April 2025

महालक्ष्मी मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर में होलकर काल से चली आ रही परंपरा आज भी देखने को मिलती है। भारत के मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के हृदय स्थल राजवाड़ा में महालक्ष्मी मंदिर स्थित है। यह इंदौर के प्राचीन मंदिरों में से एक है। भक्त मंदिर में जो चावल चढ़ाते हैं, उनमें से कुछ चावल मन्नत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं और फिर उसे घर की तिजोरी और दुकान के गल्ले में रखते हैं ताकि वर्षभर बरकत बनी रहे। बताया जाता है कि यह सिलसिला मंदिर की स्थापना के बाद से लगातार जारी है। महालक्ष्मी मंदिर का इतिहास महालक्ष्मी मंदिर करीब 188 साल प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर होलकर कालीन मंदिर की स्थापना 1833 में इंदौर के राजा हरि राव होलकर ने की थी। उस दौर में यहां मंदिर नहीं था, प्रतिमा की स्थापना एक पुराने मकान में की गई थी। होलकर वंश के लोग उस समय नवरात्र और दिवाली पर माता के दर्शन करने आते थे। इसके साथ ही खजाना खोलने से पूर्व भी होलकर राजवंश मां महालक्ष्मी का आशीष लेता था। इस मंदिर में होलकर काल से चली आ रही परंपरा आज भी देखने को मिलती है। Mahalakshmi Temple:मंदिर का महत्व दिवाली के मौके पर भक्त मंदिर पहुंचकर माता लक्ष्मी को पीले चावल देकर अपने घर आने का आमंत्रण देते हैं। भक्त मां लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं कि हमारे घर पधारें और सुख-समृद्धि का आशीष दें। दिवाली के दिन मंदिर के पट सुबह तीन बजे खोल दिए जाते हैं। 11 पंडित मां लक्ष्मी का विशेष अभिषेक करते हैं और फिर श्रृंगार के बाद माता की महाआरती की जाती है। हर साल दीपावली के मौके पर मंदिर में 5 दिवसीय महोत्सव होता है। धनतेरस से शुरू होकर ये महोत्सव भाईदूज पर पूरा होता है। इस मौके पर यहां लाखों दर्शनार्थी मंदिर पहुंचते हैं। होलकर रियासत के दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी और क्षेत्र के व्यापारी अपने दिन की शुरुआत मंदिर में मां लक्ष्मी के दर्शन के साथ करते हैं। मंदिर की वास्तुकला होलकर कालीन महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण पूरी तरह से लकड़ी से हुआ था। 1933 में ये मंदिर तीन मंजिला था, लेकिन बाद में जर्जर होने के कारण ये गिर गया। 1942 में मंदिर जीर्णोद्धार कराया गया, जिसके बाद 2011 में मंदिर का पुन: जीर्णोद्धार कराया गया। इस मंदिर में माता की 21 इंच की प्राचीन मूर्ति प्रतिष्ठित है। गर्भ गृह में बड़े चबूतरे पर माता महालक्ष्मी की भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसके चारों ओर संगमरमर के आठ स्तम्भ लगे हुए हैं। साथ ही भगवान गणेश रिद्धि सिद्धि की काले पत्थरों से बनी मूर्ति है। मुंबई के महालक्ष्मी मंदिर के तर्ज पर इस मंदिर का विकास किया जा रहा है। मंदिर को मराठा शैली में बनाया गया है। मंदिर के दीवारों पर नक्काशी की गई, जिसे देख कर मन प्रसन्न हो जाता है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM सायंकाल मंदिर खुलने का समय 05:00 PM – 10:00 PM सुबह की आरती 07:00 AM – 07:30 AM सायंकाल आरती 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद महालक्ष्मी मंदिर में भक्त मां को फल, ड्राई फ्रूट्स, लड्डू का भोग लगाते हैं। कुछ श्रद्धालु मां को हलवा, चना और पूड़ी का भोग भी लगाते हैं।

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Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date:मोहिनी एकादशी पर भूलकर भी न करें 5 काम, होगी धन की हानि

Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date:मोहिनी एकादशी का दिन बहुत शुभ माना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है। लोग इस दिन व्रत रखते हैं और पूजा-पाठ करते हैं। कहते हैं कि इस व्रत को रखने से सभी कष्टों का अंत होता है। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date इसके साथ ही घर में माता लक्ष्मी का वास होता है। इस साल यह एकादशी (Mohini Ekadashi 2025) 8 मई को रखा जाएगा। Mohini Ekadashi Vrat Niyam: मोहिनी एकादशी पर भक्त उपवास रखकर विष्णु भगवान की आराधना करेंगे। मोहिनी एकादशी पर कुछ कामों को करना अशुभ माना जाता है, जो प्रभु की नाराजगी का कारण भी बन सकते हैं। Mohini Ekadashi Vrat Niyam:  मोहिनी एकादशी का व्रत। सनातन धर्म में मोहिनी एकादशी का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इस शुभ दिन पर भक्त उपवास रखते हैं और द्वादशी तिथि पर पारण करते हैं। इसके अलावा कुछ साधक विशेष पूजा करने के लिए भगवान विष्णु के मंदिर जाते हैं। एकादशी एक महीने में दो बार आती है। एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date एकादशी पर कुछ चीजों को करने से भगवान विष्णु कुपित हो सकते हैं और आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। Mohini Ekadashi per kya na kare:मोहिनी एकादशी पर क्या न करें? 1. चावल- मोहिनी एकादशी पर चावल का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। मान्यता है Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date इस दिन चावल का सेवन करने से दोष लगता है।  2. तुलसी की पत्तियां- तुलसी की पत्तियां भगवान श्री हरि विष्णु को बेहद प्रिय हैं, जिनके बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जाता है। इसलिए मोहिनी एकादशी के दिन भूलकर भी तुलसी की पत्तियों को न तो स्पर्श करना चाहिए और न ही इन्हें तोड़ना चाहिए। तुलसी की पत्तियां तोड़ने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं। 3. काले वस्त्र- धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी शुभ अवसर या फिर पूजा-पाठ के दौरान काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। इसलिए मोहिनी एकादशी के दिन काले रंग के कपड़े पहनने से बचें। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date भगवान विष्णु की असीम कृपा पाने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा। 4. मास-मदिरा- मोहिनी एकादशी के दिन भूलकर भी मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नराज हो सकते हैं।  5. अपमान- कोशिश करें की इस दिन आप किसी का दिल न दुखाएं और वाद-विवाद से भी बचें। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date किसी का भी अपमान करने से बचें और न ही किसी का मजाक उड़ाएं।  Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date:मोहिनी एकादशी का व्रत बहुत मंगलकारी माना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप को समर्पित है। साधक इस दिन व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा-पाठ करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi 2025) का व्रत 8 मई को रखा जाएगा। इस दिन माता तुलसी की पूजा बेहद फलदायी मानी जाती है। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date इसलिए सुबह व्रती उठकर पवित्र स्नान के बाद मां तुलसी को जल चढ़ाएं। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date फिर मां के सामने घी का दीपक जलाएं। तुलसी चालीसा, मंत्र का जप करें। आखिरी में आरती करें। पूजा में हुई गलतियों के लिए माफी मांगे। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date।।तुलसी चालीसा।। श्री तुलसी महारानी, करूं विनय सिरनाय। जो मम हो संकट विकट, दीजै मात नशाय।। नमो नमो तुलसी महारानी, महिमा अमित न जाय बखानी। दियो विष्णु तुमको सनमाना, जग में छायो सुयश महाना।। विष्णुप्रिया जय जयतिभवानि, तिहूँ लोक की हो सुखखानी। भगवत पूजा कर जो कोई, बिना तुम्हारे सफल न होई।। जिन घर तव नहिं होय निवासा, उस पर करहिं विष्णु नहिं बासा। करे सदा जो तव नित सुमिरन, तेहिके काज होय सब पूरन।। कातिक मास महात्म तुम्हारा, ताको जानत सब संसारा। तव पूजन जो करैं कुंवारी, पावै सुन्दर वर सुकुमारी।। कर जो पूजन नितप्रति नारी, सुख सम्पत्ति से होय सुखारी। वृद्धा नारी करै जो पूजन, मिले भक्ति होवै पुलकित मन।। श्रद्धा से पूजै जो कोई, भवनिधि से तर जावै सोई। कथा भागवत यज्ञ करावै, तुम बिन नहीं सफलता पावै।। छायो तब प्रताप जगभारी, ध्यावत तुमहिं सकल चितधारी। तुम्हीं मात यंत्रन तंत्रन, सकल काज सिधि होवै क्षण में।। औषधि रूप आप हो माता, सब जग में तव यश विख्याता, देव रिषी मुनि औ तपधारी, करत सदा तव जय जयकारी।। वेद पुरानन तव यश गाया, महिमा अगम पार नहिं पाया। नमो नमो जै जै सुखकारनि, नमो नमो जै दुखनिवारनि।। नमो नमो सुखसम्पति देनी, नमो नमो अघ काटन छेनी। नमो नमो भक्तन दुःख हरनी, नमो नमो दुष्टन मद छेनी।। नमो नमो भव पार उतारनि, नमो नमो परलोक सुधारनि। नमो नमो निज भक्त उबारनि, नमो नमो जनकाज संवारनि।। नमो नमो जय कुमति नशावनि, नमो नमो सुख उपजावनि। जयति जयति जय तुलसीमाई, ध्याऊँ तुमको शीश नवाई।। निजजन जानि मोहि अपनाओ, बिगड़े कारज आप बनाओ। करूँ विनय मैं मात तुम्हारी, पूरण आशा करहु हमारी।। शरण चरण कर जोरि मनाऊं, निशदिन तेरे ही गुण गाऊं। क्रहु मात यह अब मोपर दाया, निर्मल होय सकल ममकाया।। मंगू मात यह बर दीजै, सकल मनोरथ पूर्ण कीजै। जनूं नहिं कुछ नेम अचारा, छमहु मात अपराध हमारा।। बरह मास करै जो पूजा, ता सम जग में और न दूजा। प्रथमहि गंगाजल मंगवावे, फिर सुन्दर स्नान करावे।। चन्दन अक्षत पुष्प् चढ़ावे, धूप दीप नैवेद्य लगावे। करे आचमन गंगा जल से, ध्यान करे हृदय निर्मल से।। पाठ करे फिर चालीसा की, अस्तुति करे मात तुलसा की। यह विधि पूजा करे हमेशा, ताके तन नहिं रहै क्लेशा।। करै मास कार्तिक का साधन, सोवे नित पवित्र सिध हुई जाहीं। है यह कथा महा सुखदाई, पढ़े सुने सो भव तर जाई।। तुलसी मैया तुम कल्याणी, तुम्हरी महिमा सब जग जानी। भाव ना तुझे माँ नित नित ध्यावे, गा गाकर मां तुझे रिझावे।। यह श्रीतुलसी चालीसा पाठ करे जो कोय। गोविन्द सो फल पावही जो मन इच्छा होय।। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। 

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Mangal Gitam:श्री मंगल गीतम

Mangal Gitam:मंगल गीतम (श्री मंगल गीतम): जब किसी जातक की कुंडली में मंगल गोचर में या गोचर में खराब प्रभाव डाल रहा हो या मंगल की स्थिति और जातकों का दखल खराब हो तो दिए गए मंगल गीतम का प्रतिदिन जाप करने से मंगल से संबंधित समस्या से मुक्ति मिलती है। मंगल गीतम का प्रतिदिन पाठ करने से मंगल अपना बुरा प्रभाव छोड़कर शुभ फल देने लगता है। अगर आप पर कर्ज या ऋण का बोझ बढ़ गया है और आप चाहकर भी ऋण नहीं ले पा रहे हैं तो अगर आप नियमित रूप से मंगल गीतम का पाठ करेंगे तो आपका कर्ज धीरे-धीरे उतर जाएगा। जैसा कि आप जानते हैं कि मंगल का संबंध हनुमान जी से है और हनुमान जी सर्वशक्ति प्रदाता हैं। इस श्लोक को हनुमान जी की पूजा के रूप में भी जाना जाता है। इस महंगे युग में एक बहुत ही आम समस्या है पैसे की बचत करने की समस्या और इसलिए अधिकतम लोग अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। Mangal Gitam धन इस भौतिक संसार का देवता है और इसलिए अपनी जरूरतों को पूरा करने और खुद को सफल बनाने के लिए इसका होना बहुत जरूरी है। इस युग में प्रतिस्पर्धा, महँगाई, अवांछित खर्चों के कारण धन कमाना और उसे बचाना बहुत कठिन है। Mangal Gitam:मंगल गीतम भगवान मंगल/मंगल की प्रार्थना करने का एक विशेष तरीका है जो शक्ति, संपत्ति, समृद्धि, साहस, क्रोध और सफलता पर नियंत्रण रखता है। ऐसी मान्यता है कि प्रतिदिन भक्तिपूर्वक मंगल गीतम का पाठ करने से सफलता के मार्ग खुल सकते हैं। मंगल देवी पृथ्वी के पुत्र हैं और व्यक्ति को कर्ज मुक्त करने में सक्षम हैं। Mangal Gitam उनका आसन स्थिर है और उनका शरीर शक्तिशाली है और वे कर्तव्यों को पूरा करने में आने वाली सभी बाधाओं को जड़ से खत्म करने में भी सक्षम हैं। Mangal Gitam:मंगल गीतम के लाभ: मंगल गीतम का उपयोग करके प्रतिदिन मंगल पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिल सकती है।भगवान मंगल की कृपा से कमाई में रुकावटें आसानी से दूर हो सकती हैं।व्यक्ति काम करने और सफलतापूर्वक कमाने की शक्ति विकसित कर सकता है।इस मंगल गीतम का प्रतिदिन पाठ करने से व्यक्ति संतोषजनक मौद्रिक शक्ति प्राप्त करके सफल जीवन जी सकता है।यह कुज दोष या मांगलिक दोष को कम करने में मदद कर सकता है। Mangal Gitam:इस गीत का पाठ किसे करना चाहिए: जिन व्यक्तियों की कुंडली में मांगलिक दोष है, जो गरीबी, जुनून और अन्य प्रकार के अवसाद से पीड़ित हैं, उन्हें इस मंगल गीत का पाठ अवश्य करना चाहिए । श्री मंगल गीतम हिंदी पाठ:Mangal Gitam in Hindi श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए ।कलितललितवनमाल जय जय देव हरे ।। 1 ।। दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए ।मुनिजनमानsहंस जय जय देव हरे ।। 2 ।। कालियविषधरगञ्जन जनरञ्जन ए ।यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ।। 3 ।। मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए ।सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे ।। 4 ।। अमलकमलदललोचन भवमोचन ए ।त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे ।। 5 ।। जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए ।समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे ।। 6 ।। अभिनवजलधरसुंदर धृतमंदर ए ।श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे ।। 7 ।। तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए ।कुरु कुशलं प्रणतेषु जय जय देव हरे ।। 8 ।। श्रीजयदेवकवेरूदितमिदं कुरुते मुदम् ।मंगलमञ्जुलगीतं जय जय देव हरे ।। 9 ।। राधेकृष्ण हरि गोविन्द गोपालहरि वसुदेव बाल भज नन्द दुलालजय जय देव हरे ।। 10 ।। ।। इति श्री मंगल गीतम संपूर्णम्‌ ।।

