2025

Bhuvaneshwari Jayanti 2025

Bhuvaneshwari Jayanti 2025 Date: भुवनेश्वरी जयंती: देवी मां की आराधना से मिलेगा सौभाग्य, राशिनुसार ऐसे करें पूजा

Bhuvaneshwari Jayanti: हिंदू धर्म में, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भुवनेश्वरी जयंती मनाई जाती है। यह दिन देवी भुवनेश्वरी की साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां भुवनेश्वरी का अवतरण हुआ था। दस महाविद्याओं में से एक, मां भुवनेश्वरी, इस ब्रह्मांड की समस्त शक्ति का आधार हैं। उनका स्वरूप अत्यंत कांतिपूर्ण और सौम्य है, और स्वयं भगवान शंकर ने भी उनके पाठ से समस्त आगमों तथा तंत्रों में विज्ञानी हुए हैं। Bhuvaneshwari Jayanti इस विशेष दिन पर मां भुवनेश्वरी की आराधना करने से भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। मां भुवनेश्वरी की महिमा और पूजा का महत्व: मां भुवनेश्वरी को ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जो सृष्टि के पालन, पोषण और संहार का कार्य करती हैं। गुरु के सानिध्य में, गुरु के मुख से अभ्यास करके, जो मनुष्य शिवालय, शून्य घर या चौराहे पर इनके मंत्र का जप करता है, वह योगी बन जाता है। Bhuvaneshwari Jayanti 2025 Date जो एकाग्रचित्त होकर इसे सदा पढ़ता या सुनता है, Bhuvaneshwari Jayanti वह दीर्घायु और सुखी होता है, उसकी वाणी ओजस्वी हो जाती है। ऐसा व्यक्ति गुरु के चरणों में श्रद्धावान होकर स्त्रियों का प्रिय होता है। दुर्भाग्य और कष्टों से मुक्ति का उपाय: मंत्रमहार्णव के अनुसार, जो नारी दुर्भाग्य, धन-धान्य की कमी, रोग और कष्टों से पीड़ित है, उसे भोजपत्र पर देवी का मंत्र लिखकर अपने बाएं हाथ में बांधना चाहिए। ऐसा करने से उसे सुख और सौभाग्य दोनों प्राप्त होते हैं। पुरुषों को यही मंत्र अपने दाहिने हाथ में बांधना चाहिए। अतः, यदि आप भी इन सभी चीज़ों को प्राप्त करना चाहते हैं, तो Bhuvaneshwari Jayanti भुवनेश्वरी जयंती के दिन आपको मां भुवनेश्वरी की साधना अवश्य करनी चाहिए। भुवनेश्वरी देवी के मंत्र और पूजा विधि: भुवनेश्वरी देवी का एकाक्षरी मंत्र ‘ह्रीं’ है। उनका विशेष मंत्र है: ‘ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:’। पूजा विधि: इस मंत्र का कम से कम 1100 बार जाप करना चाहिए। किसी भी मंत्र का जितना जाप किया जाता है, उसके जप का 10 प्रतिशत हवन, 10 प्रतिशत तर्पण, 10 प्रतिशत मार्जन और 10 प्रतिशत ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। हवन सामग्री: मां भुवनेश्वरी का होम पीपल, गूलर, पलाश, बरगद की समिधाएं, पीली सरसों, खीर और घी आदि से किया जाता है। मंत्र जाप के बाद आप इनमें से किसी भी एक चीज़ का होम कर सकते हैं। Bhuvaneshwari Jayanti: देवी मां की आराधना से मिलेगा सौभाग्य, राशिनुसार ऐसे करें पूजा राशि अनुसार भुवनेश्वरी जयंती Bhuvaneshwari Jayanti के विशेष उपाय: भुवनेश्वरी जयंती के दिन विभिन्न राशि के जातक अपनी समस्याओं के निवारण और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए विशेष उपाय कर सकते हैं: • मेष राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करने के बाद पीपल की समिधा से हवन करें। इससे जीवन में आ रही परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। • वृष राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके दूध-चावल से बनी खीर का होम करें। इससे व्यापार में वृद्धि के लिए आर्थिक मदद मिलेगी। • मिथुन राशि: ब्राह्मी और घी को देवी भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” से अभिमंत्रित करके पूरे एक साल तक पिएं। इससे आपमें सुंदर कविता करने की अद्भुत क्षमता आएगी। • कर्क राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके बरगद की समिधा से हवन करें। इससे हर तरह के वाद-विवाद से छुटकारा मिलेगा। • सिंह राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके गूलर की समिधा से होम करें। Bhuvaneshwari Jayanti इससे विरोधियों से छुटकारा मिलेगा और भय दूर होगा। • कन्या राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके पीली सरसों का होम करें। इससे आप किसी को भी अपने वश में करने की क्षमता हासिल कर लेंगे। • तुला राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके घी, मधु और शक्कर से युक्त खीर से होम करें। इससे आपको नौकरी में तरक्की मिलेगी। • वृश्चिक राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके चंदन के जल से युक्त चावल से होम करें। आप जिस भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, आपको उस क्षेत्र में सफलता अवश्य मिलेगी। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि • धनु राशि: सुख-सौभाग्य पाने के लिए, भोजपत्र पर देवी भुवनेश्वरी का एकाक्षरी मंत्र “ह्रीं” लिखकर स्त्रियों को अपने बाएं हाथ में और पुरुषों को अपने दाहिने हाथ में बांधना चाहिए। Bhuvaneshwari Jayanti इससे शीघ्र ही सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होगी और जीवन में कोई अड़चन नहीं आएगी। • मकर राशि: जीवन में खुशहाली के लिए, अपने सामने एक लोटा जल लेकर बैठ जाएं और देवी भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का 21 बार जाप करें। जाप करने के बाद उस जल से अपना अभिषेक करें। ऐसा करने से आपके जीवन में खुशहाली बनी रहेगी. • कुंभ राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके देवी को चंदन, अगर, कपूर और केसर की गंध अर्पित करके, पलाश की समिधा से हवन करें। ऐसा करने से आपको श्रेष्ठ वाणी की प्राप्ति होगी और आप सभी को जल्द ही प्रभावित कर पाने में सफल होंगे। • मीन राशि: शुद्ध जल लेकर, उसे देवी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” से इक्कीस बार अभिमंत्रित करना चाहिए और अभिमंत्रित करने के बाद उस जल को पीना चाहिए। इस प्रकार मंत्र से अभिमंत्रित जल का पान करने से आपकी बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होगी। निष्कर्ष: भुवनेश्वरी जयंती (Bhuvaneshwari Jayanti) का यह पावन अवसर मां भुवनेश्वरी की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत मौका है। ऊपर बताए गए उपायों और मंत्रों का विधि-विधान से पालन करके आप देवी मां को प्रसन्न कर सकते हैं और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त कर सकते हैं। Bhuvaneshwari Jayanti अपनी राशि के अनुसार उपाय करके आप अपनी विशिष्ट इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं।

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Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और बप्पा की कृपा पाने के 5 महाउपाय

