2023

पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त

साल में आने वाली हर एक एकादशी का अपना अलग ही महत्व है। सावन शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है पुत्रदा एकादशी साल में वैसे 2 बार आती है। पुत्रदा एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान की सुख की प्राप्ति होती है साथ ही संतान की उन्नति होती है। आइए जानते हैं कब है सावन शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी। इसका महत्व और पूजा विधि। कब है पुत्रदा एकादशी पंचांग के अनुसार, सावन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 अगस्त देर रात 12 बजकर 9 मिनट पर प्रारंभ होगी और अगले दिन यानी 27 अगस्त की रात 9 बजकर 33 मिनट तक रहेगी। उदय तिथि में एकादशी तिथि होने के कारण यह व्रत 27 अगस्त को ही रखा जाएगा। वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा 27 अगस्त को बहुत ही शुभ सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 5 बजकर 56 मिनट से आरंभ होगा और 7 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। इसलिए इस शुभ मुहूर्त में पूजा करना अति उत्तम फलदायी रहेगा। पुत्रदा एकादशी का महत्व मान्यताओं के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत उत्तम फल देने वाला है। अगर किसी को संतान सुख में बाधा आ रही है तो वह इस व्रत को रख सकते हैं। साथ ही इस व्रत को रखने से संतान के सभी कष्ट भी दूर होता है। साथ ही संतान को स्वास्थ्य और अच्छी आयु का वरदान मिलता है। पुत्रदा एकादशी पूजा विधि सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि के बाद घर के मंदिर में देसी घी का दीपक जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु को गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। साथ ही तुलसी माला से 108 बार ओम वासुदेवाय नम: का जप करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन भगवान को भी सात्विक चीजों का ही भोग लगाएं। साथ ही भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। इस दिन रविवार है तो तुलसी के पत्ते पहले ही तोड़ कर रख दें। पुत्रदा एकादशी व्रत कथा  द्वापर युग के आरंभ में महिरूपति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन राज्य के सभी ऋषि-मुनियों, सन्यासियों और विद्वानों को बुलाकर संतान प्राप्ति के उपाय पूछे। राजा की बात सुनकर सभी ने कहा कि ‘हे राजन तुमने पूर्व जन्म में सावन माह की एकादशी के दिन अपने तालाब से एक गाय को जल नहीं पीने दिया था। जिसके कारण गाय ने तुम्हे संतान न होने का श्राप दिया था। इसके बाद सभी ऋषि-मुनियों ने कहा कि हे राजन यदि तुम और तुम्हारी पत्नी पुत्रदा एकादशी का व्रत रखें तो इस श्राप से मुक्ति पा सकते हो। जिसके बाद तुम्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है। यह सुनकर राजा ने पत्नी के साथ मिलकर पुत्रदा एकादशी का व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद राजा ने सावन माह में आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा और इस व्रत के प्रभाव से वह शाप से मुक्त हो गया। जिसके बाद उसकी पत्नी गर्भवती हुई और एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा काफी प्रसन्न हुए और तब से वह प्रत्येक पुत्रदा एकादशी का व्रत करने लगे। कहते हैं जो कि साधक पूरे मन व श्रद्धा के साथ यह व्रत करता है भगवान विष्णु उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

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वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा

पूजा-उपासना तो जैसे भारतवासियों की सांसों में बसा हुआ है. शायद की ऐसा कोई दिन गुजरता होगा, जब कोई खास पूजा का संयोग न बनता हो. सप्ताह के हर दिन के अनुसार भी विशेष पूजा का विधान है. शुक्रवार को लक्ष्मी देवी का व्रत रखा जाता है. इसे ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ भी कहा जाता है. पूजा-उपासना तो जैसे भारतवासियों की सांसों में बसा हुआ है. शायद की ऐसा कोई दिन गुजरता होगा, जब कोई खास पूजा का संयोग न बनता हो. सप्ताह के हर दिन के अनुसार भी विशेष पूजा का विधान है. शुक्रवार को लक्ष्मी देवी का व्रत रखा जाता है. इसे ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ भी कहा जाता है. वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा किसी शहर में अनेक लोग रहते थे. सभी अपने-अपने कामों में लगे रहते थे. किसी को किसी की परवाह नहीं थी. भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए. शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं. शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे. इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे. ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी. शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी. उनका पति भी विवेकी और सुशील था. शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे. शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे. देखते ही देखते समय बदल गया. शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा. अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा. इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया. यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी. शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया. दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई. इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया. शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी. वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी. अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी. शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक माँजी खड़ी थी. उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था. उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था. उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था. उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई. शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया. शीला उस माँजी को आदर के साथ घर में ले आई. घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था. अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया. मांजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मी जी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं.’ इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी. फिर मांजी बोलीं- ‘तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई.’ मांजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया. उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी. मांजी ने कहा- ‘बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं. धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता. क्या आप जानते हैं माता लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी मांजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई. कहानी सुनकर माँजी ने कहा- ‘कर्म की गति न्यारी होती है. हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं. इसलिए तू चिंता मत कर. अब तू कर्म भुगत चुकी है. अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएँगे. तू तो माँ लक्ष्मी जी की भक्त है. माँ लक्ष्मी जी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं. वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं. इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मी जी का व्रत कर. इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा.’ शीला के पूछने पर मांजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई. मांजी ने कहा- ‘बेटी! मां लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है. उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है. यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है. वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है.’ शीला यह सुनकर आनंदित हो गई. शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था. वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं. दूसरे दिन शुक्रवार था. सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया. आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ. यह प्रसाद पहले पति को खिलाया. प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया. उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं. शीला को बहुत आनंद हुआ. उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई. शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया. इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं. फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- ‘हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है. हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो. हमारा सबका कल्याण करो. जिसे संतान न हो, उसे संतान देना. सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना. कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना. जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना. सभी को सुखी करना. हे माँ! आपकी महिमा अपार है.’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को प्रणाम किया. व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा. उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए. घर में धन की बाढ़ सी आ गई. घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई. ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं. कैसे करें

