2023

भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कथा

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं, क्योंकि यह दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिवस माना जाता है। इसी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है।  जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की जन्म संबंधी कथा भी सुनते-सुनाते हैं, जो इस प्रकार है-  ‘द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था।  एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?’ कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।  वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था।  उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी।  जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- ‘अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।  भारत के प्रमुख धार्मिक स्थल तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।’  उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।  अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है।  उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।’ यह है कृष्ण जन्म की कथा। भगवान कृष्ण का जन्म कहां हुआ था? भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद महीने में मथुरा के एक कारागार में हुआ था। द्वापर युग में मथुरा में असुरों का साम्राज्य चल रहा था जहां के राजा कंस हुआ करते थे, भूत प्रेत और असुरों के साथ उन्होंने मथुरा पर अपना कब्जा जमा कर रखा था। मथुरा के लोगों पर कंस के द्वारा बहुत अत्याचार किए जाते थे, एक दिन कंस के अत्याचार से तंग आकर उनके राज्य में आकाशवाणी होती है कि कंस की बहन का पुत्र कंस की मृत्यु का कारण बनेगा। इसके बाद कौन से अपनी बहन देवकी और उसके पति वसुदेव को एक कारागार में बंद कर दिया। जहां भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष में भगवान कृष्ण का जन्म होता है। वह भगवान का अवतार था इसलिए कृष्ण अपने माया जाल से स्वयं को उस कारागार से मुक्त कर लेते हैं।

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भारत के प्रमुख धार्मिक स्थल

1. भारत का धार्मिक स्थल वैष्णो देवी माता मंदिर भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल माता वैष्णो देवी का मंदिर हिन्दू धर्म का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। जम्मू कश्मीर की आकर्षित त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है यह पवित्र स्थान 9 देवियों में से एक माता वैष्णो रानी का परम धाम हैं। देवी के दर्शन के लिए आने वाले भक्तो की भीड़ नवरात्री के अवसर पर देखने लायक होती है। श्रद्धालुगण सीढ़ियों पर चलते हुए लम्बा सफर तय करते हैं और माता रानी का जयकारा लगाते है। वैष्णो देवी धाम में कई पावन स्थान हैं। 2. भारत का धार्मिक मंदिर अमृतसर में स्वर्ण मंदिर / स्वर्ण मंदिर / हरमंदिर साहिब भारत के धार्मिक तीर्थ स्थलों में अमृतसर का स्वर्ण मंदिर / हरमंदिर साहिब सिखों के चौथे गुरु श्री रामदास साहिब जी द्वारा निर्मित किया गया था। भारत में धार्मिक स्थलों की यात्रा करने के लिए गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब भारत में सिख तीर्थ स्थल में सबसे ख़ास माना जाता है। स्वर्ण जडित यह पवित्र पर्यटन स्थल अपने में कई ऐतिहासिक घटनाओ को समेटे हुए हैं। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। अमृत कलश (झील) और तीर्थ परिसर कि यात्रा टूरिस्टों को बहुत लुभाती हैं। 3. भारत का ऐतिहासिक धार्मिक स्थल कोणार्क सूर्य मंदिर कोणार्क सूर्य मंदिर भारत में ओडिशा के तट पर पुरी से लगभग 35 किलोमीटर कि दूरी पर उत्तर-पूर्व कोणार्क में स्थित है। हिंदू देवता सूर्य को समर्पित यह एक विशाल मंदिर है और भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हैं। कोणार्क दो शब्दों कोण (कोना) और अर्क (अर्का) से मिलकर बना है। जहां कोण का अर्थ कोना (कॉर्नर) और अर्क का अर्थ सूर्य (सूर्य) है। दोनों को संयुक्त रूप से मिलाने पर यह सूर्य का कोना यानि कोणार्क कहा जाता है। कोणार्क के सन मंदिर को काले पैगोडा के नाम से भी जाना जाता है। 4. हिंदुस्तान के धार्मिक स्थल जगन्नाथ मंदिर पूरी भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में जगन्नाथ मंदिर ओडिशा में सबसे अच्छा धार्मिक स्थल माना जाता हैं। इस मंदिर के प्रमुख देवता भगवान जगन्नाथ, बलभद्रऔर देवी सुभद्रा हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं, जिसमे मंदिर के तीनो मुख्य देवताओं को एक रथ में बिठाया जाता हैं। इस पवित्र मंदिर को भारतीय संस्कृति का प्रामाणिक प्रतिबिंब माना जाता है। 5. भारत का दर्शनीय स्थल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का पहले द्वादश ज्योतिर्लिंग (प्रकाश का स्तंभ) हैं। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य में स्थित हिन्दू धर्म का एक प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। हिन्दू धर्म से सम्बंधित यह पवित्र स्थान पर्यटकों को अपने दरबार में आमंत्रित करता हैं। 6. भारत का प्रसिद्ध तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर भारत के प्रसिद्ध स्थानों में शामिल तिरुपति का वेंकटेश्वर मंदिर यहाँ का एक प्रमुख दर्शनीय स्थान हैं, जोकि भगवान विष्णु का अवतार हैं। भगवान विष्णु का तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर आंध्र प्रदेश राज्य के तिरुपति में शेषचलम श्रेणी की अंतिम पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर भारत में सबसे अधिक देखे जाने वाले हिंदू मंदिरों में से एक हैं। भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कथा 7. भारत में देखने लायक जगह हेमकुंड साहिब भारत में देखने वाली जगहों में शामिल हेमकुंड साहिब भारत का प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। हेमकुंड साहिब की संरचना पंचकोणीय है। बर्फ से ढंकी हुई ऊँची पहाड़ियों पर स्थित इस स्थान सुन्दरता देखने लायक होती हैं। पर्यटक हेमकुंड का दौरा करना बहुत अधिक पसंद करते हैं। 8. भारत के पवित्र तीर्थ स्थल अमरनाथ गुफा भारत में देखने वाली पवित्र जगहों में अमरनाथ गुफा भारत के सबसे खूबसूरत राज्य जम्मू और कश्मीर में स्थित है। अमरनाथ गुफा भारत के प्राचीन तीर्थ स्थलों में शुमार हैं। माना जाता है कि भगवान भोले नाथ ने अपनी पत्नी देवी पार्वती की अमरता का रहस्य इसी स्थान पर उजागर किया था। यह स्थान अमरनाथ लिंग के लिए प्रसिद्ध हैं और हिन्दू धर्म का एक परम पूजनीय स्थान हैं। 9. इंडिया के फेमस धार्मिक स्थल वाराणसी भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित वाराणसी भारत में एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है, जोकि हिन्दू धर्म की आस्था से सम्बंधित हैं। वाराणसी की सुन्दरता और अखंडता को देखने के लिए देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की लम्बी कतार लगी रहती है। शहर के मध्य से प्रवाहित होने वाली पवित्र गंगा नदी निस्संदेह वाराणसी शहर की सुन्दरता और पवित्रता को बढ़ा देती है। सुबह शाम होने वाली गंगा नदी की आरती से वाराणसी शहर में भक्ति लहर दौड जाती है। 10. इंडिया टूरिज्म में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल द्वारका नगरी भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल द्वारिका नगरी एक प्रमुख तीर्थ स्थल हैं जिसका निर्माण महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण ने करबाया था। जब श्री कृष्ण और बलराम ने अपनी राजधानी मथुरा से द्वारिका में स्थानांतरित की थी। द्वारिका गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित है। हिन्दू धर्म से सम्बंधित द्वारिका चार धामों में से एक हैं। 11. भारत में फेमस ऋषिकेश शहर की धार्मिक यात्रा 12. भारत में घूमने वाली जगह मथुरा ऋषिकेश भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों की यात्राओं में शामिल है। यहां स्थित असंख्य हिंदू मंदिरों और योग केंद्रों की भारी व्यवस्था की गई हैं। ऋषिकेश धाम भारत में यात्रा करने के लिए एक प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। 13. दक्षिण भारत का प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में सबरीमाला एक प्रमुख मंदिर हैं। सऊदी अरब में मक्का के हज तीर्थयात्रा के बाद लगभग 30 लाख से भी अधिक तीर्थयात्री सबरीमाला मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं। तीर्थ यात्रियों की अधिक संख्या इस मंदिर को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा और भारत का प्रथम मंदिर बनाता हैं। यह मंदिर केरला में स्थित हैं और केवल दो महीने के लिए ही खुला रहता हैं। 14. इंडिया के प्रमुख धार्मिक पर्यटन हरिद्वार  भारत के दर्शनीय स्थलों में मथुरा एक ऐसी जगह है जोकि भारत की सबसे पवित्र भूमि मानी जाती हैं। दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पवित्र स्थान भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि के रूप में जाना जाता है। मथुरा अपने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता हैं। भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल हरिद्वार भारत के सात सबसे पवित्र शहरों में से एक हैं। हरिद्वार भारत के उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में गंगा नदी के