Ganesh Chaturthi: भगवान गणेश, जिन्हें बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य का देवता माना जाता है, के जन्मोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में पूरे देश में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाया जाता है। इस वर्ष, गणेश चतुर्थी का महापर्व 27 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा। Ganesh Chaturthi भक्तजन इस दौरान घरों, दफ्तरों, दुकानों और मंदिरों में गणपति जी की मूर्ति स्थापित करते हैं और पूरे 10 दिनों तक उनकी विधिनुसार उपासना करते हैं, Ganesh Chaturthi जो अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होती है। वैसे तो भगवान गणेश की पूजा-अर्चना रोजाना की जाती है, लेकिन भादों माह को उनकी उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी 2025 से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियां, शुभ मुहूर्त और बप्पा की कृपा पाने के सरल उपाय। Ganesh Chaturthi date and auspicious time 2025: गणेश चतुर्थी तिथि और शुभ मुहूर्त 2025 • चतुर्थी तिथि का प्रारंभ: भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर शुरू होगी। • चतुर्थी तिथि का समापन: 27 अगस्त की दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर होगा। • पर्व का दिन: उदया तिथि के अनुसार, गणेश चतुर्थी का पर्व 27 अगस्त को ही मनाया जाएगा। • गणेश मूर्ति स्थापना का शुभ मुहूर्त: ज्योतिषियों के अनुसार, 27 अगस्त को सुबह 11 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 40 मिनट तक का समय गणपति जी की मूर्ति स्थापना के लिए अत्यंत शुभ रहेगा। Ganesh Chaturthi आप इस शुभ अवधि में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर सकते हैं। गणेश चतुर्थी 2025 पर बन रहे दुर्लभ संयोग:Rare coincidences are happening on Ganesh Chaturthi 2025 इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर कई शुभ और दुर्लभ योग बन रहे हैं, जो इस तिथि की महत्ता को कई गुना बढ़ा रहे हैं: • प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग: गणेश चतुर्थी पर प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग का अद्भुत संयोग रहेगा। • इंद्र-ब्रह्म योग: इन योगों के साथ इंद्र-ब्रह्म योग भी उपस्थित रहेगा। • लक्ष्मी नारायण योग: कर्क राशि में बुध और शुक्र की युति से लक्ष्मी नारायण योग का निर्माण होगा, Ganesh Chaturthi जो धन-संपदा के लिए बहुत शुभ माना जाता है। • बुधवार का महासंयोग: गणेश चतुर्थी बुधवार के दिन पड़ रही है, और बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित है, जिससे इस पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है। Offer this special offering to Lord Ganesha on Ganesh Chaturthi:गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को लगाएं ये विशेष भोग भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए विशेष भोग लगाए जाते हैं, जिन्हें बेहद शुभ माना जाता है। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि • मोदक और लड्डू: भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अति प्रिय हैं। मान्यता है कि इन्हें अर्पित करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। • खीर और मालपुआ: मोदक और लड्डू के अलावा, खीर और मालपुआ जैसे भोग भी प्रभु को चढ़ाए जाते हैं। Do these 5 great measures for happiness and prosperity on Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर सुख-समृद्धि के लिए करें ये 5 महाउपाय गणेश चतुर्थी के दिन कुछ विशेष उपायों को करने से भगवान गणेश की कृपा से जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। 1. मोदक और लड्डू का भोग: गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाएं। ऐसा करने से उनकी कृपा बनी रहती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। 2. दूर्वा और शुद्ध घी अर्पित करें: भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास) के जोड़े और शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे धन की स्थिति में सुधार होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है। 3. पीले रंग की गणपति प्रतिमा स्थापित करें: यदि संभव हो, तो गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करें। यह माना जाता है कि ऐसा करने से गणेश जी की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और धन-धान्य में वृद्धि होती है। 4. हाथी को हरा चारा खिलाएं: गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को हरा चारा खिलाना बहुत शुभ होता है। इस उपाय से कार्यों में आने वाली सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। 5. गणपति मंदिर के दर्शन: भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति मंदिर जाकर उनके दर्शन अवश्य करें। यह उपाय जीवन में सुख-समृद्धि लाने में सहायक माना जाता है। गणेश चतुर्थी 2025 का पंचांग:Ganesh Chaturthi 2025 calendar 27 अगस्त 2025 के लिए पंचांग की महत्वपूर्ण जानकारी: • सूर्योदय: सुबह 05 बजकर 57 मिनट पर। • सूर्यास्त: शाम 06 बजकर 48 मिनट पर। • चंद्रोदय: सुबह 09 बजकर 28 मिनट पर। • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 28 मिनट से 05 बजकर 12 मिनट तक। • विजय मुहूर्त: दोपहर 02 बजकर 31 मिनट से 03 बजकर 22 मिनट तक। • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 48 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तक। • निशिता मुहूर्त: रात 12 बजे से 12 बजकर 45 मिनट तक। निष्कर्ष:conclusion गणेश चतुर्थी का पर्व हमें भगवान गणेश के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर देता है। इन शुभ मुहूर्तों और उपायों का पालन करके आप भी गणपति बप्पा की कृपा से अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि ला सकते हैं। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहाँ दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। अमर उजाला या लाइव हिंदुस्तान, यहाँ दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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Ekadanta Stuti Mahavishnukrita: महाविष्णुकृता एकदन्तस्तुतिः

Ekadanta Stuti Mahavishnukrita: महाविष्णुकृता एकदन्तस्तुतिः॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमहाविष्णुरुवाच ।नमो गणपते तुभ्यं विघ्नराजाय ते नमः ।नमः कृपानिधे ढुण्ढे भक्तसंरक्षकाय ते ॥ ३७॥सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं नमस्ते विघ्नहारिणे ।अभक्तेभ्यः सदा विघ्नदात्रे हेरम्बरूपिणे ॥ ३८॥निर्गुणाय गुणानां वै चालकाय नमो नमः ।नमः प्रपञ्चरूपाय प्रपञ्चरहिताय ते ॥ ३९॥ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे च ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे ।नरकुञ्जररूपाय नानामायामयाय ते ॥ ४०॥ कारणानां च देवेश कारणाय नमो नमः ।ज्येष्ठराजाय वै तुभ्यं कारणै रहिताय च ॥ ४१॥योगिनां हृदि संस्थाय योगिभ्यो योगदायिने ।योगरूपधरायैव गणेशाय नमो नमः ॥ ४२॥मायाश्रयाय मायाया आधाराय नमो नमः ।मायिभ्यो मायया त्वं वै मोहदाता नमो नमः ॥ ४३॥त्वां स्तोतुं कः समर्थः स्याद्योगाकारेण वर्तसे ।यत्र वेदा विकुण्ठाश्च शास्त्रैः सर्वैः सहाङ्गकैः ॥ ४४॥मनोवाणीविहीनस्त्वं न हि देव कृपाकर ।मनोवाणीमयो नैव कथं त्वां स्तौमि विघ्नपम् ॥ ४५॥तथापि बुद्धिदाता त्वं त्वत्प्रसादेन संस्तुतः ।धन्योऽहं देवदेवेश तव दर्शनतोऽधुना ॥ ४६॥साक्षाद् दृष्ट्वा गणेशं त्वां तेनाहं ब्रह्मरूपकः ।जातो नास्त्यत्र सन्देहो योगीन्द्रो योगदायकः ॥ ४७॥इत्युक्त्वा तं प्रणम्याऽसौ त्वनृत्यद् भक्तिभावितः ।रोमाञ्चितशरीरश्च हर्षाश्रुभिरपिप्लुतः ॥ ४८॥ (फलश्रुतिः)एकदन्त उवाच ।तमुवाच गणाधीशो वरं वृणु जनार्दन ।तपसा भक्तिभावेन तुष्टो दास्यामि वाञ्छितम् ॥ ४९॥त्वया कृतमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ।भविष्यति नृणां विष्णो पठतां श‍ृण्वतां सदा ॥ ५०॥धर्मार्थकाममोक्षाणां साधकं प्रभविष्यति ।ईप्सितार्थप्रदं सद्यः प्रसादान्मे च केशव ॥ ५१॥मुद्गल उवाच ।गणेशवचनं श्रुत्वा विष्णुर्हर्षसमन्वितः ।जगाद तं प्रणम्यादौ वाञ्छितं संवृणे त्विति ॥ ५२॥ विष्णुरुवाच ।यदि प्रसन्नतां यातस्तदा भक्तिं सुदुर्लभाम् ।तव पादयुगे देहि दृढामव्यभिचारिणीम् ॥ ५३॥अन्यद्देहि गणाधीश ज्ञानं मे ह्यतुलं तथा ।कीर्तिं सर्वत्र मे देहि सामर्थ्यं विविधं तथा ॥ ५४॥मधुकैटभनाशार्थमुपायं वद साम्प्रतम् ।अन्यदैत्याभिहनने सामर्थ्यं देहि विघ्नप ॥ ५५॥तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तथेति गणपोऽब्रवीत् ।युद्धाय गच्छ देवेश दैत्यौ जेष्यसि तौ बलात् ॥ ५६॥तयोर्मरणमत्यन्त सुगुप्तं ब्रह्मणा कृतम् ।समये वरदानस्य तपसा तोषितेन च ॥ ५७॥ इति महाविष्णुकृता एकदन्तस्तुतिः सम्पूर्णा ॥ – ॥ मुद्गलपुराणं द्वितीयः खण्डः । अध्यायः ४ । २.४ ३७-५७॥

