2022

श्री राम रक्षा स्तोत्रम् (Shri Ram Raksha Stotram)

विनियोग:अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः ।श्री सीतारामचंद्रो देवता ।अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः ।श्रीमान हनुमान कीलकम ।श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः । अथ ध्यानम्‌:ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं,पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम ।वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम्नी,रदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम ॥ राम रक्षा स्तोत्रम्:चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥ ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं ॥2॥ सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥3॥ रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥ कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति ।घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥ जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥ करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित ।मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥ सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।उरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृताः ॥8॥ जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखांतकः ।पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामअखिलं वपुः ॥9॥ एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृति पठेत ।स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥10॥ पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः ।न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥ रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन ।नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥ जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥ वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत ।अव्याहताज्ञाः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥14॥ आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥ आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान स नः प्रभुः ॥16॥ तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥ फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥ शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥ आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा वक्ष याशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम ॥20॥ सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।गच्छन् मनोरथान नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥ रामो दाशरथी शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥ वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥ इत्येतानि जपन नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥ रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम ।स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥25॥ रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं,काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम ।राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिं,वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम ॥26॥ रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥ श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम,श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥ श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,श्रीराम चंद्रचरणौ वचसा गृणामि ।श्रीराम चन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,श्रीराम चन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥ माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी,रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,जाने नैव जाने न जाने ॥30॥ दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मज ।पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥31॥ लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं ।कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥ कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम ।आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम ॥34॥ आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥35॥ भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥36॥ रामो राजमणिः सदा विजयते,रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता,निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।रामान्नास्ति परायणं परतरं,रामस्य दासोस्म्यहं रामे चित्तलयः,सदा भवतु मे भो राम मामुद्धराः ॥37॥ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

श्री राम रक्षा स्तोत्रम् (Shri Ram Raksha Stotram) Read More »

रामनवमी ये आसान उपाय, सुखी एवं खुशहाल होगा जीवन

इस साल राम नवमी 10 अप्रैल दिन रविवार को है. चैत्र शुक्ल नवमी के दिन भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था. भगवान विष्णु ने लंकापति रावण के अत्याचारों से तीनों लोकों को मुक्ति दिलाने के लिए रामावतार लिया था. रामदेव मिश्रा शास्त्री ने बताया कि इस साल 09 अप्रैल की देर रात 01:23 बजे से नवमी तिथि प्रारंभ हो रही है, जो 11 अप्रैल को प्रात: 03:15 बजे तक है. राम नवमी के अवसर पर देशभर के राम मंदिरों में प्रभु श्रीराम की पूजा अर्चना की जाएगी और राम जन्मोत्सव मनाया जाएगा. राम नवमी के अवसर पर आप कुछ आसान उपायों से अपने जीवन को खुशहाल और सुखी बना सकते हैं. संकटों से बचाव का उपाय: यदि आप जीवन में किसी संकट से घिरे हुए हैं तो रामनवमी के दिन राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें. ऐसा करना आपको कष्‍टों से राहत देगा. रक्षा स्तोत्र पढ़ने हेतु करें क्लिक करें KARMASU राम नवमी के दिन शुभ मुहूर्त में प्रभु श्रीराम की पूजा करें. ​उस दौरान राम स्तुति श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन…करें. इसका पाठ करने से व्यक्ति के दुख और कष्ट दूर होते हैं. दुखों से निजात पाने का उपाय: दुख के समय में प्रभु की आराधना करना व्‍यक्ति को सकारात्‍मकता और धैर्य देती है. रामनवमी के दिन शुभ मुहूर्त में प्रभु श्रीराम की पूजा करना और राम स्तुति ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन…’ करना दुख-कष्‍टों से निजात दिलाता है मनोकामनाएं पूरी करने का उपाय: रामनवमी के दिन भगवान श्रीराम के परम भक्‍त हनुमान जी की आराधना करने से भगवान राम प्रसन्‍न होते हैं. लिहाजा रामनवमी के दिन हनुमान चालीसा का संपूर्ण पाठ करें, ऐसा करने से भक्‍तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. राम नवमी के दिन रामायण या रामचरितमानस का पाठ करना या कराना बहुत ही शुभ होता है. इससे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. सुख-समृद्धि पाने का उपाय: राम नाम में बहुत शक्ति होती है. रामनवमी के दिन भगवान श्रीराम का पूजन करना और राम नाम का जप करना जीवन में सुख-समृद्धि लाता है.  राम नवमी पूजा मुहूर्त 202210 अप्रैल को राम नवमी का शुभ मुहूर्त दिन में 11 बजकर 06 मिनट पर शुरु हो रहा है, जो दोपहर 01 बजकर 39 मिनट तक है. इस मुहूर्त में रामलला का जन्म होगा और मंदिरों में राम जन्मोत्सव मनाया जाएगा. इस दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 04 मिनट से दोपहर 12 बजकर 53 मिनट तक है. इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. KARMA इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

रामनवमी ये आसान उपाय, सुखी एवं खुशहाल होगा जीवन Read More »

Chaitra Navratri 2022: चैत्र नवरात्रि पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों को लगाएं इन चीजों का भोग

