Gudi Padwa 2025: कब है गुड़ी पड़वा? क्यों खास है ये पर्व ? जानिए इससे जुड़े रोचक तथ्य

Gudi Padwa 2025: गुड़ी पड़वा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, जिसमें धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सभी पहलु जुड़े हुए हैं।ह दिन न केवल महाराष्ट्र में रह रहे लोगों के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक नई शुरुआत, खुशी और समृद्धि के आगमन का संदेश लेकर आता है। Gudi Padwa 2025:गुड़ी पड़वा का महत्व गुड़ी पड़वा Gudi Padwa 2025 हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान रखता है। ऐसा माना जाता है कि गुड़ी को घर पर फहराने से घर से नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं और जीवन में सौभाग्य और समृद्धि आती है। यह दिन वसंत की शुरुआत का भी प्रतीक है और इसे फसल उत्सव के रूप में माना जाता है। कई अन्य राज्यों में इस पर्व को संवत्सर पड़वो, उगादि, चेती, नवारेह, साजिबु नोंगमा पानबा चीरोबा आदि नामों से जाना जाता है। कई लोगों का मानना ​​है कि इस दिन सोना या नई कार खरीदना शुभ होता है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाने वाला गुड़ी पड़वा भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो खासतौर पर महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा वसंत ऋतु का त्यौहार है Gudi Padwa 2025 जो मराठी हिंदुओं के लिए पारंपरिक नए साल का प्रतीक है। यह चैत्र महीने (मार्च-अप्रैल) के पहले दिन चंद्र-सौर हिंदू कैलेंडर के अनुसार नए साल की शुरुआत को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है। यह त्योहार रंगोली, एक विशेष गुड़ी ध्वज (फूलों, आम और नीम के पत्तों की माला, ऊपर से उलटे हुए मुकुट) के साथ मनाया जाता है। यह पर्व न केवल हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, बल्कि इसमें कई सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी छिपा हुआ है।  Gudi Padwa 2025:गुड़ी पड़वा 2025: तिथि और मुहूर्त गुड़ी पड़वा 30 मार्च 2025, रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन को खास बनाती है इसकी तिथि, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक नए साल की शुरुआत होती है। यह दिन न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी बेहद अहम है, क्योंकि यह मराठी नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है।वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 29 मार्च को सायं  04 बजकर 27 मिनट पर होगी और 30 मार्च को दोपहर 12 बजकर 49 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि गणना अनुसार 30 मार्च को गुड़ी पड़वा मनाया जाएगा। इस दिन से चैत्र नवरात्र भी प्रारंभ होगा। Gudi Padwa 2025 गुड़ी पड़वा की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता गुड़ी पड़वा के दिन के साथ जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ हैं। इनमें से एक प्रमुख कथा है छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ी, जो इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाने का कारण बनती है। कहा जाता है कि इसी दिन शिवाजी महाराज ने विदेशी घुसपैठियों को पराजित कर विजय प्राप्त की थी। विजय के प्रतीक स्वरूप उन्होंने विजय ध्वज फहराया, जो गुड़ी पड़वा के दिन की परंपरा बन गई। क्यों मनाया जाता है गुड़ी पड़वा? Gudi Padwa 2025:गुड़ी पड़वा का महत्व न केवल धार्मिक रूप से है, बल्कि यह जीवन के हर पहलु में शुभता और समृद्धि की प्रतीक भी है। इस दिन घरों में पताका (झंडा) फहराया जाता है, जो यह दर्शाता है कि इस घर में समृद्धि और सुख का आगमन होने वाला है। इस दिन से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है, जिसमें देवी भगवती की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान ब्रह्मा की पूजा करना भी विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वह सृष्टि के रचयिता माने जाते हैं।इस दिन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, और लोग इस दिन को हर्षोल्लास, परिवार के साथ समय बिताने और नए साल के साथ जीवन में नई ऊर्जा और आशा लेकर मनाते हैं। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है।

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Vinayak Chaturthi 2025: विनायक चतुर्थी व्रत की जनवरी से दिसंबर की लिस्ट, देखें गणेश उत्सव कब होगा शुरू