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क्या आप जानते हैं माता लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी

हिंदू धर्म में माता लक्ष्मी को धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी के रूप में पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यदि माता लक्ष्मी किसी से नाराज हो जाती हैं तो उसकी सुख समृद्धि ख़त्म होने लगती है। शास्त्रों में माता लक्ष्मी को लेकर न जाने कितनी बातें प्रचलित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं माता लक्ष्मी की उत्पत्ति कहां से हुई और उनके जन्म की कहानी क्या है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में उनके जन्म को लेकर बहुत सी बातें प्रचलित हैं। इस बात को विस्तार से जानने के लिए कि माता लक्ष्मी की उत्पत्ति कहां से हुई है, आइए जानें माता लक्ष्मी की उत्पत्ति से जुड़ी कुछ बातें। माता लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी कुछ हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार लक्ष्मी की उत्पत्ति की कहानी के कई अलग-अलग संस्करण हैं और यह हमेशा कई अविश्वसनीय तत्वों से अलंकृत है। एक पौराणिक कथा के अनुसार माता लक्ष्मी की कहानी ऋषि दुर्वासा और भगवान इंद्र के बीच मुलाकात से शुरू होती है। एक बार ऋषि दुर्वासा, बहुत सम्मान के साथ, इंद्र को फूलों की माला भेंट करते हैं। भगवान इंद्र फूल लेते हैं और विनम्रतापूर्वक उन्हें अपने गले में डालने के बजाय, वह माला को अपने हाथी ऐरावत के माथे पर रख देते हैं। हाथी माला लेकर पृथ्वी पर फेंक देता है। दुर्वासा अपने उपहार के इस अपमानजनक व्यवहार पर क्रोधित हो जाते हैं और दुर्वासा ने भगवान इंद्र को श्राप देते हुए कहा कि जिस तरह उन्होंने अपने अत्यधिक अभिमान में माला को जमीन पर फेंक कर बर्बाद कर दिया, उसी तरह उनका राज्य भी बर्बाद हो जाएगा। क्या आप जानते हैं कान्हा को बांसुरी किसने दी, पढ़ें रोचक कथा दुर्वासा चले जाते हैं और इंद्र अपने घर लौट आते हैं। दुर्वासा के श्राप के बाद इंद्र की नगरी में परिवर्तन होने लगते हैं। देवता और लोग अपनी शक्ति और ऊर्जा खो देते हैं, सभी वनस्पति उत्पाद और पौधे मरने लगते हैं, मनुष्य दान करना बंद कर देते हैं, मन भ्रष्ट हो जाता है और सभी की इच्छाएं बेकाबू हो जाती हैं। उस समय देवताओं और दैत्यों ने अमृत्व के लिए समुद्र मंथन (समुद्र मंथन की कथा) का आग्रह किया। तब देवताओं और राक्षसों द्वारा आदिम दूधिया सागर की हलचल से माता लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इस प्रक्रिया के दौरान समुद्र से 14 ग्रन्थ निकले जिनमें से माता लक्ष्मी प्रमुख थीं। माता का स्वरुप इतना सुंदर था कि सभी देव और दैत्य उनकी तरफ खिंचे चले आए। ऐसे में दैत्यों ने भी उन्हें पाने की चेष्टा की और माता ने स्वयं की सुरक्षा के लिए खुद को पालनहार भगवान विष्णु को सौंप दिया। उसी समय से लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में विराजमान हैं। समुद्र मंथन के दौरान निकलने की वजह से माता लक्ष्मी को दूध के समुद्र की पुत्री क्षीरब्धितान्या भी कहा जाता है। चूंकि माता लक्ष्मी का स्थान भगवान विष्णु के ह्रदय में है इसलिए उन्हें श्रीनिवास नाम से भी जाना जाता है। कैसा है माता लक्ष्मी का स्वरूप लक्ष्मी जी को अक्सर कमल के फूल पर बैठी या खड़ी एक सुंदर स्त्री के रूप में चित्रित किया जाता है, जो पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक हैं। उन्हें अक्सर एक हाथ में कमल का फूल और दूसरे हाथ में सोने का सामान लिए दिखाया जाता है, जो धन और समृद्धि का प्रतीक है। हिंदू धर्म में, लक्ष्मी को धन और सौभाग्य की देवी के रूप में पूजा जाता है, और उन्हें अपने भक्तों के लिए समृद्धि, सफलता और खुशी लाने वाली देवी माना जाता है। अपनी आर्थिक स्थिति ठीक बनाए रखने के लिए भक्त मुख्य रूप से माता का पूजन पूरे विधि-विधान के साथ भगवान विष्णु समेत करते हैं। माता लक्ष्मी धन, सौभाग्य, यौवन और सुंदरता की हिंदू देवी हैं और भगवान विष्णु की पत्नी हैं इसी वजह से उनकी जोड़ी को लक्ष्मी-नारायण के रूप में पूजा जाता है। लक्ष्मी-विष्णु विवाह कथा  जब लक्ष्मी जी बड़ी हुई तो वह भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुनकर उनमें ही अनुरक्त हो गई और उनको पाने के लिए तपस्या करने लगी उसी तरह जिस तरह पार्वतीजी ने शिव को पाने के लिए तपस्या की थी। वे समुद्र तट पर घोण तपस्या करने लगीं। तदनन्तर लक्ष्मी जी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

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क्या आप जानते हैं कान्हा को बांसुरी किसने दी, पढ़ें रोचक कथा