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भारत भूमातृ स्तोत्र:Bharat Bhumatra Stotram

Bharat Bhumatra Stotra in Hindi:भारत भूमातृ स्तोत्र हिंदी पाठ वन्दे मातरमव्यक्तां व्यक्तां च जननीं पराम् ।दीनोहं बालक: कांक्षे सेवां जन्मनि जन्मनि ।। 1 ।। सागरालिंगिता लक्ष्मीं जगज्जनककन्यकाम् ।स्थितां हिमनगस्यांके पार्वतीमपरां भजे ।। 2 ।। शुभ्रं धर्मध्वजं मातु: किं वा राशीकृतं यश: ।रौप्यं वा मुकुटं दिव्यं वन्देऽहं तं हिमालयम् ।। 3 ।। जाह्नवीयमुनासिन्धुब्रह्मपुत्रशतद्रुभि: ।भूदेवीं पंचधाराभि सततं साभिषिचंति ।। 4 ।। नगाधिपं धारयंती मस्तके रत्नमद्वयम् ।काश्मीरं च ललाटे भ्रूमध्ये नेपालिकां शुभाम् ।। 5 ।। Bharat Bhumatra Stotra नर्मदातापतीविंध्यसप्तपीठकमेखलाम् ।पूर्वापराचलोरूँ च मलयं पादपीठके ।मध्यदेशोदरे गुप्तानक्षयान् धनसंचयान् ।। 6 ।। असुराणां पुरी लंका दासी यंच्चरणयो: कृता । तां देवी भारतीं वन्दे मातरं विश्वपूजिताम् ।। 7 ।। दृष्टा चैवोपनिषदां गीतशास्त्रप्रवर्तक: ।षड्दर्शनप्रवक्ता च भगवान्पाणिनिर्मुनि: ।। 8 ।। वाल्मीकिश्र्च तथा व्यास: कालिदासो महाकवि: ।आर्यभट्टश्र्च भरत: शंकरोऽद्वैतकेसरी ।। 9 ।। भीष्मरामार्जुना वीरा नृपौ रामयुधिष्ठिरौ ।सावित्री द्रोपदी सीता दमयंती च तारका ।। 10 ।। महाधान्यद्वितीयानि रत्नान्येतानि भूतले ।जननी भारती तेषां रत्नगर्भा कथं न सा ।। 11 ।। वसुंधरा रत्नगर्भा रसा विश्र्वंभरा क्षमा ।सर्वसहा स्थिरा चैव भारती भूसुकन्यका ।। 12 ।। रत्नाकर: स्वयं भक्त्या मुक्तो पायनपूर्वकम् ।चरणान्क्षालयत्यस्या अंतद्रश्र्च दिवानिशम् ।। 13 ।।  कैलासद्वारकाधीशौ रामेश्वरपुरीश्र्वरौ ।द्वारपाला वभूबुश्र्च सौभाग्यं मातुरद्भुतम् ।। 14 ।। पोषयन्ति सदा मातु: पर्वतस्तनमण्डलात् ।नि:सृहाश्र्च पयोधारा: संततीनां परंपरा ।। 15 ।। पुत्रवत्सलता मातुरगाथा हरिणा स्वयम् ।अवतीर्योदरे सोढं गर्भदुखं पुन: पुन: ।। 16 ।। Bharat Bhumatra Stotra मरणे जन्मकाले च मुमूर्षुर्नवबालक: ।त्वदंके चैव संशेते अहो वत्सलता तव ।। 17 ।। पद्मालया त्वमेवासि त्वमेव च सरस्वती ।अन्नपूर्णा त्वमेवासि त्वमेव च शिवा सती ।। 18 ।। त्वदृक्षा: कल्पवृक्षाश्र्च चिंतामणिशिला: शिला: ।त्वद्वनं नन्दनं साक्षात्साक्षात्वं स्वर्गदेवता ।। 19 ।। प्रतिजन्मनि मे चित्तं वित्तं देहश्र्च संतति: ।त्वत्सेवानिरता भूयुर्माता त्वं करुणामयी ।। 20 ।। न मे वांछाऽस्ति यशसि विद्वत्तवे न च वा सुखे ।प्रभुत्वं नैव वा स्वर्गे मोक्षेत्यानंददायके ।। 21 ।। परं च भारते जनम मानवस्य च वा पशो: ।विहंगस्य च वा जन्तोर्व्रक्षपाषाणयोरपि ।। 22 ।। निरंतरं भवतु मे मातृ सेवांशभाग्यभाक् ।एषैव वांछा ह्रदये साक्षी सर्वात्मक: प्रभु: ।। 23 ।। Bharat Bhumatra Stotra।। इति भारत भूमातृ स्तोत्र संपूर्णम्‌ ।।

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अन्नपूर्णा मंदिर:अयोध्या, उत्तरप्रदेश, भारत