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Ekadanta Stuti by Madasura: एकदन्तस्तुतिः मदासुरेण प्रोक्ता

Ekadanta Stuti by Madasura: एकदन्तस्तुतिः मदासुरेण प्रोक्ता ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ गृत्समद उवाच –मदासुरः प्रणम्यादौ परशुं यमसन्निभम् ।तुष्टाव विविधैर्वाक्यैः शस्त्रं ब्रह्ममयं भयात् ॥ ८॥ मदासुर उवाच ।नमस्ते एकदन्ताय मायामायिकरूपिणे ।सदा ब्रह्ममयायैव गणेशाय नमो नमः ॥ ९॥ मूषकारूढरूपाय मूषकध्वजिने नमः ।सर्वत्र संस्थितायैव बन्धहीनाय ते नमः ॥ १०॥ चतुर्बाहुधरायैव लम्बोदर सुरूपिणे ।नाभिशेषाय वै तुभ्यं हेरम्बाय नमो नमः ॥ ११॥ चिन्तामणिधरायैव चित्तस्थाय गजानन ।नानाभूषणयुक्ताय गणाधिपतये नमः ॥ १२॥ अनन्तविभवायैवानन्तमायाप्रचालक ।भक्तानन्दप्रदात्रे ते विघ्नेशाय नमो नमः ॥ १३॥ योगिनां योगदात्रे ते योगानां पतये नमः ।योगाकारस्वरूपाय ह्येकदन्तप्रधारिणे ॥ १४॥ मायाकारं शरीरं त एकशब्दः प्रकथ्यते ।दन्तः सत्तामयस्तत्र मस्तकस्ते नमो नमः ॥ १५॥ मायासत्ताविहीनस्त्वं तयोर्योगधरस्तथा ।कस्त्वां स्तोतुं समर्थः स्यादतस्ते वै नमो नमः ॥ १६॥ शरणागतपालाय शरणागतवत्सल ।पुनः पुनः सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं नमो नमः ॥ १७॥ रक्ष मामेकदन्तस्त्वं शरणागतमञ्जसा ।भक्तं भावेन सम्प्राप्तं संसारात्तारयस्व च ॥ १८॥ एवमुक्त्वा प्रणम्यापि मदः कृत्वा प्रदक्षिणाम् ।कृताञ्जलिपुटो भूत्वा संस्थितो देवसन्निधौ ॥ १९॥ तमुवाच गणाधीशः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।विकाररहितं दृष्ट्वा हृदयं भक्तिसंयुतम् ॥ २०॥ (फलश्रुतिः ।)एकदन्त उवाच ।त्वां हन्तुं क्रोधसंयुक्तो जातोऽहं नात्र संशयः ।अधुना शरणं प्रेप्सुं न हन्मि शरणागतम् ॥ २१॥ मदाज्ञावशगो भूत्वा तिष्ठ स्थाने स्वके सदा ।देवानां वैरमुत्सृज्य मद्भक्तिनिरतो भव ॥ २२॥ वरं वरय मत्तस्त्वं त्वया दास्यामि चिन्तितम् ।विनयेन च सन्तुष्टः स्तोत्रेणाऽहं विशेषतः ॥ २३॥ त्वया कृतमिदं स्तोत्रं यः पठिष्यति दैत्यप ।श‍ृणुयाद्वा प्रयत्नेन भवेत्तस्येप्सितप्रदम् ॥ २४॥ न तत्र मदसम्भूतं भयं भवति कर्हिचित् ।अन्ते स्वानन्ददं तस्मै स्तोत्रं मद्भक्तिदं भवेत् ॥ २५॥ इति एकदन्तस्तुतिःमदासुरकृता द्वादशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ – ॥ मुद्गलपुराणं द्वितीयः खण्डः । अध्यायः ५४ । २.५४ ९-२५॥

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Ekadantasharanagatistotram:एकदन्तशरणागतिस्तोत्रम्

Ekadantasharanagatistotram:एकदन्तशरणागतिस्तोत्रम्श्रीगणेशाय नमः । देवर्षय ऊचुः ।सदात्मरूपं सकलादिभूतममायिनं सोऽहमचिन्त्यबोधम् ।अनादिमध्यान्तविहीनमेकं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १॥ अनन्तचिद्रूपमयं गणेशमभेदभेदादिविहीनमाद्यम् ।हृदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २॥ समाधिसंस्थं हृदि योगिनां यं प्रकाशरूपेण विभातमेतम् ।सदा निरालम्बसमाधिगम्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ३॥ स्वबिम्बभावेन विलासयुक्तां प्रत्यक्षमायां विविधस्वरूपाम् ।स्ववीर्यकं तत्र ददाति यो वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ४॥ त्वदीयवीर्येण समर्थभूतस्वमायया संरचितं च विश्वम् ।तुरीयकं ह्यात्मप्रतीतिसंज्ञं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ५॥ स्वदीयसत्ताधरमेकदन्तं गुणेश्वरं यं गुणबोधितारम् ।भजन्तमत्यन्तमजं त्रिसंस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ६॥ ततस्वया प्रेरितनादकेन सुषुप्तिसंज्ञं रचितं जगद्वै ।समानरूपं ह्युभयत्रसंस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ७॥ तदेव विश्वं कृपया प्रभूतं द्विभावमादौ तमसा विभान्तम् ।अनेकरूपं च तथैकभूतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ८॥ ततस्त्वया प्रेरितकेन सृष्टं बभूव सूक्ष्मं जगदेकसंस्थम् ।सुसात्विकं स्वप्नमनन्तमाद्यं तमेकदन्तं शरण व्रजामः ॥ ९॥ तदेव स्वप्नं तपसा गणेश सुसिद्धरूपं विविधं बभूव ।सदैकरूपं कृपया च तेऽद्य तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १०॥ त्वदाज्ञया तेन त्वया हृदिस्थं तथा सुसृष्टं जगदंशरूपम् ।विभिन्नजाग्रन्मयमप्रमेयं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ११॥ तदेव जाग्रद्रजसा विभातं विलोकितं त्वत्कृपया स्मृतेन ।बभूव भिन्नं च सदैकरूपं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १२॥ सदेव सृष्ट्वा प्रकृतिस्वभावात्तदन्तरे त्वं च विभासि नित्यम् ।धियः प्रदाता गणनाथ एकस्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १३॥ त्वदाज्ञया भान्ति ग्रहाश्च सर्वे प्रकाशरूपाणि विभान्ति खे वै ॥ भ्रमन्ति नित्यं स्वविहारकार्यास्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १४॥ त्वदाज्ञया सृष्टिकरो विधाता त्वदाज्ञया पालक एव विष्णुः ।त्वदाज्ञया संहरको हरोऽपि तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १५॥ यदाज्ञया भूमिजलेऽत्र संस्थे यदाज्ञयापः प्रवहन्ति नद्यः ।स्वतीर्थसंस्थश्च कृतः समुद्रस्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः॥ १६॥ यदाज्ञया देवगणा दिविस्था ददन्ति वै कर्मफलानि नित्यम् ।यदाज्ञया शैलगणाः स्थिरा वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १७॥ यदाज्ञया शेषधराधरो वै यदाज्ञया मोहप्रदश्च कामः ।यदाज्ञया कालधरोऽर्यमा च तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १८॥ यदाज्ञया वाति विभाति वायुर्यदाज्ञयाग्निर्जठरादिसंस्थः ।यदाज्ञयेदं सचराचरं च तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १९॥ यदन्तरे संस्थितमेकदन्तस्तदाज्ञया सर्वमिदं विभाति ।अनन्तरूपं हृदि बोधकं यस्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २०॥ सुयोगिनो योगबलेन साध्यं प्रकुर्वते कः स्तवनेन स्तौति ।अतः प्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तु तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २१॥ गृत्समद उवाच ।एवं स्तुत्वा गणेशानं देवाः समुनयः प्रभुम् ॥ तूष्णीम्भावं प्रपद्यैव ननृतुर्हर्षसंयुताः ॥ २२॥ स तानुवाच प्रीतात्मा देवर्षीणां स्तवेन वै ॥ एकदन्तो महाभागो देवर्षीन् भक्तवत्सलः ॥ २३॥ एकदन्त उवाच ।स्तोत्रेणाऽहं प्रसन्नोऽस्मि सुराः सर्षिगणाः किल ।वरदं भो वृणुत वो दास्यामि मनसीप्सितम् ॥ २४॥ भवत्कृतं मदीयं यत्स्तोत्रं प्रीतिप्रदं च तत् ।भविष्यति न सन्देहः सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २५॥ यं यमिच्छति तं तं वै दास्यामि स्तोत्रपाठतः ।पुत्रपौत्रादिकं सर्वं कलत्रं धनधान्यकम् ॥ २६ ।गजाश्वादिकमत्यन्तं राज्यभोगादिकं ध्रुवम् ।भुक्तिं मुक्तिं च योगं वै लभते शान्तिदायकम् ॥ २७॥ मारणोच्चाटनादीनि राज्यबन्धादिकं च यत् ।पठतां श‍ृण्वतां नॄणां भवेच्च बन्धहीनताम् ॥ २८॥ एकविंशतिवारं यः श्लोकानेवैकविंशतीन् ।पठेच्च हृदि मां स्मृत्वा दिनानि त्वेकविंशतिः ॥ २९॥ न तस्य दुर्लभं किञ्चित्रिषु लोकेषु वै भवेत् ।असाध्यं साधयेन्मर्त्यः सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ३०॥ नित्यं यः पठति स्तोत्रं ब्रह्मभूतः स वै नरः ।तस्य दर्शनतः सर्वे देवाः पूता भवन्ति च ॥ ३१॥ इति श्रीमुद्गलपुराणे एकदन्तशरणागतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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Dead in Dreams

