राम घाट:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

राम घाट क्षिप्रा नदी के तट पर बना है राम घाट भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर के क्षिप्रा नदी के किनारे बना है। मोक्षदायिनी और उत्तरवाहिनी क्षिप्रा नदी को भगवान महाकाल की गंगा के रूप में जाना जाता है। जानकारों की माने तो भगवान श्रीराम राम घाट ने अपने पिता दशरथ और माता कौशल्या का यहां पर तर्पण किया था। इसलिए क्षिप्रा नदी के तट को रामघाट के रूप में जाना जाता है। आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों के मोक्ष की प्राप्ति के लिए यहां पर तर्पण और पूजा करने के लिए आते हैं। यहां पर कालसर्प और पितृ दोष पूजा होती है। राहु-केतु को शांत करने के लिए भी यहां पूजा की जाती है। मंदिर का इतिहास हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अमृत मंथन के दौरान क्षिप्रा नदी के समीप स्थित एक सुंदर कुंड में अमृत की कुछ बूंदे गिरी थी, इसलिए क्षिप्रा नदी का महत्व और भी बढ़ जाता है। साथ ही यहां पर भगवान श्रीराम ने अपने पूर्वजों का तर्पण किया था, राम घाट इसलिए क्षिप्रा नदी के इस प्रमुख तट को रामघाट के रूप में जाना जाता है। इस हिसाब से रामघाट का इतिहास भारत के पौराणिक काल से जुड़ा हुआ है। मंदिर का महत्व -रामघाट कुंभ समारोह के संबंध में सबसे पुराने स्नान घाटों में से एक माना जाता है। मेगा कुंभ उत्सव के दौरान लाखों लोग इस स्थान पर आते हैं क्योंकि ऐसी मान्यता है राम घाट कि कि यहां एक डुबकी लगाने से आपके सभी पाप धूल जाते हैं। -रामघाट में ही भगवान श्रीराम ने अपने पिता दशरथ और माता कौशल्या का तर्पण किया था। तब से रामघाट पर पितृ दोष की पूजा होती जा रही है। मंदिर की वास्तुकला रामघाट घाट ऐतिहासिक एवं पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और प्राचीन भारतीय वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। वहीं रामघाट में कई सीढ़ियाँ बनी हुई हैं, जो क्षिप्रा नदी तक जाती हैं। रामघाट के आरती स्थल पर एक भव्य द्वार भी बना हुआ है, जिसकी सुंदरता श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर का समय प्रतिदिन होने वाली सायंकाल घाट में संध्या आरती का समय 07:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद रामघाट पर मुख्य रूप से श्रद्धालु कालसर्प पूजा और पितृ दोष पूजा करवाने आते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रसाद चढ़ाते हैं।

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श्री जुगल किशोर जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

श्री जुगल किशोर मंदिर भगवान श्री कृष्ण के बचपन और उनकी लीलाओं के लिए जाना जाता है। श्री जुगल किशोर जी मंदिर:भारत के उत्तर प्रदेश का वृंदावन शहर पौराणिक कथाओं में डूबा हुआ है। इसे भगवान श्री कृष्ण के बचपन और उनकी लीलाओं के लिए जाना जाता है। भगवान श्री कृष्णा और राधा जी की लीलाओ का साक्षी श्री धाम वृन्दावन आज भी अपने आप में अनेकों रहस्यों को समाये हुए है। श्री जुगल किशोर मंदिर वृन्दावन में केशी घाट पर स्थित है, श्री जुगल किशोर जी मंदिर जहां भगवान श्री कृष्ण और राधा जी जुगल रूप में विराजमान है। श्री जुगल किशोर मंदिर में शाम के समय दीपक जलाया जाता है, जिससे इस मंदिर की सुंदरता और बढ़ जाती है। मंदिर का इतिहास india’s famous temple श्री जुगल किशोर मंदिर की इतिहास हजारों साल पुराना है। वृन्दावन में सबसे पुराने मंदिरों में से एक श्री जुगल किशोर मंदिर है, इसका निर्माण वर्ष 1627 में किया गया था। इसका निर्माणकर्त्ता नानकरन था। श्री जुगल किशोर मंदिर एक वैष्णव संप्रदाय का मन्दिर है। श्री जुगल किशोर मंदिर गोविन्द देव, मदनमोहन और गोपीनाथ मन्दिर की ही श्रृंखला में चौथा मंदिर है, जो वृन्दावन के निचले सिरे पर प्रसिद्ध केशी घाट के बगल में स्थित है। मंदिर का महत्व यमुना नदी के किनारे श्री कृष्ण ने अश्व दानव केशी का वध किया था, जिस स्थान पर उन्होंने दानव का वध किया उस स्थान पर केशी घाट बना और यहीं श्री जुगल किशोर मंदिर स्थापना हुई। – श्री जुगल किशोर जी मंदिर का मुख्य आकर्षण केशी घाट है, जो वृंदावन में श्रद्धालुओं के लिए पसंदीदा और पवित्र स्नान/स्नान स्थलों में से एक है। – श्री जुगल किशोर मंदिर में शाम के समय केशी घाट पर आए भक्त सैकड़ों की संख्या में दीपक जलातें हैं, जिससे इस घाट और मंदिर की सुंदरता और बढ़ जाती है। मंदिर की वास्तुकला श्री जुगल किशोर जी मंदिर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित एक सुंदर संरचना है, ये मंदिर इतना ऊंचा है कि इसे यमुना नदी के पार से भी देखा जा सकता है। श्री जुगल किशोर जी मंदिर की वास्तुकला मदन मोहन मंदिर, श्री जुगल किशोर जी मंदिर श्री गोविंद देव मंदिर और श्री मदन मोहन मंदिर से मिलती है। मंदिर के मुख्य द्वार पर गोवर्धन पर्वत उठाए हुए और अपनी प्रिय सखियों से घिरे हुए भगवान श्री कृष्ण की एक सुंदर मूर्ति है। प्रवेश द्वार को पुष्प और पक्षी रूपांकनों से सजाया गया है। मंदिर का शिखर और वास्तुकला सौंदर्य की दृष्टि से मनभावन हैं।श्री जुगल किशोर जी मंदिर इसका सभा कक्ष अन्य मंदिरों की तुलना में अपेक्षाकृत बड़ा है, जिसका क्षेत्रफल 25 वर्ग फुट है और यह पूर्वी दिशा में स्थित है। उत्तरी और दक्षिणी किनारों पर छोटे प्रवेश द्वार हैं। श्री जुगल किशोर जी मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM सुबह दर्शन का समय 08:30 AM – 10:00 AM शयन आरती का समय 11:45 AM – 12:00 PM शाम का भोग का समय 05:30 PM – 06:00 PM शयन आरती का समय 08:10 PM – 08:30 PM सुबह की आरती और परिक्रमा 05:00 AM – 06:00 AM सुबह भोग का समय 11:30 AM – 11:45 AM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:30 PM शाम की परिक्रमा का मसय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद श्री जुगल किशोर जी को फूलों के साथ माखन, मिश्री, पेड़ा और बर्फी का भोग लगाया जाता है।