आदिशक्ति मां दुर्गा की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्रि 2 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है। मान्यता है कि नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की भक्ति भाव के साथ पूजा करने से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां अंबे को अगर भक्त नवरात्रि के समय राशिनुसार भोग लगाते हैं तो उन्हें दोगुना फल मिलता है। जानें माता रानी को कौन-सा भोग लगाना चाहिए। पहला स्वरूप मां शैलपुत्री पहला दिन मां शैलपुत्री का माना जाता है। आरोग्य और धन लाभ के लिए मां को गाय के घी का भोग लगाना शुभ होगा। मेष- मेष राशि वालों के लिए जातक स्कंद माता की उपासना करें और रोज दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। इसके अलावा मां शैलपुत्री को सफेद चीजों का भोग लगाएं। माता रानी को नारियल चढ़ाएं। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को लगाएं ये भोग नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन मां ब्रह्मचारिणी को चीनी का भोग लगाना चाहिए। इससे अच्छी सेहत के साथ दीर्घायु का वरदान मिलता है। वृषभ- वृषभ राशि के लोग नवरात्रि में घर में मोर पंख लगाएं। सौभाग्य की प्राप्ति के लिए नवरात्रि के समय माता को मिश्री व पंचामृत का भोग लगाएं। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को लगाएं ये भोग तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा का विधान है। इस दिन मां को भोग लगाने के साथ जरूरतमंद को दान देना शुभ माना जाता है। इसलिए तीसरे दिन मां को दूध या इससे संबंधी बनी हुई चीजों का भोग लगा सकते हैं। इससे धन लाभ होगा। मिथुन– नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के शक्कर का भोग लगाना शुभ रहेगा। मान्यता है कि इससे धन व वैभव की प्राप्ति होती है। चौथे दिन मां कुष्मांडा देवी को लगाएं ये भोग नवरात्रि के चौथे दिन माता कुष्मांडा देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन मां को मालपुआ का नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। इससे जातक के ऊपर मां का आशीर्वाद बना रहता है। कर्क- कर्क राशि वालों को गाय का घी अर्पित करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से भक्त को मां दुर्गा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। पांचवें दिन माता स्कंदमाता को लगाएं ये भोग नवरात्रि के पांचवे दिन माता स्कंदमाता को केले का भोग लगाना चाहिए। इससे व्यक्ति के बिजनेस, करियर में उन्नति होती है और हर काम बनने लगते है। सिंह- सिंह राशि के जातक माता रानी को मालपुए का भोग लगाएं। मान्यता है कि ऐसा करने से बुद्धि व कौशल का विकास होता है। छठे स्वरूप मां कात्यायनी को लगाएं ये भोग नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के छठवें अवतार मां कात्यायनी की पूजा की जाती हैं। इस दिन मां को शहद का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इससे जातक को धन, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। कन्या- कन्या राशि वालों को मां दुर्गा को शक्कर का भोग लगाना चाहिए। इससे धन व वैभव की प्राप्ति होती है। सातवें स्वरूप मां कालरात्रि को लगाएं ये भोग नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा करने का विधान है। रोग मुक्त होने के लिए मां कालरात्रि को गुड़ से बनाई हुई चीज का भोग लगाएं। तुला– तुला राशि वालों को मिठाई का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-शांति व खुशहाली आती है। आठवें स्वरूप मां महागौरी को लगाएं ये भोग नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा का आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा करने का विधान है। मां का आशीर्वाद पाने और हर इच्छा पूर्ण करने के लिए मां को नारियल का भोग लगाएं वृश्चिक- वृश्चिक राशि वालों को नवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा को रोज 1 नारियल चढ़ाना चाहिए। ऐसा करने से मां दुर्गा के प्रसन्न होने की मान्यता है। नौवें स्वरूप सिद्धिदात्री को लगाएं ये भोग नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री को हलवा, पूड़ी और खीर का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इस दिन ये भोग लगाने से मां की कृपा हमेशा जातक के ऊपर बनी रहती है। धनु- धनु राशि वालों को मां दुर्गा को दूध व उससे बनी चीजों का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से दुख व भय दूर होते हैं।मकर– मकर राशि वालों को नवरात्रि के दिनों में दूध व खीर का भोग लगाना चाहिए। सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।कुंभ- कुंभ राशि वालों को मां दुर्गा को गुड़ का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से पापों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।मीन- मीन राशि वाले मां दुर्गा को खीर या दूध से बनी चीजों का भोग लगाएं। ऐसा करने से घर में खुशहाली आने की मान्यता है।

Chaitra Navratri 2022: चैत्र नवरात्रि पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों को लगाएं इन चीजों का भोग Read More »

आज से शुरू होंगे इन राशियों के अच्छे दिन, देखें क्या आप भी हैं 

शुक्र ग्रह कल राशि परिवर्तन करने जा रहा है।  इस दिन शुक्र देव कुंभ राशि में प्रवेश कर जाएंगे। शुक्र देव को ज्योतिष में विशेष स्थान प्राप्त है।  ज्योतिष में शुक्र को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शुक्र ग्रह आज राशि परिवर्तन करने जा रहा है। इस दिन शुक्र देव कुंभ राशि में प्रवेश कर जाएंगे। शुक्र देव को ज्योतिष में विशेष स्थान प्राप्त है।  ज्योतिष में शुक्र को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शौहरत, कला, प्रतिभा, सौन्दर्य, रोमांस, काम-वासना और फैशन-डिजाइनिंग के कारक ग्रह हैं। शुक्र, वृष और तुला राशि के स्वामी होते हैं और मीन इनकी उच्च राशि है, जबकि कन्या इनकी नीच राशि है। शुक्र के राशि परिवर्तन करते ही कुछ राशि वालों का भाग्योदय होना तय है। आइए जानते हैं शुक्र के राशि परिवर्तन से किन राशि वालों के अच्छे दिन शुरू होंगे….  मिथुन राशि-  वाणी में सौम्यता रहेगी।  परिवार में हंसी खुशी का माहौल बना रहेगा। किसी पुराने मित्र एवं भाइयों के सहयोग से आय के स्रोत विकसित होंगे। आय में वृद्धि की संभावना है। दांपत्य जीवन सुखमय रहेगा। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए समय शुभ रहेगा। कर्क राशि-  मन में शांति व प्रसन्नता के भाव रहेंगे।  आत्मविश्वास से लबरेज रहेंगे। पारिवारिक जीवन सुखमय रहेगा।  माता व परिवार की किसी बुजुर्ग महिला से धन की प्राप्ती के योग बन रहे हैं। नौकरी में अफसरों का सहयोग।  स्थान परिवर्तन की संभावना भी बन रही है। धनु राशि-  धर्म के प्रति श्रद्धाभाव रहेगा।  आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। कला व संगीत के प्रति रूझान बढ़ेगा। परिवार के साथ यात्रा देशाटन के लिए जाना हो सकता है। अनियोजित खर्चों में वृद्धि हो सकती है। कार्यक्षेत्र में परिश्रम की अधिकता रहेगी। मकर राशि-  कला व संगीत के प्रति रूझान बढ़ेगा।  पारिवारिक जीवन सुखमय रहेगा। संपत्ति से आय में वृद्धि हो सकती है।  संतान की ओर से सुखद समाचार मिल सकते हैं। नौकरी में तरक्की की संभावनएं बन रही हैं।  अफसरों का सहयोग मिलेगा। आय में वृद्धि होगी।  वाहन सुख का विस्तार संभव है। (इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।)

