Pratah Smaranam | प्रात: स्मरण

Pratah Smaranam:प्रातः स्मरणम्: प्रातः स्मरणम् श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक प्रार्थना है जिसमें तीन छंद हैं जिसमें व्यक्ति के मन (मनस), वाणी (वाक) और शरीर (कया) को सर्वोच्च आत्मा को समर्पित करने का प्रयास किया गया है। प्रतिदिन के पहले विचार, शब्द और क्रियाएँ व्यक्ति के जीवन पर बहुत प्रभाव डालती हैं। यदि उन्हें पवित्र और दिव्य बना दिया जाए, तो वे आध्यात्मिक प्रकाश का मार्ग प्रशस्त करेंगे। भोर की प्रार्थना इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण है कि भोर आंतरिक जागृति का बाहरी प्रतीक है। जो व्यक्ति प्रतिदिन सुबह तीनों लोकों के लिए एक आभूषण के रूप में छंदों की इस पवित्र त्रयी को पढ़ता है, वह मुक्ति की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करेगा। इन प्रातः स्मरणम् में, शंकर अद्वैत-वेदांत का सार भी प्रस्तुत करते हैं। परम वास्तविकता सच्चिदानंद (अस्तित्व-चेतना-आनंद) है। यह सच है, जो अनुभव की तीन अवस्थाओं की वास्तविकता है और उनसे परे है। हालाँकि, इन अभिव्यक्तियों को वास्तविकता के वर्णनात्मक या निश्चित रूप से शाब्दिक रूप से नहीं लिया जाना चाहिए। इसलिए यह है कि ब्रह्म को नकारात्मक तरीके से इंगित किया जाता है, Pratah Smaranam जैसे ‘यह नहीं’, ‘यह नहीं’। ब्रह्म वर्गीकरण से परे है; यह विचारों और शब्दों की सीमाओं के भीतर नहीं है। तथाकथित व्यक्तिगत आत्मा इससे अलग नहीं है। आत्मा को शरीर मन परिसर के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। दुनिया का निर्माण करने वाले तत्व मूल वास्तविकता पर भ्रामक Pratah Smaranam उपस्थिति हैं, जैसे कि एक हिला, एक माला, आदि एक रस्सी पर प्रक्षेपण हैं। जैसे ही ज्ञान का सूर्य उदय होता है, ये भ्रम गायब हो जाते हैं, और जीवन का लक्ष्य प्राप्त होता है। प्रातः स्मरणम श्लोकों की पुण्य त्रय, तीन शब्दों का आभूषण – जो भोर के समय पढ़ता है वह सर्वोच्च लक्ष्यों को प्राप्त करता है। प्रातः स्मरणम प्रातः स्मरणम वेदांतिक प्रार्थना की पहला-श्रुति (फल का वर्णन) है। Pratah Smaranam यह प्रार्थना की स्तुति है जिसका उद्देश्य व्यक्ति के विचारों, शब्दों और कर्मों को पवित्र करना है ताकि अंततः अंतिम लक्ष्य प्राप्त किया जा सके। Pratah Smaranam:प्रातः स्मरण के लाभ: प्रातः स्मरण भ्रम को दूर करता है, दिन को बहुत ताज़ा और उत्साह और जुनून से भरा बनाता है। किसको यह स्मरण Pratah Smaranam करना चाहिए: जिन लोगों को जीवन में कोई ताज़गी नहीं मिल रही है और जो देवताओं का वरदान पाना चाहते हैं, उन्हें Pratah Smaranam प्रातः स्मरण का नियमित पाठ करना चाहिए। प्रात: स्मरणम् | Pratah Smaranam प्रकीर्णस्तोत्राणि (1) परब्रह्मण: प्रात: स्मरामिह्रदि संस्फुरदात्मतत्त्वं सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् । यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघ ।।1।।प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण । यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचंस्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्रयम् ।।2।। प्रातर्नमामि तमस: परमर्कवर्णं पूर्णं सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम् । यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्तौ रज्ज्वां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै ।।3।। श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् । प्रात: काले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पद्म ।।4।। (2) श्रीविष्णो: प्रात: स्मरामि भवभीतिमहार्तिशान्त्यै नारायणं गरुडवाहनमब्जनाभम् । ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं चक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम् ।।1।। प्रातर्नमामि मनसा वचसा च मूर्ध्ना पादारविन्दयुगलं परमस्य पुंस: । नारायणस्य नरकार्णवतारणस्य पारायणप्रवणविप्रपरायणस्य ।।2।। प्रातर्भजामि भजतामभयंकरं तं प्राक्सर्वजन्मकृतपापभयापहत्यै । यो ग्राहवक्त्रपतितांगघ्रिगजेन्द्रघोरशोकप्रणाशनकरो धृतशंखचक्र: ।।3।। (3) श्रीरामस्य प्रात: स्मरामि रघुनाथमुखारविन्दं मन्दस्मितं मधुरभाषि विशालभालम् । कर्णावलम्बिचलकुण्डलशोभिगंडं कर्णान्तदीर्घनयनं नयनाभिरामम् ।।1।। प्रातर्भजामि रघुनाथकरारविन्दं रक्षोगणाय भयदं वरदं निजेभ्य: । यद्राजसंसदि विभज्य महेशचापं सीताकरग्रहणमंगलमाप सद्य: ।।2।। प्रातर्नमामि रघुनाथपदारविन्दं वज्रांकुशादिशुभरेखि सुखावहं मे । योगीन्द्रमानसमधुव्रतसेव्यमानं शापापहं सपदि गौतमधर्मपत्न्या: ।।3।। प्रातर्वदामि वचसा रघुनाथनाम वाग्दोषहारि सकलं शमलं निहन्ति । यत्पार्वती स्वपतिना सह भोक्तुकामा प्रीत्या सहस्त्रहरिनामसमं जजाप ।।4।। प्रात: श्रये श्रुतिनुतां रघुनाथमूर्तिं नीलाम्बुजोत्पलसितेतररत्ननीलाम् । आमुक्तमौक्तिकविशेषविभूषणाढयां ध्येयां समस्तमुनिभिर्जनमुक्तिहेतुम् ।।5।। य: श्लोकपंचकमिदं प्रयत: पठेद्धि नित्यं प्रभातसमये पुरुष: प्रबुद्ध: । श्रीरामकिंकरजनेषु स एव मुख्यो भूत्वा प्रयाति हरिलोकमनन्यलभ्यम् ।।6।। (4)  श्रीशिवस्य प्रात: स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं गंगाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् । खट्वांगशूलवरदाभयहस्तमीशं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ।।1।। प्रातर्नमामि गिरिशं गिरजार्द्धदेहं सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् । विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोऽभिरामं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ।।2।। प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्यं वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम् । नामादिभेदरहितं षड्भावशून्यं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ।।3।। प्रात: समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकत्रयं येऽनुदिनं पठन्ति । ते दुःखजातं बहुजन्मसञ्चितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्भोः ।।4।। (5) श्रीदेव्या: चाञ्चल्यारुणलोचनाञ्चितकृपां चन्द्रार्कचूडामणिं चारुस्मेरमुखां चराचरजगत्संरक्षणीं सत्पदाम् । चञचच्चकनासिकाग्रविलसन्मुक्तामणीरञ्जितां श्रीशैलस्थलवासिनीं भवतीं श्रीमातरं भावये ।।1।। कस्तूरीतिलकाञ्चितेन्दुविलसत्प्रोद्भासिभालस्थलीं कर्पूरद्रवमिश्रचूर्णखदिरामोदोल्लसद्वीटिकाम् । लोलापांगतरंगितैरधिकृपासारैर्नतानन्दिनीं श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ।।2।। (6) श्रीगणेशस्य प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं सिंदूरपूरपरिशोभितगंडयुग्मम् । उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचंडदण्डमाखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्दम् ।।1।। प्रातर्नमामि चतुराननवन्द्दमानमिच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम् । तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं पुत्रं विलासचतुरं शिवयो: शिवाय ।।2।। प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्तशोकदावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम् । अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाहमुत्साहवर्धनमहं सुतमीश्वरस्य ।।3।। श्लोकत्रयमिदं पुण्यं सदा साम्राज्यदायकम् । प्रातरुत्थाय सततं य: पठेत्प्रयत: पुमान् ।।4।। (7) श्रीसूर्यस्य प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि । सामानि यस्य किरणा: प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ।।1।। प्रातर्नमामि तरणिं तनुवांगमनोभिर्ब्रहोंद्रपूर्वकसुरैर्नुतमर्चितं च । वृष्टिप्रमोचन विनिग्रहहेतुभूतं त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मक च ।।2।। प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्ंति पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च । तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्तिं गोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम् ।।3।। श्लोकत्रयमिदं भानो: प्रात:काले पठेत्तु य: । स सर्वव्याधिनिर्मुक्त: परं सुखमवाप्नुयात् ।।4।। (8) श्रीभगवतद्भक्तानाम् प्रहलादनारदपराशरपुण्डरीकव्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान् । रुक्मांडदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन् पुण्यानिमान् परमभागवतान् स्मरामि ।।9।। वाल्मीकि: सनक: सनन्दनतरुव्र्यासो वसिष्ठो भृगुर्जाबालिर्जमदग्निकच्छजनको गर्गोऽगिंरा गौतम: । मान्धाता ऋतुपर्णवैन्यसगरा धन्यो दिलीपो नल: पुण्यो धर्मसुतो ययातिनहुषौ कुर्वन्तु नो मंगलम् ।।2।।