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Bhaum Pradosh Vrat:भौम प्रदोष व्रत कथा, इस कथा के पढ़ने व सुनने से भगवान शिव और हनुमानजी की मिलेगी कृपा

Bhaum Pradosh Vrat:माह की त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल मे होना, प्रदोष व्रत होने का सही कारण है। प्रदोष काल सूर्यास्त से 45 मिनट पहिले प्रारम्भ होकर सूर्यास्त के बाद 45 मिनट होता है। प्रदोष का दिन जब साप्ताहिक दिवस सोमवार को होता है उसे सोम प्रदोष कहते हैं, मंगलवार को होने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष तथा शनिवार के दिन प्रदोष को शनि प्रदोष कहते हैं। प्रदोष व्रत कब है? – Pradosh Kab Hai फाल्गुन शुक्ल प्रदोष व्रत: मंगलवार, 11 मार्च 2025  भौम प्रदोष व्रत – ऋण मोचनभौम प्रदोष व्रत कथा प्रदोष काल – 6:27 PM से 8:53 PM फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी तिथि : 11 मार्च 2025 8:13 AM – 12 मार्च 2025 9:11 AM प्रदोष व्रत की पूजा कब करनी चाहिए? प्रदोष व्रत की पूजा अपने शहर के सूर्यास्त होने के समय के अनुसार प्रदोष काल मे करनी चाहिए। प्रदोष में क्या न करें? भगवान शिव की प्रदोष काल में पूजा किए बिना भोजन ग्रहण न करें. व्रत के समय में अन्न, नमक, मिर्च आदि का सेवन नहीं करें। प्रदोष व्रत मे पूजा की थाली में क्या-क्या रखें? पूजा की थाली में अबीर, गुलाल, चंदन, काले तिल, फूल, धतूरा, बिल्वपत्र, शमी पत्र, जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, अगरबत्ती एवं फल के साथ पूजा करें। Bhaum Pradosh Vrat katha:भौम प्रदोष व्रत कथा Bhaum Pradosh Vrat:सूतजी बोले- अब मैं मंगल त्रयोदशी प्रदोष व्रत का विधि विधान कहता हूं। मंगलवार का दिन व्याधियों का नाशक है। इस व्रत में एक समय व्रती को गेहूं और गुड़ का भोजन करना चाहिए। इस व्रत के करने से मनुष्य सभी पापों व रोगों से मुक्त हो जाता है इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है। अब मैं आपको उस बुढ़िया की कथा सुनाता हूं, जिसने यह व्रत किया व मोक्ष को प्राप्त हुई। अत्यन्त प्राचीन काल की घटना है। एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। उसके मंगलिया नाम का एक पुत्र था। Bhaum Pradosh Vrat वृद्धा को हनुमानजी पर बड़ी श्रद्धा थी। वह प्रत्येक मंगलवार को हनुमानजी का व्रत रखकर यथाविधि उनका भोग लगाती थी। इसके अलावा मंगलवार को एक न तो घर लीपती थी और न ही मिट्टी खोदती थी। इसी प्रकार से व्रत रखते हुए जब उसे काफी दिन बीत गए तो हनुमानजी ने सोचा कि चलो आज इस वृद्धा की श्रद्धा की परीक्षा करें। वे साधु का वेष बनाकर उसके द्वार पर जा पहुंचे और पुकारा “है कोई हनुमान का भक्त जो हमारी इच्छा पूरी करे।” वृद्धा ने यह पुकार सुनी तो बाहर आई और महाराज क्या आज्ञा है? साधु वेषधारी हनुमान जी बोले कि ‘मैं बहुत भूखा हूं भोजन करूंगा। Bhaum Pradosh Vrat तू थोड़ी सी जमीन लीप दे।’ वृद्धा बड़ी दुविधा में पड़ गई। अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना की- हे महाराज! लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त जो काम आप कहें वह मैं करने को तैयार हूं। साधु ने तीन बार परीक्षा करने के बाद कहा- “तू अपने बेटे को बुला मैं उसे औंधा लिटाकर, उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा।” वृद्धा ने सुना तो पैरों तले की धरती खिसक गई, मगर वह वचन हार चुकी थी। Bhaum Pradosh Vrat उसने मंगलिया को पुकार कर साधु महाराज के हवाले कर दिया। मगर साधु ऐसे ही मानने वाले न थे। उन्होंने वृद्धा के हाथों से ही मंगलिया को ओंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलवाई। आग जलाकर, दुखी मन से वृद्धा अपने घर के अंदर जा घुसी। साधु जब भोजन को बुलाकर कहा कि वह मंगलिया को पुकारे ताकि वह भी आकर भोग लगा ले। वृद्धा में आंसू भरकर कहने लगी कि अब उसका नाम लेकर मेरे हृदय को और न दुखाओ, लेकिन साधु महाराज न माने वृद्धा को भोजन के लिए मंगलिया को पुकारना पड़ा। Bhaum Pradosh Vrat पुकारने की देर थी कि मंगलिया बाहर से हंसता हुआ घर में दौड़ा आया। मंगलिया को जीता जागता देखकर वृद्धा को सुखद आश्चर्य हुआ। वह साधु महाराज के चरणों में गिर पड़ी। Bhaum Pradosh Vrat साधु महाराज ने उसे अपने असली रूप में दर्शन दिए। हनुमानजी को अपने आंगन में देखकर वृद्धा को लगा कि जीवन सफल हो गया। Bhaum Pradosh Vrat ki vidhi:प्रदोष व्रत की विधि प्रदोष व्रत करने के लिए मनुष्य को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए।नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्री भोले नाथ का स्मरण करें।इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है।पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किए जाते है। पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है।अब इस मंडप में पांच रंगों का उपयोग करते हुए रंगोली बनाई जाती है।प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है।इस प्रकार पूजन की तैयारियां करके उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए।पूजन में भगवान शिव के मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिव को जल चढ़ाना चाहिए। प्रदोष व्रत का महत्व मान्यता और श्रध्दा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों यह व्रत करते हैं। कहा जाता है Bhaum Pradosh Vrat कि इस व्रत से कई दोषों की मुक्ति तथा संकटों का निवारण होता है. यह व्रत साप्ताहिक महत्त्व भी रखता है।रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है।सोमवार के दिन त्रयोदशी पड़ने पर किया जाने वाला व्रत आरोग्य प्रदान करता है और इंसान की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो तो उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपासक की Bhaum Pradosh Vrat सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत पड़े तो इस दिन के व्रत के फल से शत्रुओं का विनाश होता है।शुक्रवार के दिन होने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए किया जाता है।संतान प्राप्ति की कामना हो तो शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए।अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किए जाते हैं तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है।

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गढ़कालिका मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

