Maa Katyayani

Maa Katyayani Puja Vidhi 2026: जानिए नवरात्रि के छठे दिन की पूजा विधि, मंत्र, कथा, भोग और शीघ्र विवाह उपाय….

Navratri 2026 Day 6 Maa Katyayani Puja Vidh : सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में आश्विन मास के पावन नवरात्र शक्ति साधना, अंतःकरण की शुद्धि और दिव्य ऊर्जा के जागरण का महापर्व माने जाते हैं। नौ दिनों तक चलने वाले इस आध्यात्मिक अनुष्ठान में मां नवदुर्गा के नौ विशिष्ट और कल्याणकारी स्वरूपों की क्रमबद्ध आराधना की जाती है। Maa Katyayani प्रथम दिन मां शैलपुत्री की घटस्थापना, द्वितीय दिन मां ब्रह्मचारिणी का तपोमय आचरण, तृतीय दिन मां चंद्रघंटा की वीर-सौम्य आभा, चतुर्थ दिन मां कूष्मांडा की सृष्टि-रचना और पंचम दिन मां स्कंदमाता के ममतामयी स्वरूप के पूजन के उपरांत, नवरात्रि के छठे पावन दिन मां दुर्गा के षष्ठम स्वरूप Maa Katyayani की विशेष पूजा-अर्चना और साधना का विधान है।

महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उनके आश्रम में पुत्री के रूप में अवतरित होने और महिषासुर जैसे दुर्दंत असुर का संहार करने के कारण देवी का यह तेजस्वी स्वरूप संपूर्ण जगत में विख्यात हुआ। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को पूरे देश में अपार श्रद्धा, सात्विकता और भक्तिभाव के साथ संपन्न की जाएगी। Maa Katyayani आज हम देवी के अलौकिक स्वरूप, आज्ञा चक्र साधना, 2026 के पंचांगीय मुहूर्त, महर्षि कात्यायन व महिषासुर वध की पौराणिक कथा, गोपी-कृष्ण विवाह प्रसंग, षोडशोपचार पूजा विधि, प्रिय भोग (शहद), शीघ्र विवाह के अचूक शास्त्रीय उपाय, सिद्ध मंत्र, स्तोत्र, कवच और आरती का सविस्तार विवेचन करेंगे।

मां कात्यायनी का दिव्य स्वरूप और अलौकिक प्रतीक : The Divine Form and Supernatural Symbolism of Mother Katyayani

शास्त्रों, देवी भागवत और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, Maa Katyayani का स्वरूप अत्यंत भव्य, दिव्य, जाज्वल्यमान और स्वर्ण के समान चमकीला है। Maa Katyayani माता का यह स्वरूप एक ओर जहां भक्तों के लिए असीम वात्सल्य और सुरक्षा से परिपूर्ण है, वहीं धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए प्रचंड तेज से दीप्तिमान है

स्वर्ण कांति और चार भुजाएं (Chaturbhuja Swaroop): देवी का वर्ण तपते हुए विशुद्ध सोने के समान चमकीला है। माता की चार भुजाएं हैं।

दाहिने हाथों की मुद्राएं: माता के दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ भक्तों को समस्त भयों से मुक्ति दिलाने वाली ‘अभय मुद्रा’ में है, Maa Katyayani जबकि नीचे वाला दाहिना हाथ समस्त मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाली ‘वरद मुद्रा’ में सुशोभित है।

बाएं हाथों के अस्त्र व पुष्प: देवी के बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में दैत्यों का संहार करने वाला दिव्य खड्ग (चंद्रहास तलवार) चमक रहा है, जबकि नीचे वाले कर-कमल में पवित्र कमल का पुष्प सुशोभित है।

सिंह अथवा शार्दूल की सवारी: माता पराक्रमी सिंह (शार्दूल) पर आरूढ़ हैं। सिंह की यह सवारी अदम्य पराक्रम, निर्भीकता, आत्मनियंत्रण और धर्म के आधिपत्य का प्रतीक है।

