Pitra Stotra | पितृ स्तोत्र

Pitra Stotra पितृ स्तोत्र: मार्कण्डेय पुराण में वर्णित इस चमत्कारी पितृ स्तोत्र का नियमित पाठ करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। मार्कण्डेय पुराण में महात्मा रुचि द्वारा रचित पितरों के पितृ स्तोत्र को ‘पितृ स्तोत्र’ कहा गया है। पितरों की प्रसन्नता के लिए पितृ स्तोत्र का पाठ किया जाता है। यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष है तो पितृ स्तोत्र का पाठ करना बहुत लाभकारी रहेगा। Pitra Stotra पितृ स्तोत्र का पाठ श्राद्ध पक्ष में या अपने पितरों की तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराते समय करना चाहिए। यदि पितृ दोष के कारण आपको परेशानी हो रही है या काम में रुकावट आ रही है तो प्रतिदिन इसका पाठ करने से आपके पितृ दोष कम हो सकते हैं। अक्सर लोग असफलता के समय सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में सोचते हैं। लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से सोचें तो व्यक्ति के कर्म ही उसे भाग्यशाली या दुर्भाग्यशाली बनाते हैं। यही कारण है कि शास्त्र सुखी जीवन के लिए अच्छे कर्म करने की शिक्षा देते हैं। ऐसे पुण्य कर्म से सौभाग्य प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में धार्मिक उपायों में पितृ पूजन और स्मरण का महत्व बताया गया है। Pitra Stotra धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ दोष व्यक्ति के जीवन में गहरे संकट, Pitra Stotra असफलता और संकट का कारण बन सकता है। Pitra Stotra कुंडली में राहु-केतु ग्रहों के कारण होने वाली कुंडली भी पितृदोष उत्पन्न करती है। पितृ दोष के कारण कई लोगों को संतान प्राप्ति में बाधा और रुकावटों का सामना करना पड़ता है। Pitra Stotra पितृ स्तोत्र के लाभ: धार्मिक पौराणिक कथाओं के अनुसार पितृ दोष निवारण में पितृ स्तोत्र का पाठ बहुत ही स्मरणीय है। पितृ स्तोत्र सभी के लिए शुभ फल प्रदान करने वाला लाभकारी है। Pitra Stotra अमावस्या या पूर्णिमा या श्राद्ध पक्ष के दिनों में शाम के समय तेल का दीपक जलाकर इस स्तोत्र का पाठ करने से पितृ दोष की शांति होती है और सभी दूरियों से उन्नति प्राप्त होती है। Pitra Stotra जो लोग जीवन में बहुत कठिनाई का अनुभव करते हैं, उन्हें यह पाठ प्रतिदिन अवश्य करना चाहिए। Pitra Stotra पितृ स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिन व्यक्तियों की कुंडली में Pitra Stotra पितृ दोष है या जिन्होंने अपने पूर्वजों के विरुद्ध पाप किया है, उन्हें पितृ स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे उनके जीवन में शांति आएगी। यदि विधि-विधान और वैदिक नियमों के अनुसार किया जाए, Pitra Stotra तो निश्चित रूप से बुरे दिन समाप्त हो जाते हैं। पितृ स्तोत्र | Pitra Stotra रूचिरूवाच नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धे ये वसन्त्यधिदेवताः । देवैरपि हि तर्प्यंते ये च श्राद्धैः स्वधोत्तरैः ।।1।। नमस्येऽहं पितृन्स्वर्गे ये तर्प्यन्ते महर्षिभिः । श्राद्धेर्मनोमयैर्भक्तया भुक्ति-मुक्तिमभीप्सुभिः ।।2।। नमस्येऽहं पितृन्स्वर्गे सिद्धाः संतर्पयन्ति यान् । श्राद्धेषु दिव्यैः सकलै रूपहारैरनुत्तमैः ।।3।। नमस्येऽहं पितृन्भक्तया येऽर्च्यन्ते गुह्यकैरपि । (गुह्यकैर्दिवि) तन्मयत्वेन वांछिद्भिर्ऋद्धिमात्यंतिकीं पराम् ।।4।। नमस्येऽहं पितृन्मर्त्यैरच्यन्ते भुवि ये सदा । श्राद्धेषु श्रद्धयाभीष्ट लोक-प्राप्ति-प्रदायिनः ।।5।। (लोक-पुष्टि-प्रदायिनः) नमस्येऽहं पितृन् विप्रैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा। वाञ्छिताभीष्ट-लाभाय प्राजापत्य-प्रदायिनः ।।6।। नमस्येऽहं पितृन् ये वै तर्प्यन्तेऽरण्यवासिभिः । वन्यैः श्राद्धैर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकिल्बिषैः ।।7।। (श्राद्धैर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकल्मषैः) नमस्येऽहं पितृन् विप्रैर्नैष्ठिकब्रह्मचारिभिः । (विप्रैर्नैष्ठिकैधर्मचारिभिः) ये संयतात्मभिर्नित्यं संतर्प्यन्ते समाधिभिः ।।8।। नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धै राजन्यास्तर्पयंति यान् । कव्यैरशेषैर्विधिवल्लोकत्रय(द्वय)फलप्रदान् ।।9।। नमस्येऽहं पितृन्वैष्यैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा । स्वकर्माभिरतैर्नित्यं पुष्पधूपान्नवारिभिः ।।10।। नमस्येऽहं पितुन् श्राद्धैर्ये शूद्रैरपि च भक्तितः । संतृप्यन्ते जगत्यत्र (जगत्कृत्स्नं) नाम्ना ज्ञाताः (ख्याताः) सुकालिनः ।।11। नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धैः पाताले ये महासुरैः । संतर्प्यन्ते स्वधाहारैस्त्यक्त(सुधाहारास्त्यक्त) दम्भमदैः सदा ।।12।। नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धैरर्च्यन्ते ये रसातले । भोगैरशेषैर्विधिवन्नागैः कामानभीप्सुभिः ।।13।। नमस्येऽहं पितृन् श्राद्धैः सर्पैः संतर्पितान् सदा । तत्रैव विधिवन्मंत्रभोगसंपत्समन्वितैः।।14।। पितृन्नमस्ये निवसन्ति साक्षाद्ये देवलोके च तथांतरिक्षे। (देवलोकेऽथ महीतले वा) महीतले ये (तथांतरिक्षे) च सूरादिपूज्यास्ते मे प्रयच्छन्तु मयोपनीतम्।।15।। पितृन्नमस्ये परमात्मभूता (परमार्थभूता) ये वै विमाने निवसंति मूर्त्ताः। यजन्ति यानस्तमलैर्मनोभिर्यौगीश्वराः क्लेश-विमुक्ति-हेतून्।।