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2023: संकष्टी चतुर्थी कब ? नोट करें डेट, मुहूर्त और चंद्रोदय समय

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हेरंब संकष्टी चतुर्थी है. इस दिन बहुला चौथ भी मनाई जाती है. जानते हैं हेरंब संकष्टी चतुर्थी की डेट, मुहूर्त और महत्व. हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हेरंब संकष्टी चतुर्थी है इसे महा स्कंद हर चतुर्थी भी कहते हैं. इस दिन बहुला चौथ भी मनाई जाती है. संकष्टी चतुर्थी व्रत गणपति जी को समर्पित है लेकिन बहुला चौथ व्रत में श्रीकृष्ण और बहुला गाय की पूजा की जाती है. ऐसे में व्रती को इस दिन बप्पा और बाल गोपाल दोनों का आशीर्वाद मिलेगा. आइए जानते हैं हेरंब संकष्टी चतुर्थी और बहुला चौथ की डेट, मुहूर्त और महत्व. 2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2023 डेट भाद्रपद माह की हेरंब संकष्टी चतुर्थी 3 सितंबर 2023 रविवाह को है.संकष्टी के दिन बुद्धि, विद्या के दाता गणपति जी की उपसाना करने से समस्त विघ्न दूर होते हैं. मांगलिक कार्य में बाधाएं नहीं आती. हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2023 मुहूर्त  पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह की चतुर्थी तिथि 02 सितंबर 2023 को रात 08 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 03 सिंतबर 2023 को शाम 06 बजकर 24 मिनट पर खत्म होगी. गणपति की पूजा का मुहूर्त – सुबह 07.35 – सुबह 10.45 शाम का मुहूर्त – शाम 06.41 – रात 09.31 बहुला चौथ की पूजा – शाम 06.28 – शाम 06.54 चंद्रोदय समय – रात 08:57 हेरंब संकष्टी चतुर्थी महत्व  भविष्य पुराण में बताया गया है कि हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर उपवास करने से बुध, राहु-केतु के दुष्प्रभाव नहीं झेलने पड़ते. भगवान गणेश की पूजा करने से हर तरह की परेशानियां दूर होती हैं और बुद्धि, बल और विवेक की प्राप्ति होती है. इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है. हेरंब संकष्टी चतुर्थी मंत्र ‘ॐ नमो हेरम्ब मद मोहित मम् संकटान निवारय-निवारय स्वाहा।’ ‘ॐ श्रीं गं सौभाग्य गणपतये। वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नम:।’  ‘ॐ गं गणपतये नम:।’ भाद्रपद चतुर्थी 2023 तिथि और पूजा विधि  इस दिन श्री गणेश की पूजा की जाती है और फिर चांद को अर्घ्य देते हैं.  दिन भर महिलाएं निराहार रहकर इस व्रत को करती हैं. शाम के वक्त गणेश की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें फूल, पांच तरह के फल, नारियल, पान, सुपारी, दही, दूध, शहद, इत्र, सिंदूर, अक्षत और चंदन चढ़ाएं. इस दिन भगवान को मोतीचूर के लड्डू चढ़ाने चाहिए.

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कजरी तीज आज, जानें क्यों रखा जाता है ये व्रत और क्या है पौराणिक कथा