आज से शुरू होंगे इन राशियों के अच्छे दिन, देखें क्या आप भी हैं  Read More »

नवसंवत्सर में इन राशि वालों पर रहेगी मां लक्ष्मी की विशेष कृपा, नौकरी में प्रमोशन के बनेंगे प्रबल योग

नवसंवत्सर की शुरुआत में मंगल और राहु-केतु अपनी उच्च राशि में रहेंगे वहीं, शनि खुद की ही राशि मकर में होगा। नववर्ष के सूर्योदय की कुंडली में शनि-मंगल की युति से धन, भाग्य और लाभ का शुभ योग बन रहा है। इस योग के प्रभाव से ये साल मिथुन, तुला और धनु राशि वाले लोगों के लिए बहुत शुभ रहेगा। वहीं, अन्य राशियों के लिए बड़े बदलाव का समय रहेगा। ग्रहों का ऐसा संयोग 1563 साल बाद बन रहा है। इससे पहले 22 मार्च 459 को ये ग्रह स्थिति बनी थी। ग्रह-नक्षत्रों के लिहाज से अप्रैल का महीना खास होने वाला है। इस महीने कई ग्रहों का राशि परिवर्तन होगा। ग्रहों का राशि परिवर्तन का प्रभाव मेष से लेकर मीन राशि तक वालों पर पड़ेगा। ग्रहों की स्थिति से कुछ राशि वालों को धन संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि कुछ राशि वालों की परेशानी दूर होगी। जानें अप्रैल में किन ग्रहों का होगा राशि परिवर्तन व किन राशि वालों को होगा जबरदस्त लाभ- अप्रैल 2022 में ग्रहों का राशि परिवर्तन- 07 अप्रैल 2022 को मंगल का कुंभ राशि में गोचर होगा। इसके अगले दिन यानी 08 अप्रैल को बुध का मेष राशि में प्रवेश होगा। 12 अप्रैल को राहु-केतु राशि परिवर्तन करेंगे। राहु मेष राशि में और केतु का तुला राशि में गोचर होगा। 13 अप्रैल को गुरुदेव बृहस्पति का मीन राशि में गोचर होगा। 14 अप्रैल को सूर्य का मेष राशि में गोचर होगा। 25 अप्रैल को बुध का वृषभ राशि में गोचर होगा। 27 अप्रैल को शुक्र का मीन राशि में गोचर होगा। 29 अप्रैल को शनि का कुंभ राशि में गोचर होगा। मिथुन- अप्रैल का महीना मिथुन राशि वालों के लिए लाभकारी रहेगा। इस समय आपकी राशि में शनि ढैय्या का प्रभाव बना है। शनि के राशि परिवर्तन के साथ ही आपको शनि ढैय्या से मुक्ति मिल जाएगी। इस महीने आपके रुके हुए कार्य पूरे होंगे। नए समाचार मिल सकते हैं। शादी-विवाह में आने वाली बाधाएं दूर हो सकती हैं। आय के साधनों में वृद्धि होगी। कन्या-  कन्या राशि वालों के लिए नौकरी में स्थान परिवर्तन के योग बन रहे हैं। सरकारी नौकरी करने वाले जातकों का स्थान परिवर्तन संभव है। ऑफिस में मान-सम्मान बढ़ेगा। आय के साधनों में वृद्धि होगी।  नौकरी पेशा करने वाले जातकों के तरक्की के योग बनेंगे। इस समय आप खुद का कारोबार शुरू करने की सोच सकते हैं। घर में कोई महत्वपूर्ण चीज खरीद कर ला सकते हैं। मकर- मकर राशि में शनिदेव विराजमान हैं। 29 अप्रैल को शनि कुंभ राशि में प्रवेश कर जाएंगे। शनि का राशि परिवर्तन धन के मामले में आपके लिए लाभकारी रहेगा। भाग्य में वृद्धि होगी। इस दौरान आपको नए अवसरों का लाभ मिलेगा। गुस्से पर काबू रखें। 

नवसंवत्सर में इन राशि वालों पर रहेगी मां लक्ष्मी की विशेष कृपा, नौकरी में प्रमोशन के बनेंगे प्रबल योग Read More »

भारतीय नवसंवत्सर 2079 : 1563 साल बाद दुर्लभ संयोग में शुरू होगा हिंदू नव वर्ष जानें इस साल कौन होगा राजा- मंत्री,