Dead in Dreams:सपने में मृत लोगों का दिखना: क्या हैं इसके शुभ-अशुभ संकेत? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य

Dead in Dreams: सपने में मृत लोगों का दिखना: क्या हैं इसके शुभ-अशुभ संकेत? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य परिचय: हम सभी सपने देखते हैं, और कई बार ये इतने वास्तविक लगते हैं कि हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि इनका अर्थ क्या है। स्वप्न शास्त्र (Dream Interpretation) में सपनों में दिखने वाली हर चीज़ की व्याख्या की गई है। खास तौर पर, जब सपने में मृत व्यक्ति (deceased person) नज़र आते हैं, तो वे हमें भविष्य से जुड़े कई गहरे संकेत देते हैं। Dead in Dreams हमारे चाहने वाले, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, कभी-कभी सपनों के माध्यम से हमसे कुछ कहने की कोशिश करते हैं। आइए, स्वप्न शास्त्र के अनुसार जानते हैं कि सपने में मृत लोगों का दिखना शुभ है या अशुभ और इन सपनों का क्या मतलब हो सकता है। Why do dead people appear in dreams: सपने में मृत व्यक्ति क्यों दिखते हैं? मृत व्यक्तियों का सपने में आना कई कारणों से हो सकता है: 1. मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Reasons): मरे हुए लोगों की यादें और उनके साथ बीती बातें हमें अक्सर याद आती रहती हैं। यदि किसी की मृत्यु से हमें बहुत दुःख हुआ है और हम उसके बारे में सोचते रहते हैं, तो वह व्यक्ति सपने में आने लगता है। 2. आध्यात्मिक कारण (Spiritual Reasons): ऐसा माना जाता है कि यदि किसी की मृत्यु समय से पहले हो जाती है, तो वह अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने के संकेत देने के लिए सपने में आता है। ऐसे में वे सपने में आपकी मदद की अपेक्षा रखते हैं। सपने में मृत व्यक्तियों के दिखने के शुभ संकेत (Positive Signs): कुछ सपने ऐसे होते हैं जब मृत व्यक्ति का दिखना शुभ माना जाता है: स्वस्थ और खुश दिखना: यदि कोई करीबी सदस्य बीमारी के कारण मरा हो, लेकिन वह आपको सपने में बिल्कुल स्वस्थ और खुश दिखाई देता है, तो इसका अर्थ है कि उसका जन्म किसी अच्छे स्थान पर हो चुका है या वे जहाँ भी हैं, खुश हैं। Dead in Dreams यह सपना आपको उस व्यक्ति को भुलाकर जीवन में आगे बढ़ने का संकेत देता है और जीवन में खुशहाली लाता है। खुश या मुस्कुराते हुए दिखना: सपने में किसी मृत व्यक्ति का खुश नज़र आना शुभ संकेत देता है। Dead in Dreams यह दर्शाता है कि आपका आने वाला समय काफी शुभ रहेगा। रोते हुए दिखना: मृत व्यक्ति का सपने में रोते हुए दिखना भी शुभ होता है। ऐसे में आपको लाभ होता है और आपकी मनोकामना पूरी होती है। आशीर्वाद देना: यदि मृत व्यक्ति सपने में आशीर्वाद दे रहा है, Dead in Dreams तो इसका मतलब आपको अपने किसी कार्य में बड़ी सफलता हासिल होने वाली है। आकाश में दूर दिखना: यदि मरा हुआ व्यक्ति बहुत दूर आकाश में दिखाई दे, तो इसका अर्थ है कि उसे मोक्ष की प्राप्ति हो गई है। सपने में प्रेमी या प्रेमिका को देखना – शुभ या अशुभ संकेत? जानिए क्या कहते हैं आपके सपने सपने में मृत व्यक्तियों के दिखने के अशुभ संकेत या चेतावनी (Negative Signs/Warnings): कुछ सपने चेतावनी या किसी अधूरी इच्छा की ओर इशारा करते हैं: खाने के लिए कुछ मांगना: मृत व्यक्ति का सपने में आकर खाने के लिए कुछ मांगना अशुभ होता है। ऐसा सपना आने पर आपको मंदिर में जाकर उस व्यक्ति की मनपसंद चीज़ का दान करना चाहिए जो सपने में आया है। गुस्से में या कुछ मांगते हुए दिखना: यदि मृत व्यक्ति सपने में गुस्से में दिखाई दे या आपसे कुछ मांग रहा हो, तो इसका मतलब है कि उसकी कोई इच्छा अधूरी रह गई है, जिसे वह आपके माध्यम से पूरी कराना चाहता है। ऐसा सपना आने पर आत्मा की शांति के उपाय कर लेने चाहिए। बार-बार दिखना: यदि मृत व्यक्ति सपने में बार-बार दिखाई दे रहा है, तो इसका मतलब वह असंतुष्ट है। Dead in Dreams ऐसे में मृत व्यक्ति के परिवार वालों को किसी विशेषज्ञ की सलाह से उसकी आत्मा की शांति के उपाय करने चाहिए। शांत दिखना (गलत काम से रोकना): यदि मरा हुआ व्यक्ति सपने में शांत दिखाई दे, Dead in Dreams तो इसका मतलब आपको वो किसी गलत काम को करने से रोक रहा है। ऐसे में आपको तुरंत गलत राह छोड़ देनी चाहिए। बिना कपड़ों के, बिना जूते-चप्पल के या भूखा दिखना: अगर मृत व्यक्ति सपने में बिना कपड़ों के, बिना जूते-चप्पल के या फिर भूखा दिखाई दे, तो आपको वस्त्रों, खान-पान की वस्तुओं का और जूते-चप्पलों का दान कर देना चाहिए। निष्कर्ष: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, Dead in Dreams सपने में मृत व्यक्तियों का दिखना सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि अक्सर भविष्य के लिए कुछ महत्वपूर्ण संकेत लिए होता है। इन संकेतों को समझकर हम अपने जीवन में सही दिशा चुन सकते हैं या किसी अधूरी इच्छा को पूरा करने में मदद कर सकते हैं। यह जानकारी सामान्य मान्यताओं पर आधारित है।

