2023

राम जटायु संवाद तथा शबरी के बेर | Shabri Ramayan In Hindi

सीता की खोज तथा राम जटायु संवाद  सीता की खोज Sita सीता का हरण होते ही, राम और लक्ष्मण बहुत दुखी हुए। उन्होंने सीता को खोजने का संकल्प लिया। वे वन में सीता की खोज करने लगे। एक दिन, वे एक घने जंगल में पहुंचे। वहां, उन्होंने एक घायल पक्षी देखा। पक्षी का नाम जटायु था। जटायु ने राम और लक्ष्मण को बताया कि उसने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। राम और लक्ष्मण जटायु से सीता के बारे में और पूछने लगे। जटायु ने उन्हें बताया कि रावण ने सीता को लंका ले गया है। वह सीता को लंका के अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा है। राम और लक्ष्मण को जटायु की बातों से बहुत दुख हुआ। उन्होंने जटायु को धन्यवाद दिया और उसे मरने से बचा लिया। राम और लक्ष्मण सीता की खोज में आगे बढ़ गए। वे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे। वहां, उन्होंने शबरी नाम की एक भीलनी से मुलाकात की। शबरी ने उन्हें सीता के बारे में कुछ और जानकारी दी। शबरी ने उन्हें बताया कि सीता ने उसे एक बार देखा था। सीता ने उसे बताया था कि वह रावण द्वारा लंका ले जाई जा रही है। राम और लक्ष्मण को शबरी की बातों से भी कुछ और जानकारी मिली। वे सीता की खोज में आगे बढ़ते रहे। राम जटायु संवाद Sita सीता की खोज में राम और लक्ष्मण जब जटायु से मिले, तो उन्होंने उससे सीता के बारे में पूछा। जटायु ने उन्हें बताया कि उसने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। राम ने जटायु से कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता का हरण करते हुए रावण को देखा? तुमने उसे लंका ले जाते हुए देखा?” जटायु ने कहा, “हां, मैंने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। मैंने उसे लंका ले जाते हुए भी देखा था।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता को कैसे बचाया?” Jatau जटायु ने कहा, “मैंने रावण से सीता को छोड़ने के लिए कहा, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी। उसने मेरे पंख काट दिए और मुझे घायल कर दिया।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने हमारे लिए बहुत बड़ा उपकार किया है। तुमने सीता को बचाने की कोशिश की। हम तुम्हें कभी नहीं भूलेंगे।” जटायु ने कहा, “मैंने सीता को बचाने की कोशिश की, लेकिन मैं असफल रहा। मैं सीता को नहीं बचा सका।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता को बचाने की कोशिश की, यह ही सबसे बड़ी बात है। तुमने सीता की रक्षा के लिए अपना प्राण तक दे दिया। हम तुम्हारी वीरता को कभी नहीं भूलेंगे।” राम और लक्ष्मण ने जटायु को धन्यवाद दिया और उसे मरने से बचा लिया। जटायु मरते-मरते भी राम और लक्ष्मण को सीता की खोज में सफल होने का आशीर्वाद दे गया। राम तथा गन्धर्व संवाद Shree ram श्रीराम एक पुत्र की तरह जटायु का अंतिम संस्कार करते है तथा सीता की खोज में दक्षिण की तरफ चल देते है। बहुत समय तक वन में भटकते हुए उनपर एक लंबी भुजाओं वाला राक्षस आक्रमण करता है। लक्ष्मण अपनी तलवार से उस राक्षस की दोनो भुजाए काट देते है । तब वह राक्षस श्रीराम को बताता है कि वह एक गंधर्व है और ऋषि के शाप के कारण ऐसा बन गया है यदि कृपया करके आप मेरे पूरे शरीर का अंतिम संस्कार करेंगे तो मैं श्राप से मुक्त हो जाऊंगा। तब मैं आपकी पत्नी सीता तक पहुंचने में आपकी सहायता करूंगा। तब श्रीराम लक्षमण से लकड़ियां एकत्रित करने के लिए कहते है और उस विशाल राक्षस का पुरे शरीर के  साथ अंतिम संस्कार करते है।  अंतिम संस्कार करने के बाद वह राक्षस एक रूपवान गंधर्व बन जाता है और श्रीराम को बताता है कि आपकी पत्नी को लंका का राजा रावण हरण करके ले गया है। मैं अपने दिव्य ज्ञान से यह देख सकता हु की आपकी मित्रता वानर राज सुग्रीव से होगी जिसकी सहायता से आप अपने कार्य में सफल होंगे तथा रावण पर विजय प्राप्त करेंगे । सुग्रीव से मिलने के लिए आप पहले माता शबरी से मिलेंगे जोकि परम तपस्विनी है और महर्षि मतंग मुनि की शिष्या है।  वह आपकी भक्ति कर रही है। इसलिए आप अभी पंपासरोवर के पास स्थित मतंग मुनि के आश्रम में जाइए जहां पर आपको माता शबरी मिलेंगी। राम-लक्षमण की माता शबरी से भेंट  उसके बाद श्री राम और लक्ष्मण पंपा सरोवर की तरफ चल देते हैं जहां पर उन्हें एक वृद्ध भीलनी मिलती है जोकि रास्ते पर फूल बिछा रही होती है। वह वृद्ध भीलनी परम तपस्विनी माता शबरी थी जोकी अपने भगवान श्री राम के आने के लिए कुटिया के रास्ते पर हर दिन फूल बिछाती थी ताकि जब श्री राम आए तो उनके पैर में कोई कांटा ना लगे। जब श्री राम और लक्ष्मण की कुटिया में पहुंचते हैं तो उनका परिचय पाकर माता शबरी खुशी से रोने लगती हैं तथा श्री राम और लक्ष्मण का स्वागत करती है वह उन्हें बताती हैं कि उनके गुरु श्री मतंग मुनि जी अब नहीं रहे लेकिन उन्होंने ही मुझे बताया था कि भविष्य में श्रीराम अपनी पत्नी सीता को खोजते हुए हमारे आश्रम में आएंगे और तुम उन्हें सुग्रीव तक जाने का मार्ग बता देना जिनकी सहायता से वह रावण पर विजय प्राप्त करके अपनी पत्नी सीता को पा सकेंगे।  (Shabri )शबरी के बेर  Mata माता शबरी Shabri श्री राम और लक्ष्मण को भोजन के रूप में अपने द्वारा लाए गए बेर देती है। शबरी श्रीराम के लिए आश्रम के वृक्षों से प्रतिदिन बेर चख चख कर अपनी टोकरी में रखती ताकि श्रीराम के लिए केवल मीठे बेर ला सके। शबरी द्वारा चख कर  इकट्ठे किए हुए  बेर भी श्री राम बड़े आदर भाव से खाते हैं क्योंकि वह जानते थे कि वह बेर झूठे होते हुए भी स्नेह और भक्ति भाव से परिपूर्ण है। शबरी मतंग मुनि के बाद केवल इसीलए रही की वह श्री राम के दर्शन करना चाहती थी। अतः श्री राम से मिलन के मिलने के पश्चात शबरी उनको बताती है कि पंपा सरोवर के दक्षिण तट की तरफ ऋषि मुख पर्वत है जिसके शिखर पर  वानर राज सुग्रीव अपने चार मंत्रियों के साथ वास करते हैं और

