2023

भगवान श्रीराम के 10 प्रमुख मंदिर

1. राम मंदिर, अयोध्या राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म आज से 7128 वर्ष पूर्व अर्थात 5114 ईस्वी पूर्व को उत्तरप्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था। अयोध्या हिन्दुओं के प्राचीन और 7 पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर को रामायण अनुसार ‘मनु’ ने बसाया था। यह हिन्दुओं के लिए मदीना और बेथलहम की तरह है। मध्यकाल में राम जन्मस्थान पर बने भव्य मंदिर को आक्रांता बाबर ने तोड़कर वहां एक मस्जिद स्थापित कर दी जिस पर अभी भी विवाद जारी है। 2. रघुनाथ मंदिर भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के जम्मू शहर में स्थित यह राम मंदिर आकर्षक वास्तुकला का नमूना है। इस मंदिर को 1835 में महाराजा गुलाब सिंह ने बनवाना शुरू किया था और इसका पूर्ण निर्माण महाराजा रणजीतसिंह के काल में हुआ। इस मंदिर में 7 ऐतिहासिक धार्मिक स्‍थल मौजूद है। मंदिर के भीतर की दीवारों पर तीन तरफ से सोने की परत चढ़ी हुई है। इसके अलावा मंदिर के चारों ओर कई मंदिर स्थित है जिनका सम्बन्ध रामायण काल के देवी-देवताओं से हैं। 3. त्रिप्रायर श्रीरामा मंदिर यह मंदिर भारतीय राज्य केरल के दक्षिण-पश्चिमी शहर त्रिप्प्रयार (त्रिप्रायर) में स्थित है। त्रिप्रायर नदी के किनारे स्थित त्रिप्रायर श्रीराम मंदिर कोडुन्गल्लुर का प्रमुख धार्मिक स्थान है। यह त्रिप्रायर में स्थित है, जो कोडुन्गल्लुर शहर से लगभग 15 किलोमीटर और त्रिशूर से 25 किलोमीटर दूर स्थित है। भगवान विष्णु के 7वें अवतार भगवान श्रीराम की इस मंदिर में पूजा की जाती है। इस मंदिर के बारे में कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित मूर्ति यहां के स्थानीय मुखिया को समुद्र तट पर मिली थी। इस मूर्ति में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव के तत्व हैं अत: इसकी पूजा त्रिमूर्ति के रूप में की जाती है। 4. श्रीसीतारामचंद्र स्वामी मंदिर (भद्राचलम) भगवान राम का यह मंदिर आंध्रप्रदेश के खम्मण जिले के भद्राचलम शहर में स्थित है। भद्राचलम की एक विशेषता यह भी है कि यह वनवासी बहुल क्षेत्र है और राम वनवासियों के पूज्य हैं। कथाओं के अनुसार भगवान राम जब लंका से सीता को बचाने के लिए गए थे, तब गोदावरी नदी को पार कर इस स्थान पर रुके थे। मंदिर गोदावरी नदी के किनारे ठीक उसी जगह पर बनाया गया है, जहां से राम ने नदी को पार किया था। जानिए, रामायण हमारे शरीर में हर समय होती है घट 5. श्रीतिरुनारायण स्वामी मंदिर, मेलकोट, कर्नाटक मेलकोट या मेलुकोट कर्नाटक के मांड्या जिला तहसील पांडवपुरा का एक छोटा-सा कस्बा है, जो कावेरी नदी के तट पर बसा है। इस स्थान को तिरुनारायणपुरम भी कहते हैं। यह एक छोटी-सी पहाड़ी है जिसे यदुगिरि कहते हैं। यदुगिरि पहाड़ी पर दो मंदिर स्थित है। एक मंदिर भगवान नृसिंह का जो पहाड़ी के रास्ते में पहले पड़ता है और दूसरा चेलुवा नारायण का मंदिर जो पहाड़ी के सबसे उपर स्थित है। यह स्थान मैसूर से 51 किलोमीटर और बेंगलुरु से 133 किलोमीटर किलोमीटर दूर है। 6. हरिहरनाथ मंदिर (सोनपुर) भगवान विष्णु को समर्पित हरिहरनाथ मंदिर का निर्माण भगवान राम ने त्रेतायुग में करवाया था। माना जाता है कि श्रीराम ने यह मंदिर तब बनवाया था, जब वे सीता स्वयंवर में जा रहे थे। सारण और वैशाली जिले की सीमा पर गंगा और गंडक नदी के संगम पर स्थित इस मंदिर का निर्माण राजा मानसिंह ने करवाया। वर्तमान में जो मंदिर है, उसका जीर्णोद्धार तत्कालीन राजा राम नारायण ने करवाया था। 7. थिरुवंगड श्रीरामस्वामी मंदिर, जिला कन्नूर, थालास्सेरी (केरल) केरल के कण्णूर जिले में स्थित थालास्‍सेरी में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया एक प्रसिद्ध किला है। यहां से कुछ दूर ही प्रसिद्ध राम मंदिर है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 2,000 वर्ष पूर्व हुआ था। इससे पहले इस स्थान पर भगवान परशुराम ने एक विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया था। इस स्थान का संबंध अगस्त्य मुनि से भी है। थालास्‍सेरी के सबसे नजदीक स्थित हवाई अड्डा कालीकट इंटरनेशनल एयरपोर्ट 93 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कन्नूर केरल के उत्तरी सिरे में स्थित एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत तटवर्ती नगर है। 8. रामभद्रस्वामी मंदिर, तिरुविल्वमल जिला त्रिसूर (केरल) यहां स्थित रामभद्रस्वामी का मंदिर विश्वप्रसिद्ध है। दूर-दूर से लोग इस मंदिर की भव्यता देखने आते हैं। त्रिसूर से 85‍ किलोमीटर दूर कोच्चि का एयरपोर्ट है। हालांकि त्रिसूर नगर में रेलवे स्टेशन है, जो देश के सभी बड़े स्टेशनों से कनेक्टेड है। त्रिसूर के 47 किलोमीटर दूर स्थित थिरुविल्वमाला 9. चित्रकूट का राम मंदिर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं- वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि। चित्रकूट में राम अनुसूया के आश्रम में कई महीनों तक रहे थे।  10. मध्यप्रदेश का रामवन अत्रि-आश्रम से भगवान श्रीराम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ है। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सुतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।