16।। पितृन्नमस्ये दिवि ये च मूर्त्ताः स्वधाभुजः काम्यफलाभिसंधौ। प्रदानशक्ताः सकलेप्सितानां विमुक्तिदा येऽनभिसंहितेषु।।17।। तृप्यंतु तेऽस्मिन् पितरः समस्ता इच्छावतां ये प्रदिशंति कामान्। सुरत्वमिन्द्रत्वमतोधिकंवा सुतान् पशून् स्वानि बलं गृहाणि।।18।। (सुरत्वमिन्द्रत्वमितोऽधिकं वा गजाश्वरत्नानि महागृहाणि) सोमस्य ये रष्मिषुयेऽर्कबिम्बे शुक्ले विमाने च सदा वसन्ति। तृप्यंतु तेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयैर्गंधादिना (तेऽस्मिन्तिपरोऽन्नतोयैर्गन्धादिना) पुष्टिमितो व्रजंतु।।19।। येषां हुतेऽग्नौ हविषा च तृप्तिर्ये भुञ्जते विप्र-शरीर-भाजः (विप्र-शरीर-संस्था)। ये पिंडदानेन मुदं प्रयांति तृप्यन्तु तेऽस्मिन् पितरोन्नतोयैः(पितरोश्ष्न्नतोयैः)।।20।। ये खंगिमांसेन (खड्गमांसेन) सुरैरभीष्टैः कृष्णैस्तिलैर्दिव्यमनोहररैश्च। कालेनशाकेन महर्षि वर्यैः संप्रीणितास्ते मुदमत्र यान्तु।।21।। कव्यान्यशेषाणि च यान्यभीष्टान्यतीव तेषां ममरार्चितानाम् (मम पूजितानाम्)। तेषां तु सान्निध्यमिहास्तु पुष्पगंधान्नभोज्येषु (पुष्पगन्धाम्बुभोज्येषु) मया कृतेषु।।22।। दिनेदिने ये प्रतिगृह्णतेर्श्ष्चां मासान्तपूज्या (सामान्तपूज्या) भुवि येऽष्टकासु। येवत्सरान्तेऽभ्युदये च पूज्याः प्रयान्तु ते मे पितरोऽत्र तृप्तिम् (तुष्टिम्)।।23।। पूज्याद्विजानां कुमुदेंदुभासो ये क्षत्रियाणां च नवार्कवर्णाः। तथा विशां ये कनकावदाता नीलीनिभाः (नीलीप्रभाः) शूद्रजनस्य ये च।।24।। तेऽस्मिन् समस्ता मम पूष्पगंधधूपान्नतोयादि (पूष्पगंधधूपाम्बुभोज्यादि) निवेदनेन। तथाग्निहोमेन च यांतु तृप्तिं सदा पितृभ्यः प्रणतोऽस्मि तेभ्यः।।25।। ये देव पूर्वाण्यतितृप्तिहेतोरश्नंति कव्यानि शुभाहुतानि (शुभाहृतानि)। तृप्ताश्चयेभूतिसृजो(सूजो) भवंति तृप्यन्तु तेस्मिन् प्रणतोस्मि तेभ्यः।।26।। रक्षांसि भुतान्यसुरांस्तथोग्रान्निर्णाशयन्तस्त्व शिवं प्रजानाम्। आद्याः सुराणाममरेशपूज्यास्तृप्यन्तु तेऽस्मिन् प्रणतोऽस्मि तेभ्यः।।27।। अग्निश्वात्ता बर्हिषदा आज्यपाः सोमपास्तथा। व्रजन्तु तृप्तिं श्राद्धेऽस्मिन् पितरस्तर्पितामया।28।। अग्निष्वात्ताः पितृगणाः प्राचीं रक्षन्तु मे दिशम्। तथा बर्हिषदः पान्तु याम्यां पितरस्तथा (पितरः सदा)।।29।। प्रतीचीमाज्यपास्तद्वदुदीचीमपि सोमपाः। रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोषतः।।30।। सर्वतश्चाधिपस्तेषां यमो रक्षां करोतु मे। (सर्वतः पितरो रक्षां कुर्वन्तु मम नित्यशः) विश्वो विश्वभुगाराध्यो धर्म्यो धन्यः शुभाननः।।31।। भूतिदो भूतिकृद्भूतिः पितृणां ये गणा नव। कल्याणः कल्पतां (कल्यदः)कर्त्ता कल्पः कल्पतराश्रयः।।32।। कल्पताहेतुरनघः षडिमे ते गणाः स्मृताः। वरो वरेण्यो वरदः पुष्टिदस्तुष्टिदस्तथा।।33।। विश्वपाता तथा धाता सप्तैवैते गणास्तथा (गणाः स्मृताः)। महान् महात्मा महितो महिमावान्महाबलः।।34।। गणाः पंचतथैवेते पितृणां पापनाशनाः। सुखदो धनदश्चान्यो धर्मदोऽन्यश्च भूतिदः।।35।। पितृणां कथ्यते चैतत्तथा गणचतुष्टयम्। एकत्रिंशत् पितृगणा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्।।36।। ते मेऽनुतृप्तास्तुष्यंतु यच्छन्तु च सदा हितम्। (त एवात्र पितृगणास्तुष्यन्तु च मदाहितात्) मार्कण्डेय उवाच एवं तु स्तुवतस्तस्य तेजसो राशिरुच्छ्रितः । प्रादुर्बभुव सहसा गगनव्याप्तिकारकः ।। तद्दृष्ट्वा सुमहत्तेजः समाच्छाद्य स्थितं जगत् । जानुभ्यामवनीं गत्वा रुचिः स्तोत्रमिदं जगौ ।। रुचिरुवाच (सप्तार्चिस्तपम्) अमूर्त्तानां च मूर्त्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।।37।। नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्। इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।।38।। सप्तर्षीणां तथान्येषां तान्नमस्यामि कामदान्। मन्वादीनां मुनींद्राणां (च नेतारः) सूर्य्याचन्द्रमसोस्तथा।।39।। तान्नमस्याम्यहं सर्वान् पितरश्चार्णवेषु च (पितरनप्युदधावपि)। नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।।40।। द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः। प्रजापतेः कश्यपाय सामाय वरुणाय च । देवर्षीणां ग्रहाणां च सर्वलोकनमस्कृतान्।।41।। योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः। नमो गणेभ्यःसप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।।42।। स्वायम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे। सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।।43।। नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्। अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामि पितृनहम्।।44।। अग्निसोममयं विश्वं यत एतदशेषतः। ये च तेजसि ये चैते सोमसूर्य्याग्निमूर्त्तयः।।45।। जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः। तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः। नमोनमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।46।। मार्कण्डेय उवाच एवं स्तुतास्ततस्तेन तेजसो मुनिसत्तमाः । निश्चक्रमस्ते पितरो भासयन्तो दिशो दश ।। निवेदनं च यत्तेन पुष्पगन्धानुलेपनम् । तदभूषितानथ स तान् ददृशे पुरतः स्थितान् ।। प्रणिपत्य रुचिर्भक्त्या पुरेव कृतांजलिः । नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यमित्याह पृथगादृतः ।। पितर ऊचुः स्तोत्रेणानेन च नरो यो मां स्तोष्यति भक्तितः। तस्य तुष्टा वयं भोगानात्म ज्ञानं तथोत्तमम्।।47।। शरीरारोग्यमर्थं च पुत्रपौत्रादिकं तथाः।