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सीता हरण और रावण जटायु का युद्ध | Sita haran Story in Hindi

Sita haran सीता हरण रामायण महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। इसमें रावण, लंका का राजा, सीता, राम की पत्नी का हरण करता है। रावण की योजना रावण, सीता की सुंदरता से मोहित हो गया था। वह उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता था। उसने अपनी बहन शूर्पणखा को सीता को लुभाने के लिए भेजा। शूर्पणखा ने सीता को प्रपोज किया, लेकिन सीता Sita ने उसे अपमानित कर दिया। शूर्पणखा ने रावण को यह बात बताई, तो रावण ने सीता का हरण करने की योजना बनाई। स्वर्ण मृग (हिरन) तब लंकापति रावण मारीच को कहते हैं कि तुम एक अद्भुत स्वर्ण मृग (हिरण) का रूप धारण करो जिसके सींग सोने के हों तथा जिसकी चमड़ी सुनहरे रंग की हो। ऐसे अद्भुत हिरण को देखकर सीता अवश्य ही उसकी मांग करेगी और राम लक्ष्मण को उसका शिकार करने के लिए बोलेगी। जब राम लक्ष्मण उस सुनहरे मृग (हिरण) के पीछे पीछे जाएंगे तब मैं सीता का हरण कर लूंगा। रावण की बात मानकर मारीच एक अद्भुत सुनहरे हिरण का रूप धारण करके श्री राम लक्ष्मण की कुटिया की तरफ जाकर विचरण करने लगता है। सीता जी की नजर जब उस हिरण पर पड़ती है तो वह उस स्वर्ण मृग के सुंदर रूप को देखकर मोहित हो जाती है । कुटिया में आकर वह श्री राम लक्ष्मण को उस स्वर्ण मृग के बारे में बताती हैं और इच्छा जाहिर करती हैं कि वह मृग उन्हे चाहिए। सीता Sita के इच्छा का मान रखते हुए श्री राम लक्ष्मण को वहीं छोड़कर हिरन रूपी मारीच के पीछे धनुष बाण लेकर चल पड़ते हैं। श्री राम को अपनी ओर आता देख कर योजना के अनुसार मृग के वेश में मारीच कुटिया से दूर भाग जाता है जिसके पीछे श्रीराम भी चले जाते हैं। कुछ समय तक स्वर्ण मृग के पीछे भागते हुए श्रीरम उस पर बाण चला देते हैं।  बाण लगते ही मारीच श्रीराम के जैसे स्वर में चिल्लाने लगता है हे सीते हे लक्ष्मण, हे सीते हे लक्ष्मण। श्री राम जैस स्वर में अपना और लक्ष्मण का नाम सुनकर सीता जी को यही लगता है कि श्रीराम पर कोई संकट आ गया है और वह मदद के लिए लक्ष्मण तथा उन्हें पुकार रहे हैं। इसलिए सीता जी लक्ष्मण को तुरंत अपने भैया की सहायता के लिए जाने को कहती लेकिन लक्ष्मण उनकी बात मानने से मना कर देते हैं। क्योंकि लक्ष्मण जी को पता था की श्रीराम का कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता यह किसी असुर की चाल हो सकती है। लेकिन अपने पति के  ऐसे स्वर  सुनने के बाद सीता जी को शांति नहीं हो रही थी और वह लक्ष्मण को बार-बार जाने के लिए कहती है। जब लक्ष्मण  नहीं मानते तो वह उन्हें अपशब्द कहने लगती हैं।  लक्ष्मण रेखा  अंत में लक्ष्मण जी के पास कोई और रास्ता नहीं होता इसलिए वह सीता जी की सुरक्षा के लिए कुटिया के दहलीज के पास एक रेखा खींच देते है और बोलते हैं कि जो भी इस रेखा को पार करने की कोशिश करेगा वह जलकर भस्म हो जाएगा। अंत में लक्ष्मण जाते-जाते माता सीता से कहते हैं कि आप कितनी भी विकट परिस्थिति में इस रेखा को पार नहीं करेंगी। और कोई भी असुर, देव या जीव इस लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर पाएगा। कहकर लक्ष्मण कुटिया से चले जाते है।  लक्ष्मी जी के जाते ही कुटिया के आस पास झाड़ियों में छुपा हुआ रावण बाहर निकलता है और कुटिया के अंदर जाने की कोशिश करता है। लेकिन जैसे ही रावण लक्ष्मण द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा पर पैर रखता है तो उसके पैर जल जाते हैं। बार-बार प्रयत्न करने के बाद भी जब रावण कुटिया में प्रवेश नहीं कर पाया तो उसने दूसरी योजना सोची। तब रावण एक साधु का वेश धारण करके कुटिया के बाहर अलख जगाता है। कुटिया के बाहर आए किसी साधु की आवाज सुनकर माता सीता कुटिया से बाहर आती है तो देखती हैं एक साधु उनके दरवाजे पर भिक्षा मांग रहा है। भिक्षा लेकर सीता कुटिया से बाहर आती  हैं और लक्ष्मण रेखा के पास आकर खड़ी हो जाती और रावण (साधु) को बोलती है कि वह आकर  भिक्षा ले ले। क्योंकि वह इस रेखा से बाहर नहीं आ सकती। इस पर साधु के भेष में रावण बोलता है कि तु शायद हमें नहीं जानती हैं, हम परम तपस्वी साधु हैं यदि तुम बाहर भिक्षा लेकर नहीं आई तो मैं तुम्हारे पति को श्राप दे दूंगा।  Sita haran सीता हरण एक दिन, रावण ने अपने मामा मारीच को सोने का हिरण बनकर सीता को लुभाने के लिए भेजा। सीता को हिरण बहुत सुंदर लगा और वह उसे पकड़ने के लिए राम से कहती है। राम हिरण को पकड़ने के लिए जाते हैं और मारीच को मार देते हैं। मरते समय, मारीच राम की आवाज में सीता और लक्ष्मण को पुकारता है। सीता को लगता है कि यह राम की आवाज है और वह लक्ष्मण से कहती है कि वह राम की मदद करे। लक्ष्मण कुटिया के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींच देते हैं और सीता को उस रेखा को पार करने से मना करते हैं। लक्ष्मण की बात मानकर सीता कुटिया में ही रहती है। तभी रावण साधु का वेश धारण करके आता है और सीता से भिक्षा मांगता है। सीता रावण को भिक्षा देती है। भिक्षा लेने के बाद, रावण सीता से कुटिया से बाहर आने के लिए कहता है। सीता रावण की बात मानकर कुटिया से बाहर आती है। रावण उसी समय सीता का हरण कर लेता है। रावण और जटायु का युद्ध  जब रावण सीता को पुष्पक विमान में ले जा रहा था तब सीता की मदद की गुहार वहां पर बैठे जटायु नाम के गिद्ध ने सुनी और वह सीता की सहायता करने के लिए रावण से युद्ध करने लगता है। बहुत समय तक रावण से लड़ते हुए रावण अपनी चंद्रहास खड़ग (तलवार) से जटायु का एक पंख काट देता है जिससे वह लुढ़कता  हुआ जमीन पर आकर गिरता है और दर्द से कराहने लगता है।  जब कुछ भी ना हो पाया तो सीता जी अपने पल्लू का एक टुकड़ा फाड़ कर अपने सारे जेवर उसमें बांधकर नीचे ऋषिमुख पर्वत पर फेंक देती