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Hartalika Teej

Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम

Hartalika Teej: हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का पावन व्रत मनाया जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस दिन, सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले मां पार्वती ने ही हरतालिका तीज का व्रत रखकर भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। हरतालिका तीज Hartalika Teej का व्रत हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत रखने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कुंवारी कन्याओं के विवाह में आ रही परेशानियां दूर होती हैं, साथ ही उन्हें मनचाहा वर भी मिलता है। Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम When is Hartalika Teej 2025: हरतालिका तीज 2025 कब है? इस साल हरतालिका तीज का व्रत मंगलवार, 26 अगस्त 2025 को रखा जाएगा। हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त: प्रातःकाल हरितालिका पूजा मुहूर्त – सुबह 05:56 बजे से 08:31 बजे तक अवधि – 02 घंटे 35 मिनट पहला हरतालिका तीज का व्रत ससुराल में क्यों नहीं करना चाहिए? हरतालिका तीज का व्रत काफी नियमों के साथ किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार का व्यवधान शुभ परिणाम को विपरीत परिणाम में बदल सकता है। हरतालिका तीज को लेकर लंबे समय से एक परंपरा चली आ रही है कि नवविवाहित कन्या के द्वारा यह व्रत अपने मायके में ही शुरू किया जाता है। तीज का पहला व्रत ससुराल से नहीं रखा जाता है। इस दौरान नवविवाहित कन्याएं अपने मायके आती हैं और भगवान भोलेनाथ की पूरे धूमधाम से पूजा-आराधना करती हैं। एक बार मायके से व्रत की शुरुआत करने के बाद, आप ससुराल में हों या मायके में, कहीं भी यह व्रत कर सकती हैं। हरतालिका तीज व्रत का रहस्य- बारहवें सतयुग की कथा Hartalika Teej Puja Method:हरतालिका तीज पूजा विधि हरतालिका तीज Hartalika Teej के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर सभी देवी-देवताओं को धूप-दीप दिखाएं और व्रत का संकल्प लें। पूजा के दौरान, महिलाओं को मिट्टी से भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनानी चाहिए। माता गौरी ने भी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर ही भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी और उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। इसलिए, व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वे गंगा नदी या आसपास के किसी बहते हुए जलाशय से मिट्टी लाकर भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनाएं। हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ की तस्वीर रखकर भी पूजा कर सकती हैं। इसके बाद, मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करें। Hartalika Teej हरतालिका तीज व्रत कथा का पाठ करें और सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें। मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें और अखंड सौभाग्य की कामना करें। भगवान को भोग भी लगाएं। हरतालिका तीज पूजन सामग्री की सूची:List of Hartalika Teej puja materials मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए पूजा के दौरान इन सामग्री का विशेष ध्यान रखें: फल, फूल, कपूर, घी, दीपक, मिठाई, सुपारी, पान, बताशा, कुमकुम, पूजा-कलश, सूखा नारियल, शमी का पत्ता, धतूरा, शहद, गुलाल, पंचामृत, कलावा, इत्र, चंदन, मंजरी, अक्षत, गंगाजल, दूर्वा, जनेऊ, बेलपत्र, वस्त्र और केले का पत्ता। यह व्रत जीवन भर रखा जाता है, लेकिन अगर किसी कारणवश इसे रख पाना संभव न हो तो इसका उद्यापन अवश्य करना चाहिए। हरतालिका तीज के दौरान सभी नियमों का संपूर्ण पालन करना चाहिए। मिट्टी से बनानी चाहिए भोलेनाथ की प्रतिमा:Bholenath’s statue should be made of clay ज्योतिषाचार्य ने बताया कि तीज करने के दौरान महिलाओं को चाहिए कि वह मिट्टी से भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनाएं. उन्होंने बताया कि सबसे पहले माता गौरी ने हरतालिका तीज का व्रत रखा था और उन्होंने मिट्टी की ही प्रतिमा बनाकर भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी और भगवान भोलेनाथ को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था. ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वह गंगा नदी या आसपास के किसी जलाशय जिसका पानी बह रहा हो वहां से मिट्टी लाकर भगवान भोलेनाथ के प्रतिमा बनाएं. हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ की तस्वीर रखकर भी पूजा करती हैं. ऐसे में हरतालिका तीज के दौरान सभी नियमों का संपूर्ण पालन करना चाहिए.

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ShrI uchChiShTamahAgaNapati dhyAnam: श्रीउच्छिष्टमहागणपति ध्यानम्

shrI uchChiShTamahAgaNapati dhyAnam: श्रीउच्छिष्टमहागणपति ध्यानम् मूलाधारे सुयोन्याख्ये चिदग्निवरमण्डले ।समासीनं पराशक्तिविग्रहं गणनायकम् ॥ १॥ रक्तोत्पलसमप्रख्यं नीलमेघसमप्रभम् ।रत्नप्रभालसद्दीप्तमुकुटाञ्चितमस्तकम् ॥ २॥ करुणारससुधाधारास्रवदक्षित्रयान्वितम् ।अक्षिकुक्षिमहावक्षः गण्डशूकादिभूषणम् ॥ ३॥ पाशाङ्कुशेक्षुकोदण्डपञ्चबाणलसत्करम् ।नीलकान्तिघनीभूतनीलवाणीसुपार्श्वकम् ॥ ४॥ सुत्रिकोणाख्यनीलाङ्गरसास्वादनतत्परम् ।पत्न्यालिङ्गतवामाङ्गं सप्तमातृनिषेवितम् ॥ ५॥ ब्रह्मविष्णुमहेन्द्रादिसम्प्रपूजितपादुकम् ।महद्द्वयपदोवाच्यपादुकामन्त्रसारकम् ॥ ६॥ नवावरणयज्ञाख्य वरिवस्याविधिप्रियम् ।पञ्चावरणयज्ञाख्य विधिसम्पूज्यपादुकम् ॥ ७॥ अखण्डकोटिब्रह्माण्डामण्डलेश्वरमव्ययम् ।रदनाक्षरसम्पूर्णमन्त्रराजस्वरूपिणम् ॥ ८॥ गिरिव्याहृतिवर्णात्ममन्त्रतत्वप्रदर्शकम् ।अरुणारुणतनुच्छायमहाकामकलात्मकम् ॥ ९॥ महागोप्यमहाविद्या प्रकाशितकलेवरम् ।चिच्छिवं चिद्भवं शान्तं त्रिगुणादिविवर्जितम् ॥ १०॥ अष्टोत्तरशताभिख्यकलान्यासविधिप्रियम् ।चिदाकारमहाद्वीपमध्यवाससुविग्रहम् ॥ ११॥ चिदब्धिमथनोत्पन्नचित्सारघनविग्रहम् ।वाचामगोचरं शान्तं शुद्धचैतन्यरूपिणम् ॥ १२॥ मूलकन्दस्थचिद्देशनवताण्डवपण्डितम् ।षडम्बुरुहसंस्थायिपरचिव्द्योमभासुरम् ॥ १३॥ अकारादिक्षकारान्तवर्णलक्षितचित्सुखम् ।अकाराक्षरनिर्दिष्टप्रकाशमयविग्रहम् ॥ १४॥ हकाराख्यविमर्शात्मप्रभादीप्तजगत्त्रयम् ।महाहंसजपध्यानविधिज्ञातस्वरूपकम् ॥ १५॥ सदोदितमहाप्रज्ञाकारं संसारतारकम् ।मोक्षलक्ष्मीप्रदातारं कालातीतमहाप्रभुम् ॥ १६॥ नामरूपादिसम्भिन्ननित्यपूर्णचिदुत्तमम् ।प्रत्यग्भूतमहाप्रज्ञागात्रगोचरविग्रहम् ॥ १७॥ महाकुण्डलिनीरूपं षट्च्क्रनगरेश्वरम् ।अप्राकृतमहादिव्यचैतन्यात्मस्वरूपिणम् ॥ १८॥ नादबिन्दुकलातीतं कार्यकारणवर्जितम् ।षडम्बुरुहचक्रान्तः स्फुरत्सौदामिनीप्रभम् ॥ १९॥ तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थपरिबोधनपण्डितम् ।ब्रह्मादिकीटपर्यन्तव्याप्तसंवित्सुधारसम् ॥ २०॥ इच्छाज्ञानक्रियानन्दसर्वतन्त्र स्वतन्त्रिणम् ।हृदयग्रन्थिभिद्विद्यादर्शनोत्सुकमानसम् ॥ २१॥ पञ्चकृत्यपरेशानं महात्रैपुरविग्रहम् ।श्रीचक्रराजमध्यस्थशून्यग्राममहेश्वरम् ॥ २२॥ ब्रह्मविद्यास्वरूपश्रीललितारूपधारिणम् ।वशिन्याद्यावृतं साध्यं अद्वयानन्दवर्धनम् ॥ २३॥ आदिशङ्कररूपेशदक्षिणामूर्तिपूजितम् ।असंस्पृष्टमहाप्रज्ञाभिख्याद्वैतस्थितिप्रभम् ॥ २४॥ एवं सञ्चितयेद्देवं उच्छिष्टगणनायकम् ।नीलतारासमेतं तु सच्चिदानन्दविग्रहम् ॥ २५॥