कजरी तीज एक ऐसा पर्व है जिसका हर विवाहीत महिला को इंतजार रहता है. इस पर्व को महिलाएँ बड़े धुम- धाम से मनाती हैं और अपने पति के लंबी उम्र की कमना करती हैं. हिन्दू पंचांग के अनुसार कजरी तीज का व्रत भादव मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस साल ये व्रत 2 सितंबर 2023 को शनिवार के दिन रखा जाएगा। कजरी तीज के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत का विधिवत पालन करने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कजरी तीज के दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर के पूजा करती हैं। इस दिन माता पार्वती को सोलह श्रृंगार अर्पित भी किये जाते हैं। कजरी तीज का व्रत कुंवारी लड़किया भी कर सकती हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी कुंवारी लड़कियां कजरी तीज का व्रत करती हैं उन्हें महादेव से मनचाहे वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनकी सारी मनोकामना पूरी होती है। आइए जानते हैं कजरी तीज व्रत का शुभ मुहुर्त क्या है। हिंदू पंचाग के हिसाब से भादव महीने की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 1 सितंबर 2023 की रात 11 बजकर 40 मिनट से होगा और इस तिथि का समापन 2 सितंबर की रात 10 बजकर 49 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के कारण कजरी तीज का व्रत 2 सितंबर 2023 को शनिवार के रखा जाएगा। कजरी तीज के दिन चंद्र देव की भी पूजा की जाती है। चांद की पूजा के लिए इस दिन शाम के 7 बजे 44 मिनट पर होगा। इस दिन रेवती नक्षत्र का निर्माण हो रहा है। इस मुहूर्त को आरंभ 12 बजकर 30 मिनट पर होगा। इस समय में पूजा करना शुभ होगा। कजरी तीज का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसा कजरी तीज का खास महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने इस व्रत को सबसे पहले किया था। मान्यता है कि कजरी तीज का व्रत करने से पारिवारिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है और जीवन की कई परेशानियां दूर हो जाती हैं। साथ ही कुंवारी कन्या के इस व्रत को करने से उन्हें मनचाहे वर का आशीर्वाद मिलता है। इस खास दिन चंद्र देव की पूजा करने और रात के समय चंद्रमा को अर्घ्य देने से विशेष लाभ होता है। 2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व कजरी तीज की पौराणिक कथा हिंदू धर्म में हर त्योहार को मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी है. उसी तरह कजरी तीज की भी कई पौराणिक कथाएं हैं. उनमें से एक है भगवान शिव और मां पार्वती की कथा. पुराणों के अनुसार देवी पार्वती चाहती थीं कि भोलेनाथ उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करें. इसके लिए शंकर भगवान ने मां पार्वती को अपनी भक्ति साबित करने के लिए कहा. तब मां पार्वती ने 108 साल तक तपसाया करके अपनी भक्ति साबित की थी. मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने मां को अपना लिया और जिस दिन उनका मिलन हुआ उस दिन भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि थी. तब से उस दिन करजी तीज के रूप में मनाई जाती है. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा होती है.

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2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व

इस साल कृष्ण जन्माष्टमी सितंबर में मनाई जाएगी. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को आमतौर पर लगातार दो दिन समर्पित होते हैं. पहला स्मार्त सम्प्रदाय के लिए और दूसरा वैष्णव सम्प्रदाय के लिए. इस साल कृष्ण जन्माष्टी का पर्व 6 और 7 सितंबर को मनाई जाएगी. हिंदू धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी को महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है. कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास में मनाई जाती है. फिलहाल सावन का महीना चल रहा है. सावन के बाद भाद्रपद का महीना 31 अगस्त 2023 से शुरू हो जाएगा. भादो माह भगवान कृष्ण की उपासना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है. इसी महीने में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद (चंद्रमा के अंधेरे पखवाड़े) के महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. इस साल कृष्ण जन्माष्टमी की डेट को लेकर लोगों में कंफ्यूजन बना हुआ है.  गृहस्थ कब रखेंगे जन्माष्टमी व्रत 2023 पंचांग के अनुसार, इस साल कृष्ण जन्माष्टमी सितंबर में मनाई जाएगी. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को आमतौर पर लगातार दो दिन समर्पित होते हैं. पहला स्मार्त सम्प्रदाय के लिए और दूसरा वैष्णव सम्प्रदाय के लिए. इस साल कृष्ण जन्माष्टी का पर्व 6 और 7 सितंबर को मनाई जाएगी. गृहस्थ जीवन वालों के लिए 06 सितंबर 2023 को जन्माष्टमी व्रत रखना शुभ रहेगा. जबकि वैष्णव संप्रदाय को मनाने वाले लोग कान्हा का जन्मोत्सव 07 सितंबर 2023 को मनाएंगे. जन्माष्टमी 2023 शुभ मुहूर्त भाद्रपद माह के कृष्ण जन्माष्टमी तिथि 06 सितंबर 2023 को दोपहर 03 बजकर 37 मिनट पर शुरू हो रही है. अष्टमी तिथि का समापन 07 सितंबर 2023 को शाम 04 बजकर 14 मिनट पर होगा. रोहिणी नक्षत्र 06 सितंबर 2023 की सुबह 09 बजकर 20 मिनट पर शुरू होगा. वहीं रोहिणी नक्षत्र की समाप्ति 07 सितंबर 2023 की सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर होगा. जन्माष्टमी 2023 मुहूर्त धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास के अष्टमी तिथि की रात 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. गृहस्थ जीवन वाले 6 सितंबर को जन्मोत्सव मनाएंगे. इसी दिन रोहिनी नक्षत्र का संयोग भी बन रहा है. वहीं वैष्णव संप्रदाय में श्रीकृष्ण की पूजा का अलग विधान है. ऐसे में वैष्णव संप्रदाय में 07 सिंतबर को जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाएगा. रोहिणी नक्षत्र शुरू- 06 सितंबर 2023, सुबह 09 बजकर 20 मिनट पर रोहिणी नक्षत्र समाप्त – 07 सितंबर 2023, सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर श्रीकृष्ण पूजा का समय – मध्यरात्रि 12 बजकर 02 से मध्यरात्रि 12 बजकर 48 मिनट पूजा अवधि – 46 मिनट व्रत पारण समय – 7 सिंतबर 2023, सुबह 06 बजकर 09 तक जन्माष्टमी व्रत कथा जन्माष्टमी व्रत कथा में हम आपको बताने जा रहे है कि क्यों हम जन्माष्टमी के दिन व्रत रखते है। जन्माष्टमी के दिन बड़े ही धूमधाम से पूरे भारतवर्ष में जन्माष्टमी व्रत रखा जाता है। भारत के मथुरा शहर में असुर राज कंस वहां के लोगों पर बहुत अत्याचार करता था। एक समय की बात है जब कंस देवकी की शादी वसुदेव से करवा कर मथुरा से कहीं जा रहा था। रास्ते में एक आकाशवाणी होती है जिसमें बताया जाता है कि देवकी का आठवां पुत्र कंस के मृत्यु का कारण बनेगा। इसके बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया। हर एक पुत्र को कंस ने मारा मगर भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रोहिणी नक्षत्र में अष्टमी तिथि को आठवीं संतान का जन्म हुआ। आठवीं संतान के रूप में भगवान विष्णु दसवें अवतार में श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिए थे। भगवान का अवतार होने के कारण उन्होंने स्वयं को कारागार से मुक्त करके मथुरा के नंद बाबा के घर पहुंचा लिया। वहां से यशोदा माता के साथ भगवान कृष्ण का बालकांड शुरू होता है। बचपन से ही कंस के सभी प्रकार के माया जाल को विफल करते हुए एक निश्चित समय पर उन्होंने कंस का वध करके मथुरा के सभी लोगों को अत्याचार से मुक्त करवाया। इसके बाद भगवान कृष्ण ने द्वापर युग को सभी प्रकार के पाप से मुक्त किया और गीता जैसे उपदेश से लोगों का उद्धार किया। जन्माष्टमी व्रत विधि न्माष्टमी का व्रत बिल्कुल एकादशी के व्रत की तरह रखा जाता है। जन्माष्टमी के त्यौहार के दिन सुबह-सुबह नंद, यशोदा, बलराम, देवकी, कृष्ण, इन सबके नाम का बार बार उच्चारण करते हुए पूजा किया जाता है। सुबह सुबह पूजा करने के बाद अब जन्माष्टमी का उपवास शुरू कर सकते है। इस दिन अन्न नहीं खाया जाता है, जन्माष्टमी के व्रत को एक निश्चित अवधि में तोड़ा जाता है। जैसा कि हम सब जानते है भाद्रपद के कृष्ण पक्ष और रोहिणी नक्षत्र के अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन उपवास को एक निश्चित अवधि पर तोड़ा जाता है जिसे पारण मुहूर्त कहते है। हर साल जन्माष्टमी के अर्धरात्रि को अर्थात 2023 में 06 सितंबर के रात 12:00 बजे भगवान श्री कृष्ण का जन्म होगा उसके बाद जन्माष्टमी का पारण मुहूर्त होता है। भारत के कुछ जगहों पर पारण मुहूर्त अगले दिन सूर्य उदय के बाद माना जाता है। जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा जन्माष्टमी व्रत में क्या खाना चाहिए हिंदू धर्म के अलग-अलग त्योहार में अलग अलग तरीके से व्रत रखने और पारण करने की परंपरा बनाई गई है। जन्माष्टमी के दिन घर में बहुत काम रहता है लोग अपने घर को सजाते है, बाल गोपाल की पूजा अर्चना की तैयारी की जाती है, और कान्हाजी का विशेष भोग बनाया जाता है। ऐसे में अगर आप व्रत करते है तो शारीरिक रूप से कमजोर पड़ सकते है। जन्माष्टमी के व्रत में कुछ लोग 24 घंटे का निर्जला उपवास करते है, जिसमें वह पानी तक नहीं पीते मगर कुछ लोग दिनभर उपवास करके शाम को फलाहार करते है। जिनका तबीयत ठीक नहीं रहता है वह दिन में दो बार फलाहार भी करते है। आपको जन्माष्टमी व्रत में क्या खाना चाहिए यह जानना आवश्यक है ताकि आप शारीरिक रूप से कमजोर ना पड़े और रात तक उपवास करते हुए भगवान की सही तरीके से पूजा अर्चना कर सके। कृष्ण जन्माष्टमी पूजा व्रत नियम अविवाहित लोग व्रत के एक दिन पहले और जन्माष्टमी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें. व्रत के दिन मध्याहन के वक्त तिल के पानी से स्नान करें. रात में श्रीकृष्ण की पूजा के समय नए

