2025

First Sawan Somwar 2025:सावन का पहला सोमवार कब है? जानिए व्रत की तारीखें और भगवान शिव की कृपा पाने का सही समय

First Sawan Somwar 2025: यदि आप भी भगवान शिव की कृपा पाना चाहते हैं तो सावन सोमवार का व्रत जरूर रखें। मान्यता है कि भोलेनाथ की भक्ति से जीवन का हर कष्ट दूर होता है और सुख-समृद्धि मिलती है। Sawan 2025:हिंदू धर्म में भगवान शिव को सृष्टि के संहारक और कल्याणकारी देव के रूप में पूजा जाता है। शिवभक्तों के लिए श्रावण मास अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। यह महीना पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित होता है और माना जाता है कि इस दौरान शिवजी पृथ्वी पर निवास करते हैं। ऐसे में भक्तों की प्रार्थनाओं का प्रभाव भी शीघ्र दिखाई देता है। सोमवार भगवान शिव का वार है और सावन शिव का महीना, इसलिए इस महीने के सोमवार विशेष रूप से पूजनीय माने जाते हैं। इन सोमवारों को सावन सोमवारी कहा जाता है। इस दिन श्रद्धालु शिवजी का व्रत रखते हैं, उपवास करते हैं, शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा आदि अर्पित करते हैं और शिव चालीसा, रुद्राष्टक या महामृत्युंजय जाप का पाठ करते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं साल 2025 में सावन का महीना कब से शुरू हो रहा है और सावन का पहला सोमवार व्रत किस दिन रखा जाएगा।  Kab Se Suru Ho Raha Hai Sawan 2025;कब से शुरू हो रहा है सावन 2025 ? Sawan Somwar 2025 इस साल 2025 में सावन मास की शुरुआत 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से हो रही है। द्रिक पंचांग के अनुसार यह महीना विशेष रूप से शुभ रहेगा क्योंकि इस बार सावन के दौरान किसी भी तिथि का क्षय (लोप) नहीं हो रहा है। इसका मतलब है कि भक्तों को पूरे 30 दिनों तक भगवान शिव की पूजा और उपासना का अवसर मिलेगा। सावन के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाना, रुद्राभिषेक करना, महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना और सोमवार के दिन व्रत रखना विशेष फलदायी माना जाता है। Sawan Month 2025 start date and End date: कब से शुरू हो रहा है सावन का महीना, जानें व्रत तिथि, पूजन विधि… First Sawan Somwar 2025:सावन का पहला सोमवार कब है? Sawan Somwar 2025 सावन के पहले सोमवार को प्रथम श्रावणी सोमवार कहा जाता है। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है। शिव भक्त इस दिन उपवास रखते हैं और पूरे विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करते हैं। 2025 में सावन का पहला सोमवार 14 जुलाई 2025 को पड़ेगा। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से की गई पूजा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होती है और भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। सावन सोमवार की तिथियां:Sawan Monday dates पहला सोमवार- 14 जुलाई 2025दूसरा सोमवार- 21 जुलाई 2025तीसरा सोमवार- 28 जुलाई 2025चौथा सोमवार- 4 अगस्त 2025 पहले सावन सोमवार पर शुभ मुहूर्त:Auspicious time on first Monday of Sawan ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:16 से 5:04 बजे तकअभिजित मुहूर्त- दोपहर 11:59 बजे से 12:55 बजे तकअमृत काल- रात 11:21 बजे से 12:55 बजे तक, जुलाई 15पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय- दोपहर 11:38 बजे से 12:32 बजे तक ऐसी मान्यता है कि जो भक्त पूरे सावन मास के सभी Sawan Somwar 2025 सोमवारों का व्रत नहीं कर सकते, वे कम से कम पहले और अंतिम सोमवार का व्रत अवश्य करें। यह भी उतना ही पुण्यदायी होता है और शिव कृपा प्राप्त होती है। कब शुरू होगी कांवड़ यात्रा 2025?:When will Kanwar Yatra 2025 start? Sawan Somwar 2025 सावन महीने में शिव भक्तों द्वारा की जाने वाली कांवड़ यात्रा का भी खास महत्व है। इस यात्रा में भक्त पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा नदी से जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और उसे अपने नजदीकी या प्रसिद्ध शिव मंदिरों में अर्पित करते हैं। Sawan Somwar 2025 इस साल कांवड़ यात्रा की शुरुआत भी 11 जुलाई 2025 से ही हो रही है। सावन का महत्व:Importance of Sawan सावन मास को शिवभक्ति का महीना माना जाता है। मान्यता है कि इसी महीने में समुद्र मंथन हुआ था और भगवान शिव ने विषपान कर संसार की रक्षा की थी। तभी से इस माह में शिव की विशेष पूजा की जाती है। खासकर सोमवार का व्रत अविवाहित लड़कियों द्वारा अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

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Vindhyvasini Stotra:श्री विंध्यवासिनी स्तोत्र

Vindhyvasini Stotra:विंध्यवासिनी स्तोत्र (श्री विंध्यवासिनी स्तोत्र): माता विंध्यवासिनी स्तोत्र स्वरूप भी देवी वत्सल की भक्त हैं और कहा जाता है कि यदि कोई भक्त थोड़ी सी भी श्रद्धा से माता की पूजा करता है, तो माता उसे मुक्ति और मोक्ष प्रदान करती हैं। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला में उनका निवास – माता की निरंतर उपस्थिति ने विंध्य पर्वत को जाग्रत शक्तिपीठ की श्रेणी में ला खड़ा किया है और विश्व समुदाय में अतुलनीय सम्मान दिलाया है। माता विंध्यवासिनी स्तोत्र स्वरूप भी देवी वत्सल की भक्त हैं और कहा जाता है कि यदि कोई भक्त थोड़ी सी भी श्रद्धा से माता की पूजा करता है, तो माता उसे मुक्ति और मोक्ष प्रदान करती हैं। Vindhyvasini Stotra विंध्याचल पर्वत श्रृंखला में उनका निवास – माता की निरंतर उपस्थिति ने विंध्य पर्वत को जाग्रत शक्तिपीठ की श्रेणी में ला खड़ा किया है और विश्व समुदाय में अतुलनीय सम्मान दिलाया है। पुराणों में विंध्य क्षेत्र का महत्व संस्कार के रूप में वर्णित किया गया है। विंध्याचल की पर्वत शृंखलाओं में गंगा की पावन धारा की कल-कल ध्वनियाँ प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरती हैं। विंध्याचल पर्वत न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा स्थल है, बल्कि संस्कृति का अद्भुत अध्याय भी है। इसकी माटी में पुराणों की अनेक पौराणिक मान्यताएँ तथा अतीत के अनेक अध्याय समाए हुए हैं। Vindhyvasini Stotra श्रीमद्भगवती महापुराण (महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित) के श्रीकृष्ण-जीवन प्रकरण में अवतार (देवकी के आठवें जन्म से उद्धृत) के संबंध में कहा गया है। यदि थोड़ा विचार करें तो एक माँ की करुण दृष्टि, यदि पाषाण समूह को इस श्रेणी में खड़ा कर दे, तो पूर्ण श्रद्धा से पूजन करने पर माँ उसे क्या नहीं देगी? प्रयाग और काशी के मध्य (मिर्जापुर नगर के अंतर्गत) विंध्याचल नामक तीर्थ है, Vindhyvasini Stotra जहाँ माँ विंध्यवासिनी रूप में निवास करती हैं। श्रीगंगा के तट पर स्थित इस महातीर्थ शास्त्र को सभी शक्तिपीठों में प्रधान बताया गया है। यह महातीर्थ भारत के 51 शक्तिपीठों में प्रथम एवं अंतिम शक्तिपीठ है जो गंगा नदी के तट पर स्थित है। विंध्येश्वरी की महिमा जगत में अपार है। विंध्यवासिनी स्तोत्र का पाठ करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है। व्यक्ति को धन, आरोग्य, सुख, समृद्धि, सौभाग्य एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए व्यक्ति को प्रातःकाल विंध्यवासिनी स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। Benefits of Vindhyavasini Stotra:विंध्यवासिनी स्तोत्र के लाभ जो कोई भी व्यक्ति श्रद्धा एवं विश्वास के साथ 9 दिनों तक नियमित रूप से Vindhyvasini Stotra विंध्यवासिनी स्तोत्र का जाप करता है, उसे जीवन में सफलता मिलती है। धन, सुख, समृद्धि, वैभव, शक्ति एवं सौभाग्य में वृद्धि होती है। Who should recite this hymn:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ जो व्यक्ति बाधा रहित जीवन चाहते हैं, उन्हें प्रातःकाल विंध्यवासिनी स्तोत्र का नियमित जाप करना चाहिए। श्री विंध्यवासिनी स्तोत्र हिंदी पाठ:Vindhyvasini Stotra in Hindi निशुम्भ शुम्भ गर्जनी, प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी ।बनेरणे प्रकाशिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ त्रिशूल मुण्ड धारिणी, धरा विघात हारिणी ।गृहे-गृहे निवासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ दरिद्र दुःख हारिणी, सदा विभूति कारिणी ।वियोग शोक हारिणी, भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ लसत्सुलोल लोचनं, लतासनं वरप्रदं ।कपाल-शूल धारिणी, भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ कराब्जदानदाधरां, शिवाशिवां प्रदायिनी ।वरा-वराननां शुभां, भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ कपीन्द्न जामिनीप्रदां, त्रिधा स्वरूप धारिणी ।जले-थले निवासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ विशिष्ट शिष्ट कारिणी, विशाल रूप धारिणी ।महोदरे विलासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ पुंरदरादि सेवितां, पुरादिवंशखण्डितम्‌ ।विशुद्ध बुद्धिकारिणीं, भजामि विन्ध्यवासिनीं ॥ ।। इति श्री विंध्यवासिनी स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Vasudevkrit Krishna Stotra:भगवान वासुदेव द्वारा रचित श्रीकृष्ण स्तोत्र,दुर्लभ और चमत्कारी स्तोत्र