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Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत में रात को ही क्यों की जाती है भोलेनाथ की पूजा? जानिए वजह

( Masik Shivratri ) मासिक शिवरात्रि व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस व्रत को रखने से भक्तों को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन में सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति, रोगों से मुक्ति, और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ( Masik Shivratri ) मासिक शिवरात्रि व्रत की मान्यताओं के अनुसार, चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं। इसलिए इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। इसके अलावा, पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव का विवाह चतुर्दशी तिथि को हुआ था। इसलिए इस दिन का विशेष महत्व है। मासिक शिवरात्रि व्रत रखने वाले भक्तों को इस दिन निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए: Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत रखने से भक्तों को निम्नलिखित लाभ मिलते हैं: मासिक शिवरात्रि व्रत हर महीने किया जा सकता है। यह व्रत सभी वर्ग के लोगों के लिए उपयुक्त है। मासिक शिवरात्रि का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मासिक शिवरात्रि का व्रत असंभव को भी संभव कर सकता है और इस व्रत को रखने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. इस व्रत में रात्रि के समय में पूजा करने के बाद रात को जागरण करते हुए भोलेनाथ की अराधना करनी चाहिए. यदि कुंवारे लोग मासिक शिवरात्रि का व्रत व पूजन करते हैं तो जल्द ही उन्हें अच्छा जीवनसाथी मिलता है. रात को क्यों होती है भोलेनाथ की पूजा पौराणिक कथाओं के अनुसार चतुर्दशी तिथि की रात्रि में भगवान शिव का विवाह हुआ था, इसलिए भोलेनाथ को रात्रि प्रिय है. यही वजह है कि मासिक शिवरात्रि के दिन अगर रात्रि के समय भगवान शिव का पूजन किया जाए तो वह प्रसन्न होते हैं. इसके अलावा शिव को संहार का देवता भी कहा गया है और रात्रि संहार काल की प्रतिनिधि है. इसलिए मासिक शिवरात्रि की रात को विधि-विधान के साथ भगवान शिव का पूजन करने से जीवन में आ रहे कष्टों से मुक्ति मिलती है. मासिक शिवरात्रि का व्रत करने पर जातक रात्रि के चार प्रहर में भगवान शिव का पूजन करता है. बता दें ​कि प्रत्येक प्रहर 3 घंटे का होता है. एक प्रहर में भोलेनाथ का दूध से अभिषेक किया जाता है, फिर दही और फिर शहद से ​अभिषेक होता है.

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Ekadashi:क्यों मनाते है एकादशी व्रत, आइये जानते है

हमारा देश आस्था श्रद्धा और विश्वास का प्रतिक माना जाता है। देश में हमारी आस्था ही है जो हमें मस्जिद और मंदिर जाने पर देवी देवता और भगवान के होने का एहसास दिलाता है ! हमारी आस्था के कारन ही आज सम्पूर्ण समाज पीपल के पेड़ में ब्रह्म देवता और नीम में देवी तथा बबूल के पेड़ में प्रेत नजर आता हैं। इसी आस्था श्रद्धा विश्वास के चलते ही रिश्तों का निर्धारण और अनुपालन होता है। एकादशी व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं, जैसे: एकादशी Ekadashi व्रत को दो भागों में बांटा जा सकता है: एकादशी Ekadashi व्रत की तिथि का निर्धारण चंद्र दर्शन के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है। एकादशी व्रत रखने की विधि इस प्रकार है: एकादशी Ekadashi व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। यह व्रत व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति कराता है। एकादशी व्रत के पीछे कई पौराणिक कथाएँ हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार एक राजा के पास एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री था। मंत्री ने राजा से कहा कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। राजा ने मंत्री की बात मानकर एकादशी व्रत रखा। व्रत रखने से राजा के सभी पाप धुल गए और वह सुखी और समृद्ध हो गया। एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार एक ऋषि ने एकादशी व्रत रखा। ऋषि के व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने ऋषि को वरदान दिया। वरदान के अनुसार, ऋषि को मोक्ष की प्राप्ति हुई। इन पौराणिक कथाओं से स्पष्ट है कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। यह व्रत व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति कराता है। एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं: एकादशी Ekadashi व्रत सभी वर्ग के लोगों के लिए लाभकारी है। यह व्रत व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है।

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Masik Shivratri 2023: इस दिन पड़ रही है मासिक शिवरात्रि, जानें तिथि और पूजा विधि

