May 15, 2022

एक ऐसा भगवान सूर्य का अद्भुत स्तोत्र-जिसके जपने से हो जाता है सभी रोगों का नाश

भगवान सूर्य का अवतरण संसार के कल्याण के लिए हुआ है इसलिए पंचदेवोपासना में उनका विशिष्ट स्थान है। शास्त्र कहते हैं कि ‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ अर्थात् आरोग्य की कामना भगवान सूर्य से करनी चाहिए। सूर्य की उपासना से मनुष्य का तेज, बल, आयु एवं नेत्रों की ज्योति की वृद्धि होती है; मनुष्य दीर्घायु होता है। सूर्य समस्त नेत्र-रोग व चर्म-रोग को दूर करने वाले देवता हैं। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने अपने कोढ़ के रोग को सूर्य की उपासना से दूर किया था। भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र साम्ब बलवान होने के साथ ही अत्यन्त रूपवान भी थे। अपनी सुन्दरता का अभिमान ही उनके पतन का कारण बना। एक बार रुद्रावतार दुर्वासामुनि द्वारकापुरी में आए। तप से अत्यन्त क्षीण हुए दुर्वासा को देखकर साम्ब ने उनका उपहास किया। इससे क्रोध में आकर दुर्वासामुनि ने साम्ब को शाप दे दिया कि ‘तुम कोढ़ी हो जाओ।’ उपहास बुरा होता है; और वही हुआ। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब अत्यन्त भयंकर कुष्ठरोग से ग्रस्त हो गए। रोग दूर करने के लिए अनेक उपचार किए पर उनका कुष्ठ नहीं मिटा। तब भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से साम्ब चन्द्रभागा नदी के तट पर सूर्य की आराधना में लग गए। रोग से मुक्ति के लिए साम्ब नित्य भगवान सूर्य के सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। एक दिन भगवान सूर्य ने साम्ब को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा–’तुम्हें सहस्त्रनाम से मेरी स्तुति करने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें अपने अत्यन्त प्रिय एवं पवित्र इक्कीस नाम बताता हूँ, उनके पाठ से सहस्त्रनाम के पाठ का फल प्राप्त होगा। जो मनुष्य दोनों संध्याओं के समय इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे समस्त पापों से छूटकर धन, आरोग्य, संतान आदि वांछित फल प्राप्त करेंगे और समस्त रोगों से मुक्त हो जाएंगे।’ तब भगवान सूर्य ने श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब को अपने 21 नाम बताये जो ‘स्तवराज’ के नाम से भी जाने जाते हैं। ये नाम भगवान सूर्य के सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्र के रूप में आज भी विद्यमान है –॥ सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्रम् ॥विनियोगः – ॐ श्री सूर्यस्तवराजस्तोत्रस्य श्रीवसिष्ठ ऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीसूर्यो देवता ।सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगोपशमनार्थे पाठे विनियोगः ।ऋष्यादिन्यासः – श्रीवसिष्ठऋषये नमः शिरसि ।अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । श्रीसूर्यदेवाय नमः हृदि ।सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगापशमनार्थे पाठे विनियोगाय नमः अञ्जलौ ।ध्यानं –ॐ रथस्थं चिन्तयेद् भानुं द्विभुजं रक्तवाससे ।दाडिमीपुष्पसङ्काशं पद्मादिभिः अलङ्कृतम् ॥मानस पूजनं एवं स्तोत्रपाठः –ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः ।लोकप्रकाशकः श्रीमान् लोकचक्षु ग्रहेश्वरः ॥लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा ।तपनः तापनः चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥गभस्तिहस्तो ब्रध्नश्च सर्वदेवनमस्कृतः ।एकविंशतिः इत्येष स्तव इष्टः सदा मम ॥॥ फलश्रुतिः ॥श्रीः आरोग्यकरः चैव धनवृद्धियशस्करः ।स्तवराज इति ख्यातः त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥यः एतेन महाबहो द्वे सन्ध्ये स्तिमितोदये ।स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्व पापैः प्रमुच्यते ॥कायिकं वाचिकं चैव मानसं यच्च दुष्कृतम् ।एकजप्येन तत् सर्वं प्रणश्यति ममाग्रतः ॥एकजप्यश्च होमश्च सन्ध्योपासनमेव च ।बलिमन्त्रोऽर्घ्यमन्त्रश्च धूपमन्त्रस्तथैव च ॥अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाति प्रदक्षिणे ।पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्वव्याधिहरः शुभः ॥एवं उक्तवा तु भगवानः भास्करो जगदीश्वरः ।आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत ॥साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनः ।पूतात्मा नीरुजः श्रीमान् तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान् ॥भगवान् सूर्यनामावली१. विकर्तन २. विवस्वान् ३. मार्तण्ड ४. भास्कर ५. रवि६. लोकप्रकाशक ७. श्रीमान् ८. लोकचक्षु ९. ग्रहेश्वर१०. लोकसाक्षी ११. त्रिलोकेश १२. कर्ता १३. हर्ता १४. तमिस्रहा१५. तपन १६. तापन १७. शुचि १८. सप्ताश्ववाहन१९. गभस्तिहस्त २०. ब्रघ्न ( ब्रह्मा ) २१. सर्वदेवनमस्कृतइति ।