Vasudevkrit Krishna Stotra:वासुदेवकृत कृष्ण स्तोत्र: हम हर वर्ष श्रावण कृष्ण अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं। इस वर्ष हम इसे 9 अगस्त 2012, गुरुवार को मना रहे हैं। हम इस दिन को जन्माष्टमी या गोकुल अष्टमी भी कहते हैं। इस दिन बहुत से लोग व्रत रखते हैं। फिर अगले दिन वे अपना सामान्य भोजन करते हैं। इसे पारणे या गोपाल-काला कहते हैं। Vasudevkrit Krishna Stotra वासुदेव और देवकी भगवान श्री कृष्ण के पिता और माता थे। पूर्व जन्मों में वासुदेव कश्यप ऋषि थे और देवकी अदिति थीं। भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया था और उन्हें आश्वासन दिया था कि वे उनके घर में जन्म लेंगे और वे उनके पिता और माता होंगे। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए भगवान श्री कृष्ण अपने दिव्य रूप में उनके सामने प्रकट हुए। Vasudevkrit Krishna Stotra तब वासुदेव ने अपने द्वारा बनाए गए स्तोत्र में भगवान श्री कृष्ण की स्तुति की और उनसे बालक का रूप धारण करने और उन्हें बालक के सभी कार्यों का आनंद लेने देने के लिए कहा। तब भगवान श्री कृष्ण ने देवकी की गोद में एक बालक का रूप धारण किया। वासुदेव ने कहा कि भगवान सर्वत्र हैं, वे बहुत बड़े भी हैं और बहुत छोटे भी, उन्हें कोई देख नहीं सकता, वे निर्गुण भी हैं Vasudevkrit Krishna Stotra और सगुण भी, अनेक गुणों से युक्त हैं, वे जीवन के प्रत्येक रूप में विद्यमान हैं और प्राचीन काल से ही विद्यमान हैं, उनका न तो कोई आदि है और न ही कोई अंत। पांच मुख वाले भगवान शिव उनकी स्तुति, उनका वर्णन करने में असमर्थ हैं। छह मुख वाले स्कंद भी आपकी स्तुति करने में असमर्थ हैं। Vasudevkrit Krishna Stotra शेषनाग आपकी स्तुति नहीं कर सके। देवी सरस्वती भी आपकी स्तुति नहीं कर सकीं। सभी गुरुओं और सभी योगियों के गुरु भगवान गणेश भी आपके गुणों का वर्णन या स्तुति करने में असमर्थ हैं। वेदों के रचयिता भगवान ब्रह्मा भी आपकी स्तुति करने में असमर्थ हैं। श्रुतियां भी उचित शब्दों से आपकी स्तुति नहीं कर सकतीं। ऐसे में ऋषि, देवता और विद्वान लोग आपकी स्तुति कैसे कर सकते हैं? अंत में वासुदेव भगवान श्री कृष्ण से अपना दिव्य रूप छोड़कर बालक रूप धारण करने के लिए कह रहे हैं। Vasudevkrit Krishna Stotra जो व्यक्ति दिन में तीन बार (संध्या समय) इस वासुदेवकृत कृष्ण स्तोत्र का पाठ करता है, वह अपने जीवन के सभी कष्टों से मुक्त हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद पुत्र के रूप में प्राप्त होता है जो भगवान श्री कृष्ण का भक्त बन जाता है। वासुदेवकृत कृष्ण स्तोत्र के लाभ इस वासुदेवकृत कृष्ण स्तोत्र का पाठ करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होगा जो जीवन को सुखी और समृद्ध बनाएगा। किसको यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए जो लोग अपने सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद अपने जीवन में सफल नहीं हो पाते हैं, उन्हें वैदिक पद्धति के अनुसार इस वासुदेवकृत कृष्ण स्तोत्र का जाप करना चाहिए। श्री वासुदेवकृतं कृष्ण स्तोत्र:Vasudevkrit Krishna Stotra । श्री गणेशाय नमः । वसुदेव उवाच – त्वामतीन्द्रियमव्यक्तमक्षरं निर्गुणं विभुम् ।ध्यानासाध्यं च सर्वेषां परमात्मानमीश्वरम् ॥ १ ॥ स्वेच्छामयं सर्वरूपं स्वेच्छारूपधरं परम् ।निर्लिप्तं परमं ब्रह्म बीजरूपं सनातनम् ॥ २ ॥ स्थूलात्स्थूलतरं प्राप्तमतिसूक्ष्ममदर्शनम् ।स्थितं सर्वशरीरेषु साक्षिरूपमदृश्यकम् ॥ ३ ॥ शरीरवन्तं सगुणमशरीरं गुणोत्करं ।प्रकृतिं प्रकृतीशं च प्राकृतं प्रकृतेः परम् ॥ ४ ॥ सर्वेशं सर्वरूपं च सर्वान्तकरमव्ययम् ।सर्वाधारं निराधारं निर्व्यूहं स्तौमि किं विभुम् ॥ ५ ॥ अनन्तः स्तवनेऽशक्तोऽशक्ता देवी सरस्वती ।यं वा स्तोतुमशक्तश्च पञ्चवक्त्रः षडाननः ॥ ६ ॥ चतुर्मुखो वेदकर्ता यं स्तोतुमक्षमः सदा ।गणेशो न समर्थश्च योगीन्द्राणां गुरोर्गुरुः ॥ ७ ॥ ऋषयो देवताश्चैव मुनीन्द्रमनुमानवाः ।स्वप्ने तेषामदृश्यं च त्वामेवं किं स्तुवन्ति ते ॥ ८ ॥ श्रुतयः स्तवनेऽशक्ताः किं स्तुवन्ति विपश्चितः ।विहायैवं शरीरं च बालो भवितुमर्हसि ॥ ९ ॥ वसुदेवकृतं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।भक्तिं दास्यमवाप्नोति श्रीकृष्णचरणाम्बुजे ॥ १० ॥ विशिष्टं पुत्रं लभते हरिदासं गुणान्वितम् ।सङ्कटं निस्तरेत्तूर्णं शत्रुभीतेः प्रमुच्यते ॥ ११ ॥ ॥ इति श्री वासुदेवकृतं कृष्ण स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Sapne Me Shivling:क्या सपने में शिवलिंग पर दूध चढ़ाते देखा? जानें क्या होने वाला है आपके साथ