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Prahladkrit Narsimha Stotra | प्रहलादकृत नृसिंह स्तोत्र

Prahladkrit Narsimha Stotra:प्रह्लादकृत नरसिंह स्तोत्र: प्रह्लाद, नरसिंह, भगवान श्री नरसिंह जी को समर्पित है। Prahladkrit Narsimha Stotra प्रह्लादकृत नरसिंह स्तोत्र में भक्त प्रह्लाद ने भगवान नरसिंह जी की स्तुति करके उनकी स्तुति की। इसके बाद भगवान श्री नरसिंह ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए स्वयं प्रकट हुए थे। नरसिंह भगवान महाविष्णु के सबसे शक्तिशाली स्वरूपों में से एक है, जो हिंदू त्रय में रक्षक हैं। संस्कृत में कई मंत्र भगवान नरसिंह की स्तुति और प्रार्थना करते हैं और किसी भी चुने हुए प्रह्लादकृत नरसिंह स्तोत्र का उचित श्रद्धा, परिश्रम और भक्ति के साथ जाप करने से भय दूर हो सकता है Prahladkrit Narsimha Stotra और भक्तों को सभी अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। नीचे सरल, लेकिन गहन प्रह्लादकृत नरसिंह स्तोत्र का संग्रह देखें जो विविध लाभ प्रदान कर सकता है। प्रह्लादकृत नरसिंह स्तोत्र भगवान के नर-सिंह रूप का चिंतन है जिसके नाखून वज्र (वज्र) के समान मजबूत हैं। सिंह देवता मुझे सही मार्ग दिखाने के लिए प्रसन्न हों। देवता के विभिन्न रूपों को समर्पित बहुत से प्रह्लादकृत नरसिंह मंत्र हैं। ये अत्यधिक शक्तिशाली लेकिन बहुत ही सरल मंत्र हैं जिन्हें कोई भी आसानी से जप सकता है। Prahladkrit Narsimha Stotra प्रह्लादकृत नरसिंह स्तोत्र का निरंतर जप करने से भगवान नरसिंह द्वारा कवच या सुरक्षा प्राप्त होगी। कई शास्त्रों में प्रह्लादकृत नरसिंह स्तोत्र को सभी प्रकार के कवच मंत्रों का सार माना गया है। कवच मंत्रों में उन लोगों की रक्षा करने की शक्ति होती है जो इसका जप करते हैं। कवच का शाब्दिक अर्थ कवच या वक्षपट्टिका है Prahladkrit Narsimha Stotra जिसे सैनिक युद्ध के दौरान अपने शरीर को घातक हथियारों से बचाने के लिए पहनते हैं। उसी तरह, कवच मंत्र भक्तों के कल्याण की रक्षा के लिए सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करते हैं। यदि ऐसा है, तो कल्पना करें कि नरसिंह मंत्र कितना शक्तिशाली हो सकता है जब भगवान नरसिंह के अवतार के पीछे एकमात्र उद्देश्य अपने भक्त को बचाना है। भगवान नरसिंह अत्यंत सौम्य और दयालु हैं, हालांकि वे क्रूर प्रतीत होते हैं। Prahladkrit Narsimha Stotra वे प्रह्लाद द्वारा अपने क्रोधित पिता को दिए गए उत्तर के जवाब में प्रकट हुए थे। Prahladkrit Narsimha Stotra जब राक्षस राजा हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद को प्रताड़ित कर रहा था, क्योंकि वह भगवान विष्णु का भक्त था, तब प्रह्लाद द्वारा सहन की गई कठिनाइयाँ और खतरे चरम सीमा पर पहुँच गए थे। हालाँकि, वह सभी परेशानियों को धैर्य और मुस्कान के साथ पूर्ण विश्वास और समर्पण की भावना के साथ सहन कर रहा था। Prahladkrit Narsimha Stotra:प्रह्लादकृत नृसिंह स्तोत्र के लाभ: प्रह्लादकृत नरसिंह स्तोत्र Prahladkrit Narsimha Stotra साधक को बुरे कर्ताओं से सुरक्षा प्रदान करता है। प्रह्लादकृत नृसिंह स्तोत्र साधक के ऊपर कवच रखता है। Prahladkrit Narsimha Stotra:इस स्तोत्र का पाठ किसे करना है: शत्रुओं के दुष्प्रभाव से पीड़ित व्यक्तियों को Prahladkrit Narsimha Stotra प्रह्लादकृत नृसिंह स्तोत्र का नियमित जाप करना चाहिए। प्रहलादकृत नृसिंह स्तोत्र | Prahladkrit Narsimha Stotra प्रहलाद उवाच ब्रह्मादय: सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धा: सत्त्वैकतानमतयो वचसां प्रवाहै: । नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पिप्रु: किं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजाते: ।।1।। मन्ये धनाभिजनरूपतप: श्रुतौजस्तेज: प्रभावबलपौरुषबुद्धियोगा: । नाराधनाय हि भवन्ति परस्य पुंसो भक्त्या तुतोष भगवान् गजयूथपाय ।।2।। विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभपादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् । मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमान: ।।3।। नैवात्मन: प्रभुरयं निजलाभपूर्णो मानं जनादविदुष: करुणो वृणीते । यधज्जनो भगवते विदधीत मानं तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्री: ।।4।। तस्मादहं विगतविक्लव ईश्वरस्य सर्वात्मना महि ग्रणामि यथामनीषम् । नीचोऽजया गुणविसर्गमनुप्रविष्ट: पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन ।।5।। सर्वे ह्रामी विधिकरास्तव सत्त्वधाम्नो ब्रह्मादयो वयमिवेश न चोद्विजन्त: । क्षेमाय भूतय उतात्मसुखाय चास्य विक्रीडितं भगवतो रूचिरावतारै: ।।6।। तधच्छ मन्युमसुरश्च हतस्त्वयाध मोदेत साधुरपि वृश्चिकसर्पहत्या । लोकाश्च निर्व्रतिमिता: प्रतियन्ति सर्वे रूपं नृसिंह विभयाय जना: स्मरन्ति ।।7।। नाहं बिभेम्यजित तेऽतिभयानकास्य जिह्वार्कनेत्रभ्रुकुटीरभसोग्रदंष्ट्रात् । आंत्रस्त्रज: क्षतजकेसरशंकुकर्णान्निर्ह्रादभीतदिगिभादरिभिन्नखाग्रात् ।।8।। त्रस्तोऽस्म्यहं कृपणवत्सल दु:सहोग्रसंसारचक्रकदनाद्ग्रसतां प्रणीत: । बद्ध: स्वकर्मभिरुशत्तम तेंऽगघ्रिमूलं प्रीतोऽपवर्गशरणं हवयसे कदा नु ।।9।। यस्मात्प्रियाप्रियवियोगसयोगजन्मशोकाग्निना सकलयोनिषु दहामान: । दु:खौषधं तदपि दुःखमतद्धियाहं भूमन् भ्रमामि वद मे तव दास्ययोगम् ।।10।। सोऽहं प्रियस्य सुह्रद: परदेवताया लीलाकथास्तव नृसिंह विरिञ्च गीता: । अञ्जस्तितम्र्यनुग्रणन् गुणविप्रमुक्तो दुर्गाणि ते पदयुगालयहंससंग: ।।11।। बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह नार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौ: । तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहाञ्जसेष्टस्तावद्विभो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम् ।।12।। यस्मिमन्यतो यर्हि येन च यस्य यस्माधस्मै यथा यदुत यस्त्वपर: परो वा। भाव: करोति विकरोति पृथक्स्वभाव: सञ्चोदितस्तदखिलं भवत: स्वरूपम् ।।13।। माया मन: स्रजति कर्ममयं बलीय: कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंस: । छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं संसारचक्रमज कोऽतितरेत्त्वदन्य: ।।14।। स त्वं हि नित्यविजितात्मगुण: स्वधाम्ना कालो वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्ति: । चक्रे विसृष्टमजयेश्वर षोडशारे निष्पीडयमानमुपकर्ष विभो प्रपन्नम् ।।15।। दृष्टा मया दिवि विभोऽखिलधिष्ण्यपानामायु: श्रियो विभव इच्छति याञ्जनोऽयम् । येऽस्मत्पितु: कुपितहासविज्रम्भितभ्रूविस्फूर्जितेन लुलिता: स तु ते निरस्त: ।।16।। तस्मादमूस्तनुभृतामहमाशिषो ज्ञ आयु: श्रियं विभवमैन्द्रियमाविरिञ्चात् । नेच्छामि ते विलुलितानुरूविक्रमेण कालात्मनोपनय मां निजभृत्यपाशर्वम् ।।17।। कुत्राशिष: श्रुतिसुखा मृगतृष्णिरूपा: क्वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोह: । निर्विधते न तु जनो यदपीति विद्वान् कामानलं मधुलवै: शमयंदुरापै: ।।18।। क्वाहं रज: प्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिञ्जात: सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा । न ब्रह्माणो न तु भवस्य न वै रमाया यन्मेऽर्पित: शिरसि पद्मकर:प्रसाद: ।।19।। नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्याज्जन्तोर्यथाऽऽत्मसुह्रदो जगतस्तथापि । संसेवया सुरतरोरिव ते प्रसाद: सेवानुरूपमुदयो न परावरत्वम् ।।20।। एवं जनं निपतितं प्रभवाहिकूपे कामाभिकाममनु य: प्रपतन्प्रसंगात् । कृत्वाऽऽत्मसात्सुरर्षिणा भगवंन्ग्रहीत: सोऽहं कथं नु विस्रजे तव भृत्यसेवाम् ।।21।। मत्प्राणरक्षणमनन्त पितुर्वधश्च मन्ये स्वभृत्यऋषिवाक्यमृतं विधातुम् । खडगं प्रग्रहा यदवोचदसद्विधित्सुस्त्वामीश्वरो मदपरोऽवतु कं हरामि ।।22।। एकस्त्वमेव जगदेतदमुष्य यत्त्वमाधन्तयो: पृथगवस्यसि मध्यतश्च । सृष्ट्वा गुणव्यतिकरं निजमाययेदं नानेव तैरवसितस्तदनुप्रविष्ट: ।।23।। त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्रापार्था । यधस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च तद्वै तदेव वसुकालवद्ष्टितर्वो: ।।24।। न्यस्येदमात्मनि जगद्विलयाम्बुमध्ये शेषेऽऽत्मना निजसुखानुभवो निरीह: । योगेन मीलितदृगात्मनिपीतनिद्रस्तुर्ये स्थितो न तु तमो न गुणांश्च युंगक्षे ।।25।। तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या सञ्चोदितप्रक्रतिधर्मण आत्मगूढम् । अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधेर्नाभेरभूत्स्वकणिकावटवन्महाब्जम् ।।26।। तत्सम्भव: कविरतोऽन्यदपश्यमानस्त्वां बीजमात्मनि ततं स्वबहिर्विचिन्त्य । नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो जातेऽन्कुरे कठमु होपलभेत बीजम् ।।27।। स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आस्थितोऽब्जं कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभाव: । त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ।।28।। एवं सहस्त्रवद्नांगघ्रिशिर:करोरूनासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढयम् । मायामयं सदुपलक्षितसन्निवेशं दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्च: ।।29।। तस्मै भवान् हयशिरस्तनुवं च बिभ्रद्वेदद्रुहावतिबलौ मधुकैटभाख्यौ । हत्वाऽऽनयच्छुतिगणांस्तु रजस्तमश्च सत्त्वं तव प्रियतमां तनुमामनन्ति ।।30।। इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारैर्लोकान् विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान् । धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्न: कलौ यदभवस्त्रिगोऽथ स त्वम् ।।31।। नैतन्मनस्तव कथासु विकुण्ठनाथ सम्प्रीयते दुरितदुष्टमसाधु तीव्रम् । कामातुरं हर्षशोकभयैषणार्तं तस्मिन् कथं तव गतिं विम्रशामि दीन: ।।32।। जिहवैकतोऽच्युत विकर्षति मावितृप्ता शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् । घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्तिर्बहव्य: सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ।।33।। एवं स्वकर्मपतितं भववैतरण्यामन्योन्यजन्ममरणाशनभीतभीतम् । पश्यञ्जनं स्वपरविग्रहवैरमैत्रं ह्न्तेति पारचर पीप्रहि मूढ़मध ।।34।। को न्वत्र तेऽखिलगुरो भगवन् प्रयास उत्तारणेऽस्य भवसम्भवलोपहेतो: । मूढेषु वै महदनुग्रह आर्तबन्धो किं तेन ते प्रियजनाननुसेवतां न: ।।35।। नैवोद्विजे पर दुरत्ययवैतरण्यास्त्वद्विर्यगायनमहामृतमग्नचित्त: । शोचे

