास्थ्य की विशेष कामना करें. 9. प्रणाम और प्रसाद वितरण: पूजा के बाद अपने से बड़ों को प्रणाम करें और प्रसाद वितरित करें. मां कुष्मांडा का भोग (Maa Kushmanda Bhog) मां कुष्मांडा को कुम्हड़ा (पेठा) सबसे प्रिय है. इसलिए इनकी पूजा में पेठे का भोग लगाना चाहिए. आप पेठे की मिठाई भी मां कुष्मांडा को अर्पित कर सकते हैं. इसके अतिरिक्त, हलवा, मीठा दही या मालपुए का प्रसाद भी चढ़ाना शुभ माना जाता है. पूजा के बाद इस प्रसाद को स्वयं भी ग्रहण करें और लोगों में भी वितरित करें. मालपुए का भोग लगाकर दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को प्रसाद देने से ज्ञान की प्राप्ति होती है, बुद्धि और कौशल का विकास होता है, और हर प्रकार का विघ्न दूर होता है. मां कुष्मांडा के पूजा मंत्र (Maa Kushmanda Puja Mantra) मां कुष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए आप इन मंत्रों का जाप कर सकते हैं: • सरल मंत्र: ‘ॐ कूष्माण्डायै नम:।।’ • पूजा मंत्र: ‘सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते। भयेभ्य्स्त्राहि नो देवि कूष्माण्डेति मनोस्तुते।।’ • प्रार्थना मंत्र: ‘सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥’ • स्तुति मंत्र: ‘या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥’     ◦ अर्थ: हे मां! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे मां, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें. • बीज मंत्र: ‘ऐं ह्री देव्यै नम:’ • उपासना मंत्र: ‘वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥’ मां कुष्मांडा की आरती (Maa Kushmanda Aarti) कूष्मांडा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥ पिगंला ज्वालामुखी निराली। शाकंबरी मां भोली भाली॥ लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥ भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥ सबकी सुनती हो जगदम्बे। सुख पहुंचती हो मां अम्बे॥ तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥ मां के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥ तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो मां संकट मेरा॥ मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो॥ तेरा दास तुझे ही ध्याए। भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥ मां कुष्मांडा पूजा के लाभ (Maa Kushmanda Puja Benefits) मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं: • सुख-समृद्धि और सुरक्षा: परिवार में सुख-समृद्धि आती है और मां संकटों से रक्षा करती हैं. • इच्छित वर और सौभाग्य: अविवाहित लड़कियों को मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है, और सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मिलता है. • रोग-शोक से मुक्ति: देवी कुष्मांडा अपने भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करती हैं. • आयु, यश, बल और बुद्धि: मां भक्तों को लंबी आयु, यश, बल (ताकत) और बुद्धि प्रदान करती हैं. इस प्रकार, चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की विधि-विधान से पूजा कर आप उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख-शांति ला सकते हैं. Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की कैसे करें पूजा, पढ़ें मंत्र, विधि और प्रसाद

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Ayudha Puja

Ayudha Puja 2025 Date: आयुध पूजा 2025: तिथि, महत्व और शुभ मुहूर्त – अपनी रोज़मर्रा की चीज़ों का करें सम्मान