Sapne Me Shivling: अलग-अलग सपनों का अलग-अलग मतलब होता है. आप भी अपने सपने को लेकर कन्फ्यूज हैं? क्या आपने सपने में शिवलिंग पर दूध चढ़ाते देखा? ज्योतिष शास्त्र में सपनों का अर्थ बताया गया है. जानिए आपके सपने के बारे में…… Dream Science:क्या आपको भी तरह-तरह के सपने आते हैं, जिसे लेकर आपके मन में ढ़ेर सारी उलझने पैदा होती हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि सपनों का कोई न कोई खास मतलब होता है. ज्योतिष शास्त्र में सपनों का अर्थ बताया गया है. ऐसे में आचार्य विक्रमादित्य बता रहे हैं कि यदि आपने सपने में शिवलिंग पर दूध चढ़ाते देखा, तो इसके क्या संकेत हैं. सपने में शिवलिंग देखना (Sapne Me Shivling Dekhna) हमें सपने, हमारी जिंदगी में घटने वाली घटनाओं का कुछ ना कुछ संकेत करते हैं, इसलिए हमें उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हो सकता है इन संकेतों में हमें अपनी जिंदगी के बहुत से अनसुलझे सवालों के जवाब या तकलीफ दूर करने के या उन्हें सुलझाने के उपाय मिल जाए, तो हमारी कोशिश ये होनी चाहिए कि अपने सपनों को नजरअंदाज न कर, उन पर गौर करें और भविष्य की घटनाओं के संकेत को समझें। कभी कभी सोते सोते हम ऐसे अद्भुद सपने देख लेते है, जो हमारे जीवन की दिशा और दशा को बदल देने की ताक़त रखते है। Sapne Me Shivling और हम यह सोचने को मजबूर हो जाते है की आखिर इस सपने में ऐसा क्या संकेत है? जो हमें ऊपर वाला देना चाहता है। तो आईये जानते है, इन्ही कुछ अद्भुद सपनो के उत्तर – सपने में सफ़ेद शिवलिंग देखना:Seeing white Shivalinga in dream सपना में सफ़ेद शिवलिंग देखना बहुत ही शुभ सपना है। यह सपना इस बात की ओर संकेत करता है कि आपके ऊपर ईश्वर की अपार कृपा है। जिससे आने वाले समय में आपकी समस्या का निदान, धन आगमन, आपके कार्यो में सफलता तथा आध्यात्मिक उन्नति मिलने वाली है। और आपकी कोई मनोकामना भी पूर्ण होने वाली है। सपने में शिवलिंग पर  दूध चढ़ाना:Offering milk on Shivalinga in dream सपना में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का मतलब, अगर सपने में आपने Sapne Me Shivling शिवलिंग पर दूध चढ़ाते हुए देखा है, तो यह सपना बहुत ही शुभ है। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि आने वाले समय में आपका स्वास्थ्य और आपका वैवाहिक जीवन बहुत अच्छा और बहुत ही सुखी रहने वाला है। साथ ही आपका मानसिक स्वास्थ भी उत्तम रहने वाला है। सपने में शिवलिंग पर जल चढ़ाना:Offering water to Shivalinga in dreams अगर आपने, अपने सपने में शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए देखा हैं, तो यह सपना इस बात की ओर संकेत करता है कि आपके जीवन में बहुत ही जल्द सुख शांति आने वाली है। आपकी परेशानियों का अंत होने वाला है। सपने में शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना:Offering Belpatra on Shivling in dream स्वप्न शास्त्र के अनुसार अगर आपने, Sapne Me Shivling अपने सपने में शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते हुए देखा है, तो यह बहुत ही शुभ सपना है। यह सपना इस बात की ओर संकेत करता है, कि आपको जल्दी ही अपार धन और सुख शांति की प्राप्ति होने वाली है। आप अपने कार्यों में निश्चित रूप से सफल होने वाले है।  सपने में शिवलिंग देखना / सपने में शिवलिंग दिखाई देना:Seeing Shivling in dream / Seeing Shivling in dream अगर आपने, अपने सपने में Sapne Me Shivling शिवलिंग देखा है, तो यह एक बहुत ही अद्भुत सपना है। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि आप अपने पिछले जन्म में शिव भक्ति में चरम से थोड़ा पीछे रह गए। परंतु अब जो जनम मिला है उसमें आप अपनी अधूरी शिव भक्ति को फिर से पूर्ण करने के पथ पर अग्रसर होवे। हो सकता है कि आप पर बाबा भोले की कृपा बरसे और आप इस जन्म में शिव भक्ति के चरम को प्राप्त करके, मुक्ति को प्राप्त होवें।

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Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा, जानें कथा पाठ का लाभ

Devshayani ekadashi Vrat Katha In Hindi : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी का उपवास किया जाता है। इस एकादशी का व्रत करने से और कथा सुनने व पढ़ने मात्र से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। आइए जानते हैं देवशयनी एकादशी व्रत कथा के बारे में… आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी व्रत किया जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का काफी महत्व माना जाता है क्योंकि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर की योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद कार्तिक मास की एकादशी तिथि तक को भगवान विष्णु योगनिद्रा से निकलते हैं। इस दौरान भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं। देवशयनी एकादशी व्रत कथा का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। इस व्रत की कथा सुनने व पढ़ने मात्र से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। देवशयनी एकादशी व्रत कथा:Devshayani Ekadashi Vrat Katha वामन अवतार की कथा:Story of Vaman Avatar वामन पुराण के अनुसार, एक बार राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। Devshayani Ekadashi Vrat Katha यह देखकर इंद्र समेत अन्‍य देवी-देवता घबरा गए और भगवान विष्णु की शरण में पहुंच गए। देवताओं को परेशान देखकर भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। राजा बलि ने वामन देवता से कहा कि जो मांगना चाहते हैं मांग लीजिए। इस पर वामन देवता ने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। पहले और दूसरे पग में वामन देवता ने धरती और आकाश और पूरा संसार को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची तो राजा बलि से वामन देवता ने पूछा कि तीसरा पग में कहां रखूं तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान विष्णु राजा बलि को देखकर काफी प्रसन्‍न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। बलि ने उनसे वरदान में पाताल लोक में बस जाने की बात कही। बलि की बात मानकर उनको पाताल में जाना पड़ा। ऐसा करने से समस्‍त देवता और मां लक्ष्‍मी परेशान हो गए। Devshayani Ekadashi Vrat Katha अपने पति विष्‍णुजी को वापस लाने के लिए मां लक्ष्‍मी गरीब स्‍त्री के भेष में राजा बलि के पास गईं और उन्‍हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी और उपहार के रूप में विष्‍णुजी को पाताल लोक से वापस ले जाने का वरदान ले लिया। माता लक्ष्‍मी के साथ वापस जाते हुए भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया की वह प्रत्‍येक वर्ष आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास की एकादशी तक पाताल में ही निवास करेंगे और इन 4 महीने की अवधि को उनकी योगनिद्रा माना जाएगा। यही वजह है कि दीपावली पर मां लक्ष्‍मी की पूजा भगवान विष्‍णु के बिना ही की जाती है। भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी यह कथा:Lord Krishna told this story to Yudhishthir Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा का वर्णन खुद भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस वृतांत को धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था। कथाओं के अनुसार, सतयुग में मांधाता नाम का एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। एक बार उसके राज्य में तीन साल तक वर्षा नहीं हुई, जिसकी वजह से राज्य में भंयकर अकाल पड़ गया। अकाल की वजह से चारो ओर त्रासदी का माहौल बन गया। राज्य के लोगों के अंदर धार्मिक भावनाएं कम होने लगीं। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपना दर्द बताया, जिससे राजा भी चिंतित थे। राजा मांधाता को लगता था कि आखिर ऐसा कौन-सा पाप हो गया है, जिसकी सजा हमारे राज्य को ईश्वर दे रहा है। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए राजा अपनी सेना के साथ ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचे। Devshayani Ekadashi Vrat Katha ऋषिवर ने उनको यहां आने का कारण पूछा। तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि हे ऋषिवर, मैंने हमेशा से पूरा निष्ठा से धर्म का पालन किया है, फिर मेरे राज्य की ऐसी हालत क्यों है। कृपया करके मुझे इसका समाधान दें। अंगिरा ऋषि ने कहा कि यह सतयुग है, यहां छोटे से पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। अंगिरा ऋषि ने राजा को आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने को कहा। महर्षि ने कहा कि इस व्रत का फल जरूर मिलेगा और इसके प्रभाव से तुम्हारा संकट से भी निकल आएगा। Devshayani Ekadashi Vrat Katha महर्षि अंगिरा के निर्देश का पालन करते हुए राजा अपनी राजधानी वापस आ गए और उन्होंने चारों वर्णों सहित देवशयनी एकादशी का व्रत पूरा किया, जिसके बाद राज्य में मूसलधार वर्षा हुई।