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Lion Dream Interpretation: सपने में शेर को देखना देता है कुछ विशेष संकेत, बदल सकती है किस्मत

Lion Dream Interpretation:सपने में दिखाई देने वाली कोई भी चीज आपके जीवन के लिए अलग संकेत देती है और इसके कुछ शुभ-अशुभ फल हो सकते हैं। ऐसे ही किसी जानवर का सपना भी आपके जीवन में मिले-जुले संकेत दे सकता है।  सपने कई बार आपकी कल्पना को दिखाते हैं और कई बार आने वाले समय का संकेत देते हैं। कई ऐसे भी सपने हैं जो आपके वर्तमान और भूत से कुछ संबंध रखते हैं। यूं कहा जाए कि हर सपना कुछ न कुछ संकेत दे सकता है और अलग लोगों के लिए इनका मतलब अलग हो सकता है। ज्योतिष में सपनों की व्याख्या एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे आपको कई बार आगे की योजनाएं बनाने का मौका भी मिलता है। इन्हीं में से एक सपना है शेर का। अगर आपको कभी सपने में शेर के दर्शन होते हैं तो ये जीवन में कई तरह के मिले-जुले संकेत देता है। शेर का सपना देखने का जीवन में विशेष महत्व है जो आपकी व्यक्तिगत व्याख्या के आधार पर भिन्न होता है। शेर का सपना आपकी शक्ति और साहस का संदेश देता है। सपने में शेर देखना यह दर्शाता है Lion Dream Interpretation कि आपके पास जीवन में आने वाली किसी भी चुनौती पर विजय पाने के लिए आंतरिक शक्ति का विकास हो सकता है।  Lion Dream Interpretation:सपने में शेर देखना क्या संकेत देता है ताकत, साहस, नेतृत्व और राजस्व का प्रतीक माना जाने वाला शेर यदि आपको सपने में दिखाई देता है तो इसका सिंह राशि से भी संबंध हो सकता है। जब आपके सपने में शेर दिखाई देता है, तो यह ज्योतिषीय ऊर्जा के बीच के संबंध को दिखाता है। सपने में शेर देखना Lion Dream Interpretation आपकी आंतरिक शक्ति का प्रतीक सपने में शेर देखना इस बात का संकेत हो सकता है कि आपके पास व्यक्तिगत शक्ति और ताकत है। यह इस बात का संकेत दे सकता है कि आपके भीतर चुनौतियों से पार पाने, अपने जीवन पर नियंत्रण रखने और विभिन्न परिस्थितियों में खुद को मजबूती से खड़ा करने की क्षमता है। यह शक्तिशाली प्रतीक आपको अपने आंतरिक साहस को पहचानने और उसके अनुसार काम करने की प्रेरणा देता है। सपने में शेर इस बात का प्रतीक है कि आप अपनी शक्तियों को बखूबी पहचान नहीं पा रहे हैं जिसकी वजह से आपकी उन्नति रुकी हुई है। सपने में शेर देखना नेतृत्व का प्रतीक जंगल के राजा के रूप में शेर को हमेशा से ही नेतृत्व गुणों का प्रतीक माना जाता रहा है। Lion Dream Interpretation जब आपके सपने में शेर दिखाई देता है, तो समझें कि यह नेतृत्व की भूमिका का प्रतीक है और किसी विशेष स्थिति का नेतृत्व करने की क्षमता को दिखाता है। यह आपको खुद पर ज़ोर देने, अपनी राय व्यक्त करने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निर्णायक कार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित करता है। सपने में शेर देखना बदलाव का संकेत Lion Dream Interpretation अगर आपको कभी सपने में शेर दिखाई देता है तो ये इस बात का संकेत हो सकता है कि आपको आगे के जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इस तरह के सपने का मतलब यह है कि आप आगे जो भी निर्णय लेंगे वो आपके पक्ष में हो सकते हैं और आपको इसके लाभ मिलेंगे। कोई भी बदलाव आपके लिए शुभ हो सकता है Lion Dream Interpretation और यह आपकी शक्तियों को उजागर करता है। सपने में शेर का आपके ऊपर हमला करना अगर आप सपने में शेर को हमला करते हुए देखती हैं तो समझें कि असल जीवन में आप किसी चीज से परेशान हैं और वही बात आपके संघर्षों और असफलता का कारण बन सकती है। Lion Dream Interpretation यदि आपको ऐसा कोई सपना दिखाई देता है तो सचेत हो जाएं और सोचें कि आपको जीवन में बदलाव कैसे करना है। इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि भविष्य में कोई अधिक शक्तिशाली व्यक्ति आपको नुकसान पहुंचा सकता है या कोई स्थिति आपके जीवन को बर्बाद कर सकती है। आपको आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है और अपने अस्तित्व के बारे में सोचने की जरूरत है। सपने में शेर का पीछा करना देता है ये संकेत यदि आपको ऐसा कोई सपना दिखाई देता है जिसमें शेर आपका पीछा कर रहा है Lion Dream Interpretation तो इसका मतलब यह हो सकता है कि आप किसी ऐसी चीज से दूर भाग रहे हैं जिसे आप अपने लिए खतरा मानते हैं। ऐसे में अपनी समस्याओं का समझदार समाधान खोजने के कोशिश करें। सपने में शेर को मरना देता है ये संकेत अगर आप सपने में शेर को मार रहे हैं तो समझें कि आप किसी समस्या का जल्द ही समाधान पाने में सफल होंगे। आपका कोई ऐसा काम पूरा हो सकता है जो आपको काफी समय से परेशान कर रहा है। Lion Dream Interpretation ऐसे में यह आपके लिए एक शुभ संकेत हो सकता है जिससे आपको लाभ मिलने के योग हैं। अगर आपको कभी शेर से जुड़े ऐसे सपने दिखाई देते हैं तो आपके जीवन में कुछ विशेष संकेत हो सकते हैं। हालांकि ऐसा हमेशा जरूरी नहीं है कि आपको इसका कोई फल मिले, लेकिन कुछ लोगों के लिए ये संकेत सत्य भी हो सकते हैं।