3200 वर्ग फुट में फैला अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। अन्नपूर्णा मंदिर:भारत में माता अन्नपूर्णा के कई सारे मंदिर हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर में बने अन्नपूर्णा मंदिर की अपनी अलग पहचान है। 3200 वर्ग फुट में फैला अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर की ऊंचाई 100 फुट से भी अधिक है। यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। लोग मान्यता अनुसार यहां मांगने वालो की हर मुराद पूरी होती है। मंदिर न केवल धार्मिक आगंतुकों के लिए है, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो प्राचीन भारतीय कला और हिंदू धर्म के वर्चस्व के बारे में जानना चाहते हैं। Annapurna Temple:मंदिर का इतिहास अन्नपूर्णा मंदिर की स्थापना 63 साल पहले यानी 1959 में हुई। इसकी स्थापना ब्रह्मलीन स्वामी प्रभानंद गिरी महाराज ने की थी। मंदिर से मिली जानकारी के मुताबिक महाराज का जन्म 14 जनवरी 1911 को आंध्रप्रदेश के नंदी कुटकुट स्थान पर हुआ। 15 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ वैराग्य लिया। बाद में स्वामी प्रभानंद गिरी जी उज्जैन होते हुए गुजरात पहुंचे जहां प्रसिद्ध देव स्थल गिरनार पर्वत पर कठोर तपस्या की, वहीं उन्हें भगवती अम्बिका का दर्शन हुआ और वहां से वे इंदौर आ गए। 1955 में इंदौर आने के बाद वे रणजीत हनुमान मंदिर क्षेत्र में निवास करने लगे। अन्नपूर्णा मंदिर में वट वृक्ष के नीचे बैठकर मां अन्नपूर्णा की भक्ति-साधना में लग गए। यहीं आपने अन्नपूर्णा मंदिर बनाने का संकल्प लिया और भक्तों के सहयोग से 22 फरवरी 1959 को समारोहपूर्वक मां अन्नपूर्णा का श्री विग्रह स्थापित कर प्राण-प्रतिष्ठा की। मंदिर का महत्व मां अन्‍नपूर्णा को भोजन की देवी माना जाता है। मंदिर की अद्भुत स्‍थापत्‍य शैली, विश्‍व प्रसिद्ध मदुरै के मीनाक्षी मंदिर से प्रेरित लगती है। बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने के लिए ट्रस्ट अन्नपूर्णा विद्यालय, अन्नपूर्णा वेद वेदांग विद्यालय चलाया जाता है। साथ ही आसपास के गरीब बच्चों का 12वीं तक की शिक्षा का शर्च भी मंदिर द्वारा उठाया जाता है। अन्नपूर्णा मंदिर में विराजित तीनों देवियों का दिनभर में तीन बार श्रृंगार किया जाता है यहां देवियों का श्रृंगार कराने के लिए आपको मंदिर के पुजारी से या ऑफिस में संपर्क करना होता है। उनके द्वारा फिर दिन आपको बताया जाता है। जिस दिन श्रृंगार करना होता है उसके एक दिन पहले आपको श्रृंगार की सामग्री और साड़ी देना होती है। मंदिर की वास्तुकला अन्नपूर्णा मंदिर इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर को 9 वीं शताब्दी में इंडो-आर्यन और द्रविड़ स्थापत्य शैली के संयोजन का उपयोग करके बनाया गया था। यह मंदिर में हिंदू देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है। इसमें मां अन्नपूर्णा की तीन फुट ऊंची संगमरमर की मूर्ति है। मंदिर की अविश्वसनीय वास्तुकला शैली मदुरई के विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर से प्रभावित है। मंदिर का प्रवेश द्वार बहुत प्रभावशाली है। मंदिर के मुख्य द्वार पर चार बड़े हाथियों की मूर्ति है। मंदिर परिसर के भीतर अन्नपूर्णा, शिव, हनुमान और काल भैरव भगवान को समर्पित मंदिर भी हैं। मंदिर की बाहरी दीवारें अभी भी रंगीन पौराणिक चित्रों में शामिल हैं। मंदिर की दीवारों पर कृष्ण लीला का चित्रण है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM पहला श्रृंगार 05:00 AM – 05:00 AM सुबह की आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM दूसरा श्रृंगार 11:00 AM – 11:00 AM भोग का समय 12:00 PM – 12:00 PM दोपहर में मंदिर खुलने का समय 02:00 PM – 10:00 PM तीसरा श्रृंगार 05:00 PM – 05:00 PM शाम की आरती 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद अन्नपूर्णा मंदिर में भक्त मां को ड्राई फ्रूट्स, फल, लड्डू और खीर का भोग चढ़ाते हैं। श्रद्धालु माता को अन्न भी चढ़ाते हैं।

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गायत्री मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत

मां गायत्री को समर्पित यह शक्तिपीठ भक्तों की धार्मिक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। गायत्री मंदिर:मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के महाराणा प्रताप नगर में स्थित है अद्भुत धार्मिक व आध्यात्मिक स्थल गायत्री मंदिर। यह गायत्री शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध है। मां गायत्री को समर्पित यह शक्तिपीठ भक्तों की धार्मिक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। भोपाल शहर में व्यायाम के लिए यह मंदिर मुख्य केंद्र माना जाता है। आध्यात्मिक शांति के लिए रोजाना यहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। मंदिर परिसर में एक्यूप्रेशर पार्क बना है, जहां कांटेदार ट्रेक पर चलने से शरीर स्वस्थ्य व निरोगी रहता है। शांतिकुंज हरिद्वार की तर्ज पर इस पार्क की शुरुआत की गई। गायत्री मंदिर में लोग विवाह व उपनयन संस्कार भी कराने आते हैं। Gayatri Mandir का इतिहास गायत्री मंदिर के इतिहास पर नजर डालें तो साल 1980 में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा मंदिर में मां गायत्री की प्राण प्रतिष्ठा की गई। तभी से मंदिर में मां गायत्री की पूजा व हवन संस्कार का कार्य किया जा रहा है। शांतिकुंज हरिद्वार के संस्थापक पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी ने ही गायत्री शक्तिपीठ की स्थापना की थी। इस शक्तिपीठ को बनाने का मुख्य उद्देश्य था कि हरिद्वार की शांतिकुंज आश्रम में होने वाली सभी गतिविधियों को देश के हर छोटे-बड़े गांव शहर कस्बों तक पहुंचाया जा सके। सभी जगहों पर हरिद्वार की तरह धार्मिक आयोजन किया जा सके। मंदिर का महत्व गायत्री मंदिर परिसर में लगे राशि वृक्षों की परिक्रमा से ग्रहों की स्थिति ठीक हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार बुद्ध पूर्णिमा के दिन गायत्री यज्ञ करने से अश्वमेध जैसा फल मिलता है। ऐसा माना जाता है की जो भी भक्त इस मंदिर में गायत्री यज्ञ करता है उसके जीवन से सभी कष्ट मिट हाते हैं। मंदिर की वास्तुकला चारों तरफ प्राकृतिक चीजों से घिरा गायत्री मंदिर देखने में काफी सुंदर लगता है। मंदिर में मां गायत्री की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर के पूरे परिसर में दीवारों पर गायत्री मंत्र व अच्छे विचार लिखे गए हैं, जिसे अगर मनुष्य अपना ले तो उसका जीवन सफल बन सकता है। मंदिर में एक बड़ी गौशाला भी है, यहां आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन के साथ गायों को घास खिलाकर परमसुख की अनुभूति करते हैं। मंदिर परिसर में पुस्तक प्रदर्शनी लगती है, जहां धार्मिक, अध्यात्मिक व साहित्य की पुस्तकें मिलती हैं। मंदिर परिसर में एक्यूप्रेशर पार्क सेंटर, स्वास्थ्य भवन सहित अन्य स्वास्थ्य संबंधी भवन बनाए गए हैं। पार्क में नक्षत्र व राशि वाटिका भी है। यानी हर राशि के अनुसार अलग-अलग वृक्ष लगे हैं। पार्क के अंदर ही मां भगवती प्राकृतिक रसाहार केंद्र भी है, जहां आंवला, एलोवेरा, ज्वारे का रस सहित अन्य प्रकार के जूस मिलते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद हैं। एक्यूप्रेशर ट्रेक के पास बहुत से औषधिय पौधें भी लगे हैं, जैसे: आंवला, तुलसी, एलोवेरा, नीम आदि। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM सुबह मां गायत्री की आरती का समय 05:30 AM – 06:00 AM शाम को मां गायत्री की आरती का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद गायत्री मंदिर में किसी प्रकार का कोई प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता है। मंदिर परिसर में बने हवन कुंड में हवन के लिए नारियल, घी, शहद सहित अन्य हवन सामग्री लगती है।

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How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:कैसे शुरू हुए कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष,जानिए इसके पीछे की पौराणिक मान्यता