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Devshayani Ekadashi 2025 Date:देवशयनी एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र, पारण का समय

Devshayani Ekadashi:देवशयनी एकादशी 2025 चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है, जो भक्ति, उपवास और आत्म-अनुशासन का पवित्र 4 महीने का काल है। जानिए तिथि, अनुष्ठान और इस शुभ समय के दौरान क्या न करें। देवशयनी एकादशी वह दिन है जब भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस क्षण से, ब्रह्मांड की जिम्मेदारी अगले चार महीनों के लिए अन्य देवताओं को सौंप दी जाती है। यह पवित्र दिन चातुर्मास की शुरुआत का भी प्रतीक है, जो आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण अवधि है, जिसके दौरान विवाह, गृह प्रवेश समारोह और भूमि पूजन जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। देवशयनी एकादशी शुभ मुहूर्त (Devshayani Ekadashi Shubh Muhurat) Kab hai Devshayani Ekadash:वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 05 जुलाई को शाम 06 बजकर 58 मिनट पर होगी। वहीं, 06 जुलाई को रात 09 बजकर 14 मिनट पर एकादशी तिथि का समापन होगा। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसके लिए 06 जुलाई को देवशयनी एकादशी मनाई जाएगी।साधक देवशयनी एकादशी का व्रत 06 जुलाई के दिन रखेंगे। वहीं, 07 जुलाई को पारण सुबह 05 बजकर 29 मिनट से लेकर 08 बजकर 16 मिनट के मध्य किया जाएगा। इस दौरान स्नान-ध्यान और पूजा के बाद अन्न और धन का दान कर व्रत खोलें। देवशयनी एकादशी शुभ योग (Devshayani Ekadashi Shubh Muhurat) Devshayani Ekadashi:ज्योतिषियों की मानें तो आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर साध्य योग का संयोग रात 09 बजकर 27 मिनट तक है। इसके बाद शुभ योग का निर्माण हो रहा है। इन योग में लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करने से सभी प्रकार के शुभ कामों में सफलता मिलेगी। इसके साथ ही त्रिपुष्कर योग और रवि योग का भी संयोग बन रहा है। Devshayani Ekadashi Puja Vidhi:देवशयनी एकादशी की पूजा विधि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें। इसके बाद साफ-सुथरे वस्त्र धारण कर लें। एक तांबे के लोटे में जल, सिंदूर, लाल फूल डालकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। सबसे पहले व्रत का संकल्प लें।  इसके बाद विष्णु जी की पूजा आरंभ करें। सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी में पीले रंग का वस्त्र बिछाकर श्री विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखें। सबसे पहले जल से आचमन करें। इसके बाद विष्णु जी को पीला चंदन, फूल, माला, अक्षत आदि लगाने के साथ भोग में तुलसी का दल के साथ रखें। इसके बाद जल अर्पित करें। फिर घी का दीपक और धूप जलाकर एकादशी व्रत कथा, विष्णु चालीसा, विष्णु मंत्र के बाद श्री विष्णु आरती कर लें। अंत में भूल चूक के लिए माफी मांग लें और दिनभर व्रत रखें। दूसरे दिन तय समय पर पूजा पाठ करने के बाद व्रत का पारण कर लें। Devshayani Ekadashi chatur mass ka mahetwa:देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का महत्व इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और ब्रह्मांड का संचालन अन्य दिव्य प्राणियों को सौंप देते हैं। Devshayani Ekadashi उनका विश्राम काल, जिसे चातुर्मास के नाम से जाना जाता है, 6 जुलाई से शुरू होकर 1 नवंबर 2025 को देवउठनी एकादशी तक जारी रहेगा। चातुर्मास को तपस्या, उपवास, ध्यान और आत्मसंयम का समय माना जाता है। इस अवधि के दौरान विलासिता, उत्सव और भोग-विलास से दूर रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इस दौरान ध्यान आंतरिक चिंतन और आध्यात्मिक विकास की ओर केंद्रित होता है। Chatur mas Ke dauran kya nhi karna chahiye:चातुर्मास के दौरान क्या नहीं करना चाहिए? चातुर्मास के दौरान कुछ कार्य पारंपरिक रूप से प्रतिबंधित होते हैं, क्योंकि यह आत्म-अनुशासन और भक्ति का एक पवित्र चरण है: Chatur mas mein kya karna chahiye:चातुर्मास में क्या करना चाहिए? देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) न केवल भगवान विष्णु के विश्राम का प्रतीक है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत विराम, आत्म-अनुशासन, आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक उत्थान का अवसर भी है। चातुर्मास के सिद्धांतों का पालन करके, व्यक्ति जीवन में शांति, अनुशासन और ईश्वरीय कृपा ला सकता है। यदि आप अपने प्रयासों में सफलता और स्थायी सद्भाव चाहते हैं, तो इस पवित्र चार महीने की अवधि के आध्यात्मिक दिशानिर्देशों का पालन करें। देवशयनी एकादशी संकल्प मंत्र सत्यस्थ: सत्यसंकल्प: सत्यवित् सत्यदस्तथा।धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जित:।।कर्मकर्ता च कर्मैव क्रिया कार्यं तथैव च।श्रीपतिर्नृपति: श्रीमान् सर्वस्यपतिरूर्जित:।। देवशयनी एकादशी विष्णु क्षमा मंत्र भक्तस्तुतो भक्तपर: कीर्तिद: कीर्तिवर्धन:।कीर्तिर्दीप्ति: क्षमाकान्तिर्भक्तश्चैव दया परा।।

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अवधूत हनुमान मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यह एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर है, जो एक सिद्धपीठ है। देवभूमि उत्तराखंड का हरिद्वार जिला चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वार है। हरिद्वार को प्रभु हरि का द्वार कहा जाता है। यहां के ज्वालापुर में गंगा तट किनारे स्थित है अवधूत हनुमान मंदिर। यह एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर है, जो एक सिद्धपीठ है। इसे बाबा हीरादास हनुमान मंदिर या अवधूत मंडल आश्रम के नाम से भी जानते हैं। इस आश्रम में भक्तों को रहने व खाने की सुविधा मिलती है। हर मंगलवार को यहां विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार आने वाले भक्त यहां दर्शन करना नहीं भूलते। मंदिर में बजरंगबली के अलावा राम दरबार, शंकर-पार्वती, गणेश जी, मां दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित है। सबसे खास बात है कि राम दरबार में नेपाल की गंडक नदी से लाए गए दिव्य शालीग्राम पत्थरों के भी दर्शन होते हैं। आपको बता दें कि ऐसे ही शालीग्राम पत्थरों से अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर में मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। अवधूत हनुमान मंदिर का इतिहास यह मंदिर रामानंदी निराकारी वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है। इस संप्रदाय की स्थापना स्वर्गीय श्री आचार्य बाबा सरयूदासजी महाराज ने करीब 200 साल पहले की थी। मंदिर के नाम में अवधूत का अर्थ होता है कि जिसको घर या बाहर किसी से कोई मतलब नहीं होता, जो भगवान की भक्ति में लीन रहता है। कुछ ऐसे ही थे मूल रूप से पटियाला के रहने वाले बाबा सरयूदासजी। ये एक महान और आध्यात्मिक संत थे। बताया जाता है एक बार पटियाला के राजा को संतान नहीं हो रही थी। इसको लेकर राजा-रानी सहित पूरी प्रजा दुखी थी। बाबा सरयूदासजी के आशीर्वाद से राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसके बाद से बाबा की ख्याति और फैल गई। हरिद्वार में बाबा को उनके भक्तों ने ज्वालापुर गांव में गंगा नदी के तट ​पर एक जमीन दान में दी थी। बताया जाता है कि इसी जमीन पर सरयूदासजी के आदेश पर उनके अनुयायी बाबा हीरादास जी ने बसंत-पंचमी, दिनांक 13-04-1830 को यहां हनुमान मंदिर की नींव रखी। मंदिर में स्वामी हीरादास की मूर्ति भी लगी है। अवधूत हनुमान मंदिर का महत्व अवधूत हनुमान मंदिर में आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। इसी वजह से इस मंदिर को कुछ भक्त मनकामेश्वर भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने से सभी प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना लेकर इस मंदिर में आती हैं। अवधूत हनुमान मंदिर की वास्तुकला अवधूत हनुमान मंदिर काफी सुंदर तरीके से बनाया गया है। इसमें प्रवेश करते ही यहां का दृश्य किसी का भी मन मोह लेता है। मुख्य द्वार पर सबसे ऊपर विष्णु भगवान की प्रतिमा लगाई गई है। मंदिर में मुख्य रूप से हनुमान जी की पूजा अर्चना की जाती है। यहां हनुमानजी की एक हाथ में पर्वत लिए विशाल मूर्ति स्थापित है। इसके निर्माण की कहानी बहुत रोचक है। बताया जाता है कि मूर्ति तैयार करते समय लाखों लोगों ने कागज पर 11.11 करोड़ बार राम-नाम मंत्र लिखा था, जिसे गंगाजी के पवित्र जल में मिला दिया गया। इसके बाद सीमेंट व रेत में गंगाजी के इसी पवित्र जल को मिलाकर लेप तैयार किय गया, जिसका उपयोग हनुमानजी की विशाल मूर्ति तैयार करने में किया गया। अवधूत हनुमान मंदिर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए एक आश्रम है। इसके अलावा एक गौशाला भी हैं, जहां बड़ी अच्छे तरीके से गायों की देखरेख व सेवा की जाती है। अवधूत मंडल आश्रम जरूरतमंद व गरीब लोगों के लिए एक धर्मार्थ अस्पताल भी चलाता है। मंदिर परिसर में समय समय पर कथा व सत्संग का आयोजन भी होता रहता है। मंदिर परिसर में सत्यदेव पुरम कथा स्थल बना है। अवधूत हनुमान मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 10:00 PM सुबह आरती का समय 06:00 AM – 06:30 AM शाम को आरती का समय 06:30 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद अवधूत हनुमान मंदिर मेंं नारियल, बेसन के लड्डू, दूध के पेड़े, फल, फूल आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