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Pashuptastrey Stotra:पशुपतास्त्रेय स्तोत्र

Pashuptastrey Stotra:जैसा कि मैं पहले से भी कहता आ रहा हूं कि शनि स्वयं कोई फल प्रदान नहीं करता वह जातक के निज कर्मों का फल प्रदान करता है। न्याय के आसन पर बैठकर वे कभी इस बात की परवाह नहीं करते उनके द्वारा किया गया न्याय संबंधित व्यक्ति को कितना कष्टकारी होगा, उसे कितना दुख भुगतना पड़ेगा। वे मात्र उसके किये गये कुकर्मों को देखते हुए निर्णय देते हैं। यदि किसी व्यक्ति की जन्म-कुण्डली में शनि प्रतिकूल परिस्थितियों में स्थित हैं तो जरूर उसने पूर्वजन्म में कहीं न कहीं ऐसे अशुभ कर्म किये होंगे जो मानवता के अथवा धर्म के प्रतिकूल थे। Pashuptastrey Stotra पिछले कुछ वर्षों में मैंने देवाधिदेव शनिदेव की कृपा से शिव के मंत्र व स्तोत्र का प्रयोग स्वयं कई व्यक्तियों के लिए किया है और उसका फल बहुत ही अनुकूल प्राप्त हुआ। उसी अमोघ प्रयोग को मैं यहां दे रहा हूं जिसका फल बहुत जल्दी प्राप्त होता है। यह स्तोत्र अग्नि पुराण के 322 वें अध्याय से लिया गया है। यह अत्यन्त प्रभावशाली व शीघ्र फलदायी प्रयोग है। Pashuptastrey Stotra यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ गुरू के निर्देशानुसार संपादित करे तो अवश्य फायद मिलेगा। शनिदेव शिव भक्त भी हैं और शिव के शिष्य भी हैं। शनि के गुरु शिव होने के कारण इस अमोघ प्रयोग का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यदि किसी साधारण व्यक्ति के भी गुरु की कोई आवभगत करें तो वह कितना प्रसन्न होता है। फिर शनिदेव अपने गुरु की उपासना से क्यों नहीं प्रसन्न होंगे। इस स्तोत्र के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और शिव की प्रसन्नता से शनिदेव खुश होकर संबंधित व्यक्ति को अनुकूल फल प्रदान करते हैं। साथ ही एक विशेषता यह भी परिलक्षित होती है Pashuptastrey Stotra कि संबंधित व्यक्ति में ऐसी क्षमता आ जाती है Pashuptastrey Stotra कि वह शनिदेव के द्वारा प्राप्त दण्ड भी बड़ी सरलता से स्वीकार कर लेता है। साथ ही वह अपने जीवन में ऐसा कोई अशुभ कर्म भी नहीं करता जिससे उस पर शनिदेव भविष्य में भी नाराज हों। जैसा कि इसका नाम अमोघ प्रयोग है, उसी प्रकार यह किसी भी कार्य के लिए अमोघ राम बाण है। Pashuptastrey Stotra अन्य सारी बाधाओं को दूर करने के साथ ही युवक-युवतियों के लिए यह अकाट्य प्रयोग माना ही नहीं जाता अपितु इसका अनेक अनुभूत प्रयोग किया जा चुका है। जिस वर या कन्या के विवाह में विलंब होता है, यदि इस पशुपतास्त्रेय स्तोत्र का प्रयोग जैसा कि बताया गया है 1008 की संख्या में पाठ करने के बाद दशांश, हवन, तर्पण एवं मार्जन कर यथा शक्ति ब्राह्मण भोजन कराकर पूर्णाहुति करें तो निश्चित रूप से शीघ्र ही उन्हें दाम्पत्य सुख का लाभ मिलता है। केवल इतना ही नहीं, अन्य सांसारिक कष्टों को दूर करने के लिए भी 1008 पाठ या जप, हवन, तर्पण, मार्जन आदि करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। Pashuptastrey Stotra मंत्र पाठ: Pashuptastrey Stotra:पशुपतास्त्रे का 21 दिन नियमित सुबह-शाम 21-21 पाठ प्रतिदिन करें। साथ ही नीचे लिखे स्तोत्र का एक सौ आठ बार अवश्य जाप करें और सुबह या शाम को इस मंत्र की 51 आहुतियां काले तिल से हवन अवश्य करें। विनियोग: सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग का पाठ करे अस्य श्री पाशुपताशान्तिस्तोत्रस्य भगवान् वेदव्यासगषि: अनुष्टुप छन्द: श्रीसदशिवपरमात्मा देवता सर्वविघ्नविनाशार्थे पाठे विनियोग:। पशुपतात्र मंत्र: नमो भगवते महापाशुपताय, अतुलवीर्यपराक्रमाय, त्रिपंचनयनाय, नानारूपाय, नानाप्रहरणोद्यताय, सर्वांगरंक्ताय, मनीसांजनचयप्रख्याय,श्मशानवेतालप्रियाय, सर्वविघ्न- निकृन्तनरताय, सर्वसिद्धिप्रधान, भक्तानुकंपिनेऽसंख्यवक्त्रभुज- पादय, तस्मिन् सिद्धाय, वेतालवित्रासिने, शाकिनी क्षोभजनकाय, व्याधिनिग्रहकारिणे पापभंजनाय, सूर्यसोमाग्निर्नत्राय, विष्णुकवचाय, खड्गवज्रहस्ताय, यमदंडवरुणपाशाय, रुद्रशूलाय,ज्वलज्जिह्वाय, सर्वरोगविद्रावणाय, ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनाशक्षयकारिणे। कृष्णपिंगलाय फट्। हुंकारााय फट्। वज्रहस्ताय फट्। शक्तये फट्। दंडाय फट्। यमाय फट्। खड्गाय फट्। निर्गतये फट्। वरुणाय फट्। वज्राय फट्। पाशाय फट्। धवजाय फट्। अंकुशाय फट्। गदय फट्। कुबेराय फट्। त्रिशूलाय फट्। मुद्गाय फट्। चक्राय फट्। पद्माय फट्। नागाय फट्। ईशानाय फट्। खेटकाय फट्। मुंडाय फट्। मुंडाय फट्। कंकालाख्याय फट्। पिबिछकाय फट्। क्षुरिकाय फट्। ब्रह्माय फट्। शक्त्यय फट्। गणाय फट्। सिद्धाय फट्। पिलिपिबछाय फट्। गंधर्वाय फट्। पूर्वाय फट्। दक्षिणाय फट्। वामाय फट्। पश्चिमाय फट्। मंत्राय फट्। शाकिन्य फट्। योगिन्यय फट्। दंडाय फट्। महादंडाय फट्। नमोऽय फट्। शिवाय फट्। ईशानाय फट्। पुरुषाय फट्। आघोराय फट्। सद्योजाताय फट्। हृदयाय फट्। महाय फट्। गरुड़ाय फट्। राक्षसाय फट्। दनवाय फट्। क्षौंनरसिंहाय फट्। त्वष्ट्य फट्। सर्वाय फट्। न: फट्। व: फट्। प: फट्। फ: फट्। भ: फट्। श्री: फट्। पै: फट्। भू: फट्। भुव: फट्। स्व फट्। मह: फट्। जन: फट्। तप: फट्। सत्यं फट्। सर्वलोक फट्। सर्वपाताल फट्। सर्वतत्तव फट्। सर्वप्राण फट्। सर्वनाड़ी फट्। सर्वकारण फट्। सर्वदेव फट्। द्रीं फट्। श्रीं फट्। हूं फट्। स्वां फट्। लां फट्। वैराग्याय फट्। कामाय फट्। क्षेत्रपालाय फट्। हुंकाराय फट्। भास्कराय फट्। चन्द्राय फट्। विघ्नेश्वराय फट्। गौ: गा: फट्। भ्रामय भ्रामय फट्। संतापय संतापय फट्। छादय छादय फट्। उन्मूलय उन्मूलय फट्। त्रासय त्रासय फट्। संजीवय संजीवय फट्। विद्रावय विद्रावय फट्। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट्॥ इन मंत्रों का 1008 की संख्या में पाठ करने के उपरांत प्रतिदशांश हवन, तर्पण एवं मार्जन भी विधिपूर्वक करें।

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Dreams About Hairs : सपने में काले सफेद बाल देखना देता है भविष्य में होने वाली इन घटनाओं का संकेत

Dreams About Hairs:सपने में सफेद बाल दिखाई देने का मतलब है कि आपको भविष्य में अपने प्रयासों का शुभ फल प्राप्त होगा। समाज में आपकी मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी। Dream Interpretation: स्वप्न शास्त्र के अनुसार हम सोते हुए जो भी सपने देखते हैं उसका कुछ न कुछ अर्थ जरूर होता है। सपने हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में संकेत देते हैं। सपने में इंसान कई चीजें देखता है। बस जरूरत होती है उन चीजों को समझने की। यदि सपने में आपको बाल दिखाई देते हैं तो ये सपना शुभ भी हो सकता है और अशुभ भी। जानिए कैसे… सपने में सिर के कटे हुए बाल देखना या बाल काटना दोनों ही सपने शुभ माने जाते हैं। इसका अर्थ है कि भविष्य में जल्द ही आप कर्ज मुक्त हो जाएंगे। Dreams About Hairs अगर सपने में आपको अपने काले बाल दिखाई देते हैं तो इसका मतलब है कि आपको धन लाभ होने वाला है। तो वहीं दूसरों के काले बाल देखने का अर्थ है कि आपकी मुलाकात किसी ऐसे इंसान से होने वाली है जिसका प्रभाव आप पर अच्छा नहीं पड़ेगा। सपने में सफेद बाल दिखाई देने का मतलब है कि आपको भविष्य में अपने प्रयासों का शुभ फल प्राप्त होगा। समाज में आपकी मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी।अगर आपको सपने में अपने हाथों या फिर तलवे पर बाल उगते दिखाई दें तो इसका अर्थ है Dreams About Hairs कि आपको शायद किसी से कर्ज लेना पड़ सकता है। अगर आपको बगल या नाभि के आस-पास सपने में बाल दिखाई दें तो इसका मतलब आपका जल्द ही नई परेशानियों से सामना हो सकता है। यदि सपने में आप अपने उलझे बालों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं पर सुलझा नहीं पा रहे हैं। तो इसका मतलब आप किसी चीज से बहुत परेशान हैं और उसका हल आपको जल्द ही निकाल लेना चाहिए। बालों को कंघे से सुलझाते हुए सपने में देखने का मतलब है कि आप जिस दिशा की तरफ असल जिंदगी में बढ़ रहे हैं उससे आपके जीवन में नया बदलाव आएगा। Dreams About Hairs सपने में बाल रंगते हुए देखने का मतलब है कि आप अपनी योजनाओं में सफल होंगे। सपने में बालों को झड़ते हुए देखने का मतलब है कि आपके अंदर आत्मविश्वास की कमी है। सपने में अपने काले, लंबे और घने बाल देखने का अर्थ होता है कि आपकी सोच सही दिशा में बढ़ रही है और आनेवाले दिनों में मान-सम्मान और बड़ी मात्रा में धन मिल सकता है। Dreams About Hairs सपने में किसी व्यक्ति या फिर खुद को गंजा देखने का मतलब है कि आपके जीवन में चल रही परेशानियां खत्म होने वाली हैं। धन प्राप्ति के योग बनेंगे। साथ ही समाज में मान-सम्मान मिलेगा Dreams About Hairs:सपने में काले सफेद बाल देखना का क्या है मतलब Dreams Meaning About Hairstyle : सपनों की दुनिया में व्यक्ति जो भी देखता है हर उस बात का कुछ न कुछ मतलब जरूर होता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने व्यक्ति को जीवन में होने वाली घटनाओं के बारे में संकेत देते हैं। सपनों का इशारा जानकर आप जीवन की बहुत सी मुश्किलों से बच सकते हैं। स्वप्न शास्त्र में सपनों के बारे में लगभग सारी जानकारी दी गई हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं बालों से जुड़े सपनों का क्या अर्थ होता है। सपने में कटे हुए बाल देखना का मतलब अगर सपने में आप खुद के कटे हुए बाल देखते हैं तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार इस तरह के सपने आना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस तरह के सपने देखने का मतलब है की व्यक्ति को जल्द ही कर्ज से मुक्ति मिलने वाली है। सपने में बदला हुआ हेयरस्टाइल देखना का मतलब कई बार व्यक्ति इस तरह के सपने भी देखता है की उसका हेयरस्टाइल अचानक से बदल गया है। आपका हेयरस्टाइल कुछ ऐसा हो गया है जो पहले कभी आपने नहीं रखा है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपनों का अर्थ है की Dreams About Hairs आप खुद को बहुत ही सकारात्मक तरीके से आगे बढ़ाएंगे। आने वाले दिनों में जिसका लाभ आपको जरूर मिलेगा।

