Ganesha Ashtottara: गणेश अष्टोतर

गणेश अष्टोत्तर: भगवान गणेश को सभी देवी-देवताओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। उन्हें कई उपाधियाँ और विशेषण दिए गए हैं। उन्हें आरंभ के देवता और बाधाओं को दूर करने वाले के रूप में भी जाना जाता है। कई धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष अवसरों पर उनकी पूजा की जाती है, खासकर किसी उद्यम की शुरुआत में जैसे वाहन खरीदना या कोई उद्यम शुरू करना। उन्हें चार भुजाओं और हाथी के सिर वाले एक घड़े के रूप में दर्शाया गया है, जो एक चूहे पर सवार हैं। भगवान गणेश के 108 नाम हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से भगवान गणेश के अष्टोत्तर शतनामावली के रूप में जाना जाता है। गणेश अष्टोत्तर एक बहुत ही उपयोगी और लाभकारी स्तोत्र है जहाँ आप अपनी समस्याओं के बारे में समाधान पा सकते हैं और आप जटिल समय से छुटकारा पा सकते हैं और आप अपने जीवन को खुशहाल बना सकते हैं और अपनी पसंद के अनुसार अपना जीवन खुशहाल बना सकते हैं। गणेश अष्टोत्तर भगवान गणेश के मुख्य रूप से सफल स्तोत्रों में से एक है। गणेश अष्टोत्तर सभी प्रकार के क्लेशों को मिटाता है। मूल्यांकन गणेश अष्टोत्तर का प्रतिदिन पाठ करने से मनुष्य को सभी प्रकार की परेशानियों से मुक्ति मिलती है। भगवान गणेश सभी कष्टों का निवारण करते हैं और जीवन में समृद्धि और संतोष लाते हैं। किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। प्राचीन पूजा में भगवान गणेश का महत्वपूर्ण स्थान है। वेदों और पुराणों में भगवान गणेश की पूजा के कई लाभ बताए गए हैं। गणेश अष्टोत्तर लाभ: भगवान गणेश को ब्रह्मा, विष्णु और शिव से जुड़ा माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि अन्य सभी देव भगवान गणेश से ही प्रेरित हैं। भगवान गणेश की कृपा से व्यक्ति का जीवन स्वस्थ और खुशहाल बनता है। ऐसा व्यक्ति सभी कष्टों पर विजय पाने में सक्षम होता है। भगवान गणेश के पास अपार ज्ञान है और वे सभी कष्टों को दूर करते हैं। हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार, किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए भगवान गणेश की पूजा की जाती है। शास्त्रों में भगवान गणेश की पूजा करने के कई तरीके बताए गए हैं। ऐसी ही एक विधि है गणेश अष्टोत्तर। भगवान गणेश की पूजा के दौरान उन्हें दूर्वा, फूल, सिंदूर, घी, दीपक और मोदक अवश्य अर्पित करना चाहिए। इस अष्टोत्तर का पाठ किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है उसे बेहतर परिणामों के लिए गणेश अष्टोत्तर का पाठ अवश्य करना चाहिए। गणेश अष्टोत्तर | Ganesha Ashtottara विनायकॊ विघ्नराजॊ गौरीपुत्रॊ गणॆश्वरः ।  स्कन्दाग्रजॊव्ययः पूतॊ दक्षॊज़्ध्यक्षॊ द्विजप्रियः ॥ 1 ॥  अग्निगर्वच्छिदिन्द्रश्रीप्रदॊ वाणीप्रदॊज़्व्ययः  सर्वसिद्धिप्रदश्शर्वतनयः शर्वरीप्रियः ॥ 2 ॥  सर्वात्मकः सृष्टिकर्ता दॆवॊनॆकार्चितश्शिवः ।  शुद्धॊ बुद्धिप्रियश्शान्तॊ ब्रह्मचारी गजाननः ॥ 3 ॥  द्वैमात्रॆयॊ मुनिस्तुत्यॊ भक्तविघ्नविनाशनः ।  ऎकदन्तश्चतुर्बाहुश्चतुरश्शक्तिसंयुतः ॥ 4 ॥  लम्बॊदरश्शूर्पकर्णॊ हरर्ब्रह्म विदुत्तमः ।  कालॊ ग्रहपतिः कामी सॊमसूर्याग्निलॊचनः ॥ 5 ॥  पाशाङ्कुशधरश्चण्डॊ गुणातीतॊ निरञ्जनः ।  अकल्मषस्स्वयंसिद्धस्सिद्धार्चितपदाम्बुजः ॥ 6 ॥  बीजपूरफलासक्तॊ वरदश्शाश्वतः कृती ।  द्विजप्रियॊ वीतभयॊ गदी चक्रीक्षुचापधृत् ॥ 7 ॥  श्रीदॊज उत्पलकरः श्रीपतिः स्तुतिहर्षितः ।  कुलाद्रिभॆत्ता जटिलः कलिकल्मषनाशनः ॥ 8 ॥  चन्द्रचूडामणिः कान्तः पापहारी समाहितः ।  अश्रितश्रीकरस्सौम्यॊ भक्तवांछितदायकः ॥ 9 ॥  शान्तः कैवल्यसुखदस्सच्चिदानन्दविग्रहः ।  ज्ञानी दयायुतॊ दान्तॊ ब्रह्मद्वॆषविवर्जितः ॥ 10 ॥  प्रमत्तदैत्यभयदः श्रीकण्ठॊ विबुधॆश्वरः ।  रमार्चितॊविधिर्नागराजयज्ञॊपवीतवान् ॥ 11 ॥  स्थूलकण्ठः स्वयङ्कर्ता सामघॊषप्रियः परः ।  स्थूलतुण्डॊज़्ग्रणीर्धीरॊ वागीशस्सिद्धिदायकः ॥ 12 ॥  दूर्वाबिल्वप्रियॊज़्व्यक्तमूर्तिरद्भुतमूर्तिमान् ।  शैलॆन्द्रतनुजॊत्सङ्गखॆलनॊत्सुकमानसः ॥ 13 ॥  स्वलावण्यसुधासारॊ जितमन्मथविग्रहः ।  समस्तजगदाधारॊ मायी मूषकवाहनः ॥ 14 ॥  हृष्टस्तुष्टः प्रसन्नात्मा सर्वसिद्धिप्रदायकः ।  अष्टॊत्तरशतॆनैवं नाम्नां विघ्नॆश्वरं विभुम् ॥ 15 ॥  तुष्टाव शङ्करः पुत्रं त्रिपुरं हन्तुमुत्यतः ।  यः पूजयॆदनॆनैव भक्त्या सिद्धिविनायकम् ॥ 16 ॥  दूर्वादलैर्बिल्वपत्रैः पुष्पैर्वा चन्दनाक्षतैः ।  सर्वान्कामानवाप्नॊति सर्वविघ्नैः प्रमुच्यतॆ ॥

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Sapne Me Bandar Dekhna: क्या आपको भी सपने में बार-बार दिखाई देते हैं बंदर? जानें ऐसा सपना शुभ है या अशुभ