Ayudha Puja 2025 Date And Time: आयुध पूजा, जिसे शस्त्र पूजा या अस्त्र पूजा के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो हमारे दैनिक जीवन और पेशेवर कार्यों में उपयोग होने वाले उपकरणों, औजारों और हथियारों का सम्मान करता है। यह आभार व्यक्त करने का एक सुंदर तरीका है। हर साल नवरात्रि के नौवें दिन, जिसे महा नवमी के रूप में मनाया जाता है, इस त्योहार को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। Ayudha Puja 2025 Date: आयुध पूजा 2025 कब है? साल 2025 में Ayudha Puja आयुध पूजा बुधवार, 01 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। यह तिथि महा नवमी के साथ पड़ती है। तिथि प्रारंभ: नवमी तिथि 30 सितंबर को शाम 06:06 बजे शुरू होगी। तिथि समाप्त: 01 अक्टूबर को शाम 07:01 बजे समाप्त होगी। आयुध पूजा विजय मुहूर्त: दोपहर 02:28 बजे से दोपहर 03:16 बजे तक रहेगा। Ayudha Puja:आयुध पूजा का महत्व यह त्योहार भारतीय संस्कृति में कई कारणों से विशेष महत्व रखता है: 1. आध्यात्मिक श्रद्धा: ऐसी मान्यता है कि जो कुछ भी हमें अपने कर्तव्यों में सहायता करता है, Ayudha Puja वह पूजा के योग्य है। औजारों को दिव्य ऊर्जा का विस्तार माना जाता है। 2. बुराई पर अच्छाई की जीत: यह त्योहार देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर पर और महाभारत में अर्जुन द्वारा अपने शस्त्रों को पुनः प्राप्त करने की विजय का प्रतीक है। 3. आधुनिक अनुकूलन: किसान के हल से लेकर मैकेनिक के रिंच, छात्र की किताबों से लेकर लैपटॉप और वाहनों तक – आज, तकनीकी उपकरण भी इस दिन पूजे जाते हैं। 4. सांस्कृतिक एकता: यह त्योहार सभी समुदायों में कौशल, श्रम और शिल्प कौशल के प्रति गहरी सराहना पैदा करता है। 5. कृतज्ञता और विनम्रता: यह हमें ज़मीन से जुड़े रहने की याद दिलाता है, उन वस्तुओं और व्यवसायों का सम्मान करता है जो हमारे जीवन को कार्यात्मक और सफल बनाते हैं। History and Mythology of Ayudha Puja: आयुध पूजा का इतिहास और पौराणिक कथाएँ आयुध पूजा की जड़ें प्राचीन हिंदू महाकाव्यों और पौराणिक कथाओं में गहराई से निहित हैं। महाभारत से संबंध: महाभारत के अनुसार, अपने वनवास के दौरान, अर्जुन ने अपने हथियारों को एक शमी के पेड़ में छिपा दिया था। विजयदशमी के दिन, अपना वनवास पूरा करने के बाद, उन्होंने उन्हें वापस प्राप्त किया और युद्ध में जाने से पहले उनकी पूजा की – और विजयी हुए। हथियारों के प्रति यह श्रद्धा प्रतीकात्मक हो गई और आयुध पूजा के रूप में विकसित हुई। देवी दुर्गा की विजय: एक और मजबूत संबंध नवरात्रि की कथा से आता है, जहाँ देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर को हराया था। Ayudha Puja अपनी जीत के बाद, उन्होंने अपने हथियार रख दिए, जिनकी देवताओं द्वारा पूजा की गई। इस कार्य से शक्ति और कार्य के उपकरणों की पूजा करने की प्रथा का उदय हुआ। शाही परंपरा: मैसूर के वोडेयार शासकों ने अपनी नवरात्रि उत्सवों के दौरान आयुध पूजा को संस्थागत रूप दिया था, Ayudha puja festival in india जहाँ विजय प्राप्त करने से पहले हथियारों को पवित्र किया जाता था। समय के साथ, आयुध पूजा युद्ध के औजारों की पूजा से हटकर किसी भी उपकरण या साधन के व्यापक, प्रतीकात्मक उत्सव में बदल गई जो किसी के पेशे या शिक्षा का समर्थन करता है। Ayudha puja festival in india:भारत में आयुध पूजा का उत्सव यह त्योहार विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों जैसे कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे अन्य क्षेत्रों में भी यह मनाया जाता है। दक्षिण भारत: यहाँ लोग अपने घरों में, कार्यालयों में, कारखानों में और वाहनों की विशेष पूजा करते हैं। छात्र अपनी किताबें देवी सरस्वती की मूर्ति के पास रखकर पढ़ाई से परहेज करते हैं। उत्तरी और पश्चिमी भारत: इन क्षेत्रों में इसे शस्त्र पूजा के रूप में भी जाना जाता है और कुछ जगहों पर यह प्रतिबंधित अवकाश के रूप में मनाया जा सकता है। दुर्गा पूजा और दशहरा से संबंध: आयुध पूजा, दुर्गा पूजा और दशहरा आपस में जुड़े हुए हैं और अक्सर हिंदू चंद्र कैलेंडर के एक ही सप्ताह में, विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान पड़ते हैं। आयुध पूजा महा नवमी (नौवें दिन) पर होती है, जबकि दशहरा (विजयदशमी) दसवें दिन मनाया जाता है। आयुध पूजा की रस्में और परंपराएँ आयुध पूजा में हमारे दैनिक जीवन को उत्पादक और उद्देश्यपूर्ण बनाने वाले औजारों को धन्यवाद देना शामिल है। पूजा से पहले की तैयारियाँ:     स्वच्छता: औजारों, मशीनों, किताबों और वाहनों को अच्छी तरह से साफ और पॉलिश किया जाता है।     सजावट: वस्तुओं को हल्दी, कुमकुम, चंदन का पेस्ट, गेंदे के फूल, आम के पत्ते और केले के तनों से सजाया जाता है।      व्यवस्थित प्रदर्शन: उपकरणों को अक्सर एक वेदी या मंच पर व्यवस्थित किया जाता है, Ayudha Puja कभी-कभी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की मूर्तियों या तस्वीरों के साथ। मुख्य दिन की पूजा (महा नवमी):     स्नान: भक्तगण स्नान करते हैं और साफ कपड़े पहनते हैं।     वेदी स्थापित करना: देवताओं की छवियों के साथ एक सजाया हुआ क्षेत्र स्थापित किया जाता है, खासकर देवी सरस्वती (ज्ञान के लिए), देवी लक्ष्मी (धन के लिए), और देवी दुर्गा या पार्वती (शक्ति के लिए)।     प्रसाद: नारियल, पान के पत्ते और सुपारी, फल और मिठाई, अगरबत्ती और दीये, पारंपरिक भोजन जैसे पायसम, वड़ा या सुंदर (क्षेत्रीय भिन्नताएँ) चढ़ाए जाते हैं।     पूजा प्रदर्शन: आरती भक्ति के साथ की जाती है। पूजा के दिन औजारों को छुआ या इस्तेमाल नहीं किया जाता है।     वाहन पूजा: वाहनों को धोया जाता है, फूलों और केले के पत्तों से सजाया जाता है, और पहियों के नीचे नींबू रखकर प्रतीकात्मक रूप से नकारात्मकता को दूर करने के लिए कुचला जाता है।    किताबों और वाद्ययंत्रों की पूजा: विशेष रूप से दक्षिण भारत में, छात्र अपनी नोटबुक, पेन और वाद्ययंत्र सरस्वती की मूर्ति के पास रखते हैं और पढ़ाई से बचते हैं, यह मानते हुए कि देवी का आशीर्वाद अकादमिक और कला में सफलता लाता है। आयुध पूजा पर अवकाश Ayudha Puja आयुध पूजा 2025 बुधवार, 01 अक्टूबर को मनाई जाएगी। यह भारत में राष्ट्रीय अवकाश नहीं है। हालाँकि, यह तमिलनाडु, कर्नाटक, और आंध्र प्रदेश जैसे कई दक्षिणी राज्यों में बैंक अवकाश या सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाया

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Dussehra 2025

Dussehra 2025 Date And Time: दशहरा 2025: कब है विजयादशमी? जानें तिथि, रावण दहन और शस्त्र पूजन का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व !

Dussehra 2025 Date: दशहरा, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। हर साल अश्विन माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार, हमें भगवान राम की रावण पर विजय और मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के संहार की याद दिलाता है। आइए जानते हैं कि साल 2025 में दशहरा कब है और इससे जुड़े शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व क्या हैं। Dussehra 2025 kis din hai: दशहरा या विजयादशमी का पर्व अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा मनाया जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंकपति रावण का वध किया था। यही कारण है कि इस त्योहार को विजयादशमी भी कहा जाता है। इस दिन रावण, मेघनाद व कुंभकर्ण के पुतलों का प्रदोष काल में दहन भी किया जाता है। जानें इस बार दशहरा कब है व रावण दहन का शुभ मुहूर्त। When is Dussehra 2025: दशहरा 2025 कब है? ज्योतिष पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 01 अक्टूबर 2025 को शाम 07 बजकर 01 मिनट पर शुरू होगी (एक स्रोत के अनुसार 07 बजकर 02 मिनट) और इसका अंत 02 अक्टूबर 2025 को शाम 07 बजकर 10 मिनट पर होगा। चूंकि दशहरा या  (vijayadashami) विजयादशमी उदयातिथि में मनाई जाती है, इसलिए यह त्योहार गुरुवार, 02 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। Religious significance of Dussehra:दशहरा का धार्मिक महत्व दशहरा का पर्व विभिन्न रूपों में देश के अलग-अलग हिस्सों में मनाया जाता है। उत्तर भारत: उत्तर भारत में इस दिन भगवान राम की वानर सेना के साथ मिलकर लंकापति रावण का वध करने की खुशी में रामलीला और रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन किया जाता है। पूर्वी भारत: पूर्वी भारत में दशहरे को दुर्गा पूजा और दुर्गा विसर्जन के रूप में मनाया जाता है, जो मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय का प्रतीक है। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है और लोगों को सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। दशहरा 2025 पर बन रहे शुभ योग:Auspicious chances are being formed on Dussehra 2025 इस साल Dussehra 2025 दशहरा पर कई शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। दशहरा के दिन रवि योग पूरे दिन रहेगा। इसके अलावा, सुकर्मा और धृति योग के साथ श्रवण नक्षत्र भी रहेगा, जिसे हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और मंगलकारी संयोग माना गया है। Auspicious time for Dussehra Ravana Dahan:दशहरा रावण दहन का शुभ मुहूर्त शास्त्रों के अनुसार, रावण दहन प्रदोष काल में करने का विधान है, जो सूर्यास्त के बाद आरंभ होता है। 02 अक्टूबर 2025 को सूर्यास्त का समय शाम 06 बजकर 05 मिनट है (एक अन्य स्रोत के अनुसार 06 बजकर 06 मिनट), इसलिए इसके बाद प्रदोष काल शुरू होगा और रावण दहन किया जा सकेगा। मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में रावण दहन करने से शुभ प्रभाव पड़ता है। शस्त्र पूजन का शुभ मुहूर्त:Auspicious time for weapon worship Dussehra 2025: दशहरा के दिन शस्त्र पूजन का भी विशेष महत्व है। इस दिन शस्त्र पूजन का शुभ मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 09 मिनट से दोपहर 02 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। पूजन की कुल अवधि 47 मिनट की है। दशहरा अबूझ मुहूर्त:dussehra abujh muhurat ज्योतिष शास्त्र में दशहरा तिथि Dussehra 2025 को एक ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है। इसका अर्थ है कि इस दिन कोई भी शुभ कार्य, जैसे नया व्यापार शुरू करना, संपत्ति या वाहन खरीदना, बिना किसी मुहूर्त को देखे किया जा सकता है। इस दिन कोई सामान खरीदने के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती है। दशहरा का पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है जो हमें सिखाता है कि सत्य की हमेशा जीत होती है। ललिता पंचमी 2025: तिथि,महत्व और उपांग ललिता व्रत की संपूर्ण जानकारी