मासिक शिवरात्रि हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है जो हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन पड़ रही है मासिक शिवरात्रि Masik Shivratri 2023 Masik Shivratri 2023 मासिक शिवरात्रि 11 दिसबंर के दिन शनिवार को सुबह 7 बजकर 10 मिनट से शुरू होगी। साथ ही इस तिथि की समाप्ति 12 दिसंबर, रविवार सुबह 6 बजकर 24 मिनट पर होगी। ऐसे में इस बार मासिक शिवरात्रि की उपासना 11 दिसंबर को की जाएगी। पूजा विधि मासिक शिवरात्रि के दिन सुबह उठकर सबसे पहले स्नानादि से निवृत हो जाएं। इसके बाद महादेव की पूजा करें। ऐसा कहा जाता है औघड़दानी को बेलपत्र, भांग, धतूरा अति प्रिय है। व्रती को सुबह स्नान करके साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। फिर मंदिर में जाकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाओं को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद भगवान शिव को दूध, दही, घी, शहद, फल, फूल, धूप, दीप आदि अर्पित करें। भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें। भगवान शिव की आरती करें। अंत में प्रसाद वितरित करें। इसलिए इन चीजों को अपनी पूजा में जरूर शामिल करें। इसके साथ व्रत कथा का पाठ करें या सुनें। अंत में कपूर की आरती से पूजा का समापन करें। मासिक शिवरात्रि के व्रत का नियम मासिक शिवरात्रि के व्रत में व्रती को दिन में कुछ भी नहीं खाना चाहिए। केवल रात में एक बार भोजन करना चाहिए। व्रती को इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। मासिक शिवरात्रि के व्रत के लाभ मासिक शिवरात्रि का व्रत करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं: सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। मासिक शिवरात्रि के व्रत का महत्व और लाभ देखते हुए सभी लोगों को इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। शिव स्तुति आशुतोष शशाँक शेखर, चन्द्र मौली चिदंबरा, कोटि कोटि प्रणाम शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा ॥ निर्विकार ओमकार अविनाशी, तुम्ही देवाधि देव, जगत सर्जक प्रलय करता, शिवम सत्यम सुंदरा ॥ निरंकार स्वरूप कालेश्वर, महा योगीश्वरा, दयानिधि दानिश्वर जय, जटाधार अभयंकरा ॥ शूल पानी त्रिशूल धारी, औगड़ी बाघम्बरी, जय महेश त्रिलोचनाय, विश्वनाथ विशम्भरा ॥ नाथ नागेश्वर हरो हर, पाप साप अभिशाप तम, महादेव महान भोले, सदा शिव शिव संकरा ॥ जगत पति अनुरकती भक्ति, सदैव तेरे चरण हो, क्षमा हो अपराध सब, जय जयति जगदीश्वरा ॥ जनम जीवन जगत का, संताप ताप मिटे सभी, ओम नमः शिवाय मन, जपता रहे पञ्चाक्षरा ॥ आशुतोष शशाँक शेखर, चन्द्र मौली चिदंबरा, कोटि कोटि प्रणाम शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा ॥ कोटि नमन दिगम्बरा.. कोटि नमन दिगम्बरा.. कोटि नमन दिगम्बरा.. मासिक शिवरात्रि के व्रत का नियम मासिक शिवरात्रि के व्रत में व्रती को दिन में कुछ भी नहीं खाना चाहिए। केवल रात में एक बार भोजन करना चाहिए। व्रती को इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। मासिक शिवरात्रि के व्रत के लाभ मासिक शिवरात्रि का व्रत करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं: सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। मासिक शिवरात्रि के व्रत का महत्व और लाभ देखते हुए सभी लोगों को इस व्रत को अवश्य करना चाहिए।

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Pradosh Vrat 2023: दिसंबर का पहला प्रदोष व्रत कब, नोट करें सही डेट और प्रदोष काल का समय

Pradosh Vrat 2023:प्रदोष व्रत करने से भक्तों के सभी पापों का नाश होता है और उन्हें सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।दिसंबर माह में दो रवि प्रदोष व्रत का संयोग बन रहा है, रवि प्रदोष व्रत आरोग्य, सौभाग्य और सफलता प्रदान करता है. जानें दिसंबर के रवि प्रदोष व्रत की डेट, मुहूर्त December Pradosh Vrat 2023 रवि प्रदोष व्रत की पूजा शाम के समय की जाती है। पूजा करने के लिए सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर, मंदिर में जाकर शिवलिंग की पूजा करें। पूजा में बेलपत्र, धतूरा, चंदन, पुष्प आदि अर्पित करें। शिव चालीसा और शिव मंत्रों का जाप करें। अंत में, आरती करें और प्रसाद वितरित करें। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत सबसे अधिक फलदायी माना गया है. वार अनुसार प्रदोष व्रत का अलग-अलग महत्व है. इस साल 2023 में दिसंबर का पहला प्रदोष व्रत रविवार के दिन पड़ रहा है, जो लंबी आयु की प्राप्ति के लिए बेहद शुभ फलदायी माना जाता है. दिसंबर का पहला रवि प्रदोष व्रत 2023 (First Ravi Pradosh Vrat 2023) दिसंबर माह का पहला रवि प्रदोष व्रत 10 दिसंबर 2023, रविवार के दिन रखा जाएगा. इस व्रत में शिव जी की पूजा प्रदोष काल में करनी चाहिए. पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 10 दिसंबर 2023 को सुबह 07 बजकर 13 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 11 दिसंबर 2023 को सुबह 07 बजकर 10 मिनट पर इसका समापन होगा. पूजा का मुहूर्त – शाम 05.24 – रात 08.08 रवि प्रदोष व्रत का महत्व प्रदोष व्रत की महत्वता सप्ताह के दिनों के अनुसार अलग-अलग होती है. रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत और पूजा से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है. जो लोग आए दिन बीमारी का शिकार होते हैं उन्हें रवि प्रदोष व्रत जरुर करना चाहिए. प्रदोष काल यानी सूर्य अस्त होने से 45 मिनट पहले और सूर्य अस्त होने के 45 मिनट बाद तक का समय. इस दौरान शिव साधना करने से मनोकामना जल्द पूर्ण होती है.

