Navratri 2026 Day 7 Maa Kalaratri Puja Vidhi: सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में आश्विन मास के दौरान मनाया जाने वाला शारदीय नवरात्रि का पावन महापर्व आदिशक्ति जगदंबे की नवधा भक्ति, अंतःकरण की शुद्धि, अज्ञान के अंधकार के शमन और आत्मिक तेज के जागरण का सबसे बड़ा आध्यात्मिक अनुष्ठान है।
नौ दिनों तक चलने वाले इस दिव्य उत्सव में मां नवदुर्गा के नौ विशिष्ट और कल्याणकारी स्वरूपों की क्रमबद्ध आराधना की जाती है। Maa Kalaratri प्रथम दिन मां शैलपुत्री की घटस्थापना, द्वितीय दिन मां ब्रह्मचारिणी के तपोमय स्वरूप, तृतीय दिन मां चंद्रघंटा की वीर-सौम्य आभा, चतुर्थ दिन मां कूष्मांडा की सृष्टि-रचना, पंचम दिन मां स्कंदमाता के ममतामयी वात्सल्य और षष्ठम दिन महिषासुरमर्दिनी मां कात्यायनी के पूजन के उपरांत, नवरात्रि के सातवें पावन दिन मां दुर्गा के सप्तम स्वरूप Maa Kalaratri की विशेष पूजा-अर्चना और साधना का विधान है ।
शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी तिथि का यह दिन शक्ति की परम संहारक और साथ ही भक्तों के लिए परम कल्याणकारी ऊर्जा के साक्षात्कार का दिन माना जाता है । वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 को पूरे देश में अपार श्रद्धा, सात्विकता और तंत्र-मंत्र साधना के साथ संपन्न की जाएगी। आज हम Maa Kalaratri के अलौकिक व भयानक स्वरूप, ‘शुभंकरी’ कहलाने का आध्यात्मिक रहस्य, सहस्रार चक्र की सर्वोच्च साधना, 2026 के पंचांगीय मुहूर्त, शुंभ-निशुंभ व रक्तबीज वध की पौराणिक कथा, षोडशोपचार पूजा विधि, प्रिय भोग (गुड़ व मालपुआ), सिद्ध मंत्र, कवच, स्तोत्र, शुभ रंग (नारंगी व ग्रे) और शनि दोष निवारण के अचूक उपायों का सविस्तार विवेचन करेंगे।
मां कालरात्रि का अलौकिक स्वरूप और दिव्य प्रतीक : The Transcendent Form and Divine Symbols of Goddess Kaalratri
शास्त्रों, मार्कंडेय पुराण और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, Maa Kalaratri का स्वरूप समस्त नवदुर्गाओं में सर्वाधिक भयानक, रौद्र और विस्मयकारी है। किंतु इस बाह्य भयानक रूप के भीतर अपने निष्काम भक्तों के लिए अपार वात्सल्य, अभय और मंगलकारी आशीर्वाद समाहित है
घने अंधकार सा कृष्ण वर्ण: देवी का शरीर रात के घने अंधकार की भांति पूर्णतः काला (कृष्ण वर्ण) है। यह काला वर्ण इस बात का द्योतक है कि जिस प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व गहन अंधकार था और प्रलय के पश्चात सब कुछ शून्य में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार कालरात्रि ही संपूर्ण काल (समय) और ब्रह्मांडीय शून्यता की आधार शक्ति हैं।
बिखरे हुए बाल (Disheveled Hair): देवी के सिर के केश खुले हुए और बिखरे हुए हैं, जो उनकी अदम्य स्वतंत्रता, स्वच्छंदता और आसुरी शक्तियों के विरुद्ध युद्धोन्माद को प्रदर्शित करते हैं।
ब्रह्मांड के समान तीन गोल नेत्र: माता के तीन नेत्र हैं, जो ब्रह्मांड की भांति पूर्ण गोल और विद्युत (बिजली) के समान तेज बिखेरने वाले हैं। इनसे लगातार ज्ञान और विनाश की दिव्य किरणें निकलती हैं।
नाभिनाल और श्वास से निकलती अग्नि ज्वालाएं : जब देवी श्वास-प्रश्वास लेती हैं, तो उनकी नासिका और मुख से भयंकर अग्नि की ज्वालाएं निकलती हैं, जो पापियों और राक्षसों को भस्म कर देती हैं।
गले में विद्युत की माला: माता के कंठ में श्वेत रंग की माला सुशोभित है, जो आकाशीय बिजली (तड़ित) की भांति चमकती है।