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Chandra Darshan

Ashwin Chandra Darshan 2025 date : चंद्र दर्शन कब है, पूजन विधि,महत्व

Ashwin Chandra Darshan: चंद्र दर्शन अमावस्या के उपरांत चंद्र देव के पुनः आगमन एवं उनके दर्शन की परंपरा है। हिंदू धर्म में सूर्य दर्शन की ही तरह चंद्र दर्शन का भी अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इस दिन श्रद्धालु चंद्र देव की पूजा एवं विशेष प्रार्थना करते हैं। अमावस्या के तुरंत बाद चंद्रमा का दर्शन करना अत्यंत शुभ माना गया है। पुराणों में चंद्र देव को पूजनीय देवताओं में से एक माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रमा को मन का निर्देशक माना जाता है। चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव की पूजा अर्चना करना मानसिक शांति के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है, Chandra Darshan इसलिए हिंदू धर्म में इस तिथि का विशेष महत्व है। तो चलिए जानते हैं कि वैशाख मास में चंद्रदर्शन कब है, और इस तिथि का महत्व व अनुष्ठान क्या हैं:- Chandra Darshan Kab Manaya Jayega: चंद्र दर्शन कब मनाया जायेगा? अमावस्या के बाद अगले दिन या दूसरे दिन को चन्द्र दर्शन दिवस कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास का चंद्रदर्शन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर 23 सितम्बर 2025, मंगलवार को मनाया जायेगा। चंद्र दर्शन का समय 05:53 पी एम से 06:33 पी एम तक रहेगा। जिसकी कुल अवधि 00 घण्टा 40 मिनट्स होगी। Kyo Manate Hai Chandra Darshan:क्यों मनाते हैं चंद्र दर्शन? चंद्रमा ‘नवग्रहों’ में से एक ग्रह है और पृथ्वी पर जनजीवन को प्रभावित करता है। Chandra Darshan ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति पर चंद्र देव का आशीर्वाद रहता है, उसे सफलता और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए भक्त, सुख-समृद्धि की कामना करते हुए पूजा व व्रत रखते हैं। चंद्र दर्शन का महत्व:Importance of Chandra Darshan अमावस्या के बाद अगले दिन या दूसरे दिन को चन्द्र दर्शन दिवस कहा जाता है। यह पूजा कई मायनों में लाभकारी और कल्याणकारी मानी जाती है। चंद्र दर्शन के दिन चंद्रमा की पूजा से मन को शांति मिलती है। साथ ही जीवन में सफलता के अनेक रास्ते खुलते हैं, साथ ही सद्बुद्धि की भी प्राप्ति होती है। वहीं जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा निम्न या अशुभ स्थिति में मौजूद होता है उन्हें अपने जीवन में तमाम परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। Chandra Darshan इसलिए कहा जाता है कि ऐसी कुंडली वाले लोग यदि चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देवता की उपासना के साथ व्रत रखते हैं तो चंद्र से उत्पन्न होने वाले उनके ग्रह दोष शांत हो जाते हैं। चंद्र दर्शन पूजन विधि:Chandra Darshan Puja Vidhi अगर आप चंद्र दर्शन तिथि के दिन चंद्र देव की कृपा प्राप्त प्राप्ति के लिए चंद्र देव की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करना चाहते हैं तो यह आपके लिए है। इस पूजा को करने से चंद्र देव की कृपा और आशीष आप पर बना रहता है। तो चलिए विस्तार पूर्वक इस पूजा विधि के बारे में जानते हैं। चंद्र तिथि के दिन सुबह उठकर चंद्र देव का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद स्नान आदि कार्यों से निवृत होकर पूरे विधि-विधान से घर के मंदिर में पूजा-पाठ करें। पूजा के समय चंद्र दर्शन की व्रत कथा अवश्य सुनें। इसके बाद पूरा दिन फलाहार करके व्रत रखें। शास्त्रों के अनुसार, चंद्र दर्शन की तिथि के दिन, शाम के समय चंद्र देव की पूजा की जाती है। चंद्र देव को सबसे पहले अर्घ्य दें, इसके बाद उन्हें पुष्प, दीप, नैवेद्य, रोली और अक्षत अर्पित करें और चंद्र देवता को खीर का प्रसाद अर्पित करें। चंद्र भगवान की पूजा करते समय इस मंत्र का जाप करें- “ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृत तत्वाय धीमहि, तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्” चंद्रमा की विधिवत पूजा अर्चना करने के बाद व्रत का पारण करें। चंद्र दर्शन पर दान देना भी एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, इसके बिना आपका व्रत संपूर्ण नहीं होता है। What to do on the day of Chandra Darshan:चंद्र दर्शन के दिन क्या करें? इस दिन ब्राह्मणों को कपड़े, चावल और चीनी समेत अन्य चीजों का दान करना फलदायी माना जाता है। साथ ही व्रत रखने वाले उपासक इस बात का ध्यान रखें कि चंद्र देव के दर्शन और उनकी पूजा के बाद ही व्रत का पारण करें। इससे आपके जीवन में जीवन में शीतलता और शांति आएगी। जल में अपनी छाया देखकर चंद्र देव पर जल अर्पित करें। इससे मानसिक विकारों से मुक्ति मिल सकती है और मन शांत होता है। यदि आपकी माता का स्वास्थ्य ख़राब रहता है, तो चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव शतावरी की जड़ अर्पित करें। इससे उन्हें स्वास्थ्य लाभ हो सकता है. सौभाग्य की प्राप्ति के लिए चंद्र देव को चांदी का सिक्का अर्पित करें और उसे अपनी तिजोरी में रखें। इससे सौभाग्य व समृद्धि में वृद्धि होती है। What not to do on the day of Chandra Darshan:चंद्र दर्शन के दिन क्या न करें? इस दिन किसी की बुराई न करें, किसी को अपशब्द न कहें और किसी का दिल न दुखाएं चंद्र दर्शन के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए, इससे चंद्रमा की कृपा कम होती है। इस दिन वाद-विवाद या लड़ाई-झगड़े से बचना चाहिए। चंद्र दर्शन के दिन मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन चोरी या अन्य अपराधों से बचना चाहिए। Sindoor Tritiya 2025 Date And Time: सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि, पूजा का समय, अनुष्ठान और महत्व