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माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति हेतु अमोघ प्रयोग

आज मैं आपको माता महा लक्ष्मी के एक ऐसे स्तोत्र के बारे में बताने जा रहा हूँ जोकि अपने आप में अद्भुत है और जिसको केवल रोज एक बार पढ़ लेने से माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हो जाती है. इस स्तोत्र का नाम है महालक्ष्मी अष्टकम.. जैसा की नाम से ही स्पष्ट है कि यह स्तोत्र मात्र आठ छंद का है और यह स्तोत्र अत्यंत शक्तिशाली है जिससे सुनकर माता महा लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हो जाती है. इसके पीछे एक कथा है- एक बार माता लक्ष्मी विष्णुलोक से रूठकर, पुष्कर में एक सरोवर के अन्दर एक कमल के फूल की नाल के अन्दर जाकर बैठ गयी. माता लक्ष्मी के रूठ जाने से और वहां से चले जाने से, पूरे देवलोक के साथ साथ समस्त संसार की कान्ति क्षय होने लगी. समस्त देवतागण परेशान हो गए. किसी भी देवता को माता लक्ष्मी का पता नहीं मिल रहा था. तब देवराज इन्द्र ने माता महालक्ष्मी को दूंढ़ निकाला और उस कमल के पुष्प के सामने खड़े होकर माता महा लक्ष्मी की स्तुति की और माता को प्रसन्न करने के लिए महालक्ष्मी अष्टकम नामक स्तोत्र की रचना की जिसे सुनकर माता अत्यंत प्रसन्न हुई और प्रकट हो गयी और दोबारा विष्णुलोक चली गयी. इस भगवान् इन्द्र द्वारा रचित महालक्ष्मी अष्टकम की इतनी महिमा है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य एक बार भी पाठ कर ले वहां माता लक्ष्मी का वास सदैव बना रहता है. महालक्ष्मी अष्टकम नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते.‌ शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते..१. नमस्ते गरुडारुढ़े कोलासुर भयंकरी. सर्वपापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..२. सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी. सर्वदुखहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..३. सिद्धिबुद्धिप्रदे देवी भुक्ति मुक्ति प्रदायिनी. मन्त्रपूते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..४. आद्यंतरहिते देवी आदिशक्ति महेश्वरी. योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोस्तुते..५. स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे. महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..६. पद्मासनस्थिते देवी परब्रह्मस्वरूपिणी. परमेशी जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोस्तुते..७. श्वेताम्बरधरे देवी नानालंकारभूषिते. जगतस्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोस्तुते..८. महालक्ष्मय्ष्ट्कम स्तोत्रं यः पठेदक्ति मान्नरः. सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा..९. एककाले पठेन्नित्यम महापापविनाशनम. द्विकालं यः पठेन्नित्यम धनधान्यसमन्वितः..१०. त्रिकालं यः पठेन्नित्यम महाशत्रुविनाशनम. महालक्ष्मीर्भवेंनित्यम प्रसन्ना वरदा शुभा..११.