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Holi 2025 Special Tips: होली के दिन भूलकर भी न करें ये 5 काम, वरना हो सकता है भारी नुकसान

Holi 2025 Special Tips: 14 मार्च 2025 को रंगों का त्योहार होली मनाया जाने वाला है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि होली पर भूलकर भी इन 5 चीजों का दान न करें वरना हो सकता है भारी नुकसान। जानिए होली के दिन किन गलतियों से बचें ताकि बनी रहे सुख-समृद्धि और नकारात्मक शक्तियों का असर न हो। Holi 2025 Special Tips:होलिका दहन पर क्या न करें? उधार– आज होलिका दहन के दिन किसी को पैसे उधार देने से बचें। होलिका दहन पर पैसे उधार देने से आर्थिक स्थिति पर नेगेटिव असर पड़ सकता है। फटे-पुराने कपड़े– होलिका दहन के दिन कटे-फटे कपड़े पहनने से बचें। किसी भी त्योहार या शुभ मौके पर फटे कपड़े पहनना अशुभ माना जाता है। कहा जाता है की फटे-पुराने कपड़े पहनने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं। मास-मदिरा– होलिका दहन के दिन भूलकर भी मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नराज हो सकते हैं। काले वस्त्र– धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी शुभ अवसर या फिर पूजा-पाठ के दौरान काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। इसलिए होलिका दहन के दिन काले रंग के कपड़े पहनने से बचें। भगवान विष्णु की असीम कृपा पाने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा।अपमान- कोशिश करें की इस दिन आप किसी का दिल न दुखाएं और वाद-विवाद से भी बचें। किसी का भी Holi 2025 Special Tips अपमान करने से बचें और न ही किसी का मजाक उड़ाएं। 

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पातालपुरी मंदिर:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

पातालपुरी मंदिर धरती के नीचे स्थित एक मंदिर है जो इसके नाम से पता चलता है। पातालपुरी मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज जिले में स्थित है। पातालपुरी मंदिर संगमनगरी के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। पातालपुरी मंदिर धरती के नीचे स्थित एक मंदिर है जो इसके नाम से पता चलता है। पातालपुरी मंदिर और अक्षय वट वृक्ष दोनों एक दूसरे के निकट स्थित है। अक्षय वट वृक्ष के बारे में यह कहा जाता है कि जब तक पूरी दुनिया है, तब तक अक्षय वट वृक्ष खड़ा रहेगा। मंदिर का इतिहास पातालपुरी मंदिर प्रयागराज के इलाहाबाद किले के तहखाने के अन्दर स्थित है। पातालपुरी मंदिर परिसर में छठवीं शताब्दी की मूर्तियां भी स्थापित है। इससे ये मंदिर कितना पुराना है इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इलाहाबाद किला अकबर ने 1583 में बनवाया था। पातालपुरी मंदिर तक पहुंचने के लिए इलाहाबाद किले से एक सड़क बनाई गई है। मंदिर परिसर में अक्षय वट वृक्ष और सरस्वती कूप स्थित है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि श्री राम, लक्ष्मण और सीता ने मंदिर का दौरा किया था। यहां वह स्थान भी मौजूद है जहां त्रेता युग में माता सीता ने अपने कंगन दान किए थे। इसी के साथ इस मंदिर का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के वृत्तांतों में भी मिलता है। Patalpuri mandir मंदिर का महत्व पातालपुरी मंदिर के परिसर में स्थित अक्षय वट वृक्ष के बारे में बताया जाता है कि यह पेड़ अमर है और जब तक दुनिया है तब तक यह पेड़ खड़ा रहेगा। ऐसा माना जाता है कि पातालपुरी मंदिर में भगवान राम और प्रहलाद आये थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री और लेखक ह्यूएन त्संग ने अपनी भारत की यात्रा के दौरान इस मंदिर का दौरा किया था। पातालपुरी के परिसर में सरस्वती कूप है। यह बहुत गहरा कुआँ है और इसे भरने के प्रयास विफल रहे हैं। ऐसा कहा जाता है कि इसका बारहमासी स्रोत दो पवित्र नदियों के संगम पर है। ऐसा माना जाता है कि इसी स्थान पर सरस्वती नदी लुप्त हो गई थी। भगवान अपने अर्धनारीश्वर रूप में विराजमान है, साथ ही तीर्थों के राजा प्रयाग की भी प्रतिमा है। यहां भगवान शनि को समर्पित एक अखंड ज्योति है, जो 12 महीने प्रज्वलित होती रहती है। मंदिर की वास्तुकला मंदिर इलाहाबाद किले के अंदर बने तहखाने नुमा स्थान पर बना हुआ है। इतिहासकार बताते हैं कि मुगलकाल में जब अकबर ने यहां किले का निर्माण करवाया था, तो पुराना मंदिर और ऐतिहासिक अक्षयवट वृक्ष पृथ्वी के धरातल से नीचे हो गए। अकबर के शासनकाल में बने इस किले में मुगल वास्तुकला की झलक देखने को मिलती है। पातालपुरी बड़े-बड़े खंभों पर खड़ा हुआ है। यहां पर एक लाइन से आपको देवी देवताओं के दर्शन करते हुए बाहर निकलने का मार्ग बना है। उसके बाद सीढ़ियां बनी हुई है। मंदिर में श्री राम जी, माता सीता जी, लक्ष्मण जी, भैरव बाबा समेत 43 देवी-देवताओं की मूर्तियां विराजमान है। मंदिर का समय पातालपुरी मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 06:30 PM सुबह आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM शाम की आरती का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद पातालपुरी मंदिर में श्रद्धालु फल, मेवा, बेसन के लड्डू का भोग चढ़ाते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार ड्राई फ्रूट्स और दूध के पेड़े को भी मंदिर में चढ़ाते हैं।

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Para Puja Stotra | परा पूजा स्तोत्र