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Sindoor Tritiya 2025

Sindoor Tritiya 2025 Date And Time: सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि, पूजा का समय, अनुष्ठान और महत्व

Sindoor Tritiya 2025:शारदीय नवरात्रि का तृतीया दिन देवी पार्वती के माँ चंद्रघंटा रूप को समर्पित है, यही तृतीया दिवस सिंदूर तृतीया पर्व के नाम से प्रसिद्ध है। हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ला तृतीया तिथि को सिंदूर तृतीया मनायी जाती है। सिंदूर को सुहाग की निशानी माना जाता है। विवाहित होकर भी सिंदूर न लगाना अशुभ माना जाता है। सिंदूर तृतीया के दिन माता रानी को सिंदूर चढ़ाने से सुहागिन स्त्रियों के सौभाग्य में वृद्धि होती है। सिंदूर को देवी पूजा की विशेष सामग्रियों मे शामिल किया जाता है। सिंदूर तृतीया Sindoor Tritiya 2025 को भक्तों द्वारा नवरात्रि पर्व के तीसरे दिन मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर, भक्त देवी के तीसरे रूप की पूजा करते हैं, जिसका नाम देवी चंद्रघंटा है। उत्तर भारत के राज्यों में, यह दिन काफी महत्व रखता है। सिंदूर तृतीया Sindoor Tritiya 2025 का अनुष्ठान नवरात्रि के दौरान किया जाता है क्योंकि नवरात्रि का अवसर इस त्योहार के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है। सिंदूर (सिंदूर या लाल पाउडर) विभिन्न हिंदू अनुष्ठानों की सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण चीजों में से एक है और देवी दुर्गा की पूजा करते समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। दक्षिण भारत के राज्यों में, सिंदूर तृतीया की रस्म नवरात्रि उत्सव के पहले तीन दिनों के समापन का प्रतीक है। देवी ब्रह्मचारिणी की कैसे करें पूजा, पढ़ें मंत्र, विधि और प्रसाद Sindoor Tritiya 2025 Date:सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि Sindoor Tritiya 2025: सिंदूर तृतीया पर्व 24 सितम्बर, 2025 को मनाया जायेगा । सिन्दूर तृतीया पूजा विधि:Sindoor Tritiya Puja Method Sindoor Tritiya 2025 सिन्दूर तृतीया शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन यानी हिंदू कैलेंडर के अनुसार तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यह दिन देवी के नौ रूपों में से तीसरे माता देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। सिन्दूर तृतीया के दिन माता रानी को सिन्दूर चढ़ाने से विवाहित महिलाओं का सौभाग्य बढ़ता है, घर में सुख-शांति आती है और जीवन की परेशानियां दूर होती हैं। सिन्दूर देवी पूजा की विशेष वस्तुओं में शामिल है। Sindoor Tritiya 2025 सिन्दूर तृतीया के दिन लाखों महिलाएं बड़ी धूमधाम से माता रानी की पूजा करती हैं और उनका आशीर्वाद लेती हैं। सिन्दूर तृतीया का महत्व:Significance of Sindoor Tritiya हिंदू कैलेंडर के अनुसार, सिन्दूर तृतीया तृतीया तिथि यानी कि नवरात्रि के तीसरे दिन मनाई जाती है। सिन्दूर तृतीया को महा तृतीया नवरात्रि दुर्गा पूजा, सौभाग्य तीज और गौरी तीज जैसे नामों से भी जाना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं माता को सिन्दूर लगाने के बाद बचे हुए सिन्दूर को प्रसाद के रूप में अपने पास रख लेती हैं। कहा जाता है कि उसी सिन्दूर से घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक चिन्ह बनाना चाहिए जिससे घर में शांति और समृद्धि बनी रहे। यह दिन माता चंद्रघंटा के विवाहित रूप में माता पार्वती का प्रतिनिधित्व करता है।

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Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की कैसे करें पूजा, पढ़ें मंत्र, विधि और प्रसाद

Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार , संयम की वृद्धि होती है। जीवन की कठिन समय मे भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता है। देवी अपने साधकों की मलिनता, दुर्गणों व दोषों को खत्म करती है। देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि तथा विजय की प्राप्ति होती है।  Maa Brahmacharini: मां ब्रह्मचारिणी  दूसरे नवरात्र में मां के Devi Brahmacharini ब्रह्मचारिणी एवं तपश्चारिणी रूप को पूजा जाता है। जो साधक मां के इस रूप की पूजा करते हैं उन्हें तप, त्याग, वैराग्य, संयम और सदाचार की प्राप्ति होती है और जीवन में वे जिस बात का संकल्प कर लेते हैं उसे पूरा करके ही रहते हैं।  क्या चढ़ाएं प्रसाद  मां भगवती को नवरात्र के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए मां को शक्कर का भोग प्रिय है। ब्राह्मण को दान में भी चीनी ही देनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। इनकी उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, सदाचार आदि की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। Devi Brahmacharini देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ज्योर्तिमय है। ये मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरी शक्ति हैं। तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा इनके अन्य नाम हैं। इनकी पूजा करने से सभी काम पूरे होते हैं, Devi Brahmacharini Puja Vidhi रुकावटें दूर हो जाती हैं और विजय की प्राप्ति होती है। इसके अलावा हर तरह की परेशानियां भी खत्म होती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। Devi Brahmacharini Puja Vidh: ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा विधि देवी ब्रह्मचारिणी Devi Brahmacharini की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर Brahmacharini Puja Vidhi उनका ध्यान करें और  प्रार्थना करते हुए नीचे लिखा मंत्र बोलें। श्लोक दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु| देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा || ध्यान मंत्र वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्। जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥ गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम। धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥ परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन। पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ इसके बाद देवी को पंचामृत स्नान कराएं, फिर अलग-अलग तरह के फूल,अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें।  देवी को सफेद और सुगंधित फूल चढ़ाएं।  इसके अलावा कमल का फूल भी देवी मां को चढ़ाएं और इन मंत्रों से प्रार्थना करें। 1. या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। 2. दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। इसके बाद देवी मां को प्रसाद चढ़ाएं और आचमन करवाएं। प्रसाद के बाद पान सुपारी भेंट करें और प्रदक्षिणा करें यानी 3 बार अपनी ही जगह खड़े होकर  घूमें। प्रदक्षिणा के बाद घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। इन सबके बाद क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद बांट दें। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थ : हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं।