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Holashtak 2025: 7 या 8 मार्च, कब से शुरू हो रहा होलाष्टक, जानें इस दौरान क्यों नहीं करने चाहिए मांगलिक कार्य

Holashtak 2025 धार्मिक मान्यता के मुताबिक होलाष्टक के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं करने चाहिए. यदि कोई इस दौरान ऐसा करता है तो उसके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है. इस दौरान किए गए मांगलिक कार्य सफल नहीं होते हैं. होलाष्टक में जप और तप करना शुभ माना जाता है. Holashtak Me Kya Karein Kya Na Karein: हिंदू धर्म में होली (Holi) का विशेष महत्व है. इस दिन गरीब हों या अमीर, सभी लोग एक होकर इस रंगों के त्योहार को मनाते हैं. इस पर्व को हर साल फाल्गुन महीने में मनाया जाता है. होली से आठ दिन पहले होलाष्टक (Holashtak) शुरू होता है और इसका समापन होलिका दहन (Holika Dahan) के दिन होता है.  होलाष्टक के दौरान मांगलिक कार्य जैसे शादी-विवाह करने की मनाही होती है. आइए जानते हैं कब से होलाष्टक शुरू हो रहा है और इस दिन क्या करें व क्या नहीं? कब है होली Kab hai Holi वैदिक पंचांग के मुताबिक होली हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है. इस साल फाल्गुन पूर्णिमा 13 मार्च को सुबह 10 बजकर 35 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 14 मार्च को दोपहर 12 बजकर 23 मिनट पर होगा. उदयातिथि के कारण रंगों की होली 14 मार्च 2025 को है. होली से एक दिन पहले यानी 13 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा. होलिका दहन के लिए का शुभ मुहूर्त 13 मार्च 2025 को रात 10:45 बजे से लेकर रात 1:30 बजे तक है.  कब से शुरू होगा होलाष्टक kab se Suru Hoga Holashtak 2025 इस साल होलाष्टक 7 मार्च से शुरू होगा और इसका समापन होलिका दहन दहन के साथ 13 मार्च 2025 को होगा. होलाष्टक यूपी, बिहार, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में मनाया जाता है. Holashtak 2025 होलाष्टक की परंपरा के मुताबिक इस दिन यानी फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी के दिन होलिका दहन के लिए स्थान का चयन किया जाता है. क्यों नहीं करने चाहिए होलाष्टक के समय मांगलिक कार्य  धार्मिक मान्यता है कि जो लोग होलाष्टक Holashtak 2025 के दौरान शुभ कार्य करते हैं, उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है. इस दौरान किए गए मांगलिक कार्य सफल नहीं होते हैं. होलष्टक के दौरान विवाह जैसा मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं. इस समय निर्मित किए गए मकान सुख नहीं देते, इसलिए गृह निर्माण भी वर्जित होता है. इस समय नया व्यवसाय भी शुरू नहीं करना चाहिए. होलाष्टक के दौरान सोना-चांदी, वाहन आदि की खरीदारी करने की मनाही होती है. होलाष्टक में जप और तप करना शुभ माना जाता है. होलाष्टक में इन संस्कारों को करने पर रहती है मनाही 1. विवाह: शादी के बंधन में बंधना.2. चूड़ाकर्म: मुंडन.3. गर्भाधानः किसी स्त्री का गर्भ धारण करना.4. पुंसवनः गर्भ धारण करने के तीन महीने के बाद किया जाने वाला संस्कार.5. सीमंतोन्नयनः गर्भ के चौथे, छठे व आठवें महीने में होने वाला संस्कार.6. जातकर्म: बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए शहद और घी चटाना और वैदिक मंत्रों का उच्चारण करना.7. नामकरणः बच्चे का नाम रखना. 8. निष्क्रमणः यह संस्कार बच्चे के जन्म के चौथे महीने में किया जाता है.9. अन्नप्राशनः बच्चे के दांत निकलने के समय किया जाने वाला संस्कार.10. विद्यारंभः शिक्षा की शुरुआत.11. कर्णवेधः कान को छेदना.12. यज्ञोपवीतः गुरु के पास ले जाना या जनेऊ संस्कार.13. वेदारंभः वेदों का ज्ञान देना.14. केशांतः विद्यारम्भ से पहले बाल मुंडन.15. समावर्तनः शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति का समाज में लौटना समावर्तन है.16. अन्त्येष्टिः अग्नि परिग्रह संस्कार. Holashtak 2025 होलाष्टक के दौरान क्या करें  1. होलाष्टक के दौरान जप और तप करना शुभ माना जाता है.2. हनुमान चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें.3. गरीबों को दान करें. भोजन कराएं. 4. पितृ तर्पण कर सकते हैं. 5. ग्रह शांति पूजा कर सकते हैं.  होलाष्टक Holashtak 2025 में क्यों रहते हैं मांगलिक कार्य बंद हिंदू धर्म ग्रंथों के मुताबिक हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु को शत्रु मानता था. उसके पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे. हिरण्यकशिपु  नहीं चाहता था कि उसका पुत्र विष्णु की पूजा करे. उसके बार-बार मना करने और यातनाएं देने के बाद भी प्रहलाद की भक्ति भगवान विष्णु के प्रति कम नहीं होती थी. इसका कारण हिरण्यकशिपु अपने पुत्र को मारना चाहता था. Holashtak 2025 प्रहलाद को मारने के लिए उसने कई उपाय किए लेकिन सफल नहीं हुआ. इसके बाद हिरण्यकशिपु की बहन होलिका ने अपने भाई से कहा कि वरदान के मुताबिक मैं अग्नि से जल नहीं सकती हूं. मैं प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाती हूं. इससे प्रहलाद जलकर मर जाएगा. होलिका इसके बाद प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में आठ दिन के लिए बैठ गई.  Holashtak 2025 होलिका को वरदान होने के कारण वह सात दिनों तक नहीं जली लेकिन आठवें दिन वह अग्नि सहन नहीं कर पाई और जलकर उसमें भस्म हो गई. Holashtak 2025 भक्त प्रहलाद को भगवान विष्णु के आशीर्वाद से कुछ भी नहीं हुआ. होलिका के जलने के बाद अग्नि देव शांत हो गए और भक्त प्रहलद सुरक्षित निकल आए. इन आठ दिनों में भक्त प्रहलाद ने अग्नि का ताप और पीड़ा सही, जिस कारण यह आठ दिन होलाष्टक कहा जाने लगा, इसलिए इन आठ दिनों कोई भी मांगलिक कार्य करना शुभ नहीं माना जाता है. Holashtak 2025 होलाष्टक के विषय में कई धार्मिक मान्यताएं हैं. कहते हैं कि होलाष्टक में ही शिवजी ने कामदेव को भस्म किया था. इस अवधि में हर दिन अलग-अलग ग्रह उग्र रूप में होते हैं. इसलिए होलाष्टक में शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं. 