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एक ऐसा कवच-जिसके पढने से मिलता है एक हज़ार गाय दान करने का फल

आज मैं आपको एक ऐसे कवच के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसका महत्ता का वर्णन स्वयं भगवान् श्री नारायण ने किया है। इसका नाम है श्री गायत्री कवच। श्री गायत्री कवच एक महान कवच है जो स्वयं नारद ऋषि को भगवान श्री नारायण ने बताया और जिसकी रचना महर्षि वेद व्यास जी ने की। श्री गायत्री कवच का उल्लेख श्रीमद देवी भागवत में 12 वे अध्याय में किया गया है। भगवान श्रीमान नारायण, महर्षि नारद को कवच की महिमा और श्री गायत्री देवी की पूजा के माध्यम से प्राप्त भक्ति के बारे में बताते हैं। गायत्री कवच द्वारा अर्जित की गयी शुद्धता सभी प्रकार के पूजा के पापों को नष्ट कर देती है, सभी इच्छाओं को पूरा करती है और मुक्ति प्रदान करती है। भगवान श्रीमान नारायण ने कहा कि देवी गायत्री के दैवीय कवच, सभी अवरोधों और बुराइयों को समाप्त कर सकते हैं। यह पूजा के लिए 64 रूपों के ज्ञान (कला रूपों) और मुक्ति को देने में सक्षम है। इसके अलावा, जो कोई गायत्री कवच की महिमा को पढ़ता या सुनता है, वह एक हज़ार गौ दान के पुण्य को प्राप्त करता है। श्रीगायत्रीकवचम्- श्रीगणेशाय नमः याज्ञवल्क्य उवाच- स्वामिन् सर्वजगन्नाथ संशयोऽस्ति महान्मम । चतुःषष्ठिकलानं च पातकानां च तद्वद। मुच्यते केन पुण्येन ब्रह्मरूपं कथं भवेत् । देहं च देवतारूपं मन्त्ररूपं विशेषतः । क्रमतः श्रोतुमिच्छामि कवचं विधिपूर्वकम् । ब्रह्मोवाच- गायत्र्याः कवचस्यास्य ब्रह्मा विष्णुः शिवो ऋषिः । ऋग्यजुःसामाथर्वाणि छन्दांसि परिकीर्तिताः । परब्रह्मस्वरूपा सा गायत्री देवता स्मृता । रक्षाहीनं तु यत्स्थानं कवचेन विना कृतम् । सर्वं सर्वत्र संरक्षेत्सर्वाङ्गं भुवनेश्वरी । बीजं भर्गश्च युक्तिश्च धियः कीलकमेव च । पुरुषार्थविनियोगो यो नश्च परिकीर्त्तितः । ऋषिं मूर्ध्नि न्यसेत्पूर्वं मुखे छन्द उदीरितम् । देवतां हृदि विन्यस्य गुह्ये बीजं नियोजयेत् । शक्तिं विन्यस्य पदयोर्नाभौ तु कीलकं न्यसेत् । द्वात्रिंशत्तु महाविद्याः साङ्ख्यायनसगोत्रजाः । द्वादशलक्षसंयुक्ता विनियोगाः पृथक्पृथक् । एवं न्यासविधिं कृत्वा कराङ्गं विधिपूर्वकम् । व्याहृतित्रयमुच्चार्य ह्यनुलोमविलोमतः । चतुरक्षरसंयुक्तं कराङ्गन्यासमाचरेत् । आवाहनादिभेदं च दश मुद्राः प्रदर्शयेत् । सा पातु वरदा देवी अङ्गप्रत्यङ्गसङ्गमे । ध्यानं मुद्रां नमस्कारं गुरुमन्त्रं तथैव च । संयोगमात्मसिद्धिं च षड्विधं किं विचारयेत् । विनियोग- अस्य श्रीगायत्रीकवचस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, ऋग्यजुःसामाधर्वाणि छन्दांसि, परब्रह्मस्वरूपिणी गायत्री देवता, भूर्बीजं, भुवः शक्तिः, स्वाहा कीलकं, श्रीगायत्रीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुरिति हृदयाय नमः । ॐ भूर्भुवः स्वः वरेण्यमिति शिरसे स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः भर्गो देवस्येति शिखायै वषट् । ॐ भूर्भुवः स्वः धीमहीति कवचाय हुम् । ॐ भूर्भुवः स्वः धियो यो नः इति नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ भूर्भुवः स्वः प्रचोदयादिति अस्त्राय फट् । वर्णास्त्रां कुण्डिकाहस्तां शुद्धनिर्मलज्योतिषीम्म् । सर्वतत्त्वमयीं वन्दे गायत्रीं वेदमातरम् । अथ ध्यानम्- मुक्ता विद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै- र्युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थवर्णात्मिकाम् । गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशां शूलं कपालं गुणं शङ्खं चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे । कवच- ॐ गायत्री पूर्वतः पातु सावित्री पातु दक्षिणे । ब्रह्मविद्या च मे पश्चादुत्तरे मां सरस्वती । पावकी मे दिशं रक्षेत्पावकोज्ज्वलशालिनी । यातुधानीं दिशं रक्षेद्यातुधानगणार्दिनी । पावमानीं दिशं रक्षेत्पवमानविलासिनी । दिशं रौद्रीमवतु मे रुद्राणी रुद्ररूपिणी । ऊर्ध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा । एवं दश दिशो रक्षेत् सर्वतो भुवनेश्वरी । ब्रह्मास्त्रस्मरणादेव वाचां सिद्धिः प्रजायते । ब्रह्मदण्डश्च मे पातु सर्वशस्त्रास्त्रभक्षक्रः । ब्रह्मशीर्षस्तथा पातु शत्रूणां वधकारकः । सप्त व्याहृतयः पान्तु सर्वदा बिन्दुसंयुताः । वेदमाता च मां पातु सरहस्या सदैवता । देवीसूक्तं सदा पातु सहस्राक्षरदेवता । चतुःषष्टिकला विद्या दिव्याद्या पातु देवता । बीजशक्तिश्च मे पातु पातु विक्रमदेवता । तत्पदं पातु मे पादौ जङ्घे मे सवितुःपदम् । वरेण्यं कटिदेशं तु नाभिं भर्गस्तथैव च । देवस्य मे तु हृदयं धीमहीति गलं तथा । धियो मे पातु जिह्वायां यःपदं पातु लोचने । ललाटे नः पदं पातु मूर्धानं मे प्रचोदयात् । तद्वर्णः पातु मूर्धानं सकारः पातु भालकम् । चक्षुषी मे विकारस्तु श्रोत्रं रक्षेत्तु कारकः । नासापुटेर्वकारो मे रेकारस्तु कपोलयोः । णिकारस्त्वधरोष्ठे च यकारस्तूर्ध्व ओष्ठके । आत्यमध्ये भकारस्तु गोकारस्तु कपोलयोः । देकारः कण्ठदेशे च वकारः स्कन्धदेशयोः । स्यकारो दक्षिणं हस्तं धीकारो वामहस्तकम् । मकारो हृदयं रक्षेद्धिकारो जठरं तथा । धिकारो नाभिदेशं तु योकारस्तु कटिद्वयम् । गुह्यं रक्षतु योकार ऊरू मे नः पदाक्षरम् । प्रकारो जानुनी रक्षेच्चोकारो जङ्घदेशयोः । दकारो गुल्भदेशं तु यात्कारः पादयुग्मकम् । तकारो व्यंजनं चैव सर्वांगे में सदा Ƨ वतु। फलश्रुति- इदं तु कवच दिव्यं बाधाशतविनाशकम् । चतुःषष्टिकला विद्या दायकं मोक्ष कारकं । मुच्यते सर्वपापेभ्यः परं ब्रह्माधिगच्छति । पठनात श्रवणात वा Ƨ पि गो सहस्र फलं लभेत । इति श्री गायत्री कवचम्‌ संपूर्णम्‌

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