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Vishwakarma Puja 2025 Date And Time: विश्वकर्मा पूजा तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि – जानें सब कुछ

Vishwakarma Puja:हर साल भाद्रपद मास में सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने पर विश्वकर्मा पूजा (Vishwakarma Puja 2025) मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो औजारों, मशीनों, कारखानों और वाहनों से जुड़ा काम करते हैं। इस दिन भगवान विश्वकर्मा, जो दुनिया के पहले इंजीनियर और वास्तुकार माने जाते हैं, की विशेष पूजा की जाती है। आइए जानते हैं विश्वकर्मा पूजा 2025 की सही तारीख, शुभ मुहूर्त, इसका महत्व और पूजा की विधि के बारे में। विश्वकर्मा पूजा 2025 कब है? (Vishwakarma Puja 2025 Date) हर साल की तरह, इस बार भी विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी। यह तिथि तब निर्धारित होती है जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है। सूर्य देव 16 सितंबर, मंगलवार की रात 1 बजकर 47 मिनट पर या 17 सितंबर की देर रात 1 बजकर 54 मिनट पर सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करेंगे। सनातन धर्म में उदया तिथि का विशेष महत्व होने के कारण, विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को ही मनाई जाएगी। विश्वकर्मा पूजा 2025 का शुभ मुहूर्त (Vishwakarma Puja 2025 Shubh Muhurat) विश्वकर्मा पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त बताए गए हैं, जिनमें आप अपनी सुविधा के अनुसार पूजा कर सकते हैं: • सबसे उत्तम समय (नवभारत टाइम्स के अनुसार): सुबह 10 बजकर 43 मिनट से शुरू होकर दोपहर के 12 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। • पुण्य काल (जागरण के अनुसार): सुबह 05 बजकर 36 मिनट से लेकर दिन में 11 बजकर 44 मिनट तक है। इस दौरान स्नान-ध्यान और दान-पुण्य किया जा सकता है। • महा पुण्य काल (जागरण के अनुसार): सुबह 05 बजकर 36 मिनट से सुबह 07 बजकर 39 मिनट तक है। यह महा पुण्य काल 2 घंटे 3 मिनट का होगा। • एकादशी तिथि: आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 17 सितंबर को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर शुरू होगी और इसी दिन देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर समाप्त होगी। साधक अपनी सुविधा अनुसार इस दौरान स्नान-ध्यान कर विश्वकर्मा जी की पूजा कर सकते हैं। विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Importance of Vishwakarma Puja) हिंदू धर्म में विश्वकर्मा पूजा Vishwakarma Puja का बेहद विशेष महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला इंजीनियर और वास्तुकार कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने ही इंद्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्ग लोक और लंका जैसे स्थानों का निर्माण किया था। इतना ही नहीं, भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र भी तैयार किया था। माना जाता है कि जिन घरों, कारखानों, फैक्ट्री आदि में भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है, वहां सदैव माता लक्ष्मी का वास बना रहता है और कारोबार में मुनाफा होता है। जो लोग लैपटॉप या मोबाइल से काम करते हैं, उन्हें भी यह पूजा जरूर करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से काम में तरक्की होती है। इस पूजा से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है और विश्वकर्मा जी की कृपा से जीवन में सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। विश्वकर्मा पूजा की विधि (Vishwakarma Puja Vidhi) विश्वकर्मा पूजा के दिन विधि-विधान से पूजा करने का खास महत्व है। यहाँ पूजा की सरल विधि दी गई है: 1. स्वच्छता: सुबह उठकर अपनी मशीनों, औजारों और वाहनों को अच्छी तरह साफ कर लें। 2. मशीनों को बंद करें: इसके बाद, सभी मशीनों को बंद कर दें। 3. भगवान की स्थापना: भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति को अपनी मशीन या कार्यस्थल के पास स्थापित करें। 4. संयुक्त पूजा: भगवान विश्वकर्मा और अपनी मशीनों/औजारों की एक साथ विधि-विधान से पूजा करें। 5. वाहन पूजा: अपने वाहनों की पूजा भी अवश्य करें। 6. भोग लगाएं: भगवान विश्वकर्मा को मिष्ठान का भोग और प्रसाद जरूर चढ़ाएं। 7. दान-पुण्य: इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को आवश्यकतानुसार सामान दान करना बहुत शुभ माना जाता है। 8. घरेलू मशीनें: अपने घर की छोटी-छोटी मशीनों की भी पूजा करने का महत्व होता है। शुभ योग (Shubh Yog on Vishwakarma Puja 2025) विश्वकर्मा पूजा के दिन कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। इस दिन शिव और परिघ योग के साथ-साथ शिववास योग का भी निर्माण होगा। इन शुभ योगों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। विश्वकर्मा पूजा बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में धूमधाम से मनाई जाती है। इस पावन अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की कृपा से आपके जीवन में सुख, समृद्धि और उन्नति आए।

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Navratri 2025 2nd Day Maa Brahmacharini Puja : नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी पूजा, जाने पूजा विध, महत्व, मंत्र, भोग और पीले रंग का क्या है महत्व