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जानिए, रामायण हमारे शरीर में हर समय होती है घटित

जानिए, रामायण हमारे शरीर में हर समय होती है घटित राम नवमी का पर्व भारत में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। रामनवमी के दिन ही चैत्र नवरात्र की समाप्ति भी हो जाती है। हिंदु धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था अत: इस शुभ तिथि को भक्त लोग रामनवमी के रूप में मनाते हैं एवं पवित्र नदियों में स्नान करके पुण्य के भागीदार होते है। आइये अब जानते है श्री राम और रामायण का सार जो हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करता है  राम नवमी, भगवान श्री राम के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। हर्ष एवं उल्लास के इस पर्व के मनाए जाने का उद्देश्य है – हमारे भीतर “ज्ञान के प्रकाश का उदय”। भगवान राम का जन्म राजा दशरथ और रानी कौशल्या के यहाँ चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में हुआ था। भगवान राम का अर्थ क्या है ?  राम का अर्थ है, स्वयं का प्रकाश; स्वयं के भीतर ज्योति। “रवि” शब्द का अर्थ “राम” शब्द का पर्यायवाची है। रवि शब्द में ‘र’ का अर्थ है, प्रकाश और “वि” का अर्थ है, विशेष। इसका अर्थ है, हमारे भीतर का शाश्वत प्रकाश। हमारे ह्रदय का प्रकाश ही राम है। इस प्रकार हमारी आत्मा का प्रकाश ही राम है। क्यों मनाया जाता है रक्षाबंधन का त्योहार? जानें इससे जुड़ी कहानियां रामायण का सार इस कहानी का सार है: हमारा शरीर अयोध्या है, पांच इन्द्रियां और पांच कर्मेन्द्रियाँ इस के राजा हैं। कौशल्या, इस शरीर की रानी है। सभी इन्द्रियां ब्राह्य मुखी हैं और बहुत कुशलता से इन्हें भीतर लाया जा सकता है और ये तभी हो सकता हैं जब भगवन राम, प्रकाश हम में जन्म लें। भगवान राम का जन्म नवमी के दिन हुआ था (हिन्दू पंचांग के अनुसार नौवां दिन)। मैं इनके महत्व के बारे में किसी और समय बताऊंगा। जब मन (सीता) अहंकार (रावण) के द्वारा अपहृत हो जाता है, तो दिव्य प्रकाश और सजगता (लक्षमण) के माध्यम भगवन हनुमान (प्राण के प्रतीक) के कंधो पर चढ़कर उसे घर वापस लाया जा सकता है। ये रामायण हमारे शरीर में हर समय घटित होती रहती है।

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नारी गहने क्यों पहनती है? गहनों का महत्व

हिन्दू महिलाओं के लिए गहनों का विशेष महत्व है। हर एक गहने का अपना अलग महत्व है। क्या आप जानते है की नारी गहने क्यों पहनती है ? और उनका क्या महत्व है ? यहां जानिए इन गहनों से जुड़ा रोचक प्रसंग जो हमे प्रत्येक गहने का महत्व बताते है। भगवान राम ने धनुष तोड दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, ‘‘माताश्री इतना श्रृंगार क्यों ?’’‘‘बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है?’’ उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था। ‘‘अर्थात?’’ सीताजी ने पुनः पूछा, ‘‘इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध?’’‘‘बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।’’ ‘‘और मेहंदी का अर्थ?’’मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।’’ ‘‘और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?’’‘‘बेटी! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।’ ‘‘बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री?’’‘‘बिंदि का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।’’ ‘‘यह नथ क्यों?’’‘‘नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’’ ‘और यह टीका?’’‘‘पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।’’ ‘‘और यह बंदनी क्यों?’’‘‘बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।’’ ‘‘पत्ती का अर्थ?’’‘‘पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।’’ ‘‘कर्णफूल क्यों?’’‘‘हे सीते! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।’’ ‘और इस हंसली से क्या तात्पर्य है?’’‘‘हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’ ‘‘मोहनलता क्यों?’’‘‘मोहनमाला का अर्थ है कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।’’ ‘‘नौलखा हार और बाकी गहनों का अर्थ भी बता दो माताश्री?’’‘‘पुत्री नौलखा हार का अर्थ है कि पति से सदा हार स्वीकारना सीखना होगा, कडे का अर्थ है कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा, बांक का अर्थ है कि हमेशा सीधा-सादा जीवन व्यतीत करना होगा, छल्ले का अर्थ है कि अब किसी से छल नहीं करना, पायल का अर्थ है कि बूढी बडियों के पैर दबाना, उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और अंगूठी का अर्थ है कि हमेशा छोटों को आशीर्वाद देते रहना।’’ ‘‘माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रृंगार है?’’‘‘बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।’’ ‘हे राम!’’ कहते हुए सीताजी मुस्करा दी। शायद इसलिए कि शादी के बाद पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी, क्योंकि अर्धांग्नी होने से कोई स्वयं अपना नाम लेगा तो लोग क्या कहेंगे…। रक्षाबंधन की पौराणिक कथा । रक्षाबंधन की कहानी कीचक वध कथा