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मदन मोहन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर को “श्री राधा मदन मोहन मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। मदन मोहन मंदिर उत्तर प्रदेश मथुरा के पावन नगरी वृन्दावन में स्थित है। यह मंदिर वैष्णव संप्रदाय के प्राचीन मंदिरों में से एक है। सप्तदेवालयों में शामिल मंदिरों में यह मंदिर पहले स्थान पर आता है। औरंगजेब के समय मदन मोहन की मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए इसे राजस्थान के करौली में स्थानांतरित कर दिया गया था। इस मंदिर को “श्री राधा मदन मोहन मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का इतिहास मदन मोहन मंदिर का इतिहास पांच हजार साल पुराना है। ऐसा कहा जाता है कि कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। जबकि ऐतिहासिक अभिलेखों के मुताबिक, एक मुल्तान व्यापारी कपूर राम दास ने श्री सनातन गोस्वामी की देखरेख में 15वीं या 16वीं शताब्दी में इस मंदिर को बनवाया था। मंदिर का महत्व मदन मोहन मंदिर की खास बात और है कि यह मंदिर बहुत ही मजबूती से बना हुआ है। औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का बहुत प्रयास किया परन्तु वह इसे तोड़ नहीं पाया। वृन्दावन में भगवान कृष्ण के प्रत्येक मंदिर में प्रतिदिन आरती की जाती है परन्तु मदन मोहन मंदिर में केवल कार्तिक के महीने में ही आरती की जाती है। पांच सौ साल पूर्व चैतन्य महाप्रभु ब्रज वृन्दावन आये तो उन्हें यहाँ पर श्रीकृष्ण की लीलास्थलियों का अनुभास हुआ। वह कुछ समय के बाद बंगाल चले गए। परन्तु उन्होंने अपने अनुयायियों को वृन्दावन में श्रीकृष्ण की लीलास्थलियों को खोजने के लिए भेजा। क्योंकि उस समय वृन्दावन पूर्ण रूप से जंगल बन गया था। चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी वृन्दावन में वास करने लगे। चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी सनातन गोस्वामी एक दिन मथुरा में ओंकार चौबे के घर भिक्षा मांगने गए तो उन्होंने वहां पर 5 साल के बालक को खेलते हुए देखा। उन्होंने चौबे की पत्नी से पूछा की यह बालक आपका है ? माता ने बताया कि यह बालक उन्हें यमुना किनारे खेलता हुआ दिखा, तो उसे अपने घर ले आयी। इसका नाम मदन मोहन है। सनातन गोस्वामी उस बालक को अपने साथ ले गए। वह साधना करने के बाद बिना नमक की बाटी को भोग में ठाकुर जी को अर्पित करते और उस बाटी को बालक को खाने को देते। बालक को बिना नमक की बाटी पसंद नहीं आ रही थी। इस दौरान मुल्तान का एक व्यापारी रामदास कपूर व्यापार हेतु अपनी नाव से यमुना नदी द्वारा आगरा जा रहा था। तभी उसकी नाव खराब हो गयी। नाव ख़राब होने के कारण व्यापारी सनातन गोस्वामी के पास गया। तब सनातन गोस्वामी को मालूम हुआ कि यह नमक का व्यापारी, तो वह समझ गए। जब उस व्यापारी ने गोस्वामी और बालक को देखा,तो मोहित होकर मंदिर निर्माण की इच्छा रखी। मंदिर निर्माण के निर्णय से ही नाव ठीक हो गयी। इसके बाद मंदिर का निर्माण हुआ और मदन मोहन की पूजा होने लगी। मंदिर की वास्तुकला मदन मोहन मंदिर उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली में बना हुआ है। यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियाँ है। मंदिर में भगवान कृष्ण के साथ राधा रानी और ललिता सखी की प्रतिमा है। यह मंदिर यमुना नदी से 50 फीट ऊंचा है और यमुना में इसकी नींव 70 फीट नीचे तक है। मंदिर का समय गर्मियों में मदन मोहन मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 11:00 AM गर्मियों में शाम में मदन मोहन मंदिर खुलने का समय 05:00 PM – 05:30 PM सर्दियों में मदन मोहन मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM सर्दियों में शाम में मदन मोहन मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद मंदिर में भगवान कृष्ण के प्रिय व्यंजन “अंगा कड़ी” का भोग लगाया जाता है। साथ ही पुष्प भी चढ़ाये जाते है।

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Pratyangira Mahavidya Stotra | प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र

Pratyangira Mahavidya Stotra :प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र: मां प्रत्यंगिरा महाकाली का विशाल रूप हैं। गुप्त रूप से प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र का पाठ करने से बड़े-बड़े और प्रतिष्ठित लोगों में बड़ा अंतर आता है। चाहे कितना भी बड़ा काम हो या कितना भी बड़ा शत्रु क्यों न हो, प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र के पाठ से सभी क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं। प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र के पाठ से शत्रुओं से निपटना आसान होता है, लेकिन हमारे कई अप्रत्यक्ष शत्रु भी होते हैं, जो मित्रवत होते हैं, लेकिन वे हमारी बुराई करते हैं और अधिकतर हमारी छवि खराब करते हैं, और हमारे परिवार के सदस्यों से बदला लेते हैं। प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र के प्रयोग से न केवल शत्रुओं का नाश होता है, बल्कि उनके परिवार के सदस्यों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। मानव मानस में मां की गहरी आद्यरूपी आवश्यकता होती है। ऐसा कहा जाता है कि देवी मानव जाति की देवत्व की सबसे प्रारंभिक अवधारणा थी। देवी की पूजा करने वाले शाक्तों में, सभी अस्तित्व का स्रोत स्त्री है। ईश्वर स्त्री है। Pratyangira Mahavidya Stotra वह देवत्व का मुख्य प्रतिनिधित्व है। वह वह शक्ति है जो चेतना, मन, पदार्थ, ऊर्जा, मौन, आनंद तथा अशांति और हिंसा के रूप में सभी के जीवन में निवास करती है। वह जीवंत ऊर्जा है जो हर चीज को जीवंत, आकर्षक और अद्भुत बनाती है। वह हर चीज में निहित है और साथ ही हर चीज से परे है। प्रत्यंगिरा को कभी-कभी भद्रकाली और सिद्धिलक्ष्मी के रूप में पहचाना जाता है। हालाँकि देवी की पूजा काली, कमलात्मिका, तारा, त्रिपुरसुंदरी आदि एक रूप में करना कहीं अधिक बेहतर है। प्रत्यंगिरा साधना मुख्य रूप से काले जादू के हमलों से खुद को बचाने और अपने जीवन में समृद्धि के लिए की जाती है। यदि आपके शत्रु आपसे दुश्मनी की भावना रखते हैं और आप पर बार-बार तांत्रिक हमले करते हैं या अन्य प्रकार के जादू-टोने करते हैं, और आर्थिक, शारीरिक नुकसान पहुंचाते हैं और आपका भविष्य नष्ट कर रहे हैं, तो इस समय आप माँ भद्रकाली के प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र रूप की पूजा करें और शत्रु द्वारा किसी भी प्रकार की घृणा, जादू-टोना, यातना, रुमाल, घाव आदि को नष्ट कर दें, माँ भगवती द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। इतना ही नहीं, आप पर किए गए टोने-टोटके आदि के अनेक प्रयोग माता द्वारा शत्रु पर दुगुनी तीव्रता से वापस लौटेंगे। कुछ अन्य प्रयोग भी शत्रु को लौटा देते हैं तथा शत्रु की सारी शक्ति को नष्ट कर देते हैं और शत्रु पर आक्रमण भी करते हैं। Pratyangira Mahavidya Stotra:प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र के लाभ देवी प्रत्यंगिरा को आह्वान करने के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र साधना यहां दी गई है। Pratyangira Mahavidya Stotra प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र का प्रयोग किसी ऐसे शत्रु के मन को नष्ट करने के लिए किया जाता है जो अनावश्यक रूप से किसी निर्दोष और असहाय व्यक्ति को परेशान करता है और उसे नुकसान पहुंचाने पर तुला रहता है। यह शत्रु की हानिकारक और विनाशकारी सोच को नष्ट करके और उसके मन को भ्रमित करके उसे भ्रमित करता है। Pratyangira Mahavidya Stotra:किसको करना है यह स्तोत्र का पाठ Pratyangira Mahavidya Stotra शत्रुओं द्वारा किए गए टोने-टोटके, बुरी नजर, काले जादू से प्रभावित और अपने जीवन को परेशान करने वाले व्यक्तियों को किसी विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र का पाठ करना चाहिए ताकि इसका परिणाम तुरंत मिल सके।किसी भी प्रकार के दिशा-निर्देशों और जानकारी के लिए कृपया एस्ट्रो मंत्र से संपर्क करें। प्रत्यंगिरा महाविद्या स्तोत्र | Pratyangira Mahavidya Stotra Pratyangira Mahavidya Stotra किसी भी शत्रु की प्रबलतम तांत्रिक क्रियाओं को वापिस लौटने वाली एवं रक्षा करने वाली ये महा दिव्यशक्ति है। इस तंत्र का प्रयोग शत्रु को नाश करने के लिए, शत्रुओं के किये-करायों को नाश करने के लिए किया जाता है। Pratyangira Mahavidya Stotra कोई भी सिद्ध तन्त्र क्रियाओं को जानने वाला तांत्रिक इस विद्या का प्रयोग कर सकता है, क्योंकि इस विद्या को प्रयोग करने से पूर्व शत्रुओं के तन्त्र शक्ति, उसकी प्रकृति एवं उसकी मारक क्षमता का ज्ञान होना अति आवश्यक है। वास्तव में प्रत्यंगिरा स्वयं में शक्ति न होकर नारायण, रूद्र, कृत्य, भद्रकाली आदि महा शक्तियों की संवाहक है। जैसे तारे स्वयं में विद्युत् न होकर करंट की सम्वाहिकाएँ हैं। बहुत से व्यक्ति प्रेत, यक्ष, राक्षस, दानव, दैत्य, मरी-मसान, शंकिनी, डंकिनी बाधाओं तथा दूसरे के द्वारा या अपने द्वारा किए गए प्रयोगों के फल-स्वरुप पीड़ित रहते हैं। इन सबकी शान्ति हेतु यहाँ भैरव-तन्त्रोक्त ‘विपरीत-प्रत्यंगिरा’ की विधि प्रस्तुत है। पीड़ित व्यक्ति या प्रयोग-कर्ता गेरुवा लंगोट पहन कर एक कच्चा बिल्व-फल अपने तथा एक पीड़ित व्यक्ति के पास रखे। रात्रि में सोने से पूर्व पीड़ित व्यक्ति की चारपाई पर चारों ओर इत्र का फाहा लगाए। Pratyangira Mahavidya Stotra रात्रि को 108 या कम से कम 15 पाठ सात दिन तक करे। Pratyangira Mahavidya Stotra नित्य गो-घृत या घृत-खाण्ड (लाल शक्कर), घृत, पक्वान्न, बिल्व-पत्र, दूर्वा, जाउरि (गुड़ की खीर) से हवन करे। सात ब्राह्मणों या कुमारियों को भोजन प्रतिदिन करावे। यदि भोजन कराने में असमर्थ हो, तो कुमारियों को थोड़े बताशे तथा दक्षिणा प्रतिदिन दे, बिल्व-फल जब काला पड़ जाये, तो दूसरा हरा बिल्व-फल ले ले। फल को लाल कपड़े में लपेटकर रखे। ।। ध्यानम् ।। नानारत्नार्चिराक्रान्तं वृक्षाम्भ: स्त्रव??र्युतम् । व्याघ्रादिपशुभिर्व्याप्तं सानुयुक्तं गिरीस्मरेत् ।। मत्स्यकूर्मादिबीजाढ्यं नवरत्न समान्वितम् । घनच्छायां सकल्लोलम कूपारं विचिन्तयेत् ।। ज्वालावलीसमाक्रान्तं जग स्त्री तयमद्भुतम् । पीतवर्णं महावह्निं संस्मरेच्छत्रुशान्तये ।। त्वरा समुत्थरावौघमलिनं रुद्धभूविदम् । पवनं संस्मरेद्विश्व जीवनं प्राणरूपत: ।। नदी पर्वत वृक्षादिकालिताग्रास संकुला । आधारभूता जगतो ध्येया पृथ्वीह मंत्रिणा ।। सूर्यादिग्रह नक्षत्र कालचक्र समन्विताम् । निर्मलं गगनं ध्यायेत् प्राणिनामाश्रयं पदम् ।। “वक्र-तुण्ड महा-काय, कोटि-सूर्य-सम-प्रभं! अविघ्नं कुरु मे देव! सर्व-कार्येषु सर्वदा।।” उक्त श्लोक को पढ़कर भगवान् गणेश को नमन करे। फिर पाठ करे- ब्राह्मी मां पूर्चतः पातु, वह्नौ नारायणी तथा। माहेश्वरी च दक्षिणे, नैऋत्यां चण्डिकाऽवतु।। पश्चिमेऽवतु कौमारी, वायव्ये चापराजिता। वाराही चोत्तरे पातु, ईशाने नारसिंहिका।। प्रभाते भैरवी पातु, मध्याह्ने योगिनी क्रमात्। सायं मां वटुकः पातु, अर्ध-रात्रौ शिवोऽवतु।। निशान्ते सर्वगा पातु, सर्वदा चक्र-नायिका। ॐ क्षौं ॐ ॐ ॐ हं हं हं यां रां लां खां रां रां क्षां ॐ ऐं ॐ ह्रीं रां रां मम रक्षां कुरु ॐ ह्रां ह्रं ॐ सः ह्रं ॐ क्ष्रीं रां रां रां यां सां ॐ वं यं रक्षां कुरु कुरु। ॐ नमो विपरित-प्रत्यंगिरायै विद्या-राज्ञो त्रैलोक्य-वशंकरी तुष्टि-पुष्टि-करी, सर्व-पीड़ापहारिणी, सर्व-रक्षा-करी, सर्व-भय-विनाशिनी। सर्व-मंगल-मंगला-शिवा सर्वार्थ-साधिनी। वेदना पर-शस्त्रास्त्र-भेदिनी,