Navratri 2025 2nd Day Maa Brahmacharini :नवरात्रि का दूसरा दिन है और इस दिन मां भगवती के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तपस्या की थी, उसी तप के कारण माता को ब्रह्मचारिणी कहा गया। आइए जानते हैं चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन की पूजा विधि, मंत्र, भोग, महत्व, आरती के बारे में… नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के ‘देवी ब्रह्मचारिणी‘ स्वरूप की पूजा करने का विधान है। माता के नाम से उनकी शक्तियों के बारे में जानकारी मिलती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली ब्रह्मचारिणी को हमन बार बार नमन करते हैं। माता ब्रह्मचारिणी की पूजा अराधना करने से आत्मविश्वास, आयु, आरोग्य, सौभाग्य, अभय आदि की प्राप्ति होती है। माता ब्रह्मचारिणी को ब्राह्मी भी कहा जाता है। मां भगवती की इस शक्ति की पूजा अर्चना कने से मनुष्य कभी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता और सही मार्ग पर चलता है। आइए जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, मंत्र, आरती और स्वरूप के बारे में… This is how the mother was named Brahmacharini:ऐसे पड़ा माता का नाम ब्रह्मचारिणी शास्त्रों में बताया गया है कि मां दुर्गा ने पार्वती के रूप में पर्वतराज के यहां पुत्री बनकर जन्म लिया और महर्षि नारद के कहने पर अपने जीवन में भगवान महादेव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। हजारों वर्षों तक अपनी कठिन तपस्या के कारण ही इनका नाम तपश्चारिणी या Maa Brahmacharini ब्रह्मचारिणी पड़ा। अपनी इस तपस्या की अवधि में इन्होंने कई वर्षों तक निराहार रहकर और अत्यन्त कठिन तप से महादेव को प्रसन्न कर लिया। उनके इसी तप के प्रतीक के रूप में नवरात्र के दूसरे दिन इनके इसी रूप की पूजा और स्तवन किया जाता है। ऐसा है माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप:Such is the form of Mata Brahmacharini दधाना कपाभ्यामक्षमालाकमण्डलू।देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।नवदुर्गाओं में दूसरी दुर्गा का नाम ब्रह्मचारिणी है। इनकी पूजा नवरात्र के दूसरे दिन की जाती है। Maa Brahmacharini ब्रह्मचारिणी इस लोक के समस्त चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता हैं। इनका स्वरूप श्वेत वस्त्र में लिप्टी हुई कन्या के रूप में है, जिनके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल है। यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रह्मचारिणी नामक दुर्गा शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को यह अपनी सर्वज्ञ संपन्न विद्या देकर विजयी बनाती है। ब्रह्मचारिणी का स्वरूप बहुत ही सादा और भव्य है। अन्य देवियों की तुलना में वह अतिसौम्य, क्रोध रहित और तुरंत वरदान देने वाली देवी है। माता ब्रह्मचारिणी का भोग:Mata Brahmacharini’s offering नवरात्र के इस दूसरे दिन मां भगवती को चीनी का भोग लगाने का विधान है। ऐसा विश्वास है कि चीनी के भोग से उपासक को लंबी आयु प्राप्त होती है और वह नीरोगी रहता है तथा उसमें अच्छे विचारों का आगमन होता है। साथ ही माता पार्वती के कठिन तप को मन में रखते हुए संघर्ष करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। नवरात्रि के दूसरे दिन पीले रंग का महत्व:Importance of yellow color on the second day of Navratri नवरात्रि के दूसरे दिन पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा अर्चना करनी चाहिए क्योंकि माता Mata Brahmacharini ब्रह्मचारिणी को पीला रंग बहुत प्रिय है। साथ ही माता को पीले रंग के वस्त्र, पीले रंग के फूल, फल आदि अवश्य अर्पित करना चाहिए। भारतीय दर्शन में पीला रंग पालन-पोषण करने वाले स्वभाव को दर्शाता है और यह रंग सीखने, उत्साह, बुद्धि और ज्ञान का संकेत है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा निम्न मंत्र के माध्यम से की जाती है- दधाना करपद्माभ्याम्, अक्षमालाकमण्डलू।देवी प्रसीदतु मयि, ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। अर्थात् जिनके एक हाथ में अक्षमाला है और दूसरे हाथ में कमण्डल है, ऐसी उत्तम ब्रह्मचारिणी रूपा मां दुर्गा मुझ पर कृपा करें। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम: दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।। माता ब्रह्मचारिणी पूजा विधि:Mata Brahmacharini puja method माता ब्रह्मचारिणी की पूजा पहले दिन की तरह ही शास्त्रीय विधि से की जाती है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत होकर पूजा स्थल पर गंगाजल से छिड़काव करें और पूरे परिवार के साथ मां दुर्गा की उपासना करें। Maa Brahmacharini माता ब्रह्मचारिणी की पूजा में पीले रंग के वस्त्र का प्रयोग करें और पीले रंग की चीजें ही अर्पित करें। माता का पंचामृत से स्नान कराने के बाद रोली, कुमकुम अर्पित करें। इसके बाद अग्यारी करें और अग्यारी पर लौंग, बताशे, हवन सामग्री आदि चीजें अर्पित करें, जैसा आपके घर पर होता हो। मां ब्रह्मचारिणी Maa Brahmacharini की पूजा में पीले रंग के फल, फूल आदि का प्रयोग करें। माता को दूध से बनी चीजें या चीनी का ही भोग लगाएं। इसके साथ ही मन ही मन माता के ध्यान मंत्र का जप करें और बीच बीच में पूरे परिवार के साथ माता के जयकारे लगाते रहें। इसके बाद पान-सुपारी भेंट करने के बाद प्रदक्षिणा करें। फिर कलश देवता और नवग्रह की पूजा करें। इसके बाद घी के दीपक व कपूर से माता की आरती करें। फिर दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती आदि का पाठ करें। पूजा पाठ करने के बाद फिर माता के जयकारे लगाएं। साथ ही शाम के समय भी माता की आरती करें। माता ब्रह्मचारिणी की आरती:Aarti of Mata Brahmacharini जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।जय चतुरानन प्रिय सुख दाता। ब्रह्मा जी के मन भाती हो।ज्ञान सभी को सिखलाती हो।ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।जिसको जपे सकल संसारा। जय गायत्री वेद की माता।जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता। कमी कोई रहने न पाए।कोई भी दुख सहने न पाए। उसकी विरति रहे ठिकाने।जो तेरी महिमा को जाने। रुद्राक्ष की माला ले कर।जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर। आलस छोड़ करे गुणगाना।मां तुम उसको सुख पहुंचाना। ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।पूर्ण करो सब मेरे काम। भक्त तेरे चरणों का पुजारी।रखना लाज मेरी महतारी।बोल सांचे दरबार की जय, जय माता दी।

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Lalita Panchami 2025 Date And Time: ललिता पंचमी 2025: तिथि,महत्व और उपांग ललिता व्रत की संपूर्ण जानकारी