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कीचक वध कथा

द्रौपदी के साथ पाण्डव वनवास के अंतिम वर्ष अज्ञातवास के समय में वेश तथा नाम बदलकर राजा विराट के यहां रहते थे। उस समय द्रौपदी ने अपना नाम सैरंध्री रख लिया था और विराट नरेश की रानी सुदेष्णा की दासी बनकर वे किसी प्रकार समय व्यतीत कर रही थीं। शास्त्रों में कहा गया है की परस्त्री में आसक्ति मृत्यु का कारण होती है। राजा विराट का प्रधान सेनापति कीचक सुदेष्णा का भाई था। एक तो वह राजा का साला था, दूसरे सेना उसके अधिकार में थी, तीसरे वह स्वयं प्रख्यात बलवान था और उसके समान ही बलवान उसके एक सौ पांच भाई उसका अनुगमन करते थे। इन सब कारणों के कीचक निरंकुश तथा मदांध हो गया था। वह सदा मनमानी करता था। राजा विराट का भी उसे कोई भय या संकोच नहीं था। उल्टे राजा ही उससे दबे रहते थे और उसके अनुचित व्यवहारों पर भी कुछ कहने का साहस नहीं करते थे। दुरात्मा कीचक अपनी बहन रानी सुदेष्णा के भवन में एक बार किसी कार्यवश गया। वहां अपूर्व लावण्यवती दासी सैरंध्री को देखकर उस पर आसक्त हो गया। कीचक ने नाना प्रकार के प्रलोभन सैरंध्री को दिए। सैरंध्री ने उसे समझाया, “मैं पतिव्रता हूं, अपने पति के अतिरिक्त किसी पुरुष की कभी कामना नहीं करती। तुम अपना पाप-पूर्ण विचार त्याग दो। लेकिन कामांध कीचक ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। उसने अपनी बहन सुदेष्णा को भी तैयार कर लिया कि वे सैरंध्री को उसके भवन में भेजेंगी। रानी सुदेष्णा ने सैरंध्री के अस्वीकार करने पर भी अधिकार प्रकट करते हुए डांटकर उसे कीचक के भवन में जाकर वहां से अपने लिए कुछ सामग्री लाने को भेजा। सैरंध्री जब कीचक के भवन में पहुंची, तब वह दुष्ट उसके साथ बल प्रयोग करने पर उतारू हो गया। उसे धक्का देकर वह भागी और राजसभा में पहुंची। परंतु कीचक ने वहां पहुंचकर राजा विराट के सामने ही उसके केश पकड़कर भूमि पर पटक दिया और पैर की एक ठोकर लगा दी। राजा विराट कुछ भी बोलने का साहस न कर सके। रक्षाबंधन की पौराणिक कथा । रक्षाबंधन की कहानी द्रौपदी पर जब कीचक ने डाली गलत नजर कीचक विराटनगर का सेनापति और महारानी सुदेशना का भाई था. कीचक के बारे में कहा जाता था कि वह अहंकारी और दुष्ट था. वह बहुत जिद्दी भी था. एक बार कीचक अपनी बहन सुदेशना से मिलने उसके महल में आया तो उसकी नजर द्रौपदी पर पड़ गई है. द्रोपदी को देखकर कीचक मोहित हो गया और द्रौपदी को पाने की कामना करने लगा. कीचक ने अपनी बहन सुदेशना को द्रोपदी को उसके पास भेजने को कहा. रानी की आज्ञा से द्रोपदी कीचक के पास जाती हैं. कीचक द्रोपदी पर गलत नजर डालता है. द्रोपदी इसका विरोध करती हैं और उसे गंभीर परिणाम भुगतने के लिए कहती हैं. इससे कीचक समझ जाता है कि ये कोई मामूली दासी नहीं है. कीचक को शक होता है. दुर्योधन और शकुनि से कीचत की मुलाकात  इसी दौरान शकुनि के साथ दुर्योधन आता है और राजा विराट से मिलता है और कहता है कि उसे ज्ञात हुआ कि पांडव विराट राज्य में शरण लिए हुए हैं. राजा इस बात से इंकार करते हैं. लेकिन इन बातों को कीचक सुन लेता है और वह समझ जाता है कि दासी ही द्रोपदी है. कीचक इस बात की जानकारी दुर्योधन को दे देता है. कीचक वध की पांडवों ने योजना बनाई  कीचक एक बार फिर द्रौपदी के पास जाता है और कहता है कि उसे असलियत का पता चल चुका है. इस बात से द्रौपदी हैरान रह जाती हैं. कीचक द्रौपदी को रात में अपने कक्ष में आने के लिए कहता है, उसकी आज्ञा न मानने पर वह राज खोलने की धमकी देता है. इस बात की जानकारी द्रौपदी सभी पांडवों को देती हैं. पांडवों को बहुत क्रोध आता है. तब अर्जुन बताते हैं कि कीचक के मन में राजा बनने की इच्छा है. तब पांडव कीचक वध करने की एक योजना बनाते हैं.

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रक्षाबंधन की पौराणिक कथा । रक्षाबंधन की कहानी

रक्षाबंधन के त्योहार को भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन बहन अपने भाई को रक्षा का सूत्र बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन लेता है। राखी के पर्व के लिए कुछ पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं जिनमें इस बात का जिक्र है कि कैसे माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर भगवान विष्णु को उनसे मांगा था। रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर बलि राजा के अभिमान को इसी दिन चकानाचूर किया था। इसलिए यह त्योहार ‘बलेव’ नाम से भी प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र राज्य में नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से यह त्योहार विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं। रक्षाबंधन के संबंध में एक अन्य पौराणिक कथा भी प्रसिद्ध है। देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इंद्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। तभी से राखी बाँधने की प्रथा शुरू हुई। दूसरी मान्यता के अनुसार ऋषि-मुनियों के उपदेश की पूर्णाहुति इसी दिन होती थी। वे राजाओं के हाथों में रक्षासूत्र बाँधते थे। इसलिए आज भी इस दिन ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बाँधते हैं। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाई को प्यार से राखी बाँधती है और उसके लिए अनेक शुभकामनाएँ करती है। भाई अपनी बहन को यथाशक्ति उपहार देता है। बीते हुए बचपन की झूमती हुई याद भाई-बहन की आँखों के सामने नाचने लगती है। सचमुच, रक्षाबंधन का त्योहार हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता है। राखी के इन धागों ने अनेक कुरबानियाँ कराई हैं। चित्तौड़ की राजमाता कर्मवती ने मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर अपना भाई बनाया था और वह भी संकट के समय बहन कर्मवती की रक्षा के लिए चित्तौड़ आ पहुँचा था। आजकल तो बहन भाई को राखी बाँध देती है और भाई बहन को कुछ उपहार देकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेता है। लोग इस बात को भूल गए हैं कि राखी के धागों का संबंध मन की पवित्र भावनाओं से हैं। राजा बलि से जुड़ी रक्षा बंधन की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में जब राजा बलि अश्वमेध यज्ञ करा रहे थे। उस समय भगवान विष्णु ने राजा बलि को छलने के लिए वामन अवतार लिया और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी। उस समय राजा बलि ने सोचा कि यह ब्राह्मण तीन पग में भला कितनी जमीन नापेगा और उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। देखते ही देखते वामन रुप धारण किए हुए विष्णु जी का आकार बढ़ने लगा और उन्होंने दो पग में ही सब नाप लिया। उस समय तीसरे पग में राजा बलि ने स्वयं को ही सौंप दिया और विष्णु जी ने राजा बलि को पाताल लोक दे दिया। उस समय बलि ने भगवान विष्णु से एक वचन मांगा कि वो जब भी देखें तो सिर्फ विष्णु जी को ही देखें और विष्णु जी ने तथास्तु कहकर वचन को पूर्ण कर दिया। अपने वचन के अनुसार भगवान ने तथास्तु कह दिया और पाताल लोक में रहने लगे। इस पर माता लक्ष्मी जी को अपने स्वामी विष्णु जी की चिंता होने लगी। उसी समय लक्ष्मी जी को देवर्षि ने एक सुझाव दिया जिसमें उन्होंने कहा कि वो बलि को अपना भाई बना लें और अपने स्वामी को वापस ले आएं। उसके बाद माता लक्ष्मी स्त्री का भेष धारण करके रोटी हुई पाताल लोक पहुंचीं। श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी रक्षाबंधन की कथा एक अन्य कथा के अनुसार श्री कृष्ण ने महाभारत में द्रौपदी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और इसकी कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने जब अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तब उनकी कनिष्ठा ऊंगली कट गई जिससे भगवान कृष्ण की उंगली से रक्त की धार बहने लगी। उस समय द्रोपदी ने अपने साड़ी के चीर के एक टुकड़े को श्रीकृष्ण की ऊंगली पर बांध दिया। इसके बाद से ही श्री कृष्ण ने द्रौपदी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और हर संकट की परिस्थिति में उनकी रक्षा करने का वचन दिया। उसी वचन की वजह से भरी सभा में श्री कृष्ण ने द्रौपदी को दुर्योधन के द्वारा चीर हरण होने से बचाया था।