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Temple Meaning in Dreams: सपने में खुद को पूजा करते देखना शुभ या अशुभ, भविष्य में मिलते हैं ऐसे संकेत

Temple Meaning in Dreams:हर मनुष्य सपना देखता है और उस सपने को भूल जाता है परंतु कई सपने ऐसे होते हैं, जो हमें याद रह जाते हैं. यदि सपने में हम खुद को पूजा करते हुए देखते हैं तो यह बड़ा संकेत माना जाता है. इसके अलावा, स्वप्न शास्त्र में मंदिर में पूजा करना और परिजनों के साथ पूजा करते देखने का भी अलग अर्थ बताया गया है. Sapne me Puja Karte Dekhne ka Matlab : सोते समय सपना देखना एक सामान्य प्रक्रिया है. सपने में अक्सर वही चीजें देखी जाती हैं, जो दिन भर में आपके साथ घटी हों परंतु कई बार कुछ ऐसे सपने दिखाई देते हैं, जिनका हमारी दिनचर्या से कोई संबंध नहीं होता. ये सपने आपको आने वाले भविष्य में होने वाली प्रिय-अप्रिय घटना की तरफ संकेत करते हैं. इन सपनों से अच्छा और बुरा दोनों तरह का संकेत मिलता है. यदि आप सपने में खुद को पूजा करते हुए देखते हैं तो यह भी आपके लिए बड़ा संकेत माना जाता है. इस विषय में स्वप्न शास्त्र में विस्तार से बताया गया है.  Temple Meaning in Dreams: सपने में खुद को पूजा करते देखना शुभ या अशुभ सपने में खुद को पूजा करते देखना:Seeing yourself worshiping in a dream स्वप्न शास्त्र की अनुसार, यदि आप खुद को सपने में पूजा करते हुए देखते हैं तो यह एक शुभ संकेत माना जाता है. यह सपना आपकी अटूट भक्ति का प्रतीक माना गया है. इसका अर्थ है कि आप पूरी तरह से भगवान की भक्ति में लीन हो चुके हैं. Temple Meaning in Dreams इस सपने को घर की समृद्धि का भी संकेत माना जाता है. मान्यता है कि ऐसा सपना देखने पर आपके घर में कुछ अच्छा परिवर्तन हो सकता है. जिसका आपके जीवन पर सकारात्मक असर देखने को मिलेगा. इस तरह का सपना देखने के बाद देव दर्शन जरूर करना चाहिए. मंदिर में पूजा करते देखना:watching worship in temple स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति खुद को सपने में मंदिर में पूजा करते हुए देखता है तो यह संकेत है कि आपकी कोई बड़ी इच्छा पूरी होने वाली है. इस सपने का अर्थ है कि आप जल्द ही उस मंदिर के दर्शन करने जा सकते हैं. Temple Meaning in Dreams इस तरह के सपने का यह भी अर्थ निकाला जाता है कि आप लंबे समय से उस मंदिर के दर्शन करना चाह रहे हैं परंतु जा नहीं पा रहे. परिजन के साथ पूजा करना:worshiping with family स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आप खुद को पूरे परिवार के साथ ईश्वर की पूजा करते हुए सपने में देखते हैं तो यह एक शुभ संकेत माना जाता है. इसका अर्थ है कि आप कोई बड़ा फैसला लेने वाले हैं, Temple Meaning in Dreams जिसमें आपको पूरे परिवार का सहयोग मिलेगा. इसके अलावा यह सपना सफलता का भी संकेत देता है. माना जाता है इस तरह के सपने आपको आपके हर काम में सकारात्मक परिणाम दिला सकते हैं. सपने में पूजा की थाली देखना:Seeing puja thali in dream कई लोग सपने में पूजा की थाली देखते हैं, तो बता दें कि यह बेहद शुभ सपना माना जाता है। यह सपना इस ओर संकेत देता है कि आपके घर कोई नया मेहमान आने वाला है। वहीं फ्यूचर में आप संपत्ति, जमीन व गाड़ी आदि खरीद सकते हैं। Temple Meaning in Dreams आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है। इसके अलावा इस सपने का यह भी अर्थ होता है कि आपके घर में किसी सदस्य की शादी फिक्स हो सकती है। सपने में पूजा पाठ करना:Sapne me Puja Karte Dekhne ka Matlab सपने में स्वयं को पूजा-अर्चना करते हुए देखने का मतलब होता है कि धार्मिक कार्यों में आपकी रुचि बढ़ने वाली है। इसके साथ ही समाज में आपका मान-सम्मान बढ़ सकता है और आपको अचानक से धन लाभ होने की संभावना है। सपने में किसी देवता की पूजा करते देखना:Seeing someone worshiping a god in a dream अगर कोई व्यक्ति सपने में किसी देवता की पूजा करता है, तो यह एक शुभ सपना होता है। इसका अर्थ है कि आपके ऊपर ईश्वर की असीम कृपा बरसने वाली है। वहीं अगर आप सपने में किसी मृत व्यक्ति की पूजा करते हुए देखते हैं, तो आपको अनुष्ठान व दान-पुण्य करना चाहिए। सपने में पूजा का कलश देखना:Seeing puja urn in dream अगर आप सपने में पूजा का कलश देखते हैं, Temple Meaning in Dreams तो आपके रुके हुए कार्य पूरे होने की संभावना बनती हैं। इसके अलावा आपको अचानक से धन लाभ हो सकता है। सपने में पूजा का सामान देखना:Seeing puja items in dream सपने में पूजा का सामान देखने का मतलब है कि जल्द ही आपके घर अनुष्ठान हो सकता है। या आपके घर के किसी बीमार सदस्य का स्वर्गवास हो सकता है। सपने में नारियल देखना:seeing coconut in dream सपने में नारियल देखने का अर्थ होता है कि आपको शुभ अवसर प्राप्त हो सकते हैं। Temple Meaning in Dreams इसके साथ ही आपके घर में खुशियां दस्तक देने वाली हैं।

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Ambubachi Mela 2025 date & time:कामख्या देवी में इस दिन से लगने वाला है तांत्रिक शक्तियों का मेला