Vinayak Chaturthi 2025:गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार हर महीने दो चतुर्थी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हर महीने पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। सभी देवताओं में गणेश जी का स्थान सर्वोपरि है। गणेश जी को सभी परेशानियों और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। भगवान गणेश की नियमित पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। Vinayak Chaturthi 2025: गणेश जी बुद्धि और विद्या के देवता हैं, Vinayak Chaturthi 2025 इनकी कृपा से व्यक्ति सुख, समृद्धि और ज्ञान पाता है. गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए विनायक चतुर्थी व्रत करना फलदायी माना गया है. Vinayak Chaturthi 2025: विनायकी चतुर्थी के दिन श्रद्वालू अपने बुरे समय व जीवन की कठिनाईओं को दूर करने के लिए भगवान गणेश की पूजा करते हैं. माना जाता है कि Vinayak Chaturthi 2025 विनायक चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त होता है और साधक के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है. अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है.इस दिन लोग सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक व्रत करते हैं. शाम को गणेशजी के वरद Vinayak Chaturthi 2025 विनायक रुप की पूजा करने के बाद व्रत खोला जाता है.आज नए साल की पहली विनायक चतुर्थी है. आइए जानते हैं साल 2025 में विनायक चतुर्थी कब-कब है. Shri Ganesh Shendur Laal Chadhayo Aarti:श्री गणेश – शेंदुर लाल चढ़ायो आरती विनायक चतुर्थी 2025 लिस्ट (Vinayak Chaturthi 2025 List) 3 जनवरी 2025 – पौष विनायक चतुर्थी 1 फरवरी 2025 – माघ विनायक चतुर्थी (गणेश जयंती) 3 मार्च 2025 – फाल्गुन विनायक चतुर्थी 1 अप्रैल 2025 – चैत्र विनायक चतुर्थी 1 मई 2025 – वैशाख विनायक चतुर्थी 30 मई 2025 – ज्येष्ठ विनायक चतुर्थी 28 जून 2025 – आषाढ़ विनायक चतुर्थी 28 जुलाई 2025 – सावन विनायक चतुर्थी 27 अगस्त 2025 – भाद्रपद विनायक चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) 25 सितंबर 2025 – अश्विन विनायक चतुर्थी 25 अक्टूबर 2025 – कार्तिक विनायक चतुर्थी 24 नवंबर 2025 – मार्गशीर्ष विनायक चतुर्थी 24 दिसंबर 2025 – पौष विनायक चतुर्थी Vinayak Chaturthi 2025:विनायक चतुर्थी व्रत क्यों महत्वपूर्ण है गणपति की कृपा से उसे बल-बुद्धि, सुख-सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है. Vinayak Chaturthi 2025 गणपति की कृपा से उसके सारे काम सिद्ध होते हैं. इसके अलावा घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और जीवन में आने वाली परेशानियों से छुटकारा मिलता है. विनायक चतुर्थी गणपति के विनायक रूप को समर्पित है. इस दिन व्रत पूजन करने से उनका आशीर्वाद मिलता है. गणेश शुभ लाभ मंत्र (Ganesha Shubh Labh Mantra) Vinayak Chaturthi 2025:विनायक चतुर्थी पर व्रत पूजा की विधि Vinayak Chaturthi 2025 Puja Mantra गणपति पूजा मंत्र प्रातर्नमामि चतुराननवन्द्यमानमिच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम्। तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं पुत्रं विलासचतुरं शिवयो: शिवाय।। प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्तशोकदावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम्। अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाहमुत्साहवर्धनमहं सुतमीश्वरस्य।। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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राम जनार्दन मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