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Pragnya Vivardhana Karthikeya Stotram:श्रीप्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र 

Pragnya Vivardhana Karthikeya Stotram:श्रीप्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र  स्कंद उवाच – योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः। स्कंदः कुमारः सेनानी स्वामी शंकरसंभवः॥१॥ गांगेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः। तारकारिरुमापुत्रः क्रोधारिश्च षडाननः॥२॥ शब्दब्रह्मसमुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः। सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः॥३॥ शरजन्मा गणाधीशः पूर्वजो मुक्तिमार्गकृत्। सर्वागमप्रणेता च वांछितार्थप्रदर्शनः ॥४॥ अष्टाविंशतिनामानि मदीयानीति यः पठेत्। प्रत्यूषं श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत् ॥५॥ महामंत्रमयानीति मम नामानुकीर्तनात्। महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥६॥ !! इति श्री रुद्रयामले प्रज्ञा विवर्धन स्तोत्रं सम्पूर्णम !! श्रीप्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र विशेषताए Pragnya Vivardhana Karthikeya Stotram श्रीप्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र के साथ-साथ यदि श्री कार्तिकेय अष्टकम का पाठ किया जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र  का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| Pragnya Vivardhana Karthikeya Stotram अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे| श्रीप्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र के पाठ के साथ साथ पारद कर्तिकेया मुर्ति का भी पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है| और नियमित रुप से करने से रुके हुए कार्य भी पूर्ण होने लगते है | और साधक के जीवन में रोग, भय, दोष, शोक, बुराइया, डर दूर हो जाते है साथ ही देवी की पूजा करने से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि प्राप्त होती है। याद रखे इस श्रीप्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र पाठ को करने से पूर्व अपना पवित्रता बनाये रखे| इससे मनुष्य को जीवन में बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है|

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Holi:जानिये होली पर किन देवी-देवताओं की पूजा करने से मिलता है सुख और सौभाग्य, इन्हें ये रंग और भोग भी करें अर्पित