Sapne me Bandar Dekhna: हिंदू धर्म में किसी भी सपने को देखने के पीछे एक कारण माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार ये सपने हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं के होने का संकेत देते हैं. आपके सपने में अक्सर बंदर दिखाई देते हैं तो जान लें कि सपने में बंदर का दिखना शुभ है या अशुभ. Monkey In Dream: सपने में बंदर को देखना कब शुभ होता है और कब अशुभ, इसके बारे में आज हम आपको अपने इस लेख में जानकारी देंगे। Monkey In Dream: स्वप्नशास्त्र की मानें तो सपने हमें कई तरह का संकेत देते हैं। कुछ सपनों का अर्थ स्वप्नशास्त्र में बेहद शुभ माना गया है, वहीं कुछ सपने जीवन में आने वाली चुनौतियों का संकेत भी देते हैं। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि अगर कभी आप सपने में बंदर देखते हैं तो असल जीवन में इस सपने का क्या अर्थ लगाया जाता है। किस स्थिति में बंदर को सपने में देखना शुभ माना जाता है और किन स्थितियों में अशुभ, आइए विस्तार से जानते हैं। सपने में बंदर Sapne Me Bandar अगर आप सपने में बंदर को देखते हैं तो ये आपके लिए अच्छा संकेत माना जाता है। इस सपने का अर्थ होता है कि आप कोई नई चीज सीखने के लिए प्रयास कर सकते हैं। आपके जीवन में नवीनता आ सकती है। साथ ही ये सपना दर्शाता है कि, आध्यात्मिक रूप से आप उन्नति के मार्ग पर चल सकते हैं। अगर सपने में बंदर किसी पत्थर पर शांतचित बैठा दिख रहा है तो ये सपना दर्शाता है कि आपके जीवन में स्थिरता आएगी। मन की चंचलता दूर होगी।  हिंदू धर्म में मान्यता रखने वाले लोग बंदर को हनुमान जी से जोड़कर देखते हैं। वहीं बंदर के स्वभाव पर नजर डालें तो ये चंचलता, नकल, मासूमियत, जिज्ञासा आदि को दर्शाता है। ऐसे में बंदर सपने में दिखे तो इसका अर्थ क्या होगा आइए जानते हैं।  बंदर को गुस्से में देखना bandar ko gusse me dekhna सपने में बंदर को गुस्से में देखना अशुभ माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार इसका मतलब होता है कि आपका किसी से झगड़ा हो सकता है और आपके मान में कमी आ सकती है और जीवन की परेशानियों का ये कारण भी बन सकता है. बंदर को खाते हुए देखना bandar ko khate huye dekhna स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में बंदर को कुछ खाते हुए देखना एक अशुभ सपना माना जाता है. यह सपना इस बात का संकेत करता है कि आपको भारी नुकसान होने वाला है और आने वाले समय में आपके परिवार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. साथ ही संकेत देता है कि आने वाले दिनों में हानि हो सकती है. सपने में बंदर को खुश या मस्ती करते हुए देखना sapne me bandar ko kush ya masti karte huye dekhna स्वप्न शास्त्र में बंदर को खुश देखने में देखना एक शुभ सपना होता है. इस सपने का अर्थ है कि आपकी जिसके साथ लड़ाई हुई थी, उससे आपकी दोबारा मित्रता हो जाएगी और आपका पुराना दोस्त आपको मिलने वाला है. साथ ही साथ यह सपना इस लिहाज़ से भी अच्छा होता है कि आपके मान सम्मान में वृद्धि होने वाली है. बंदर का झुंड में देखना bandar ko jhund me dekhna स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में बंदर को झुंड में देखना एक शुभ सपना माना जाता है. यह सपने देखने का मतलब होता है कि आपका परिवार आपके साथ है और आपको धन लाभ होने वाला है. साथ ही आने वाले समय में आपके परिवार का साथ बना रहेगा और आने वाला समय खुशहाल रहेगा. सपने में काट ले बंदर sapne me kat le bandar सपने में बंदर आपको काट ले तो अपने आर्थिक पक्ष पर विशेष ध्यान आपको देना चाहिए। ऐसा सपना आपकी जेब को ढीला कर सकता है। इस सपने के बाद संचित धन को खर्च करने से भी आपको बचना चाहिए।  सपने में बंदर के साथ खेलना sapne me bandar ke sath khelna अगर आप सपने में खुद को बंदर के साथ खेलते देखते हैं तो ये सपना बहुत अच्छा माना जाता है। इस सपने का अर्थ होता है कि आप अच्छी संगत में हैं और जीवन का आनंद ले रहे हैं। ऐसा सपना आपके व्यक्तित्व में अच्छे बदलाव लेकर आ सकता है। 

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Harsha Richhariya: महाकुंभ में पॉपुलर होने से लेकर मैदान छोड़ने के संकल्प तक, सुंदर ‘साध्वी’ ने क्या-क्या कहा

Viral Sadhvi Harsha Richhariya Update: सोशल मीडिया सेंसेशन बन चुकीं वायरल साध्वी हर्षा रिछारिया ने महाकुंभ से वापस लौट जाने का ऐलान किया है. उन्होंने रोते हुए एक वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया है. आखिर क्यों यह ‘साध्वी’ महाकुंभ से पहले ही वापस लौट रही हैं. कहां से बवाल शुरू हुआ और क्या है पूरी कहानी चलिए जानते हैं आसान भाषा में… Viral Sadhvi In Mahakumbh: प्रयागराज महाकुंभ में अपनी खूबसूरती को लेकर वायरल हो रही साध्वी हर्षा रिछारिया ने कुंभ छोड़ने का ऐलान कर दिया है. लेकिन इस दौरान उन्होंने ट्रोलरों पर गंभीर आरोप लगा दिया है. Viral Sadhvi In Mahakumbh: महाकुंभ में पवित्र स्नान करने प्रयागराज Prayagrag पहुंची वायरल साध्वी हर्षा रिछारिया फूट-फूटकर रोने लगी. उन्होंने महाकुंभ छोड़ देने का ऐलान कर दिया है. रोते हुए हर्षा ने ट्रोलरों पर गंभीर आरोप लगा दिया. उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो रोते हुई दिख रही हैं. रोते हुए हर्षा ने कहा, “शर्म आनी चाहिए एक लड़की जो धर्म से जुड़ने के लिए यहां आई थी, धर्म को जानने आई थी, सनातन संस्कृति को जानने यहां आई थी. आपने उसे इस लायक भी नहीं छोड़ा, जो पूरे कुंभ में रूक पाए. वो कुंभ जो हमारे जीवन में एक बार आएगा. आपने वो कुंभ एक इंसान से छीन लिया. जिसने भी ऐसा किया है, उसे पाप लगेगा.” रथ पर बैठने से विवाद निरंजनी अखाड़े के छावनी प्रवेश के दौरान एक रथ पर संतों के साथ हर्षा रिछारिया के बैठने को लेकर विवाद पैदा हो गया. काली सेना के प्रमुख स्वामी आनंद स्वरूप ने इस पर आपत्ति जताई है. उन्होंने फेसबुक Fecbook पर लिखा है, “महाकुंभ मेले Mahakumbh Mela में निरंजनी अखाड़े के छावनी में अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी जी महाराज से भोजन प्रसाद पर चर्चा हुई. मैंने कहा कि यह कुंभ अखाड़ों को मॉडल दिखाने के लिए नहीं आयोजित है, यह कुंभ जप, तप और ज्ञान की गंगा के लिए है. इसलिए इस कुकृत्य पर आप कार्रवाई कीजिए.” जैसे मैंने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया’ वायरल साध्वी ने कहा, ‘कुछ लोगों ने मुझे धर्म से जुड़ने का मौका नहीं दिया. इस कॉटेज में रहते हुए मुझे ऐसा लग रहा है कि मैंने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया है. जबकि मेरी कोई गलती नहीं है, लेकिन फिर भी मुझे टारगेट किया जा रहा है. तो मैं पहले यहां पूरे महाकुंभ में रहने आई थी, लेकिन अब मैं यहां नहीं रह पाऊंगी. 24 घंटे इस रूम को देखना पड़ रहा है, इससे तो अच्छा है कि मैं यहां से चली जाऊं.’ किन लोगों ने जताई आपत्ति दरअसल, जब हर्षा का रथ पर बैठने वाला वीडियो सामने आया तो कई संत से लेकर अन्य लोग उन्हें ट्रोल करने लगे. हर्षा आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री कैलाशनंदगिरी जी महाराज की शिष्या हैं. वह महाकुंभ में निरंजनी अखाड़े से जुड़ी हैं. सबसे पहले ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि महाकुंभ में इस तरह की परंपरा शुरू करना पूरी तरह गलत है. यह विकृत मानसिकता का नतीजा है. महाकुंभ में चेहरे की सुंदरता नहीं बल्कि हृदय की सुंदरता देख जाना चाहिए था. उन्होंने कहा कि जो अभी यह नहीं तय कर पाया है कि संन्यास की दीक्षा लेनी है या शादी करनी है, उसे संत महात्माओं के शाही रथ पर जगह दिया जाना उचित नहीं है. श्रद्धालु के तौर पर शामिल होती तब भी ठीक था, लेकिन भगवा कपड़े में शाही रथ पर बिठाना पूरी तरह गलत है. इसके बाद शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने कहा कि यह बिल्कुल भी उचित नहीं है. इससे समाज में गलत संदेश फैलता है. काली सेना के प्रमुख स्वामी आनंद स्वरूप ने उनके आचरण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कुंभ का आयोजन ज्ञान और आध्यात्मिकता फैलाने के लिए किया जाता है. कहा- इसे मॉडलों द्वारा प्रचार कार्यक्रम के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. महंत रवींद्र पुरी ने किया बचाव हालांकि, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने इस मुद्दे को ज्यादा तवज्जो न देते हुए कहा कि भगवा कपड़े पहनना कोई अपराध नहीं है और युवती ने निरंजनी अखाड़े के एक महामंडलेश्वर से मंत्र दीक्षा ली थी. उन्होंने हर्षा का बचाव किया और कहा- रिछारिया को लेकर कहा कि वह निरंजनी अखाड़े के एक महामंडलेश्वर से दीक्षा लेने आई थीं. वह एक मॉडल हैं और सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. उन्होंने रामनामी कपड़ा पहना हुआ था. हमारी परंपरा है कि जब भी सनातन का कोई कार्यक्रम होता है, तो हमारे युवा भगवा कपड़े पहनते हैं. यह कोई अपराध नहीं है. ‘गुरु की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं’ हर्षा को सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर जमकर ट्रोल किया जाने लगा. जिसके बाद हर्षा ने आखिरकार कुंभ से वापस जाने का ऐलान कर दिया है. उन्होंने कहा कि मैं अगले 3 दिन में महाकुंभ से उत्तराखंड जा रही हूं. क्योंकि बात अब मेरे गुरु तक आ गई है. मैं अपने गुरु की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं. मैं एक्टर और एंकर रह चुकी हूं, लेकिन मुझे मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है, जो गलत है.