नवसंवत्सर की शुरुआत में मंगल और राहु-केतु अपनी उच्च राशि में रहेंगे वहीं, शनि खुद की ही राशि मकर में होगा। नववर्ष के सूर्योदय की कुंडली में शनि-मंगल की युति से धन, भाग्य और लाभ का शुभ योग बन रहा है। इस योग के प्रभाव से ये साल मिथुन, तुला और धनु राशि वाले लोगों के लिए बहुत शुभ रहेगा। वहीं, अन्य राशियों के लिए बड़े बदलाव का समय रहेगा। ग्रहों का ऐसा संयोग 1563 साल बाद बन रहा है। इससे पहले 22 मार्च 459 को ये ग्रह स्थिति बनी थी। इस बार नव संवत्सर 2079 शनिवार, 2 अप्रैल से शुरू हो रहा है। चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होगी। नवरात्रि के दौरान मां आदिशक्ति की मंदिरों के साथ घर घर में आराधना होगी। मां इस बार नव संवत्सर 2079 शनिवार, 2 अप्रैल से शुरू हो रहा है। चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होगी। रामदेव मिश्र शास्त्री ने बताया कि नए संवत्सर का नाम नल है और राजा शनि देव तो मंत्री वृहस्पति रहेंगे। शनिवार से ही चैत्र नवरात्र भी शुरू हो जाएगी। नवरात्र व्रत का पारण 11 अप्रैल सोमवार को प्रातः काल में किया जाएगा। इसी दिन धर्मराज दशमी भी मनाया जाएगा। ये नववर्ष रेवती नक्षत्र में शुरू होगा। इसके स्वामी बुध हैं। बुध के कारण कारोबार में फायदा होता है इसलिए इस नक्षत्र में खरीदी-बिक्री करना शुभ माना जाता है। व्यापार का कारक बुध भी इस नक्षत्र में रहेगा। जिससे बड़े लेन-देन और निवेश के लिए पूरा साल शुभ रहेगा। साल की शुरुआत मीन राशि में हो रही है। जिसके स्वामी गुरु है। इसलिए ये समय सबके लिए शुभ रहेगा। पूरे नवरात्र में मंगल अपने ही नक्षत्र में रहेगा। साथ ही 5 दिन उच्च राशि में रहेगा। जिससे प्रॉपर्टी के कारोबार में तेजी आने के योग हैं। वहीं, बृहस्पति के कारण खरीदारी से सुख-समृद्धि बढ़ेगी। इस बार नव वर्ष की शुरुआत सरल, सत्कीर्ति और वेशि राजयोगों में हो रही है। इससे नवरात्र में खरीदारी लेन-देन निवेश और नए कामों की शुरुआत शुभ रहेगी। इन योगों का शुभ फल पूरे साल दिखेगा।देश के लिए सुख समृद्धि के साथ आर्थिक मजबूती और व्यापार बढ़ाने वाला रहेगा ।रेवती नक्षत्र और बुध से बड़े लेन-देन व निवेश के लिए पूरा साल शुभ रहेगा। प्रॉपर्टी के कारोबार में तेजी आएगी। वृहस्पति के कारण खरीदारी से सुख-समृद्धि बढ़ेगी। नए संवत्सर में ग्रहों की खगोलीय मंत्री परिषद के 10 विभागों में राजा और मंत्री सहित पांच विभाग पाप ग्रहों के पास तथा 5 शुभ ग्रहों के पास रहेंगे। इस वर्ष राजा-शनि, मंत्री गुरु, सस्पेश सूर्य, दुर्गेश बुध, धनेश-शनि, रसेश मंगल, धान्येश-शुक्र, नीरसेश-शनि, फलेश मेघेश-बुध होंगे।

भारतीय नवसंवत्सर 2079 : 1563 साल बाद दुर्लभ संयोग में शुरू होगा हिंदू नव वर्ष जानें इस साल कौन होगा राजा- मंत्री, Read More »

होली का वास्तविक स्वरुप

इस पर्व का प्राचीनतम नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है अर्थात् बसन्त ऋतु के नये अनाजों से किया हुआ यज्ञ, परन्तु होली होलक का अपभ्रंश है। यथा–तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक: (शब्द कल्पद्रुम कोष) अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह।(भाव प्रकाश) अर्थात्―तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है। होलिका―किसी भी अनाज के ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं-जैसे-चने का पट पर (पर्त) मटर का पट पर (पर्त), गेहूँ, जौ का गिद्दी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूँ, जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते हैं कि वह चनादि का निर्माण करती (माता निर्माता भवति) यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूँ व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूँ, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात् होलिका रुपी पट पर (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया। अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है और बसन्त ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है। यथा―वासन्तो=वसन्त ऋतु। नव=नये। येष्टि=यज्ञ। इसका दूसरा नाम नव सम्वतसर है। मानव सृष्टि के आदि से आर्यों की यह परम्परा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात् स्वयं भोग करते थे। हमारा कृषि वर्ग दो भागों में बँटा है―(1) वैशाखी, (2) कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय एवं रबी और खरीफ की फसल कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। अब तक चना, मटर, अरहर व जौ आदि अनेक नवान्न पक चुके होते हैं। अत: परम्परानुसार पितरों देवों को समर्पित करें, कैसे सम्भव है। तो कहा गया है–अग्निवै देवानाम मुखं अर्थात् अग्नि देवों–पितरों का मुख है जो अन्नादि शाकल्यादि आग में डाला जायेगा। वह सूक्ष्म होकर पितरों देवों को प्राप्त होगा। हमारे यहाँ आर्यों में चातुर्य्यमास यज्ञ की परम्परा है। वेदज्ञों ने चातुर्य्यमास यज्ञ को वर्ष में तीन समय निश्चित किये हैं―(1) आषाढ़ मास, (2) कार्तिक मास (दीपावली) (3) फाल्गुन मास (होली) यथा फाल्गुन्या पौर्णामास्यां चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जीत मुखं वा एतत सम्वत् सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी आषाढ़ी पौर्णमासी अर्थात् फाल्गुनी पौर्णमासी, आषाढ़ी पौर्णमासी और कार्तिकी पौर्णमासी को जो यज्ञ किये जाते हैं वे चातुर्यमास कहे जाते हैं आग्रहाण या नव संस्येष्टि। समीक्षा―आप प्रतिवर्ष होली जलाते हो। उसमें आखत डालते हो जो आखत हैं–वे अक्षत का अपभ्रंश रुप हैं, अक्षत चावलों को कहते हैं और अवधि भाषा में आखत को आहुति कहते हैं। कुछ भी हो चाहे आहुति हो, चाहे चावल हों, यह सब यज्ञ की प्रक्रिया है। आप जो परिक्रमा देते हैं यह भी यज्ञ की प्रक्रिया है। क्योंकि आहुति या परिक्रमा सब यज्ञ की प्रक्रिया है, सब यज्ञ में ही होती है। आपकी इस प्रक्रिया से सिद्ध हुआ कि यहाँ पर प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ की परम्परा रही होगी इस प्रकार चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस होली रुपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते थे। आप जो गुलरियाँ बनाकर अपने-अपने घरों में होली से अग्नि लेकर उन्हें जलाते हो। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हवनों की है। सामूहिक बड़े यज्ञ से अग्नि ले जाकर अपने-अपने घरों में हवन करते थे। बाहरी वायु शुद्धि के लिए विशाल सामूहिक यज्ञ होते थे और घर की वायु शुद्धि के लिए छोटे-छोटे हवन करते थे दूसरा कारण यह भी था। ऋतु सन्धिषु रोगा जायन्ते―अर्थात् ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होते हैं, उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किये जाते थे। यह होली हेमन्त और बसन्त ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम साधन है। अब होली प्राचीनतम वैदिक परम्परा के आधार पर समझ गये होंगे कि होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है। *पौराणिक मत में कथा इस प्रकार है―होलिका हिरण्यकश्यपु नाम के राक्षस की बहिन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का प्रह्लाद नाम का आस्तिक पुत्र विष्णु की पूजा करता था। वह उसको कहता था कि तू विष्णु को न पूजकर मेरी पूजा किया कर। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठे। वह प्रह्लाद को आग में गोद में लेकर बैठ गई, होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। होलिका की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है जो नितान्त मिथ्या है।