How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:हिन्दू कैलेंडर यानी पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है। चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है। दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं। kaise shuru hue krishna and shukla paksha:हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने में 30 दिन होते हैं जिनकी गणना सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर की जाती है. इसी पंचांग के आधार पर भारत के अधिकतर राज्यों में व्रत और त्योहार आदि मनाए जाते हैं. पंचाग के मुताबिक पूर्णिमा के बाद यानी कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नया महीना शुरू होता है. How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: चंद्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही हर महीने को कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के आधार पर दो भागों में बांटा जाता है. इसमें 15 दिनों के एक पक्ष को कृष्ण पक्ष, तो बाकी के 15 दिनों का दूसरा शुक्ल पक्ष कहा जाता है. How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:हिन्दू कैलेंडर यानी पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है। चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है। दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:ऐसे होती है कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की गणना पूर्णिमा से अमावस्या के बीच के 15 दिनों को कृष्ण पक्ष कहा जाता है. वहीं, दूसरी तरफ अमावस्या से पूर्णिमा तक की अवधि को शुक्ल पक्ष कहा गया है. अमावस्या के अगले दिन से ही चंद्रमा का आकार बढ़ना शुरू हो जाता है जिससे अंधेरे में भी चंद्रमा की काफी तेज रोशनी दिखाई देती है. अमावस्या के बाद चंद्रमा अपने पूरे तेज पर रहता है. इसलिए शुक्ल पक्ष के इन 15 दिनों के दौरान कोई भी नया काम करना बेहद शुभ माना जाता है. आइए पहले जानते हैं कि कैसे हुई थी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की शुरुआत. What is the difference between Krishna Ekadashi and Shukla Ekadashi? शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष से जुड़ी कथा This is how the Krishna Paksha started:इस तरह हुई कृष्णपक्ष की शुरुआत How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस बेटियों का विवाह चंद्रमा से कर दिया। ये सत्ताईस बेटियां सत्ताईस स्त्री नक्षत्र हैं और अभिजीत नामक एक पुरुष नक्षत्र भी है। लेकिन चंद्र केवल रोहिणी से प्यार करते थे। ऐसे में बाकी स्त्री नक्षत्रों ने अपने पिता से शिकायत की कि चंद्र उनके साथ पति का कर्तव्य नहीं निभाते। दक्ष प्रजापति के डांटने के बाद भी चंद्र ने रोहिणी का साथ नहीं छोड़ा और बाकी पत्नियों की अवहेलना करते गए। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: तब चंद्र पर क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने उन्हें क्षय रोग का शाप दिया। क्षय रोग के कारण सोम या चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे कम होता गया। कृष्ण पक्ष की शुरुआत यहीं से हुई।  This is how Shuklapaksha started:ऐसे शुरू हुआ शुक्लपक्ष How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:कहते हैं कि क्षय रोग से चंद्र का अंत निकट आता गया। वे ब्रह्मा के पास गए और उनसे मदद मांगी। तब ब्रह्मा और इंद्र ने चंद्र से शिवजी की आराधना करने को कहा। शिवजी की आराधना करने के बाद शिवजी ने चंद्र को अपनी जटा में जगह दी। ऐसा करने से चंद्र का तेज फिर से लौटने लगा। इससे शुक्ल पक्ष का निर्माण हुआ। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: चूंकि दक्ष ‘प्रजापति’ थे। चंद्र उनके शाप से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकते थे। शाप में केवल बदलाव आ सकता था। इसलिए चंद्र को बारी-बारी से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में जाना पड़ता है। दक्ष ने कृष्ण पक्ष का निर्माण किया और शिवजी ने शुक्ल पक्ष का।

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Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai:सभी एकादशियों में बड़ी एकादशी कौन – कौन सी होती हैं,सबसे शुभ माना जाता है इन चार एकादशी को….

Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai:हर माह आने वाली एकादशी की दो तिथियां भगवान विष्णु की अराधना के लिए समर्पित होती हैं. एक वर्ष में कुल 24 एकादशी आती हैं लेकिन उनमें से कुछ एकादशी बहुत खास मानी जाती हैं. Most Important Ekadashi:हर माह आने वाली एकादशी की दो तिथियां भगवान विष्णु की अराधना के लिए समर्पित होती हैं. इस दिन भक्त व्रत रखकर विधि-विधान से भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा करते हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai मान्यता है कि एकादशी का व्रत रखने और भगवान विष्णु की अराधना से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और सांसारिक कष्ट मिट जाते हैं. एक वर्ष में कुल 24 एकादशी (Ekadashi) आती हैं लेकिन उनमें से कुछ एकादशी बहुत खास होती हैं. आइए जानते हैं कौन सी 4 एकादशी का महत्व होता है सबसे अधिक. Ekadashi | हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में महत्वपूर्ण होता हैं और साल में चौबीस एकादशी आती हैं यानि कि हर महीने में दो एकादशी होती हैं एक कृष्ण पक्ष की और दूसरी शुक्ल पक्ष की लेकिन जिस साल अधिक मास या फिर मलमास आती हैं तो एकादशी व्रत की संख्या दो बढ़ जाया करती हैं अर्थात 24 एकादशी की जगह 26 एकादशी होती हैं अधिक मास में परमा और पद्मिनी एकादशी नाम की होती हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai सभी एकादशी व्रत भगवान विष्णु की पूजा अर्चना के लिए समर्पित होती हैं मान्यता है कि जो भी एकादशी व्रत को सच्चे मन से करता है उसे उसके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती हैं और इस लोक में सभी सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद स्वर्ग में स्थान प्राप्त करता है कहा जाता हैं कि एकादशी व्रत के प्रताप से पितरों को मोक्ष मिलता हैं. हर एकादशी का अपना विशेष महत्व होता लेकिन सभी एकादशियों में से चार एकादशियों ऐसी है जिनको विशेष महत्व माना गया है और वे सभी एकादशी बड़ी एकादशी कहलाती हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai :आइए जानते हैं साल की चार बड़ी एकादशी और उनके महत्व को…. 1) आमलकी एकादशी : Amalaki Ekadashi Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai आमलकी एकादशी फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है इस एकादशी को आंवला एकादशी और रंगभरनी एकादशी भी कहा जाता हैं. आमलकी एकादशी को सारे एकादशियों में श्रेष्ठ माना जाता हैं क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु के साथ आंवले वृक्ष की भी विधिवत पूजन किया जाता हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai यह एकादशी साल की एक मात्र ऐसी एकादशी है जिसमें भगवान विष्णु के अलावा भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा होती हैं मान्यता है कि इस एकादशी के दिन भगवान शंकर के गण शंकर पार्वती के संग गुलाल की होली खेलते हैं इसी लिए इस एकादशी को रंगभरनी एकादशी भी कहा जाता हैं. आमलकी एकादशी का महत्व :Importance of Amalaki Ekadashi Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai धार्मिक मान्यता हैं कि आमलकी एकादशी व्रत को करने से सभी पाप धुल जाते हैं और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु को आंवला फल को चढ़ाने से भक्त को अच्छे स्वास्थ्य, धन और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. शास्त्रों के अनुसार जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्माजी का जन्म हुआ तब उसी समय भगवान विष्णु ने आंवले वृक्ष को आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया जिसके हर भाग में ईश्वर का स्थान माना जाता हैं. 2) पापमोचनी एकादशी : Papmochani Ekadashi पापमोचनी एकादशी चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती हैं और धार्मिक मान्यता के अनुसार पापमोचनी एकादशी का विशेष महत्व है. पापमोचनी दो शब्द पाप और मोचनी से मिलकर बना है Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai जिसमें पाप का अर्थ पाप या फिर दुष्कर्म और मोचनी का अर्थ है हटाने वाला यानि कि पापमोचनी एकादशी का व्रत को करने वालों को उनके पापों से मुक्ति मिल जाती हैं. पापमोचनी एकादशी का महत्व : Importance of Papamochani Ekadashi: पापमोचनी एकादशी का व्रत रखने से मन की चंचलता खत्म होने के साथ ही धन और आरोग्य की प्राप्ति होती हैं.पुराणों के अनुसार इस एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के सारे कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai तो वहीं पापमोचनी एकादशी व्रत से जाने अनजाने में कि गई पाप और गलतियों से छुटकारा मिल जाता हैं और उसे सहस्त्र गोदान यानि हजार गायों के बराबर दान का फल मिलता हैं मान्यता है कि ब्रह्म हत्या, स्वर्ण चोरी, सुरापान और गुरुपत्नी गमन जैसे महापाप भी पापमोचनी एकादशी व्रत को करने से दूर हो जाते हैं. 3) निर्जला एकादशी : Nirjala Ekadashi निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती हैं. इस एकादशी में निर्जल व्रत यानि कि बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती हैं. निर्जला एकादशी को भीम एकादशी भी कहा जाता हैं. मान्यता है कि जो कोई भी यह व्रत रखता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने के साथ ही यश, वैभव और सुख की प्राप्ति होती हैं. निर्जला एकादशी का महत्व : Importance of Nirjala Ekadashi: निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन और पवित्र व्रतों में से एक है इस एकादशी के बारे में मान्यता है कि अगर पूरे साल एक भी एकादशी का व्रत नहीं करते हैं और जो निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai तो उनकों संपूर्ण एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता हैं. पद्म पुराण के अनुसार इस व्रत को करने से दीर्घायु और मोक्ष मिलता है इस व्रत को अन्न और जल त्याग करके व्रत करना पड़ता हैं. 4) देवोत्थान एकादशी : Devotthan Ekadashi देवोत्थान एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है इस एकादशी को देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देव शयन करते हैं और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को उठते हैं इसीलिए इसे देवोत्थान एकादशी या देवउठनी एकादशी कहते हैं. इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती

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भोजेश्वर मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत

इस मंदिर को भोजेश्वर मंदिर या भोजपुर मंदिर के नाम से जाना जाता है। Bhojeshwar Temple:महादेव का यह मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 30 किलोमीटर दूर भोजपुर में एक पहाड़ी पर स्थित है। इसे भोजेश्वर मंदिर या भोजपुर मंदिर के नाम से जाना जाता है। विशालकाय शिवलिंग व अधूरे मंदिर निर्माण के कारण यह देश ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है। जिस चबूतरे पर शिवलिंग टिका है, वहां तक पहुंचने के लिए पुजारी को सीढ़ी लगानी पड़ती है। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यह अधूरा है, यानी मंदिर का निर्माण आजतक पूरा नहीं हो सका। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग की छत तक अधूरी है, जोकि 4 विशालकाय स्तंभों पर टिकी है। कहा जाता है कि अगर भोजेश्वर मंदिर का निर्माण पूरा हो जाता तो यह उस समय का पूरे विश्व में सबसे बड़ा मंदिर होता। रहस्यों व अनसुलझी पहेलियों से घिरे इस मंदिर में दर्शन के लिए सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है। मंदिर का इतिहास भोजेश्वर मंदिर के निर्माण की कहानी काफी दिलचस्प है। मंदिर बनवाने का श्रेय 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोजदेव को दिया जाता है। कहा जाता है कि एक बार राजा भोज बहुत बीमार पड़ गए, उन्हें सलाह दी गई कि 9 नदियों व 19 तालाबों का पानी पीकर वो ठीक हो जाएंगे। राजा भोज ने बेतवा नदी पर एक बांध बनवाया, जिसने बहुत सी छोटी नदियों व तालाबों को जोड़ दिया। इसी बांध का पानी पीकर राजाभोज ठीक हो गए, तभी उन्होंने फैसला किया कि वह दुनिया का सबसे बड़ा व भव्य मंदिर बनवाएंगे, लेकिन किसी कारण मंदिर निर्माण पूरा न हो सका। कहा जाता है कि मंदिर को एक ही दिन में बनवाने का फैसला किया गया था। सूर्योदय होते ही मंदिर निर्माण को रोक दिया गया। हालांकि, पुरातत्व विभाग की तरफ से ऐसी किसी भी घटना की पुष्टि नहीं की गई है। भोजेश्वर मंदिर निर्माण की एक और कहानी है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा किया गया। अज्ञातवास के दौरान पांडव कुछ दिनों के लिए भोपाल के पास भीमबेटका में भी रुके थे। उसी दौरान भीम ने बेतवा नदी के पास विशालकाय शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव के मंदिर का निर्माण किया। ताकि माता कुंती नदी में स्नान करने के बाद मंदिर में भगवान शिव की उपासना कर सकें। यही मंदिर राजा भोज के समय विकसित होकर भोजेश्वर मंदिर बन गया। मंदिर का महत्व पांडवों की माता कुंती इस मंदिर में अराधना करती थीं। भोजेश्वर मंदिर में स्थापित विश्व के सबसे बड़े व प्राचीन शिवलिंग में से एक होने के कारण इसे उत्तर भारत का सोमनाथ भी जाता है। किसी संकल्प की वजह से इस मंदिर का निर्माण कार्य अधूरा रह गया, जिसे एक ही दिन में पूरा करना था। मंदिर के आसपास मौजूद मूर्तियां व पिलर इस बात की गवाही देते हैं। विशालकाय शिवलिंग होने के कारण भक्त शिवलिंग पर जलाभिषेक नहीं कर पाते। शिवलिंग का अभिषेक व पूजन इसकी जलहरी पर चढ़कर ही किया जाता है। मंदिर की वास्तुकला पहाड़ी पर 17 फुट ऊंचे एक चबूतरे पर भोजेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर 106 फुट लंबा व 77 फुट चौड़ा है। सबसे विशेष है गर्भगृह में स्थापित विशाल शिवलिंग, यह आधार सहित 22 फुट ऊंचा है। इसका व्यास 7.5 फुट है। शिवलिंग को बनाने में एक ही पत्थर का प्रयोग किया गया है जोकि चिकने बलुआ पत्थर से बना है। गर्भगृह की अधूरी छत 40 फुट ऊंचे 4 विशाल स्तंभों पर टिकी है। इन स्तंभों पर शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम व ब्रह्मा-सावित्री की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। मंदिर का दरवाजा देश में किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है। मंदिर परिसर में ही भक्तांबर स्त्रोत लिखने वाले आचार्य माटूंगा का समाधि स्थल भी है। भोजेश्वर मंदिर की वास्तुकला में गौर करने वाली बात यह है कि मंदिर की छत गुंबद आकार की है। जोकि प्रमाणित करती है कि भारत में गुंबद का निर्माण इस्लाम आने से पहले से किया जा रहा है। इतिहासकार इसे भारत की सबसे पहली गुंबदीय छत वाली इमारत मानते हैं। मंदिर के पीछे एक ढलान है। माना जाता है कि इसी ढलान का प्रयोग कर भारी पत्थरों को पहाड़ पर मंदिर निर्माण के लिए लाया गया होगा। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:00 AM मंदिर का प्रसाद महादेव के भोजेश्वर मंदिर में जल, दूध, घी, शहद, दही अर्पित किया जाता है। विशेष अवसरों पर भक्त बेलपत्र, फूल, नारियल व अन्य पूजन सामग्री भी चढ़ाते हैं।

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बिजासन माता मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