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Magh Masik Krishna Janmashtami 2025: कब है साल की पहली मासिक कृष्ण जन्माष्टमी? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त

Krishna Janmashtami 2025 : भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रप्रद मास के कृष्ण पक्ष (KRISHNA JANMASTAMI) की अष्टमी तिथि को हुआ था। हिंदू धर्म में इस दिन को हर साल श्री कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। बाल गोपाल के भक्त भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव बहुत धूमधाम से मनाते हैं। भगवान कृष्ण की पूजा के लिए हर महीने मासिक कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। हिंदू धर्म में भगवान श्री कृष्ण की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। मासिक जन्माष्टमी हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। मासिक कृष्ण Krishna जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल की साधना या व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है। जिन लोगों को संतान प्राप्ति में दिक्कतें आती हैं, अगर वे इस दिन लड्डू गोपाल की पूजा करें तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है। Magh Masik Krishna Janmashtami 2025 Date: मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का दिन भगवान कृ्ष्ण को समर्पित है. यह दिन श्री कृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है. मासिक जन्माष्टमी का व्रत हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत और पूजन करने से व्यक्ति के घर में सुख-समृद्धि आती है. इसके आलावा इस दिन जीवन में सकारात्मकता आती है. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी कब है? (Magh Masik Krishna Janmashtami 2025 Date) हिंदू वैदिक पंचांग के अनुसार साल की पहली यानी माघ माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 21 जनवरी को रात 12 बजकर 39 मिनट होगी. वहीं तिथि का समापन अगले दिन 22 जनवरी रात 3 बजकर 18 मिनट पर होगी. जिसके अनुसार मासिक जन्माष्टमी का व्रत 21 जनवरी को रखा जाएगा. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त (Masik Krishna Janmashtami 2025 shubh Muhurat) पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म रात्रि में 12 बजे हुआ था. पंचांग के अनुसार मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त रात्रि 12 बजकर 6 मिनट से लेकर 12 बजकर 59 मिनट तक रहेगा. ऐसे में भक्तों को पूजा करने के लिए कुल 53 मिनट का समय मिलेगा. श्रीकृष्ण पूजा मंत्र ( Masik Krishna Janmashtami puja Mantra) मासिक कृष्ण जन्माष्टी का महत्व (Magh Masik Krishna Janmashtami Significance) धार्मिक मान्याता के अनुसार, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसके अलावा मान्यता है कि इस दिन कान्हा की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं भी पूरी होती है और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि भी आती है. Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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Gajendra Moksha Stotram:गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र (Gajendra Moksha Stotram) श्रीशुक उवाच एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो ह्रदि । जजाप परमं जाप्यं प्राक्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥  १ ॥ गजेन्द्र उवाच ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् । पुरुषायादिबीजाय परेशायाभीधीमहि ॥  २ ॥ यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् । योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्दे स्वयंभुवम् ॥ ३ ॥ यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितम् । क्वचिद्विभांतं क्व च तत्तिरोहितम् ।। अविद्धदृक् साक्ष्युभयम तदीक्षते । सआत्ममूलोऽवतु मां परात्पतरः ।। ४ ।। कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो । लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।। तमस्तदा ऽ ऽ सीद् गहनं गभीरम् । यस्तस्य पारे ऽ भिविराजते विभुः ॥ ५ ॥ न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुः । जन्तुः पुनः कोऽर्हति गंतुमीरितुम् ।। यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो । दुरत्ययानुक्रमणः स माऽवतु ॥ ६ ॥ दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम् । विमुक्तसंगा मुनयः सुसाधवः ।। चरंत्यलोकव्रतमव्रणं वने । भूतात्मभूतः सुह्रदः स मे गतिः ॥ ७ ॥- गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा । न नामरुपे गुणदोष एव वा ।। तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः । स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ ८ ॥ तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये । अरुपायोरुरुपाय नम आश्र्चर्य कर्मणे ॥ ९ ॥ नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने । नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ १० ॥ सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्र्चिता । नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ ११ ॥ नमः शांताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे । निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ १२ ॥ क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे । पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ १३ ॥ सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे । असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥ १४ ॥ नमो नमस्तेऽखिल कारणाय । निष्कारणायाद्भुत कारणाय ।। सर्वागमाम्नायमहार्णवाय । नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥ १५ ॥ गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय । तत्क्षोभ-विस्फूर्जितमानसाय ।। नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम । स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ १६ ॥ मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय । मुक्ताय भुरिकरुणाय नमोऽलयाय ।। स्वांशेनसर्वतनुभृत्मनसि-प्रतीत–प्रत्यग् दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥ १७ ॥ आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैः । दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।। मुक्तात्मभिः स्वह्रदये परिभाविताय । ज्ञानात्मने भगवते नमः ईश्र्वराय ॥ १८ ॥ यं धर्मकामार्थ-विमुक्तिकामाः । भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।। किंत्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययम् । करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ १९ ॥ एकांतिनो यस्य न कंचनार्थम् । वांछन्ति ये वै भगवत् प्रपन्नाः ।। अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलम् । गायन्त आनन्द समुद्रमग्नाः ॥ २० ॥ तमक्षरं ब्रह्म परं परेशम् । अव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।। अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरम् । अनंतमाद्यं परिपूर्णमिडे ॥ २१ ॥ यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्र्चराचराः । नामरुपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ २२ ॥ यथार्चिषोऽग्ने सवितुर्गभस्तयोः । निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।। तथा यतोऽयं गुणसंप्रवाहो । बुद्धिर्मनः ख्रानि शरीरसर्गाः ॥ २३ ॥ स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ । न स्त्री न षंढो न पुमान् न जन्तुः ।। नायं गुणः कर्म न सन्न चासन् । निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ २४ ॥ जिजी विषे नाहमियामुया किम् । अन्तर्बहिश्र्चावृतयेभयोन्या ।। इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवः । तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥ २५ ॥ सोऽहं विश्र्वसृजं विश्र्वमविश्र्वं विश्र्ववेदसम् । विश्र्वात्मानमजंब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥ २६ ॥ योगरंधितकर्माणो ह्रदि योग-विभाविते । योगिनो यं प्रपश्यति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥ २७ ॥ नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग–शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।। प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये । कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ २८ ॥ नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहं धिया हतम् । तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवंतमितोऽस्म्यहम् ॥ २९ ॥ श्रीशुक उवाच एवं गजेन्द्र मुपवर्णितनिर्विशेषम् । ब्रह्मादयो विविधलिंग भिदाभिमानाः ।। नैते यदोपससृपुनिंखिलात्मकत्वात् । तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥ ३० ॥ तं तद्वदार्तमुपलभ्य जगन्निवासः । स्तोत्रं निशम्य दिविजै सह संस्तुवद्भिः ।। छंदोमयेन गरुडेन समुह्यमानः । चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥ ३१ ॥ सोऽन्तः सरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो । दृष्टवा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् ।। उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रात् । नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥ ३२ ॥ तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य । सग्राहमाशु सरसः कृपायोज्जहार ।। ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रम् । संपश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम् ॥ ३३ ॥ योऽसौ ग्राहः स वै सद्यः परमाश्र्चर्य रुपधृक् । मुक्तो देवलशापेन हुहु-गंधर्व सत्तमः ।। सोऽनुकंपित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम् । लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्त-किल्बिषः ॥ ३४ ॥ गजेन्द्रो भगवत्स्पर्शाद् विमुक्तोऽज्ञानबंधनात् । प्राप्तो भगवतो रुपं पीतवासाश्र्चतुर्भुजः ।। एवं विमोक्ष्य गजयुथपमब्जनाभः । स्तेनापि पार्षदगति गमितेन युक्तः ॥ ३५ ॥ गंधर्वसिद्धविबुधैरुपगीयमान- कर्माभ्दुतं स्वभवनं गरुडासनोऽगात् ॥ ३६ ॥ ॥ इति श्रीमद् भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे गजेंन्द्रमोक्षणे तृतीयोऽध्यायः ॥