भगवान श्रीराम वनवासी स्वरूप में हैं विराजमान राम जनार्दन मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में बना हुआ है। अंकपात क्षेत्र में स्थित राम जनार्दन मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था। इसमें श्री राम और जनार्दन (विष्णु) का मंदिर हैं। इसमें भगवान के वनवासी स्वरूप के दर्शन होते हैं। भगवान की दाड़ी-मूछ है और माता सीता के हाथ में पौधों को पानी देने वाली झारी और दूसरे हाथ में चवर दिखाई देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह स्थान एक प्राचीन मंदिर स्थल रहा है क्योंकि यहां स्थापित कई प्रतिमाएं दसवीं और बारहवीं शताब्दी की हैं। इससे इस स्थल को परमारों के काल का माना जाना चाहिए। मंदिर का इतिहास राम जनार्दन मंदिर का निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था, मंदिर का रथाकार निर्माण आकर्षक है। अठारहवीं शताब्दी में मराठा राजाओं ने मंदिरों में कुछ संरचनाएं जोड़ीं। मंदिरों की दीवारों पर लगी भव्य तस्वीरें मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं। इन शानदार मंदिरों में कुछ अद्भुत मूर्तियां भी हैं जो 11वीं और 12वीं शताब्दी की हैं। गोवर्धनधारी कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की छवि उनकी स्थापत्य भव्यता और मूर्तिकला उत्कृष्टता के लिए बहुत प्रभावशाली हैं। मंदिर का महत्व राम जनार्दन मंदिर में श्रीराम की सांवले रंग के पत्थर की प्रतिमा है। यह देश में दूसरा ऐसा मंदिर है जहां काले रंग में राम जी की मूर्ति है, एक प्रतिमा नासिक के राम मंदिर में है। – होल्कर राजवंश की महारानी अहिल्यादेवी ने राम जनार्दन मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। मंदिर की वास्तुकला मराठा शैली में राम और कृष्ण के जीवन के दृश्यों को दर्शाने वाली पेंटिंग हैं। यह मराठा कला का एक सुंदर उदाहरण है। मराठा शासन के दौरान ही उज्जैन पूना और कांगड़ा शैली के चित्रकारों का मिलन स्थल बन गया। चित्रकला की दो अलग-अलग शैलियों का प्रभाव विशिष्ट है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 06:30 AM संध्या आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद राम जनार्दन मंदिर में भक्त श्रद्धा के अनुसार दूध की बनी बर्फी, बूंदी के लड्डू चढ़ाते हैं। श्रद्धालु प्रभु को फल के साथ पूड़ी-खीर का भी भोग लगाते हैं।

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द्वारकाधीश गोपाल मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

चांदी लेपित संगमरमर से बनी भगवान कृष्ण की मूर्ति द्वारकाधीश गोपाल मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर उज्जैन का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। मुख्य मंदिर में चांदी लेपित संगमरमर से बनी भगवान कृष्ण की दो फुट ऊंची मूर्ति है। यहां जन्माष्टमी के अलावा ‘हरिहर का पर्व’ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरिहर के समय भगवान महाकाल की सवारी रात बारह बजे आती है, तब यहां हरिहर मिलन अर्थात् विष्णु और शिव का मिलन होता है। जहां पर उस वक्त डेढ़ दो घंटे पूजन चलता है। मंदिर का इतिहास पुराणों के अनुसार द्वारकाधीश गोपाल मंदिर लगभग दो सौ वर्ष पुराना है। इतिहासकारों की माने तो इस मंदिर का निर्माण दौलतराव सिंधिया की धर्मपत्नी बैजीबाई शिंदे ने 1844 में कराया था, जिसमें मूर्ति की स्थापना 1852 में की गई थी। मंदिर के आसपास विशाल प्रांगण में सिंहस्थ था जहां पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते हैं। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर का महत्व कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर जहां देश भर में भक्त कान्‍हा की भक्ति में डूब जाते हैं, वहीं द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में कान्‍हा के जन्‍म के बाद उनकी आरती नहीं उतारने की परंपरा है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म (जन्माष्टमी) के बाद रोज होने वाली शयन आरती पांच दिनों तक नहीं होती है। मंदिर में पांच दिनों तक कोई भजन पाठ नहीं होता है। क्‍योंकि यह परंपरा करीब 110 सालों से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि यहां जन्म के बाद कान्हा पांच दिनों तक सोते नहीं हैं। मंदिर की वास्तुकला द्वारकाधीश गोपाल मंदिर की वास्तुकला मराठा वास्तुकला का एक सुंदर उदाहरण है। गर्भगृह संगमरमर से जड़ा हुआ है और दरवाजे चांदी से मढ़े हुए हैं। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वती और गरुड़ भगवान की मूर्तियां हैं। ये मूर्तियां अचल है और एक कोने में रानी बैजीबाई की भी ‍मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में लगा रत्न जड़ित द्वार दौलतराव सिंधिया ने गजनी से प्राप्त किया था, जो सोमनाथ की लूट में वहां पहुंचा था। मंदिर के विशाल स्तम्भ और सुंदर नक्काशी देखने लायक हैं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 08:30 PM सुबह की आरती का समय 05:00 AM – 06:30 AM संध्या आरती का समय 08:00 PM – 08:30 PM मंदिर का प्रसाद द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में दूध, माखन आदि का नियमित भोग लगाया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार श्री कृष्ण को सूजी का हलवा और पंचामृत का भी भोग लगाते हैं।