Para Puja Stotra:परा पूजा स्तोत्र (पारा पूजा स्तोत्र): परा पूजा स्तोत्र श्री माश्चंकर भगवत्पाद द्वारा रचित है। पूजा-अर्चना में परा पूजा स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से किया जाता है। किसी भी देवता की पारंपरिक पूजा में ध्यान[1], आवाहन[2], आसन[3], पद्य[4], अर्घ्य[5], आचमनिया[6], स्नान[7], वस्त्र[8], उपवीत[9], पात्र-पुष्प[10], गंध[11], अभरण[12], नैवेद्य[13], थंबुला[14], धीपा[15] शामिल हैं। धूप[16], निरंजना[17] और उद्वासना[18]। ईश्वर से की गई इस महान प्रार्थना में, कवि बताता है कि ईश्वर के उन महान गुणों को सामने लाते हुए इनमें से प्रत्येक कैसे असंभव या अनुचित है। निर्गुण मनसा पूजा, जिसे ‘परा पूजा’ भी कहा जाता है, पूजा का सर्वोच्च रूप है। श्री शंकर भगवत्पाद ने इस पूजा का वर्णन करते हुए एक अद्भुत स्तोत्र की रचना की है। ‘परा पूजा’ नामक एक और स्तोत्र है जो इस निर्गुण मनसा स्तोत्र के पहले भाग के लगभग समान है। लेकिन ‘परा पूजा’ स्तोत्र पूजा का वर्णन नहीं करता है जबकि यह प्रसिद्ध भजन स्पष्ट व्याख्या करता है। ‘परा पूजा’ का शाब्दिक अर्थ है “पूजा से परे”। परा पूजा स्तोत्र में प्रयुक्त पूजा शब्द का अर्थ है बझ्य पूजा, यानी बाहरी पूजा। यह पूजा पूजा का सर्वोच्च प्रकार है। परा पूजा स्तोत्र ज्ञानियों की पूजा है। यह आत्म-साक्षात्कार का प्रभाव है। भक्त को लगता है कि वह केवल ईश्वर का अनुभव करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। वह कहता है: हे प्रभु! मैं आपकी पूजा कैसे कर सकता हूँ Para Puja Stotra जो बिना अंगों के हैं, जो स्वयं अस्तित्व हैं? मैं आपकी प्रार्थना कैसे कर सकता हूँ जब आप स्वयं मेरे अस्तित्व हैं? जब आप सदैव शुद्ध हैं, तो मैं आपको अर्घ्य, पाद्य आदि कैसे अर्पित कर सकता हूँ? Para Puja Stotra जब आप सदैव आप्त-काम हैं, तो मैं आपको कुछ भी कैसे अर्पित कर सकता हूँ? क्या मैं सूर्य को मोमबत्ती जला सकता हूँ और क्या मैं समुद्र को एक गिलास पानी से नहला सकता हूँ? जब आप स्वयं संतुष्ट हैं, तो मैं आपको भोग कैसे अर्पित कर सकता हूँ? और इस तरह भक्त भगवान की अनंत प्रकृति का अनुभव करता है। इस प्रकार परा पूजा भगवान की ज्ञान और आनंद से भरी अनंत और शाश्वत प्रकृति को ध्यान में रखते हुए उनकी औपचारिक पूजा की असंभवता का एक उदाहरण है। परा भक्ति उसी अवस्था से संबंधित है। इस अवस्था में भक्त भगवान के साथ एक हो जाता है और अपना व्यक्तित्व खो देता है। आप वैदिक या तांत्रिक विधियों से देवी की पूजा कर सकते हैं। उनकी पूजा बिना किसी अनुष्ठान के, केवल परा पूजा या शुद्ध ध्यान के माध्यम से की जाती है। वास्तव में, यह पूजा का सर्वोच्च प्रकार है, जहाँ आध्यात्मिक बच्चे द्वारा दिव्य माँ को अपना माना जाता है। Para Puja Stotra:परा पूजा स्तोत्र लाभ: Para Puja Stotra यह स्तोत्र आत्म-साक्षात्कार देता है। परा पूजा स्तोत्र ईश्वर के अनुभव की अनुभूति कराता है जो जीवन में समृद्धि प्रदान करता है। Para Puja Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ विभिन्न समस्याओं और एकाग्रता की कमी से ग्रस्त व्यक्तियों को परा पूजा स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। परा पूजा स्तोत्र | Para Puja Stotra अखण्डे सच्चिदानन्दे निर्विकल्पैकरुपिणि । स्थितेऽद्वितीयभावेऽस्मिन्कथं पूजा विधीयते ।।1।। पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् । स्वच्छस्य पाद्यमर्घ्यं च शुद्धस्याचमनं कुत: ।।2।। निर्मलस्य कुत: स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च । अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ।।3।। निर्लेपस्य कुतो गन्ध: पुष्पं निर्वासनस्य च । निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलन्कारो निराकृते: ।।4।। निरञ्जनस्य किं धूपैर्दीपैर्वा सर्वसाक्षिण: । निजानन्दैकतृप्तस्य नैवेद्यं किं भवेदिह ।।5।। विश्वानन्दपितुस्तस्य किं ताम्बूलं प्रकल्प्यते । स्वयंप्रकाशचिद्रूपो योऽसावर्कादिभासक: ।।6।। प्रदक्षिणा ह्र्मानन्तस्य ह्र्माद्वयस्य कुतो नति: । वेदवाक्यैरवेदयस्य कुत: स्तोत्रं विधीयते ।।7।। स्वयंप्रकाशमानस्य कुतो नीराजनं विभो: । अंतर्बहिश्च पूर्णस्य कथमुद्वासनं भवेत् ।।8।। एवमेव परापूजा सर्वावस्थासु सर्वदा । एकबुद्धया तु देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमै: ।।9।। आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणा: शरीरं ग्रहं पूजा ते विविधोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थिति: । संचार: पद्यो: प्रदक्षिणविधि: स्तोत्राणि सर्वागिरो यद्त्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ।।10।।

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Parmeshwar Stotra | परमेश्वर स्तोत्र

Parmeshwar Stotra:परमेश्वर स्तोत्र: परमेश्वर स्तोत्र उस परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना है। परमेश्वर स्तोत्र के कुछ श्लोकों में भगवान शिव को संबोधित किया गया है और कुछ में भगवान विष्णु को, लेकिन इसका उद्देश्य ऐसे ईश्वर को संबोधित करना है जो इन सीमित वर्णनों से परे हैं। यह अत्यंत संगीतमय है और स्तोत्र रत्नावली से लिया गया है। परमेश्वर स्तोत्र Parmeshwar Stotra में यह प्रार्थना करके दर्शाया गया है कि हे ब्रह्मांड के स्वामी, हे अच्छे लोगों के स्वामी, सभी चीजों के स्रोत, आप सर्वोच्च, आप आदिम भगवान हैं, हे परम पवित्र, हे पिता, इस पापी को संभालो जो बुद्धि और शक्ति से रहित है, और इस कष्टदायक जीवन को पार करने में सहायता करें जो पार करना कठिन है। यह भी उल्लेख किया गया है कि हे भगवान जो लोगों को इस जीवन से पार करने में मदद करते हैं, कृपया हमारी मदद करें, हम इस जीवन से परेशान हैं। लोगों में अच्छे गुण नहीं हैं, जो दुखी हैं, और बहुत गंदे दिमाग वाले हैं, और जो नीच और अहंकारी व्यक्तित्व वाले हैं, वे इस जीवन को पार करने के लिए हैं, हालांकि हम आपकी सुरक्षात्मक और संपन्न दृष्टि से बहुत दूर हैं। परमेश्वर स्तोत्र का पाठ आमतौर पर कई स्तोत्रों के पाठ के अंत में या कई गीतों के गायन के अंत में या किसी शुभ कार्य के अंत में किया जाता है। भक्त भगवान से मंगल कामना करता है। इसका अर्थ शुभ कामनाएँ या सुखद अंत की कामना भी हो सकता है। यह स्तुति Parmeshwar Stotra स्तोत्र भगवान महेश्वर को समर्पित है जो उमा के अविभाज्य साथी हैं जो उनकी शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। शक्ति और शक्तिमान के बीच गैर-भेद को मंदिरों में आधे पुरुष आधे महिला अर्धनारीश्वर में मानवरूपी रूप दिया गया है। रघुवंश में अपने आह्वान के गीत में कालिदास द्वारा पार्वती और परमेश्वर कहे जाने वाले इन दोनों की तुलना उन्होंने शब्द और भाव, वाक और अर्थ की उस शाश्वत अविभाज्य जोड़ी से की है, जो एक सत्य है जिसे व्याकरणविद कात्यायन ने अपनी पहली वार्तिक में कहा है। Parmeshwar Stotra परमेश्वर स्तोत्र के लाभ: परमेश्वर स्तोत्र जीवन में सफलता प्रदान करता है।यह स्तोत्र बुरे प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करता है।परमेश्वर स्तोत्र जीवन में अनेक संभावनाएं प्रदान करता है। परमेश्वर स्तोत्र साधक को व्यक्तित्व प्रदान करता है। Parmeshwar Stotra इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए रोग, मानसिक अवसाद और संबंध संबंधी समस्याओं से पीड़ित व्यक्ति को वैदिक नियमों के अनुसार नियमित रूप से परमेश्वर स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। Parmeshwar Stotra | परमेश्वर स्तोत्र जगदीश सुधीश भवेश विभो परमेश परात्पर पूत पित: । प्रणतं पतितं हतबुद्धिबलं जनतारण तारय तापितकम् ।।1।। गुणहीनसुदीनमलीनमतिं त्वयि पातरि दातरि चापरतिम् । तमसा रजसावृतवृत्तिमिमं । जन. ।।2।। मम जीवनमीनमिमं पतितं मरूघोरभुवीह  सुवीहमहो । करुणाब्धिचलोर्मिजलानयनं ।जन. ।।3।। भववारण कारण कर्मततौ भवसिन्धुजले शिव मग्नमत: । करुणाञच समर्प्य तरिं त्वरितं । जन. ।।4।। अतिनाश्य जनुर्मम पुण्यरुचे दूरितौघभरै: परिपूर्णभुव: । सुजघन्यमगण्यमपुण्यरुचिं । जन. ।।5।। भवकारक नारकहारक हे भवतारक पातकदारक हे। हर शंकर किंकरकर्मचयं । जन. ।।6।। तृषितश्चिरमस्मि सुधां हित मेऽच्युत चिन्मय देहि वदान्यवर । अतिमोहवशेन विनष्टकृतं । जन. ।।7।। प्रणमामि नमामि नमामि भवं भवजन्मकृतिप्रणिषूदनकम् । गुणहीनमनन्तमितं शरणं । जन. ।।8।।