सौम्यता और वीरता का समन्वय: देवी के मुखमंडल पर एक ओर शत्रुओं को कंपित कर देने वाला तेज है, तो दूसरी ओर निष्काम भक्तों के लिए अपार शांति और ममतामयी करुणा की अमृत धारा प्रवाहित होती है।

आध्यात्मिक चक्र: आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य) की सर्वोच्च साधना : Spiritual Chakra: The Supreme Practice of the Ajna Chakra (Between the Eyebrows)

कुंडलिनी योग और आंतरिक ध्यान साधना में Maa Katyayani नवरात्रि का छठा दिन अत्यंत रहस्यमयी और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है:

प्रथम दिन: मूलाधार चक्र (पृथ्वी तत्व, आधार व स्थिरता)

द्वितीय दिन: स्वाधिष्ठान चक्र (जल तत्व, तप व संयम)

तृतीय दिन: मणिपुर चक्र (अग्नि तत्व, साहस व पराक्रम)

चतुर्थ दिन: अनाहत चक्र (वायु तत्व, प्रेम, करुणा व संतुलन)

पंचम दिन: विशुद्ध चक्र (आकाश तत्व, वाणी व अभिव्यक्ति)

षष्ठम दिन (आज्ञा चक्र): नवरात्रि के छठे दिन साधक का चित्त कंठ से ऊपर उठकर दोनों भौंहों के मध्य स्थित ‘आज्ञा चक्र’ (Ajna Chakra / Third Eye) में प्रविष्ट होता है।

शास्त्रों में आज्ञा चक्र को आध्यात्मिक चेतना का सर्वोच्च नियंत्रण केंद्र और ज्ञान का दिव्य नेत्र कहा गया है। ध्यान मंत्र में स्पष्ट उल्लेख है—”स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्”। जब साधक छठे दिन एकाग्र होकर देवी के चरणों में पूर्ण आत्मदान (Complete Self-Surrender) कर देता है, तो उसे सहज रूप से दिव्य अंतर्दृष्टि और भगवती के साक्षात दर्शन प्राप्त होते हैं। आज्ञा चक्र के जाग्रत होने से साधक के भीतर का संशय, अज्ञान और द्वंद्व सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

वर्ष 2026 में पूजन की तिथि और पंचांगीय मुहूर्त :Date of worship and astrological auspicious timings for the year 2026

वैदिक पंचांगीय गणना और ज्योतिषीय सिद्धांतों के अनुसार, वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की षष्ठी तिथि का शुभ संयोग निम्नलिखित है:

पूजा की मुख्य तिथि: शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

पंचांगीय विवरण: आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, षष्ठी तिथि

उदयातिथि नियम: 16 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय के समय षष्ठी तिथि विद्यमान रहने से इसी दिन छठे नवरात्र का व्रत और पूजन संपन्न किया जाएगा।

दिल्ली सूर्योदय समय: प्रातःकाल 06:23 AM

पूजन के शुभ मुहूर्त (Auspicious Timings 2026):

ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:43 AM से 05:33 AM तक (ध्यान व मंत्र जप के लिए अति उत्तम)

प्रातःकालीन शुभ पूजा मुहूर्त: प्रातः 06:23 AM से 09:15 AM तक (चर, लाभ व अमृत चौघड़िया)

अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:44 AM से 12:30 PM तक

गोधूलि वेला (विशेष कात्यायनी पूजन मुहूर्त): सायं 05:50 PM से 06:16 PM तक

गोधूलि वेला का विशेष महत्व: शास्त्रों और तंत्र ग्रंथों के अनुसार, Maa Katyayani की पूजा विशेष रूप से संध्या काल यानी गोधूलि वेला में करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है। Maa Katyayani सूर्यास्त के समय जब दिन और रात का मिलन होता है, उस समय पीले अथवा लाल वस्त्र धारण करके देवी की आराधना करने से विशेष सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