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भगवान श्रीकृष्ण को क्यों कहा जाता है रणछोड़?

भगवान श्रीकृष्ण  के चमत्कार और लीलाओं के बारे में कौन नहीं जानता है। वह भगवान विष्णु के अवतार थे, वह जो चाहे वो कर सकते थे। लेकिन एक ऐसा मौका भी आया था, जब श्रीकृष्ण को रणभूमि छोड़कर भागना पड़ा था, जिस वजह से उनका नाम रणछोड़ पड़ा गया। अब आप सोच रहे होंगे कि वो तो भगवान थे, फिर उन्हें किसी से भागने की क्या जरूरत थी? आइए जानते है इसके पीछे छिपे रहस्यमयी कहानी को भगवान श्री कृष्ण को रणछोड़ नाम कैसे पड़ा दुनिया को अपनी बाल लीला से मंत्रमुग्ध करने वाले कान्हा को उनके भक्त मुरली मनोहर, कान्हा, कृष्ण मुरारी, नंद गोपाल, माखन चोर, देवकी नंदन, जैसे कई नामों से पुकारते हैं लेकिन श्रीकृष्ण के जीवन में एक समय ऐसा भी आया था जब उन्होंने अपने शत्रु से मुकाबला ना करके मैदान छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी। जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा यह घटना तब की है जब महाबली मगध राज जरासंध ने श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा था। जरासंध ने कृष्ण के साथ युद्ध करने के लिए अपने साथ कालयवन नाम के राजा को भी मना लिया था। कालयवन ऋषि शेशिरायण का पुत्र था। जो जन्म से तो ब्राह्मण लेकिन कर्म से असुर था। दरअसल, कालयवन को भगवान शंकर ने वरदान दिया था कि ना तो चंद्रवंशी और ना ही सूर्यवंशी उसका कभी कुछ बिगाड़ पाएँगे, उसे ना तो कोई हथियार खरोच सकता है और ना ही कोई उसे अपने बल से हरा सकता है। भगवान शिव से मिले वरदान के बाद कालयवन ने खुद को अजेय समझ लिया था। जरासंध के कहने पर कालयवन ने बिना किसी शत्रुता के मथुरा पर आक्रमण कर दिया, भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि कालयवन को मारा नहीं जा सकता उनका सुदर्शन कालयवन का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जिसके बाद वह रणभूमि से भागकर एक गुफा में पहुँच गए जहाँ राक्षसों से युद्ध करके राजा मुचकुंद त्रेता युग से सोए हुए थे। राजा मुचकुंद दानवों को हराने के बाद बहुत थक गए थे, जिसके बदले देवराज इंद्र ने उन्हें विश्राम का आग्रह कर एक वरदान भी दिया, इंद्र ने कहा कि “जो भी इंसान तुम्हें नींद से जगाएगा वह जलकर खाक हो जाएगा। श्रीकृष्ण जिस गुफा में जाकर छुपे हुए थे, उसमें पहले से ही इक्ष्वाकु नरेश मांधाता के पुत्र और दक्षिण कोसल के राजा मुचकुंद गहरी नींद में सोए हुए थे। दरअसल, उन्होंने असुरों से युद्ध कर देवताओं को जीत दिलाई थी। लगातार कई दिनों तक युद्ध करने की वजह से वह थक गए थे, इसलिए भगवान इंद्र ने उनसे सोने का आग्रह किया और उन्हें एक वरदान भी दिया, जिसके मुताबिक जो कोई भी उन्हें नींद से जगाएगा, वह जलकर भस्म हो जाएगा। राजा मुचकुंद को मिले वरदान की बात श्रीकृष्ण को पता थी, इसलिए वो कालयवन को अपने पीछे-पीछे उस गुफा तक ले आए, जहां राजा मुचकुंद सोए हुए थे। श्रीकृष्ण ने कालयवन को भ्रमित करने के लिए अपना पीतांबर राजा मुचकुंद के ऊपर डाल दिया। राजा मुचकुंद को देख कर कालयवन को लगा कि वह श्रीकृष्ण ही हैं और उससे डर कर अंधेरी गुफा में छुप कर सो गए हैं। इसलिए उसने श्रीकृष्ण समझ कर राजा मुचकुंद को ही नींद से उठा दिया। अब राजा मुचकुंद जैसे ही नींद से उठे, कालयवन वहीं जल कर भस्म हो गया। असल में यह भगवान श्रीकृष्ण की ही एक लीला थी। उन्होंने महाभारत के युद्ध में गीता का उपदेश देते हुए कहा भी था कि सृष्टि में जो कुछ भी होता है, उन्ही की इच्छा से होता है, तो जाहिर है कालयवन का अंत भी उन्ही की इच्छा से हुआ था।   श्रीकृष्ण ये बात भली-भांति जानते थे भगवान श्रीकृष्ण कालयवन को अपने पीछे भगाते-भगाते उस गुफा तक ले आए जहाँ राजा मुचकुंद सोए हुए थे। गुफा में भगवान श्रीकृष्ण ने राजा मुचकुंद के ऊपर अपना पीतांबर डाल दिया, कालयवन को लगा श्रीकृष्ण अंधेरी गुफा में सो गए हैं।  कालयवन ने जैसे ही त्रेता युग से सोए हुए राजा मुचकुंद को लात मार कर उठाया, राजा मुचकुंद की नींद टूटते ही कालयवन जलकर खाक हो गया और इसी प्रकार रण छोड़ कर जाने पर श्रीकृष्ण का एक और नाम रणछोड़ पड़ गया।