भगवान कृष्ण की बांसुरी को लेकर अलग अलग- कथाएं प्रचलित हैं जिनमें दो कथाएं प्रमुख हैं। इनमें एक कथा भगवान शिव से जुड़ी थी तो दूसरी कथा बबूल के पेड़ से। भगवान शिव से मिली कृष्ण को बांसुरी कहते हैं भगवान कृष्ण की बांसुरी को लेकर अलग अलग- कथाएं प्रचलित हैं जिनमें दो कथाएं प्रमुख हैं। इनमें एक कथा भगवान शिव से जुड़ी थी तो दूसरी कथा बबूल के पेड़ से। द्वापरयुग के समय जब भगवान श्री कृष्ण ने धरती में जन्म लिया तब देवी-देवता वेश बदलकर समय-समय पर उनसे मिलने धरती पर आने लगे। इस दौड़ में भगवान शिवजी कहां पीछे रहने वाले थे, अपने प्रिय भगवान से मिलने के लिए वह भी धरती पर आने के लिए उत्सुक हुए।  कान्हा और कुम्हार की रोचक पौराणिक कथा भगवान शिव से मिली कृष्ण को बांसुरीकहते हैं कि द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ तो नंद बाबा के घर बधाई देने वालों का तांता लग गया। क्या नगरवासी, क्या ऋषि मुनि यहां तक की देवता भी समाचार मिलने पर नंद बाबा के घर बधाई देने पहुंचने लगे। बधाई की परंपरा के अनुसार सभी भगवान के लिए कुछ न कुछ उपहार में ला रहे थे। ऐसा जब भगवान भोले शंकर ने देखा तो सोचा कि उन्हें भी कुछ न कुछ लेकर ही जाना चाहिए, लेकिन वह कुछ ऐसा ले जाएं जो बालक कृष्ण अपने साथ रख सके। ऐसा सोचते हुए भगवान शिव गोकुल मथुरा की ओर बढ़ रहे थे तभी उन्हें रास्ते में महर्षि दधीच की हड्डियों के कुछ अवेशेष मिले। यह वही महर्षि दधीच थे जिन्होंने राक्षसों के विनास के लिए अपने शरीर को दान कर दिया था। इन्हीं के हड्यिों से सारंग, पिनाक और गांडीव नामक तीन धनुष और एक बज्र बनाया गया था।  भगवान शिव ने हड्डी के एक टुकड़े को उठाया और माया से एक अनुपम और बांसुरी तैयार की। इसके बाद उन्होंने नंदबाबा के घर जब भगवान कृष्ण को देखा तो उन्हें यह बांसुरी भेंट की। भगवान शिव का आशीर्वाद समझकर भगवान कृष्ण हमेशा इस बांसुरी को अपने पास रखा। वहीं बबूल की दूसरी कथा में कहा जाता है कि भगवान कृष्ण बगीचे में टहले और फूलों को देखकर मुस्कुराते। वह सभी पेड़, पौधों और लताओं से बहुत ही स्नेह जताते। ऐसा देखकर वहां पर मौजूद बबूल के पेड़ को रहा नहीं गया तो उसने भगवान अपने से कम प्यार होने की शिकायत की। भगवान ने बबूल से कहा कि उसे भी प्यार मिलेगा लेकिन उसे कष्ट बहुत सहना पड़ेगा। बबूल तैयार हो गया। भगवान से बबूल की एक शाखा तोड़ी तो वह पीड़ा से कराह उठा। लेकिन भगवान ने इस शाखा से बांसुरी बनाई और फिर हमेशा अपने पास रखी।

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कान्हा और कुम्हार की रोचक पौराणिक कथा

यह कहानी भगवान श्री कृष्ण के बाल्य काल के समय की है। बचपन में श्री कृष्ण बडे ही शरारती थे। आये दिन भगवान श्री कृष्ण के नए-नए उलाहने रोज यशोदा मैया के पास आते रहते थे। इन्हीं उलाहनो से तंग आकार एक दिन यशोदा मैया छड़ी लेकर कृष्ण भगवान के पीछे दौड़ने लगी। यशोदा मैया को भगाते-भगाते गोविंदा एक कुम्हार के घर में घुस गए। उस वक्त कुम्हार अपने काम में व्यस्त था। पर जब कुम्हार की दृष्टि भगवान कृष्ण पर पडी। तब कुम्हार बडा ही प्रसन्न हो गया। भगवान कृष्ण बोले कुम्हार जी – कुम्हार जी मेरी मैया बहुत क्रोधित है और छड़ी लेकर मुझे ढूंड रही है। कुछ समय के लिए आप मुझे मेरी मैया से छुपा लीजिए। कुम्हार भगवान श्री कृष्ण के अवतार स्वरुप से ज्ञात था। उसने तुरंत कृष्णजी को एक बडे से मिट्टी के घड़े के निचे छुपा दिया। कुछ समय पश्चात जब यशोदा मैया ने वहां आकार कुम्हार से पूछा। क्यों रे कुम्हार! क्या तूने मेरे कान्हा को कही देखा है? तो कुम्हार ने जवाब दिया नहीं मैया मैंने कहीं नहीं देखा। कुम्हार और यशोदा मैया के बिच हो रहा सवांद भगवान श्री कृष्ण गौर से सुन रहे थे। फिर जब माता यशोदा वहां से चली गई। तब कान्हा बोले कुम्हार जी मेरी माता यदि चली गई हो। तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालिए। कुम्हार बोला भगवान ऐसे नहीं आपको निकालुगा पहले आपको मुझे वचन देना होगा की आप मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त कर देंगे। कुम्हार की बात सुनकर कान्हा जी मुस्कुराये और बोले ठीक कुम्हार मैं वचन देता हूं की मैं तुम्हे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्ति दे दूंगा। अब तो मुझे बाहर निकाल दो। कुम्हार बोला मुझे अकेले को नहीं महाप्रभु मेरे पूरे परिवार को भी आप चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दीजिये, तो ही मैं आपको घडे़ से बाहर निकालूंगा। इस पर कृष्ण बोले ठीक हैं भैया। मैं उन्हें भी चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का आपको वचन देता हूं। अब तो बाहर निकाल दो मुझे। अब कुम्हार बोला बस प्रभुजी एक विनती और है। उसे पूरा करने का वचन देते है। तो मैं आपको घडे से बाहर निकाल दूंगा। कृष्ण बोले अब वह भी बता दो। कुम्हार ने कहा हे प्रभुजी जिस घडे़ के निचे आप छुपे है। उस घडे को बनाने के लिए, लाई गई मिट्टी को मैंने अपने बैलों पर लाद कर लाई है। आप मेरे उन बैलो को भी चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दीजिये। कृष्ण भगवान ने कुम्हार का प्राणी प्रेम देखकर उन बैलों को भी मोक्ष देने का वचन दिया। सावन (श्रावण) सोमवार व्रत कथा, व्रत विधि  अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं – ‘कुम्हार जी, यदि मैया चली गई हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।’ कुम्हार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’ भगवान मुस्कुराये और कहा – ‘ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूं। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।’ कुम्हार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूंगा।’ प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूं। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।’ कान्हा बोले लो कुम्हार तुम्हारी सभी इच्छाएं पूरी हो गई है। अब तो इस घडे से मुझे बाहर निकल लो। इसबार कुम्हार बोला अभी नहीं भगवान। बस एक अंतिम इच्छा शेष रह गई है और वह यह है कि जो भी जीव हम दोनों के बिच हुए इस सवांद को सुन रहा होगा उसे भी आप इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त कर देंगे। बस यह वचन भी दे दीजिये। तभी मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूंगा। कुम्हार की सच्ची प्रेमभावना देखकर कृष्ण भगवान अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कुम्हार को तथास्तु कह दिया। फिर जाकर कुम्हार ने बाल कृष्ण को घडे़ से बाहर निकाला। उनको साष्टांग प्रणाम करके। उनके चरण धोये और वह चरण अमृत प्राशन करके। अपने पूरे घर में उसका छिडकाव किया। अंत में कुम्हार प्रभु कृष्ण के गले लगकर इतना रोया इतना रोया की उनमे ही विलीन हो गया।