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Ganga Dussehra Stotra:गंगा दशहरा स्तोत्र

गंगा दशहरा स्तोत्र: यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से किसी पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करके गंगा दशहरा स्तोत्र का पाठ करता है, तो व्यक्ति के सभी दोष और पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही जातक को अग्नि, चोर, सांप आदि का भय नहीं रहता। भविष्य पुराण में इसके बारे में बताया गया है। इस दिन गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने के बाद मां गंगा स्तोत्र का पाठ करने से दस प्रकार के दोष नष्ट हो जाते हैं। भक्तिपूर्वक गंगा दशहरा स्तोत्र पढ़ने, सुनने और शरीर द्वारा किए जा रहे दस प्रकार के पापों से मुक्ति दिलाता है। गंगा दशहरा स्तोत्र जिसके घर में लिखकर रखा जाता है, उसे अग्नि, चोर, सांप आदि का कभी भय नहीं रहता। वैदिक शास्त्रों के अनुसार, राजा सगर सत्य युग में सूर्यवंश के एक प्रसिद्ध राजा थे। विदर्भ की राजकुमारी और शाही सिवी राजवंश की दूसरी राजकुमारी से विवाहित, राजा राजा भगीरथ, राजा दशरथ और राजकुमार राम (भगवान कृष्ण के अवतार) के पूर्वज थे। हिंदुओं का मानना ​​है कि इस दिन पवित्र नदी गंगा स्वर्ग से धरती पर उतरी थी। गंगा दशहरा स्तोत्र हिंदू कैलेंडर महीने ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष की दशमी (10वें दिन) को होता है। एक बार की बात है, राजा सगर ने योग्य ब्राह्मणों की मदद से अश्वमेध यज्ञ नामक एक यज्ञ किया। यह राजा की संप्रभुता को साबित करने के लिए था। स्वर्ग के राजा इंद्र को यज्ञ के परिणामों पर चिंता होने लगी और फिर उन्होंने अपनी रहस्यमय शक्तियों के माध्यम से घोड़ों को चुरा लिया। गंगा दशहरा स्तोत्र के लाभ वैदिक पुराण में लिखा है कि, जो व्यक्ति इस दशहरे के दिन गंगा के जल में खड़ा होकर इस स्तोत्र को दस बार पढ़ता है, भले ही वह दरिद्र हो, असमर्थ हो, वह भी प्रयास से गंगा की पूजा करके फल प्राप्त करता है। दशहरे पर स्नान की यह विधि पूरी हुई। स्कंद पुराण के वचनों को गंगा दशहरा स्तोत्र कहते हैं और इसके पढ़ने की विधि- सभी अवयवों से युक्त सुंदर तीन नेत्रों वाला चतुर्भुज, जो चार भुज, रत्न कुंभ, श्वेतकमल, वरद और अभय से सुशोभित है, श्वेत वस्त्र पहने हुए हैं। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए गंगा दशहरा स्तोत्र का जाप कोई भी व्यक्ति कर सकता है क्योंकि यह सार्वभौमिक है और इस मानव जीवन में जाने-अनजाने पाप होते हैं। वैदिक नियमानुसार गंगा दशहरा स्तोत्र का जाप करने से व्यक्ति सभी बुराइयों से मुक्त हो जाता है। Ganga Dussehra Stotra:गंगा दशहरा स्तोत्र ॐ नमः शिवायै गंगायै, शिवदायै नमो नमः। नमस्ते विष्णु-रुपिण्यै, ब्रह्म-मूर्त्यै नमोऽस्तु ते।। नमस्ते रुद्र-रुपिण्यै, शांकर्यै ते नमो नमः। सर्व-देव-स्वरुपिण्यै, नमो भेषज-मूर्त्तये।। सर्वस्य सर्व-व्याधीनां, भिषक्-श्रेष्ठ्यै नमोऽस्तु ते। स्थास्नु-जंगम-सम्भूत-विष-हन्त्र्यै नमोऽस्तु ते।। संसार-विष-नाशिन्यै, जीवानायै नमोऽस्तु ते। ताप-त्रितय-संहन्त्र्यै, प्राणश्यै ते नमो नमः।। शन्ति-सन्तान-कारिण्यै, नमस्ते शुद्ध-मूर्त्तये। सर्व-संशुद्धि-कारिण्यै, नमः पापारि-मूर्त्तये।। भुक्ति-मुक्ति-प्रदायिन्यै, भद्रदायै नमो नमः। भोगोपभोग-दायिन्यै, भोग-वत्यै नमोऽस्तु ते।। मन्दाकिन्यै नमस्तेऽस्तु, स्वर्गदायै नमो नमः। नमस्त्रैलोक्य-भूषायै, त्रि-पथायै नमो नमः।। नमस्त्रि-शुक्ल-संस्थायै, क्षमा-वत्यै नमो नमः। त्रि-हुताशन-संस्थायै, तेजो-वत्यै नमो नमः।। नन्दायै लिंग-धारिण्यै, सुधा-धारात्मने नमः। नमस्ते विश्व-मुख्यायै, रेवत्यै ते नमो नमः।। बृहत्यै ते नमस्तेऽस्तु, लोक-धात्र्यै नमोऽस्तु ते। नमस्ते विश्व-मित्रायै, नन्दिन्यै ते नमो नमः।। पृथ्व्यै शिवामृतायै च, सु-वृषायै नमो नमः। परापर-शताढ्यै, तारायै ते नमो नमः।। पाश-जाल-निकृन्तिन्यै, अभिन्नायै नमोऽस्तु ते। शान्तायै च वरिष्ठायै, वरदायै नमो नमः।। उग्रायै सुख-जग्ध्यै च, सञ्जीविन्यै नमोऽस्तु ते। ब्रह्मिष्ठायै-ब्रह्मदायै, दुरितघ्न्यै नमो नमः।। प्रणतार्ति-प्रभञजिन्यै, जग्मात्रे नमोऽस्तु ते। सर्वापत्-प्रति-पक्षायै, मंगलायै नमो नमः।। शरणागत-दीनार्त-परित्राण-परायणे। सर्वस्यार्ति-हरे देवि! नारायणि ! नमोऽस्तु ते।। निर्लेपायै दुर्ग-हन्त्र्यै, सक्षायै ते नमो नमः। परापर-परायै च, गंगे निर्वाण-दायिनि।। गंगे ममाऽग्रतो भूया, गंगे मे तिष्ठ पृष्ठतः। गंगे मे पार्श्वयोरेधि, गंगे त्वय्यस्तु मे स्थितिः। आदौ त्वमन्ते मध्ये च, सर्व त्वं गांगते शिवे! त्वमेव मूल-प्रकृतिस्त्वं पुमान् पर एव हि।। गंगे त्वं परमात्मा च, शिवस्तुभ्यं नमः शिवे।। ।।फल-श्रुति।। य इदं पठते स्तोत्रं, श्रृणुयाच्छ्रद्धयाऽपि यः। दशधा मुच्यते पापैः, काय-वाक्-चित्त-सम्भवैः।। रोगस्थो रोगतो मुच्येद्, विपद्भ्यश्च विपद्-युतः। मुच्यते बन्धनाद् बद्धो, भीतो भीतेः प्रमुच्यते।