पौराणिक व्रत कथा: महर्षि कात्यायन और महिषासुर संहार :Mythological Vrat Katha: Maharshi Katyayan and the Slaying of Mahishasura

धार्मिक ग्रंथों, मार्कंडेय पुराण और स्कंद पुराण में मां कात्यायनी के अवतरण की अत्यंत पावन और रोमांचक कथा वर्णित है:

प्राचीन काल में कत नाम के एक परम तपस्वी और धर्मात्मा ऋषि हुए। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए और उन्हीं के कुल में विश्वविख्यात महर्षि कात्यायन का जन्म हुआ। Maa Katyayani महर्षि कात्यायन परम भगवती पराम्बा के अनन्य उपासक थे। उन्होंने कई वर्षों तक घोर वन में निराहार रहकर कठोर तपस्या की। उनकी एकमात्र अभिलाषा थी कि साक्षात जगज्जननी भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। मां भगवती ने उनकी निष्काम भक्ति और तप से प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान प्रदान कर दिया।

उसी कालखंड में ‘महिषासुर’ नामक दैत्य ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर लिया था कि कोई भी देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व या पुरुष उसका वध नहीं कर सकेगा। वरदान के अहंकार में चूर होकर महिषासुर ने तीनों लोकों पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्र का सिंहासन छीन लिया, देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया और पृथ्वी पर ऋषि-मुनियों के यज्ञों को विध्वंस करना प्रारंभ कर दिया।

जब पीड़ित देवता ब्रह्मा जी के नेतृत्व में भगवान विष्णु और देवाधिदेव महादेव की शरण में पहुंचे, तो देवताओं के संताप को सुनकर त्रिदेवों के मुख से एक अत्यंत प्रलयंकारी और दिव्य तेज प्रकट हुआ। उसी समय अन्य सभी देवताओं के शरीर से भी उनके अस्त्रों और शक्तियों का तेज निकलकर उस पुंज में समाहित हो गया। उस महातेजस्वी पुंज से एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और अष्टभुजा-चतुर्भुजा महादेवी का प्राकट्य हुआ।

चूंकि Maa Katyayani महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इस दिव्य देवी की पूजा-अर्चना की और देवी ने उनके आश्रम में पुत्री के रूप में प्रतिष्ठा पाई, इसलिए इनका नाम ‘कात्यायनी’ पड़ा। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट होकर देवी ने आश्विन शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक तीन दिनों तक महर्षि कात्यायन के आश्रम में उनकी पूजा और सत्कार ग्रहण किया। Maa Katyayani इसके उपरांत आश्विन शुक्ल दशमी के दिन देवी ने रणभूमि में महिषासुर की विशाल सेना का संहार करते हुए महिषासुर पर त्रिशूल और खड्ग से प्रहार कर उसका वध कर दिया। देवताओं ने पुष्प वर्षा कर मां कात्यायनी की जय-जयकार की।

गोपी-कृष्ण प्रेम प्रसंग और कालिंदी तट की साधना :The Love Story of Gopi and Krishna and the Spiritual Practice on the Banks of the Kalindi

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में मां कात्यायनी की पूजा का एक अत्यंत पावन प्रसंग मिलता है। द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ब्रजमंडल में बाललीलाएं कर रहे थे, तब ब्रज की गोपियों के मन में भगवान श्रीकृष्ण को अपने पति रूप में प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा जाग्रत हुई।

भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए समस्त गोपियों ने मार्गशीर्ष (अगहन) मास में यमुना (कालिंदी) नदी के पावन तट पर बालू (रेत) से मां कात्यायनी की दिव्य प्रतिमा का निर्माण किया। गोपियों ने प्रतिदिन प्रातःकाल यमुना स्नान करके लाल चंदन, धूप, दीप, सुगंधित पुष्पों और सात्विक नैवेद्य से देवी की पूजा की और प्रसिद्ध विवाह मंत्र का जप किया:

“कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥”

गोपियों की अनन्य निष्ठा और तप से प्रसन्न होकर मां कात्यायनी ने उन्हें मनोवांछित वरदान दिया और भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं महारास में गोपियों की इच्छा को पूर्ण किया। Maa Katyayani इसी कारण से मां कात्यायनी को संपूर्ण ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

मां कात्यायनी की प्रामाणिक एवं सरल गृह पूजन विधि :An authentic and simple home worship ritual for Goddess Katyayani

नवरात्रि के छठे दिन घर पर पूर्ण विधि-विधान और सात्विकता से पूजा संपन्न करने के लिए इन सरल चरणों का पालन करें:

स्नान व शुद्धि: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। इस दिन लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो, Maa Katyayani तो गोधूलि वेला (शाम के समय) पुनः हाथ-पैर धोकर पीले वस्त्र पहनें।

पूजा स्थल की शुद्धि: अपने घर के मंदिर और प्रथम दिन स्थापित घटस्थापना कलश के चारों ओर गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।

दीपक प्रज्वलन व संकल्प: मां भगवती और कलश देवता के सम्मुख शुद्ध देसी घी का दीपक और सुगंधित धूपबत्ती प्रज्वलित करें। Maa Katyayani हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजन का संकल्प लें।

कलश व नवग्रह पूजन: सर्वप्रथम घटस्थापना कलश, भगवान श्री गणेश और नवग्रहों को प्रणाम करके रोली, चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।

देवी का आह्वान व ध्यान: हाथ में लाल या पीले पुष्प और अक्षत लेकर मां कात्यायनी के ध्यान श्लोक (चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना…) का श्रद्धापूर्वक पाठ करते हुए देवी का सादर आह्वान करें।

स्नान व अभिषेक: यदि धातु की मूर्ति हो, तो गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से प्रतीकात्मक स्नान कराएं।

श्रृंगार व वस्त्र अर्पण: माता को लाल चुनरी या पीतांबरी वस्त्र अर्पित करें। कुमकुम, रोली, लाल चंदन, हल्दी और अक्षत का तिलक लगाएं। सुहाग की सामग्री (लाल चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेंहदी) माता को समर्पित करें।

पुष्प अर्पण: देवी को पीले कनेर, मोगरा, चमेली और लाल गुलाब या गुड़हल के पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। Maa Katyayani माता को ताजे पुष्पों की सुंदर माला पहनाएं।

शहद का प्रिय भोग अर्पण: मां कात्यायनी को चांदी, तांबे या मिट्टी के पात्र में रखकर शुद्ध शहद (मधु) का नैवेद्य अवश्य अर्पित करें। Maa Katyayani इसके साथ ही पीले मिष्ठान्न, मालपुआ और ऋतु फल चढ़ाएं।

मंत्र जप व स्तोत्र पाठ: रुद्राक्ष या कमलगट्टे की 108 दानों वाली माला से शांत चित्त होकर माता के सिद्ध बीज मंत्र अथवा विवाह बाधा निवारण मंत्र का कम से कम एक माला जप करें। Maa Katyayani इसके उपरांत कात्यायनी स्तोत्र व कवच का पाठ करें।

आरती व क्षमा याचना: कर्पूर और घी के दीप से मां कात्यायनी की भावपूर्ण आरती करें। Maa Katyayani अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि हे करुणामयी माता, पूजा में अनजाने में हुई किसी भी त्रुटि को क्षमा कर हमारे परिवार पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।

    माता का प्रिय भोग और शुभ रंग का महत्व :The Significance of the Mother Goddess’s Favorite Offering and Auspicious Color

    1. प्रिय भोग (Sacred Bhog – शहद / मधु):

    धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, Maa Katyayani को शुद्ध शहद (Honey) सर्वाधिक प्रिय है:

    शहद का नैवेद्य: नवरात्रि के छठे दिन माता को शहद का भोग लगाना अत्यंत अनिवार्य और शुभ माना गया है। यदि शहद को चांदी या मिट्टी के शुद्ध पात्र में रखकर अर्पित किया जाए, तो इसका फल कई गुना बढ़ जाता है।

    आकर्षण व तेज की प्राप्ति: ऐसा माना जाता है कि माता को शहद अर्पित करने से साधक के व्यक्तित्व में अलौकिक आकर्षण, वाणी में मधुरता, तन में कांति और आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।

    अतिरिक्त भोग: शहद के अतिरिक्त माता को गाय के दूध की खीर, बेसन के लड्डू, केसरिया पेड़ा और मौसमी फलों का भोग भी लगाया जा सकता है।

    2. नवरात्रि के छठे दिन का शुभ रंग (Auspicious Colors):

    परंपरागत रूप से मां कात्यायनी की पूजा में निम्नलिखित रंगों का विशेष महत्व है:

    पीला (Yellow) व लाल (Red) रंग: गोधूलि वेला की पूजा में पीले अथवा लाल वस्त्र धारण करना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। Maa Katyayani पीला रंग ज्ञान, गुरु कृपा, विवाह और सुख का प्रतीक है, जबकि लाल रंग शक्ति, पराक्रम और सौभाग्य का परिचायक है।

    हरा (Green) व स्लेटी (Grey) रंग: कुछ पंचांगीय परंपराओं में छठे दिन हरा रंग (समृद्धि व नवजीवन) या ग्रे रंग (संयम व स्थिरता) पहनने का भी चलन है।

    शीघ्र विवाह और वैवाहिक सुख के लिए अचूक उपाय : Surefire remedies for early marriage and marital happiness.

    जिन युवक-युवतियों के विवाह में अनावश्यक विलंब हो रहा हो, रिश्ते तय होकर टूट जाते हों, या वैवाहिक जीवन में तनाव रहता हो, उनके लिए नवरात्रि का छठा दिन एक वरदान के समान है:

    हल्दी की गांठों का उपाय:

      नवरात्रि के छठे दिन संध्या काल में पीले वस्त्र धारण करें।

      मां कात्यायनी के सम्मुख घी का दीपक जलाएं और उन्हें पीले पुष्प अर्पित करें।

      इसके पश्चात साबुत हल्दी की 3 या 6 गांठें माता के चरणों में अर्पित करें।

      देवी के विवाह मंत्र (ॐ कात्यायनी महामाये…) का कम से कम 108 बार जप करें।

      पूजा के बाद इन हल्दी की गांठों को पीले रेशमी कपड़े में बांधकर अपने पास सुरक्षित रख लें। मान्यता है कि इससे शीघ्र ही सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।

      नारियल और चुनरी की भेंट:

        माता को एक जटा वाला नारियल लाल चुनरी में लपेटकर और साथ में 5 सुपारी व सिक्का रखकर अर्पित करें। इससे कुंडली का गुरु दोष और मांगलिक दोष शांत होता है।

        दाम्पत्य सुख के लिए शहद का अर्पण:

          यदि पति-पत्नी के बीच कलह रहता हो, तो दोनों मिलकर माता को शहद अर्पित करें और कात्यायनी आरती गाएं। इससे दांपत्य जीवन में मिठास और प्रेम बढ़ता है।

          सिद्ध ध्यान, स्तुति, स्तोत्र और कवच मंत्र

          पूजा के समय इन पवित्र शास्त्रीय मंत्रों का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें:

          1. मुख्य प्रार्थना श्लोक (Prarthana Shloka):

          चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

          भावार्थ: चंद्रहास रूपी उज्ज्वल तलवार को अपने कर-कमल में धारण करने वाली, Maa Katyayani श्रेष्ठ सिंह पर सवार रहने वाली और दानवों का संहार करने वाली देवी कात्यायनी सदा मेरे लिए शुभ और मंगलकारी सिद्ध हों।