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क्यों मनाया जाता है रक्षाबंधन का त्योहार? जानें इससे जुड़ी कहानियां

भारतीय संस्कृति में रक्षाबंधन पर्व का खास महत्व है. इस दिन भाई अपनी बहनों के हाथों में राखी बांधती है और भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन देता है.धार्मिक ग्रंथों में रक्षाबंधन को लेकर कई प्रकार की पौराणिक कथाओं के बारे में बताया गया है.आइए जानें इसकी शुरुआत कैसे हुई और इससे जुड़ी कौन सी कहानियां प्रचलित हैं. भाई बहन के प्यार का पर्व रक्षाबंधन सावन महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. इस पर्व पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उनसे अपनी रक्षा का वचन लेती हैं. रक्षाबंधन (Raksha Bandhan) का ये पवित्र त्योहार क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे दो कथाएं प्रचलित हैं. काशी के विद्वान स्वामी कन्हैया महराज ने बताया कि भाई बहन के प्यार के इस पर्व का सीधा कनेक्शन द्वापर युग से है. रक्षाबंधन पर रहेगी भद्रा जानें 30 या 31 अगस्त राखी बांधना कब रहेगा शुभ कथाओं के अनुसार, शिशुपाल के युद्ध के समय भगवान श्री कृष्ण की तर्जनी उंगली कट जाने के कारण उनके हाथ से जब खून गिरने लगा तो द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनके हाथ पर बांध दिया था. इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को उनकी रक्षा का वचन दिया था. इसी वचन के तहत द्रौपदी के चीरहरण के वक्त भगवान श्री कृष्ण ने उनकी रक्षा की. तब से इस त्योहार को मनाया जा रहा है. कृष्ण और द्रौपदी त्रेता युग में महाभारत की लड़ाई से पहले श्री कृष्ण ने राजा शिशुपाल के खिलाफ सुदर्शन चक्र उठाया था, उसी दौरान उनके हाथ में चोट लग गई और खून बहने लगा तभी द्रौपदी ने भगवान श्री कृष्ण की उंगली में अपनी साड़ी से टुकड़ा फाड़ कर बांधी थी, बदले में श्री कृष्ण ने द्रोपदी को भविष्य में आने वाली हर मुसीबत में रक्षा करने की कसम दी थी. उसी चीर बांधने के कारण कृष्ण ने चीर हरण के समय द्रौपदी की रक्षा की इसलिए रक्षाबंधन का त्योहार बनाया जाता है. भगवान इंद्र से जुड़ी है ये कथा रक्षाबंधन को मनाए जाने के पीछे एक और कहानी देवताओं के राजा इंद्र और असुरों के राजा बलि से जुड़ी है. भविष्य पुराण के मुताबिक, असुरों के राजा बलि ने जब देवताओं पर हमला किया तो इससे इंद्र की पत्नी सची काफी व्याकुल हो गईं थीं. इस युद्ध में देवताओं की जीत के लिए तब सची ने भगवान विष्णु से मदद मांगी तो उन्होंने सची को एक धागा दिया और कहा कि इसे अपने पति की कलाई पर बांधे जिससे उनकी जीत होगी. सची ने ऐसा ही किया तो उस युद्ध में इंद्र की जीत हुई थी. यही वजह है कि पुराने समय में युद्ध में जाने से पहले बहनें और पत्नियां अपने भाइयों और पति को रक्षा सूत्र बांधती हैं. बहनें लेती हैं भाइयों से रक्षा का वचन रक्षाबंधन के त्योहार पर बहनें अपने भाइयों की लम्बी आयु की कामना के साथ उनके कुशल स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करती हैं. इसके साथ ही भाई अपनी बहन को आजीवन रक्षा का वचन भी देता है.