चतुर्भुज स्वरूप और दिव्यास्त्र: देवी की चार भुजाएं हैं। दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ भक्तों को अभय प्रदान करने वाली ‘वर मुद्रा’ में है, और नीचे वाला दाहिना हाथ सुरक्षा देने वाली ‘अभय मुद्रा’ में है[3][12]। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कंटीला कांटा (लोहलता/वज्र) और नीचे वाले हाथ में तीक्ष्ण खड्ग (कटार/तलवार) सुशोभित है।
गर्दभ (गधा) की सवारी: माता का वाहन गर्दभ (गधा) है। गधा अत्यंत परिश्रमी, अडिग, धैर्यवान और शीतलता का प्रतीक माना गया है। यह इस बात का संदेश देता है कि साधना के पथ पर साधक को सभी प्रकार के मिथ्या अहंकार और आडंबर को त्यागकर धैर्यपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए।
‘शुभंकरी’ नाम का आध्यात्मिक रहस्य : The spiritual significance of the name ‘Shubhankari’
यद्यपि माता का रूप देखने में अत्यंत विकराल और भय उत्पन्न करने वाला है, तथापि इनका एक सर्वप्रसिद्ध नाम ‘शुभंकरी’ (Shubhankari) है। ‘शुभंकरी’ का अर्थ है सदा शुभ और कल्याण करने वाली। देवी अपने भक्तों को कभी किसी प्रकार का कष्ट या भय नहीं होने देतीं। वे केवल दुष्टों, पिशाचों, राक्षसों, भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों के लिए भयंकर हैं, जबकि अपने सच्चे भक्तों के लिए वे सदैव वरदायिनी और ममतामयी माता हैं[1]। इसलिए भक्तों को उनके भयानक स्वरूप से भयभीत होने की किंचित भी आवश्यकता नहीं है।
आध्यात्मिक चक्र: सहस्रार चक्र (Crown Chakra) की सर्वोच्च साधना : Spiritual Chakra: The Supreme Practice of the Sahasrara Chakra (Crown Chakra)
योग साधना, तंत्र और कुंडलिनी जागरण की दृष्टि से नवरात्रि की सप्तमी तिथि का विशेष और सर्वोच्च महत्व है…
प्रथम दिन: मूलाधार चक्र (पृथ्वी तत्व व शारीरिक आधार)
द्वितीय दिन: स्वाधिष्ठान चक्र (जल तत्व व आत्मसंयम)
तृतीय दिन: मणिपुर चक्र (अग्नि तत्व व पराक्रम)
चतुर्थ दिन: अनाहत चक्र (वायु तत्व व हृदय की करुणा)
पंचम दिन: विशुद्ध चक्र (आकाश तत्व व वाणी की शुद्धि)
षष्ठम दिन: आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य, अंतर्दृष्टि व विवेक)
सप्तम दिन (सहस्रार चक्र): नवरात्रि के सातवें दिन साधक का चित्त आज्ञा चक्र से भी ऊपर उठकर सिर के शीर्ष भाग में स्थित ‘सहस्रार चक्र’ (Sahasrara Chakra / Crown Chakra) में प्रविष्ट हो जाता है।
सहस्रार चक्र को ‘सहस्रदल कमल’ या ब्रह्मरंध्र भी कहा जाता है। यह मानव चेतना और परमात्मा के मिलन का सर्वोच्च केंद्र है। जब साधक सातवें दिन Maa Kalaratri की अनन्य साधना में लीन होता है, तो उसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों और गुप्त ज्ञान के द्वार खुल जाते हैं। साधक को मृत्यु के भय, काल के बंधन और सांसारिक माया से मुक्ति मिल जाती है और वह पूर्णतः स्थितप्रज्ञ बनकर मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है।
वर्ष 2026 में पूजन की तिथि और पंचांगीय मुहूर्त :Date of worship and astrological auspicious timings for the year 2026
वैदिक पंचांगीय गणना और ज्योतिषीय नियमों के अनुसार, वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी तिथि का विवरण निम्नलिखित है
पूजा की मुख्य तिथि: शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