          2. मुख्य बीज मंत्र (Beej Mantra):

          “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥” “क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नमः॥” “ॐ ह्रीं नमः॥”

          3. स्तुति मंत्र (Stuti Mantra):

          या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

          4. शीघ्र विवाह हेतु कात्यायनी मंत्र (Marriage Mantra):

          “कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः॥

          5. ध्यान श्लोक (Dhyan Shloka):

          वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥ स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥ पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

          6. कात्यायनी स्तोत्र (Katyayani Stotram):

          कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां। स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥ पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां। सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥ परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

          7. कात्यायनी देवी कवच (Katyayani Kavacham):

          कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी। ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥ कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

          साधना से मिलने वाले अलौकिक लाभ : Supernatural benefits derived from spiritual practice

          शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि जो साधक सच्चे हृदय, पवित्र भाव और निष्ठा से Maa Katyayani की आराधना करते हैं, उन्हें निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

          चारों पुरुषार्थों की सुलभ प्राप्ति: देवी की कृपा से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।

          विवाह बाधाओं का संपूर्ण निवारण: विवाह योग्य कन्याओं और युवकों को मनचाहा और श्रेष्ठ जीवनसाथी मिलता है Maa Katyayani तथा वैवाहिक जीवन सुखमय बनता है।

          रोग, शोक, भय और संताप का नाश: यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से बीमार हो Maa Katyayani या अज्ञात भय से ग्रसित हो, Maa Katyayani तो माता की कृपा से उसके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।

          आज्ञा चक्र का जागरण व अलौकिक तेज: साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थिर होने से उसके व्यक्तित्व में आकर्षण और आत्मिक तेज का संचार होता है।

          शत्रु बाधा व नकारात्मक शक्तियों का शमन: दानवघातिनी देवी अपने भक्तों की सभी Maa Katyayani आंतरिक व बाह्य शत्रुओं से रक्षा करती हैं।

            माँ कात्यायनी की संपूर्ण आरती : The Complete Aarti of Maa Katyayani

            जय जय अम्बे जय कात्यायनी। जय जग माता जग की महारानी॥ बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वरदानी दाता नाम पुकारा॥ कई नाम हैं कई धाम हैं। यह स्थान भी तो सुखधाम है॥ हर मंदिर में ज्योत तुम्हारी। कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी॥ हर जगह उत्सव होते रहते। हर मंदिर में भक्त हैं कहते॥ कात्यायनी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की॥ झूठे मोह से छुड़ाने वाली। अपना नाम जपाने वाली॥ बृहस्पतिवार को पूजा करियो। ध्यान कात्यायनी का धरियो॥ हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी॥ जो भी मां को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥ जय जय अम्बे जय कात्यायनी। जय जग माता जग की महारानी॥

            पूजन का संक्षिप्त सारणी विवरण

            प्रमुख पहलूशास्त्रीय विवरण
            देवी का स्वरूपचतुर्भुजा (अभय, वरद, चंद्रहास खड्ग, कमल), सिंह सवारी, स्वर्ण कांति
            पूजा तिथि 2026शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 (आश्विन शुक्ल षष्ठी)
            विशेष पूजा कालगोधूलि वेला (संध्याकाल) — सूर्यास्त का पावन समय
            शुभ रंगपीला (Yellow) एवं लाल (Red) — ज्ञान, तेज, वधू रूप व ऊर्जा
            प्रिय भोगशुद्ध शहद (Honey) — चांदी या मिट्टी के पात्र में अर्पण
            प्रिय पुष्पपीले कनेर, मोगरा, चमेली और लाल गुलाब/गुड़हल
            मुख्य मंत्र“चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना…” / “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः”
            विवाह मंत्र“कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरी…”
            आध्यात्मिक चक्रआज्ञा चक्र (Third Eye Chakra) — अंतर्दृष्टि, आत्मदान व ज्ञान

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