Maa Skandamata Puja Vidhi : सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में आश्विन मास के दौरान मनाया जाने वाला शारदीय नवरात्रि का पावन महापर्व आदिशक्ति जगदंबे की नवधा भक्ति, अंतःकरण की शुद्धि और वात्सल्यमयी ऊर्जा के संवर्धन का सबसे बड़ा अनुष्ठान है। नौ दिनों तक चलने वाले इस आध्यात्मिक महापर्व में मां नवदुर्गा के नौ विशिष्ट और अलौकिक स्वरूपों की क्रमबद्ध आराधना की जाती है। प्रथम दिन मां शैलपुत्री की घटस्थापना, द्वितीय दिन मां ब्रह्मचारिणी के तपोमय स्वरूप, तृतीय दिन मां चंद्रघंटा के वीर-सौम्य स्वरूप और चतुर्थ दिन ब्रह्मांड की आद्यशक्ति मां कूष्मांडा के पूजन के उपरांत, नवरात्रि के पांचवें पावन दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप Maa Skandamata की विशेष पूजा-अर्चना और साधना का विधान है।
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के तेजस्वी पुत्र भगवान कार्तिकेय का एक प्रसिद्ध नाम ‘स्कंद’ भी है। भगवान स्कंद (मुरुगन) की माता होने के कारण ही आदिशक्ति के इस ममतामयी और करुणामयी स्वरूप को ‘स्कंदमाता’ नाम से पुकारा जाता है। Maa Skandamata देवी का यह स्वरूप मातृत्व, सुरक्षा, अगाध वात्सल्य, तेज और वीरता का अनुपम संगम है।
वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि के पंचम दिन की पूजा गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को पूरे देश में अपार श्रद्धा, सात्विकता और भक्तिभाव के साथ संपन्न की जाएगी। आज हम Maa Skandamata की पंचांगीय तिथि, अलौकिक स्वरूप, पद्मासना देवी कहलाने का रहस्य, विशुद्ध चक्र साधना, तारकासुर वध से जुड़ी पौराणिक व्रत कथा, घटस्थापना कलश के साथ षोडशोपचार पूजन विधि, प्रिय भोग (केला), सिद्ध ध्यान व बीज मंत्र, कवच, स्तोत्र, शुभ रंग (पीला) और साधना के आध्यात्मिक लाभों का सविस्तार विवेचन करेंगे।
मां स्कंदमाता का अलौकिक स्वरूप और पद्मासना का रहस्य :Supernatural form of Mother Skandamata and the secret of Padmasana
शास्त्रों और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, Maa Skandamata का स्वरूप अत्यंत दिव्य, शांत, करुणामयी और वात्सल्य से परिपूर्ण है। Maa Skandamata माता का यह स्वरूप एक स्नेहमयी माता के रूप में भक्तों को अभय और सुरक्षा प्रदान करता है
शुभ्र वर्ण और चार भुजाएं (Chaturbhuja): देवी का वर्ण अत्यंत शुभ्र (श्वेत एवं कांतिमय) है। माता की चार भुजाएं हैं।
कमल पुष्प और मुद्राएं: देवी अपने ऊपर की दोनों भुजाओं में कमल का पुष्प (कमल दल) धारण करती हैं, जो पवित्रता, अनासक्ति और आध्यात्मिक चेतना के खिलने का प्रतीक है । Maa Skandamata इनकी एक भुजा ऊपर उठी हुई वरद/अभय मुद्रा में है, जो भक्तों को भयमुक्ति और सुरक्षा का आशीर्वाद देती है ।
गोद में बाल स्कंद (कुमार कार्तिकेय): माता अपनी चौथी भुजा से अपनी गोद में बैठे बाल रूप भगवान स्कंद (कार्तिकेय/मुरुगन) को स्नेहपूर्वक थामे हुए हैं। Maa Skandamata भगवान कार्तिकेय देवताओं के सेनापति और वीरता के प्रतीक हैं।
पद्मासना देवी (Seated on Lotus): देवी कमल के विशाल पुष्प पर विराजमान रहती हैं, Maa Skandamata जिसके कारण इन्हें शास्त्रों में ‘पद्मासना देवी’ (Padmasana Devi) भी कहा जाता है।
सिंह की सवारी (Mrigendravahana): यद्यपि देवी कमल पर आसन ग्रहण करती हैं, किंतु इनका वाहन पराक्रमी सिंह है। Maa Skandamata यह इस बात का प्रतीक है कि ममता और वात्सल्य के साथ-साथ धर्म और संतानों की रक्षा के लिए देवी के पास सिंह जैसा अदम्य साहस और संहारक शक्ति भी विद्यमान है ।
सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी: शास्त्रों में मान्यता है कि देवी सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं । Maa Skandamata इनकी उपासना करने वाले साधक के मुखमंडल और आभा पर अलौकिक तेज और कांति का संचार होता है ।
आध्यात्मिक चक्र: विशुद्ध चक्र (कंठ चक्र) की दिव्य साधना :Spiritual Chakra: Divine Practice of the Vishuddha Chakra (Throat Chakra)
Maa Skandamata नवरात्रि का प्रत्येक दिन मानव शरीर में स्थित षट्चक्रों (ऊर्जा केंद्रों) के जागरण और शुद्धि से संबंधित है
प्रथम दिन: मूलाधार चक्र (पृथ्वी तत्व व स्थिरता)
द्वितीय दिन: स्वाधिष्ठान चक्र (आत्मसंयम व तप)
तृतीय दिन: मणिपुर चक्र (साहस व पराक्रम)
चतुर्थ दिन: अनाहत चक्र (प्रेम व करुणा)
पंचम दिन (विशुद्ध चक्र): नवरात्रि के पांचवें दिन साधक का चित्त अनाहत से ऊपर उठकर कंठ में स्थित ‘विशुद्ध चक्र’ (Vishuddha Chakra) में प्रवेश करता है ।
ध्यान मंत्र में देवी को “धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पञ्चम दुर्गा त्रिनेत्राम्” कहा गया है। विशुद्ध चक्र वाणी, सत्य अभिव्यक्ति, उच्चतर ज्ञान, रचनात्मकता और मानसिक शुद्धि का केंद्र है । जब साधक पांचवें दिन निष्काम भाव से Maa Skandamata का ध्यान विशुद्ध चक्र में करता है, तो उसकी वाणी में सरस्वती का वास हो जाता है, Maa Skandamata हिचकिचाहट और संशय दूर होते हैं तथा साधक की संचार क्षमता अत्यंत प्रभावशाली हो जाती है । पौराणिक मान्यता है कि महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशम्’ और ‘मेघदूतम्’ जैसे अमर महाकाव्य इन्हीं देवी की अनुकंपा से संभव हुए थे।
🙏 पढ़ें सभी मंत्र और स्तोत्र एक जगह — निःशुल्क!
आज ही KARMASU ऐप पर पढ़ें और अपनी भक्ति व साधना को नई दिशा दें।
📲 अभी KARMASU ऐप डाउनलोड करेंKARMASU | Digital Hindu Gurukul
2026 में पूजन की तिथि और पंचांगीय मुहूर्त : Date of worship and auspicious timings (Panchang-based) in 2026
वैदिक पंचांगीय गणना और ज्योतिषीय नियमों के अनुसार, वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की पंचमी तिथि का विवरण निम्नलिखित है…
पूजा की मुख्य तिथि: गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026[2]
पंचांगीय पंचमी तिथि का विस्तार: 15 अक्टूबर 2026 से प्रारंभ होकर 16 अक्टूबर 2026 को प्रातः 05:55 AM तक रहेगी।
उदयातिथि नियम: 15 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय के समय पंचमी तिथि विद्यमान रहने के कारण इसी दिन पांचवें नवरात्र का व्रत और पूजन संपन्न होगा ।
शुभ पूजा मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:43 AM से 05:33 AM तक (साधना व ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ)
प्रातःकालीन शुभ पूजा मुहूर्त: प्रातः 06:23 AM से 08:30 AM तक
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:26 PM से 01:15 PM तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:51 PM से 03:40 PM तक
गोधूलि मुहूर्त (संध्या आरती): सायं 05:51 PM से 06:16 PM तक
गुरुवार का दिन देवगुरु बृहस्पति (ज्ञान, संतान और धर्म के कारक) का दिन माना जाता है। Maa Skandamata इस दिन माता स्कंदमाता की पूजा होने से संतान सुख, विद्या, ज्ञान और देवगुरु की विशेष कृपा का दुर्लभ संयोग बनता है[16][51]। इसके साथ ही ज्योतिष शास्त्र में देवी को बुध ग्रह (Planet Mercury) के संचालन की भी अधिष्ठात्री शक्ति माना जाता है, जिससे बुद्धि और व्यापारिक उन्नति के द्वार खुलते हैं[16][34]।
पौराणिक व्रत कथा: तारकासुर वध और स्कंदमाता का प्राकट्य :Mythological Vrat Katha: The Slaying of Tarakasura and the Manifestation of Skandamata