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पाप का फल कब मिलता है 

इस संसार में सब कुछ अंतवंत है। पाप और पुण्य दोनों इस संसार से संबंधित हैं, इसलिए पाप और पुण्य भी अंतवंत हैं। पुण्य सुख देकर और पाप दुख देकर अंत को प्राप्त होता है। लेकिन पाप और पुण्य में थोड़ा अंतर यह है कि पुण्य का फल यदि हम नहीं चाहते तो उस फल को अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए जो भी हम सत्कर्म करते हैं, अंत में प्रभु को समर्पित कर देते हैं लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या भगवान स्वीकार करेंगे? निश्चित स्वीकार करेंगे क्योंकि भगवान ने स्वयं गीता में अर्जुन से कहा है, हे कुंतीपुत्र! तुम जो भी करते हो, जो भी खाते हो, पवित्र यज्ञाग्नि में जो आहुति डालते हो, जो भी दान देते हो, जो भी तपस्या करते हो, वह सब मुझे अर्पित करते हुए करो। इसलिए जो भी कर्म करें, भगवान को समर्पित करने के भाव से करें। हम संकल्प भी करते हैं तो प्रारंभ में तीन बार विष्णु कहते हैं। इसका अर्थ है कि मैं जो भी कर्म करता हूं उसमें विष्णु यानी व्यापक चेतना है। उसमें समष्टि के कल्याण की बात है। इस प्रकार हम जो भी पुण्य कर्म करेंगे ईश्वर को साथ रखकर समष्टि के कल्याण की भावना से करेंगे और उसे ईश्वर को समर्पित भी कर देंगे ताकि उस पुण्य का भी अभिमान न हो।  पाप का फल कब मिलता है पाप का फल कब मिलता है यह जानने के लिये कुछ लोग लालायित रहते है। आखिर क्यों लोग पाप को अपराध समझते है जब कि पाप भी पुण्य की तरह ही एक कर्म है लेकिन लोग पुण्य को ही महत्व देते है। उसका कारण यह है कि पाप छिपकर धोखा देकर किया जाता है दूसरे पाप में दूसरे को कष्ट होता है। पुण्य को लोग खुल कर करते है ओर खूब करते है क्योंकि इस से दूसरों को सुख मिलता है । कुछ लोगो को दूसरों को कष्ट देकर भी सुख मिलता है आखिर ऐसा क्यो। यह अपनी अपनी समझ पर निर्भर करता है क्यो की जिसको जो चाहिये उसका सुख उसी में है चाहे वो पाप करे या पुण्य। रक्षाबंधन पर रहेगी भद्रा जानें 30 या 31 अगस्त राखी बांधना कब रहेगा शुभ पाप का फल कब मिलता है पाप का फल इंसान को तब मिलता है जब उसके सारे पुण्य कर्म नष्ट हो जाते है। यह आसान सा जवाब है परंतु बिल्कुल सही है ओर शास्त्र सम्बत है । हमारे ऋषियों ने इसके बारे में अपने शास्त्रों में खूब वर्णन किया है। लेकिन क्या आज के युग मे भी हम इसको सही मान सकते है।  मुझे तो लगता है यह बिल्कुल सही है क्योंकि लोगो को कहते सुना होगा कि वह पापी है फिर भी भगवान उसका कुछ नही कर रहे है आखिर क्यों। जवाब यही है कि उसके पुण्य अभी वाकि है जब उसके पुण्य समाप्त होंगे तो उसको दंड अवस्य ऊपर वाला देगा। बस जरूरत है तो सब्र की। जिसको सहने के लिये हिम्मत चाहिये। 

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भाई दूज की कथा

भैयादूज के साथ ही होती है चित्रगुप्त पूजा दीपावली के दूसरे दिन भाई दूज मनाया जाता है। इसे यम द्वीतिया भी कहते हैं। इस दिन बहनें भाई के मस्तक पर टीका लगाकर उसकी लंबी उम्र की मनोकामना करती है। माना जाता है इस दिन भाई के मस्तक पर टीका लगाने झसे भाई यमराज के कष्ट से बच जाता है। कहा जाता है इस दिन भाई अपनी बहन को यमुना स्नान कराएं। इसके बाद भाई को बहन तिलक करें और भोजन कराये। जो भाई बहन यम द्वीतिया के दिन इस प्रकार दूज पूजन के बाद तिलक की रस्म पूरी करने के बाद भोजन करते हैं वे यम भय से मुक्त जो जाते हैं, उन्हें मृत्यु के पश्चात स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। भैया दूज की एक पौराणिक कथा है। इस दिन यमराज की बहन यमुनाजी ने अपने उन्हें तिलक करके भोजन कराया था इसलिए इस दिन को यम द्वीतिया भी कहा जाता है। भगवान सूर्यदेव की पत्नी का नाम छाया है। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से बड़ा स्नेह करती हैं। वह उनसे बराबर निवेदन करतीं कि वह उनके घर आकर भोजन करें, लेकिन यमराज अपने काम में व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात टाल जाते थे। कार्तिक शुक्ल द्वीतिया को यमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन करने के लिए बुलाया। बहन के घर जाते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। भाई को देखते ही यमुना ने हर्षविभोर होकर भाई का स्वागत सत्कार किया तथा भोजन करवाया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन झसे वर मांगने को कहा। बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाये, उसे आपका भय न रहे। यमराज तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वसत्राभूषण देकर यमपुरी चले गये। ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इस दिन बहन दूज बनाकर भाई को हल्दी, अक्षत रोली का तिलक करे। तिलक करने के बाद भाई को फल, मिठाई खाने के लिए दे। भाई भी अक्षत रोली का तिलक करे। भाई भी बहन को स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण तथा द्रव्य देकर प्रसन्न करे। बहन के चरण स्पर्श कर आशीष ले। बहन चाहे छोटी या आयु में बड़ी हो उसके चरण स्पर्श अवश्य करें। भैया दूज के ही दिन चित्रगुप्त पूजा भी होती है। भगवान चित्रगुप्त स्वर्ग और नरक लोक का लेखा-जोखा रखते हैं। इस पूजा को कलम दवात पूजा भी कहा जाता है। चित्रवंशियों के लिये यह पूजा अति महत्वपूर्ण होती है। इस दिन लगभग सभी चित्रवंशी अपनी कलम की पूजा करते हैं। भाईदूज का धार्मिक महत्व धर्म ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमुना ने अपने भाई यम को आदर-सत्कार स्वरूप वरदान प्राप्त किया था, जिस वजह से भाईदूज को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल यमराज के वर अनुसार जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करके, यम का पूजन करेगा, मृत्यु के पश्चात उसे यमलोक में नहीं जाना पड़ेगा। वहीं सूर्य की पुत्री यमुना समस्त कष्टों का निवारण करने वाली देवी स्वरूपा मानी गई हैं। इस कारण यम द्वितीया के दिन यमुना नदी में स्नान करने और यमुना व यमराज की पूजा करने का विशेष महत्व है। इस दिन बहन अपने भाई को तिलक कर उसकी लंबी उम्र के लिए हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना भी करती हैं। पुराणों के अनुसार, इस दिन की गई पूजा से यमराज प्रसन्न होकर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। यमुना ने मांगा था वरदान यमुना ने स्नान के बाद पूजन करके, स्वादिष्ट व्यंजन परोसकर यमराज को भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए इस आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया। फिर यमुना ने कहा कि, ‘हे भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो और मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर-सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे।’ यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की ओर प्रस्थान किया। तभी से इस दिन से ये पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है। इसी कारण ऐसी मान्यता है कि भाईदूज के दिन यमराज तथा यमुना का पूजन भी अवश्य करना चाहिए।