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सावन (श्रावण) सोमवार व्रत कथा, व्रत विधि 

सावन (श्रावण) सोमवार व्रत कथा, व्रत विधि | हिन्दू धर्म में सावन का महीना (श्रावण मास) बड़ा ही पवित्र माना जाता हैं। चूँकि सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है इसलिए भोले के भक्तों के लिए भी यह महीना बड़ा ही विशेष है। स्कंद पुराण के अनुसार जब सनत कुमार ने भगवान शिव से पूछा कि आपको श्रावण मास इतना प्रिय क्यों है? तब शिवजी ने बताया कि देवी सती ने भगवान शिव को हर जन्म में अपने पति के रूप में पाने का प्रण लिया था। लेकिन अपने पिता दक्ष प्रजापति के भगवान शिव को अपमानित करने के कारण देवी सती ने योगशक्ति से शरीर त्याग दिया।इसके पश्चात उन्होंने दूसरे जन्म में पार्वती नाम से राजा हिमालय और रानी नैना के घर जन्म लिया। उन्होंने युवावस्था में श्रावण महीने में ही निराहार रहकर कठोर व्रत द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया। सावन सोमवार व्रत कथा एक समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था. उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी, इस कारण वह बहुत दुखी था. पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था. उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया. पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि ‘हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है.’ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई. माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी. माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था. उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख. वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा. कुछ समय के बाद साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया. साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराना. जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना. दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े. रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था. लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था, वह एक आंख से काना था. राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची. साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया. उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं. विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा. लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया. लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था. उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी. उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि ‘तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा, वह एक आंख से काना है. मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं.’ सपने में बंदर दिखना अच्छा संकेत या बुरा जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई. राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई. दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया. जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई, उसी दिन यज्ञ रखा गया. लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर सो जाओ. शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए. मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया. संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे. पार्वती ने भगवान से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा. आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें. जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया. अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है. लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे. माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया. शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया. शिक्षा समाप्त करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया. दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था. उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया. उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया. इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए. उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है. इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है, उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. सावन (श्रावण) सोमवार व्रत विधि  स्कंदपुराण के अनुसार

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सपने में बंदर दिखना अच्छा संकेत या बुरा