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Sapna:सपने में खुद को चोट लगते देखना कैसा होता है

सपने में खुद को चोट ( chot ) लगते हुए देखना एक अशुभ सपना sapna माना जाता है। इस सपने के कई अर्थ हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर यह आने वाले समय में कठिनाइयों और समस्याओं का संकेत देता है। Sapna:सपने में खुद का चेहरा आईने में देखने का क्या मतलब होता है ? हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सपनों का कोई निश्चित अर्थ नहीं होता है। सपनों का अर्थ व्यक्तिगत अनुभवों और विश्वासों के आधार पर भिन्न हो सकता है। इसलिए, यदि आप सपने में खुद को चोट लगते हुए देखते हैं, तो घबराएं नहीं। बस अपने आसपास की सावधानी बरतें और आने वाले समय में कठिनाइयों और समस्याओं के लिए तैयार रहें।

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सूर्पनखा की नाक कटना तथा खर-दूषण का वध (रामायण)। Khar Dushan Vadh Story in Hindi (Ramayan)

Ramayan रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है खर-दूषण का वध। यह घटना राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास के दौरान हुई थी। घटना का कारण रावण की बहन शूर्पणखा ने राम और लक्ष्मण को देखकर उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। राम ने उसे नकार दिया। इससे शूर्पणखा बहुत क्रोधित हो गई। उसने राम और लक्ष्मण को धमकी दी कि वह उन्हें मार डालेगी। शूर्पणखा की धमकी से डरकर खर और दूषण, जो शूर्पणखा के भाई थे, राम और लक्ष्मण से बदला लेने के लिए पंचवटी आए। सूर्पनखा की नाक कटना | खर-दूषण का वध (रामायण) अपने वनवास के अंतिम वर्षों में श्री राम, लक्ष्मण और सीता दंडक वन में गोदावरी नदी के किनारे पर पंचवटी स्थान पर अपने रहने के लिए कुटिया बनाते हैं। और वहीं पर अपने वनवास का बाकी समय बिताते है। एक बार जब श्रीराम अपने आंगन में बैठे ध्यान कर रहे थे तब सूर्पनखा नामक राक्षसी वहां पर आ जाती है। सुपनखा वास्तव में लंकापति रावण की बहन थी। सूर्पनखा ध्यान में बैठे श्री राम के सुंदर स्वरूप को देखकर उन पर मोहित हो जाती हैं । वह एक सुंदर रूपवती नारी का रूप धारण करके श्री राम के पास पहुंचकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखती है। तब श्री राम बड़े ही विनम्र भाव से उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं और कहते हैं कि वह अपनी पत्नी सीता को आजीवन एक विवाह में रहने का वचन दे चुके हैं। उस समय लक्ष्मण जी वन से लकड़ियां एकत्रित करने के लिए गए हुए थे और वह भी आ जाते हैं जिन्हें देखकर शूर्पणखा एक बार उन पर भी मोहित हो जाती है। शूर्पणखा ने अपने साथ विवाह का वही प्रस्ताव लक्ष्मण जी के समक्ष भी रखा। तब लक्ष्मण जी उनको बोलते हैं कि उनके बड़े भाई श्री राम के होते हुए वह उन के योग्य नहीं हैं।   सूर्पनखा की नाक कटना जब श्री राम और लक्ष्मण दोनों सूर्पनखा के विवाह प्रस्ताव को इंकार कर देते हैं तो सूर्पनखा को क्रोध आ जाता है। और तभी देवी सीता भी कुटिया के अंदर से बाहर निकल कर आती हैं। सीता को देखकर सूर्पनखा श्रीराम को कहती है कि तुम इस औरत के कारण ही मुझे नकार रहे हो, इसलिए मैं तुम्हारी पत्नी को ही खा जाती हूं। यह कह कर क्रोध में सुपनखा माता सीता की तरफ बढ़ती है तभी श्री राम लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं और लक्ष्मण जी अपनी तलवार निकालकर सूर्पनखा की नाक पर वार करते है। लक्ष्मण जी के तलवार के वार से सुपनखा की नाक कट जाती है और वह रोते हुए वहां से चली जाती है। खर दूषण का दरबार अपने कटी हुई नाक को लेकर सुपनखा अपने भाई और दंडक वन के उस समय के असुर राजा खर के पास पहुंचती है। अपने भाई खर और दूषण के पास पहुंचकर सूर्पनखा न्याय की दुहाई देते हुए रोने लगती है। अपनी बहन को रोता हुआ देखकर राजा कर पूछते हैं कि उसकी यह दशा किसने की है। तब सूर्पनखा रोते हुए खर को बताती है कि श्री राम और लक्ष्मण नाम के दो युवक गोदावरी नदी के किनारे अपनी कुटिया बनाकर वहां पर रहने आए हैं, उन्होंने मुझे अकेली पाकर मेरा अपमान करने की कोशिश की। इसलिए आप वहां जाकर उन दोनों से मेरे अपमान का बदला लीजिए। उनके साथ एक सुंदर नारी भी है जोकि राम की पत्नी है। Shree ram श्रीराम का वनवास । राम वन गमन । अपने बहन के अपमान का बदला लेने के लिए खर और दूषण अपने 14 राक्षसों को एक साथ भेज देते हैं और कहते हैं कि जाओ और पंचवटी में बनी हुई कुटिया का तिनका तिनका बिखेर डालो और उजाड़ दो। असुर खर के  14 सैनिक एक साथ पंचवटी की तरफ जाते हैं वहां श्रीराम पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे। क्योंकि उन्हें अंदाजा था कि सूर्पनखा अपने अपमान का बदला लेने के लिए अवश्य किसी ना किसी को भेजेगी। चौदह असुर एक कतार में उनके सामने आकर बोले कि दंडक वन के राजा खर ने का आदेश दिया है कि तुम दोनों भाई हमारे राजा की शरण में खुद को समर्पित कर दो तथा तुम्हारे साथ जो सुंदर औरत है उसे हमारे राजा की सेवा में उपस्थित करो। उनके यह बातें सुनकर श्रीराम ने अपने धनुष पर एक बाण साधकर उनकी तरफ छोड़ा और एक ही बाण से उन सभी असुरों का सर धड़ से अलग हो गया जिसे देखकर सूर्पनखा चौक गई और फिर अपने भाई खर दूषण के दरबार में आ पहुंची और बोली। Ramayan खर और दूषण का वध रक्षा कीजिए भैया रक्षा कीजिए आपके भेजे हुए 14 असुरों को उस राम ने अपने की बाण से मार डाला। यह सुनकर खर दूषण समझ जाते हैं कि श्री राम लक्ष्मण कोई साधारण मानव नहीं है और वह अपनी सेना लेकर खुद ही श्री राम लक्ष्मण से युद्ध करने के लिए चल पड़ते हैं। पंचवटी पहुंचने के बाद खर दूषण श्री राम लक्ष्मण को ललकार ते हैं। कुछ समय तक युद्ध होने के पश्चात ऋषि अगस्त प्रकट होते हैं और श्री राम को बोलते हैं कि खर दूषण परम मायावी राक्षस है इसलिए आप अपने दिव्यास्त्रों में से मन मोहिनी अस्त्र का उपयोग कीजिए। तब श्रीराम मनमोहनी अस्त्र खर दूषण की ओर चला देते है जिसके प्रभाव से खर दूषण की सेना मोहित होकर आपस में ही लड़कर नष्ट हो जाती है। और आखिर में श्रीराम अपने दिव्यास्त्र के द्वारा दंडक वन के राजा खर का वध कर देते है।