स्कन्दपुराण में वर्णित है यह मंदिर गढ़कालिका मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। कालजयी कवि कालिदास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे। कालिदास रचित ‘श्यामला दंडक’ महाकाली स्तोत्र एक सुंदर रचना है। ऐसा कहा जाता है कि महाकवि के मुख से सबसे पहले यही स्तोत्र प्रकट हुआ था। यहाँ प्रत्येक वर्ष कालिदास समारोह के आयोजन के पूर्व माँ कालिका की आराधना की जाती है। ‘स्कन्दपुराण’ में चौबीस मातृकाओं में देवी गढ़कालिका का उल्लेख है। गढ़कालिका मंदिर में माँ कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। मंदिर का इतिहास गढ़कालिका मंदिर के पास जब पुरातत्व विभाग ने खुदाई कराई थी, तो बड़ी ईंट, टकसाल और सकड़ें निकली थीं। अनुमान है कि यह स्थान ईसा पूर्व 500 साल पुराना है। कुछ इतिहासकार गढ़कालिका मंदिर को महाभारतकाल का बताते हैं, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि काकड़ा आरती के बाद मां बाल स्वरूप में दर्शन देती हैं इसलिए यहां रात 2.30 बजे से श्रद्धालुओं की दर्शन के लिए कतार लग जाती है। रावण दहन के बाद श्री राम लौटते समय रुद्रसागर के किनारे रुके थे, तब रात्रि के समय मां और हनुमान जी के बीच युद्ध हुआ था, उस वक्त माता का एक अंश गलित होकर गिर गया। माता का जो अंश गिर गया, वही अंश गढ़कालिका के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर की वास्तुकला परमार शासन काल में भी इसके जीर्णोद्धार के प्रमाण मिलते हैं रियासतकाल में सिंधिया राजवंश ने भी मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। नौंवी सदी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हर्ष विक्रमादित्य ने करवाया था। ‘गढ़’ नामक स्थान पर होने के कारण देवी को गढ़कालिका कहा जाता है। मंदिर परिसर मे अति प्राचीन दीप स्तंभ है। इस दीप स्तंभ में 108 दीप विद्यमान है, इसे नवरात्रि के दिनों में प्रज्वलित किया जाता है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 03:00 AM – 11:00 AM काकड़ आरती का समय 04:00 AM – 05:00 AM महाआरती का समय 09:00 AM – 10:00 AM शयन आरती का समय 10:00 PM – 11:00 PM मंदिर का प्रसाद गढ़कालिका मंदिर में मां को हलवे और खीर-पूड़ी का भोग लगाते हैं। इसके अलावा श्रद्धालु पूरणपोली, दाल, चावल व सब्जी-रोटी का भोग भी लगाते हैं।

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इस्कॉन उज्जैन मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

इसे राधा मदन मोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर:भारत के मध्य प्रदेश राज्य के उज्जैन शहर में स्थित इस्कॉन मंदिर आस्था और हिन्दू संस्कृति का एक अनुपम संगम है। इस मंदिर को राधा मदन मोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापना पूरे संसार में भगवान श्रीकृष्ण के संदेश को पहुंचाने के लिए किया गया है। बता दें कि इस्कॉन का पूरा नाम अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ है। इस्कॉन को दुनियाभर में श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार और प्रसार करने के लिए जाना जाता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर का इतिहास भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली उज्जैन में बने इस्कॉन मंदिर का निर्माण सन् 2006 में हुआ। राजस्थान के मकराना शहर के सफेद संगमरमर से मंदिर का निर्माण किया गया है। यह उज्जैन और इस्कॉन संगठन का एकमात्र पूर्णतः सौर ऊर्जा से संचालित मंदिर है। भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और उनके मित्र सुदामा ने उज्जैन में महर्षि सांदिपनी से शिक्षा प्राप्त की थी। इस वजह से भी उज्जैन में बने इस्कॉन मंदिर से भक्तों का विशेष जुड़ाव है। यह उज्जैन और इस्कॉन संगठन का एकमात्र पूर्णतः सौर ऊर्जा से संचालित मंदिर है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर का महत्व इस्कॉन मंदिर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं और समाज के दिए उनके संदेशों का प्रचार-पसार करता है। इस्कॉन मंदिर से भक्तों का विशेष जुड़ाव रहता है, खासकर विदेशी भक्त और श्रद्धालु श्री कृष्ण की भक्ति में डूबे रहते हैं। इस्कॉन का सदस्य बनने से पहले श्रद्धालुओं को लहसुन, प्याज, मांस और मछली जैसे तामसिक भोजन का सेवन त्यागना होता है। साथ ही शराब का सेवन भी बंद करना होता है। – इस्कॉन के अनुयायियों के लिए रोजाना शाम के वक़्त करीबन एक घंटे गीता या अन्य किसी धार्मिक ग्रन्थ का पाठ करना अनिवार्य माना जाता है। इसके आलावा सदस्यों को अपनी क्षमता के अनुसार रुद्राक्ष की माला से ‘हरे कृष्णा-हरे रामा’ का जाप करना अनिवार्य होता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर की वास्तुकला इस्कॉन मंदिर, उज्जैन का निर्माण 2006 में किया गया था। मंदिर में तीन पवित्र स्थान हैं, जिनमें भगवान कृष्ण और राधा के साथ गोपियों, बलराम और कृष्ण और निताई गौर (कृष्ण और बलराम के अवतार) की मूर्तियां हैं। यहां मुरली मनोहर और उनकी प्रेमिका राधा की बेहद खूबसूरत प्रतिमा है। हर इस्कॉन मंदिर की तरह यहां तुलसी बगीचा है। मंदिर की छत पर कमल के फूल के ऊपर रासलीला में लीन श्रीकृष्ण और राधारानी का अद्‍भुत चित्रांकन है। मंदिर का समय 04:30 AM – 01:00 PM मंगला आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM तुसली आरती का समय 05:00 AM – 05:30 AM जाप सत्र का समय 05:30 AM – 06:00 AM दर्शन आरती व गुरु पूजा का समय 07:25 AM – 08:00 AM श्रीमद्भागवत कक्षा का समय 08:00 AM – 10:00 AM राजभोग आरती का समय 12:15 PM – 01:00 PM मंदिर बंद होने का समय 01:00 PM – 04:00 PM धुप आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM संध्या तुलसी आरती का समय 06:45 PM – 07:00 PM गौरा आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM शयन आरती का समय 09:00 AM – 09:15 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 09:15 PM मंदिर का प्रसाद इस्कॉन मंदिर में भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार बेसन और बूंदी के लड्डू का भोग भगवान श्री कृष्ण को लगाते हैं।

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Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra | ब्रह्मास्त्र महाविद्या श्रीबगला स्तोत्र

Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra:ब्रह्मास्त्र महाविद्या श्रीबग्ला स्तोत्र: भगवती बगला अमृत सागर के मध्य मणिमय मंडप में रत्न जड़ित व्यासपीठ पर रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं। पीले पंखों के कारण ये पीले रंग के वस्त्र, आभूषण और मालाएं धारण किए हुए हैं। एक हाथ में शत्रु की जिह्वा है और दूसरे हाथ में कलश है। मनुष्य रूप में शत्रुओं के नाश की अधिष्ठात्री शक्ति तथा सम्पूर्ण रूप में परब्रह्म परमात्मा का आधिपत्य है। श्री प्रजापति बगला की वैदिक रीति से उपासना करते थे और उन्होंने ब्रह्माण्ड की संरचना बनाने में सफलता प्राप्त की। Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra:श्री प्रजापति ने इस विद्या की शिक्षा सनकादिक मुनियों को दी। सुंत कुमार ने नारद को यह उपदेश दिया और नारद ने इसकी कथा परमहंस को दी, जिन्होंने छत्तीस पटल में बगला तंत्र नामक ग्रंथ की रचना की। Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra स्वतंत्र तंत्र के अनुसार भगवान विष्णु इस विद्या के उपासक थे। तब श्री परशुराम जी और आचार्य द्रोण इस विद्या के उपासक थे। आचार्य द्रोण ने परशुराम जी से यह विद्या ग्रहण की थी। Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra:भगवती बगलामुखी को स्तम्भन की देवी कहा गया है। स्तम्भन कर्माणि शक्ति के रूप में व्यक्त समस्त वस्तुओं की स्थिति और अव्यक्त की स्थिति का आधार पृथ्वी रूपी शक्ति है, Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra तथा ज्येष्ठ उसी स्तम्भन शक्ति की अधिष्ठात्री शक्ति है। इसी स्तम्भन शक्ति से सूर्य-चन्द्र स्थित हैं, सभी लोग इसी शक्ति के प्रभाव से ओतप्रोत हैं। अतः साधक को ऐसी साधना करनी चाहिए कि साधना सही विधि और विधि के अनुसार ही की जाए। Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra:ब्रह्मास्त्र महाविद्या श्रीबागला स्तोत्र के लाभ: Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra:सभी दुखों को दूर करता है और आत्मविश्वास, निर्भयता और साहस देता है। भक्तों के मन और हृदय को सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है, जिससे वे सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।ब्रह्मास्त्र महाविद्या श्रीबागला स्तोत्र कर्ज को दूर करता है और घर में समृद्धि बढ़ाता हैशत्रुओं का भय दूर होता है और भक्त को मन में बहुत शांति का अनुभव होता है। शत्रु आपका सामना नहीं कर पाएंगे। आपके विरुद्ध कार्य करने की कोशिश करने पर वे शक्तिहीन हो जाएंगे और उनकी शातिर साजिशें निरर्थक और अप्रभावी हो जाएंगी। छात्रों को अच्छे अंक मिलते हैं और पढ़ाई पर बेहतर ध्यान केंद्रित करने के लिए एकाग्र मन मिलता है।भक्त मुकदमों पर विजय प्राप्त करता है और झगड़ों और प्रतियोगिताओं में सफल होता है।यदि आपके जीवन में उतार-चढ़ाव हैं, तो ब्रह्मास्त्र महाविद्या श्रीबागला स्तोत्र सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को संतुलित करने और घर और जीवन में सामंजस्य स्थापित करने में मदद कर सकता है। Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra:इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra:जो व्यक्ति काले जादू, टोना, Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra बुरी नजर से पीड़ित हैं, उन्हें नियमित रूप से ब्रह्मास्त्र महाविद्या श्रीबगला स्तोत्र का जाप करना चाहिए। ब्रह्मास्त्र महाविद्या श्रीबगला स्तोत्र | Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra विनियोगः- ॐ अस्य श्रीब्रह्मास्त्र-महा-विद्या-श्रीबगला-मुखी स्तोत्रस्य श्रीनारद ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, श्री बगला-मुखी देवता, मम सन्निहिता-नामसन्निहितानां विरोधिनां दुष्टानां वाङ्मुख-बुद्धिनां स्तम्भनार्थं Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra श्रीमहा-माया-बगला मुखी-वर-प्रसाद सिद्धयर्थं जपे (पाठे) विनियोग: ।। ऋष्यादि न्यास ।। श्रीनारद ऋषये नमः शिरसि, त्रिष्टुप छन्दसे नमः मुखे, श्री बगला-मुखी देवतायै नमः हृदि, मम सन्निहिता-नामसन्निहितानां विरोधिनां दुष्टानां वाङ्मुख-बुद्धिनां स्तम्भनार्थं श्रीमहा-माया-बगला मुखी-वर-प्रसाद सिद्धयर्थं जपे (पाठे) विनियोगाय नमः सर्वांगे। ।। अंग न्यास ।। ॐ ह्लीं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः ॐ बगलामुखि तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा ॐ सर्व-दुष्टानां मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट् ॐ वाचं मुखं पदं स्तम्भय अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुं ॐ जिह्वां कीलय कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् ॐ बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट् हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे – सौवर्णासन संस्थिता त्रिनयनां पीतांशुकोल्लासिनीम्, हेमाभांगरुचिं शशांक मुकुटां सच्चम्पक स्रग्युताम् । हस्तैर्मुद्गर पाश वज्र रसनाः संबिभ्रतीं भूषणैर्व्याप्तांगीं, बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तयेत् ।। ।। मन्त्र ।। || ॐ ह्ल्रीं  बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्ल्रीं ॐ स्वाहा || ।। स्तोत्रम ।। मध्ये सुधाब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्यां, सिंहासनो-परि-गतां परिपीत-वर्णाम् । पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगीं, देवीं स्मरामि धृत-मुद्-गर-वैरि-जिह्वाम् ।। १ ।। जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं, वामेन शत्रून् परि-पीडयन्तीम् । गदाभिघातेन च दक्षिणेन, पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि ।। २ ।। त्रिशूल-धारिणीमम्बां सर्वसौभाग्यदायिनीम् । सर्वश्रृंगारवेशाढ्यां देवीं ध्यात्वा प्रपूजयेत् ।। ३ ।। पीतवस्त्रां त्रिनेत्रां च द्विभुजां हाटकोज्ज्वलाम् । शिलापर्वतहस्तां च स्मरेत् तां बगलामुखीम् ।। ४ ।। रिपुजिह्वां देवीं पीतपुष्पविभूषिताम् । वैरिनिर्दलनार्थाय स्मरेत् तां बगलामुखीम् ।। ५ ।। गम्भीरा च मदोन्मत्तां स्वर्ण-कान्ति-समप्रभाम् । चतुर्भुजां त्रिनेत्रां च कमलासन-संस्थिताम् ।। ६ ।। मुद्गरं दक्षिणे पाशं वामे जिह्वां च वज्रकम् । पीताम्बरधरां सान्द्र-दृढ़-पीन-पयोधराम् ।। ७ ।। हेम-कुण्डल-भूषां च पीत चन्द्रार्द्ध-शेखरां । पीत-भूषण-पीतांगीं स्वर्ण-सिंहासने स्थिताम् ।। ८ ।। एवं ध्यात्वा जपेत् स्तोत्रमेकाग्रकृतमानसः । Brahmastra Mahavidya Shribagla Stotra सर्व-सिद्धिमवाप्नोति मन्त्र-ध्यानपुरः सरम् ।। ९ ।। आराध्या जगदम्ब दिव्यकविभिः सामाजिकैः स्तोतृभिः । माल्यैश्चन्दन-कुंकुमैः परिमलैरभ्यर्चिता सादरात् ।। सम्यङ्न्यासिसमस्तभूतनिवहे सौभाग्यशोभाप्रदे । श्रीमुग्धे बगले प्रसीद विमले दुःखापहे पाहि माम् ।। १० ।। आनन्दकारिणी देवी रिपुस्तम्भनकारिणी । मदनोन्मादिनी चैव प्रीतिस्तम्भनकारिणी ।। ११ ।। महाविद्या महामाया साधकस्य फलप्रदा । यस्याः स्मरणमात्रेण त्रैलोक्यं स्तम्भयेत् क्षणात् ।। १२ ।। वामे पाशांकुशौ शक्तिं तस्याधस्ताद् वरं शुभम् । दक्षिणे क्रमतो वज्रं गदा-जिह्वाऽँयानि च ।। १३ ।। विभ्रतीं संसमरेन्नित्यं पीतमाल्यानुलेपनाम् । पीताम्बरधरां देवीं ब्रह्मादिसुरवन्दिताम् ।। १४ ।। केयूरांगदकुण्डलभूषां बालार्कद्युतिरञ्जितवेषाम् । तरुणादित्यसमानप्रतिमां कौशेययांशुकबद्धनितम्बाम् ।। १५ ।। कल्पद्रुमतलनिहितशिलायां प्रमुदितचित्तौल्लासदलकान्ताम् । पञ्चप्रेतनिकेतनबद्धां भक्तजनेभ्यो वितरणशीलाम् ।। १६ ।। एवं विधां तां बगलां ध्यात्वा मनसि साधकः । सर्व-सम्पत् समृद्धयर्थं स्तोत्रमेतदुदीरयेत् ।। १७ ।। चलत्-कनक-कुण्डलोल्लसित-चारु-गण्ड-स्थलाम् । लसत्-कनक-चम्पक-द्युतिमदिन्दु-बिम्बाननाम् ।। गदा-हत-विपक्षकां कलित-लोल-जिह्वां चलाम् । स्मरामि बगला-मुखीं विमुख-वाङ्-मनस-स्तम्भिनीम् ।। १८ ।। पीयूषोदधि-मध्य-चारु-विलसद्-रत्नोज्जवले मण्डपे । तत्-सिंहासन-मूल-पातित-रिपुं प्रेतासनाध्यासिनीम् ।। स्वर्णाभां कर-पीडितारि-रसनां भ्राम्यद् गदां विभ्रमाम् । यस्त्वां ध्यायति यान्ति तस्य विलयं सद्योऽथ सर्वापदः ।। १९ ।। देवि ! त्वच्चरणाम्बुजार्चन-कृते यः पीत-पुष्पाञ्जलिम्, मुद्रां वाम-करे निधाय च पुनर्मन्त्री मनोज्ञाक्षरम् ।। पीता-ध्यान-परोऽथ कुम्भक-वशाद् बीजं स्मरेत् पार्थिवम् । तस्यामित्र-मुखस्य वाचि हृदये जाड्यं भवेत् तत्क्षणात् ।। २० ।। मन्त्रस्तावदलं विपक्ष-दलने स्तोत्रं पवित्रं च ते । यन्त्रं वादि-नियन्त्रणं त्रि-जगतां जैत्रं च चित्रं च तत् ।। मातः ! श्रीबगलेति नाम ललितं यस्यास्ति जन्तोर्मुखे । त्वन्नाम-स्मरणेन संसदि मुख-स्तम्भो भवेद् वादिनाम् ।। २१ ।। वादी मूकति रंकति क्षिति-पतिर्वैश्वानरः शीतति । क्रोधी शाम्यति दुर्जनः सुजनति क्षिप्रानुगः खञ्जति ।। गर्वी खर्बति सर्व-विच्च जडति त्वद् यन्त्रणा यन्त्रितः । श्री-नित्ये, बगला-मुखि ! प्रतिदिनं कल्याणि ! तुभ्यं नमः ।। २२ ।। दुष्ट-स्तम्भनमुग्र-विघ्न-शमनं दारिद्र्य-विद्रावणम् । भूभृत्-सन्दमनं च यन्मृग-दृशां चेतः समाकर्षणम् ।। सौभाग्यैक-निकेतनं सम-दृशां कारुण्य-पूर्णेक्षणे । शत्रोर्मारणमाविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः ।। २३ ।। मातर्भञ्जय मद्-विपक्ष-वदनं जिह्वां