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Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति पर ही भीष्म पितामह ने त्यागी थी देह, जानें क्या है पौराणिक महत्व

Makar Sankranti 2025: हिंदू धर्म में मकर संक्रांति काफी महत्व है. इस दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं. मान्यता है कि इसी दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है. वैसे मकर संक्रांति का महाभारत से भी गहरा संबंध है. भीष्म पितामह 58 दिनों तक बाणों की शैया पर रहे, लेकिन अपना शरीर नहीं त्यागा क्योंकि वे चाहते थे कि जिस दिन सूर्य उत्तरायण होगा तभी वे अपने प्राणों का त्याग करेंगे. मकर संक्रांति का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व भी है, खासकर महाभारत के संदर्भ में, जब भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया और इस दिन अपने प्राण का त्याग कर दिया था। हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति इस साल 14 जनवरी को मनाई जाएगी, जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इस दिन का विशेष महत्व है क्योंकि सूर्य के गोचर से खरमास समाप्त होता है और बसंत ऋतु का आगमन होता है। मकर संक्रांति का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व भी है, खासकर महाभारत के संदर्भ में, जब भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया और इस दिन अपने प्राण त्यागे। Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति आज है और आज सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं. वैदिक ज्योतिष के मुताबिक, सूर्य को सभी ग्रहों का राजा माना जाता है और इसलिए, इनका गोचर भी खास माना जाता है. मकर संक्रांति के दिन सूर्य के गोचर से खरमास का अंत हो जाता है और वसंत ऋतु के आगमन की आहट सुनाई देती है. इस पावन पर्व का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि भीष्म पितामह, जो 58 दिनों तक बाणों की शैय्या पर थे, उन्होंने अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी. इस अवसर से जुड़ी यह पौराणिक कथा आज भी लोगों के हृदय को छूती है. भीष्म पितामह bhishma pitamah की प्राण त्यागने की कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरायण के महत्व की व्याख्या भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरायण के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस समय पृथ्वी पर प्रकाश का वास होता है, और जो भी व्यक्ति इस समय शरीर त्यागता है, उसे पुनर्जन्म नहीं मिलता। वे सीधे ब्रह्मलोक में जाते हैं, यही कारण था कि भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया। मकर संक्रांति का सूर्य के गोचर से संबंध मकर संक्रांति का दिन सूर्य के गोचर का प्रतीक है, जब सूर्य अपनी राशि बदलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन से खरमास समाप्त होता है और वसंत ऋतु का आगमन होता है, जो जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रतीक मानी जाती है। इसके साथ ही, इस दिन को धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसे पुण्यकाल माना जाता है। मकर संक्रांति के पुण्यकाल और महापुण्य काल हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन पुण्यकाल सुबह 9 बजकर 3 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। वहीं, महापुण्य काल सुबह 9 बजकर 3 मिनट से लेकर 10 बजकर 48 मिनट तक रहेगा, जो विशेष रूप से शुभ और फलदायी माना जाता है। इस समय में धार्मिक क्रियाएं और दान आदि करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है।

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Mahakumbh and Kumbh mela:महाकुंभ और कुंभ मेला: जानें प्रमुख अंतर

Mahakumbh and Kumbh mela महाकुंभ बनाम कुंभ: हालांकि दोनों त्योहारों का गहरा धार्मिक महत्व और खगोलीय संबंध है, लेकिन कुछ प्रमुख अंतर हैं जो उन्हें अलग करते हैं भारत की आध्यात्मिक विरासत ऐसे अनुष्ठानों और उत्सवों में डूबी हुई है, जिनमें भक्ति, संस्कृति और समुदाय का मिश्रण है। इसकी सबसे प्रमुख परंपराओं में कुंभ मेला और महाकुंभ मेला शामिल हैं, ये दो आयोजन दुनिया भर से लाखों तीर्थयात्रियों को आकर्षित करते हैं। जबकि दोनों त्योहारों का गहरा धार्मिक महत्व और खगोलीय संबंध है, लेकिन कुछ मुख्य अंतर उन्हें अलग करते हैं। What is Kumbh Mela कुंभ मेला क्या है? के जे सोमैया धर्म अध्ययन संस्थान की एसोसिएट प्रोफेसर और प्रभारी निदेशक डॉ पल्लवी जांभले के अनुसार, कुंभ मेला हर चार साल में मनाया जाने वाला एक सामूहिक हिंदू तीर्थयात्रा है, जो भारत में चार पवित्र स्थानों के बीच घूमता है: प्रयागराज Prayagraj (इलाहाबाद): गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदियों का संगम।हरिद्वार Haridwar : गंगा के किनारे।उज्जैन Ujjain : शिप्रा नदी के किनारे।नासिक Nashik : गोदावरी नदी पर।मेले का समय बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा के विशिष्ट ग्रहों के संरेखण द्वारा निर्धारित होता है। इस अवधि के दौरान, यह माना जाता है कि इन स्थानों पर नदियाँ दिव्य अमृत से भर जाती हैं, जिससे तीर्थयात्रियों को अपने पापों को धोने और मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने का मौका मिलता है। What is Kumbh Mela महाकुंभ मेला क्या है? महाकुंभ मेला MahaKumbh Mela, जिसे अक्सर “भव्य कुंभ” कहा जाता है, प्रयागराज में नियमित कुंभ के समान ही हर 12 साल में होता है। 2025 में होने वाला महाकुंभ विशेष रूप से खास है क्योंकि यह 144 वर्षों में एक बार होने वाले खगोलीय विन्यासों के साथ संरेखित होता है, जो इसे भक्तों और आध्यात्मिक साधकों के लिए एक असाधारण आयोजन बनाता है। प्रोफेसर जांभले ने कहा कि यह अनूठा संगम आगामी महाकुंभ को असाधारण रूप से शक्तिशाली, शुभ और पवित्र बनाता है। नियमित कुंभ मेले के विपरीत, महाकुंभ भक्तों, साधुओं और आध्यात्मिक नेताओं की एक बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है, जो इसे पृथ्वी पर सबसे बड़ी मानव सभाओं में से एक बनाता है। Mahakumbh v/s Kumbh mela:कुंभ या महाकुंभ का मुख्य अनुष्ठान स्नान (अनुष्ठान स्नान) है, जो शुद्धिकरण या शुद्धिकरण का प्रतीक है। प्रोफेसर जम्भाले के अनुसार, यह कार्य मुक्ति प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना जाता है। महाकुंभ, विशेष रूप से, ईश्वर के साथ एक ब्रह्मांडीय-स्तरीय संबंध प्रदान करने वाला माना जाता है, जो इसे आध्यात्मिक नवीनीकरण के लिए एक असाधारण अवसर बनाता है। ये आयोजन इतने खास क्यों हैं?खगोलीय संरेखणदोनों त्यौहार “समुद्र मंथन” (समुद्र मंथन) की पौराणिक कहानी पर आधारित हैं, जहाँ देवताओं और राक्षसों ने अमृत कलश (कुंभ) के लिए युद्ध किया था। माना जाता है कि इस अमृत की बूँदें चार पवित्र स्थलों पर गिरी थीं, जो उनकी पवित्रता को दर्शाती हैं।आध्यात्मिक शुद्धिमेले के दौरान नदियों में स्नान करना एक आध्यात्मिक कार्य माना जाता है जो आत्मा को शुद्ध करता है, नकारात्मक कर्मों को दूर करता है और मुक्ति का मार्ग खोलता है।वैश्विक मान्यताकुंभ और महाकुंभ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं; वे सांस्कृतिक और सामाजिक घटनाएँ हैं जो भारतीय विरासत की जीवंतता को प्रदर्शित करती हैं। यूनेस्को ने कुंभ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है।