होली का वास्तविक स्वरुप Read More »

प्रेरक कथा: श्री कृष्ण मोर से, तेरा पंख सदैव मेरे शीश पर होगा! (Prerak Katha Shri Krishn Mor Se Tera Aankh Sadaiv Mere Shish)

श्री कृष्ण के लीला काल का समय था, गोकुल में एक मोर रहता था, वह मोर बहुत चतुर था और श्री कृष्ण का भक्त था, वह श्री कृष्ण की कृपा पाना चाहता था। इसके लिए उस मोर ने एक युक्ति सोची वह श्री कृष्ण के द्वार पर जा पहुंचा, जब भी श्री कृष्ण द्वार से अंदर-बाहर आते-जाते तो उनके द्वार पर बैठा वह मोर एक भजन गाता।मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… इस प्रकार प्रतिदिन वह यही गुनगुनाता रहता एक दिन हो गया, 2 दिन हो गये इसी तरह 1 साल व्यतीत हो गया, परन्तु कृष्ण जी ने उसकी एक ना सुनी एक दिन दुखी होकर मोर रोने लगा। तभी वहा से एक मैना उडती जा रही थी, उसने मोर को रोता हुए देखा तो बहुत अचंभित हुई। वह अचंभित इस लिए नहीं थी की मोर रो रहा था वह इस लिए अचंभित हुई की श्री कृष्ण के द्वार पर कोई रो रहा था। मैना मोर के पास गई और उससे उसके रोने का कारण पूंछा वह मोर से बोली -हे मोर तू क्यों रोता हैं तब मोर ने बताया की पिछले एक वर्ष से में इस छलिये को रिझा रहा हु, परन्तु इसने आज तक मुझे पानी भी नही पिलाया। यह सुनकर मैना बोली -में श्री राधे के बरसना से आई हु.. तू मेरे साथ वहीं चल, राधे रानी बहुत दयालु हैं वह तुझ पर अवश्य ही करुणा करेंगी। मोर ने मैना की बात से सहमति जताई और दोनों उड़ चले बरसाने की और उड़ते उड़ते बरसाने पहुच गये। राधा रानी के द्वार पर पहुँच कर मैना ने गाना शुरू किया श्री राधे राधे, राधे बरसाने वाली राधे… परन्तु मोर तो बरसाने में आकर भी यही दोहरा रहा था मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… जब राधा जी ने ये सुना तो वो दोड़ी चली आई और प्रेम से मोर को गले लगा लिया, और मोर से पूंछा कि तू कहाँ से आया है। तब मोर बोला -जय हो राधा रानी आज तक सुना था की तुम करुणामयी हो और आज देख भी लिया। राधा रानी बोली वह कैसे तब मोर बोला में पिछले एक वर्ष से के द्वार पर कृष्ण नाम की धुन गाता रहा हु किन्तु कृष्ण जी ने मेरी सुनना तो दूर कभी मुझको थोड़ा सा पानी भी नही पिलाया.. राधा रानी बोली अरे नहीं मेरे कृष्ण ऐसे नहीं है, तुम एक बार फिर से वही जाओ किन्तु इस बार कृष्ण-कृष्ण नहीं राधे-राधे रटना। मोर ने राधा रानी की बात मान ली और लौट कर गोकुल वापस आ गया फिर से कृष्ण के द्वार पर पहुंचा और इस बार रटने लगा जय राधे राधे! जय राधे राधे! जय राधे राधे!… जब कृष्ण जी ने ये सुना तो भागते हुए आये और उन्होंने भी मोर को प्रेम से गले लगा लिया और बोले हे मोर, तू कहा से आया हैं। यह सुनकर मोर बोला – वाह रे छलिये जब एक वर्ष से तेरे नाम की रट लगा रहा था, तो कभी पानी भी नही पूछा और जब आज जय राधे राधे..बोला तो भागता हुआ आ गया ! कृष्ण बोले अरे बातो में मत उलझा, पूरी बात बता..! तब मोर बोला में पिछले एक वर्ष से आपके द्वार पर यही गा रहा हूँ। मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… किन्तु आपने कभी ध्यान नहीं दिया तो में बरसाने चला गया, इस प्रकार मोर ने समस्त वृतांत कृष्ण जी को कह सुनाया। तब कृष्ण जी बोले – मेने तुझको कभी पानी नहीं पिलाया यह मेने पाप किया है, और तूने राधा का नाम लिया,यह तेरा सौभाग्य है। इसलिए में तुझको वरदान देता हूँ कि जब तक ये सृष्टि रहेगी, तेरा पंख सदेव मेरे शीश पर विराजमान होगा..! और जो भी भक्त राधा का नाम लेगा, वो भी सदा मेरे शीश पर रहेगा..!! अतः श्री कृष्ण के भक्त प्रेमियों यदि श्री कृष्ण का सनिध्ये चाहिए तो प्रेम से कहिये…जय राधे राधे! जय राधे राधे! जय राधे राधे!…