सपने हर कोई देखता है। सपनों को लेकर अक्सर कहा जाता है कि हम पूरा दिन जो कुछ भी सोचते है वहीं हमें सपने में भी दिखता है। तो क्या यह सच है जो कुछ भी हम दिन भर में सोचते है वहीं हमे सपने में दिखता है। हालांकि ऐसा तो वैज्ञानिकों का मानना है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ अगर बात करें स्वप्न शास्त्र की, तो शास्त्र कुछ और कहता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार रात को सोते हुए देखे गए हर एक सपने का कोई न कोई विशेष महत्व होता है। चाहे फिर वो अच्छे सपने देखना हो या फिर बुरे। हर सपने का कोई न कोई मतलब जरूर होता है। वहीं जब भी हम कोई सपना देखते है तो सबसे पहले उस सपने के बारे में दूसरों को बताते है। आज के इस आर्टिकल में हम बात करेंगे कि अगर आपने सपने में बंदर को देखा है तो क्या ये अच्छा संकेत है या फिर बुरा सपने में बंदर का झुंड देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में अलग-अलग पशु-पक्षियों को देखने का अर्थ अलग-अलग होता है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति को अपने सपने में बंदर दिखते हैं तो इसका अर्थ शुभ भी हो सकता है, तो वहीं दूसरी और इसका अर्थ अशुभ भी हो सकता है। आपने सपने में बंदर को कैसे देखा है, शुभ या अशुभ इस बात पर निर्भर करता है। जैसे कि अगर कोई व्यक्ति बंदरों को झुड में देखता है तो यह एक अच्छा संकेत है। इसका अर्थ है कि जल्द ही उसे आर्थिक लाभ मिलने वाला है, और घर में सुख-शान्ति बनी रहेगी। सपने में बंदर को हंसते हुए देखना अगर आप सपने में बंदरों को हंसते हुए देख रहे है, तो यह भी एक अच्छे संकेत की और इशारा कर रहे है। हंसते हुए बंदर को देखने का मतलब कि आपका अच्छा समय जल्द ही शुरू होेने वाला है। ऐसे में व्यक्ति को आने वाले समय में धन लाभ के साथ-साथ मान-सम्मान भी बढ़ेगा।वहीं दूसरी और अगर आप अपने सपने में बंदरों को लड़ते हुए देखते है तो इसका मतलब कि परिवार में किसी कारण दरार पड़ सकती है। बंदर को खाना चुराते देखना वहीं स्वप्न शास्त्र के अनुसार आप बंदर को खाना चुराते देखा तो इसका मतलब है कि जल्द ही आपको धन लाभ होने वाला है। इसी के साथ अगर आप सपने में बंदर को तैरते हुए देखा तो इसका मतलब जल्दी ही आपकी सभी समस्याओं से आपको छुटकारा मिलने वाला है। वहीं अगर आप सपने में देखते है कि आपको बंद ने काट लिया है तो समझ लें कि भविष्य में आपको कोई गंभीर चोट लगने वाली है। सपने में गड़ा हुआ धन देखने या मिलने का क्या अर्थ है? बंदर को खाते हुए देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार अगर किसी को सपने में बंदर कुछ खाते हुए नजर आता है तो इसे अशुभ संकेत माना गया है। यह सपना बताता है कि आपको भविष्य के लिए सतर्क रहना चाहिए। वहीं अगर कोई व्यक्ति सपने में बंदरों का झुंड देखता है, तो इसका मतलब है कि जल्द ही उसे आर्थिक लाभ मिलने वाला है। बंदरों को लड़ते हुए देखना अगर आप सपने में बंदरों को आपस में लड़ते हुए देखते हैं तो इसका मतलब है कि परिवार में किसी कारण दरार पड़ सकती है। इसलिए आपको संभलकर रहने की जरूरत है। अगर आप सपने में बंदर को खाना चुराते देखते हैं, तो इसका मतलब है कि व्यक्ति को जल्द ही धन लाभ होने वाला है। बंदर को तैरते हुए देखना अगर सपने में कोई बंदर तैरते हुए नजर आ रहा है, तो इसका मतलब है कि जल्द ही आपको जीवन में आ रही किसी समस्या से छुटकारा मिलने वाला है। अगर सपने में आप देखते हैं कि किसी बंदर ने आपको काट लिया है, तो समझ लें कि भविष्य में कोई गंभीर चोट लगने वाली है।

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सपने में गड़ा हुआ धन देखने या मिलने का क्या अर्थ है?

सपने में गड़ा हुआ धन देखना हमारे हिन्दू शास्त्रों में लगभग हर कृत्य के पीछे एक ठोस कारण छिपा हुआ है, यानी इस संसार में जो भी घटित हो रहा या घटित होने की संभावना है उसके होने का कोई न कोई कारण तो है। भगवान कृष्ण ने भी कहा है कि मनुष्य द्वारा किये जा रहे कर्म उनके पूर्व जन्म में किये गए कर्मों का ही फल हैं। आज हम कर्म या भविष्य का लेखा जोखा रखने वाले सपनों की बात करेंगे, वो सपनें जो हमारे लिए भले ही इतने महत्वपूर्ण न हो पर उनका कोई न कोई अर्थ तो जरूर है। ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि हिन्दू धर्म के स्वप्न शास्त्र स्वयं ही इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। आज के इस लेख में हम सपने में खजाने या गड़े हुए खजाने को देखने के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की बात करने जा रहे हैं। सपने में गड़ा हुआ खजाना देखना हमारे वैदिक ग्रंथों में रावण सहिंता और वराह संहिता स्वप्न फल को जानने के लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं। लोगों को सपने बड़े ही विचित्र से आते हैं कई बार तो उन सपनों का कोई अर्थ ही नहीं निकलता है पर सपनों में हमारा जोर तो चलता नहीं है। कुछ लोग सपनें में कहीं पर गड़ा हुआ खजाना देख लेते हैं फिर उन्हें लगता है कि यह सच हो सकता है। फिर वे जी जान से उस गड़े हुए खजाने को ढूंढने में जुट जाते हैं। शायद लोगों को यह नहीं मालूम कि सपने में गड़े हुए खजाने को देखने का अर्थ यह नहीं है। जब भी कोई व्यक्ति सपने में गड़ा धन मिलना देखता है तो यह रावण सहिंता और वराह सहिंता के अनुसार यह नहीं कहता कि उस व्यक्ति को कहीं पर गड़ा हुआ खजाना मिल ही जाएगा। दरअसल इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उस व्यक्ति को अचानक धन मिलने या सम्मान-प्रतिष्ठा हासिल होने की संभावना है। गड़ा धन मिलने के संकेत है कि आपको अज्ञात स्त्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है और समाज में प्रतिष्ठा मिल सकती है। अब आपको बताते हैं कि आखिर कब आपको गड़ा हुआ धन प्राप्त होने की संभावना अत्यधिक होती है और गुप्त धन मिलने के संकेत क्या होते हैं? रावण सहिंता और वराह सहिंता के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को गड़े हुए खजाने के मिलने की संभावनाएं होती हैं तो उसे सपनें में सफेद नाग दिखाई देता है। वह सफेद नाग जिस स्थान पर दिखाई देता हैं वहीँ पर गड़ा हुआ खजाना मिलने की संभावना होती है। क्या आप ने भी सपने में देखी है खुद की शादी? जानें क्या है इसका मतलब आपको बता दें कि सपने में दिखने वाला सफेद नाग कोई सामान्य नाग नहीं बल्कि नाग के रूप में पितर होते हैं जो अपने वंशजों को गड़े हुए खजाने ( Gada hua khajana ) पाने के लिए संकेत दिया करते हैं। पितर अपने ही द्वारा छिपाए गए खजाने के रक्षक होते हैं जो अपने परिवार जनों को बार बार सफेद नाग के रूप में सपने में आकर संकेत दिया करते हैं और गुप्त धन के बारे में जानकारी देते हैं। तंत्र शास्त्र में गड़ा धन मिलने के संकेत जिस प्रकार कलियुग में मशीनों से तमाम तरह के काम होते हैं पहले तंत्र शास्त्र से कई तरह के रहस्य से पर्दा उठाया जाता था। तंत्र शास्त्र में गड़ा धन होने के संकेत कुछ इस तरह दिए गए हैं- जिस जमीन में कई पेड़ हों और एक ही पेड़ पर ज्यादा पक्षी बैठते हों, वहां गड़ा धन होने की संभावना है. जहां बारिश होने पर पानी वाली जगह पर घास न उगती हो, लेकिन गर्मी के मौसम में धूप में भी घास उगती हो, वहां जमीन के अंदर संपत्ति की संभावना है. जहां सांप, नेवले या गिरगट निकलते हों या उनके बिल हों वहां भी गड़ा धन होने की आशंका है. जहां पौधे प्राकृतिक कद से ऊंचे हों वहां भी गड़ी संपत्ति मिलने की संभावना रहती है