पौराणिक धर्मग्रंथों में वर्णित पावन कथा के अनुसार, प्राचीन काल में ‘तारकासुर’ नामक एक महापराक्रमी और क्रूर दैत्य हुआ । Maa Skandamata उसने तीनों लोकों पर अधिकार करने के उद्देश्य से भगवान ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की[19]। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा।
तारकासुर ने अमरता का वरदान मांगा, परंतु ब्रह्मा जी ने कहा कि जिसका जन्म हुआ है, Maa Skandamata उसकी मृत्यु निश्चित है। इस पर तारकासुर ने अत्यंत चालाकी से वरदान मांगा कि “मेरी मृत्यु केवल और केवल भगवान शिव के औरस पुत्र के हाथों ही हो”। तारकासुर जानता था कि देवी सती के भस्म होने के पश्चात भगवान शिव घोर समाधि में लीन हैं और वे पुनः विवाह नहीं करेंगे। अतः वह स्वयं को अजेय और अमर मान बैठा।
वरदान पाते ही तारकासुर ने स्वर्गलोक, पृथ्वी और पाताल में हाहाकार मचा दिया। उसने देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया और ऋषि-मुनियों के यज्ञ विध्वंस करने लगा। Maa Skandamata पीड़ित देवता भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। देवताओं की प्रार्थना पर आदिशक्ति ने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या करके भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया।
शिव और पार्वती के मिलन से ‘स्कंद’ (भगवान कार्तिकेय) का जन्म हुआ । Maa Skandamata माता पार्वती ने स्वयं अपने पुत्र स्कंद को युद्ध कला और अस्त्र-शस्त्रों की दीक्षा देकर एक अजेय योद्धा के रूप में प्रशिक्षित किया । कालांतर में भगवान स्कंद ने देवताओं के सेनापति बनकर तारकासुर का वध किया और तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया। Maa Skandamata भगवान स्कंद की माता होने के गौरव के कारण ही माता पार्वती का यह वात्सल्यमयी स्वरूप संसार में ‘स्कंदमाता’ के नाम से अमर हुआ।
मां कूष्मांडा की प्रामाणिक एवं सरल गृह पूजन विधि
नवरात्रि के पांचवें दिन घर पर सात्विकता और शास्त्रीय विधि से पूजा संपन्न करने के लिए इन सरल चरणों का पालन करें
स्नान व शुद्धि: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पूर्व उठें। स्नानादि के उपरांत पीले (Yellow) रंग के स्वच्छ और सात्विक वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल की शुद्धि: अपने घर के मंदिर और प्रथम दिन स्थापित घटस्थापना कलश के चारों ओर गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
दीपक प्रज्वलन व संकल्प: मां भगवती और कलश देवता के सम्मुख गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक और सुगंधित धूपबत्ती प्रज्वलित करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजन का संकल्प लें।
कलश व नवग्रह पूजन: प्रथम दिन स्थापित कलश, भगवान गणेश, वरुण देव और नवग्रहों को प्रणाम करें तथा रोली, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
देवी का आह्वान व ध्यान: हाथ में अक्षत और पीले/लाल पुष्प लेकर माता के ध्यान श्लोक (सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया…) का पाठ करते हुए देवी का सादर आह्वान करें।
स्नान व अभिषेक: यदि माता की धातु की मूर्ति हो, तो गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से प्रतीकात्मक स्नान कराएं।
तिलक, अक्षत व वस्त्र: माता को कुमकुम, रोली, चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं। माता को पीले रंग के वस्त्र या चुनरी और सौभाग्य सूत्र (मौली) अर्पित करें।