प्रेरक कथा: श्री कृष्ण मोर से, तेरा पंख सदैव मेरे शीश पर होगा! (Prerak Katha Shri Krishn Mor Se Tera Aankh Sadaiv Mere Shish) Read More »

प्रेरक कथा: श‌िव के साथ ये 4 चीजें जरुर दिखेंगी! (Shiv Ke Sath Ye 4 Cheejen Jarur Dikhengi)

भगवान श‌िव का ध्यान करने मात्र से मन में जो एक छव‌ि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की। इनके एक हाथ में त्र‌िशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, स‌िर पर त्र‌िपुंड चंदन लगा हुआ है। आप दुन‌िया में कहीं भी जाइये आपको श‌िवालय में श‌िव के साथ ये 4 चीजें जरुर द‌‌िखेगी। क्या यह श‌िव के साथ ही प्रकट हुए थे या अलग-अलग घटनाओं के साथ यह श‌िव से जुड़ते गए।1. श‌िव जी का त्र‌िशूल क्या है?भगवान श‌िव सर्वश्रेष्ठ सभी प्रकार के अस्‍त्र-शस्‍त्रों के ज्ञाता हैं लेक‌िन पौराण‌िक कथाओं में इनके दो प्रमुख अस्‍त्रों का ज‌िक्र आता है एक धनुष और दूसरा त्र‌िशूल। भगवान श‌िव के धनुष के बारे में तो यह कथा है क‌ि इसका आव‌िष्कार स्वयं श‌िव जी ने क‌िया था। लेक‌िन त्र‌िशूल कैसे इनके पास आया इस व‌िषय में कोई कथा नहीं है। माना जाता है क‌ि सृष्ट‌ि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब श‌िव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए। यही तीनों गुण श‌िव जी के तीन शूल यानी त्र‌िशूल बने। इनके बीच सांमजस्य बनाए बगैर सृष्ट‌ि का संचालन कठ‌िन था। इसल‌िए श‌िव ने त्र‌िशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण क‌िया। 2. जानें कैसे आया श‌िव के हाथों में डमरू?भगवन श‌िव के हाथों में डमरू आने की कहानी बड़ी ही रोचक है। सृष्ट‌ि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुई तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सष्ट‌ि में ध्वन‌ि जो जन्म द‌िया। लेक‌िन यह ध्वन‌ि सुर और संगीत व‌िहीन थी। उस समय भगवान श‌िव ने नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए और इस ध्वन‌ि से व्याकरण और संगीत के धन्द, ताल का जन्म हुआ। कहते हैं क‌ि डमरू ब्रह्म का स्वरूप है जो दूर से व‌िस्‍तृत नजर आता है लेक‌िन जैसे-जैसे ब्रह्म के करीब पहुंचते हैं वह संकु‌च‌ित हो दूसरे स‌िरे से म‌िल जाता है और फ‌िर व‌िशालता की ओर बढ़ता है। सृष्ट‌ि में संतुलन के ल‌िए इसे भी भगवान श‌िव अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे। 3. श‌िव के गले में व‌िषधर नाग कहां से आया?भगवान श‌िव के साथ हमेशा नाग होता है। इस नाग का नाम है वासुकी। इस नाग के बारे में पुराणों में बताया गया है क‌ि यह नागों के राजा हैं और नागलोक पर इनका शासन है। सागर मंथन के समय इन्होंने रस्सी का काम क‌िया था ज‌िससे सागर को मथा गया था। कहते हैं क‌ि वासुकी नाग श‌िव के परम भक्त थे। इनकी भक्त‌ि से प्रसन्न होकर श‌िव जी ने इन्हें नागलोक का राजा बना द‌िया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांत‌ि ल‌िपटे रहने का वरदान द‌िया। 4. श‌िव के स‌िर पर चन्द्र कैसे पहुंचे?श‌िव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का व‌िवाह दक्ष प्रजापत‌ि की 27 कन्याओं से हुआ था। यह कन्‍याएं 27 नक्षत्र हैं। इनमें चन्द्रमा रोह‌िणी से व‌िशेष स्नेह करते थे। इसकी श‌िकायत जब अन्य कन्याओं ने दक्ष से की तो दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का शाप दे द‌िया। इस शाप बचने के ल‌िए चन्द्रमा ने भगवान श‌िव की तपस्या की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर श‌िव जी ने चन्द्रमा के प्राण बचाए और उन्हें अपने श‌‌ीश पर स्‍थान द‌िया। जहां चन्द्रमा ने तपस्या की थी वह स्‍थान सोमनाथ कहलाता है। मान्यता है क‌ि दक्ष के शाप से ही चन्द्रमा घटता बढ़ता रहता है।

प्रेरक कथा: श‌िव के साथ ये 4 चीजें जरुर दिखेंगी! (Shiv Ke Sath Ye 4 Cheejen Jarur Dikhengi) Read More »

कथा: हनुमान गाथा (Katha Hanuman Gatha)