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30 अगस्त या 31 अगस्त को, रक्षाबंधन कब है? गलती से भद्रा के इस वक्त में ना बांधें राखी

रक्षाबंधन के त्योहार की तिथि को लेकर लोगों में इस बार बहुत कंफ्यूजन है. लोग संशय में हैं कि रक्षाबंधन 30 अगस्त को मनाएं या 31 अगस्त को. आपको बता दें कि रक्षाबंधन इस दिन 30 और 31 अगस्त दोनों दिन मनेगा लेकिन भद्रा के साए की वजह से आपको शुभ मुहूर्त का खास ख्याल रखना होगा. 30 अगस्त को लगभग पूरे दिन ही भद्रा का साया रहेगा और 31 अगस्त को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त सिर्फ सुबह कुछ देर तक ही है. रक्षाबंधन का मतलब रक्षा बंधन एक पारंपरिक हिंदू त्योहार है जो भाइयों और बहनों के बीच के बंधन का जश्न मनाता है. त्योहार का नाम संस्कृत शब्द ‘रक्षा’ से आया है जिसका अर्थ है- ‘सुरक्षा’ और ‘बंधन’ का अर्थ है- ‘बांधना’. रक्षा बंधन का इतिहास इस त्योहार का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व बहुत गहरा है. ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में, रानियां, और राजुकमारियां अपने गठबंधन और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में पड़ोसी राजाओं को राखी के धागे भेजती थीं. हालांकि रक्षा बंधन से जुड़ी कुछ लोकप्रिय कहानियां हैं: रक्षा बंधन से जुड़ी कहानियां 1. इंद्र और इंद्राणी: एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र को शक्तिशाली राक्षस राजा बाली के खिलाफ लड़ाई में हार का सामना करना पड़ रहा था. साची, जिसे इंद्र की पत्नी इंद्राणी भी कहा जाता है, ने इंद्र की रक्षा के लिए उनकी कलाई पर एक सुरक्षात्मक सूती धागा (राखी) बांधा था. शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पवित्र धागा दिया था. 2. कृष्ण और द्रौपदी: एक अन्य लोकप्रिय कथा महाकाव्य महाभारत से है. एक युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण की उंगली सुदर्शन चक्र से गलती से कट गई थी. यह देखकर पांचों पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने खून रोकने के लिए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया था. यह देखकर कृष्ण ने द्रौपदी को जरूरत पड़ने पर उनकी रक्षा करने और उनका समर्थन करने का वादा किया.  700 सालों बाद रक्षाबंधन पर दुर्लभ महायोग, भूलकर भी न करें ये गलतियां रक्षा बंधन 2023 शुभ मुहूर्त राखी बांधने का शुभ मुहूर्त – 30 अगस्त को रात्रि 09:01 बजे के बाद रक्षा बन्धन अनुष्ठान का समय 09:01 PM के बाद रक्षा बन्धन भद्रा अन्त समय  09:01 PM रक्षा बन्धन भद्रा पूँछ  05:30 PM से 06:31 PM रक्षा बन्धन भद्रा मुख 06:31 PM से 08:11 PM प्रदोष के बाद भद्रा समाप्त होने पर ही मुहूर्त मिलता है.   रक्षाबंधन (राखी) का महत्व रक्षा बंधन भारत और भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य हिस्सों में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है. यह एक पारंपरिक हिंदू त्योहार है जो भाइयों और बहनों के बीच के रिश्ते का सम्मान करता है. “रक्षा बंधन” शब्द का अनुवाद “सुरक्षा का बंधन” या “सुरक्षा की गांठ” है. यहां रक्षा बंधन के कुछ प्रमुख महत्व हैं  1. बंधन को मजबूत करना: रक्षा बंधन भाइयों और बहनों के बीच प्यार के रिश्ते का जश्न मनाता है. इस दिन, बहनें प्यार, सुरक्षा और सद्भावना के प्रतीक के रूप में अपने भाइयों की कलाई पर “राखी” नामक एक पवित्र धागा बांधती हैं. यह प्यार के अटूट बंधन और भाइयों के अपनी बहनों की रक्षा करने के कर्तव्य का प्रतीक है. रक्षाबंधन का पौराणिक महत्व रक्षा के लिए बांधा जाने वाला धागा रक्षासूत्र है. माना जाता है कि राजसूय यज्ञ के समय में भगवान कृष्ण को द्रोपदी ने रक्षासूत्र के रूप में अपने आंचल का टुकड़ा बांधा था. इसके बाद बहनों द्वारा भाई को राखी बांधने की परंपरा शुरू हुई. साथ ही पहले के समय में ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को राखी बांधकर उनकी मंगलकामना की जाती है. इस दिन वेदपाठी ब्राह्मण यजुर्वेद का पाठ शुरू करते हैं. इसलिए रक्षाबंधन वाले दिन यानी श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा वाले दिन शिक्षा का आरंभ करना भी शुभ माना जाता है. भारत में अन्य धर्मों के बीच रक्षा बंधन का महत्व रक्षा बंधन भारत में मुख्य रूप से हिंदुओं के बीच मनाया जाने वाला एक पवित्र त्योहार है, लेकिन यह देश के विभिन्न धर्मों और समुदायों में भी महत्व रखता है. हालाँकि यह मुख्य रूप से हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है, लेकिन इसका प्रभाव अन्य धार्मिक समूहों तक फैल गया है, जिससे एकता और सद्भाव की भावना को बढ़ावा मिलता है. हिन्दू धर्म  रक्षा बंधन वैसे तो हिंदू धर्म के सबसे पवित्र त्योहार माना जाता है. यह मुख्य रूप से भाई-बहन के बीच के बंधन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. बहनें अपने भाइयों की कलाई पर “राखी” नामक एक पवित्र धागा बांधती हैं, और भाई, बदले में, अपनी बहनों की रक्षा और समर्थन करने का वादा करते हैं. यह त्योहार भाई-बहन के बीच प्यार, देखभाल और आपसी सम्मान को दर्शाता है. जैन धर्म रक्षा बंधन जैनियों द्वारा भी मनाया जाता है. जैन अहिंसा में विश्वास करते हैं और राखी के पर्व को सभी जीवित प्राणियों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की याद के रूप में मनाते हैं. वे अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों की कलाई पर राखी बांधते हैं. सिख धर्म सिख रक्षाबंधन को “राखड़ी” के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. सिख प्यार और सुरक्षा की निशानी के रूप में अपने प्रियजनों की कलाई पर राखी बांधते हैं. यह त्योहार निस्वार्थ सेवा, करुणा और भाईचारे के महत्व पर जोर देता है. बुद्ध धर्म रक्षा बंधन बौद्ध धर्म में व्यापक रूप से नहीं मनाया जाता है, लेकिन भारत के कुछ क्षेत्रों में बौद्धों के बीच इसके पालन के कुछ उदाहरण हैं. यह दोस्ती और सुरक्षा के बंधन का प्रतीक है, व्यक्तियों के बीच सद्भाव और भाईचारा को बढ़ावा देता है. रक्षा बंधन 2023 पूजा विधि 1. अपने आप को शुद्ध करो: पूजा शुरू करने से पहले पवित्रता के संकेत के रूप में स्नान करें और साफ कपड़े पहनें. 2. पूजा की थाली तैयार करें: एक थाली लें और उस पर राखी का धागा, अक्षत, कुमकुम (सिंदूर) या चंदन, मिठाई, दीया (दीपक) और अगरबत्ती जैसी सामग्री रखें.  3. प्रार्थना करें: सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश की पूजा करें और उनका आशीर्वाद लें. आप गणेश मंत्र या गणेश आरती भी कर सकते हैं. 4. तिलक लगाएं और आरती करें: अपने भाई के माथे पर तिलक लगाएं और आरती की थाली को दक्षिणावर्त दिशा में घुमाकर आरती करें. 5.