पंचांगीय सप्तमी तिथि का प्रारंभ: शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को सायं 06:01 PM से
पंचांगीय सप्तमी तिथि का समापन: शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 को सायं 05:54 PM तक (इसके पश्चात अष्टमी तिथि का आरंभ)
उदयातिथि नियम: चूंकि 17 अक्टूबर 2026 के सूर्योदय के समय आश्विन शुक्ल सप्तमी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए उदयातिथि के शास्त्रीय नियम के अनुसार महासप्तमी का व्रत और विधिवत पूजन 17 अक्टूबर को ही संपन्न होगा।
दिल्ली सूर्योदय समय: प्रातःकाल 06:26 AM
पूजन के शुभ मुहूर्त (Auspicious Timings 2026)
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:44 AM से 05:35 AM तक (तंत्र, मंत्र साधना व ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ)
प्रातःकालीन शुभ पूजा मुहूर्त: प्रातः 06:26 AM से 08:30 AM तक
अभिजित मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ विजय मुहूर्त): दोपहर 11:42 AM से 12:28 PM तक
गोधूलि मुहूर्त (संध्या आरती): सायं 05:45 PM से 06:10 PM तक
निशीथ काल (मध्यरात्रि तंत्र व दीप साधना): रात 11:41 PM से 12:32 AM (18 अक्टूबर) तक
शनिवार और कालरात्रि का दुर्लभ संयोग: वर्ष 2026 में महासप्तमी का पर्व शनिवार के दिन पड़ रहा है। वैदिक ज्योतिष में मां कालरात्रि को ‘शनि ग्रह’ (Planet Saturn) की अधिष्ठात्री नियंत्रक देवी माना गया है। शनिवार के दिन कालरात्रि की पूजा होने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, महादशा और कालसर्प जैसे गंभीर दोषों से तत्काल मुक्ति पाने का यह एक अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी महासंयोग बन रहा है।
पौराणिक व्रत कथा: शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज का वध :Mythological Vrat Katha: The Slaying of Shumbha-Nishumbha, Chanda-Munda, and Raktabija
धार्मिक ग्रंथों, मार्कंडेय पुराण और दुर्गा सप्तशती के प्रधान प्रसंग के अनुसार मां कालरात्रि के प्राकट्य की कथा अत्यंत रोमांचकारी और महिमामयी है
प्राचीन काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो महापराक्रमी असुर भाइयों ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। वरदान के मद में चूर होकर उन्होंने देवराज इंद्र का अमरावती सिंहासन छीन लिया, सूर्य, चंद्र, वायु, यम और वरुण के अधिकार अपने हाथ में ले लिए और तीनों लोकों में भयंकर त्राहिमाम मचा दिया। असहाय देवता अपनी रक्षा के लिए हिमालय की कंदराओं में जाकर भगवती पराम्बा की स्तुति करने लगे।
देवताओं की करुण पुकार सुनकर देवी पार्वती के शरीर से ‘कौशिकी’ (मां दुर्गा/चंडी) का प्राकट्य हुआ। जब असुरराज शुंभ-निशुंभ को देवी के अनुपम सौंदर्य और तेज का समाचार मिला, तो उन्होंने देवी को बंदी बनाने के लिए अपने दो क्रूर सेनापति ‘चंड’ और ‘मुंड’ को एक विशाल सेना के साथ भेजा।
चंड और मुंड को अपनी ओर शस्त्र ताने आते देखकर देवी कौशिकी को भीषण क्रोध आ गया। क्रोध के कारण उनका ललाट काला पड़ गया और उनकी भृकुटि से अत्यंत विकराल, खड्ग और पाश धारण किए हुए देवी कालरात्रि प्रकट हुईं। कालरात्रि ने पलक झपकते ही चंड और मुंड की विशाल सेना को कुचल डाला। उन्होंने अपनी विशाल तलवार से चंड का मस्तक काट दिया और मुंड को भी यमलोक पहुंचा दिया। चंड और मुंड का वध करने के कारण ही मां कालरात्रि को संसार में ‘चामुंडा’ (Chamunda) नाम से भी जाना गया।