हम आज पवनसुत हनुमान की कथा सुनाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं ।जो रोम-रोम में सिया राम की छवि बासाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं ।पुंजिकस्थला नाम था जिसका,स्वर्ग की थी सुंदरी ।वानर राज को जर के जन्मी नाम हुआ, अंजनीकपि राज केसरी ने उससे,ब्याह रचाया था ।गिरी नामक संगपर क्या आनंद,मंगल छाया था ।राजा केसरी को अंजना का,रूप लुभाया था ।देख देख अंजनी को उनका,मान हार्षया था ।वैसे तो उनके जीवन में थी,सब खुशहाली ।परन्तु गोद अंजनी माता की,संतान से थी खाली ।अब सुनो हनुमंत कैसे पवन के पुत्र कहते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।बजरंगबली उस महाबली की,गाथा गाते है, हम कथा सुनाते हैं । हम आज पवनसुत हनुमान की कथा सुनाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं । पुत्र प्राप्ति कारण मां आंजना,तब की थी भारी ।मदन मुनि प्रसन्न हुए,अंजना पर अति भारी ।बक्तेश्वर भगवान को,जप और तप से प्रशन्न किया ।अंजना ने आकाश गंगा का,पावन जल पिया ।घोर तपस्या करके,वायु देव को प्रसन्न किया ।अंजनी मां को स्पर्श किया,वायु का एक झोंका ।पवन देव हो प्रकट उन्हें,फिर पुत्र प्रदान किया ।इस कारण बजरंग,पवन के पुत्र कहते हैं ।बजरंगबली उस महाबली की,गाथा गाते है, हम कथा सुनाते हैं । हम आज पवनसुत हनुमान की कथा सुनाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं । राजा केसरी और अंजना,करते शिव पूजा ।शिव भक्ति के बिना नहीं था,काम उन्हें दूजा ।हो प्रशन शिव प्रकट हुए,तब अंजना वर मांगी ।हे शिव शंकर पुत्र मेरा हो,आपके जैसा ही ।क्यों भाई जी बोले अंजना होगी,पूर्ण तेरी इच्छा ।मेरे अंश का 11 रुद्र ही,पुत्र तेरा होगा ।जन्म लिया बजरंगी,छठ गए संकट के बादल ।चैत्र शुक्ल की 15 की,और दिन था शुभ मंगल ।बजरंगी तब से शंकर के,अवतार कहते हैं, पावन कथा सुनाते हैं ।बजरंगबली उस महाबली की,गाथा गाते है, हम कथा सुनाते हैं । हम आज पवनसुत हनुमान की कथा सुनाते हैं,पावन कथा सुनाते हैं ।वीरों के वीर उस महावीर की गाथा गाते हैं,हम कथा सुनाते हैं । केसरी नंदन का है भक्तो प्यारा था बचपनझूल रहे थे चंदन के पालने में सुख रंजनकामकाज में लगी हुई थी तब अंजना रानीसूरज को फल समझ उन्होंने खाने की ढाणीउड़ने की शक्ति पवन देव ने उनको दे ही दी थीउड़ने लगे सूरज का फल खाने वाले बजरंगीवायु देव को चिंता हुई मेरा बच्चा जल ना जाएसूर्य देव की किरणों से मेरा फूल झुलस ना जाएबारुद के जैसी बायो देव आवाज चलाते हैंहम कथा सुनाते हैं सूर्य देव ने उनको आते देखा अपनी ओरसमझ गए वह पवन पुत्र है नहीं बालक कोई औरशीतल कर ली सूर्य देव ने अपनी गरम किरणेंपवन पुत्र गुरु रत्न पर चढ़कर सूर्य लगे डसनेअमावस्या को जब राहु सर्प डस ने को आयाबजरंगी का खेल देखकर बड़ा ही घबरायाइंद्रदेव को आकर सारा हाल था बतलायाबोला एक बालक से मैं तो प्राण थोड़ा लायाइंद्रदेव को साथ में लेकर राहु आते हैंहम कथा सुनाते हैं बाकी की गाथा को जल्दी ही पूरा किया जाएगा…

कथा: हनुमान गाथा (Katha Hanuman Gatha) Read More »

अक्षय तृतीया कथा (Akshaya Tritiya Katha)

अक्षय तृतीया की एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसका सदाचार तथा देव एवं ब्राह्मणों के प्रति उसकी श्रद्धा अत्यधिक प्रसिद्ध थी।अक्षय तृतीया व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने अक्षय तृतीया पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के उपरांत भी उसने उपवास करके धर्म-कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे अगले जन्म में कुशावती का राजा हुए। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान-पुण्य व पूजन के कारण वह अपने अगले जन्म में बहुत धनी एवं प्रतापी राजा बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ, वह प्रतापी राजा महान एवं वैभवशाली होने के बावजूद भी धर्म मार्ग से कभी विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे के जन्मों में भारत के प्रसिद्ध सम्राट चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुए थे।

अक्षय तृतीया कथा (Akshaya Tritiya Katha) Read More »

अक्षय तृतीया: श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार (Akshaya Tritiya: Shri Krishna Mundan Sanskar)