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Maha Kumbh Mela 2025 :महाकुंभ मेला 2025 अखाड़े कितने महत्वपूर्ण हैं और वे अमृत स्नान कैसे कराते हैं? जानिए

Maha Kumbh Mela 2025:अमृत ​​स्नान के दौरान अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर का रथ समूह का नेतृत्व करता है। उनके पीछे महामंडलेश्वर (दशनामी संप्रदाय में हिंदू साधुओं को दी जाने वाली उपाधि), श्री महंत, महंत, कोतवाल और थानापति तथा अखाड़ों के अन्य पदाधिकारी अपने पद और स्थिति के अनुसार क्रम से चलते हैं। महाकुंभ 2025 में मंगलवार को मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर पहला ‘अमृत स्नान‘ हुआ, जब महानिर्वाणी पंचवटी के साधुओं ने त्रिवेणी संगम – गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर पवित्र अमृत स्नान किया। कुल 13 वैद्यवै हैं, जिनमें तीन वैयक्तिक नाम शामिल हैं- संती (शैव), बैरागी (कृष्णव) और नाथ। शैव अखाड़ों में शामिल हैं – महानिर्वाणी, अटल, निरंजनी, आनंद, भैरव, आह्वान और अग्नि; वैरागी अखाड़े – निर्मोही, दिगंबर अनी और निर्वाणी अनी, दो उदासीन अखाड़े (नया और बड़ा) और निर्मला अखाड़ा। आइए अखाड़ों, उनकी संगठनात्मक संरचना, ऐतिहासिक महत्व और कुंभ मेले के दौरान प्रमुख भूमिकाओं को समझें। अखाड़े कुंभ मेले के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ वे आवश्यक अनुष्ठान करते हैं और ‘अमृत स्नान’ जैसे पवित्र आयोजन में योगदान देते हैं। सदियों से, अखाड़ों ने हिंदू परंपराओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और मंदिरों और पवित्र स्थलों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 8वीं शताब्दी से, विभिन्न ‘अखाड़ों’ के साधु (भिक्षु) अमृत स्नान करने के लिए प्रयागराज में एकत्रित होते थे। 9वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक, यह अखाड़े ही थे, जिन्होंने महीने भर चलने वाले कुंभ उत्सव का आयोजन किया और अमृत स्नान आदेश तय किया, जो बाद में विवाद का विषय बन गया। लेकिन अब अमृत स्नान आदेश को संस्थागत बना दिया गया है, हालाँकि अखाड़ों का अभी भी ऊपरी हाथ है। अखाड़ों की संगठनात्मक संरचनाअखाड़ों का नेतृत्व आम तौर पर एक महंत या आचार्य करते हैं, जो आध्यात्मिक और प्रशासनिक दोनों जिम्मेदारियों की देखरेख करते हैं। एक अखाड़े के भीतर, महामंडलेश्वर (उच्च श्रेणी के भिक्षु) सहित विभिन्न भूमिकाएँ और पद होते हैं, जिनके पास महत्वपूर्ण प्रभाव और अधिकार होते हैं। इन अखाड़ों में प्रशिक्षण कठोर होता है, जिसमें आध्यात्मिक अभ्यास, ध्यान, शास्त्रों का अध्ययन और पारंपरिक भारतीय कुश्ती और मार्शल आर्ट जैसे शारीरिक व्यायाम शामिल होते हैं। इन संस्थानों में अपनाए जाने वाले अनुशासन से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की महारत हासिल होती है, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना होता है। हिंदू धर्म में अखाड़ों का महत्व Maha Kumbh Mela:अखाड़ों का हिंदू धर्म में कई कारणों से बहुत महत्व है परंपरा का संरक्षण: अखाड़े प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं, अनुष्ठानों और शिक्षाओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे पवित्र ग्रंथों, भजनों और प्रथाओं के ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बनाए रखते हैं और प्रसारित करते हैं। आध्यात्मिक प्रशिक्षण: ये संस्थान आध्यात्मिक साधकों को गहन प्रशिक्षण से गुजरने, अनुशासन, भक्ति और आत्म-साक्षात्कार को बढ़ावा देने के लिए एक संरचित वातावरण प्रदान करते हैं। सदस्यों द्वारा अपनाई गई कठोर जीवनशैली का उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना है। सांस्कृतिक संरक्षक: अखाड़े प्रमुख धार्मिक आयोजनों, त्योहारों और तीर्थयात्राओं में भाग लेकर हिंदू समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने में योगदान देते हैं। कुंभ मेले जैसे आयोजनों में उनकी उपस्थिति सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नेताओं के रूप में उनकी भूमिका को रेखांकित करती है। मार्शल विरासत: ऐतिहासिक रूप से, अखाड़े मार्शल प्रशिक्षण से जुड़े रहे हैं, जो अपने सदस्यों को आस्था की रक्षा करने और पवित्र स्थलों की रक्षा करने के लिए तैयार करते हैं। यह मार्शल विरासत अभी भी कुछ अखाड़ों में स्पष्ट है, विशेष रूप से नागा साधुओं में – जो अपने योद्धा जैसी उपस्थिति के लिए जाने जाते हैं। सामाजिक प्रभाव: अखाड़े सामाजिक और धर्मार्थ गतिविधियों में भी संलग्न हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और ज़रूरतमंदों को सहायता प्रदान करते हैं। महत्वपूर्ण अखाड़े और महाकुंभ में उनकी भूमिका ‘अमृत स्नान’ में 13 अखाड़े (हिंदू मठवासी आदेश) भाग लेते हैं, जिनमें से प्रत्येक अपने अनुष्ठान स्नान के लिए एक पारंपरिक क्रम और निर्दिष्ट समय का पालन करता है। यह आयोजन सावधानीपूर्वक आयोजित किया जाता है, जिसमें प्रशासन स्थापित रीति-रिवाजों का सुचारू रूप से पालन सुनिश्चित करने के लिए कार्यक्रमों का समन्वय करता है। महाकुंभ में कुछ प्रमुख अखाड़ों और उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को नीचे सूचीबद्ध किया गया है। जूना अखाड़ा: यह 13 अखाड़ों में सबसे बड़ा है। जूना अखाड़ा आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शैव धर्म के दशनामी संप्रदाय का पालन करता है, और वे भगवान दत्तात्रेय की पूजा करते हैं। किन्नर अखाड़ा (ट्रांसजेंडर अखाड़ा) भी जूना अखाड़े का हिस्सा है। जूना अखाड़े के अनुयायी मुख्य रूप से शैव हैं, जो भगवान शिव को समर्पित हैं, और उनमें कई नागा शामिल हैं। जूना अखाड़ा कुंभ Maha Kumbh मेले में एक प्रमुख भूमिका निभाता है, जहाँ इसके साधु (पवित्र पुरुष) अपनी तपस्या और तप के लिए जाने जाते हैं। अखाड़े में आध्यात्मिक और मार्शल प्रशिक्षण की समृद्ध परंपरा है, जो अपने सदस्यों को आस्था की रक्षा करने और सनातन धर्म के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए तैयार करती है। इसके प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद हैं। निरंजनी अखाड़ा: दूसरे सबसे बड़े अखाड़े के रूप में, श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा की स्थापना 904 ईस्वी में गुजरात में हुई थी। इस संस्था के भक्त मुख्य रूप से कार्तिकेय की पूजा करते हैं। यह कई उच्च शिक्षित सदस्यों का घर है, जिनमें डॉक्टरेट और स्नातकोत्तर डिग्री वाले व्यक्ति शामिल हैं, जो आध्यात्मिक और शैक्षणिक दोनों तरह की गतिविधियों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। इसके प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंदजी महाराज हैं। महानिर्वाणी अखाड़ा (प्रयागराज): श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े में, मुख्य देवता ऋषि कपिलमुनि हैं, जो अपने गहन ज्ञान और आध्यात्मिक शिक्षाओं के लिए पूजनीय हैं। भक्त भैरव प्रकाश भला और सूर्य प्रकाश भला जैसे पवित्र प्रतीकों की भी पूजा करते हैं, जो दिव्य सुरक्षा और ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस अखाड़े की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत और प्रतीकात्मक प्रथाएँ धार्मिक समुदाय के भीतर इसकी प्रतिष्ठित स्थिति में योगदान करती हैं। इसके प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद हैं। किन्नर अखाड़ा: ट्रांसजेंडर अखाड़ा एक अनूठा और समावेशी आध्यात्मिक समुदाय है जो कुंभ मेले की पवित्र सभाओं और अनुष्ठानों में भाग लेता है। जबकि पारंपरिक अखाड़ों में मुख्य रूप से पुरुष होते हैं, किन्नर अखाड़ा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी भक्ति और आध्यात्मिकता व्यक्त करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