Lalita Panchami: हिंदू धर्म में, ललिता पंचमी का त्योहार देवी ललिता को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस विशेष दिन को ‘उपांग ललिता व्रत’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसे भक्तजन अपनी देवी के सम्मान में रखते हैं। यह पर्व विशेष रूप से गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों में अत्यधिक लोकप्रिय है। आइए, 2025 में Lalita Panchami ललिता पंचमी कब है, इसका क्या महत्व है और इसे कैसे मनाया जाता है, इसकी विस्तृत जानकारी प्राप्त करते हैं। Lalita Panchami 2025 kab Hai: ललिता पंचमी 2025 कब है? साल 2025 में Lalita Panchami ललिता पंचमी शुक्रवार, 26 सितंबर को मनाई जाएगी। यह दिन शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन पड़ता है, जब देवी दुर्गा के पांचवें स्वरूप देवी स्कंदमाता की भी पूजा की जाती है। महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त:Important dates and auspicious times: • ललिता पंचमी 2025: 26 सितंबर, शुक्रवार • पंचमी तिथि प्रारंभ: 26 सितंबर, सुबह 09:33 बजे • पंचमी तिथि समाप्त: 27 सितंबर, दोपहर 12:04 बजे • सूर्योदय (उज्जैन के अनुसार): 26 सितंबर, सुबह 06:20 बजे • सूर्यास्त (उज्जैन के अनुसार): 26 सितंबर, शाम 06:15 बजे Who is Goddess Lalita: कौन हैं देवी ललिता? देवी ललिता Lalita Panchami को दस महाविद्याओं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण देवी माना जाता है। उन्हें ‘षोडशी’ और ‘त्रिपुर सुंदरी’ के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी ललिता को देवी दुर्गा या शक्ति का अवतार माना जाता है। उन्हें ‘पंच महाभूतों’ (पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश) से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक कथाएं: • एक मान्यता के अनुसार, देवी ललिता का प्राकट्य ‘भंडा’ नामक राक्षस का वध करने के लिए हुआ था, जो कामदेव की राख से उत्पन्न हुआ था। इसलिए ललिता पंचमी को देवी ललिता की ‘जयंती’ या प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। • एक अन्य कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी द्वारा छोड़े गए चक्र से पाताल लोक समाप्त होने लगा और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगी, तब सभी ऋषि-मुनियों ने माता ललिता देवी की उपासना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं और इस विनाशकारी चक्र को थाम लिया, जिससे सृष्टि को नवजीवन मिला। • पुराणों में यह भी वर्णित है कि जब सती अपने पिता दक्ष द्वारा अपमानित होकर अपने प्राण त्याग देती हैं, तो भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठाकर चारों दिशाओं में घूमने लगते हैं। इस महाविपत्ति को देखकर भगवान विष्णु अपने चक्र से सती की देह को विभाजित कर देते हैं। तत्पश्चात भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर इन्हें ललिता के नाम से पुकारा जाने लगा। • कालिका पुराण जैसे विभिन्न हिंदू धर्मग्रंथों में देवी ललिता के महत्व का वर्णन मिलता है। देवी ललिता गौर वर्ण की हैं, दो भुजाएं धारण करती हैं, और लाल कमल पर विराजमान हैं। ललिता पंचमी का महत्व और उपांग ललिता व्रत के लाभ:Importance of Lalita Panchami and benefits of Upang Lalita Vrat ललिता पंचमी Lalita Panchami का व्रत ‘उपांग ललिता व्रत’ के नाम से जाना जाता है और इसे अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन देवी की पूजा और व्रत करने से भक्तों को immense शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त होता है। यह व्रत रखने के कई लाभ बताए गए हैं: • सुख, ज्ञान और धन की प्राप्ति: माना जाता है कि देवी की पूजा और व्रत से जीवन में सुख, ज्ञान और धन की वृद्धि होती है। • समस्त कष्टों का निवारण: देवी ललिता के दर्शन मात्र से या उनकी पूजा से जीवन के सभी व्यक्तिगत और व्यावसायिक कष्ट तुरंत दूर हो जाते हैं। • शक्ति और सामर्थ्य: यह व्रत भक्तों को अपार शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है। • संतोष और खुशी: देवी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को संतोष और खुशी का आशीर्वाद देती हैं। • समृद्धि: देवी ललिता की पूजा से समृद्धि की प्राप्ति होती है। उपांग ललिता व्रत और पूजा विधि:Upang Lalita fast and worship method ललिता पंचमी के दिन भक्त पूरी श्रद्धा के साथ देवी ललिता का व्रत रखते हैं और पवित्र अनुष्ठान करते हैं। पूजा के प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं:The major rituals of puja are as follows: 1. व्रत और उपवास: भक्तजन इस दिन कठोर व्रत और उपवास का पालन करते हैं। 2. देवी ललिता के साथ अन्य देवताओं की पूजा: देवी ललिता के साथ-साथ भगवान शिव और स्कंदमाता की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है। 3. विशेष पूजा और मंत्र पाठ: देवी के सम्मान में विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए जाते हैं। देवी ललिता को समर्पित वैदिक मंत्रों का पाठ या जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 4. सामुदायिक पूजा और मेले: कुछ स्थानों पर सामुदायिक पूजाएं आयोजित की जाती हैं, जहाँ सभी महिलाएं एक साथ प्रार्थना करती हैं। कई जगहों पर भव्य मेलों का आयोजन भी किया जाता है, जहाँ हजारों श्रद्धालु बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं। 5. ललिता सहस्रनाम और ललिता त्रिशती का पाठ: गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, देवी ललिता की पूजा देवी चंडी के समान ही ‘ललिता सहस्रनाम’, ‘ललितोपाख्यान’ और ‘ललिता त्रिशती’ जैसे पूजा अनुष्ठानों के साथ की जाती है। 6. षोडषोपचार विधि: भक्तगण इस दिन षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते हैं। देशभर में ललिता पंचमी का उत्सव:Celebration of Lalita Panchami across the country ललिता पंचमी का त्योहार पूरे भारतवर्ष में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र में इसकी लोकप्रियता विशेष रूप से अधिक है। इस दिन देवी ललिता के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो दूर-दूर से पूजा अनुष्ठानों में भाग लेने आते हैं। निष्कर्ष ललिता पंचमी 2025, एक बार फिर देवी ललिता की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक शुभ अवसर लेकर आएगी। यह दिन न केवल आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामुदायिक सद्भाव और सांस्कृतिक उत्सवों का भी प्रतीक है। सच्चे मन और श्रद्धा से देवी की आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि और संतोष की प्राप्ति होती है।

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Durga Panchami

Durga Panchami 2025 Start Date: दुर्गा पूजा 2025: कब से शुरू होगी यह महापर्व, जानें शुभ तिथियां और महत्व !