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Papavimocani Ekadashi 2025:पापमोचनी एकादशी कब है? जानें डेट, पूजन व व्रत पारण मुहूर्त

Papavimocani Ekadashi 2025:हिंदू धर्म में हर महीने के कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को एकादशी व्रत रखा जाता है। जानें मार्च में पापमोचिनी एकादशी कब है- Papmochani ekadashi 2025 kab hai: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी व्रत रखा जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि पापमोचनी एकादशी व्रत करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी के दिन लक्ष्मीनारायण की भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और घर में सुख-समृद्धि व धन-धान्य का वास रहता है। जानें मार्च में पापमोचनी एकादशी व्रत कब है, पूजन मुहूर्त व व्रत पारण मुहूर्त पापमोचनी एकादशी कब है 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 25 मार्च 2025 को सुबह 05 बजकर 05 मिनट पर प्रारंभ होगी और 26 मार्च 2025 को सुबह 03 बजकर 45 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि में Papavimocani Ekadashi 2025 पापमोचनी एकादशी व्रत 25 मार्च 2025, मंगलवार को रखा जाएगा पापमोचनी एकादशी शुभ योग (Papmochani Ekadashi Shubh Yoga) Papavimocani Ekadashi 2025 चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर शिव और सिद्ध योग का संयोग बन रहा है। ज्योतिष शिव और सिद्ध योग को बेहद शुभ मानते हैं। इन योग में लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होगी। साथ ही शुभ काम में सफलता मिलेगी। साथ ही शिववास योग का भी संयोग बन रहा है। शिववास योग पूर्ण रात्रि तक है। इस दिन भगवान शिव कैलाश पर जगत की देवी मां पार्वती के साथ रहेंगे। पापमोचनी एकादशी 2025 पूजन मुहूर्त- ब्रह्म मुहूर्त- 04:45 ए एम से 05:32 ए एम अभिजित मुहूर्त- 12:03 पी एम से 12:52 पी एम विजय मुहूर्त- 02:30 पी एम से 03:19 पी एम गोधूलि मुहूर्त- 06:34 पी एम से 06:57 पी एम सायाह्न सन्ध्या- 06:35 पी एम से 07:45 पी एम अमृत काल- 05:41 पी एम से 07:15 पी एम Papavimocani Ekadashi 2025:पापमोचनी एकादशी पारण समय Papavimocani Ekadashi 2025 साधक 26 मार्च को दोपहर 01 बजकर 41 मिनट से लेकर शाम 04 बजकर 08 मिनट के मध्य व्रत खोल सकते हैं। इस दौरान साधक स्नान-ध्यान कर भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके पश्चात ब्राह्मणों को अन्न दान देकर व्रत खोलें। Papavimocani Ekadashi 2025 एकादशी व्रत नियम– हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। इस दिन वाद-विवाद से दूरी बनाकर रखें। एकादशी के दिन ज्यादा से ज्यादा भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिए। व्रत पारण के दिन सबसे पहले अनजाने में हुए पाप या गलतियों के लिए भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी से माफी मांगनी चाहिए।

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हरसिद्धि माता मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