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क्या आप ने भी सपने में देखी है खुद की शादी? जानें क्या है इसका मतलब

अपनी शादी होते हुए सपने में देखता कई लोगों के लिए एक सामान्य स्वप्न अनुभव है और इसके अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं। सामान्य तौर पर सपने में खुद की शादी देखना एक नई शुरुआत का प्रतीक होता है। यदि सपने देखने वाला अविवाहित है तो सपना एक रिश्ते की इच्छा या साहचर्य की लालसा का प्रतीक हो सकता है। यहां जानें शादी से जुड़े सपने और उनके क्या मतलब हैं सोते हुए सपने देखना एक आम बात है और अक्सर हमें कुछ ऐसे सपने दिखाई देते हैं जो कि काफी देर तक हमारे दिमाग में छाए रहते हैं. ऐसे सपनों का मतलब जानने के लिए हम परेशान होते हैं कि आखिर इसका मतलब क्या है? इन्हीं सब सवालों के सभी जवाब आपको स्वप्न शास्त्र में मिलेंगे. स्वप्न शास्त्र में दी गई जानकारी के अनुसार हर सपने का एक खास मतलब होता है. अगर आपको सपने में अपनी शादी दिखाई दे तो इसके पीछे कुछ महत्वपूर्ण संकेत छिपे हुए हैं. आइए जानते हैं क्या कहता है स्वप्न शास्त्र. खुद की शादी देखना कई बार लोग सपने में अपनी खुद की शादी होते हुए देखते हैं जो कि एक अशुभ संकेत है. इसका मतलब है कि आने वाले भविष्य में आपके जीवन में कोई बड़ी घटना होने वाली है. ऐसे में आपको सतर्क रहने की जरूरत है. किसी अपने की शादी देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार आप अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार की शादी देखते हैं तो यह भी एक अशुभ संकेत है. यह सपना बताता है कि आने वाले समय में आपको किसी महत्वपूर्ण कार्य में बाधार आने वाली है. अपनी दुबारा शादी देखना सपने में खुद की शादी देखते हैं तो आपका मूड खराब होना ही है. लेकिन स्वप्न शास्त्र के मुताबिक यह सपना आपके दांपत्य जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संकेत देता है. इस सपने का मतलब है कि आने वाले समय में आपके दांपत्य जीवन में कोई अड़चन पैदा होने वाली है. सपने में बारात देखना अगर कोई व्यक्ति में अपनी खुद की बारात देखता है तो यह एक शुभ संकेत है. इस सपने का मतलब है कि समाज में आपकी मान-मर्यादा बढ़ने वाली है. जिससे आपको काफी लाभ भी होगा. सपने में तलवार देखने का क्या मतलब होता है दूल्हे की ड्रेस यदि किसी जातक ने सपने में खुद को खुशहाल और खुशमिजाज शादी की पोशाक में देखा है तो यह आशावादी दृष्टिकोण को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यदि एक उदास है और सामान्य पोशाक के साथ खुद की शादी होते हुए देखता है तो किसी अशुभ घटना के संकेत भी हो सकते हैं।

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नागपंचमी पूजा आज , जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पूजन सामग्री

नाग पंचमी पूजा आज है. आज 21 अगस्त दिन सोमवार है. आज हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है. इस विशेष दिन पर नाग देवता की विधिवत उपासना और पूजा की जाती है. नाग पंचमी के दिन नाग देवता को जल चढ़ाकर पूजा-पाठ करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है और कई प्रकार की समस्याएं टल जाती है. आइए जानते हैं, नाग पंचमी पर शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इससे जुड़ी पूरी जानकारी के बारे में…………. नाग पंचमी पूजन विधि

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सपने में तलवार देखने का क्या मतलब होता है