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Ancestors Dream Meaning: क्या आपको भी सपने में दिखाई देते हैं पूर्वज? स्वप्न शास्त्र से जानें इसका मतलब

Ancestors Dream Meaning: अक्सर लोग नींद में स्वप्न देखते हैं. इनमें से कुछ सपने अच्छे होते हैं तो कुछ बेहद अशुभ संकेत देने वाले होते हैं. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हर एक सपना कोई ना कोई खास संकेत जरूर देता है। सपने में पूर्वजों को देखना भी खास संकेत देता है।  Ancestors Dream Meaning:अक्सर लोग नींद में स्वप्न देखते हैं. इनमें से कुछ सपने अच्छे होते हैं तो कुछ बेहद अशुभ संकेत देने वाले होते हैं. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हर एक सपना कोई ना कोई खास संकेत जरूर देता है। सपने में पूर्वजों को देखना भी खास संकेत देता है। हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि सपने में पूर्वजों को किन परिस्थियों में देखा गया है। Ancestors Dream Meaning आइए स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हम आपको बता रहे हैं कि सपने में पूर्वजों को देखना क्या संकेत देता है। सपने में पूर्वजों को देखने का मतलब Ancestors Dream Meaning स्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर आपने सपने में अपने मृतक माता-पिता को देखा है तो ऐसा सपना बहुत ही शुभ माना जाता है. इसका मतलब यह होता है कि आपको अपने कार्यक्षेत्र में जल्द ही सम्मान मिलने वाला है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार अगर आप सपने में किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं, जो पहले से ही मृत हो तो और आप उसे जानते हैं तो यह सपना संकेत देता है कि आप उस व्यक्ति के प्रति अभी भी लगाव महसूस करते हैं और आप उसे कहीं ना कहीं याद कर रहे हैं. अगर सपने में आपको आपके पूर्वज दिखाई देते हैं तो Ancestors Dream Meaning इसका संकेत है कि या तो उनकी कोई इच्छा अधूरी रह गई है या फिर वो आपको किसी आगामी घटना का आभास करा रहे हैं. वहीं सपने में पितरों को मिठाई बांटते हुए देखना शुभ होता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में अपने पितरों को मुस्कुराते हुए देखना अच्छा माना जाता है. Ancestors Dream Meaning यह सपना शुभ फल देने वाला माना गया है. कहते हैं कि ऐसे सपने देखने से पितरों की कृपा से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है. यह सपना बताता है कि आपके परिवार के पितृ देव आपसे प्रसन्न हैं. अगर आपने सपने में अपने पितरों को स्वयं से बातें करते हुए देखा है तो यह इस बात का संकेत है कि वो आपको भविष्य से जुड़ी किसी घटना के लिए आगाह करना चाहते हैं. स्वप्न शास्त्र में इस सपने को दुर्घटना से बचाने वाला माना जाता है. सपने में पूर्वजों को गुस्सा करते हुए देखना शुभ नहीं माना जाता है. कहा जाता है कि अगर कोई व्यक्ति सपने में अपने पितरों को गुस्सा करते हुए देखता है तो इसका अर्थ यह है कि उसके पितृ उससे खुश नहीं है. Ancestors Dream Meaning ऐसे सपने ज्यादातार उन लोगो को आते हैं जिनके घर में पितृदोष लगा रहता है. सपने में पितरों से बात करना भी एक शुभ स्वप्न है। यह सपना इस बात की ओर इशारा करता है कि भविष्य में कोई बड़ी घटना होने वाली है। इसके अलावा यह स्वप्न दुर्घटना से बचाने वाला भी माना जाता है। वहीं सपने में पूर्वजों को गु्स्सा करते हुए देखना शुभ नहीं होता है। यह सपना इस बात का भी संकेत देता है कि पितृ देव आपसे खुश नहीं है। ऐसे में पितरों को खुश करने के लिए पितृ पक्ष में तर्पण और श्राद्ध कराना चाहिए। माना जाता है कि ऐसे सपने सिर्फ उन लोगों को ज्यादातर आते हैं जिसके घर में पितृ दोष रहता है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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Bagla Panjar Nyaas Stotra | बगला पंजर न्यास स्तोत्र