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700 सालों बाद रक्षाबंधन पर दुर्लभ महायोग, भूलकर भी न करें ये गलतियां

इस साल का रक्षाबंधन बेहद खास रहने वाला है. 700 साल बाद रक्षाबंधन पर ऐसा दुर्लभ योग बन रहा है, जो लोगों के जीवन पर बड़ा असर डालेगा. इस दिन कोई भी ऐसी गलती ना करें, जो आप पर भारी पड़े.  साल 2023 में रक्षाबंधन का त्‍योहार 30 और 31 अगस्‍त दोनों दिन मनाया जाएगा. इतना ही इस बार 30 अगस्‍त को सावन पूर्णिमा के दिन सूर्य, बुध, गुरु, शुक्र और शनि ग्रह मिलकर पंच महायोग का निर्माण कर रहे हैं. इन 5 ग्रहों की ऐसी स्थिति बुधादित्य, वासरपति और शश योग भी बना रही है. 700 साल बाद ऐसा संयोग बना है जब रक्षाबंधन के दिन पंच महायोग बन रहा है. इतना ही नहीं 30 अगस्‍त को रक्षाबंधन के पूरे दिन भद्रा काल भी रहेगा, जिसे अशुभ माना जाता है.  30 और 31 अगस्त को रक्षाबंधन मनाने का शुभ मुहूर्त  इस बार सावन महीने की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 30 अगस्त के दिन दोपहर के समय 12 बजकर 28 मिनट पर होगी। वहीं, अगले दिन 31 अगस्त गुरुवार के दिन सुबह के समय 8 बजकर 30 मिनट पर पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी। इसलिए 30 अगस्त यानी बुधवार के दिन ही सावन की पूर्णिमा का व्रत रखा जाएगा। राखी बांधने समय करें इस मंत्र का जाप, जानिए रक्षाबंधन मनाने का सही तरीका   रक्षाबंधन के दिन ना करें ये काम 1- 30 अगस्त को रक्षाबंधन मना रहे हैं तो ध्यान रखें की राखी बांधते समय भद्राकाल न रहे। भद्रा के समय राखी बांधना शुभ नहीं माना जाता है।2- रक्षाबंधन के दिन भाई के दाहिने हाथ की कलाई पर राखी बांधना शुभ माना जाता है।3- राखी बांधते समय दिशा का ध्यान रखना भी जरूरी है। भाई का मुख उत्तर-पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। वहीं, बहन का मुख दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है4- रक्षाबंधन के दिन भाई को खंडित और काले रंग की राखी नहीं बांधनी चाहिए।5- वहीं, इस दिन भाइयों को बहनों को गिफ्ट में कोई भी नुकीली चीज, जूते चप्पल या धार वाली चीजें नहीं देनी चाहिए।6- रक्षाबंधन के त्यौहार के दिन काले रंग का कपड़े न पहनना बेहतर रहेगा।7- वहीं, इस दिन तामसिक चीजों का सेवन करने से भी बचें।

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राखी बांधने समय करें इस मंत्र का जाप, जानिए रक्षाबंधन मनाने का सही तरीका