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Ganesha Stavarajah: उच्छिष्टगणेशस्तवराजः अथवा विनायकलीलास्तुतिः

Uchchishta Ganesha Stavarajah: उच्छिष्टगणेशस्तवराजः अथवा विनायकलीलास्तुतिः श्री गणेशाय नमः ।देव्युवाच ।पूजान्ते ह्यनया स्तुत्या स्तुवीत गणनायकम् ।नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम् ।गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभवासनं च ॥ १॥ केयुरिणंहारकिरीटजुष्टं चतुर्भुजं पाशवराभयानि ।सृणिं च हस्तं गणपं त्रिनेत्रं सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम् ॥ २॥ सृणिंवहन्तं षडक्षरात्मानमनल्पभूषं मुनीश्वरैर्भार्गवपूर्वकैश्च ।संसेवितं देवमनाथकल्पं रूपं मनोज्ञं शरणं प्रपद्ये ॥ ३॥ वेदान्तवेद्यं जगतामधीशं देवादिवन्द्यं सुकृतैकगम्यम् ।स्तम्बेरमास्यं ननु चन्द्रचूडं विनायकं तं शरणं प्रपद्ये ॥ ४॥ नव चन्द्रचूडं भवाख्यदावानलदह्यमानं भक्तं स्वकीयं परिषिञ्चते यः ।गण्डस्रुताम्भोभिरनन्यतुल्यं वन्दे गणेशं च तमोऽरिनेत्रम् ॥ ५॥ तमालनीलम् शिवस्य मौलाववलोक्य चन्द्रं सुशुण्डया मुग्धतया स्वकीयम् ।भग्नं विषाणं परिभाव्य चित्ते आकृष्टचन्द्रो गणपोऽवतान्नः ॥ ६॥ पितुर्जटाजूटतटे सदैव भागीरथीं तत्र कुतूहलेन । विलोक्य भागीरथींविहर्तुकामः स महीध्रपुत्र्या निवारितः पातु सदा गजास्यः ॥ ७॥ लम्बोदरो देवकुमारसङ्घैः क्रीडन्कुमारं जितवान्निजेन ।करेण चोत्तोल्य ननर्त रम्यं दन्तावलास्यो भयतः स पायात् ॥ ८॥ आगत्य योच्चैर्हरिनाभिपद्मं ददर्श तत्राशु करेण तच्च ।उद्धर्तुमिच्छन्विधिवादवाक्यं मुमोच भूत्वा चतुरो गणेशः ॥ ९॥ विधिचाटुवाक्यंनिरन्तरं संस्कृतदानपट्टे लग्नां तु गुञ्जद्भ्रमरावलीं वै ।तं श्रोत्रतालैरपसारयन्तं स्मरेद्गजास्यं निजहृत्सरोजे ॥ १०॥ विश्वेशमौलिस्थितजह्नुकन्याजलं गृहीत्वा निजपुष्करेण ।हरं सलीलं पितरं स्वकीयं प्रपूजयन्हस्तिमुखः स पायात् ॥ ११॥ स्तम्बेरमास्यं घुसृणाङ्गरागं सिन्दूरपूरारुणकान्तकुम्भम् ।कुचन्दनाश्लिष्टकरं गणेशं ध्यायेत्स्वचित्ते सकलेष्टदं तम् ॥ १२॥ स भीष्ममातुर्निजपुष्करेण जलं समादाय कुचौ स्वमातुः ।प्रक्षालयामास षडास्यपीतौ स्वार्थं मुदेऽसौ कलभाननोऽस्तु ॥ १३॥ सिञ्चाम नागं शिशुभावमाप्तं केनापि सत्कारणतो धरित्र्याम् ।वक्तारमाद्यं नियमादिकानां लोकैकवन्द्यं प्रणमामि विघ्नम् ॥ १४॥ विघ्नं विघ्ननाशनमित्यर्थः आलिङ्गितं चारुरुचा मृगाक्ष्या सम्भोगलोलं मदविह्वलाङ्गम् ।विघ्नौघविध्वंसनसक्तमेकं नमामि कान्तं द्विरदाननं तम् ॥ १५॥ हेरम्ब उद्यद्रविकोटिकान्तः पञ्चाननेनापि विचुम्बितास्यः ।मुनीन्सुरान्भक्तजनांश्च सर्वान्स पातु रथ्यासु सदा गजास्यः ॥ १६॥ द्वैपायनोक्तानि स निश्चयेन स्वदन्तकोट्या निखिलं लिखित्वा । द्वैपायनोक्तं सुविचार्य येनदन्तं पुराणं शुभमिन्दुमौलिस्तपोभिरुग्रं मनसा स्मरामि ॥ १७॥ सुतमिन्दुमौलेस्तमग्र्यरूपं क्रीडातटान्ते जलधाविभास्ये वेलाजले लम्बपतिः प्रभीतः ।विचिन्त्य कस्येति सुरास्तदा तं विश्वेश्वरं वाग्भिरभिष्टुवन्ति ॥ १८॥ वाचां निमित्तं स निमित्तमाद्यं पदं त्रिलोक्यामददत्स्तुतीनाम् ।सर्वैश्च वन्द्यं न च तस्य वन्द्यः स्थाणोः परं रूपमसौ स पायात् ॥ १९॥ इमां स्तुतिं यः पठतीह भक्त्या समाहितप्रीतिरतीव शुद्धः ।संसेव्यते चेन्दिरया नितान्तं दारिद्र्यसङ्घं स विदारयेन्नः ॥ २०॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे हरगौरीसंवादेउच्छिष्टगणेशस्तोत्रं समाप्तम् ॥ विनायकलीलास्तुतिः

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Maharishi Dadhichi

Maharishi Dadhichi Jayanti: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा

Maharishi Dadhichi Jayanti Kab hai: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा Maharishi Dadhichi: हर साल भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को महर्षि दधीचि जयंती पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह दिन एक ऐसे महान संत के सर्वोच्च त्याग को याद करने का अवसर है, जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। वर्ष 2025 में, यह पावन पर्व 31 अगस्त को मनाया जाएगा। आइए, इस विशेष अवसर पर महर्षि दधीचि की प्रेरणादायक कहानी को जानें, जिन्होंने अपने निस्वार्थ बलिदान से देवताओं और संसार की रक्षा की। Maharishi Dadhichi Introduction to a great ascetic: महर्षि दधीचि: एक महान तपस्वी का परिचय महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi प्राचीन काल के सबसे पूज्य और महत्वपूर्ण संतों में से एक माने जाते हैं। वे ऋषि अथर्वा और माता शांति (कुछ मान्यताओं के अनुसार चित्ति) के पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी (या कुछ स्थानों पर शांति, जो कर्दम ऋषि की पुत्री थीं) और पुत्र का नाम पिप्पलाद था। महर्षि दधीचि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन घोर तपस्या में समर्पित कर दिया था। उनकी अटूट भक्ति और तपस्या के कारण उन्हें पूरे देश में अत्यंत सम्मान प्राप्त था। An attempt to break the doubts and penance of Devraj Indra: देवराज इंद्र की शंका और तपस्या भंग करने का प्रयास एक पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि दधीचि की घोर तपस्या से तीनों लोकों में भय का माहौल बन गया, और यहां तक कि देवराज इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगा। इंद्र को लगा कि दधीचि उनके इंद्रलोक और सिंहासन को हथियाना चाहते हैं। इस आशंका में, इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा रूपवती को भेजा। हालाँकि, Maharishi Dadhichi महर्षि दधीचि अपनी एकाग्रता में अटल रहे और अप्सरा अपने प्रयास में विफल रही। रूपवती ने स्वर्ग लौटकर इंद्र को दधीचि की एकाग्र शक्ति के बारे में बताया, जिसके बाद इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने महर्षि से क्षमा याचना की। वृत्रासुर का आतंक और देवताओं की दुर्दशा: The terror of Vritrasura and the plight of the gods समय बीतने के साथ, वृत्रासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को देवलोक से बाहर निकाल दिया था। वृत्रासुर इतना बलशाली था कि देवताओं के सभी अस्त्र-शस्त्र उसके सामने निष्प्रभावी हो गए और उसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र प्रभावित नहीं कर पा रहा था। देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर सहायता के लिए ब्रह्माजी के पास पहुंचे। Brahmaji’s advice and Maharishi’s amazing sacrifice: ब्रह्माजी की सलाह और महर्षि का अद्भुत त्याग ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि वृत्रासुर का वध केवल महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की अस्थियों से बने विशेष वज्र से ही किया जा सकता है, क्योंकि उनकी हड्डियाँ असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। देवताओं के कल्याण के लिए यही एकमात्र उपाय था। देवराज इंद्र, अपने पूर्व के एक अपमानजनक व्यवहार के कारण महर्षि दधीचि के पास जाने में हिचकिचा रहे थे। (एक कथा के अनुसार, इंद्र ने एक बार दधीचि का अपमान किया था और उनके सिर को धड़ से अलग करने की धमकी दी थी जब महर्षि ब्रह्म विद्या अश्विनीकुमारों को देने वाले थे; अश्विनीकुमारों ने महर्षि के धड़ पर अश्व का सिर लगाकर विद्या प्राप्त की थी, जिसके बाद इंद्र ने उनका असली सिर धड़ से अलग कर दिया था, जिसे बाद में अश्विनीकुमारों ने फिर से जोड़ा था।)। लेकिन वृत्रासुर के बढ़ते अत्याचारों के कारण, उन्हें आखिरकार महर्षि दधीचि के पास जाना पड़ा और अपनी समस्या बताई। महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi ने, बिना किसी संकोच के, देवताओं और संसार के कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने का निर्णय लिया। भगवान शिव से प्राप्त वरदान के कारण उनका शरीर और अस्थियां असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। उन्होंने स्वेच्छा से अपने प्राणों का त्याग कर दिया, ताकि उनकी अस्थियों से वृत्रासुर का वध किया जा सके। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Creation of Vajra and killing of Vritrasura:वज्र का निर्माण और वृत्रासुर का वध महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की पवित्र अस्थियों से देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक शक्तिशाली वज्र का निर्माण किया। देवराज इंद्र ने इसी वज्र का प्रयोग कर वृत्रासुर का वध किया और देवताओं को उसकी आतंक से मुक्ति दिलाई। इस महान बलिदान के कारण, देवताओं और पूरे संसार की रक्षा हुई, और इंद्र की जय-जयकार होने लगी। त्याग की विरासत और पिप्पलाद का जन्म:Legacy of renunciation and birth of Pippalad महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi का यह बलिदान अनुपम है और सदियों से त्याग तथा निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक रहा है। उनकी पत्नी गभस्तिनी को जब इस त्याग का पता चला, तो वह सती होने को तैयार हो गईं। देवताओं ने उन्हें रोका, यह बताते हुए कि वह गर्भवती हैं। तब देवताओं ने उनके गर्भ को निकालकर पीपल के वृक्ष को उसके पालन-पोषण का दायित्व सौंपा। इसी कारण दधीचि के पुत्र का नाम पिप्पलाद ऋषि पड़ा। निष्कर्ष महर्षि दधीचि जयंती हमें निस्वार्थता, त्याग और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा की याद दिलाती है। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि जन कल्याण के लिए सर्वोच्च त्याग भी छोटा होता है। इस पावन दिन पर, हम उन महान ऋषि को नमन करते हैं जिन्होंने अपनी अस्थियों का दान कर मानवता की रक्षा की।