Ambubachi Mela:कामाख्या देवी मंदिर में जल्द ही अम्बुबाची मेला लगने वाला है। इस दौरान मां कामाख्या देवी मंदिर के कपाट बंद रहेंगे, क्योंकि माना जाता है कि पृथ्वी माता रजस्वला होती हैं। देशभर से तांत्रिक और श्रद्धालु इस मेले में शामिल होने आते हैं। आइए जानते हैं अम्बुबाची मेला की खास बातें और मेला कब से शुरु हो रहा है। कामाख्या देवी मंदिर में 4 दिवसीय मेले का आयोजन होने जा रहा है। देशभर से हजारों की संख्या में लोग इस मेले में शामिल होते हैं। कामाक्या देवी मंदिर 51 शक्तिपीठ में से एक है। कामाख्या देवी मंदिर में जिस मेले का आयोजन किया जाता है इसका नाम अम्बुबाची मेला है। आइए जानते हैं इस साल कब से लगने जा रहा है अम्बुबाची मेला और इस मेले की क्या खास बातें हैं। Ambubachi Mela 2025 date & time Ambubachi Mela अंबुबाची मेला असम के कामाख्या मंदिर में हर साल आयोजित होने वाला एक वार्षिक हिंदू मेला है। हिंदू महीने “आषाढ़” के सातवें से दसवें दिन तक अम्बुबाची की अवधि के दौरान, मंदिर के दरवाजे सभी के लिए बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी कामाख्या मासिक धर्म के वार्षिक चक्र से गुजरती हैं। अम्बुबाची मेला 22 जून से आरंभ होने जा रहा है और 26 जून तक यह मेला चलेगा।  यह Ambubachi Mela मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म चक्र को दर्शाता है, जो पृथ्वी की उर्वरता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवी को आराम और विश्राम की जरूरत होती है अर्थात यह भी मान्यता है कि इस दौरान देवी अपनी रचनात्मक शक्ति से पृथ्वी को धन्य करती हैं, जिससे भूमि उपजाऊ हो जाती है इसलिए मंदिर के अंदर सभी पूजा-अर्चना बंद कर दी जाती है और मंदिर के आसपास के गांवों में लोग भी कुछ दिनों के लिए नियमित गतिविधियों से दूर रहते हैं। Ambubachi Mela 2025 date & time : आईये जानते हैं अम्बुबाची मेले के विशेषताएं मंदिर के गर्भ ग्रह को तीन दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है और इस दौरान कोई पूजा-अर्चना नहीं होती है।भक्तों को देवी के मासिक धर्म का प्रतीक लाल रंग का कपड़ा प्रसाद के रूप में दिया जाता है।यह मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म के दौरान पृथ्वी की उर्वरता और नारी शक्ति को समर्पित है। Ambubachi Mela 2025 date & time Ambubachi Mela अम्बुबाची मेला 22 जून से आरंभ होने जा रहा है और 26 जून तक यह मेला चलेगा। तीन दिनों तक मंदिर में कोई पूजा या दर्शन नहीं किया जाता है। चौथे दिन, जब मां को ‘शुद्धि स्नान’ कराकर विश्राम समाप्त होता है, तब मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोले जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। Ambubachi Mela 2025 date & time इस दौरान यहां देश और विदेश से आए तांत्रिक गुप्त साधना करते हैं। इस मेले को अमेटी या तांत्रिक प्रजनन उत्सव के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह भारत के पूर्वी भागों में प्रचलित तांत्रिक शक्ति पंथ से निकटता से जुड़ा हुआ है । यहाँ तक कि कुछ तांत्रिक बाबा भी इन चार दिनों के दौरान ही सार्वजनिक रूप से दिखाई देते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जब देवी सती का शरीर को सूदर्शन चक्र से भगवान विष्णु ने भागों में बांटा था, तब उनका योनि भाग यहीं गिरा था, इसलिए यह स्थान प्रजनन शक्ति और उर्वरता का प्रतीक है। इस मेले की खास बात यह भी है कि इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में देवी के पास रखे गए सफेद कपड़ा रखा जाता है रजस्वला होने के बाद जब यह कपड़ा लाल हो जाते हैं, जो भक्तों को प्रसाद के रूप में यह वस्त्र दिया जाता है। Ambubachi Mela 2025 date & time मान्यता है अनुसार, यह वस्त्र भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत प्रदान करता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस वस्त्र के प्रभाव से संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति भी होती है। हालांकि, यह वस्त्र हर किसी को नहीं मिल पाता है बल्कि कुछ ही लोगों को यह वस्त्र मिलता है। अम्बुबाची मेला की खास बातें:Special features of Ambubachi fair इस दौरान यहां देश और विदेश से आए तांत्रिक गुप्त साधना करते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जब देवी सती का शरीर को सूदर्शन चक्र से भगवान विष्णु ने भागों में बांटा था, तब उनका योनि भाग यहीं गिरा था, इसलिए यह स्थान प्रजनन शक्ति और उर्वरता का प्रतीक है। इस मेले की खास बात यह भी है कि इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में देवी के पास रखे गए सफेद कपड़ा रखा जाता है रजस्वला होने के बाद जब यह कपड़ा लाल हो जाते हैं, जो भक्तों को प्रसाद के रूप में यह वस्त्र दिया जाता है। मान्यता है अनुसार, यह वस्त्र भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत प्रदान करता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस वस्त्र के प्रभाव से संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति भी होती है। हालांकि, यह वस्त्र हर किसी को नहीं मिल पाता है बल्कि कुछ ही लोगों को यह वस्त्र मिलता है।

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Lalita Mahalakshmi Stotra:श्री ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र,समस्त इच्छाओं की पूर्ति का महामंत्र