इसके उपरांत युद्ध भूमि में महाभयंकर असुर ‘रक्तबीज’ आया। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से रक्त की एक भी बूंद यदि पृथ्वी पर गिरेगी, तो उस बूंद से तुरंत उसी के समान बलशाली दूसरा रक्तबीज उत्पन्न हो जाएगा। जैसे ही देवी के शस्त्रों से रक्तबीज घायल हुआ और उसका रक्त धरती पर गिरा, हजारों रक्तबीज पैदा हो गए। देवताओं में घोर निराशा छा गई।
तब मां चंडी ने कालरात्रि से कहा—”हे चामुंडे! तुम अपना मुख अत्यंत विशाल करो और मेरे शस्त्रों के प्रहार से रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले संपूर्ण रक्त और उससे उत्पन्न होने वाले असुरों को अपने मुख में भक्षण कर लो।
भगवती चामुंडा ने वैसा ही किया। उन्होंने रणभूमि में अपनी विशाल जिह्वा (जीभ) फैला दी। जैसे ही रक्तबीज पर प्रहार होता, उसका एक भी रक्तकण भूमि पर गिरने से पहले देवी के मुख में समा जाता। माता ने रक्तबीज के रक्त की अंतिम बूंद तक पी ली और सभी प्रतिरूपों का संहार कर दिया। अंततः रक्तहीन होकर महादैत्य रक्तबीज निर्जीव होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। इस प्रकार मां कालरात्रि ने देवताओं और तीनों लोकों को भयमुक्त किया।
मां कालरात्रि की प्रामाणिक एवं सरल गृह पूजन विधि :Authentic and simple home worship ritual for Goddess Kaalratri
Maa Kalaratri नवरात्रि के सातवें दिन घर पर पूर्ण सात्विकता, शास्त्रीय विधि और एकाग्रता से पूजा संपन्न करने के लिए इन सरल चरणों का पालन करें
स्नान व शुद्धि: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय उठकर स्नानादि से निवृत्त हों । Maa Kalaratri इस दिन नारंगी (Orange) या गहरे/ग्रे रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना श्रेष्ठ माना जाता है।
पूजा स्थल की शुद्धि: अपने घर के मंदिर और प्रथम दिन स्थापित घटस्थापना कलश के चारों ओर गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
सरसों के तेल या घी का दीपक: Maa Kalaratri मां कालरात्रि की पूजा में गाय के शुद्ध घी के साथ-साथ ‘सरसों के तेल का दीपक’ (Mustard Oil Diya) जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है[29]। दीपक को पूजा वेदी के दाहिने भाग में स्थापित करें।
कलश व नवग्रह पूजन: सर्वप्रथम प्रथम दिन स्थापित कलश, भगवान श्री गणेश, वरुण देव और नवग्रहों को प्रणाम करके रोली, चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें
देवी का आह्वान व ध्यान: हाथ में लाल पुष्प (गुड़हल/गुलाब) और अक्षत लेकर माता के ध्यान श्लोक (वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा…) का पाठ करते हुए देवी का सादर आह्वान करें।
स्नान व तिलक अर्पण: यदि माता की धातु की प्रतिमा हो, तो गंगाजल से स्नान कराएं। Maa Kalaratri तत्पश्चात माता को कुमकुम, सिंदूर, लाल चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं।
पुष्प व नींबू की माला: देवी कालरात्रि को लाल गुड़हल का पुष्प (Red Hibiscus) अत्यंत प्रिय है। माता को 108 या 21 गुड़हल के ताजे फूलों की माला अर्पित करें। तंत्र और लोक परंपरा में माता को ताजे हरे/पीले नींबुओं की माला अर्पित करने का भी विधान है।
अक्षत, काले तिल व लौंग अर्पण: माता के चरणों में अक्षत के साथ थोड़े से ‘काले तिल’ (Black Sesame Seeds) और 2 साबुत लौंग अर्पित करें। यह नकारात्मक ऊर्जा का शमन करता है।