सपना मनुष्य को सोते वक्त एक दूसरी दुनिया में ले जाता है, एक काल्पनिक दुनिया जो सिर्फ हमारे ही इर्द गिर्द घूमा करती है। स्वप्न मनुष्य के भविष्य के बारे में संकेत देते हैं। स्वप्न को समझने के लिए जरूरी है की हमको ये पता होना चहिए की स्वप्न हमने किस अवस्था और किस समय देखा। स्वपन शास्त्र के अनुसार सपनो को भविष्य कहा जाता है. सपने में आप कुछ भी देखते हैं उसका अर्थ कुछ ना कुछ जरूर होता है और उसका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। सपने हमारे बारे में पहले से ही जान लेते हैं की मेरे साथ क्या होने वाला है। सपने में तलवार देखना सपने में तलवार देखना बहुत ही शुभ सपना होता है। सपने में तलवार देखने का मतलब है की आप शत्रुओं पर विजय प्राप्त करेंगे।  कोई भी आपके विरोध में नहीं जा सकेगा। आप अपने तर्कों से दूसरों को प्रभावित करने में सफल रहेंगे। इसके अलावा सपने में तलवार चलाते देखना, सपने में तलवार से मारना, सपने में तलवार लगना, सपने में खुद पर हमला होते हुए देखना ईत्यादि का मतलब एक ही होता है। यह एक अच्छा सपना है। सपने देखना कि आप देखते हैं और तलवार के साथ बातचीत करते हैं जब सपना देखते हैं कि आप देख रहे हैं और किसी के साथ बातचीत कर रहे हैं तलवार, हमें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि वह न केवल सपने में मौजूद है, बल्कि हमारे बीच एक बातचीत भी है। दूसरे शब्दों में, हम हथियार संभाल रहे हैं। इस प्रकार के सपने अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि तलवार मानवता के सबसे पुराने प्रतीकों में से एक है। इसलिए, अधिक जानने के लिए पढ़ते रहें। सपने में तलवार देखना सपने में तलवार देखना यह दर्शाता है कि आपका जीवन कैसा चल रहा है। आपको दुर्भाग्य से अपने जीवन में ज्यादा समर्थन नहीं मिलता है। आपके परिवार के सदस्य उतने मौजूद नहीं हैं जितने वे हो सकते हैं, और आपके पास बहुत से नहीं हैंयदि हमें अन्य लोगों से या स्वयं जीवन से कोई प्रतिरोध नहीं मिलता है, तो संदेह करें। सपना देख रहे हैं कि आप तलवार तेज कर रहे हैं लड़ाई का समय अभी तक नहीं आया है, लेकिन आप बहुत अच्छी तैयारी कर रहे हैं , ताकि जब वह आए, तब तुम्हारी जय हो। यह सपना देखना कि आप अपनी तलवार तेज कर रहे हैं, एक अच्छा शगुन है। आप हर दिन जल्दी उठते हैं, अपने राज्य के कर्तव्यों की मांगों को पूरा करते हैं, आपने अपने जीवन में एक महान क्षण के लिए बहुत कुछ तैयार किया है, एक पदोन्नति, एक बड़ी बैठक या शायद एक परीक्षा। सपने के बारे में हम जो कह सकते हैं वह यह है कि आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि जीत आपकी है, क्योंकि जब युद्ध का समय आएगा, तो आप अपना सर्वश्रेष्ठ करेंगे, जैसा कि कहावत है “खेलने वालों की चिंता के साथ अभ्यास करो; प्रशिक्षण देने वाले व्यक्ति की शांति के साथ खेलें। सपना है कि आप किसी को तलवार तेज करते हुए देखें अगर आपने सपना देखा कि आप किसी को तलवार तेज करते हुए देखते हैं तो बहुत सावधान रहें। क्योंकि कोई आपकी वस्तु लेने की योजना बना रहा है। यह आपकी नौकरी का शीर्षक, आपका व्यवसाय, आपका जीवनसाथी या आपका परिवार भी हो सकता है। जिस तरह से आप अपने जीवन के बारे में बात करते हैं, उस पर भी अधिक ध्यान दें। खूनी तलवार का सपना देखना नी तलवार का सपना देखना आपकी इच्छा को दर्शाता है बदला लेने के लिए। दुर्भाग्य से, आपके लिए किसी ऐसे व्यक्ति को माफ़ करना बहुत मुश्किल है, जिसने किसी तरह से आपको नुकसान पहुँचाया हो। आप इस व्यक्ति के साथ बराबरी करना चाहते हैं और उन्हें भी चोट पहुँचाना चाहते हैं। हालांकि, जीवन ऐसे नहीं चलता है। यह बदला लेने से नहीं है कि जो किया गया था उसे हम मिटा देंगे। वास्तव में, जो कुछ हो चुका है उसे मिटाया नहीं जा सकता। सबसे अच्छा रास्ता क्षमा है, जहां हम जो हुआ उसे भूल जाते हैं और अपने जीवन के साथ आगे बढ़ते हैं। आपकी छाती। टूटी तलवार का सपना देखना टूटी हुई तलवार का सपना देखने का मतलब यह हो सकता है कि आप कुछ लड़ाई हार रहे हैं। यह हो सकता है कि आप एक लत, एक बुरे झुकाव या आपके घर या काम में कुछ हो रहा है। जो आपसे प्यार करते हैं और अपनी सुरक्षा के लिए आप पर भरोसा करते हैं। मजबूत बनो और कुछ और लड़ो। यदि आप किसी लत से जूझ रहे हैं लेकिन ऐसा महसूस करते हैं कि आप इसे प्राप्त करने वाले हैंएक पुनरावर्तन, एक चिकित्सक से बात करना बेहतर है, क्योंकि वह किसी से भी बेहतर जानता होगा कि इस स्थिति में आपकी मदद कैसे की जाए। दबी हुई तलवार का सपना देखना दफन का सपना देखना तलवार इंगित करती है कि आपको अपने आंतरिक जीवन की खेती शुरू करनी चाहिए। आप शायद लगभग कभी अकेले नहीं हैं और सबसे अधिक संभावना है कि आप हर समय व्यस्त रहते हैं। इस सपने का संदेश यह है कि आपको वास्तव में जितना आप कर सकते हैं उससे अधिक चीजों में खुद को व्यस्त रखना बंद कर देना चाहिए और अपने दिन का समय बचाना शुरू कर देना चाहिए। अपने आप को। उस दिन जो कुछ भी हुआ उसके प्रतिबिंब और आत्मसात करने का क्षण। यह अभ्यास हमें इतना सतही नहीं होने में मदद करता है, जिससे हम अपनी रुचियों में गहराई तक जा सकें और खुद को बेहतर जान सकें।

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हरियाली तीज व्रत पूजा कथा, जानें क्यों और कैसे शुरू हुई इस व्रत को रखने की परंपरा