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Parmeshwar Stutisaar Stotra | परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र

Parmeshwar Stutisaar Stotra:परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र: परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र परम ईश्वर से प्रार्थना है। किसी श्लोक में यह भगवान शिव को संबोधित करता है तो किसी में भगवान विष्णु को, लेकिन इसका उद्देश्य ऐसे ईश्वर को संबोधित करना है जो इस तरह के सीमित वर्णन से परे हैं। यह अत्यंत संगीतमय है और स्तोत्र रत्नावली से लिया गया है। परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र में यह प्रार्थना करते हुए दर्शाया गया है कि हे ब्रह्मांड के स्वामी, हे अच्छे लोगों के स्वामी, सभी चीजों के स्रोत, आप सर्वोच्च हैं, आप आदिम ईश्वर हैं, हे परम पवित्र, हे पिता, Parmeshwar Stutisaar Stotra इस पापी को संभालो जिसमें बुद्धि और शक्ति का अभाव है, और इस दर्दनाक जीवन को पार करने में मदद करें जो पार करना कठिन है। यह भी उल्लेख किया गया है कि हे भगवान जो लोगों को इस जीवन से पार करने में मदद करते हैं, कृपया हमारी मदद करें, हम इस जीवन से परेशान हैं। जो लोग अच्छे गुणों से रहित हैं, जो दुखी हैं, और जिनका मन बहुत गंदा है, Parmeshwar Stutisaar Stotra और जो नीच और अहंकारी व्यक्तित्व वाले हैं, वे इस जीवन को पार करने के लिए, यद्यपि हम आपकी सुरक्षात्मक और अनुदान देने वाली दृष्टि से बहुत दूर हैं। परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र का पाठ आमतौर पर कई स्तोत्रों के पाठ के अंत में या कई गीतों के गायन के अंत में या किसी शुभ कार्य के अंत में किया जाता है। भक्त भगवान से शुभ कामनाएँ करते हैं। Parmeshwar Stutisaar Stotra परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र का अर्थ शुभकामनाएँ या सुखद अंत की कामना भी हो सकता है। यह स्तुति स्तोत्र भगवान महेश्वर को समर्पित है जो उमा के अविभाज्य साथी हैं जो उनकी शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। शक्ति और शक्तिमान के बीच गैर-भेद को मंदिरों में आधे पुरुष आधे महिला अर्धनारीश्वर में मानव रूप दिया गया है। Parmeshwar Stutisaar Stotra रघुवंश में कालिदास ने अपने आह्वान गीत में इन दोनों को पार्वती और परमेश्वर कहा है, जिसकी तुलना उन्होंने शब्द और अर्थ, वाक और अर्थ के उस शाश्वत अविभाज्य जोड़े से की है, जो एक सत्य है, जिसे व्याकरणाचार्य कात्यायन ने अपनी पहली वार्तिक में कहा है। Parmeshwar Stutisaar Stotra:परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र के लाभ: यह परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र जीवन में सफलता प्रदान करता है।परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र बुरे प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करता है।यह स्तोत्र जीवन में बहुत सी संभावनाएं प्रदान करता है।परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र साधक को व्यक्तित्व प्रदान करता है। Parmeshwar Stutisaar Stotra:किसको यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए: रोग, मानसिक अवसाद और संबंध समस्याओं से पीड़ित व्यक्ति को वैदिक नियमों के अनुसार नियमित रूप से परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। परमेश्वर स्तुतिसार स्तोत्र | Parmeshwar Stutisaar Stotra त्वमेक: शुद्धोऽसि त्वयि निगमबाह्य मलमयं प्रपंचं पश्यन्ति भ्रमपरवशा: पापनिरता: । बहिस्तेभ्य: कृत्वा स्वपदशरणं मानय विभो गजेन्द्रे दृष्टं ते शरणद वदान्यं स्वपददम् ।।1।। न सृष्टेस्ते हानिर्यदि हि कृपयातोऽवसि च मां त्वयानेके गुप्ता व्यसनमिति तेऽस्ति श्रुतिपथे । अतो मामुद्धर्तुं घटय मयि दृष्टिं सुविमलां न रिक्तां मे याच्ञां स्वजनरत कर्तुं भव हरे ।।2।। कदाहं भो स्वामिन्नियतमनसा त्वां ह्रदि भजन्नभद्रे संसारे ह्रानवरतदु:खेऽतिविरस: । लभेयं तां शान्तिं परममुनिभिर्या ह्राधिगता दयां कृत्वा मे त्वं वितर परशान्तिं भवहर ।।3।। विधाता चेद्विश्वं सृजति सृजतां मे शुभकृतिं विधुश्चेत्पाता मावतु जनिमृतेर्दु:खजलधे: । हर: संहर्ता संहरतु मम शोकं सजनकं यथाहं मुक्त: स्यां किमपि तु तथा ते विदधताम् ।।4।। अहं ब्रह्मानन्दस्त्वमपि च तदाख्य: सुविदित स्ततोऽहं भिन्नो नो कथमपि भवत्त: श्रुतिदृशा । तथा चेदानीं त्वं त्वयि मम विभेदस्य जननीं स्वमायां संवार्य प्रभव मम भेदं निरसितुम् ।।5।। कदाहं हे स्वामिञजनिमृतिमयं दुःखनिबिडं भवं हित्वा सत्येऽनवरतसुखे स्वात्मवपुषि । रमे तस्मिन्नित्यं निखिलमुनयो ब्रह्मरसिका रमन्ते यस्मिंस्ते कृतसकलकृत्या यतिवरा: ।।6।। पठ्न्त्येके शास्त्रं निगममपरे तत्परतया यजन्त्यन्ये त्वां वै ददति च पदार्थांस्तव हितान् । अहं तु स्वामिंस्ते शरणमगमं संसृतिभयाधथा ते प्रीति: स्याद्धितकर तथा त्वं कुरु विभो ।।7।। अहं ज्योतिर्नित्यो गगनमिव तृप्त: सुखमय: श्रुतौ सिद्धोऽद्वैत: कथमपि न भिन्नोऽस्मि विधुत: । इति ज्ञाते तत्वे भवति च पर: संसृतिलयादतस्तत्त्वज्ञानं मयि सुघटयेस्त्वं हि कृपया ।।8।। अनादौ संसारे जनिमृतिमये दुःखितमना मुमुक्षु: संकश्चिद्भजति हि गुरुं ज्ञानपरमम् । ततो ज्ञात्वा यं वै तुदति न पुन: क्लेशनिवहैर्भजेऽहं तं देवं भवति च परो यस्य भजनात् ।।9।। विवेको वैराग्यो न च शमदमाद्या: षडपरे मुमुक्षा मे नास्ति प्रभवति कथं ज्ञानममलम् । अत: संसाराब्धेस्तरणसरणिं मामुपदिशन् स्वबुद्धिं श्रौतीं मे वितर भगवंस्त्वं हि कृपया ।।10।। कदाहं भो स्वामिन्निगममतिवेधं शिवमयं चिदानन्दं नित्यं श्रुतिह्रतपरिच्छेदनिवहम् । त्वमर्थाभिन्नं त्वामभिरम इहात्मन्यविरतं मनीषामेवं मे सफलय वदान्य स्वकृपया ।।11।। यदर्थं सर्वं वै प्रियमसुधनादि प्रभवति स्वयं नान्यार्थो हि प्रिय इति च वेदे प्रविदितम् । स आत्मा सर्वेषां जनिमृतिमतां वेदगदितस्ततोऽहं तं वेधं सततममलं यामि शरणम् ।।12।। मया त्यक्तं सर्वं कथमपि भवेत्स्वात्मनि मतिस्त्वदीया माया मां प्रति तु विपरीतं कृतवती । ततोऽहं किं कुर्यां न हि मम मति: क्वापि चरति दयां कृत्वा नाथ स्वपदशरणं देहि शिवदम् ।।13।। नगा दैत्या: कीशा भवजलधिपारं हि गमितास्त्वया चान्ये स्वामिन्किमिति समयेऽस्मिञ्छयितवान् । न हेलां त्वं कुर्यास्त्वयि निहितसर्वे मयि विभो न हि त्वाहं हित्वा कमपि शरणं चान्यमगमम् ।।14।। अनन्ताधा विज्ञा न गुणजलधेस्तेऽन्तमगमन्नत: पारं यायात्तव गुणगणानां कथमयम् । गृणन्यावद्धि त्वां जनिमृतिहरं याति परमां गतिं योगिप्राप्यामिति मनसि बुद्ध्वाहमनवम् ।।15।।