रक्षाबंधन हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह त्योहार हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन धूम-धाम से मनाया जाता है। इस साल भद्रा लगने से रक्षाबंधन 30 अगस्त व 31 अगस्त यानी कि दो दिन मनाया जा रहा है। पूर्णिमा तिथि 30 अगस्त के दिन सुबह 10 बजकर 58 मिनट पर शुरु होगी व 31 अगस्त की सुबह 7 बजकर 5 मिनट तक रहेगी। हालांकि इस दाैरान 30 अगस्त को रात 9 बजकर 1 मिनट तक भद्रा काल रहेगा। उसके बाद राखी बांधने का शुभ मुहूर्त रात 9 बजकर 2 मिनट से शुरु होगा। रक्षाबंधन के दिन बहनें भाई के माथे पर टीका लगाकर व कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी आयु की कामना करती है। इसके साथ ही उनसे अपनी रक्षा का वचन मांगती है। वहीं भाई भी राखी बंधवाने के बाद बहनों के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं साथ ही उनकी रक्षा का बचन देते हैं। बहनों द्वारा कलाई पर बांधे जाने की इस प्रक्रिया को रक्षाबंधन कहा जाता है। राखी बांधने की विधि राखी बांधते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। मान्यता है कि रक्षाबंधन के दिन बहन भाई को जब राखी बांधे तो वह पूर्व दिशा में मुंह करके बैठे। रक्षाबंधन मनाने से पहले अपने ईष्टदेव के सामने राखी रखकर उनका ध्यान करें फिर भाई को रोली, चंदन व अक्षत का तिलक और आरती करें। इसके बाद श्लोक रुपी मंत्र “येन बद्धो बलिराज दानवेन्द्रो महाबलः। तेन स्वामापि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल” पढ़ते हुए भाई राखी बांधे। राखी बांधने के बाद अंत में भाई को मुंह मीठाई खिलाएं। कहते हैं कि जो लोग इस मंत्र के साथ राखी बांधते हैं तो वह रक्षासूत्र उनके भावनात्मक संबंधों को मजबूत बनाए रखता है साथ जीवन में खुशियों का आगमन होता है। राम की तरह श्रीकृष्ण ने एक पत्नी व्रत क्यों नहीं लिया? बहनें राखी बांधते समय पढ़ें ये मंत्र ऊँ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।। ऐसा माना जाता है कि जो लोग इस मंत्र के साथ राखी बांधते हैं तो वह रक्षासूत्र उनके भावनात्मक संबंधों को मजबूत बनाए रखता है साथ जीवन में खुशियों का आगमन होता है। न करें ये गलती हिंदू पंचांग के अनुसार भद्रा और राहुकाल के दौरान राखी नहीं बांधनी चाहिए। इन दोनों समय में किए गए कार्य अशुभ माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस समय राखी बांधने से भाई को कई परेशानियां आ सकती हैं।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राखी बांधते समय भूलकर भी उत्तर-पश्चिम दिशा में नहीं बैठना चाहिए। राखी बांधने के दौरान पूजा की थाली अक्षत यानी चावल मुख्य रूप से रखे जाते हैं। ध्यान रखें कि चावल टूटे हुए न हों। डिसक्लेमर: ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। 

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राम की तरह श्रीकृष्ण ने एक पत्नी व्रत क्यों नहीं लिया?

भगवान विष्णु के अवतार श्री राम ने आजीवन एक ही पत्नी धारण करने का व्रत लिया था जिसके चलते उनकी एक ही पत्नी थी लेकिन द्वापर युग में श्रीकृष्ण की 16 हजार पत्नियां हुईं और 8 पटरानियां थी, जबकि वे राधा से प्रेम करते थे लेकिन उन्होंने राधा से शादी नहीं की. श्रीमदभागवत की कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने राजा नरकासुर का वध किया था जिसके बाद उसके कैद से 16 हजार स्त्रियां आजाद हुई थीं और श्रीकृष्ण ने उन सभी के साथ विवाह किया था. लेकिन उन्होंने हजारों से स्त्रियों से विवाह क्यों किया था इसके पीछे की कथा को बहुत कम लोग ही जानते हैं. चलिए हम आपको बताते हैं उस कथा के बारे में. श्रीराम ने लिया था आजीवन एक पत्नी का व्रत आनंद रामायण के मुताबिक राम राज्य स्थापित होने के बाद एक दिन जब भगवान श्री राम अपने महल में थे, तब उनसे मिलने के लिए महर्षि वेदव्यास अपने शिष्यों के साथ पहुंचे. बातों ही बातों ने श्री राम ने उन्हें ये बताया कि उन्होनें एक पत्नी धारण करने का व्रत लिया है इसलिए सीता को छोड़कर सभी स्त्रियां उनके लिए माता कौशल्या के समान हैं. भगवान श्री कृष्ण की 16108 पत्नियों के पीछे क्या है पौराणिक कथा, जानिए श्री राम की इस बात को सुनकर वेदव्यासजी ने कहा कि आपने इस जन्म में एक पत्नी का व्रत लिया है तो इसके प्रभाव से जब आप द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रुप में जन्म लेंगे तब आपकी बहुत सारी पत्नियां होंगी. उन्होंने कहा कि इसके लिए आपको सीता के वजन के बराबर सोने की 16 मूर्तियां बनवाकर सरयू नदी के तट पर ब्राह्मणों को दान करना चाहिए. श्रीराम ने जब मूर्तियां बनवाकर दान किया तब उन मूर्तियों को लेते समय ब्राह्मणों ने श्री राम को वरदान दिया कि इस दान का आपको हजार गुना फल मिलेगा यानी अगले जन्म में आपकी 16 हज़ार पत्नियां होंगी. 16 हजार स्त्रियों ने श्रीराम से विवाह की जताई थी इच्छा रामायण की एक कथा के अनुसार एक समय श्री राम अपनी सेना के साथ शिकार पर गए तो उन्हें जंगल में एक गुफा दिखाई दी. जिसपर एक बहुत बड़ा पत्थर रखा हुआ था और उसे हटाना किसी के बस की बात नहीं थी, लेकिन श्री राम ने उस पत्थर एक ही प्रयास में हटा दिया. पत्थर हटाते ही उन्होंने देखा कि उस गुफा में चार स्त्रियां तपस्या कर रही थीं और उनके शरीर का मांस तपस्या के कारण गल चुका था. लेकिन जब श्री राम ने उन स्त्रियों को स्पर्श किया तो वो पहले की तरह सुंदर बन गईं. जब श्री राम ने उन स्त्रियों से पूछा कि वो कौन हैं तो उन्होंने बताया कि दुंदुभी नाम के दैत्य ने उन चारों के साथ अन्य 16 हजार स्त्रियों को इस गुफा में बंदी बनाया हुआ है. तब श्री राम ने उन्हें बताया कि दुंदुभी को बालि ने मार दिया है. इस बात को सुनकर स्त्रियां बेहद खुश हुईं तब श्री राम ने उनसे वरदान मांगने के लिए कहा जिसके बाद उन स्त्रियों ने श्री राम से गंधर्व विवाह करने की इच्छा जाहिर की. उन स्त्रियों की इस इच्छा को सुनकर श्री राम ने कहा कि उन्होंने इस जन्म में एक पत्नी का व्रत लिया है. लेकिन वो अपने कृष्ण जन्म में उन चारों के साथ विवाह करेंगे. ये सुनकर जब उन 16 हजार स्त्रियों ने भी श्री राम से विवाह की इच्छा जाहिर की तो श्री राम ने कहा कि द्वापर युग में दुंदुभी दैत्य नरकासुर के नाम से जन्म लेगा और उस जन्म में भी तुम सभी को कैद करेगा. तब मैं कृष्ण के अवतार में उसका वध करके तुम सभी से विवाह करुंगा. गौरतलब है त्रेता युग में श्री राम द्वारा लिए गए एक पत्नी व्रत और 16 हजार महिलाओं से अगले जन्म में विवाह करने के दिए हुए वचन के चलते ही द्वापर युग में श्रीकृष्ण की 16 हजार पत्नियां हुईं. नरकासुर के वध के उपलक्ष्य में ही मनाई जाती है ‘नरक चतुर्दशी’भगवान कृष्ण ने जिस दिन पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का संहार कर 16 हजार लड़कियों को कैद से आजाद करवाया था। इस उपलक्ष्य में दिवाली के एक दिन पहले ‘नरक चतुर्दशी’ मनाई जाती है।   