इस दिन मनाई जाएगी हरियाली तीज  हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 18 अगस्त को रात 08 बजकर 01 मिनट पर होगी. वहीं इसका समापन अगले दिन 19 अगस्त को रात 10 बजकर 19 मिनट पर होगा. इसलिए उदया तिथि के अनुसार हरियाली तीज 19 अगस्त को मनाई जाएगी.  सावन महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का व्रत पर्व मनाया जाता है। इस व्रत की कथा में यह रहस्य बताया गया है कि क्यों और कैसे इस व्रत की परंपरा शुरू हुई और किसलिए यह व्रत सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं में खूब प्रचलित है। शिवजी ने देवी पार्वती को जो बताया था हरियाली तीज के बारे में आप भी जानिए। सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का व्रत पर्व मनाया जाता है। हरियाली तीज का त्योहार सुहागन महिलाओं के लिए विशेष महत्वपूर्ण होता है। इस पर्व का संबंध भगवान शिव और देवी पार्वती से है। मान्यता है कि देवी पार्वती की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए थे और इसी दिन ही माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म की कथा भी सुनाई थी। इसलिए इस व्रत का संबंध शिव पार्वती के मिलन से है। आइए जानें हरियाली तीज की पौराणिक कथा में क्या कहा गाय है। हरियाली तीज की पौराणिक कथा हरियाली तीज से जुड़ी एक कथा बहुत प्रचलित है। एक समय की बात है माता पार्वती अपने पूर्वजन्म के बारे में याद करना चहती थीं लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं आ रहा था। ऐसे में भोलेनाथ देवी पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती! तुमने मुझे प्राप्त करने के लिए 107 बार जन्म लिया था लेकिन तुम मुझे पति रूप में न पा सकीं। लेकिन 108वें जन्म में तुमने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया और मुझे वर रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। नारद आए विवाह का प्रस्ताव लेकर भगवान शिव कहते हैं कि हे पार्वती! तुमने अन्न-जल का त्यागकर पत्ते खाए और सर्दी-गर्मी एवं बरसात में हजारों कष्टकर सहकर भी अपने व्रत में लीन रही। तुम्हारे कष्टों को देखकर तुम्हारे पिताजी बहुत दुखी थे, तब नारद मुनि तुम्हारे घर पधारे और कहा कि मुझे भगवान विष्णु ने भेजा है। भगवान विष्णु आपकी कन्या से अत्यंत प्रसन्न हैं और वह उनसे विवाह करना चाहते हैं, मैं भगवान विष्णु का यही संदेश लेकर आपके पास आया हूं। शिव भक्ति में लीन पार्वती हुईं गुम नारदजी के प्रस्ताव को सुनकर पार्वती के पिता खुशी से भगवान विष्णु के साथ विवाह के लिए तैयार हो गए। नारदमुनि ने भी भगवान विष्णु को यह शुभ संदेश सुना दिया। लेकिन जब यह बात पार्वती को पता चली तब वह बहुत दुखी हुईं। पार्वती ने अपने मन की बात अपनी सखी को सुनाई। तब सखी ने माता पार्वती को घने जंगल में छुपा दिया। जब पार्वती के गायब होने की खबर हिमालय को पता चली तब उन्होंने खोजने में धरती-पाताल एक कर दिया लेकिन पार्वती का कहीं पता नहीं चला। क्योंकि देवी पार्वती तो जंगल में एक गुफा के अंदर रेत से शिवलिंग बनाकर शिवजी की पूजा कर रही थी। शिवजी ने बताया पार्वती से विवाह का रहस्य शिवजी ने कहा, हे पार्वती! इस प्रकार तुम्हारी पूजा से मैं बहुत प्रसन्न हुआ और तुम्हारी मनोकामना पूरी की। जब हिमालयराज गुफा में पहुंचे तब तुमने अपने पिता को बताया कि मैंने शिवजी को पतिरूप में चयन कर लिया और उन्होंने मेरी मनोकामना पूरी कर दी है। शिवजी ने मेरा वरण कर लिया है। मैं आपके साथ केवल एक शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह भोलेनाथ से करवाने के लिए तैयार हो जाएं। तब हे पार्वती! तुम्हारे पिताजी मान गए और विधि-विधान सहित हमारा विवाह हुआ। हे पार्वती! तुम्हारे कठोर तप और व्रत से ही हमारा विवाह हो सका। हरियाली तीज की परंपरा ऐसे शुरू हुई भगवान शिव देवी पार्वती से कहते हैं, हे पार्वती! इस हरियाली तीज को जो भी निष्ठा के साथ करेगा, मैं उसको मनोवांधित फल प्रदान करूंगा। उसे तुम जैसा सुहाग मिलेगा। तबसे कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना हेतु यह व्रत रखती है। वहीं सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए इस व्रत को रखती हैं। भव‌िष्य पुराण में देवी पार्वती ने खुद बताया है क‌ि हरियाली तीज का व्रत करने पर महिलाओं को सुहाग और सौभाग्य की प्राप्त‌ि होती है। सावन महीने में तृतीया त‌िथ‌ि के दिन कई वर्षों की कठिन तपस्या के बाद देवी पार्वती ने भगवान श‌िव को पत‌ि रूप में पाने का वरदान प्राप्त क‌िया था इसलिए इस व्रत का बड़ा ही महत्व है। हरियाली तीज का महत्व  हरियाली तीज आमतौर पर नाग पंचमी के दो दिन पूर्व यानी श्रावण मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, यह वह दिन है जब देवी ने शिव की तपस्या में 107 जन्म बिताने के बाद पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इस दिन महिलाएं 16 श्रृंगार करके भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। सुखी वैवाहिक जीवन के साथ ही घर में सुख शांति समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। साथ ही इस दिन हरे रंग के कपड़े पहनने का विशेष महत्व है। इस दिन महिलाओं के बीच झूला झूलने का भी प्रचलन है। साथ ही महिलाएं तीज के गीत गाती हैं। भगवान श्रीराम के 10 प्रमुख मंदिर हरियाली तीज की पूजा विधि हरियाली तीज का व्रत रखने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और साफ- सुथरे कपड़े पहनकर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करना चाहिए. इसके बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इस दिन बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है. चौकी पर प्रतिमा स्थापित करने के बाद माता को श्रृंगार का सामान अर्पित करें.  भगवान शिव, माता पार्वती का आवाह्न करें. माता-पार्वती, शिव जी और उनके साथ गणेश जी की पूजा करें. शिव जी को वस्त्र अर्पित करें. इस दिन हरियाली तीज की कथा सुनना शुभ माना जाता है. 

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