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Shree ram श्रीराम का वनवास । राम वन गमन ।

श्रीराम का वनवास श्रीराम का वनवास रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस घटना के माध्यम से हमें कई संदेश मिलते हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं: वनवास का कारण श्रीराम के वनवास का कारण था कैकेयी का क्रोध। कैकेयी दशरथ की तीसरी पत्नी थी। वह दशरथ से बहुत प्रेम करती थी। लेकिन दशरथ ने एक समय में उसे दो वरदान दिए थे। एक वरदान था कि भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए। दूसरा वरदान था कि राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए। एक दिन, जब दशरथ राजा थे, तब कैकेयी ने अपने वरदानों का स्मरण कराते हुए दशरथ से भरत को अयोध्या का राजा और राम को चौदह वर्ष का वनवास देने की मांग की। दशरथ अपने वचनों के प्रति वचनबद्ध थे। इसलिए उन्होंने कैकेयी की मांग को मान लिया। Sita Swayamver सीता स्वयंवर की कथा। श्रीराम और माता सीता का विवाह Shree ram राम का वनवास राम, सीता और लक्ष्मण को वनवास जाना था। वे सभी अयोध्या से निकलकर वन की ओर चल पड़े। अयोध्या में सभी लोग उनके जाने से बहुत दुखी थे। राम, सीता और लक्ष्मण वन में कई स्थानों पर रहे। उन्होंने कई राक्षसों का वध किया। उन्होंने कई लोगों की मदद की। वनवास का अंत चौदह वर्ष बाद, राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। उन्होंने सीता को मुक्त कराया और अयोध्या लौट आए। अयोध्या में उनका भव्य स्वागत हुआ। वनवास का संदेश श्रीराम का वनवास एक कठिन समय था। लेकिन राम ने धर्म और सत्य के मार्ग पर चलकर इस कठिन समय को भी सहन किया। उन्होंने यह भी दिखाया कि माता-पिता के वचनों का पालन करना चाहिए। श्रीराम के वनवास से हमें यह भी सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति से भगवान की कृपा प्राप्त होती है। श्रीराम ने भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने कभी भी भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी। अंत में, भगवान की कृपा से उन्हें सफलता मिली।

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Sita Swayamver सीता स्वयंवर की कथा। श्रीराम और माता सीता का विवाह

श्रीराम और माता सीता का विवाह रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह विवाह हिंदू धर्म में प्रेम और समर्पण के प्रतीक के रूप में माना जाता है। विवाह का प्रसंग राजा दशरथ के चार पुत्र थे। श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। श्रीराम सबसे बड़े पुत्र थे। राजा दशरथ चाहते थे कि उनके बड़े पुत्र श्रीराम का विवाह हो जाए। एक दिन, राजा दशरथ ने अपने गुरु वशिष्ठ से सलाह ली। वशिष्ठ ऋषि ने उन्हें सलाह दी कि वे राजा जनक की पुत्री सीता के स्वयंवर में भाग लें। Sita Swayamver सीता स्वयंवर की शर्त  राजा जनक सभी को की शर्त बताते हुए कहते है। आप सभी राजाओं का मेरी पुत्री सीता के स्वयंवर में स्वागत है। आज इस स्वयंवर को जीतने की शर्त यह है कि जो भी महारथी  सामने रखें भगवान शिव के पिनाक धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा उसी से मेरी पुत्री सीता का विवाह संपन्न होगा। अतः आप सभी से अनुरोध है कि एक-एक करके आए और भगवान शिव के इस धनुष को उठाकर और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा कर अपने बलाबल तथा शक्ति का परिचय दें। राजा जनक की यह घोषणा सुनकर सभी राजा एक-एक करके आते हैं और धनुष को उठाने का प्रयास करते हैं। लेकिन भगवान शिव के उस धनुष को उठाना या प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर कोई भी राजा महाराजा उस धनुष को हिला तक नहीं पाया।  लक्ष्मण जी को आया क्रोध  बहुत समय बीत जाने के बाद भी जब कोई राजा उस धनुष को हिला नहीं पाया तो महाराजा जनक को क्रोध आ गया। उन्हें लगने लगा कि कोई भी इस शिव धनुष को उठा नहीं पाएगा और उनकी पुत्री सीता अविवाहित ही रह जाएंगी। यही सोचकर उन्होंने वहां उपस्थित सभी राजाओं की निंदा करने शुरू कर दी कि उनमें से कोई भी लायक पुरुष नहीं है। जो शिव धनुष का उठा सके।  राजा जनक की ऐसी अपमानजनक बातें सुनकर लक्ष्मण जी को क्रोध आ जाता है और वह इसे श्रीराम तथा रघुकुल  का अपमान समझते हैं। लक्ष्मण जी राजा जनक को ललकारने लगते हैं कि वह उनके तथा श्रीराम के सभा में होते हुए पूरी सभा को अयोग्य कैसे कह सकते हैं। तब ऋषि विश्वामित्र ने लक्ष्मण जी को शांत कराया और श्री राम को धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए बोला। श्रीराम  विनम्र भाव  से ऋषि  विश्वामित्र जी को प्रणाम करके शिव धनुष की तरफ बढ़ते हैं तो वहां पर उपस्थित राजा उनका उपहास करने लगते हैं क्योंकि कहा जाता है कि उस समय भगवान राम की आयु लगभग 16 से 17 वर्ष की थी। इसलिए वहां उपस्थित सभी राजा उन्हें  “लो, अब चिड़िया पहाड़ उठाने को चली है”  बोलकर उनका उपहास उड़ा रहे थे।  Shree Ram : श्री राम द्वारा ताड़का वध तथा अहिल्या का उद्धार  श्रीराम ने तोडा शिव धनुष  लेकिन भगवान विष्णु के अवतार श्री राम सहर्ष भाव से शिव धनुष को प्रणाम करते हैं और केवल अपने एक ही हाथ से शिव धनुष को उठा लेते हैं जिसे देखकर वहां उपस्थित सभी राजा हैरान रह जाते हैं। तभी  श्री राम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर उसकी डोरी को खींच देते हैं जिससे वह शिव धनुष टूट जाता है और स्वयंवर की शर्त के अनुसार देवी सीता और श्री राम का विवाह हो जाता है। माता सीता श्री राम को वरमाला पहना देती हैं श्रीराम को अपने पति के रूप में स्वीकार करती है। यह देखकर राजा जनक तथा उनके परिवार जन की खुशी की कोई सीमा नहीं रहती। देवी सीता तथा श्रीराम का विवाह  तब राजा जनक ऋषि विश्वामित्र को बधाई देते हुए उनका अभिनंदन करते हैं तथा श्री राम और देवी सीता के विवाह के आगे के कार्यक्रम के बारे में पूछते हैं। ऋषि विश्वामित्र राजा जनक को कहते हैं कि हे जनक यह विवाह तो शिव धनुष के अधीन था। तुम धनुष टूटते ही है विवाह तो हो चुका है लेकिन फिर भी आपने कुल के रीति रिवाज के अनुसार ही आगे का कार्यक्रम बनाइए।  ऋषि विश्वामित्र के कहने पर जनकपुरी से राजा दशरथ के पास सन्देश भेजा जाता है। तथा उसके बाद दोनों परिवारों के द्वारा विचार करके राजा दशरथ के चारो पुत्रो का विवाह राजा जनक की चारो पुत्रियों से निश्चित कर दिया जाता है। जिसमे श्रीराम के साथ देवी सीता, भरत  के साथ मान्ध्वि, लक्ष्मण के साथ उर्मिला, तथा शत्रुघ्न के साथ श्रुतिकीर्ति का शुभ विवाह संपन्न किया जाता है। 