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रक्षाबंधन पर रहेगी भद्रा जानें 30 या 31 अगस्त राखी बांधना कब रहेगा शुभ

इस साल रक्षाबंधन पर भद्रा होने की वजह से इसकी डेट को लेकर लोगों में कंफ्यूजन है. 30 या 31 अगस्त रक्षाबंधन का त्योहार किस दिन मनाया सही होगा, आइए जानते हैं सही मुहूर्त और डेट हर साल सावन पूर्णिमा पर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है, इस साल रक्षाबंधन पर भद्रा का साया है. जानकारों के अनुसार इस बार राखी का पर्व 30 और 31 अगस्त 2023 दोनों दिन मनाया जा सकेगा. रक्षाबंधन का पर्व हमेशा ही भद्रा रहित काल में मनाया जाता है, साथ ही शुभ मुहूर्त देखकर ही भाई की कलाई पर राखी बांधी जाती है. 30 अगस्त 2023 को भद्रा रात 09.02 मिनट तक रहेगी. इसके बाद ही राखी बांध सकते हैं. पंचांग अनुसार 30 अगस्त को राखी बांधने के लिए रात 09.03 के बाद का समय शुभ है. शास्त्रों के अनुसार राखी बांधने के लिए दोपहर का मुहूर्त सबसे अच्छा माना, ऐसे में जो लोग रात में राखी नहीं बांधते वह अगले दिन 31 अगस्त 2023 को सुबह 07.05 मिनट से पहले तक राखी बांध सकते हैं, क्योंकि पूर्णिमा तिथि इस दिन सुबह इसी समय समाप्त हो जाएगी. खास बात ये है कि 31 अगस्त को भद्रा का साया भी नहीं रहेगा. रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है.ये रिश्ता बहुत पवित्र धागे से बंधा होता है. ऐसे में भाई के लिए राखी लेते समय कुछ विशेष बातों का जरुर ध्यान रखें. जैसे कि राखी का धागा काला न हो. इस पर कोई अशुभ चिन्ह नहीं बना होना चाहिए. राखी खरीदते समय ये भी ध्यान रखें कि इस पर देवी-देवता की तस्वीर न बनी हो. रोजाना के कामों में हम पवित्रता का ध्यान नहीं रख पाते, ऐसे में इस तरह की राखी बांधने से भगवान का अपमान होता है. रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त इस साल शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 30 अगस्त को सुबह 10 बजकर 58 मिनट पर प्रारंभ हो रही है। पूर्णिमा तिथि का समापन 31 अगस्त को सुबह 7 बजकर 5 मिनट पर होगा। ऐसे में रक्षाबंधन का त्योहार 30 अगस्त को ही मनाया जाएगा। हालांकि, इस दिन भद्रा लगने के कारण आपको मुहूर्त का खास ख्याल रखना होगा। आगे बढ़ने से पहले बता दें कि पंजाब सहित कुछ क्षेत्रों में जहां उदया तिथि की मान्यता है वहां 31 तारीख को सुबह 7 बजकर 5 मिनट से पहले रक्षाबंधन का पर्व मना लेना अत्यंत फलदायी रहेगा। राखी बांधने का मुहूर्त भद्रा 30 अगस्त को रात के समय 9 बजकर 1 मिनट पर समाप्त होगी। शास्त्रों में ऐसा विधान है की भद्रा स्थिति में भद्रा मुख का त्याग करके भद्रा पूंछ जब हो उस समय शुभ कार्य जैसे रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा सकता है। इस बार भद्रा पूंछ शाम में 5 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। आप चाहें तो इस समय रक्षाबंधन का पर्व मना सकते हैं। इसमें आपको भद्रा का दोष नहीं लगेगा। ख्याल रखें की भद्रा मुख के दौरान आपको राखी नहीं बांधनी है। 30 अगस्त 2023 को भद्रा पूंछ का समय में 5 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 31 मिनट तक30 अगस्त 2023 को भद्रा मुख का समय शाम में 6 बजकर 31 मिनट से 8 बजकर 11 मिनट तक। इस समय बांधे राखी30 अगस्त को भद्र रात में 9 बजकर 1 मिनट तक होने के कारण आप चौघड़िया मुहूर्त में भी राखी बांध सकते हैं।

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 यम द्वितीया भाई दूज कथा, पूजा विधि व महत्व

