2022

त्रिस्पृशा एकादशी महायोग कथा (Trisparsha Ekadashi Mahayog Katha)

द्म पुराण के अनुसार देवर्षि नारदजी ने भगवान शिवजी से पूछा: सर्वेश्वर! आप त्रिस्पृशा नामक व्रत का वर्णन कीजिये, जिसे सुनकर लोग कर्मबंधन से मुक्त हो जाते हैं।महादेवजी बोले: विद्वान्! देवाधिदेव भगवान ने मोक्षप्राप्ति के लिए इस व्रत की सृष्टि की है, इसीलिए इसे वैष्णवी तिथि कहते हैं। भगवान माधव ने गंगाजी के पापमुक्ति के

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हिरण्यगर्भ दूधेश्वर ज्योतिर्लिंग प्रादुर्भाव पौराणिक कथा! (Hiranyagarbh Shri Dudheshwarnath Mahadev Utpatti Pauranik Katha)

ॐ हौं जूं स: ॐ भू र्भुव: स्व:।ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम् ॥उर्वारुक मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।स्व: भुव: भू ॐ स: जूं हौं ॐ ॥द्वादश ज्योतिर्लिंगों के अतिरिक्त अनेक ऐसे हिरण्यगर्भ शिवलिंग हैं, जिनका बड़ा अदभुत महातम्य है। इनमें से अनेक बड़े चमत्कारी और मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं तथा सिद्धपीठों में स्थापित

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नाग पंचमी पौराणिक कथा (Nag Panchami Pauranik Katha)

प्राचीन काल में एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातों के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदूषी और सुशील थी, परंतु उसके भाई नहीं था।एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी डलिया* और

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श्री रुक्मणी मंदिर प्रादुर्भाव पौराणिक कथा (Rukmani Mandir Pauranik Katha)

यदु वंशी श्रीकृष्ण दुर्वासा ऋषि को अपना कुलगुरु मानते थे। जब श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह हुआ तो वे अशीर्वाद प्राप्ति के लिए दुर्वासा ऋषि से मिलने के लिए उनके आश्रम पधारे, जो द्वारका से दूरी पर स्थित था।श्री कृष्ण ने ऋषि दुर्वासा को महल आने का निमंत्रण दिया, जिसे दुर्वासा ऋषि ने स्वीकार तो

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अनंत चतुर्दशी की पौराणिक कथा (Anant Chaturdashi Pauranik Katha)

एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही, अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी।बहुत सावधानी करने पर भी बहुत

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श्री विष्णु मत्स्य अवतार पौराणिक कथा (Shri Vishnu Matsyavatar Pauranik Katha)

एक बार ब्रह्मा जी के पास से वेदों को एक बहुत बड़े दैत्य हयग्रीव ने चुरा लिया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोल-बाला हो गया। तब भगवान ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके उस दैत्य का वध किया और वेदों की रक्षा की।कल्पांत के

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अहोई अष्टमी और राधाकुण्ड से जुड़ी कथा (Ahoi Ashtami And Radhakund Katha)

॥ श्री गणेशाय नमः ॥बहुत समय पहले झाँसी के निकट एक नगर में चन्द्रभान नामक साहूकार रहता था। उसकी पत्नी चन्द्रिका बहुत सुंदर, सर्वगुण सम्पन्न, सती साध्वी, शिलवन्त चरित्रवान तथा बुद्धिमान थी। उसके कई पुत्र-पुत्रियां थी परंतु वे सभी वल्यावस्था में ही परलोक सिधार चुके थे। दोनों पति-पत्नी संतान न रह जाने से व्यथित रहते

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भगवान राम के राजतिलक में निमंत्रण से छूटे भगवान चित्रगुप्त (Ram Ke Rajtilak Me Nimantran Se Chhute Bhagwan Chitragupt)

कहते है, जब भगवान राम दशानन रावण को मार कर अयोध्या लौट रहे थे, तब उनके खडाऊं को राजसिंहासन पर रख कर राज्य चला रहे राजा भरत थे।भरत ने गुरु वशिष्ठ को भगवान राम के राज्यतिलक के लिए सभी देवी देवताओं को सन्देश भेजने की व्यवस्था करने को कहा। गुरु वशिष्ठ ने ये काम अपने

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भैया दूज लोक कथा (Bhaiya Dooj Lauk Katha)

एक बुढ़िया माई थीं, उसके सात बेटे और एक बेटी थी। बेटी कि शादी हो चुकी थी। जब भी उसके बेटे कि शादी होती, फेरों के समय एक नाग आता और उसके बेटे को डस लेता था। बेटे कि वही म्रत्यु हो जाती और बहू विधवा, इस तरह उसके छह बेटे मर गये। सातवे कि

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चित्रगुप्त की कथा – यम द्वितीया (Chitragupt Ji Ki Katha – Yam Dwitiya)

यम द्वितिया, कार्तिक द्वितीया अथवा भैया दूज पर श्री चित्रगुप्त जी की पढ़ी जाने वाली पौराणिक कथा, पूजन एवं विधि..मंत्री श्री धर्मराजस्य चित्रगुप्त: शुभंकर: ।पायान्मां सर्वपापेभ्य: शरणागत वत्सल: ॥ एक बार युधिष्ठिरजी भीष्मजी से बोले: हे पितामह! आपकी कृपा से मैंने धर्मशास्त्र सुने, परंतु यम द्वितीया का क्या पुण्य है? क्या फल है? यह मैं

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भैया दूज पौराणिक कथा (Bhaiya Dooj Pauranik Katha)

भैया दूज पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बहनें रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं। भैया दूज की पौराणिक कथा इस प्रकार से है…भैया दूज पौराणिक कथा:भैया दूज के संबंध में पौराणिक कथा इस प्रकार

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तुलसी विवाह पौराणिक कथा (Tulsi Vivah Pauranik Katha)

एक बार शिव ने अपने तेज को समुद्र में फैंक दिया था। उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना। इसकी राजधानी का नाम जालंधर नगरी था।दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ। जालंधर महाराक्षस था। अपनी सत्ता के मद में चूर उसने माता लक्ष्मी को

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