Holi:पूरे देश में अभी से ही होली की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. अब आपके मन में यह सवाल चल रहा होगा की होली के दिन किन देवी-देवताओं की पूजा बेहद जरूरी है. साथ ही पूजा आराधना करने के लिए किन-किन सामग्रियों की जरूरत होती है. जानिये होली Holi पर किन देवी-देवताओं की पूजा करने से पूरी होती है हर मनोकामना होली Holi एक महोत्सव के साथ-साथ एक पावन असर भी है जिसमें लोग अपने और अपने आस-पास वालों के लिए शुभकामनाओं की कामना करते हैं। इस अवसर पर लोग न केवल अपने पूर्वजों बल्कि अपने कुलदेवी-देवताओं को भी याद करते हैं और उन्हें भी भोजन अर्पित करते हैं। कई लोग इस दिन घर में समृद्धि लाने या सौभाग्य पाने के लिए भगवान् की भी पूजा करते हैं लेकिन उनमें से कईयों को ये समझ नहीं आता कि इस दिन किस भगवान् की पूजा अत्यंत फलदाई है। तो, चलिए जानते हैं…श्री राधा और कृष्णकहते हैं कि होली का पर्व भगवान् श्रीकृष्ण से ही शुरू हुआ था और इसमें राधा भी उनके साथ थी। ऐसे में इस दिन श्री राधा कृष्ण की पूजा अवश्य करनी चाहिए जिससे जीवन में प्रेम का आगमन होता है और प्रेम संबंध मजबूत भी मजबूत होते हैं। भगवान् को अगर रंग अर्पित करना चाहते हैं, तो राधा जी को खिले रंग का गुलाल और कृष्ण जी को मटमैला गुलाल लगाना चाहिए। हनुमानजी की पूजा हनुमानजी दुखहर्ता हैं और होली पर इनकी पूजा का विशेष महत्व है। होली Holi के दिन हनुमान जी की आराधना करने से भक्तों के जीवन में सुख-संपन्नता बनी रहती है। होली पर भगवान हनुमानजी को चोला चढ़ाना चाहिए और मीठा पान और गुड़ से बनी मीठी रोटियों का भोग लगाना चाहिए। इन्हें सिंदूरी लाल रंग का गुलाल भी अर्पित करना चाहिए। Holi 2025 Special Tips: होली के दिन भूलकर भी न करें ये 5 काम, वरना हो सकता है भारी नुकसान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी होली के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से घर में खुशहाली आती है और माता लक्ष्मी की पूजा से धन-धान्य के भंडार सदैव के लिए भरे रहते हैं। होली के दिन आप भगवान विष्‍णु को आप बताशे का भोग लगाकर और माता लक्ष्‍मी को पीले या सफेद मिष्‍ठान का भोग लगाकर प्रसन्न कर सकते हैं। भगवान शिव भगवान् शिव को समर्पित बनारस में भस्म की होली Holi खेली जाती है। मान्यता है कि होली के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से न सिर्फ वैवाहिक जीवन सुखी रहता है बल्कि सभे कष्ट दूर हो जाते हैं। इस दिन आप चाहें तो उन्हें भस्म यानि होलिका दहन की राख, भांग की सूखी पत्तियां अथवा नीला रंग अर्पित कर सकते हैं। Why Holi is celebrated:क्यों मनाई जाती है होली? यहां जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथाएं भगवान राम होली पर सुख-समृद्धि के लिए भगवान् राम की पूजा होली Holi की अग्नि में भूनी गईं गेहूं जौ की बालियों के साथ करना चाहिए और उन्हें इसका भोग लगाना चाहिए। इससे भगवान आपके भंडार सदैव भरे रखेंगे और आपको भी कभी पैसों की कमी नहीं होगी।मां दुर्गा होली के दिन मां दुर्गा को लाल रंग की चुनरी या लाल रंग की साड़ी चढाने से सारे कष्ट दूर होते हैं। होली के दिन भगवान शंकर की पूजा आराधना करना शुभ माना जाता है. चिता की राख से काशी में होली भी खेली जाती है. जिसे मसाने की होली कहा जाता है. इसके अलावा होली के दिन राधा कृष्ण की भी पूजा का विधान है. इससे न सिर्फ जीवन में प्रेम का आगमन होता है बल्कि प्रेम संबंध भी मजबूत होते हैं. इसके अलावा होली के दिन माता लक्ष्मी की उपासना करने से घर में पैसे की तंगी खत्म होती है. होली से एक दिन पहले भक्त प्रहलाद को जलाने के लिए होलिका उन्हें गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी लेकिन प्रहलाद को कुछ नहीं हुआ और होलिका भस्म हो गई थी. होली के दिन भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार की भी पूजा आराधना करने का विधान है.

Holi:जानिये होली पर किन देवी-देवताओं की पूजा करने से मिलता है सुख और सौभाग्य, इन्हें ये रंग और भोग भी करें अर्पित Read More »

Why Holi is celebrated:क्यों मनाई जाती है होली? यहां जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथाएं

Why Holi is celebrated:होली का त्योहार पूरे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि इस त्योहार की शुरुआत कहां और कैसे से हुई? अगर नहीं, तो हम आपको इस लेख में विस्तार से बताते हैं. Holi Mythological Story: होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. इस दिन होलिका दहन (Holika) का आयोजन किया जाता है और इसके अगले दिन लोग रंगों और गुलाल के साथ एक-दूसरे के साथ होली (Holi 2025) खेलते हैं. हर कोई एक-दूसरे पर प्यार के रंग बरसाते हैं. होली के रंगों को प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है. होली मनाने की पीछे की वजह (Why Holi is celebrated in India) मथुरा, वृंदावन और अन्य पवित्र स्थलों सहित पूरे ब्रज क्षेत्र में, होली भक्ति और उल्लास के साथ मनाई जाती है. बड़े उत्सवों में वृंदावन की फूलवाली होली और बरसाना की लठमार होली शामिल हैं. Why Holi is celebrated यह उत्सव दो दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत होलिका दहन से होती है जो बुराई को खत्म करने का प्रतीक है. होली को कुछ जगहों पर धुलेंडी के नाम से भी जाना जाता है. भारत के सबसे बड़े उत्सवों में से एक होली रंगों, उत्साह और कई अन्य चीजों के साथ वसंत ऋतु का प्रतिनिधित्व करने वाला एक आनंदमय त्योहार है. हर साल हम बुराई पर अच्छाई की जीत मनाने के लिए इस दिन को मनाते हैं, Why Holi is celebrated जो मार्च की शुरुआत में फाल्गुन महीने में आता है. हालांकि होली एक प्राचीन हिंदू त्योहार है लेकिन यह लगभग पूरी दुनिया में मनाया जाता है. इस साल रंगों का त्योहार 25 मार्च 2025, सोमवार को मनाया जाएगा. होली क्यों मनाई जाती है? (Why do we celebrate Holi) होली एक हिंदू त्योहार है जो प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है. होली का त्योहार वसंत ऋतु का स्वागत करने के एक तरीके के रूप में मनाया जाता है, और इसे एक नई शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है. ऐसा कहा जाता है कि होली उत्सव के दौरान लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर आनंद लेते हैं. त्योहार के पहले दिन, प्रतीकात्मक रूप से सभी बुराइयों को जलाने और एक रंगीन और नए भविष्य की शुरुआत करने के लिए अलाव जलाया जाता है. होली महोत्सव में लोग बहुत से रंग एक-दूसरे पर फेंकते हैं. Why Holi is celebrated धार्मिक अर्थ में ये रंग प्रतीकात्मकता से समृद्ध होते हैं और उनके कई अर्थ भी होते हैं. कुछ लोगों के लिए होली का मतलब खुद को बुराइयों और राक्षसों से साफ करना होता है. होली बुराई पर धर्म की जीत की कहानियों से गूंजती है. ऐसी ही एक किंवदंती भगवान कृष्ण और राधा के बीच के मधुर बंधन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो विविधता के बीच एकता का प्रतीक है. इस पौराणिक कहानी के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने अपनी शरारती भावना से, खेल-खेल में राधा रानी के चेहरे पर रंग लगाया, जिससे होली की परंपरा की शुरुआत हुई. Why Holi is celebrated एक पौराणिक कथा के अनुसार होली को राजा हिरण्यकशिपु, उनके समर्पित पुत्र प्रहलाद और दुष्ट होलिका की कहानी से जोड़ती है. भगवान विष्णु के प्रति प्रहलाद की अटूट भक्ति के कारण उसके पिता को क्रोध आया, जिसके कारण होलिका ने एक विश्वासघाती योजना बनाई. हालांकि, दैवीय हस्तक्षेप ने बुराई को विफल कर दिया, जिससे होलिका दहन की शुरुआत हुई और अंधकार पर अच्छाई की जीत का स्थायी उत्सव मनाया गया. होली मनाने के पीछे की कहानी क्या है? (What is the story behind holi) हिंदू धर्म में बुराई पर अच्छाई की विजय हिरण्यकशिपु की कहानी में बताई जाती है. पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकशिपु एक प्राचीन राजा था जो अमर होने का दावा करता था और भगवान के रूप में पूजे जाने की मांग करता था. Why Holi is celebrated उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु की पूजा करने के प्रति अत्यधिक समर्पित था इसलिए हिरण्यकशिपु इस बात से क्रोधित था कि उसका पुत्र उसके स्थान पर इस भगवान की पूजा करता था. इससे क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु अपने बेटे प्रह्लाद को यातनाएं देता था. ऐसे में एक दिन भगवान विष्णु आधे शेर और आधे मनुष्य के रूप में प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु का वध कर दिया. इस तरह, अच्छाई ने बुराई पर विजय पा ली. होली महोत्सव से जुड़ी एक और पौराणिक कहानी राधा और कृष्ण से जुड़ी है. भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में, श्री कृष्ण को कई लोग सर्वोच्च भगवान के रूप में देखते हैं. ऐसा कहा जाता है Why Holi is celebrated कि कृष्ण का रंग नीला था क्योंकि किंवदंती के अनुसार, जब वह शिशु थे तो उन्होंने एक राक्षस का जहरीला दूध पी लिया था. कृष्ण को देवी राधा से प्रेम हो गया, लेकिन उन्हें डर था कि उनका नीला रंग देखकर राधा उनसे प्रेम नहीं करेंगी लेकिन राधा ने कृष्ण को अपनी त्वचा को रंग से रंगने की अनुमति दी, जिससे वे एक सच्चे जोड़े बन गए. होली पर लोग कृष्ण और राधा के सम्मान में एक-दूसरे की पर रंग लगाते हैं. होली की रस्में और परंपराएं (Holi rituals) Why Holi is celebrated होली केवल उल्लास का एक दिन नहीं है ब्लकि यह परंपराओं और अनुष्ठानों से भरा दो दिवसीय त्योहार है. आइए उन खास उत्सवों के बारे में जानें जो होली को इतना खास बनाते हैं- होलिका दहन (होलिका जलाना):- यह अनुष्ठान मुख्य होली समारोह से पहले शाम को होता है. होलिका दहन और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक अलाव जलाया जाता है. लोग अलाव के चारों ओर इकट्ठा होते हैं, भक्ति गीत गाते हैं और प्रार्थना करते हैं. इस साल होलिका दहन 24 मार्च 2024 को किया जाएगा. रंगवाली होली (रंगों का दिन):- यह होली का मुख्य दिन है, जहां रंगों को उछालना और एक-दूसरे को रंग लगाने पर केंद्रित होता है. लोग, युवा और बूढ़े, रंगीन पानी और गुलाल से भरी पिचकारियों से लैस होकर एक साथ आते हैं. Why Holi is celebrated इस साल होली का त्योहार होलिका के अगले दिन यानी 25 मार्च 2024 को बनाया जाएगा.