भाई दूज या यम द्वितीया त्यौहार की कथा सूर्य देव की पत्नी का नाम संज्ञा हैं। उससे उन्हें यमराज रूप में सबसे बड़े पुत्र व यमुना रूप में सबसे बड़ी पुत्री प्राप्त हुई। यमराज मृत्यु के देवता बने जबकि यमुना धरती पर एक नदी के रूप में रहने लगी। दोनों भाई-बहन में बहुत लगाव था लेकिन यमराज अपने कार्यो में इतना व्यस्त रहते थे कि उन्हें अपनी बहन से मिलने का अवसर ही नही मिल पाता था। एक दिन अपनी बहन के बार-बार आग्रह करने पर यमराज अपने कार्य में से समय निकाल कर यमुना के घर चले गए। अपने भाई यमराज को आया देखकर यमुना माता बहुत प्रसन्न हुई और उसने उनकी बहुत आवाभगत की। माता यमुना ने यमराज के माथे पर रोली चंदन से तिलक किया तथा उनके सुखद भविष्य की कामना की। इसके बाद माता यमुना ने उन्हें कई प्रकार के पकवान बनाकर खिलाए। अपनी बहन के द्वारा इतनी आवाभगत होने पर यमराज अत्यधिक प्रसन्न हो गए तथा यमुना से एक वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने यह वर मांग लिया कि आज के दिन वे हमेशा अपनी बहन के घर आयेंगे व उनका आतिथ्य स्वीकार करेंगे। यमराज ने अपनी बहन को यह वर दे दिया और वहां से चले गए। भाई दूज क्यों मनाया जाता हैं? अब बात आती हैं कि हम आज तक इस पर्व को क्यों मनाते हैं व यह पर्व रक्षाबंधन की तरह भाई-बहन के बीच इतना लोकप्रिय क्यों है? दरअसल यमराज ने अपनी बहन यमुना को वर देने के साथ-साथ यह भी कहा था कि पृथ्वी पर जो भाई अपनी व्यस्तता से समय निकाल कर आज के दिन अपनी बहन के घर जाएगा तो उसे अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलेगी। इसी के साथ उन्होंने यह भी वरदान दिया कि यदि इस दिन भाई-बहन यमुना नदी में डुबकी लगाएंगे तो वे यमराज के प्रकोप से बच पाएंगे। तब से इस पर्व की महत्ता बहुत बढ़ गयी व इसे सभी भाई-बहन के बीच मनाया जाने लगा। मध्य प्रदेश के रहस्यमयी मंदिर कहीं पानी से जलता है दीपक, कहीं ट्रेन रुककर करती है प्रणाम भाई दूज की पूजा विधि इस दिन सभी भाई अपनी बहन के घर जाते है। वैसे तो यह त्यौहार विवाहिता बहनों का अपने भाई के साथ मनाया जाता है लेकिन अविवाहित बहने भी इसे मना सकती है। इसलिये यदि आपकी बहन का विवाह हो चुका हैं तो इस दिन आप अपनी बहन के घर जाए। बहने अपने भाई के स्वागत के लिए पूजा की थाली तैयार करे व उसमे सभी आवश्यक वस्तुएं रखे। जब भाई आपके घर आए तब उनका रोली-चंदन से तिलक करे और उनकी लंबी आयु व सुखद स्वास्थ्य की कामना करे। भाई को कुछ मीठा खिलाए व उनका आशीर्वाद प्राप्त करे। बदले में भाई भी अपनी बहन की रक्षा का वचन दे तथा जीवन में उसे कोई भी कष्ट आने पर उसकी सहायता करने को तैयार रहे। अपनी बहन को आशीर्वाद देकर उसे शगुन रूप में कुछ पैसे या उपहार भी अवश्य दे। इसके बाद दोनों भाई-बहन मिलकर स्वादिष्ट पकवानों का आनंद ले। यही बात माँ को आकर बताई तो वह बावड़ी सी हो कर भाई के पीछे भागी। रास्ते भर लोगों से पूछती की किसी ने मेरा गैल बाटोई देखा, किसी ने मेरा बावड़ा सा भाई देखा। तब एक ने बताया की कोई लेटा तो है पेड़ के नीचे, देख ले वही तो नहीं। भागी भागी पेड़ के नीचे पहुची। अपने भाई को नींद से उठाया। भैया भैया कहीं तूने मेरे लड्डू तो नही खाए!! भाई बोला- ये ले तेरे लड्डू, नहीं खाए मैने। ले दे के लड्डू ही तो दिए थे, उसके भी पीछे पीछे आ गयी। बहिन बोली- नहीं भाई, तू झूठ बोल रहा है, ज़रूर तूने खाया है| अब तो मैं तेरे साथ चलूंगी। भाई बोला- तू न मान रही है तो चल फिर। चलते चलते बहिन को प्यास लगती है, वह भाई को कहती है की मुझे पानी पीना है। भाई बोला- अब मैं यहाँ तेरे लिए पानी कहाँ से लाउ, देख ! दूर कहीं चील उड़ रहीं हैं,चली जा वहाँ शायद तुझे पानी मिल जाए। तब बहिन वहाँ गयी, और पानी पी कर जब लौट रही थी तो रास्ते में देखती है कि एक जगह ज़मीन में 6 शिलाए गढ़ी हैं, और एक बिना गढ़े रखी हुई थी। उसने एक बुढ़िया से पूछा कि ये शिलाएँ कैसी हैं।

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मध्य प्रदेश के रहस्यमयी मंदिर कहीं पानी से जलता है दीपक, कहीं ट्रेन रुककर करती है प्रणाम