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Durva Ashtami

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व – पाएं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद! Kab Hai Durva Ashtami: हर साल भाद्रपद मास में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, राधा अष्टमी और अनंत चतुर्दशी प्रमुख हैं। इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण पर्व है दूर्वा अष्टमी। यह पर्व दूर्वा घास को समर्पित है, जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। दूर्वा घास को केवल घास नहीं माना जाता, बल्कि इसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है, जिसका प्रयोग लगभग सभी हिंदू अनुष्ठानों में किया जाता है। आइए जानते हैं दूर्वा अष्टमी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके धार्मिक महत्व को विस्तार से। दूर्वा अष्टमी 2025 कब है? (Durva Ashtami 2025 Date) वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 30 अगस्त 2025 को देर रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। यह तिथि 31 अगस्त 2025 को देर रात 12 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है, इसलिए दूर्वा अष्टमी का पर्व 31 अगस्त 2025 (रविवार) को मनाया जाएगा। दूर्वा अष्टमी 2025 के शुभ योग (Durva Ashtami 2025 Shubh Yog) दूर्वा अष्टमी के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देते हैं। • अनुराधा नक्षत्र: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर अनुराधा नक्षत्र का संयोग शाम 05 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। • ज्येष्ठा नक्षत्र: इसके बाद ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग बनेगा। • भद्रावास योग: इस शुभ अवसर पर भद्रावास योग का निर्माण हो रहा है, जो दिन में 11 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भद्रा स्वर्ग में रहेंगी, और भद्रा के स्वर्ग में रहने के दौरान पृथ्वी वासियों का कल्याण होता है। दूर्वा अष्टमी का धार्मिक महत्व(Religious significance of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी Durva Ashtami का दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति-भाव से पूजा की जाती है। दूर्वा घास को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है और हिंदू धर्म में कई पूजाएं इसके बिना अधूरी मानी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर व्रत रखने और दूर्वा घास की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और रौनक आती है, साथ ही भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि पौराणिक कथा और दूर्वा घास का महत्व: प्राचीन कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के सिर से कुछ बाल गिरे थे, जिन्हें दूर्वा घास माना जाता है। यह भी माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत की कुछ बूँदें इस पर गिरी थीं, जिससे यह अत्यंत शुद्ध हो गई। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को दूर्वा घास का महत्व बताया था। दूर्वा अष्टमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान(Rituals performed on the day of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी का त्योहार विशेष रूप से महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस दिन किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं: • स्नान और वस्त्र धारण: महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और नए वस्त्र धारण करती हैं। • विशेष पूजा: दूर्वा अष्टमी के दिन विशेष प्रकार की पूजा और अन्य रीति-रिवाज किए जाते हैं। • भोग और सामग्री: पूजा में फल, फूल, चावल, धूपबत्ती, दही और अन्य आवश्यक पूजन सामग्री के साथ भोग चढ़ाया जाता है। • व्रत का संकल्प: इस दिन महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखती हैं और ईश्वर को भोग अर्पित करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। दूर्वा अष्टमी और पर्यावरण संरक्षण (Durva Ashtami and environmental protection) Durva Ashtami: दूर्वा अष्टमी का पर्व हमें पर्यावरण को सहेजने का भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुड़ी हर एक चीज बहुत महत्वपूर्ण है। दूर्वा घास को घर में भी आसानी से लगाया जा सकता है, और इसे उगाने के लिए विशेष मेहनत की आवश्यकता नहीं पड़ती। सबसे बड़ी बात यह है कि दूर्वा घास को घर में लगाने से शुद्धता और पवित्रता का आगमन होता है। यह त्यौहार हमें यह भी याद दिलाता है कि पेड़-पौधे लगाना कितना आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। पंचांग (31 अगस्त 2025 के लिए) • सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 19 मिनट पर • सूर्यास्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट पर • चंद्रोदय – दोपहर 12 बजकर 08 मिनट से… • चंद्रास्त – रात 10 बजकर 52 मिनट तक • ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 03 बजकर 48 मिनट से 04 बजकर 33 मिनट तक • विजय मुहूर्त – दोपहर 01 बजकर 43 मिनट से 02 बजकर 33 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट से 06 बजकर 17 मिनट तक • निशिता मुहूर्त – रात 11 बजकर 14 मिनट से 12 बजे तक दूर्वा अष्टमी का यह पावन पर्व हमें प्रकृति के प्रति आदर और भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना और व्रत करने से जीवन में सकारात्मकता और खुशहाली आती है। अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई है और केवल सामान्य सूचना के लिए है। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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Shri ambikAShTottarashatanAmAvalI: श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली

Shri ambikAShTottarashatanAmAvalI: श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली ॐ अस्यश्री अम्बिकामहामन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः उष्णिक् छन्दःअम्बिका दुर्गा देवता ॥ [ श्रां – श्रीं इत्यादिना न्यासमाचरेत् ]ध्यानम्या सा पद्मासनस्था विपुलकटतटी पद्मपत्रायताक्षीगम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया ।लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैःनित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥ मन्त्रः – ॐ ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः ॐ ॥ ॥अथ श्री अम्बिकायाः नामावलिः ॥ ॐ अम्बिकायै नमः ।ॐ सिद्धेश्वर्यै नमः ।ॐ चतुराश्रमवाण्यै नमः ।ॐ ब्राह्मण्यै नमः ।ॐ क्षत्रियायै नमः ।ॐ वैश्यायै नमः ।ॐ शूद्रायै नमः ।ॐ वेदमार्गरतायै नमः ।ॐ वज्रायै नमः ।ॐ वेदविश्वविभागिन्यै नमः । १०ॐ अस्त्रशस्त्रमयायै नमः ।ॐ वीर्यवत्यै नमः ।ॐ वरशस्त्रधारिण्यै नमः । ॐ सुमेधसे नमः ।ॐ भद्रकाल्यै नमः ।ॐ अपराजितायै नमः ।ॐ गायत्र्यै नमः ।ॐ संकृत्यै नमः ।ॐ सन्ध्यायै नमः ।ॐ सावित्र्यै नमः । २०ॐ त्रिपदाश्रयायै नमः ।ॐ त्रिसन्ध्यायै नमः ।ॐ त्रिपद्यै नमः ।ॐ धात्र्यै नमः ।ॐ सुपथायै नमः ।ॐ सामगायन्यै नमः ।ॐ पाञ्चाल्यै नमः ।ॐ कालिकायै नमः ।ॐ बालायै नमः ।ॐ बालक्रीडायै नमः । ३० ॐ सनातन्यै नमः ।ॐ गर्भाधारायै नमः ।ॐ आधारशून्यायै नमः ।ॐ जलाशयनिवासिन्यै नमः ।ॐ सुरारिघातिन्यै नमः ।ॐ कृत्यायै नमः ।ॐ पूतनायै नमः ।ॐ चरितोत्तमायै नमः ।ॐ लज्जारसवत्यै नमः ।ॐ नन्दायै नमः । ४०ॐ भवायै नमः ।ॐ पापनाशिन्यै नमः ।ॐ पीतम्बरधरायै नमः ।ॐ गीतसङ्गीतायै नमः ।ॐ गानगोचरायै नमः ।ॐ सप्तस्वरमयायै नमः ।ॐ षद्जमध्यमधैवतायै नमः ।ॐ मुख्यग्रामसंस्थितायै नमः ।ॐ स्वस्थायै नमः ।ॐ स्वस्थानवासिन्यै नमः । ५०ॐ आनन्दनादिन्यै नमः । ॐ प्रोतायै नमः ।ॐ प्रेतालयनिवासिन्यै नमः ।ॐ गीतनृत्यप्रियायै नमः ।ॐ कामिन्यै नमः ।ॐ तुष्टिदायिन्यै नमः ।ॐ पुष्टिदायै नमः ।ॐ निष्ठायै नमः ।ॐ सत्यप्रियायै नमः ।ॐ प्रज्ञायै नमः । ६०ॐ लोकेशायै नमः ।ॐ संशोभनायै नमः ।ॐ संविषयायै नमः ।ॐ ज्वालिन्यै नमः ।ॐ ज्वालायै नमः ।ॐ विमूर्त्यै नमः ।ॐ विषनाशिन्यै नमः ।ॐ विषनागदम्न्यै नमः ।ॐ कुरुकुल्लायै नमः । ॐ अमृतोद्भवायै नमः । ७०ॐ भूतभीतिहरायै नमः ।ॐ रक्षायै नमः ।ॐ राक्षस्यै नमः ।ॐ रात्र्यै नमः ।ॐ दीर्घनिद्रायै नमः ।ॐ दिवागतायै नमः ।ॐ चन्द्रिकायै नमः ।ॐ चन्द्रकान्त्यै नमः ।ॐ सूर्यकान्त्यै नमः ।ॐ निशाचरायै नमः । ८०ॐ डाकिन्यै नमः ।ॐ शाकिन्यै नमः ।ॐ हाकिन्यै नमः ।ॐ चक्रवासिन्यै नमः ।ॐ सीतायै नमः ।ॐ सीताप्रियायै नमः ।ॐ शान्तायै नमः ।ॐ सकलायै नमः ।ॐ वनदेवतायै नमः । ॐ गुरुरूपधारिण्यै नमः । ९०ॐ गोष्ठ्यै नमः ।ॐ मृत्युमारणायै नमः ।ॐ शारदायै नमः ।ॐ महामायायै नमः ।ॐ विनिद्रायै नमः ।ॐ चन्द्रधरायै नमः ।ॐ मृत्युविनाशिन्यै नमः ।ॐ चन्द्रमण्डलसङ्काशायै नमः ।ॐ चन्द्रमण्डलवर्तिन्यै नमः ।ॐ अणिमाद्यै नमः । १००ॐ गुणोपेतायै नमः ।ॐ कामरूपिण्यै नमः ।ॐ कान्त्यै नमः ।ॐ श्रद्धायै नमः ।ॐ पद्मपत्रायताक्ष्यै नमः ।ॐ पद्महस्तायै नमः ।ॐ पद्मासनस्थायै नमः ।ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः । १०८॥ॐ॥

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