पुष्प अर्पण: देवी को कमल का पुष्प सर्वाधिक प्रिय है[4]। इसके अतिरिक्त पीले कनेर, लाल गुड़हल या गुलाब के ताजे पुष्पों की माला माता को अर्पित करें।
भोग अर्पण: मां को पके हुए ताजे केले (Bananas), पीली मिठाइयां (बेसन के लड्डू, पेड़ा), छह छोटी इलायची और ऋतु फलों का नैवेद्य अर्पित करें।
मंत्र जप व स्तोत्र पाठ: कमलगट्टे या रुद्राक्ष की 108 दानों वाली माला से शांत चित्त होकर माता के सिद्ध बीज मंत्र का कम से कम एक माला जप करें। इसके उपरांत स्कंदमाता स्तोत्र, कवच या दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय का पाठ करें।
आरती व क्षमा याचना: कर्पूर और घी के दीप से मां स्कंदमाता की भावपूर्ण आरती करें। Maa Skandamata अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि हे जगदंबे, पूजा में अनजाने में हुई किसी भी भूल-चूक को क्षमा कर हमारे परिवार पर अपनी छत्रछाया बनाए रखें।
माता का प्रिय भोग और प्रिय रंग का महत्व
1. प्रिय भोग (Sacred Bhog – केला व पीली मिठाई)
धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, Maa Skandamata को केला (Banana) सर्वाधिक प्रिय है
केले का नैवेद्य: नवरात्रि के पांचवें दिन माता को ताजे पके केले और केले से बने सात्विक पकवानों का भोग लगाने का विधान है ।
आरोग्य और बुद्धि का वरदान: ऐसा माना जाता है कि माता को केला अर्पित करने से जातक को शारीरिक व्याधियों से मुक्ति मिलती है, Maa Skandamata उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है और परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है ।
छह छोटी इलायची: कुछ पारंपरिक मान्यताओं में माता को भोग के साथ छह हरी इलायची अर्पित करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।
पीली मिठाइयां व पंचामृत: बेसन के लड्डू, केसरिया पेड़ा, मालपुआ और गाय के दूध से बना पंचामृत भी माता को अर्पित किया जा सकता है।
2. प्रिय रंग (Auspicious Color – पीला रंग)
वर्ष 2026 में गुरुवार, 15 अक्टूबर के दिन पड़ने वाले नवरात्रि के पांचवें दिन का पारंपरिक और सर्वाधिक शुभ रंग पीला (Yellow) है
पीला रंग सूर्य के तेज, आशावाद, ज्ञान, सकारात्मक ऊर्जा, सौम्यता, सुख और दिव्यता का प्रतीक है ।
गुरुवार का दिन होने के कारण पीला रंग देवगुरु बृहस्पति के प्रभाव को भी प्रबल करता है।
पूजा के दिन पीले वस्त्र धारण करने, पूजा वेदी पर पीले पुष्प अर्पित करने और सात्विक वातावरण निर्मित करने से साधक के जीवन से नकारात्मकता का नाश होता है।
सिद्ध ध्यान, स्तुति, स्तोत्र और कवच मंत्र
पूजा और ध्यान के समय इन पवित्र शास्त्रीय मंत्रों का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें
1. मुख्य बीज मंत्र (Beej Mantra):
> “ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥” “ॐ देवी स्कन्दमात्रे नमः॥” “ॐ ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नमः॥”
2. मुख्य प्रार्थना श्लोक (Prarthana Shloka):
> सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
भावार्थ: जो सदैव सिंह रूपी सिंहासन पर विराजमान रहती हैं, जिनके दोनों हाथों में कमल पुष्प सुशोभित हैं, वे यशस्विनी देवी स्कंदमाता सदा हमारे लिए शुभ और मंगलकारी सिद्ध हों।
3. स्तुति मंत्र (Stuti Mantra)
> या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
4. ध्यान मंत्र (Dhyan Shloka):
> वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्विनीम्॥ धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पञ्चम दुर्गा त्रिनेत्राम्। अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
5. स्कंदमाता कवच (Skandamata Kavacham)
> ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मधरापरा। हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥ श्रीं ह्रीं हुं ऐं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा। सर्वाङ्गं मे सदा पातु स्कन्दमाता पुत्रप्रदा॥ वाणवाणामृते हुं फट् बीज समन्विता। उत्तरस्यां तथाग्नेये वारुणे नैर्ऋतेऽवतु॥ इन्द्राणी भैरवी चैवासिताङ्गी च संहारिणी। सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥
साधना से मिलने वाले अलौकिक लाभ
शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि जो साधक सच्चे हृदय, पवित्र भाव और निष्ठा से Maa Skandamata की आराधना करते हैं, उन्हें निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं
संतान सुख की प्राप्ति: जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में बाधाएं आ रही हों या संतान की उन्नति की कामना हो, उनके लिए स्कंदमाता की पूजा कल्पवृक्ष के समान फलदायी मानी जाती है ।
मां और पुत्र दोनों का दोहरा आशीर्वाद: इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है Maa Skandamata कि स्कंदमाता की आराधना करने से गोद में विराजमान भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की पूजा स्वतः ही संपन्न हो जाती है, जिससे वीरता और वात्सल्य दोनों प्राप्त होते हैं।
अज्ञान का नाश और बुद्धि का विकास: मान्यता है कि देवी की कृपा से मूर्ख या अज्ञानी व्यक्ति भी ज्ञानवान और प्रखर बुद्धि वाला बन जाता है।
मोक्ष और भवसागर से मुक्ति: सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री होने के कारण यह देवी साधक के लिए मोक्ष का द्वार खोलती हैं Maa Skandamata और समस्त सांसारिक कष्टों का निवारण करती हैं।
वाणी और अभिव्यक्ति में आकर्षण: विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने से साधक की वाणी प्रभावशाली, सत्यनिष्ठ और मधुर हो जाती है।
माँ स्कंदमाता की संपूर्ण आरती
जय तेरी हो स्कंद माता। पांचवां नाम तुम्हारा आता॥ सब के मन की जानन हारी। जग जननी सब की महतारी॥ तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं। हरदम तुम्हें ध्याता रहूं मैं॥ कई नामों से तुझे पुकारा। मुझे एक है तेरा सहारा॥ कहीं पहाड़ों पर है डेरा। कई शहरों में तेरा बसेरा॥ हर मंदिर में तेरे नजारे। गुण गाएं तेरे भक्त प्यारे॥ भक्ति अपनी मुझे दिला दो। शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो॥ इंद्र आदि देवता मिल सारे। करें पुकार तुम्हारे द्वारे॥ दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए। तुम ही खंडा हाथ उठाए॥ दासों को सदा बचाने आई। ‘चमन’ की आस पुजाने आई॥ जय तेरी हो स्कंद माता। पांचवां नाम तुम्हारा आता॥
पूजन का संक्षिप्त सारणी विवरण
| प्रमुख पहलू | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| देवी का स्वरूप | चतुर्भुजा (चार हाथ), गोद में बाल स्कंद, हाथों में कमल, अभय मुद्रा, सिंह सवारी |
| पूजा तिथि 2026 | गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 (आश्विन शुक्ल पंचमी) |
| विशेष नाम | पद्मासना देवी, सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री |
| शुभ रंग | पीला (Yellow) — ज्ञान, तेज, आशावाद व गुरु कृपा का प्रतीक |
| प्रिय भोग | पका हुआ केला (Banana), छह इलायची, पीली मिठाइयां, पंचामृत |
| प्रिय पुष्प | कमल का पुष्प (Lotus), पीले व लाल पुष्प |
| मुख्य मंत्र | “सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया…” / “ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः” |
| आध्यात्मिक चक्र | विशुद्ध चक्र (Throat Chakra) — वाणी शुद्धि, ज्ञान व विवेक |

KARMASU