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भगवान श्री कृष्ण की 16108 पत्नियों के पीछे क्या है पौराणिक कथा, जानिए

Janmashtami 2023 Date: कान्हा के जन्मोत्सव को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है. जन्माष्टमी की डेट को लेकर कंफ्यूजन बना हुआ है. आइए जानते हैं जन्माष्टमी 6 या 7 सितंबर कब मनाई जाएगी. द्वापर युग में श्रीहरि विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अपना आठवां अवतार लिया था. कान्हा के जन्मोत्सव को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है. हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है. श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृषभ राशि और बुधवार के दिन हुआ था. इस साल जन्माष्टमी बहुत खास है क्योंकि इस बार कान्हा का जन्मदिवस बुधवार को ही मनाया जाएगा, हालांकि जन्माष्टमी की डेट को लेकर कंफ्यूजन बना हुआ है. आइए जानते हैं जन्माष्टमी 6 या 7 सितंबर कब मनाई जाएगी. जन्माष्टमी 2023 तिथि भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी तिथि शुरू – 06 सितंबर 2023, दोपहर 03.37  भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि समाप्त – 07 सितंबर 2023, शाम 04.14 जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा सनातन धार्मिक शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की 8 पत्नियां थी। इनके नाम क्रमश रुक्मणि जाम्बवन्ती सत्यभामा कालिन्दी मित्रबिन्दा सत्या भद्रा और लक्ष्मणा था। असुर नरकासुर के चलते भगवान श्रीकृष्ण को 16000 नारियों संग विवाह करना पड़ा था। भगवान श्रीकृष्ण की लीला अपरंपार है। उनकी लीलाओं का अंत नहीं है। अनंत काल से भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीलाओं के जरिए सृष्टि का संचालन कर रहे हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि ज्ञानगंज में भगवान श्रीराम और कृष्ण आज भी मानव रूप में उपस्थित हैं। धार्मिक ग्रंथों में भगवान की लीलाओं का वर्णन विस्तार रूप से है। इसमें एक लीला नरकासुर वध का है। असुर नरकासुर के चलते भगवान श्रीकृष्ण को 16000 नारियों संग विवाह करना पड़ा था। इसके लिए आज भी धार्मिक प्रसंगों में भगवान श्रीकृष्ण की 16108 पत्नियों की कथा सुनाई जाती है। आइए, भगवान श्रीकृष्ण के 16108 पत्नियों के बारे में सबकुछ जानते हैं सनातन धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की 8 पत्नियां थी। इनके नाम क्रमश: रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा था। इसके अलावा, उन्होंने 16000 से अधिक कन्याओं संग विवाह किया था। हालांकि, उन्होंने 16000 कन्याओं संग केवल विवाह किया था, किन्तु अर्धांगिनी रूप में स्वीकार नहीं किया था। वहीं, 16000 कन्याओं ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। इसके बावजूद वे सभी द्वारका में भगवान की भक्ति कर जीवन यापन करती थी। किंदवंती है कि एक बार नरकासुर का आतंक बहुत बढ़ गया। उसके आतंक से स्वर्ग लोक में हाहाकार मच गया। सत्ता छीनने के डर से स्वर्ग नरेश इंद्र, भगवान के शरण में गए और उनसे स्वर्ग की रक्षा करने का अनुरोध किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने आश्वासन दिया कि नरकासुर का अंत निकट है। वहीं, दूसरी तरफ नरकासुर अमरता का वरदान प्राप्ति हेतु 16000 हजार कन्याओं को बंदी बनाकर एक कारागार में डाल रखा था। कालांतर में भगवान ने 16000 कन्याओं को नरकासुर के कारागार से मुक्त कराया। जबकि, नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसे कोई पुरुष मार नहीं सकता है। उस समय सत्यभामा की मदद से कृष्णजी ने नरकासुर का वध किया। वहीं, 16000 हजार कन्याएं समाज के कलंक से बचने के लिए भगवान को ही अपना पति मान लिया। तब भगवान 16000 रूप में प्रकट होकर उन कन्याओं से विवाह किया था। डिसक्लेमर इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।

भगवान श्री कृष्ण की 16108 पत्नियों के पीछे क्या है पौराणिक कथा, जानिए Read More »

जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा

श्री कृष्ण के जन्मदिवस को भक्त बड़े ही प्रेम भाव से कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्र माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी कथा के बारे में जानते हैं। इससे पहले कि कृष्ण जन्माष्टमी की तिथि और पूजा मुहूर्त के बारे में जानिए। श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा। यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है? पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ माया थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी। उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा। यह है कृष्ण जन्म की कथा। श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूजन विधि जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व व्रत का नियम ग्रहण करे। जन्माष्टमी के दिन दोपहर को स्नानादि से निर्वत होकर भगवान कृष्ण के लिए एक सूतिका गृह बनाये। उसको फूलो और मालाओं से सजाये। द्वार रक्षा के लिए खड्ग रखना चाहिए। दीवारों को स्वास्तिक व रंगोली सजाये। सूतिका गृह सहित देवकी माता की प्रतिमा स्थापित करे। जन्माष्टमी व्रत कथा महत्व जन्माष्टमी व्रत परिवार में सौभाग्य और शांति लाता है। श्रीकृष्ण आपकी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं; और आपके विकास की बाधाओं पर जीत हासिल करने में मदद करते है। कृष्ण जन्माष्टमी का मुख्य महत्व सद्भावना को प्रोत्साहित करना और बुरी इच्छा को हतोत्साहित करना है। यह भी एक साथ प्रतीक है। पवित्र अवसर लोगों को एक साथ लाता है, इस प्रकार यह एकता और विश्वास का प्रतीक है।

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