Bagla Panjar Nyaas Stotra:बगला पंजर न्यास स्तोत्र: यह अत्यंत गोपनीय और रहस्यमयी स्तोत्र अत्यंत दुर्लभ और परखा हुआ है। बगला पंजर स्तोत्र का जाप करने या जपने वाले साधक को हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। घोर दरिद्रता और संकट के नाश के इस स्तोत्र का पाठ करने वाले साधक की माता शत्रु दल को शांत रखती हैं। यह देवी बगलामुखी का अत्यंत गुप्त, रहस्यमय और दुर्लभ स्तोत्र है जिसे बगला पंजर न्यास स्तोत्र के नाम से जाना जाता है। यह कई बार सिद्ध हो चुका है कि इसने कई लोगों को अपने जीवन में सफलता पाने में मदद की है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है माँ बगलामुखी स्वयं उसकी रक्षा करती हैं। Bagla Panjar Nyaas Stotra बगला पंजर न्यास स्तोत्र जीवन में धन, स्वास्थ्य और समग्र सुख प्रदान करने वाला है। देवी का हृदय किसी भी देवता से संबंधित होता है। यह स्तोत्र भगवती बगलामुखी से संबंधित है। इस पाठ का उद्देश्य या तो बस उनके हृदय में बैठना या उन्हें अपने हृदय में बसाना है। उनके हृदय में वास करना तो मात्र स्वप्न है, क्योंकि इसके लिए परम शक्ति को भी आमंत्रित किया जाता है। हां, हमारी भक्ति के प्रसाद के रूप में यह फल अवश्य मिलता है कि ये आस्थाएं हमारे हृदय में उतर जाएं और वास्तव में यही जीवन का लक्ष्य है, तभी हमारा उद्धार संभव है। यह स्तोत्र माता का हृदय माना जाता है। इस स्तोत्र का अनुयायी इस संसार में जो कुछ भी देखता है, उसे प्राप्त कर लेता है। बगला पंजर न्यास स्तोत्र देवी बगलामुखी/पीताम्बरा से संबंधित है। इस स्तोत्र का उद्देश्य माता बगलामुखी के निकट जाना है। Bagla Panjar Nyaas Stotra:बगल पंजर न्यास स्तोत्र के लाभ साधक अपने इष्ट देव को चुनता है, तथा निरंतर उनका भजन-कीर्तन करता है, तो वे उन सभी सांसारिक कार्यों का भार उठा लेते हैं, तथा परम मोक्ष प्रदान करते हैं। यदि आप उन्हें संतान की तरह प्यार करते हैं, तो वे आपकी इच्छाओं को उसी प्रकार पूर्ण करते हैं, जिस प्रकार वे मां के समान हैं।साधक को कभी भी किसी अप्रिय घटना का भय नहीं माना जाता है। ऐसे साधक के सभी सांसारिक और असाधारण कार्य स्वयं सिद्ध होने लगते हैं, उनकी कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहती। Bagla Panjar Nyaas Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ जादू-टोना, काला जादू, ग्रहों के दुष्प्रभाव या व्यक्तिगत दुश्मनी से प्रभावित और किसी भी काम में सफल न होने वाले व्यक्तियों को नियमित रूप से स्तोत्र का जाप करना चाहिए। बगला पञ्जर न्यास स्तोत्र | Bagla Panjar Nyaas Stotra बगला पूर्वतो रक्षेद् आग्नेय्यां च गदाधरी। पीताम्बरा दक्षिणे च स्तम्भिनी चैव नैऋते ।।1।। जिह्वाकीलिन्यतो रक्षेत् पश्चिमे सर्वदा हि माम्। वायव्ये च मदोन्मत्ता कौवेर्यां च त्रिशूलिनी ।।2।। ब्रह्मास्त्रदेवता पातु ऐशान्यां सततं मम। संरक्षेन् मां तु सततं पाताले स्तब्धमातृका ।।3।। ऊर्ध्वं रक्षेन् महादेवी जिह्वा-स्तम्भन-कारिणी। एवं दश दिशो रक्षेद् बगला सर्व-सिद्धिदा ।।4।। एवं न्यास-विधिं कृत्वा यत् किञ्चिज्जपमाचरेत्। तस्याः संस्मरेणादेव शत्रूणां स्तम्भनं भवेत् ।।5।।

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होलाष्टक 2025 प्रारंभ तिथि और समय, महत्व, क्या करें और क्या न करें, और इस अवधि के दौरान क्या न करें