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Mahakumbh 2025 Shahi Snan Date: देश का सबसे बड़ा धार्मिक मेला महाकुंभ आज से शुरू, जानें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और सही नियम

Mahakumbh 2025 Shahi Snan Shubh Muhurat: प्रयागराज में महाकुंभ की शुरुआत के साथ पहला शाही स्नान किया जाएगा. इस मेले में देश विदेश से भारी संख्या में लोग शमिल होने वाले हैं. आइए जानते हैं महाकुंभ के पहले शाही स्नान के शुभ मुहूर्त और नियम के बारे में. Mahakumbh 2025: प्रयागराज में आज से महाकुंभ की शुरुआत हो गई है. हिंदू धर्म में प्रयागराज में आयोजित होने वाले महाकुंभ का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण है. यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम होता है, जिसे ‘त्रिवेणी संगम’ कहा जाता है. महाकुंभ का आयोजन भारत में चार जगहों प्रयागराज, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में होता है. इन पवित्र स्थलों पर होने वाले महापर्व का साधु-संतों और श्रद्धालुओं को बेसब्री से इंतजार होता है. कहते हैं कि महाकुंभ में त्रिवेणी घाट पर स्नान करने से व्यक्ति को जीवन के समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है, जिससे आत्मा और शरीर दोनों ही शुद्ध हो जाता है. इसके साथ ही बता दें कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शाही स्नान का नाम बदलकर अमृत स्नान और नगर प्रवेश कर दिया है. पहले शाही स्नान का शुभ मुहूर्त| Mahakumbh 2025 Shahi Snan Shubh muhurat महाकुंभ का पहला स्नान पौष पूर्णिमा तिथि को होगा. वैदिक पंचांग के अनुसार, पौष माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत सोमवार, 13 जनवरी को सुबह 5 बजकर 3 मिनट पर होगी. वहीं तिथि का समापन 14 जनवरी को रात 3 बजकर 56 मिनट पर होगा. वहीं शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं- ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 5 बजकर 27 मिनट से लेकर 6 बजकर 21 मिनट तक रहेगा. विजय मुहूर्त- दोपहर 2 बजकर 15 मिनट से लेकर 2 बजकर 57 मिनट तक रहेगा गोधूलि मुहूर्त- शाम 5 बजकर 42 से लेकर 6 बजकर 09 तक रहेगा निशिता मुहूर्त- रात 12 बजकर 03 से लेकर 12 बजकर 57 तक रहेगा शाही स्नान की अन्य तिथियां |Mahakumbh 2025 Shahi Snan Dates प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ मे आज पहला शाही स्नान होगा. इसके बाद अन्य शाही स्नान की तिथियां कुछ इस प्रकार हैं- शाही स्नान का नियम |Mahakumbh 2025 Shahi Snan Niyam महाकुंभ में शाही स्नान के कुछ खास नियमों का पालन किया जाता है. महाकुंभ में सबसे पहले नागा साधु स्नान करते हैं. नागा साधुओं को स्नान करने की प्राथमिकता सदियों से चली आ रही है. इसके पीछे एक धार्मिक मान्यता है. इसके अलावा गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों के लिए महाकुंभ में स्नान के नियम कुछ अलग हैं. गृहस्थ लोगों नागा साधुओं बाद ही संगम में स्नान करना चाहिए. स्नान करते समय 5 डुबकी जरूर लगाएं, तभी स्नान पूरा माना जाता है. स्नान के समय साबुन या शैंपू का इस्तेमाल न करें. क्योंकि इसे पवित्र जल को अशुद्ध करने वाला माना जाता है. यहां जरूर करें दर्शन महाकुंभ में शाही स्नान-दान के बाद बड़े हनुमान और नागवासुकि का दर्शन जरूर करना चाहिए. मान्यता है कि शाही स्नान के बाद इन दोनों में से किसी एक मंदिर के दर्शन करने से महाकुंभ की धार्मिक यात्रा अधूरी मानी जाती है. महाकुंभ पर 144 साल बनेगा ये शुभ संयोग इस बार का महाकुंभ बहुत खास है क्योंकि ज्योतिष की मानें तो 144 साल बाद ऐसा संयोग बन रहा है। समुद्र मंथन के समय सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की जो स्थिति थी, वही इस बार भी बन रही है। इसके साथ ही इस बार रवि योग और भद्रावास योग भी बन रहे हैं। इन योगों में पूजा-पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है। Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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साध्वी कैसे बनती हैं? – वेदों के प्रमाण सहित विस्तृत जानकारी

साध्वी बनने का अर्थ है अपने जीवन को धर्म, तपस्या और अध्यात्म के मार्ग पर समर्पित करना। भारतीय संस्कृति और वेदों में साध्वी बनने की प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है, जिसमें संकल्प, दीक्षा, ब्रह्मचर्य पालन और संन्यास ग्रहण जैसी आवश्यक विधियाँ शामिल हैं। आइए, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करें। 1. साध्वी बनने का संकल्प (Sankalp) साध्वी बनने के लिए सबसे पहले संकल्प लिया जाता है। यह संकल्प एक दृढ़ निश्चय होता है कि व्यक्ति अपने जीवन को तपस्या और सेवा में समर्पित करेगा। वेदिक प्रमाण: यजुर्वेद 40.1 में उल्लेख है – “ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।” इसका अर्थ है कि पूरे जगत में ईश्वर का वास है, और त्याग का मार्ग अपनाकर ईश्वर की सेवा में जीवन समर्पित करना चाहिए। 2. दीक्षा (Diksha) दीक्षा का अर्थ है गुरु द्वारा दिए गए धार्मिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन को स्वीकार करना। साध्वी बनने के लिए दीक्षा अनिवार्य है, जिसमें गुरु व्यक्ति को साध्वी जीवन के नियम और अनुशासन सिखाते हैं। वेदिक प्रमाण: तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है, “शिक्षा और दीक्षा के द्वारा ही व्यक्ति अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त करता है।” यह प्रक्रिया साध्वी बनने के मार्ग में महत्वपूर्ण होती है। 3. ब्रह्मचर्य पालन (Brahmacharya Palan) साध्वी बनने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक होता है। इसका मतलब है कि व्यक्ति शारीरिक और मानसिक शुद्धता का पालन करता है, जिसमें सांसारिक इच्छाओं से दूर रहना शामिल है। वेदिक प्रमाण: मनुस्मृति 6.1-2 में उल्लेख है, “ब्रह्मचर्येण तपसा…” इसका अर्थ है कि ब्रह्मचर्य और तपस्या के माध्यम से ही व्यक्ति साध्वी जीवन को प्राप्त करता है। 4. संन्यास ग्रहण (Sannyas Grahan) साध्वी बनने की अंतिम और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है संन्यास ग्रहण करना। इसमें व्यक्ति संसार के बंधनों से मुक्त होकर पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है। वेदिक प्रमाण: भगवद गीता 6.1 में कहा गया है, “अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः”। इसका अर्थ है कि जो बिना फल की इच्छा के कर्म करता है, वही सच्चा सन्यासी है। 5. धार्मिक अनुष्ठान और सेवा (Dharmik Anushthan aur Seva) साध्वी बनने के बाद व्यक्ति को धार्मिक अनुष्ठानों और समाज सेवा में संलग्न रहना होता है। यह सेवा समाज के कल्याण के लिए होती है और इसके माध्यम से व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है। वेदिक प्रमाण: ऋग्वेद 10.117.6 में कहा गया है, “न स धनं विन्दते यस्त्यजि: सन्”। इसका अर्थ है कि जो दूसरों की सेवा करता है, वही सच्चा धन प्राप्त करता है। निष्कर्ष साध्वी बनने की प्रक्रिया एक गहन तपस्या और समर्पण का कार्य है। वेदों में बताए गए मार्ग का अनुसरण कर व्यक्ति अपने जीवन को धर्म, तपस्या और सेवा के माध्यम से सार्थक बना सकता है। यह मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन इसका आध्यात्मिक लाभ अनंत है। यदि आप साध्वी बनने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहते हैं, तो इन वेदिक सिद्धांतों और प्रक्रियाओं का पालन अवश्य करें।