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Sapno ka matlab : सपने में खुद को देख लिया है तो आपके साथ होने वाला है यह, जानें क्या कहता है स्वप्न शास्त्र

Sapno ka matlab:अकसर लोग सपने में चीजें देखकर डर जाते हैं. चलिए बताते हैं सपनों खुद को या किसी चीज को देखने पर ज्योतिषी शास्त्र क्या कहता है. अक्सर लोग खुद को सपने में रोते हुए, हंसते हुए, गिरते हुए या खुद को मरा हुआ देखते हैं जिससे उनके मन में डर बैठ जाता है. लेकिन क्या आपको पता है खुद को सपने में कैसे देखना शुभ और अशुभ माना जाता है? सपने देखना एक सामान्य सी प्रक्रिया होती है. हर सपने के पीछे अच्छे या बुरे संकेत छिपे होते हैं, Sapno ka matlab इसलिए हमें कभी भी सपनों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ये सपने कभी सच हो जाते हैं तो कभी नहीं भी होते हैं, लेकिन इनका कहीं न कहीं हमारी लाइफ से कनेक्शन जरूर होती है हम सभी को तरह-तरह के सपने आते हैं, लेकिन ये सपने स्वप्न शास्त्र के हमारे भविष्य का आईना होते हैं. ये सपने हमें यब बताने में मदद करते हैं कि भविष्य में हमारे साथ क्या शुभ या क्या अशुभ होने वाला है. ये सपने होते हैं शुभ (Auspicious Dreams) सपने में हाथी के साथ महावत को देखना शुभ होता है. इससे धन को लेकर शुभ समाचार मिलते हैं.  मछली मां लक्ष्मी का प्रतीक है और अगर आप सपने में छली देखे या खुद को मछली पकड़ते देखे तो ये जिंदगी में लक्ष्मी के आगमन का संकेत हो सकता है. सपने में बांसुरी देखना दांपत्य जीवन में सुख और मधुरता का समय आने का संकेत है. सपने में अगर आपको सड़क पर पड़े पैसे, सिक्के या नोट मिल जाएं तो यह आने वाले दिनों में धन प्राप्ति का संकेत है.  सपने में सर्कस देखना भी धन प्राप्ति का संकेत है, इससे  संकेत मिलता है कि आपको Sapno ka matlab आने वाले दिनों में कुछ भौतिक सुख प्राप्त होने वाले हैं.  सपने में अगर आप किसी मृत व्यक्ति से बात कर रहे हैं तो डरने की बजाय खुश हो जाइए क्योंकि ये शुभ सपना है और आगे जाकर आपको ढेर सारा धन मिलने वाला है.  अगर आप सपने में खुद को माणिक्य या माणिक की माला या अंगूठी पहने देखें तो समझिए कि आपका भाग्योदय होने वाला है.  अगर सपने में आप खुद को किसी ऊंची और बड़ी दीवार पर बैठा हुआ देख रहे हैं तो इसका मतलब है कि आने वाले जीवन में आपको जबरदस्त तरक्की और पदोन्नति मिलने वाली है.  अगर सपने में आप किसी को पुष्प गुच्छ देते दिखे तो समझना चाहिए कि आने वाले दिनों में आपको किसी की विरासत मिलने वाली है. Sapno ka matlab:सपने में खुद को खुश देखना Sapno ka matlab:सपने में अगर आप खुद को खुश देखते हैं या हंसते हुए देखते हैं, तो इसका मतलब होता है कि आने वाले समय में आपको कोई बड़ी खुशखबरी मिलने वाली है और आपके जीवन में सुख समृद्धि बढ़ने वाली है. सपने में खुद को रोते हुए देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में खुद को रोते हुए देखना बहुत शुभ माना जाता है. खुद को रोते हुए देखना बड़ा ही अच्छा संकेत माना जाता है. सपने में खुद को रोते हुए देखने का अर्थ है कि उस व्यक्ति को जीवन में कोई बड़ी उपल्ब्धि मिलने वाली है Sapno ka matlab और उसका जीवन ऐशो आराम के साथ बीतने वाला है. सपने में खुद को आंसुओं से रोते हुए देखने का मतलब है कि उसके जीवन की परेशानियां कम होने वाली हैं और जल्द ही कोई खुशखबरी मिलेगी. सपने में खुद को मरा हुआ देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में खुद को मरते हुए देखना या मरा हुआ देखने का मतलब है कि आने वाले समय में आपकी आयु लंबी होने वाली है. इसके अलावा खुद को कब्रिस्तान या शमशान घाट में देखना का अर्थ होता है कि आपकी सफलना मिलने वाली है. ऐसे सपने भाग्योदय के संकेत होते हैं. सपने में खुद को उड़ते हुए देखना स्वप्न ज्योतिष के अनुसार सपने में खुद को उड़ते हुए देखने का अर्थ होता है कि आप वास्तविक जीवन में किसी न किसी चिंता को लेकर तनाव में हैं और बहुत ज्यादा परेशान हैं, लेकिन इस सपमे से यह संकेत मिलता है कि Sapno ka matlab आने वाले समय में आपके जीवन की ये परेशानियां दूर हो जाएंगी. ऐसे सपने का मतलब यह भी होता है कि भविष्य में आपको करियर में भी सफलता मिलेगी. सपने में खुद को गिरते हुए देखना सपने में खुद को ऊंचाई से गिरते हुए देखना स्वप्नशास्त्र के अनुसार अशुभ माना जाता है. Sapno ka matlab सपने में खुद को किसी इमारत से गिरते हुए देखने का मतलब होता है कि आपके जीवन में कोई परेशानी आने वाली हैं या फिर आपको स्वास्थ्य से संबंधित कोई दिक्कत हो सकती है.

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Holi 2025:होली किस तारीख को है? जानें सही तिथि और होलिका दहन का शुभ मुहूर्त

Holi 2025:हर साल होली (Holi 2025 Kab hai) के पर्व का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं। इस त्योहार के दिन देशभर में लोगों में बेहद खास देखने को मिलता है। होली के पर्व को 2 दिन तक मनाया जाता है। एक दिन पहले दिन होलिका दहन किया जाता है और इसके अगले दिन रंगों का पर्व होली मनाई जाती है। ऐसे में आइए जानते हैं होली से जुड़ी विशेष बातें। Holi 2025: हिंदू धर्म में होली का त्योहार प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। देशभर में बड़े धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ होली मनाया जाता है। यह त्योहार फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को पड़ता है, लेकिन इससे एक दिन पहले रात्रि में होलिका दहन Holi 2025 किया जाता है। जिसे छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है। होली का महापर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस त्योहार को लेकर कई अलग-अलग पौराणिक कथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं। रंगों का पर्व होली काम, क्रोध, मद,मोह और लोभ जैसे दोषों को त्यागकर ईश्वर की भक्ति में समय व्यतीत करने का संदेश देता है। इस दिन लोगों एक-दूसरे को गुलाल और रंग लगाते हैं और आपस में खुशियां बांटते हैं। इस साल होलिका दहन के दिन भद्रा का साया रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भद्राकाल में होलिका दहन करना शुभ नहीं माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं होली की सही तिथि और होलिका दहन का शुभ मुहूर्त… Holi Kab hai 2025:होली कब है? द्रिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 13 मार्च 2025 को सुबह 10 बजकर 35 मिनट पर होगी और अगले दिन 14 मार्च 2025 को दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, 14 मार्च को होली मनाई जाएगी और 13 मार्च की रात्रि को होलिका दहन किया जाएगा। इस साल होलिका दहन के दिन भद्रा का भी साया रहेगा। होलिका दहन पर भद्रा : 13 मार्च को होलिका दहन के दिन 10:35 AM से 11:26 PM तक भद्राकाल रहेगा। इस दौरान होलिका दहन करने से बचें। होलिका दहन का मुहूर्त : पंचांग के अनुसार, 13 मार्च को देर रात 11 : 27 PM से लेकर 14 मार्च को 12:30 AM तक लगभग 01 घंटा 40 मिनट तक होलिका दहन का शुभ मुहूर्त है। Holi 2025:होलिका दहन के उपाय यदि आप शादी में किसी बाधा का सामना कर रहे हैं, तो होलिका दहन Holi 2025 के समय परिक्रमा लगाएं। साथ ही अग्नि में हवन सामग्री अर्पित करें। मान्यता है कि इस उपाय को करने से विवाह में आ रही रुकावट से छुटकारा मिलता है। साथ ही वैवाहिक जीवन हमेशा खुशहाल रहता है। इसके अलावा किसी रोग से छुटकारा पाने के लिए होलिका दहन की आग में कपूर डालें। ऐसी मान्यता है कि इस उपाय को करने से सभी तरह की बीमारी दूर होती है और मन सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहता है। अगर आप लंबे समय से घर में नकारात्मक ऊर्जा का सामना कर रहे हैं, तो ऐसे में होली की आग घर लाएं और उसे अपने पूरे घर में घुमाएं। माना जाता है कि होलिका दहन की आग से इस उपाय को करने से घर में उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