माता को “राजराजेश्वरी बिजासन माता” के नाम से भी जाना जाता है। बिजासन माता मंदिर:क्लीन सिटी इंदौर, मध्यप्रदेश के एयरपोर्ट रोड के समीप पहाड़ी पर स्थित है बिजासन माता मंदिर। इस मंदिर में माता के नौ रूप विराजित है। यह मंदिर एक हजार वर्ष पुराना है। माता के दर्शन के लिए यहाँ प्रतिदिन श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। माता को “राजराजेश्वरी बिजासन माता” के नाम से भी जाना जाता है। Shree Bijasan Mata Mandir:मंदिर का इतिहास बिजासन माता मंदिर का निर्माण इंदौर के होलकर महाराजा शिवाजी राव होलकर ने सन 1760 में करवाया था। प्राचीन मंदिर में विजासन माता की प्रतिमा करीब 1000 साल से भी ज्यादा पुरानी है। मंदिर के निर्माण के 100 वर्ष पूरे होने पर सन 1860 में मंदिर में बहुत ही धूमधाम से उत्सव मनाया गया था। इस मंदिर का समय समय पर जीर्वोद्धार भी किया जाता रहा है। मंदिर का महत्व बिजासन माता मंदिर में माता की पाषाण पिंडियाँ विराजमान है। ये पिंडियां यहाँ पर कब विराजित हुयी है इसका कोई भी प्रमाण नहीं है। ऐसा माना जाता है कि ये पिंडियाँ स्वयंभू हैं। बिजासन माता संतान और सौभाग्य प्रदान करती है। इसलिए नवविवाहित जोड़े माता के दर्शन कर आशीर्वाद लेने आते है। माता सभी की मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। ऐसा कहा जाता है कि आल्हा-उदल ने मांडू के राजा को परास्त के लिए माता से प्रार्थना की थी। तंत्र-मंत्र और अनेकों प्रकार की सिद्धियों हेतु भी यह बिजासन माता मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। इस मंदिर के पीछे एक जलाशय है। ऐसा बताया जाता है कि पहले इस जलाशय में शेर पानी पीने आता था। वह माता के मंदिर के समीप कुछ देर खड़ा रहता और बिना किसी को नुकसान पहुँचाये चला जाता था। मंदिर की वास्तुकला माता का यह मंदिर ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ है। पहले यह मंदिर मिट्टी और पत्थरों से निर्मित था। इस मंदिर का सन् 1920 में मराठा शैली में जिर्णोद्धार करवाया गया। इस मंदिर में माता के अलावा आपको शिव जी, काल भैरव, हनुमान जी के भी दर्शन करने को मिलेंगे। माता का यह मंदिर ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ है। मंदिर के पास ही एक छोटा सा तालाब है जिसमे कई रंग की मछलियां है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:30 AM – 10:30 PM शनिवार और रविवार मंदिर का समय 05:30 AM – 11:00 PM सुबह की आरती 06:00 AM – 06:30 AM रात की आरती 09:00 AM – 10:00 PM

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Bhawani Bhujangpryat Stotram:भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र

Bhawani Bhujangpryat Stotra:भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र: भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र माँ दुर्गा देवी को समर्पित है। भवानी भुजंग की रचना शंकराचार्य ने की है। भवानी भुजंग का नियमित पाठ करने से मृत्यु के बाद स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र के पाठ से दरिद्रता, असाध्य रोग, अवसाद आदि कठिनाइयाँ दूर होती हैं। यह स्तोत्र श्री चक्र की देवी को संबोधित है। और स्वाभाविक रूप से योग शास्त्र के कई शब्द यहाँ आते हैं। संभवतः स्तोत्र साहित्य में सबसे बड़ा योगदान आदि शंकर का है। उनकी भक्ति की भावना, शब्दों के चयन में सरलता, प्रवाह और बहुत ही संगीतमय लेखन ने उनके सभी भक्तों को उनकी रचनाओं से प्यार दिलाया है। Bhawani Bhujangpryat Stotra भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र या भवानी बुजंगम श्लोक गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित सुंदर संस्कृत स्तोत्रों में से एक है। इस महान संस्कृत स्तोत्र, श्री भवानी भुजंग में, आदि शंकराचार्य ने देवी भवानी (देवी पार्वती) के गौरवशाली सौंदर्य का सिर से पैर तक गुणगान किया है। आदि शंकराचार्य भागवत पद के अनुसार शुद्ध भक्ति के साथ तीन बार भवानी के पवित्र नाम का जप करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और दुख, वासना, पाप और भय से मुक्ति मिलती है। इस (Bhawani Bhujangpryat Stotra) भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र का नियमित पाठ करने से माँ दुर्गा का आनंद प्राप्त होता है और इससे पाप, अप्राकृतिक शक्तियों के भय और कई अन्य नकारात्मकताओं से दूर रहने में मदद मिलती है और शांतिपूर्ण जीवन जीने में मदद मिलती है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति भक्ति के साथ तीन बार भवानी के पवित्र नाम का जप करता है, Bhawani Bhujangpryat Stotra वह हमेशा के लिए और हर तरह से दुख, वासना, पाप और भय से मुक्त हो जाता है। चूँकि आदि शंकराचार्य ने इस भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र की रचना की है, इसलिए यह प्रामाणिक है और इसका पाठ कोई भी व्यक्ति आसानी से कर सकता है। भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र के लाभ: जो कोई भी व्यक्ति भक्ति के साथ इस भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र को सही ढंग से पढ़ता है, Bhawani Bhujangpryat Stotra भवानी की स्तुति सिर से पैर तक करता है, उसे मोक्ष का स्थायी स्थान प्राप्त होता है, यह वेदों का सार है, और धन और आठ गुप्त शक्तियों को भी प्राप्त करता है। किसको यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए: भय और अस्वस्थ परिस्थितियों के माहौल में रहने वाले लोगों को एक बेहतर और प्रगतिशील भविष्य के लिए शांति और शांति के साथ Bhawani Bhujangpryat Stotra भयमुक्त और सुचारू जीवन के लिए इस भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र हिंदी पाठ:Bhawani Bhujangpryat Stotram in Hindi षडधारपङकेरुहंतारविराजत्सुषुम्नान्तरालेऽतितेजोल्लसन्तिम् ।सुधामण्डलं द्रव्यन्तं पिबन्तींसुधामूर्तिमीदेऽचिदानन्दरूपाम् ॥ 1 ॥ ज्वलत्कोटिबालार्कभासारुणाङ्गींसुलावण्यश्रृंगारशोभाभिरामम् ।महापद्मकिंजल्कमध्ये विराजत्त्रिकोणे निशानं भजे श्रीभवानीम् ॥ 2 ॥ क्वान्तकिङकिणुपुरोद्भासिरत्नप्रभालिधलाक्षारद्रपादब्जयुग्मम् ।अजेशाच्युताद्यैः सुरैः सेव्यमानंमहादेवी मनमूर्धनि ते भावयामि ॥ 3 ॥ सुषोणामाम्बराबिद्धनीवीविनंमहारत्नकाञ्चीकलापं नितम्बम् ।स्फुर्ददक्षिणावर्तनाभिं च तिसरोवलि राम्यते रोमराजिं भजेऽहम् ॥ 4 ॥ लस्द्योन्क्तमुत्तुङ्गमनमाणिक्यकुंभो-पमश्रीस्तनद्वन्द्वमम्बुजाक्षीम् ।भजे दुग्ध पूर्णाभिरामं तवेदंमहाहरिदिप्तं सदा प्रस्नुतास्यम् ॥ 5 ॥ शिरीषप्रसूनोल्लसद्बहुदण्डैर्-ज्वलदबनकोदण्डपाशाङकुशैश्च ।चलत्कणोदरकेयूरभूषाज्वलद्भिः लसन्तिं भजे श्रीभवानीम् ॥ 6 ॥ शरत्पूर्णचन्द्रप्रभापूर्णबिम्बाधर्स्मेरवक्त्रारविन्दं सुशांतम् ।सुरत्नालिहारतात्ङक्षोभामहा सुप्रसन्नं भजे श्रीभवानीम् ॥ 7 ॥ सूनासापूतं पद्मपत्रयताक्षंयजन्तः श्रीयं दण्डक्षं कटाक्षम् ।ललतोल्लसद्गन्धकस्तूरीभूषो-ज्ज्वलद्भिःस्फुरन्तीं भजे श्रीभवानीम् ॥ 8 ॥ चलत्कुण्डलां ते ब्रह्माद्भृङ्गवृन्दं घनस्निग्धधम्मिल्लभूषोज्ज्वलन्तिम् ।स्फुर्नमौलिमानिक्यमध्येन्दुरेखाविलासोल्लासदिव्यमूर्धनमीडे ॥ 9 ॥ स्वरूपं तवेदं प्रपौचत् परम चतुरक्षमं प्रसन्नं स्फुरत्वम्ब ।दिम्भस्य मे होत्सरोजे सदा वाञ्मयं सर्वतेजोमयं च ॥ 10 ॥ गणेशाभि-मुख्यखिलाइच शक्तिबन्धैर-वोतम वै स्फुरच्चक्र-राजोल्लासन्तिंपरं राजराजेश्वरी त्रैपुरी त्वंशिवकोपरिस्थं शिवं भवयामि ॥ 11 ॥ त्वमर्कस्त्वमग्निष्ट्वमिन्दुस्त्वमाप-स्त्वमाकाशभूर्वयवस्तुं चिदात्मा ।त्वदन्यो न कश्चित्प्रकाशोऽस्ति सर्वंसदानन्दसंवित्स्वरूपं तवेदम् ॥ 12 ॥ गुरुस्त्वं शिवस्त्वं च शक्तिस्त्वमेवत्वमेवसि माता पिताऽसि त्वमेव ।त्वमेवासी विद्या त्वमेवासी बुद्धिर्-गतिर्मे मतिर्देवी सर्वं त्वमेव ॥ 13 ॥ श्रुतिनामगम्यं सुवेदागमाद्यैर्-महिमनो न जानाति परं तवेदम् ।स्तुतिं कर्तुमिच्छामि ते त्वं भवानीक्षमस्वेदमम्ब प्रमुग्धा किल्हम् ॥ 14 ॥ शरण्ये वरेण्ये सुकारुण्यपूर्णेहिरण्योदारद्यैरगम्ययेऽतिपुण्ये ।भवार्यभीतं च मां पाहि भद्रेनमस्ते नमस्ते नमस्ते भवानी ॥ 15 ॥ इमान्वाहं श्रीभवानीभुजङ्ग-स्तुतिर्यः पथेक्रोटुमिच्छेत् तस्मै ।स्वकीयं पदं शाश्वतं चैव सारंश्रियं चाष्टसिद्धिं भवानी ददाति ॥ 16 ॥ भवने, भवने, भवने, त्रिवरंउदारं मुद सर्वदा ये जपंतिन शोको न मोहो न पापं न भेतिचकदाचित कथाश्चित कुतश्चिज्जनानम् ॥ 17 ॥ ॥ इति भवानी भुजंगप्रयात स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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Bhavtu Stotra:भवतु स्तोत्र