Lalita Mahalakshmi Stotra:ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र (श्री ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र): ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र ब्रह्माण्ड पुराण के ललितोपाक्याणम नामक अध्याय में समाहित है। ललिता महालक्ष्मी एक अत्यंत प्रतिष्ठित संस्कृत स्तोत्र है जिसमें देवी ललिता या देवी पार्वती देवी के 300 दिव्य नामों को संबोधित किया गया है। ललिता सहस्त्रनाम के समान, ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र में ऋषि अगस्त्य और भगवान हयग्रीव (घोड़े के सिर वाले भगवान विष्णु का अवतार) के बीच बातचीत का वर्णन किया गया है। ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र को सबसे गुप्त स्तोत्र माना जाता है और इसमें देवी ललिता के तीन सौ नामों का वर्णन है। ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र Lalita Mahalakshmi Stotra की अनूठी रचना यह है कि ललिता महालक्ष्मी के प्रत्येक बीस नाम 15 अक्षरों में से प्रत्येक से शुरू होते हैं जो पंच दशाक्षरी मंत्र बनाते हैं। Lalita Mahalakshmi Stotra महालक्ष्मी सर्वोच्च देवता हैं जिन्हें त्रिपुर सुंदरी या श्री विद्या या ललिताम्बिका या ललिता के नाम से भी जाना जाता है। महालक्ष्मी लक्ष्मी (सात्विक), सरस्वती (राजसिक) और काली (तामसिक) शक्तियों का संगम हैं। यहाँ, “महा” शब्द संज्ञा “लक्ष्मी” के लिए प्रयुक्त विशेषण नहीं है। जबकि भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी हैं, भगवान विष्णु स्वयं श्री विद्या उपासक हैं, अर्थात, वे महालक्ष्मी की पूजा करते हैं। Lalita Mahalakshmi Stotra:इसका उदाहरण भगवान हयग्रीव द्वारा ऋषि अगस्त्य को ललिता सहस्त्रनाम स्तोत्रम का जाप करने के माध्यम से मिलता है। अपने वास्तविक सार में, महालक्ष्मी वह ब्रह्मांडीय शक्ति है जिसे शक्ति कहा जाता है जो जीवंतता (विष्णु) को बनाए रखती है और साथ ही व्यक्ति को उसकी वास्तविक पहचान (शिव) का एहसास कराती है। महालक्ष्मी सर्वोच्च शक्ति देवी हैं जो आत्म-साक्षात्कार की ओर वास्तविक ज्ञान (बुद्धि) का प्रतीक हैं। उनके दो निचले हाथ अभयम (भ्रामक मार्गदर्शन से सुरक्षा या परिरक्षण) और वरदम (सच्चा मार्गदर्शन प्राप्त करने का आशीर्वाद) का प्रतीक हैं। उनके दो ऊपरी हाथों में पवित्र कमल का फूल है, जो हमारे सूक्ष्म शरीर में अदृश्य कमल के अलावा और कुछ नहीं, जिसे “सहस्रार दल पद्मम” (हजार पंखुड़ियों वाला कमल) कहा जाता है, जो छह चक्रों से परे स्थित है। Lalita Mahalakshmi Stotra पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन, माँ ललिता कामदेव के शरीर से उत्पन्न ‘भंडा’ नामक राक्षस का वध करने के लिए प्रकट हुई थीं। इस दिन मंदिरों में भक्तों का तांता लगता है। यह व्रत सभी सुखों को प्रदान करने वाला है, इसलिए इस दिन भगवान ललिता की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से किया जाता है। Lalita Mahalakshmi Stotra:ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र के लाभ ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र मनुष्य को शक्ति प्रदान करता है।ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र का जाप करने से मनुष्य को सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र मंत्र का जाप करने से जीवन की आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है, धन प्राप्ति में आसानी होती है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए Lalita Mahalakshmi Stotra:जो व्यक्ति लगातार असफलता से पीड़ित हैं, कठिनाइयों से गुजर रहे हैं और अंत नहीं पा रहे हैं, उन्हें नियमित रूप से ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्री ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र:Lalita Mahalakshmi Stotra वैष्णव-सम्प्रदाय के प्रसिद्ध ग्रन्थ “लक्ष्मी-नारायण-संहिता” से उद्धृत निम्न स्तोत्र शक्ति-साधना से सम्बन्धित है। वैष्णव ग्रन्थ होने के कारण इनकी साधना-प्रणाली ‘वैष्णवाचार’-परक है। ।। श्री नारायणी श्रीरुवाच ।। ललिताख्य-महा-लक्ष्म्या, नामान्यसंख्यानि वै ।तथाप्यष्टोत्तर-शतं, स-पादं श्रावय प्रभो ! ।। हे प्रभो ! ललिता महा-लक्ष्मी के असंख्य नाम हैं ।तथापि उनके एक सौ पैंतीस नामों को सुनाइए । ।। श्री पुरुषोत्तमोवाच ।। मुख्य-नाम्नां प्रपाठेन, फलं सर्वाभिधानकम् ।भवेदेवेति मुख्यानि, तत्र वक्ष्यामि संश्रृणु ।। ललिता श्री महा-लक्ष्मीर्लक्ष्मी रमा च पद्मिनी ।कमला सम्पदीशा च, पद्मालयेन्दिरेश्वरी ।। परमेशी सती ब्राह्मी, नारायणी च वैष्णवी ।परमेश्वरी महेशानी, शक्तीशा पुरुषोत्तमी ।। बिम्बी माया महा-माया, मूल-प्रकृतिरच्युती ।वासुदेवी हिरण्या च हरिणी च हिरण्मयी ।। कार्ष्णी कामेश्वरी चापि कामाक्षी भगमालिनी ।वह्निवासा सुन्दरी च संविच्च विजया जया ।। मंगला मोहिनी तापी वाराही सिद्धिरीशिता ।भुक्तिः कौमारिकी बुद्धिश्चामृता दुःखहा प्रसूः ।। सुभाग्यानन्दिनी संपद्, विमला विंद्विकाभिधा ।माता मूर्तिर्योगिनी च, चक्रिकार्चा रतिधृती ।। श्यामा मनोरमा प्रीतिः ऋद्धिः छाया च पूर्णिमा ।तुष्टिः प्रज्ञा पद्मावती दुर्गा लीला च माणिकी ।। उद्यमा भारती विश्वा, विभूतिर्विनता शुभा ।कीर्तिः क्रिया च कल्याणी विद्या कला च कुंकुमा ।। पुण्या पुराणा वागीशी, वरदा विभवात्मिनी ।सरस्वती शिवा नादा, प्रतिष्ठा संस्कृता त्रयी ।। आयुर्जीवा स्वर्ण-रेखा, दक्षा वीरा च रागिनी ।चपला पंडिता काली, भद्राम्बिका च मानिनी ।। विशालाक्षी वल्लभा च गोपी नारी नारायणी ।संतुष्टा च सुषुम्ना च, क्षमा धात्री च वारुणी ।। गुर्वी साध्वी च गायत्री, दक्षिणा चान्नपूर्णिका ।राजलक्ष्मीः सिद्धमाता माधवी भार्गवी परो ।। हारिती राशियानी च, प्राचीनी गौरिका श्रुतिः । ।। फल-श्रुति ।। इत्यष्टोत्तर-शतकं, सप्त-विंशतिरित्यपि ।ललिता-मुख्य-नामानि, कथितानि तव प्रिये ।। नित्यं यः पठते तस्य, भुक्तिर्मुक्तिः कर-स्थिता ।स्मृद्धिर्वंशस्य विस्तारः, सर्वानन्दा भवन्ति वै ।। ।। इति श्री ललिता महालक्ष्मी स्तोत्र सम्पूर्णम् ।। हे प्रिये ! ललिता के मुख्य एक सौ आठ और सत्ताइस नाम तुमसे कहे हैं। जो नित्य इन नामों को पढ़ता है, उसके कुल की सम्पन्नता बढ़ती है, सभी प्रकार के सुख मिलते हैं और भोग-मोक्ष उसके हाथ में रहते हैं अर्थात् साधक सभी भोगों को भोगकर अन्त में मोक्ष पाता है।

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Lalita Panchakam Stotram:ललिता पंचकम –एक अलौकिक स्तोत्र, जो जीवन को दिव्यता से भर दे

Lalita Panchakam Stotram:ललिता पंचकम (ललिता पंचकम): ललिता पंचकम की शुरुआत प्रथा स्मारमी ललिता वदनारविंदम से होती है, जो देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी का भक्ति मंत्र है और गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी श्रीचक्र (श्रीयंत्र) की अधिष्ठात्री देवी हैं। षोडशी के रूप में देवी त्रिपुरा को सोलह वर्ष की कन्या के रूप में दर्शाया गया है, और माना जाता है कि वे सोलह प्रकार की इच्छाओं का प्रतीक हैं। माँ त्रिपुरा को षोडशी, ललिता और राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। ललिता पंचकम के लाभों का वर्णन फल स्तुति में किया गया है और इसके अनुसार जो लोग ललिता पंचकम का पाठ करके देवी ललिता की पूजा करते हैं, उन्हें देवी सौभाग्य, समृद्धि और प्रसिद्धि का आशीर्वाद देती हैं। Lalita Panchakam Stotram:ललिता पंचकम के लाभ Lalita Panchakam Stotram:ललिता पंचकम किसी भी तंत्र या मंत्र से अधिक शक्तिशाली है।भगवान हयग्रीव ने मुक्ति के लिए शुद्धतम इरादे से ललिता पंचकम का जाप किया।यदि पूर्णिमा के दिन ललिता पंचकम का जाप किया जाए तो सभी रोग दूर हो जाते हैं और लंबी आयु की गारंटी होती है।यदि इसका जाप किया जाए तो एक करोड़ गंगा स्नान का लाभ मिलता है।एक करोड़ लिंग की स्थापना का लाभ मिलता है।अकाल के समय एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने का लाभ मिलता है। एक करोड़ छात्रों को पढ़ाने का लाभ मिलता है। Lalita Panchakam Stotram:यदि आपको बुखार है, तो बस अपने सिर को छूएं और इन 1000 नामों का जाप करें, बुखार उतर जाएगा और गायब हो जाएगा।रोगों से मुक्ति के लिए पवित्र भस्म को छूएं और इन 1000 नामों का जाप करें, और भस्म (विभूति) धारण करने से सभी रोग ठीक हो जाएंगे।ग्रह दोष (ग्रह दोष, शनि दोष आदि) से बचने के लिए, एक बर्तन में पानी रखें, और 1000 नामों का जाप करते हुए और अपने ऊपर पानी छिड़कते हुए ग्रहों से सभी समस्याओं का समाधान करें। पुत्र की प्राप्ति के लिए, एक महिला इन 1000 नामों का जाप कर सकती है और देवी माँ को मक्खन चढ़ा सकती है।मंत्रियों या राजाओं, यदि आप उन्हें प्रभावित करना चाहते हैं, तो राजा के महल की ओर मुंह करके इन 1000 नामों का जाप करें – राजा आपके पास आएंगे और आपकी ज़रूरत पूछेंगे। यदि आप इसका जाप करते हैं, तो आप काले जादू से प्रभावित नहीं हो सकते। यदि आप इसे 6 महीने तक रोजाना पढ़ते हैं, तो देवी लक्ष्मी आपके घर में स्थायी रूप से निवास करेंगी। इस पंचकम का पाठ किसे करना चाहिए:जो लोग काले जादू, टोना और अन्य तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव में हैं, उन्हें नियमित रूप से ललिता पंचकम का पाठ करना चाहिए। ललिता पञ्चकम् हिंदी:Lalita Panchakam Stotram प्रात: स्मरामि ललितावदनारविन्दं विम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् ।आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढयं मंदस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम् ।। 1 ।। प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं रक्तांगगुलीयलसदंगुलिपल्लवाढयाम् ।माणिक्यहेमवलयांगदशोभमानां पुण्ड्रेक्षुचापकुसुमेषुसृणीदधानाम् ।। 2 ।। प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् ।पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं पद्मांकुशध्वजसुदर्शनलांछनाढ़यम् ।। 3 ।। प्रात: स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं त्र्य्यन्तवेधविभवां करुणानवधाम् ।विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां विधेश्वरीं निगमवांगमनसातिदूराम् ।। 4 ।। प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति ।श्रीशाम्भविती जगतां जननी परेति वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति ।। 5 ।। य: श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकाया: सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते ।तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम् ।। 6 ।। ।। इति ललिता पंचकम सम्पूर्णम् ।।