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राम जानकी मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

यहां दर्शन करने से होती है सुख – सोभाग्य में वृद्धि राम जानकी मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। राम जानकी मन्दिर शहर के मंगलनाथ रोड़ स्थित अंकपात चौराहे पर बना हुआ है। शहर के बीचोंबीच बने इस मंदिर की गिनती पुराने मंदिरों में की जाती है, जिसका समय-समय पर सुंदरीकरण कराया जाता रहा है। मंदिर के राम दरबार में हाजिरी लगाने के लिए देश-प्रदेश से लोग आते हैं और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए पूजन-अर्चन करते हैं। इस मंदिर में माता सीता और प्रभु श्री राम छोटे भाई लक्ष्मण के साथ विराजमान हैं। राम जानकी मंदिर का इतिहास धर्म नगरी उज्जैन में एक से बढ़कर एक पुराने मंदिर हैं, जहां श्रद्धालुओं का हर समय तांता लगा रहता है। राम जानकी मन्दिर भी उनमें से एक है, जानकार इस मंदिर को दशकों पुराना बताते हैं। मीना समाज धर्मशाला की देख-रेख में राम जानकी मंदिर का संचालन होता है। प्रभु श्रीराम की भक्ति जीव को संसार में अनंत सुख देने वाली होती है। भक्त श्री राम की भक्ति में लीन होकर भजन कीर्तन करते हैं, जिससे उनकी और उनको सुनने वालों की आत्मा निर्मल हो जाती हैं। राम जानकी मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति निरन्तर पूरे विधि विधान से राम जानकी मन्दिर में पूजा करता है उस व्यक्ति के सुख – सोभाग्य में वृद्धि होती है और वह अपने जीवन की हर मनोकामना को पूर्ण प्राप्त कर पाता है। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से इस मंदिर में प्रभु की भक्ति करते हैं, तो प्रभु उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं। राम जानकी मन्दिर में आए भक्तों के सारे कष्ट भगवान खत्म कर देते हैं।इस मन्दिर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी की चालीसा का पाठ पूरे मन व आस्था के साथ करने से घर परिवार के लोगों मे अपनत्व बढ़ता है। राम जानकी मंदिर की वास्तुकला राम जानकी मन्दिर में एक मुख्य प्रवेश द्वार है। मंदिर के गर्भ गृह में श्री राम, माता जानकी और लक्ष्मण जी की भव्य मूर्तियां स्थापित है। मंदिर का भव्य और विशाल परिसर है, जिसमें शिव जी और माँ दुर्गा की प्रतिमा भी स्थापित है। मन्दिर की वास्तुकला में आधुनिकता के साथ भारतीय पारंपरिक वास्तुकला की झलक देखने को मिलती हैं। राम जानकी मंदिर का समय मंदिर का खुलने का समय 05:00 AM – 09:30 PM सुबह मंदिर क दर्शन 05:00 AM – 05:30 AM संध्या आरती का समय 09:00 PM – 09:30 PM मंदिर का प्रसाद राम जानकी मन्दिर में भक्त फल और बूंदी के लड्डू का भोग लगाते हैं और मनवांछित फल प्राप्त करते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार इस मंदिर में पूड़ी-सब्जी का भोग भी लगाते हैं।

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लक्ष्मीनारायण मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर के चारो तरफ मौजूद प्राकृतिक हरियाली आनंद व शांति का अहसास कराती है। लक्ष्मीनारायण मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के मालवीय नगर क्षेत्र में स्थित यह मंदिर बिड़ला मंदिर नाम से प्रसिद्ध है। भोपाल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल इस मंदिर का निर्माण भारत के प्रमुख औद्योगिक बिड़ला परिवार ने कराया था। अरेरा पहाड़ियों पर बने इस मंदिर के पास एक झील है, जिसके कारण यह श्रद्धालुओं के लिए आस्था के साथ पर्यटन का भी केंद्र बनता जा रहा है। चारो तरफ प्राकृतिक हरियाली आनंद व शांति का अहसास कराती है। देशभर में लक्ष्मीनारायण मंदिर प्रसिद्धी है, भोपाल आने वाले श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन को जरूर जाते हैं। मंदिर का इतिहास भोपाल के लक्ष्मीनारायण मंदिर की स्थापना की कहानी काफी रोचक है। साल 1960 में बिड़ला परिवार ने मध्यप्रदेश में अपना उद्योग स्थापित करने की योजना बनाई। जिसके लिए उन्होंने प्रदेश सरकार से जमीन की मांग की। उस समय म.प्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ कैलाश नाथ काटजू थे। उन्होंने उद्योग के लिए जमीन देने के बदले बिड़ला परिवार के सामने भोपाल की अरेरा पहाड़ी पर भव्य लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण कराने की शर्त रखी। बिड़ला परिवार ने शर्त स्वीकार करते हुए 4 साल में साल 1964 में मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर बनने के बाद इसके उद्‍घाटन पर विष्णु महायज्ञ आयोजित किया गया था, जिसमें देश के बड़े विद्वानों व धर्म शास्त्रियों ने हिस्सा लिया था। लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास में ही एक संग्रहालय बना है, जिसमें प्रदेश के रायसेन, सेहोर, मंदसौर व सहदोल सहित अन्य जगहों से लाई गईं मूर्तियां रखी गई हैं। मंदिर का महत्व जन्माष्टमी पर मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के दर्शन-पूजन से हर मनोकामना पूरी होती है। भगवान विष्णु के साथ यह माता लक्ष्मी का भी एक विशेष मंदिर है। दीपावली पर लक्ष्मीनारायण मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना से मां लक्ष्मी की कृपा बरसती है। मंदिर की वास्तुकला अरेरा पहाड़ियों की चोटी पर करीब 7-8 एकड़ क्षेत्र में यह मंदिर बना है। मंदिर में प्रवेश के लिए अर्धमण्डप, महामण्डप, परिक्रमापथ व गर्भगृह है। मंदिर के अंदर संगमरमर पर की गई पौराणिक दृश्यों की नक्काशी काफी सुंदर व दर्शनीय है। दीवारों पर वेद, गीता, रामायण, महाभारत व पुराण आदि के श्लोक लिखे हैं। यह मंदिर देवी लक्ष्‍मी व उनके पति भगवान विष्‍णु को समर्पित है। इसमें भगवान शिव व मां जगदम्बा की प्रतिमा भी विराजमान है। मंदिर परिसर में हनुमानजी व शिवलिंग स्थापित हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के सामने एक विशाल शंख है, जो श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:30 AM – 12:00 PM लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास बना संग्रहालय खुलने का समय 09:00 AM – 05:00 PM शाम को मन्दिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद लक्ष्मीनारायण मंदिर में नारियल, लईया, बताशा, मिश्री आदि का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त भक्त दूध से बने पेड़े का प्रसाद भी चढ़ाते हैं।

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पितृ स्तोत्र | Pitra Dev Stotram

Pitra Dev Stotram (पितृ स्तोत्र) अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् । नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।। इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा । सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।। मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा । तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ।। नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा । द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।। देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।  अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि: ।। प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च । योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ।। नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु । स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।। सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा । नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।। अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् । अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ।। ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:। जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ।। तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:। नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज ।। Pitra Dev Stotram पितृ स्तोत्र विशेषताएं पितृ स्तोत्र एक अत्यंत ही दिव्य व प्रभावशाली स्तोत्र है जिसकी रचना मूल रूप से संस्कृत में की गयी है| इस स्तोत्र का पाथ नियमित रुप से  करना चहीये| कहा जाता है जिस घर में पितृ स्तोत्र को लिखकर रखा जाता है Pitra Dev Stotram वहाँ श्राद्ध पक्ष में पितृ स्वयं निवास करते हैं। सामान्य उपायों में षोडश पिंडदान, सर्पपूजा, ब्राह्मण को गौदान, कन्यादान, कुआं, बावड़ी, तालाब आदि बनवाना, मंदिर प्रांगण में पीपल, बड़ (बरगद) आदि देववृक्ष लगवाना एवं विष्णु मंत्रों का जाप, प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए।

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