गुड़ का प्रिय भोग अर्पण: मां कालरात्रि को शुद्ध गुड़ (Jaggery) का नैवेद्य मुख्य रूप से अर्पित करें। इसके साथ ही गुड़ से बने मालपुए, गुड़ की खीर, तिल-गुड़ के लड्डू और ऋतु फल अर्पित करें।
मंत्र जप व दुर्गा सप्तशती पाठ: रुद्राक्ष की माला से शांत चित्त होकर माता के सिद्ध बीज मंत्र अथवा कालरात्रि स्तुति का कम से कम 108 बार जप करें। Maa Kalaratri इसके उपरांत दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय (चंड-मुंड वध) का पाठ अवश्य करें।
आरती व क्षमा याचना: कर्पूर और दीपक प्रज्वलित कर घंटी और शंखनाद के साथ मां कालरात्रि की आरती उतारें। अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि हे माता, अनजाने में हुई किसी भी त्रुटि को क्षमा कर हमारे जीवन से समस्त भयों और संकटों का निवारण करें।
माता का प्रिय भोग और शुभ रंग का महत्व : The Significance of the Mother Goddess’s Favorite Offering and Auspicious Color
1. प्रिय भोग (Sacred Bhog – गुड़ व गुड़ से बने पकवान):
धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, Maa Kalaratri को गुड़ (Jaggery) सर्वाधिक प्रिय है
गुड़ का नैवेद्य: नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर माता को शुद्ध देसी गुड़ का भोग लगाना अनिवार्य माना गया है।
संकट व रोग निवारण: ऐसा माना जाता है कि माता को गुड़ का भोग लगाने और उसे परिजनों व जरूरतमंदों में प्रसाद के रूप में बांटने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है, रक्त संबंधी विकार दूर होते हैं और आकस्मिक संकटों से रक्षा होती है।
गुड़ का मालपुआ: कई पारंपरिक परिवारों में इस दिन गेहूं के आटे और गुड़ की चाशनी से बने सात्विक मालपुए का भोग भी लगाया जाता है।
2. नवरात्रि के सातवें दिन का शुभ रंग (Auspicious Colors):
परंपरागत रूप से मां कालरात्रि की पूजा में निम्नलिखित रंगों का विशेष महत्व है:
नारंगी रंग (Orange Color): वर्ष 2026 के लोकप्रिय रंग कैलेंडर के अनुसार सातवें दिन नारंगी रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ है। नारंगी रंग अग्नि, तेज, ज्ञान, उत्साह और अंधकार को चीरकर निकलने वाले प्रकाश का प्रतीक है।
ग्रे या स्लेटी रंग (Gray Color): कई पंचांगीय परंपराओं में सप्तमी के दिन ग्रे रंग को प्राथमिकता दी जाती है । Maa Kalaratri ग्रे रंग संतुलन, गंभीरता, शांति और नकारात्मक ऊर्जा को सोखने की शक्ति का परिचायक है।
लाल रंग (Red Color): पूजा के समय माता को लाल चुनरी और लाल गुड़हल के फूल अर्पित करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।
शनि दोष और भय मुक्ति के अचूक शास्त्रीय उपाय :Surefire classical remedies to get rid of Shani Dosha and fear:
Maa Kalaratri जिन जातकों की कुंडली में शनि ग्रह प्रतिकूल हो, साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही हो, या जो लोग अज्ञात भय, डिप्रेशन और नजर दोष से परेशान हों, उनके लिए शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 का दिन एक महावरदान है
सरसों के तेल का दीपक:Mustard oil lamp
Maa Kalaratri शनिवार की शाम को पीपल के वृक्ष के नीचे अथवा घर के मंदिर में मां कालरात्रि के सम्मुख सरसों के तेल का एक चौमुखी दीपक जलाएं और उसमें 2 साबुत लौंग व थोड़े काले तिल डाल दें। इससे शनि का अशुभ प्रभाव तुरंत शांत होता है।