अश्वत्थामा को जिसने देखा हो जाता है पागल महाभारत के अश्वत्थामा को पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के दौरान हुई  एक चूक भारी पड़ी और भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें युगों-युगों तक भटकने का श्राप दे दिया. ऐसा कहा जाता है कि पिछले लगभग 5 हजार वर्षों से अश्वत्थामा भटक रहे हैं. मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किमी दूर असीरगढ़ का किला है. कहा जाता है कि इस किले में स्थित शिव मंदिर में अश्वत्थामा आज भी पूजा करने आते हैं. स्थानीय निवासी अश्वत्थामा से जुड़ी कई कहानियां सुनाते हैं. वे बताते हैं कि अश्वत्थामा को जिसने भी देखा, उसकी मानसिक स्थिति हमेशा के लिए खराब हो गई. इस मंदिर में जीवित अवस्था में है शिवलिंग मतंगेश्वर महादेव नामक ये शिव मंदिर खजुराहो में है. कहा जाता है कि ये दुनिया का एकमात्र ऐसा शिवलिंग है जो लगातार बढ़ता जा रहा है. यही नहीं इस मंदिर के शिवलिंग की ख़ासियत है कि ये जितना धरती के ऊपर है उतना ही ये जमीन में धंसा हुआ है. इसके साथ ही शिवलिंग की ऊंचाई हर साल एक इंच बढ़ती जा रही है. कहते हैं इंसान की तरह शिवलिंग का आकार भी बढ़ता चला जा रहा है, जिस वजह से इसे जीवित शिवलिंग कहा जाता है. इसके पीछे के रहस्य को आज तक कोई वैज्ञानिक भी नहीं समझ पाया है. आपको बता दें कि शिवलिंग की ऊंचाई 9 फ़ीट है.  रोहिणी व्रत की पूरी यहां जलता है पानी से दीया आप जब भी मंदिरों में जाते होंगे तो घी या तेल का दिया जरूर जलाते होंगे. मध्य प्रदेश के गड़ियाघाट माताजी का माताजी का मंदिर ऐसा है जहां दिया घी या तेल से नहीं जलता है बल्कि पानी से जलता है. यह मंदिर काली सिंध नदी के किनारे आगर-मालवा के नलखेड़ा गांव से करीब 15 किलोमीटर गाड़िया गांव में है. मंदिर में पिछले 5 सालों से घी तेल के बदले पानी से दीपक जलाए जा रहे हैं. पुजारी बताते हैं कि, पहले तेल का दीपक जला करता था, लेकिन करीब पांच साल पहले माता ने सपने में अपना दर्शन देकर पानी से दीपक जलाने के लिए कहा. जिसके बाद सुबह उठकर पास बह रही कालीसिंध नदी से पानी भरा और उसे दीए में डाला. जैसे ज्योत जलाई, दीपक जलने लगा. तभी से मंदिर का दिया कालीसिंध नदी के पानी से जलाया जाता है. इतना ही नहीं जब दीपक में पानी डाला जाता है, तो वह चिपचिपा हो जाता और दीपक जल उठता है. दीपक को लेकर पुजारी ने बताया कि पानी से जलने वाला ये दीपक बारिश के मौसम में नहीं जलता है. क्योंकि बारिश  के मौसम में कालीसिंध नदी का जलस्तर लेवल बढ़ने की वजह मंदिर पानी में डूब जाता है, जिससे यहां पूजा उस समय नहीं हो पाती. ये दिया फिर सितंबर-अक्टूबर में आने वाली शारदीय नवरात्रि के पहले दिन दोबारा ज्योत जला दी जाती है, फिर ये दिया अगले साल बारीश के मौसम तक जलती रहती है. यहां तेल के बजाए पानी से जोत जलाए जाने का दावा किए जाने के बाद लोगों ने उत्सुकतावश यहां आना शुरु किया। इस तरह मंदिर का गुणगान आस-पास के जगहों के साथ काफी दूर-दूर तक होने लगा। धीरे-धीरे मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ती गई और आज दूर से यहां माता की चमत्कारी जोत का दर्शन करने के लिए आते हैं। नवरात्रों में तो यहां भारी संख्या में दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर की बढ़ती प्रसिद्धि इस बात की प्रतीक है कि आज भी लोग ईश्वरीय शक्ति में पूरा विश्वास रखते हैं। कहा जाता है कि देवी के इस मंदिर के दर्शन से मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।

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कभी सपने में हो शिवलिंग के दर्शन, तो जान लें इसका मतलब

अक्सर हम रात को सोते समय सपने देखते हैं। हम में से ज्यादातर लोग सपनों में वही देखते हैं जो असल में हमारे जीवन में हो रहा होता है।ऐसे में अगर आप सपने में कोई देवता देखते हैं तो उसके भी अलग-अलग अर्थ होते हैं।  सपने में दिखाई देने वाली चीजों का हमारे जीवन से गहरा संबंध होता हैं। आज हम आपको सपने में शिवजी से जुड़ी चीजें दिखाई देने का तात्पर्य बताने जा रहे हैं। तो आइये जानते है कि सपने में शिवजी से जुड़ी चीजें दिखना कैसे आपके जीवन पर प्रभाव डालता हैं। सपने में शिव पार्वती को एक साथ देखना यदि आप शिव और पार्वती को एक साथ देखते हैं तो इसका मतलब है कि आपके दरवाजे पर नए अवसर हैं। जल्द ही आपको लाभ, यात्रा, अन्न और खाद्यान्न प्राप्त करने, धन और बहुतायत के समाचार सुनने को मिलेंगे। शिव और पार्वती को एक साथ देखना एक अच्छा शगुन है। सपने में सांप दिखना-सपने मे सांप का देखना धन प्राप्ति का संकेत होता है। अगर सांप फन फैलाए हुए हो और आप उसको पीछे की ओर से देखें तो आपके लिए शुभ फल देने वाला रहेगा। सपने में शिव को नृत्य करते हुए देखना- अगर आप सपने में शिव को नाचते हुए देखते हैं तो इसका मतलब है कि आपकी समस्या का जल्द ही समाधान हो जाएगा। यह यह भी दर्शाता है कि आप धन प्राप्त करेंगे लेकिन कुछ संघर्ष के बाद। सपने में चंद्रमा देखना-यदि आप चंद्रमा का सपना देखते हैं, तो इसका मतलब है कि आपको जीवन में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे।  सपने में सपरिवार भगवान शिव की पूजा करना यदि आप खुद को अपने परिवार के साथ शिवजी की पूजा करते देखते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि आप अपने काम में पूरे त्‍याग, समर्पण और ईमानदारी के साथ लगे रहते हैं। ऐसा सपना आना बताता है कि कार्यक्षेत्र में आपकी आने वाली परेशानियां जल्‍द ही दूर होने वाली हैं। आपके जीवन में सुख समृद्धि और सौभाग्‍य आने वाला है। ऐसा सपना उन्‍नति और सुख सौभाग्‍य का प्रतीक माना जाता है। सपने में सफेद शिवलिंग देखना अगर आपको सपने में यदि सफेद शिवलिंग के दर्शन हों तो यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आने वाले वक्‍त में आपको या फिर आपके परिवार के किसी सदस्‍य को गंभीर रोग से छुटकारा मिल सकता है और आपके जीवन में कुछ अच्‍छा होने वाला है। सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना भी असल जीवन में बहुत ही शुभ संकेत देता है। इसका अर्थ है कि आप अपने जीवन में सुख शांति की ओर बढ़ रहे हैं। संघर्ष का दौर आपके जीवन से समाप्‍त होने वाला है और जल्‍द ही आपके जीवन में स्‍थायित्‍व आने वाला है और सब कुछ आपके अनुसार होने वाला है।

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