Durga Panchami: हिंदू धर्म में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। यह एक प्रमुख त्योहार है जो शारदीय नवरात्रि के दौरान मनाया जाता है और दुर्गोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। विशेष रूप से पूर्वी भारत, जैसे बंगाल, ओडिशा, असम, त्रिपुरा, बिहार और झारखंड में इसे बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। साल 2025 में दुर्गा पूजा कब से शुरू होगी, विसर्जन कब होगा, और इसके प्रमुख अनुष्ठान क्या हैं, आइए जानते हैं इस विस्तृत ब्लॉग पोस्ट में। Durga Puja 2025 Start date shubh muhurat : दुर्गा पूजा 2025 का शुभारंभ और समापन साल 2025 में दुर्गा पूजा का पर्व 27 सितंबर, शनिवार को पंचमी तिथि से शुरू होगा और 2 अक्टूबर, गुरुवार को विजयादशमी के साथ समाप्त होगा। यह छह दिवसीय उत्सव होगा, जिसमें देवी दुर्गा की आराधना और सांस्कृतिक उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। Importance of Shardiya Navratri 2025 and Mahalaya:शारदीय नवरात्रि 2025 और महालया का महत्व दुर्गा पूजा का आरंभ महालया के साथ होता है, जो पितृ पक्ष के अंत और देवी पक्ष की शुरुआत का प्रतीक है। 2025 में, महालया 21 सितंबर को मनाया जाएगा। इस दिन चंडी पाठ और भक्ति गीतों के साथ वातावरण में एक दिव्य उत्साह भर जाता है। शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर 2025, सोमवार से शुरू होकर 1 अक्टूबर 2025, बुधवार तक चलेगी। इस वर्ष नवरात्रि 10 दिनों की होगी क्योंकि तृतीया तिथि दो दिन रहेगी। Important dates and rituals of Durga Puja 2025: दुर्गा पूजा 2025 की महत्वपूर्ण तिथियां और अनुष्ठान आइए जानते हैं दुर्गा पूजा 2025 के प्रत्येक महत्वपूर्ण दिन की तिथि और उसके विशेष अनुष्ठान: पंचमी (27 सितंबर 2025, शनिवार): बिल्व निमंत्रण दुर्गा पूजा की शुरुआत बिल्व निमंत्रण के साथ होती है। इस दिन देवी दुर्गा को अनुष्ठानों के साथ पृथ्वी पर आमंत्रित किया जाता है। षष्ठी (28 सितंबर 2025, रविवार): कल्पारंभ और अकाल बोधन षष्ठी तिथि के दिन दुर्गा पूजा का विधिवत आरंभ होता है। Durga Panchami इस दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। कल्पारंभ अनुष्ठान के बाद अकाल बोधन होता है, जो देवी के आह्वान का प्रतीक है। इस दिन बिल्व निमंत्रण और पंडाल सजाने की परंपरा भी निभाई जाती है। मूर्ति स्थापना के लिए सुबह 06:08 बजे से 10:30 बजे तक का समय उत्तम मुहूर्त रहेगा। सप्तमी (29 सितंबर 2025, सोमवार): कोलाबौ पूजा इस दिन दुर्गा सप्तमी मनाई जाती है। कोलाबौ पूजा एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें एक छोटे केले के पौधे को साड़ी पहनाकर भगवान गणेश की पत्नी के रूप में पूजा जाता है। इसे दुर्गा पूजा का सबसे पवित्र भाग माना जाता है। अष्टमी (30 सितंबर 2025, मंगलवार): महा अष्टमी, कुमारी पूजा और संधि पूजा महा अष्टमी दुर्गा पूजा का सबसे शुभ दिन माना जाता है। इस दिन भक्त कुमारी पूजा करते हैं, जिसमें युवा लड़कियों को देवी के अवतार के रूप में पूजा जाता है। Durga Panchami अष्टमी और नवमी के संधिकाल में (रात्रि 07:36 से 08:24 बजे तक) संधि पूजा की जाती है। यह समय मां दुर्गा के चामुंडा रूप की आराधना के लिए अत्यंत विशेष होता है, जिसमें 108 दीपों और 108 कमल पुष्पों से मां की पूजा की जाती है। नवमी (1 अक्टूबर 2025, बुधवार): महा नवमी और नवमी होम महा नवमी के दिन, महिषासुर पर दुर्गा के युद्ध के अंतिम दिन का स्मरण किया जाता है। इस दिन नवमी होम (पवित्र अग्नि अनुष्ठान) और दुर्गा बलिदान बड़ी श्रद्धा के साथ किए जाते हैं। दशमी (2 अक्टूबर 2025, गुरुवार): विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन यह दुर्गा पूजा का अंतिम दिन है। Durga Panchami इस दिन सिंदूर उत्सव होता है, जहां विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमाओं का नदियों और तालाबों में विसर्जन किया जाता है। यह देवी के अपने स्वर्गीय निवास पर लौटने का प्रतीक है। Durga Panchami:देवी दुर्गा का आगमन और प्रस्थान 2025 Durga Panchami देवी दुर्गा का धरती पर आगमन देवी पक्ष के पहले दिन होता है और दुर्गा विसर्जन के दिन वह प्रस्थान करती हैं। Durga Panchami मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान वाले दिन महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि यह आने वाले समय का अनुमान लगाने में सहायक होते हैं। आगमन: 2025 में देवी दुर्गा हाथी पर सवार होकर आएंगी, जिसे अत्यधिक शुभ माना जाता है, Durga Panchami क्योंकि यह समृद्धि और अच्छी फसल का प्रतीक है। प्रस्थान: वह “नर” (मनुष्य) पर प्रस्थान करेंगी, जो आगे आने वाले संघर्षों और चुनौतियों का संकेत देता है, लेकिन उन्हें दूर करने के लिए मानवीय शक्ति को भी दर्शाता है। Why is Durga Puja celebrated: दुर्गा पूजा क्यों मनाई जाती है? दुर्गा पूजा देवी दुर्गा की महिषासुर नामक राक्षस राजा पर विजय का उत्सव है। Durga Panchami यह बुराई पर अच्छाई की जीत और स्त्री शक्ति के सर्वोच्च स्वरूप का प्रतीक है। धार्मिक भक्ति से परे, दुर्गा पूजा कला, संस्कृति, सामुदायिक बंधन, भोजन और आनंद का त्योहार भी है। निष्कर्ष दुर्गा पूजा 2025 एक बार फिर पूरे देश में भक्ति, अनुष्ठानों, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक उत्सवों के साथ छह दिनों तक मनाई जाएगी। Durga Panchami महालया से लेकर विजयादशमी तक, प्रत्येक अनुष्ठान का गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जो इस त्योहार को परंपरा और उत्सव का एक अद्भुत मिश्रण बनाता है। जैसे-जैसे गिनती शुरू हो रही है, भारत और दुनिया भर के भक्त खुशी, समृद्धि और शांति के लिए प्रार्थनाओं के साथ मां दुर्गा के आगमन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें और क्या नहीं

Durga Panchami 2025 Start Date: दुर्गा पूजा 2025: कब से शुरू होगी यह महापर्व, जानें शुभ तिथियां और महत्व ! Read More »