गुड़ और काले तिल का दान:Donation of jaggery and black sesame seeds
पूजा के उपरांत किसी गरीब, वृद्ध या सफाईकर्मी को शुद्ध गुड़, काले तिल और काले/ग्रे वस्त्रों का दान करें। Maa Kalaratri इससे पुराने रुके हुए कार्य बनने लगते हैं।
नींबू और लौंग का नजर दोष उपाय:Remedy using lemon and cloves to ward off the evil eye
यदि घर में लगातार क्लेश या नजर दोष हो, तो एक साबुत नींबू में 4 लौंग गाड़कर मां कालरात्रि के चरणों में रखें और मंत्र जप के बाद उसे घर के मुख्य द्वार से बाहर फेंक दें।
लोहे की वस्तु का अर्पण:Offering of an iron object:
Maa Kalaratri चूंकि शनि का धातु लोहा है, अतः मां कालरात्रि को लोहे का छोटा त्रिशूल या लोहे का छल्ला अर्पित करके धारण करने से शत्रुओं का भय समाप्त होता है[20]।
सिद्ध ध्यान, स्तुति, स्तोत्र और कवच मंत्र
Maa Kalaratri पूजा और ध्यान के समय इन पवित्र शास्त्रीय मंत्रों का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें
1. मुख्य ध्यान श्लोक (Dhyan Shloka)
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
भावार्थ: जिनके बाएं पैर में लोहे की कंटीली लता रूपी आभूषण सुशोभित हैं, जो भक्तों के कल्याण और संवर्धन के लिए तत्पर हैं, जिनका वर्ण घने अंधकार सा काला है, वे दुष्टों के लिए अत्यंत भयंकरी मां कालरात्रि हमारे समस्त कष्टों का नाश करें।
2. मुख्य बीज मंत्र (Beej Mantra):
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः॥ ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥ “क्लीं ऐं श्रीं कालिकायै नमः॥”
3. स्तुति मंत्र (Stuti Mantra):
या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
4. कालरात्रि गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra):
> ॐ महादेव्यै च विद्महे कालरात्र्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
5. कालरात्रि कवच (Kalaratri Kavacham):
> ऊर्ध्वं पातु मे शीर्षं कालरात्रि सर्वदा। कर्णौ पातु मे कालरात्रि नेत्राणि च संरक्षेत्॥ रसनां पातु मे देवी जिह्वां पातु भयङ्करी। हृदयं पातु मे दुर्गा सर्वशत्रुविनाशिनी॥ शिरो मे पातु कात्यायनी कालरात्रि तु मध्यमे। पादाङ्गुलीः सदा पातु कालरात्रि नमोऽस्तुते॥
साधना से मिलने वाले अलौकिक लाभ
Maa Kalaratri शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि जो साधक सच्चे हृदय, पवित्र भाव और निष्ठा से Maa Kalaratri की आराधना करते हैं, उन्हें निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं
समस्त प्रकार के भयों से मुक्ति: साधक के भीतर से मृत्यु, भूत-प्रेत, अंधकार, हिंसक पशुओं और आकस्मिक दुर्घटनाओं का Maa Kalaratri भय सदा के लिए नष्ट हो जाता है।
शत्रु बाधा और षड्यंत्रों का शमन: गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं के षड्यंत्र निष्फल हो जाते हैं Maa Kalaratri और साधक को विजय प्राप्त होती है।
शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या से राहत: शनि ग्रह की पीड़ा, Maa Kalaratri कार्यों में अनावश्यक विलंब और आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है।
सहस्रार चक्र का जागरण: Maa Kalaratri साधक की चेतना सांसारिक सीमाओं को पार करके उच्चतर आध्यात्मिक ज्ञान और आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होती है।