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Satyanarayan Vrat Katha:श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा संपूर्ण हिंदी में,जानें पूजन विधि

Satyanarayan Vrat Katha:शास्त्रों में बताया गया है कि सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ करने से व्यक्ति को हजार यज्ञ करने के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है। सत्यनारायण भगवान व्रत कथा में भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप के बारे में बताया गया है। इस व्रत का पाठ करने से घर में सुख समृद्धि का वास होता है और भगवान विष्णु की कृपा बना रहती है। सत्यनारायण कथा का महत्व:Importance of Satyanarayan Vrat Katha भगवान सत्यनारायण का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। स्कन्द पुराण में भगवान विष्णु ने नारद को इस व्रत का महत्व बताया है। ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति सत्य को ईश्वर मानकर, निष्ठा के साथ इस व्रत और कथा का श्रवण करता है उसे मनमुताबिक फल की प्राप्ति होती है। पुराणों में यहां तक कहा गया है कि सत्यनारायण कथा कराने से हजारों वर्ष किए गए यज्ञ के बराबर फल मिलता है।   कब कराई जा सकती है कथा:When can the story be conducted? महीने की एकादशी, बृहस्पतिवार और हर महीने की पूर्णिमा तिथि को विष्णु जी का पूजन करने का विशेष फल प्राप्त होता है। इसलिए इन विशेष दिनों में सत्यनारायण की कथा पढ़ना और सुनना शुभ माना जाता है। सत्यनारायण व्रत पूजन:Satyanarayan fast worship सत्यनारायण व्रत के दौरान पूरे दिन उपवास रखना चाहिए। व्रत के दिन सुबह स्नान करके साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। शुभ मुहूर्त में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके सत्यनारायण भगवान का पूजन करें। संध्या काल में पंडित को बुलाकर सत्यनारायण की कथा श्रवण करनी चाहिए। चौकी पर कलश रखकर भगवान विष्णु की मूर्तियां सत्यनारायण की फोटो रखकर पूजन करना चाहिए। भगवान को भोग में चरणामृत, पान, तिल, रोली, कुमकुम, फल, फूल, सुपारी और दुर्गा आदि अर्पित करें। सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने के लिए परिवार के साथ- साथ अन्य भक्तों को भी शामिल करें। अंत में सभी लोगों में कथा का प्रसाद बांटे। Satyanarayan Vrat Katha:श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा Satyanarayan Vrat Katha:सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय एक समय की बात है नैषिरण्य तीर्थ में शौनिकादि, 88,000 ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा हे प्रभु! इस कलियुग में वेद विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिल सकती है? तथा उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनि श्रेष्ठ ! कोई ऐसा तप बताइए जिससे थोड़े समय में ही पुण्य मिलें और मनवांछित फल भी मिल जाए। इस प्रकार की कथा सुनने की हम इच्छा रखते हैं। सर्व शास्त्रों के ज्ञाता सूतजी बोले: हे वैष्णवों में पूज्य ! आप सभी ने प्राणियों के हित की बात पूछी है इसलिए मैं एक ऐसे श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों को बताऊंगा जिसे नारद जी ने लक्ष्मीनारायण जी से पूछा था और लक्ष्मीपति ने मनिश्रेष्ठ नारद जी से कहा था। आप सब इसे ध्यान से सुनिए | एक समय की बात है, योगीराज नारदजी दूसरों के हित की इच्छा लिए अनेकों लोको में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे। यहां उन्होंने अनेक योनियों में जन्मे प्राय: सभी मनुष्यों को अपने कर्मों द्वारा अनेकों दुखों से पीड़ित देखा। उनका दुख देख नारदजी सोचने लगे कि कैसा यत्न किया जाए जिसके करने से निश्चित रुप से मानव के दुखों का अंत हो जाए। इसी विचार पर मनन करते हुए वह विष्णुलोक में गए। वहाँ वह देवों के ईश नारायण की स्तुति करने लगे जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे, गले में वरमाला पहने हुए थे। स्तुति करते हुए नारद जी बोले, हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती हैं। आपका आदि, मध्य तथा अंत नहीं है। निर्गुण स्वरुप सृष्टि के कारण भक्तों के दुख को दूर करने वाले है, आपको मेरा नमस्कार है। नारदजी की स्तुति सुन विष्णु भगवान बोले, हे मुनिश्रेष्ठ! आपके मन में क्या बात है? आप किस काम के लिए पधारे हैं? उसे नि:संकोच कहो। इस पर नारद मुनि बोले कि मृत्युलोक में अनेक योनियों में जन्मे मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अनेको दुख से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि वो मनुष्य थोड़े प्रयास से ही अपने दुखों से कैसे छुटकारा पा सकते है। श्रीहरि बोले, हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह बात मैं कहता हूं, उसे सुनो। स्वर्ग लोक व मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है जो पुण्य देने वाला है। आज प्रेमवश होकर मैं उसे तुमसे कहता हूं। श्रीसत्यनारायण भगवान का यह व्रत अच्छी तरह विधानपूर्वक करके मनुष्य तुरंत ही यहाँ सुख भोग कर, मरने पर मोक्ष पाता है। श्रीहरि के वचन सुन नारदजी बोले कि उस व्रत का फल क्या है? और उसका विधान क्या है? यह व्रत किसने किया था? इस व्रत को किस दिन करना चाहिए? सभी कुछ विस्तार से बताएं। नारद की बात सुनकर श्रीहरि बोले, दुख व शोक को दूर करने वाला यह सभी स्थानों पर विजय दिलाने वाला है। मानव को भक्ति व श्रद्धा के साथ शाम को श्रीसत्यनारायण की पूजा धर्म परायण होकर ब्राह्मणों व बंधुओं के साथ करनी चाहिए। भक्ति भाव से ही नैवेद्य, केले का फल, घी, दूध और गेहूँ का आटा सवाया लें। गेहूं के स्थान पर साठी का आटा, शक्कर तथा गुड़ लेकर व सभी भक्षण योग्य पदार्थो को मिलाकर भगवान का भोग लगाएँ। ब्राह्मणों सहित बंधु-बांधवों को भी भोजन कराएं, उसके बाद स्वयं भोजन करें। भजन, कीर्तन के साथ भगवान की भक्ति में लीन हो जाएं। इस तरह से सत्य नारायण भगवान का यह व्रत करने पर मनुष्य की सारी इच्छाएँ निश्चित रुप से पूरी होती हैं। इस कलि काल अर्थात कलियुग में मृत्युलोक में मोक्ष का यही एक सरल उपाय बताया गया है। ॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय। Satyanarayan Vrat Katha:सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का दूसरा अध्याय सूत जी बोले, हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया था उसका इतिहास कहता हूं, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन

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