प्राचीन काल में व्रज के लोगों का मुख्य व्यवसाय गौ-चारण ही था इसलिए मुख्य व्यवसाय से सम्बंधित कुछ वर्जनाएं भी थी। अब इसे वर्जनाएं कहें या सामाजिक नियम बालक का जब तक मुंडन नहीं हो जाता तब तक उसे जंगल में गाय चराने नहीं जाने दिया जाता था।अब तो हम काफी आधुनिक हो गये हैं या यूं कह सकते हैं अपनी जड़ों से दूर हो गये हैं नहीं तो हमारे यहाँ भी बालक को मुंडन के पहले ऐसी-वैसी जगह नहीं जाने दिया जाता था। खैर! बालक कृष्ण रोज़ अपने परिवार के व पास-पडौस के सभी पुरुषों को, थोड़े बड़े लड़कों को गाय चराने जाते देखते तो उनका भी मन करता पर मैया यशोदा उन्हें मना कर देती कि अभी तू छोटा है, थोड़ा बड़ा हो जा फिर जाने दूँगी। एक दिन बलराम जी को गाय चराने जाते देख कर लाला अड़ गये: दाऊ जाते हैं तो मैं भी गाय चराने जाऊंगा। ये क्या बात हुई। वो बड़े और मैं छोटा ? मैया ने समझाया कि दाऊ का मुंडन हो चुका है इसलिए वो जा सकते हैं, तुम्हारा मुंडन हो जायेगा तो तुम भी जा सकोगे। लाला को चिंता हुई इतनी सुन्दर लटें रखे या गाय चराने जाएँ? बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने सोचा कि लटें तो फिर से उग जायेगी पर गाय चराने का इतना आनंद अब मुझसे दूर नही रहना चाहिए। वे तुरंत नन्दबाबा से बोले: कल ही मेरा मुंडन करा दो। मुझे गाय चराने जाना है। नंदबाबा हँस के बोले: ऐसे कैसे करा दें मुंडन। हमारे लाला के मुंडन में तो बहुत बड़ा आयोजन करेंगे तब लाला के केश जायेंगे। लाला ने अधीरता से कहा: आपको जो आयोजन करना है करो पर मुझे गाय चराने जाना है। आप जल्दी से जल्दी मेरा मुंडन करवाओ। मुंडन तो करवाना ही था अतः नंदबाबा ने गर्गाचार्यजी से लाला के मुंडन का शुभ-मुहूर्त निकलवाने का आग्रह किया। इसलिए उस दिन मुंडन का आयोजन तय हुआ। आसपास के सभी गावों में न्यौते बांटे गये, हर्षोल्लास से कई तैयारियां की गयी। आखिर आयोजन का दिन आ ही गया। आसपास के गावों के हजारों अतिथियों की उपस्थिति में भव्य आयोजन हुआ, मुंडन हुआ और मुंडन होते ही लाला मैया से बोले: मैया मुझे कलेवा (नाश्ता) दो। मुझे गाय चराने जाना है। मैया थोड़ी नाराज़ होते हुए बोली: इतने मेहमान आये हैं घर में तुम्हें देखने और तुम हो कि इतनी गर्मी में गाय चराने जाना है। थोड़े दिन रुको गर्मी कम पड़ जाए तो मैं तुम्हें दाऊ के साथ भेज दूँगी। लाला भी अड़ गये: ऐसा थोड़े होता है। मैंने तो गाय चराने के लिए ही मुंडन कराया था। नहीं तो मैं इतनी सुन्दर लटों को काटने देता क्या? मैं कुछ नहीं जानता। मैं तो आज और अभी ही जाऊंगा गाय चराने। मैया ने नन्दबाबा को बुला कर कहा: लाला मान नहीं रहा। थोड़ी दूर तक आप इसके साथ हो आइये। इसका मन भी बहल जायेगा। क्योंकि इस गर्मी में मैं इसे दाऊ के साथ या अकेले तो भेजूंगी नहीं। नन्दबाबा सब को छोड़ कर निकले। लाला भी पूरी तैयारी के साथ छड़ी, बंसी, कलेवे की पोटली ले कर निकले एक बछिया भी ले ली जिसे हुर्र। हुर्र कर घेर कर वो अपने मन में ही बहुत खुश हो रहे थे। कि आखिर मैं बड़ा हो ही गया। बचपन में सब बड़े होने के पीछे भागते हैं कि कब हम बड़े होगे। और आज हम बड़े सोचते हैं कि हम बालक ही रहते तो कितना अच्छा था। खैर! गर्मी भी वैशाख माह की थी और व्रज में तो वैसे भी गर्मी प्रचंड होती है। थोड़ी ही देर में बालक श्रीकृष्ण गर्मी से बेहाल हो गये पर अपनी जिद के आगे हार कैसे मानते, बाबा को कहते कैसे की थक गया हूँ। अब घर ले चलो। चलते रहे.. मैया होती तो खुद समझ के लाला को घर ले आती पर संग में बाबा थे, वे भी चलते रहे। थोड़ी ही दूर ललिताजी और कुछ अन्य सखियाँ मिली। देखते ही लाला की हालत समझ गयी। गर्मी से कृष्ण का मुख लाल हो गया था सिर पर बाल भी नही थे इसलिए लाला पसीना-पसीना हो गये थे। उन्होंने नन्दबाबा से कहा कि आप इसे हमारे पास छोड़ जाओ। हम इसे कुछ देर बाद नंदालय पहुंचा देंगे। नंदबाबा को रवाना कर वो लाला को निकट ही अपने कुंज में ले गयीं। उन्होंने बालक कृष्ण को कदम्ब की शीतल छांया में बिठाया और अपनी अन्य सखी को घर से चन्दन, खरबूजे के बीज, मिश्री का पका बूरा, इलायची, मिश्री आदि लाने को कहा। सभी सामग्री ला कर उन सखियों ने प्रेम भाव से कृष्ण के तन पर चन्दन की गोटियाँ लगाई और सिर पर चन्दन का लेप किया। कुछ सखियों ने पास में ही बूरे और खरबूजे के बीज के लड्डू बना दिए और इलायची को पीस कर मिश्री के रस में मिला कर शीतल शरबत तैयार कर दिया और बालक कृष्ण को प्रेमपूर्वक आरोगाया। साथ ही ललिता जी लाला को पंखा झलने लगी। यह सब अरोग कर लाला को नींद आने लगी तो ललिताजी ने उन्हें वहीँ सोने को कहा और स्वयं उन्हें पंखा झलती रही। कुछ देर आराम करने के बाद लाला उठे और ललिताजी उन्हें नंदालय छोड़ आयीं। आज भी अक्षय-तृतीया के दिन प्रभु को ललिताजी के भाव से बीज के लड्डू और इलायची का शीतल शर्बत आरोगाये जाते हैं व विशेष रूप से केशर मिश्रित चन्दन (जिसमें मलयगिरी पर्वत का चन्दन भी मिश्रित होता है) की गोटियाँ लगायी जाती हैं। लाला ने गर्मी में गाय चराने का विचार त्याग दिया था। औपचारिक रूप से श्री कृष्ण ने गौ-चारण उसी वर्ष गोपाष्टमी (दीपावली के बाद वाली अष्टमी) के दिन से प्रारंभ किया और इसी दिन से उन्हें गोपाल कहा जाता है।वर्ष में एक ये ही दिन ऐसा होता है जब बीज के लड्डू अकेले श्रीजी को आरोगाये जाते हैं अन्यथा अन्य दिनों में बीज के लड्डू के साथ चिरोंजी के लड्डू भी आरोगाये जाते हैं।

अक्षय तृतीया: श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार (Akshaya Tritiya: Shri Krishna Mundan Sanskar) Read More »