Bhavtu Stotra भवतु स्तोत्र: शांति मंत्र भवतु हिंदू धर्म के पुराने शास्त्रों – बृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है। भवतु स्तोत्र का जाप करने से आस-पास के वातावरण में उपचारात्मक कंपन उत्पन्न होते हैं और सभी को लाभ होता है, जो इसके संपर्क में आते हैं। भवतु स्तोत्र सभी जीवित प्राणियों की शांति और कल्याण के लिए एक प्रार्थना है। माना जाता है कि भवतु स्तोत्र के जाप से बाधाएं और रुकावटें शांत हो जाती हैं। भवतु स्तोत्र का जाप एक आध्यात्मिक अनुशासन है जो सुनने के कौशल, बढ़ी हुई ऊर्जा और दूसरों के प्रति अधिक संवेदनशीलता को बेहतर बनाता है। इस अभ्यास को तब लोकप्रियता मिली जब स्पेन में सैंटो डोमिंगो के बेनेडिक्टिन भिक्षुओं द्वारा ग्रेगोरियन मंत्रों का एक एल्बम सबसे ज्यादा बिकने वाला बन गया। मंत्र भक्ति, कृतज्ञता, शांति, करुणा व्यक्त कर सकते हैं Bhavtu Stotra और किसी के जीवन में प्रकाश ला सकते हैं। यहाँ कुछ मंत्र दिए गए हैं जो आपके जीवन को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। भवतु स्तोत्र आमतौर पर जीवमुक्ति योग विद्यालय से जुड़ा हुआ है। इसका अनुवाद है “सभी प्राणी हर जगह खुश और स्वतंत्र रहें, और मेरे अपने जीवन के विचार, शब्द और कार्य किसी तरह से सभी के लिए उस खुशी और स्वतंत्रता में योगदान दें।” यह एक शक्तिशाली मंत्र है जो महान भलाई के सेवक के रूप में जीवन जीने पर ध्यान केंद्रित करता है। यह न केवल अन्य मनुष्यों के बीच बल्कि प्रकृति के साथ भी सहयोग, करुणा और सद्भाव में रहने को प्रोत्साहित करता है। अब तक हम जानते हैं कि शब्दों में हमारी वास्तविकता को बदलने, Bhavtu Stotra हमारे सोचने के तरीके को बदलने और हमारे अवचेतन मन को फिर से प्रोग्राम करने की शक्ति है। भवतु स्तोत्र पवित्र शब्दों का एक संग्रह है जो हमारी आत्मा के भीतर गहराई से गूंजता है, ब्रह्मांड की आवृत्ति के साथ मेल खाता है और जब बार-बार दोहराया जाता है तो यह मन और आत्मा को शुद्ध करता है, स्पष्टता लाता है और नकारात्मक विचार पैटर्न को सकारात्मक में बदल देता है। It is based on the understanding of the science of sound:यह ध्वनि के विज्ञान की समझ पर आधारित है; संस्कृत वर्णमाला की प्रत्येक ध्वनि एक कंपन पैदा करती है जो शरीर की प्राकृतिक ऊर्जाओं के साथ प्रतिध्वनित होती है। Bhavtu Stotra जब आप कोई मंत्र जपते हैं, उदाहरण के लिए ‘शांति’, जिसका संस्कृत में अर्थ है ‘शांति’, तो व्यक्ति के पूरे अस्तित्व में शांति का कंपन पैदा होता है, जो द्वैत को दूर करता है और सभी प्राणियों के साथ परस्पर जुड़ाव की भावना पैदा करता है। Benefits of Bhavatu Stotra:भवतु स्तोत्र के लाभ: Bhavtu Stotra इसका पाठ करने के बाद मानसिक शांति मिलती है। Bhavtu Stotra यह खोया हुआ प्यार वापस दिलाता है। तलाक का मामला आपसी सहमति से सुलझ जाता है और हम भविष्य में खुशी-खुशी साथ रहते हैं। भवतु स्तोत्र हिंदी पाठ Bhavtu Stotra in Hindi ॐ सः नववतुॐ सह नववतुॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॐ सह नाववतु ।सह नौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विदविशावै ।ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ ॥ इति भवतु स्तोत्र संपूर्णम्‌ ॥

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