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Shree Ram : श्री राम द्वारा ताड़का वध तथा अहिल्या का उद्धार 

श्री राम द्वारा ताड़का का वध | श्री राम द्वारा ताड़का का वध रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस घटना के माध्यम से श्री राम के साहस, पराक्रम और धर्मपरायणता का परिचय मिलता है। श्रीराम तथा चारों भाइयों की शिक्षा पूर्ण होने के चारों भाई राजमहल में वापस लौट जाते हैं। उसके कुछ ही समय पश्चात महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के महल में आते हैं तथा राजा दशरथ से कहते हैं कि उन्हें श्री राम चाहिए ताकि उनके यज्ञ तथा अनुष्ठानों की असुरों तथा राक्षसों से रक्षा की जा सके । राक्षस हमेशा हमारे यज्ञ में बाधा डालते है और यज्ञ को पूरा नहीं होने देते। इसलिए हम राम को अपने साथ ले जाना चाहते हैं ताकि वह हमारे यज्ञ तथा अनुष्ठानों रक्षा कर सकें। ताड़का कौन थी? ताड़का एक राक्षसी थी जो कि ऋषि विश्वामित्र के आश्रम के आसपास रहने वाले ऋषियों और साधुओं को सताती थी। वह बहुत ही बलशाली थी और उसकी आवाज इतनी भयानक थी कि सुनने वाले कांप उठते थे। Shree Ram श्री राम और लक्ष्मण का ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में जाना राजा दशरथ ने अपने पुत्रों श्री राम, लक्ष्मण और भरत को ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में भेजा था। ऋषि विश्वामित्र उनसे यज्ञ की रक्षा करने के लिए कहा चाहते थे। राक्षसी ताड़का का वध  श्री राम तथा लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम में चले जाते हैं। जहां पर विश्वामित्र श्री राम को बताते हैं कि एक राक्षसी ताड़का उनके हर यज्ञ में विघ्न डालती है तथा उसका विनाश करना आवश्यक है  यह माना जाता है कि राक्षसी ताड़का एक यक्षिणी थी। महा पुराण में वर्णित है कि यक्षिणीया स्वयं मां दुर्गा की शक्ति का अंश होती है इसलिए वे बहुत शक्तिशाली होती है। इसलिए श्री राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ राक्षसी ताड़का के निवास स्थान पर जाते हैं और उसको ललकारते हैं। ललकार सुनकर राक्षसी तड़का बाहर निकलती है और इनपर हमला करने लगती है काफी समय तक युद्ध के बाद श्री राम अपने एक बाण से राक्षसी तड़का का अंत कर देते है। उसके बाद विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण को अपने आश्रम में ठहर आते हैं। अगले दिन जब ऋषि विश्वामित्र यज्ञ कर रहे होते हैं तब सुबाहु तथा मारीच नाम के दो राक्षस उनका यज्ञ भंग करने के लिए कुछ राक्षसों को साथ ले आते हैं। लेकिन श्री राम और लक्ष्मण पहले से ही वहां यज्ञ की रक्षा में तैनात होते हैं और मैं दोनों अपने दिव्य बाणों से सभी राक्षसों का अंत कर देते हैं। अहिल्या का उद्धार अहिल्या कौन थी? अहिल्या एक पतिव्रता और धर्मपरायण स्त्री थी। वह ऋषि गौतम की पत्नी थी। एक बार, जब ऋषि गौतम आश्रम से बाहर गए थे, तब इंद्र ने अहिल्या का रूप धारण करके उसके साथ बलात्कार किया। इस घटना से अहिल्या बहुत दुखी हुईं और उन्होंने भगवान से अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी। अहिल्या स्वयं ब्रह्म देव की पुत्री थी। अत्यंत रूपवती होने के कारण देवराज इंद्र की नियत अहिल्या पर खराब हो गई। इसके पश्चात भी अहिल्या की शादी महर्षि गौतम से हो गई इससे देवराज इंद्र बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने उन दोनो से बदला लेने की सोची। एक रात देवराज इंद्र ने मुर्गे का रूप धारण करके ऋषि गौतम के आश्रम के बाहर जाकर बांग देनी शुरू कर दी। उसकी आवाज सुनकर गौतम को लगा कि सुबह हो गई है और वह प्रतिदिन की तरह अपना कमंडल लेकर गंगा स्नान करने के लिए चल पड़ते है। पीछे से देवराज इंद्र ऋषि गौतम का वेश धारण करके अहिल्या के पास चले जाते हैं और उसके साथ समागम करते है । जब ऋषि गौतम गंगा तट पर स्नान करने के लिए पहुंचते हैं तो उन्हें यह आभास होता है कि अभी सुबह हुई नहीं है। अवश्य ही किसी ने उनके साथ छल किया है। इसीलिए वह तुरंत अपने आश्रम की तरफ चल देते हैं। ऋषि गौतम अपने आश्रम पहुंचते हैं तो वह देखते हैं कि उन्हीं के भेष में एक व्यक्ति उनकी कुटिया से निकल रहा है। ऋषि गौतम परम तपस्वी थे इसलिए वह छल वेश में भी देवराज इंद्र को पहचान जाते हैं और उसे कुरूप होने का श्राप देते हैं। यह सुनकर अहिल्या अपनी कुटिया से बाहर निकलती है तब वह समझ जाती है कि उसके साथ छल हुआ है और अपने पति ऋषि गौतम के पैरों में गिरकर क्षमा मांगने लगती है। लेकिन क्रोध में भरे हुए श्री गौतम ने उन्हें क्षमा नहीं किया और तुरंत पत्थर में बदलने का श्राप दिया। बार-बार मिन्नत करने के बाद ऋषि गौतम को अहिल्या पर दया आ जाते हैं और वह उसके मुक्ति का मार्ग बताते हैं। जब भगवान विष्णु राम अवतार में पृथ्वी पर आएंगे तब वह अपने चरणों से स्पर्श करके तुम्हें इस श्राप से मुक्त करेंगे।  ताड़का वध के बाद जब महर्षि विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण के साथ जनकपुरी की तरफ रवाना होते हैं तब वह ऋषि गौतम के आश्रम से होकर गुजरते हैं जहां पर वह श्री राम को अहिल्या की कहानी बताते हैं। तब श्रीराम अपने पैरों से स्पर्श करके पाषाण में परिवर्तित हो चुकी  अहिल्या को शाप मुक्त कर देते हैं। और इस तरह भगवान राम के द्वारा अहिल्या का उद्धार हो जाता है। 