होलाष्टक 2025 आठ दिनों की अवधि है जिसे अशुभ माना जाता है क्योंकि यह होली के त्यौहार से पहले की अवधि है। यह फाल्गुन के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होता है और होलिका दहन के साथ समाप्त होता है। इस दौरान लोगों को धार्मिक गतिविधियों, दान और आत्मसंयम में संलग्न होना चाहिए, लेकिन नई शुरुआत, ग्रह शांति पूजा, बाल कटवाने या नए कपड़े खरीदने से बचना चाहिए। होली से पहले आठ दिनों की अवधि, जिसे होलाष्टक के नाम से जाना जाता है, नए उद्यम शुरू करने या महत्वपूर्ण अनुष्ठान करने के लिए अशुभ माना जाता है। इस साल होलाष्टक 7 मार्च 2025 को शुरू होगा और 13 मार्च 2025 को होलिका दहन के साथ समाप्त होगा। होलाष्टक 2025: तिथियां और समय अष्टमी तिथि आरंभ: 6 मार्च 2025, सुबह 10:50 बजे होलाष्टक आरंभ: 7 मार्च, 2025 होलाष्टक समाप्त: 13 मार्च, 2025 होलाष्टक महत्व होलाष्टक होलाष्टक 2025 शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर होलिका दहन तक चलता है। “होलाष्टक” नाम “होली” और “अष्टक” (आठ दिन) को मिलाकर बना है, जो होली के त्यौहार से इसके संबंध पर जोर देता है। इस अवधि के दौरान, लोग शुभ कार्य करने से बचते हैं क्योंकि ग्रहों का प्रभाव प्रतिकूल माना जाता है। होलाष्टक के अंत में होने वाला होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। कई लोग मंत्र जाप, उपवास और दान जैसी धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न होते हैं, क्योंकि वे इसे आंतरिक शुद्धि और भक्ति का समय मानते हैं। होलाष्टक 2025: क्या करें आध्यात्मिक गतिविधियाँ माना जाता है कि प्रार्थना, ध्यान और मंत्र जाप में शामिल होने से नकारात्मक ग्रह प्रभाव का प्रतिकार होता है। दान और परोपकार जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े और वित्तीय सहायता देना शुभ माना जाता है। भगवान विष्णु और नरसिंह की पूजा : विष्णु सहस्त्रनाम, विष्णु मंत्र और श्री हरि स्तोत्र का पाठ करने को प्रोत्साहित किया जाता है। आत्म-नियंत्रण बनाए रखें : इस अवधि के दौरान नकारात्मक भावनाओं, कठोर भाषण से बचें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। होलाष्टक 2025: क्या न करें नई शुरुआत से बचें : विवाह, घर खरीदना, गृह प्रवेश, नया व्यापार और जनेऊ संस्कार स्थगित कर देना चाहिए। ग्रह शांति पूजा न करें : प्रतिकूल ग्रहों की स्थिति के कारण ऐसे अनुष्ठानों से बचना चाहिए। बाल कटवाने और नाखून काटने से बचें : पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार ये गतिविधियाँ दुर्भाग्य ला सकती हैं। संदिग्ध वस्तुओं को न छुएँ : चौराहे पर रखी गई वस्तुओं में नकारात्मक ऊर्जा हो सकती है। खरीदारी से बचें : इस दौरान नए कपड़े, जूते या गहने खरीदने से मना किया जाता है। होलाष्टक होली से पहले आध्यात्मिक तैयारी का एक चरण है, जो त्योहार के समापन तक शुभ कार्यों से परहेज करते हुए भक्ति और आत्मनिरीक्षण को प्रोत्साहित करता है।

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Holashtak 2025: होलाष्टक आज से प्रारंभ, जानें कब होंगे समाप्त व इस दौरान क्या करें?

Holashtak 2025 Date: होली के त्योहार से कुछ दिन पहले होलाष्टक प्रारंभ होते हैं, ज्योतिष शास्त्र में होलाष्टक को शुभ नहीं माना गया है। Holashtak date: हिंदू धर्म में होलाष्टक का विशेष महत्व है। इस साल होलाष्टक 07 मार्च 2025, शुक्रवार से आरंभ हो गए हैं। होलाष्टक के समय शुभ व मांगलिक कार्यों की मनाही होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, होलाष्टक की शुरुआत से ही होलिका दहन की तैयारी शुरू होती है। यह वह समय है जब भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था। यही कारण है कि इस दौरान विवाह, मुंडन संस्कार, गृह प्रवेश समेत अन्य शुभ संस्कार पर रोक होती है। मान्यता है कि इस दौरान कुछ कार्यों को करने से जीवन में सकारात्मकता व शुभता का आगमन होता है। जानें होलाष्टक के दौरान क्या करें- 1. होलाष्टक के दौरान हनुमान चालीसा का रोजाना पाठ करना अत्यंत शुभ व लाभकारी माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है। हनुमान जी की कृपा से कार्यों में आने वाली अड़चनें दूर होती हैं और संकटों से रक्षा होती है। Holi 2025 Special Tips: होली के दिन भूलकर भी न करें ये 5 काम, वरना हो सकता है भारी नुकसान 2. होलाष्टक Holashtak 2025 के दौरान भगवान शिव की उपासना का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस शिव मंत्रों का जाप करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक चिंताओं से मुक्ति मिलती है। 3. होलाष्टक Holashtak 2025 के दौरान दान का विशेष महत्व है। इस दौरान गरीब व जरूरतमंदों की मदद करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दौरान दान-पुण्य करने से जीवन में सुख-शांति व समृद्धि का आगमन होता है। Holi 2025:होली किस तारीख को है? जानें सही तिथि और होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 4. होलाष्टक के दौरान पितरों का तर्पण अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है Holashtak 2025 कि ऐसा करने परिवार में सुख-शांति व समृद्धि का आगमन होता है। करियर में तरक्की के अवरोध खत्म होते हैं और संतान से जुड़ी परेशानियां खत्म होने की मान्यता है। Why Holi is celebrated:क्यों मनाई जाती है होली? यहां जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथाएं होलाष्टक Holashtak 2025 कब खत्म होंगे होलाष्टक 13 मार्च 2025 को होलिका दहन के साथ समाप्त होंगे। इसके अगले दिन रंग वाली होली खेली जाएगी। इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें I

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पड़िला महादेव मंदिर:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर को पांडेश्वर नाथ महादेव के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में वैसे तो बहुत सारे आध्यात्मिक और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल हैं, लेकिन पड़िला महादेव मंदिर का इतिहास अलौकिक है। तीर्थराज प्रयाग के फाफामऊ के थरवई गांव में स्थित इस मंदिर को पांडेश्वर नाथ महादेव के नाम से भी जाना जाता है। बताया जाता है कि पड़िला महादेव मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था। इस मंदिर की गिनती प्रयाग के पंचकोसी परिक्रमा में होती है और यहां स्वयं भू शिवलिंग है। मंदिर का इतिहास पड़िला महादेव मंदिर को 8,000 साल पुराना बताया जाता है। इस मंदिर का नाम पहले माधव मनोहर नाम था। द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडव पड़िला में आकर काफी समय तक रुके थे। इस दौरान पांडवों ने यहां लिंग की पूजा अर्चना की थी। ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान श्री कृष्ण के कहने पर पांडवों ने पड़िला महादेव मंदिर में शिवलिंग पर विधि विधान से पूजा-अर्चना कर मन्नत मांगी थी कि हम पांचों भाई सकुशल हस्तिनापुर पहुंचें। पांडवों की यह मन्नत पूरी भी हुई। पांडवों द्वारा हुई इसी पूजा के बाद इसे पांडेश्वरनाथ धाम कहा जाने लगा। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि श्री कृष्ण की सलाह पर यहां पाण्ड्वों ने अपने वनवासकाल के दौरान भगवान शंकर के लिंग की स्थापना की थी। ऐसी मान्यता है कि पड़िला महादेव मंदिर में शिवलिंग सुबह हरा, दोपहर में भूरा और रात में काले रंग का नजर आता है। भगवान भोलेनाथ के इस पवित्र माह में पांडेश्वरनाथ भगवान भोलेनाथ का हर दिन अलग-अलग श्रृंगार किया जाता है। भगवान भोलेनाथ के अनेक रूपों के अनुरूप शिवलिंग पर श्रृंगार किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अगर लगातार 40 दिन तक पांडेश्वर नाथ धाम में भगवान शिव का दर्शन किया जाए, तो दर्शन करने वाले की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। मंदिर की वास्तुकला पड़िला महादेव मंदिर एक अनूठी स्थापत्य शैली का प्रदर्शन करता है। पूरी तरह से पत्थरों से निर्मित पड़िला महादेव मंदिर नागर शैली में बना है। द्वापर युग में बना यह मंदिर आज भी बिल्कुल वैसा ही है। मंदिर का डिज़ाइन प्राचीन काल की शिल्प कौशल को दर्शाता है, जिससे दिव्यता और पवित्रता का माहौल बनता है। मंदिर के गर्भ गृह के शीर्ष पर विशाल शिखर बना है। छज्जों के रूप में वातायन बनाकर मंडप को महामंडप बनाया गया है। भीतर हवा जाने के लिए वातायन है और मंडप तीन ओर से खुले हैं। मंदिर की दीवारें पुख्ता हैं। मंदिर का समय मंदिर खुलने और बंद होने का समय 05:00 AM – 10:30 PM मंदिर का प्रसाद पांडेश्वर महादेव धाम में भक्त उमापति शिवशंकर को खुश करने के लिए लाल झंडा (निशान) और लाठी चढ़ाते हैं। इसके अलावा मंदिर में आने वाले भक्त फल, फूल, मिठाई के साथ गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, भांग चढ़ाते हैं।