अकाल मृत्यु से रक्षा: Maa Kalaratri देवी कालरात्रि स्वयं काल की भी नियंत्रक हैं, Maa Kalaratri अतः इनकी कृपा से अकाल मृत्यु का योग कट जाता है Maa Kalaratri और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
माँ कालरात्रि की संपूर्ण आरती : Complete Aarti of Goddess Kaalratri
Maa Kalaratri कालरात्रि जय जय महाकाली। काल के मुंह से बचाने वाली॥ Maa Kalaratri दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा। महा चंडी तेरा अवतारा॥ Maa Kalaratri पृथ्वी और आकाश पे सारा। महाकाली है तेरा पसारा॥ खड्ग खप्पर रखने वाली। दुष्टों का लहू चखने वाली॥ कलकत्ता स्थान तुम्हारा। सब देवों ने सिर को झुकाया॥ सभी देवता सब नर-नारी। गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥ रक्तदंता और अन्नपूर्णा। कृपा करे तो कोई दुःख ना॥ ना कोई चिंता रहे ना बीमारी। ना कोई गम ना संकट भारी॥ उस पर कभी कष्ट ना आवे। महाकाली को जो ध्यावे॥ कालरात्रि को जिसने पुकारा। क्षण में उसका काज संवारा॥ कालरात्रि जय जय महाकाली। काल के मुंह से बचाने वाली॥
पूजन का संक्षिप्त सारणी विवरण (Summary Table)
| प्रमुख पहलू | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| देवी का स्वरूप | कृष्ण वर्ण, बिखरे केश, त्रिनेत्र, चतुर्भुज (खड्ग, लोहलता, अभय, वरद), गर्दभ सवारी |
| पूजा तिथि 2026 | शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 (आश्विन शुक्ल सप्तमी) |
| विशेष संयोग | महासप्तमी तिथि, शनिवार का दिन (शनि दोष निवारण महायोग) |
| शुभ रंग | नारंगी (Orange) एवं ग्रे (Gray) — तेज, ऊर्जा, संतुलन व रक्षण |
| प्रिय भोग | शुद्ध गुड़ (Jaggery), गुड़ के मालपुए, गुड़ की खीर |
| प्रिय पुष्प | लाल गुड़हल (Red Hibiscus) एवं लाल गुलाब |
| मुख्य मंत्र | “वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा…” / “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः” |
| आध्यात्मिक चक्र | सहस्रार चक्र (Crown Chakra) — मोक्ष, आत्मज्ञान व सिद्धि |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. वर्ष 2026 में Maa Kalaratri की पूजा किस दिन होगी ?
Ans: वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन Maa Kalaratri माता कालरात्रि की पूजा 17 अक्टूबर 2026, दिन शनिवार को पूरे विधि-विधान से संपन्न की जाएगी ।
Q2. भयानक रूप होने के बावजूद देवी को शुभंकरी क्यों कहा जाता है ?
Ans: देवी का भयानक रूप केवल असुरों और नकारात्मक शक्तियों के संहार के लिए है। अपने भक्तों के लिए वे सदा कल्याणकारी, मंगलमयी और अभय देने वाली हैं, Maa Kalaratri इसलिए इन्हें ‘शुभंकरी’ कहा जाता है।
Q3. नवरात्रि के सातवें दिन माता को किस चीज का भोग लगाना चाहिए ?
Ans: मां कालरात्रि को शुद्ध देसी गुड़ (Jaggery) का भोग लगाना सर्वाधिक प्रिय है। Maa Kalaratri इसके अतिरिक्त गुड़ से बने मालपुए या खीर का भोग भी लगाया जाता है।
Q4. मां कालरात्रि का वाहन क्या है ?
Ans: मां कालरात्रि का वाहन गर्दभ (गधा) है, जो अपार धैर्य, दृढ़ता, सरलता और अहंकार-मुक्ति का प्रतीक है।
Q5. मां कालरात्रि की पूजा से शनि दोष कैसे शांत होता है ?
Ans: ज्योतिष शास्त्र में मां कालरात्रि शनि ग्रह की अधिष्ठात्री नियंत्रक हैं। महासप्तमी के दिन गुड़, काले तिल और सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रकोप शांत हो जाता है

KARMASU