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Shree Ram श्री राम जन्म कथा | श्री राम और उनके भाइयों का जन्म |

(Shree Ram’s Birth story in Hindi) श्री राम का जन्म कैसे हुआ था। श्री राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन का जन्म राजा दशरथ वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के इक्ष्वाकु कुलोत्पन्न राजा थे। वे राजा अज व इन्वदुमतीके के पुत्र थेे तथा इक्ष्वाकु कुल मे जन्मे थे। वे श्रीराम के पिता थे। उनके चरित्र को आदर्श महाराजा, पुत्रों को प्रेम करने वाले पिता और अपने वचनों के प्रति पूर्ण समर्पित व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है। दशरथ का जन्म दशरथ का जन्म अयोध्या के राजा अज व इंदुमती के घर हुआ था। उनके पिता अज एक धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा थे। उनकी माता इंदुमती एक सुंदर और गुणवान रानी थीं। दशरथ का विवाह दशरथ ने तीन विवाह किए। उनका पहला विवाह कौशल्या से हुआ। कौशल्या से उनका पुत्र श्रीराम हुआ। उनका दूसरा विवाह सुमित्रा से हुआ। सुमित्रा से उनका पुत्र भरत और लक्ष्मण हुए। उनका तीसरा विवाह कैकेयी से हुआ। कैकेयी से उनका पुत्र शत्रुघ्न हुआ। पुत्र कामेष्टि यज्ञ संपन्न होना राजा दशरथ पैदल वन में श्रृंग मुनि के पास जाते हैं तथा उनसे आग्रह करते हैं कि संतान सुख के लिए व्याकुल हैं। कृपया करके मेरी समस्या का समाधान कीजिए। राजा दशरथ की सादगी तथा विनम्र आदर भाव के कारण श्रृंग मुनि प्रसन्न हुए और उन्होंने दशरथ का वचन दिया कि वह उनका पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाएंगे। उसके पश्चात शुभ मुहूर्त देखकर उन्होंने दशरथ का पुत्र कामेष्टि यज्ञ संपन्न करवाया यज्ञ संपन्न होने के बाद हवन कुंड में से अग्निदेव एक खीर का पात्र लेकर प्रकट हुए और राजा दशरथ से बोले। हे राजन, यह खीर ले जाओ और अपनी तीनों रानियों को बराबर खिला दो इससे तुम्हे संतान प्राप्ति अवश्य होगी। Shree Ram श्रीराम तथा उनके भाइयों का जन्म राजा दशरथ खीर का पात्र ले जाकर रानी कौशल्या तथा रानी कैकई को दे देते हैं। रानी कौशल्या तथा रानी कैकई अपने अपने पात्र में से एक एक निवाला सबसे छोटी रानी सुमित्रा को खिला देते हैं जिसके प्रभाव से कुछ समय बाद राजा दशरथ के घर में एक साथ चार पुत्रों का जन्म होता है। रानी कौशल्या सबसे बड़े पुत्र राम को जन्म देती है। उसके कुछ ही समय बाद हैरानी कैकई राजा दशरथ के दूसरे पुत्र भरत को जन्म देती हैं। कुछ है घड़ी बीतने के पश्चात रानी सुमित्रा राजा दशरथ के तीसरे पुत्र लक्ष्मण को जन्म देती है तथा कुछ ही क्षण बाद वह दशरथ के चौथे पुत्र शत्रुघ्न को जन्म देती हैं।  और इस प्रकार पृथ्वी पर बढ़े हुए पाप, अत्याचार को मिटाने के लिए भगवान नारायण स्वयं राजा दशरथ के पहले पुत्र श्री राम के रूप में जन्म लेते हैं। भगवान विष्णु के राम अवतार का साथ देने के लिए शेषनाग लक्ष्मण के अवतार में जन्म लेते हैं। तथा उनके साथ ही भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र भारत के अवतार में जन्म लेते हैं तथा शत्रुघ्न भगवान विष्णु के शंख शैल के  अवतार होते है। श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को चार पुरुषार्थ का रूप माना गया है। जिसमें श्री राम धर्म का रूप होते हैं तथा भारत मोक्ष का रूप होते हैं। उसके साथ ही लक्ष्मण जी को काम का प्रतीक माना गया है तथा शत्रुघ्न जी को धन का रूप माना गया है ।

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