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Vinayak Chaturthi 2025 Date: मार्च महीने में कब है विनायक चतुर्थी? शुभ मुहूर्त एवं योग के लिए पढ़ें यह खबर

Vinayak Chaturthi 2025 Date:भगवान गणेश को कई नामों से जाना जाता है। भगवान गणेश की पूजा करने से धन की परेशानी दूर होती है। साथ ही सभी संकटों से मुक्ति मिलती है। इस शुभ अवसर पर मंदिरों में देवों के देव महाेदव के पुत्र भगवान गणेश की श्रद्धा भाव से पूजा की जाती है। साथ ही चतुर्थी का व्रत (Vinayak Chaturthi 2025 Date) रखा जाता है। धार्मिक मत है कि चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश की पूजा करने से साधक के आय, सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही आर्थिक तंगी से मुक्ति मिलती है। आइए, फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की विनायक चतुर्थी (Vinayak Chaturthi 2025 Date) की सही डेट एवं शुभ मुहूर्त जानते हैं। विनायक चतुर्थी शुभ मुहूर्त (Vinayak Chaturthi Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 02 मार्च को रात 09 बजकर 01 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, चतुर्थी तिथि का समापन 03 मार्च को शाम 06 बजकर 02 मिनट पर होगा। इस दिन चन्द्रास्त रात 10 बजकर 11 मिनट पर होगा। साधक 03 मार्च को विनायक चतुर्थी का व्रत रख सकते हैं। विनायक चतुर्थी शुभ योग (Vinayak Chaturthi Shubh Yog) फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर शुक्ल और ब्रह्म योग का निर्माण हो रहा है। शुक्ल योग सुबह 08 बजकर 57 मिनट तक है। इसके बाद ब्रह्म योग का संयोग बन रहा है। इसके साथ ही भद्रावास योग का भी संयोग बनेगा। इसके अलावा, अश्विनी नक्षत्र का भी योग है। इन योग में भगवान गणेश की पूजा करने से साधक ही हर मनोकामना पूरी होगी। Vinayak Chaturthi 2025:पंचांग सूर्योदय – सुबह 06 बजकर 44 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 06 बजकर 22 मिनट पर चन्द्रोदय- सुबह 08 बजकर 40 मिनट पर चंद्रास्त- रात 10 बजकर 11 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 05 बजकर 05 मिनट से 05 बजकर 55 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 30 मिनट से 03 बजकर 16 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 06 बजकर 20 मिनट से 06 बजकर 45 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 12 बजकर 08 मिनट से 12 बजकर 57 मिनट तक

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Nyasa Dasakam | न्यसा दशकम्

Nyasa Dasakam : न्यासा दशकम्: न्यासा दशकम् में प्रपत्ति पर 10 श्लोक हैं। घरों में दैनिक पूजा के दौरान इनका जाप करना आम बात है। न्यासा दशकम् स्वामी देसिकन द्वारा कांचीपुरम के भगवान वरदराज के चरणों में की जाने वाली प्रपत्ति है। इस प्रकार सभी श्लोक स्वामी देसिकन द्वारा भगवान को संबोधित किए गए हैं, और इस प्रकार वे “मैं आपके समक्ष समर्पण करता हूँ”, “मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ”, आदि के रूप में हैं। हालाँकि, जिस उद्देश्य से हमारे पूर्वाचार्यों ने वेदांत देसिका के इन शब्दों को संरक्षित किया है और हमें प्रस्तुत किया है, वह है कि हम उनके उदाहरण का अनुसरण करें। इसलिए, श्लोक का अर्थ यहाँ इस रूप में प्रस्तुत किया गया है कि एक प्रपन्न को क्या पालन करना चाहिए। “न्यासा” की धारणा एक परिपूर्ण और आसान प्रणाली है, जिसे सभी द्वारा अपनाया जा सकता है। Nyasa Dasakam बेशक प्रपत्ति की महानता सभी आलवारों और आचार्यों द्वारा बताई गई है और यह कोई नई बात नहीं है; इसे आलवारों के सहज अनुभवों और आचार्यों के शास्त्रिक व्याख्यानों से प्राप्त किया जा सकता है। स्वामी श्री देसिकन ने हमें न्यास या प्रपत्ति के सिद्धांतों पर कई ग्रंथ प्रदान किए हैं। न्यास के विषय पर सबसे सारगर्भित और संक्षिप्त स्तुति में दस श्लोक हैं और इसे न्यास दशकम के नाम से जाना जाता है। न्यास के सिद्धांतों और न्यास के प्रदर्शन की विधि के आसुत सार के रूप में इस कार्य के महत्व के कारण, श्री वैष्णव श्रीमन नारायण के लिए अपने दैनिक तिरुवर अधिवेशन के दौरान अपने घरों में न्यास दशकम का पाठ करते हैं। इस प्रकार भगवान द्वारा प्रपत्ति के पांच अंगों का पालन करके उनके चरणों में न्यास करने का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद, प्रपन्न ने अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह से भगवान को सौंप दी है। फिर प्रपन्न अपना शेष जीवन उनके कैंकर्य के आनंद में समर्पित करता है और इस दुनिया में ही श्री वैकुंठ का आनंद प्राप्त करता है। इस जीवन के अंत में, यह भगवान ही हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि जिस प्रपन्न ने इस प्रकार स्वयं को उनकी देखभाल और सुरक्षा में समर्पित कर दिया है, वह वास्तव में श्री वैकुंठ में उनके साथ एक हो जाए, और संसार के चक्र से मुक्त हो जाए। Nyasa Dasakam:न्यास दशकम के लाभ न्यास दशकम जीवन में आनंद और प्रसन्नता प्रदान करता हैयह न्यास दशकम शांति और समृद्धि देता हैन्यास दशकम भगवान के प्रति भक्ति, एकाग्रता और ध्यान देता है। Nyasa Dasakam:इस दशकम का पाठ किसे करना चाहिए जिस व्यक्ति का ध्यान भंग हो गया हो और काम करने के लिए मन तैयार न हो रहा हो, Nyasa Dasakam उसे नियमित रूप से न्यास दशकम का पाठ करना चाहिए। Nyasa Dasakam | न्यसा दशकम् अहं मद्रक्षणभरो मद्रक्षणफलं तथा । न मम श्रीपतेरेवेत्यात्मानं निक्षिपेद् बुध: ।।1।। न्यस्याम्यकिनचन: श्रीमन्ननुकूलोऽन्यवर्जित: । विश्वासप्रार्थनापूर्वमात्मरक्षाभरं त्वयि ।।2।। स्वामी स्वशेषं स्ववशं स्वभरत्वेन निर्भरम् । स्वदत्तस्वधिया स्वार्थ स्वस्मिन्नयस्यति मां स्वयम् ।।3।। श्रीमन्नभीष्टवरद त्वामस्मि शरणं गत: । ऐतद्देहावसाने मां त्वत्पादं प्रापय स्वयम् ।।4।। त्वच्छेषत्वे स्थिरधियं त्वत्प्राप्त्येकप्रयोजनम् । निषिद्धकाम्यरहितं कुरु मां नित्यकिंकरम् ।।5।। देवीभूषणहेत्यादिजुष्टस्य भगवंस्तव । नित्यं निरपराधेषु कैंकर्येषु नियुंगक्ष्व माम् ।।6।। मां मदीयं च निखिलं चेतनाचेतनात्मकम् । स्वकैकंर्योपकरणं वरद स्वीकुरु स्वयम् ।।7।। त्वमेव रक्षकोऽसि मे त्वमेव करुणाकर: । न प्रवर्तय पापानि प्रवृत्तानि निवारय ।।8।। अक्रत्यानां च करणं कृत्यानां वर्जनं च मे । क्षमस्व निखिलं देव प्रणतार्तिहर प्रभो ।।9।। श्रीमन्नियतपंचांग मद्रक्षणभरार्पणम् । अचीकरत्स्वयं स्वस्मिन्नतोऽहमिह निर्भर: ।।10।।

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