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Bandi Mochan Hanuman Stotra | बंदी मोचन हनुमान स्तोत्र

Bandi Mochan Hanuman Stotra :बंदी मोचन हनुमान स्तोत्र: बंदी मोचन हनुमान जी को समर्पित है। जो व्यक्ति बिना किसी दोष के कोर्ट केस में फंसा हो और उसे सजा मिल गई हो या उसे सजा मिल गई हो, उसे बंदी मोचन हनुमान का पाठ करना चाहिए। साधक सजा से छूटकर शीघ्र ही सम्मान के साथ वापस लौटता है। कहा जाता है कि बंदी मोचन हनुमान का पाठ करने से साधक को मानसिक शांति मिलती है Bandi Mochan Hanuman Stotra और मानसिक पीड़ा से राहत महसूस होने लगती है। Bandi Mochan Hanuman Stotra साधक के विरुद्ध किए गए षड्यंत्रों का विधिवत खुलासा होता है और षड्यंत्रकारी बेनकाब हो जाते हैं। साथ ही शत्रुओं का नाश होता है और साधक को भविष्य की समस्याओं से सुरक्षा मिलती है। जब कोई व्यक्ति स्वयं को या अपने परिवार को किसी प्रकार के बंधन में पाता है या दुश्मनों ने उसे धोखाधड़ी और बेईमानी के कोर्ट विवाद में उलझा दिया है या Bandi Mochan Hanuman Stotra उसके निर्दोष परिवार के सदस्य को झूठे आरोप में सजा मिलने वाली है, Bandi Mochan Hanuman Stotra तो उसे बंदी मोचन हनुमान का बार-बार पाठ करना चाहिए। किसी भी टोने-टोटके, टोने-टोटके और बुरी नजर आदि के प्रभाव से बचने का सबसे सरल उपाय। अक्सर सुनने में आता है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोपों में फंसा दिया गया है और इसके लिए उसके परिवार के सभी लोग चिंतित हैं। ऐसी स्थिति में बंदी मोचन हनुमान बहुत ही अद्भुत लाभ प्रदान करते हैं, Bandi Mochan Hanuman Stotra लेकिन इसे कभी भी अकेले या बिना दिशा-निर्देशों के या अपने मन से न करें। बंदी मोचन हनुमान का पाठ किसी योग्य गुरु और गुरु के दिशा-निर्देशों के तहत ही करना चाहिए। बंदी मोचन हनुमान को बताने का एक ही तरीका है कि हमारे शास्त्रों में फंसे हुए लोगों के लिए इतनी आवश्यकता है इसलिए इसे लोगों के सामने लाना होगा ताकि उन्हें समझाया जा सके। Bandi Mochan Hanuman Stotra बंदी मोचन हनुमान स्तोत्र के लाभ: किसी भी तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, टोने-टोटके, काले जादू के प्रभाव से बचने का सरल उपाय।सभी बुरे प्रभावों और टोने-टोटके से मुक्ति।कोर्ट-कचहरी के मामलों से बचाता है।कोर्ट-कचहरी के मामलों में जीत दिलाता है।धोखे से बचाता है।विश्वासघात का शिकार होने से बचाता है। इस स्तोत्र का Bandi Mochan Hanuman Stotra जाप किसे करना चाहिए: जो लोग काले जादू, टोना-टोटका और अन्य बुरी शक्तियों से पीड़ित हैं, उन्हें खुद को अशुभ प्रभावों से बचाने के लिए बंदी मोचन हनुमान का जाप करना चाहिए। बंदी मोचन हनुमान स्तोत्र | Bandi Mochan Hanuman Stotra यदि आप किसी कोर्ट कचहरी के मामले मे बेवजाह फंस गये है। और सजा होने की स्थिति है। या सजा हो चुकी है। या कोई व्यक्ति जेल मे बंद हो, तो यह प्रयोग अवश्य करे। इस प्रयोग से व्यक्ति निश्चय ही सजा से मुक्त हो कर सम्मान सहित वापिस आ जायेगे। लेकिन आप इस प्रयोग को तभी करे, जब आप सामाजिक और न्यायिक दृष्टि से सही हो। दोष युक्त होने पर यह प्रयोग कोई फल नही देगा।  “ॐ ह्रीं ह्रूं बन्दी देव्यै नम:” इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जाप करे तथा इस स्तोत्र का नित्य पाठ करे। स्तोत्रम् बन्दी देव्यै नमस्कृत्य वरदाभय शोभितम्। तदाज्ञांशरणं गच्छत् शीघ्रं मोचं ददातु मे॥ बन्दी कमल पत्राक्षी लौह श्रृंखला भंजिनीम्। प्रसादं कुरू मे देवि! शीघ्रं मोचं ददातु मे॥ त्वं बन्दी त्वं महा माया त्वं दुर्गा त्वं सरस्वती। त्वं देवी रजनी चैव शीघ्रं मोचं ददातु मे॥ त्वं ह्रीं त्वमोश्वरी देवि ब्राम्हणी ब्रम्हा वादिनी। त्वं वै कल्पक्षयं कर्त्री शीघ्रं मोचं ददातु मे॥ देवी धात्री धरित्री च धर्म शास्त्रार्थ भाषिणी। दु: श्वासाम्ब रागिणी देवी शीघ्रं मोचं ददातु मे। नमोस्तुते महालक्ष्मी रत्न कुण्डल भूषिता। शिवस्यार्धाग्डिनी चैव शीघ्रं मोचं ददातु मे॥ नमस्कृत्य महा-दुर्गा भयात्तु तारिणीं शिवां। महा दु:ख हरां चैव शीघ्रं मोचं ददातु मे॥ इंद स्तोत्रं महा-पुण्यं य: पठेन्नित्यमेव च। सर्व बन्ध विनिर्मुक्तो मोक्षं च लभते क्षणात्॥ यदि आप पूर्णतः निर्दोष है। तो निश्चित ही इस प्रयोग से कारागार(जेल) से मुक्त होंगे।

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