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मकर संक्रांति पर पहला स्नान… कौन अखाड़ा पहले और कौन आखिर में लगाएगा डुबकी, टाइमिंग जानिए

Mahakumbh Amrit Snan Akhada Snan Timing: महाकुंभ 2025 का आगाज पौष पूर्णिमा पर शाही स्नान के साथ हो गया। इस महाकुंभ में छह शाही स्नान हैं। इसमें से तीन अमृत स्नान होंगे। पहला अमृत स्नान मकर संक्रांति के मौके पर मंगलवार 14 जनवरी को होगा। इसके अलावा मौनी अमावस्या पर 29 जनवरी और बसंत पंचमी पर 3 फरवरी अन्य दो अमृत स्नान होंगे। प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज prayagraj में भक्तों का सैलाब संगम तट पर उमड़ पड़ा है। पौष पूर्णिमा के मौके पर पहला शाही स्नान पर्व का आयोजन हुआ। सुबह से लोगों की भीड़ संगम तट पर उमड़ पड़ी। एक करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने पहले शाही स्नान के दौरान संगम में डुबकी लगाई। पौष पूर्णिमा के साथ ही ही संगम तट पर 45 दिनों के कल्पवास की शुरुआत हो गई है। इसको लेकर देश-दुनिया से लोग संगम नगरी पहुंचे हैं। वहीं, सभी 13 अखाड़ों का डेरा संगम तट पर जम गया है। महाकुंभ के सबसे बड़े आकर्षण अखाड़ों के अमृत स्नान का कार्यक्रम मंगलवार सुबह से होगा। प्रयागराज मेला प्राधिकरण की ओर से अखाड़ों के अमृत स्नान का समय और क्रम जारी कर दिया है। अमृत स्नान पर्व पर सबसे पहले महानिर्वाणी और अटल अखाड़े के संत-महंत और महामंडलेश्वर अमृत स्नान करेंगे। परंपरागत तरीके से सबसे पहले सातों संन्यासी, इसके बाद तीनों वैरागी और सबसे अंत में तीनों उदासीन अखाड़ों का अमृत स्नान होगा। रविवार को इस संबंध में अखाड़ों से चर्चा और विमर्श के बाद अमृत स्नान पर्व की समय सीमा का निर्धारण किया गया है। अमृत स्नान के लिए अखाड़ों के संत सुबह 5:15 बजे से अपने अखाड़ों से निकलना शुरू होंगे। 30 मिनट से एक घंटे का समय मेला प्राधिकरण की ओर से अमृत स्नान के दौरान अखाड़ों को 30 मिनट से एक घंटे का समय आवंटित किया गया है। अखाड़ों के स्नान के दौरान सड़कों को खाली रखा जाएगा। इसको लेकर प्रशासनिक तैयारियां पहले से पूरी कराई जा चुकी हैं। सबसे पहले श्री पंचायत अखाड़ा महानिर्वाणी एवं श्री शंभू पंचायती अटल अखाड़ा के संत स्नान के लिए निकलेंगे। सबसे आखिर में निर्मल अखाड़े के संत पुण्य संगम की डुबकी लगाएंगे। अखाड़ों के अमृत स्नान की समय सारिणी अखाड़ों का नाम शिविर से प्रस्थान घाट पर आगमन स्नान का समय घाट से प्रस्थान श्री पंचायत अखाड़ा महानिर्वाणी एवंश्री शंभू पंचायती अटल अखाड़ा 5:15 बजे 6:15 बजे 40 मिनट 6:55 बजे श्री तपोनिधि पंचायती श्री निरंजनी अखाड़ाएवं श्री पंचायती अखाड़ा आनंद 6:05 बजे 7:05 बजे 40 मिनट 7:45 बजे श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा, श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ाएवं श्री पंच अग्नि अखाड़ा 7:00 बजे 8:00 बजे 40 मिनट 8:40 बजे अखिल भारतीय श्री पंच निर्मोही अखाड़ा 9:40 बजे 10:40 बजे 30 मिनट 11:10 बजे अखिल भारतीय श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़ा 10:20 बजे 11:20 बजे 50 मिनट 12:10 बजे अखिल भारतीय श्री पंच निर्वाणी अखाड़ा 11:20 बजे 12:20 बजे 30 मिनट 12:50 बजे श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा 12:15 बजे 13:15 बजे 55 मिनट 14:10 बजे श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन निर्वाण 13:20 बजे 14:20 बजे 60 मिनट 15:20बजे श्री पंचायत निर्मल अखाड़ा 14:40 बजे 15:40 बजे 40 मिनट 16:20 बजे अखाड़ों के संत सुबह 5.15 बजे से बैंडबाजा, डीजे के साथ रथों पर सवार होकर स्नान के लिए निकलेंगे। अमृत स्नान के लिए निकलने वाली यात्रा में संतों के शिष्य और अनुयायी चंवर, छत्र, दंड लिए पुष्पवर्षा करते हुए साथ-साथ चलेंगे। कुंभ मेलाधिकारी विजय किरन आनंद ने अखाड़ों से अनुरोध किया है कि उनके साथ स्नान के लिए जाने वाले खालसों, महामंडलेश्वरों, आचार्य महामंडलेश्वर की संख्या मेला प्रशासन को भेज गई सूची के अनुसार ही सीमित रखें। अखाड़ों के लिए रूट मैप जारी अमृत स्नान के साथ जाने वाले रथों एवं वाहनों की संख्या मेला पुलिस की ओर से जारी पास के अनुसार रखी जाएगी। त्रिवेणी मार्ग सेक्टर-20 से पीपा पुल संख्या-6 त्रिवेणी दक्षिणी और पीपा पुल संख्या-7 त्रिवेणी मध्य के जरिए गंगा पार कर संगम क्षेत्र (सेक्टर-3) में अमृत स्नान के लिए अखाड़ों का आगमन होगा। त्रिवेणी मार्ग और अखाड़ा मार्ग क्रॉसिंग से बाएं मुड़कर निर्धारित संगम घाट पर स्नान की व्यवस्था की गई है। संगम क्षेत्र में अखाड़ों के वाहनों के लिए पार्किंग की व्यवस्था भी की गई है। संगम में स्नान के बाद अखाड़ों के संत और अनुयायी सेक्टर तीन अखाड़ा वापसी मार्ग से दाहिने मुड़कर पीपा पुल संख्या-3 महावीर दक्षिण और पीपा पुल संख्या-4 महावीर उत्तरी से गंगा पार कर सेक्टर-20 में प्रवेश करेंगे। पीपा पुल से महावीर मार्ग, महावीर संगम लोवर और उसके बाद महावीर संगम लोवर मार्ग क्रॉसिंग से बाएं (उत्तर मुड़कर) अखाड़ा वापसी मार्ग से होकर अपने-अपने शिविर में जाएंगे। संन्यासी अखाड़े काली मार्ग से होकर अपने शिविर में प्रवेश करेंगे।

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