51 शक्तिपीठों में 13वां शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर भारत के मध्य प्रदेश की धर्मिक नगरी उज्जैन में हरसिद्धि माता का मंदिर स्थित है। जो कि उज्जैन के क्षिप्रा नदी के रामघाट के पास भैरव पर्वत पर स्थित है, माँ हरसिद्धि का यह मंदिर शक्तिपीठों में से एक है। माता सती के 52 शक्तिपीठों में 13वां शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर है। इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी। मंदिर परिसर में 51 फीट ऊंचे 2 दीप स्तंभ स्थापित हैं। दोनों दीप स्तंभों में लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं। बताया जाता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी। मंदिर का इतिहास माता हरसिद्धि की साधना करने से सभी प्रकार की दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए हरसिद्धि माता को ‘मांगल-चाण्डिकी’ के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य जो अपनी बुद्धि, पराक्रम और उदारता के लिए जाने जाते हैं, हरसिद्धि माता मंदिर इन्हीं देवी की आराधना किया करते थे। इसलिए उन्हें भी हर प्रकार की दिव्य सिद्धियां प्राप्त हो गई थीं। हरसिद्धि माता मंदिर इसी कारण मांगल-चाण्डिकी देवी को हरसिद्धि अर्थात हर प्रकार की सिद्धि की देवी नाम दिया गया। विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार वर्ष पुराना है। इसलिए इस मंदिर को भी 2,000 वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर का महत्व पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा विक्रमादित्य देवी को प्रसन्न करने के लिए हर 12 साल में अपना शीश काटकर उन्हें बलि चढ़ा देते थे और बार-बार उनका मस्तक लौट आता था। 11 बार उन्होंने ऐसा किया लेकिन हर बार उनका सिर वापस उनके शरीर पर आ जाता। राजा विक्रमादित्य ने जब 12वीं बार अपना शीश माता को अर्पित किया तो वह वापस नहीं आया और यह मान लिया गया कि उनका शासन पूर्ण हो गया है। हालांकि जिस मुंड को राजा विक्रमादित्य का बताया जाता है वह देवी वैष्णवी है जिनकी पूजा अर्चना मंदिर के पुजारी करते हैं। मंदिर की वास्तुकला हरसिद्धि मंदिर की चारदीवारी के अंदर चार प्रवेश द्वार हैं। वहीं मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर है। द्वार पर सुंदर बंगले बने हुए हैं। बंगले के पास दक्षिण-पूर्व की और एक बावड़ी बनी हुई है, हरसिद्धि माता मंदिर जिसके अंदर एक स्तंभ है। यहां श्री यंत्र बना हुआ स्थान है। इसी स्थान के पीछे भगवती अन्नपूर्णा की सुंदर प्रतिमा है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 07:00 PM सुबह आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM संध्या आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद हरसिद्धि माता मंदिर में श्रद्धालु देवी को देशी घी के लड्डू का भोग लगाते हैं। वहीं भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार इलायची दाना और बर्फी भी माँ को चढ़ाते हैं और उन्हें प्रसन्न करते हैं।

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मनकामेश्वर मंदिर:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

मनकामेश्वर मंदिर उत्तर प्रदेश सरकार ने मनकामेश्वर मंदिर को एक ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया है। मनकामेश्वर मंदिर:त्रिवेणी संगम की नगरी प्रयागराज को सनातन धर्म का केंद्र कहा जाता है। यहां पर कई ऐसे पौराणिक और आध्यात्मिक स्थल मौजूद हैं जो इस नगरी की प्राचीनता और महत्वई को बताते हैं। मनकामेश्वर मंदिर यहां के अनेकों मंदिर रामायण काल और महाभारत काल से जुड़े हैं और इनका वर्णन धर्म ग्रंथों में मिलता है। ऐसा ही एक पौराणिक गंगा,यमुना और सरस्वती के संगम तट पर मौजूद बना है, जिसे मनकामेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। ये मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि यहां पर आने वाले भक्तों की भगवान शिव हर मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसलिए यहां पर देश के अलग-अलग राज्यों से लोग आते हैं और भोलेनाथ से मनोकामना मांगते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने मनकामेश्वर मंदिर को एक ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया है। मनकामेश्वर मंदिर का इतिहास मनकामेश्वर मंदिर का निर्माण 1542 ई. में हुआ था, इसका निर्माण राजपूत वंश के राजा मान सिंह प्रथम ने करवाया था। मनकामेश्वर मंदिर का जिक्र स्कंद पुराण और पदम पुराण में कामेश्वर पीठ के तौर पर मिलता है। ऐसा कहा जाता है मनकामेश्वर कि शिव जी कामदेव को भस्म करने के बाद यहां आकर लिंग के रूप में विराजमान हो गए थे। बताया जाता है कि त्रेता युग में भगवान श्री राम जब वनवास जा रहे थे तो प्रयागराज में अक्षयवट के नीचे अपने भाई लक्ष्मण और माता सीता के साथ रूके थे। यहां से आगे बढ़ने से पहले प्रभु राम ने मंदिर पहुंच कर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था और उन्होंने भगवान शिव से मार्ग में आने वाले बाधाओं से मुक्ति पाने की कामना भी की थी। 14 वर्ष के वनवास के बाद जब श्री राम वापस अयोध्या लौटने लगे तो पुनः यहां पर रुककर भोलेनाथ के दर्शन किये थे। मंदिर का महत्व मान्यता है कि मनकामेश्वर महादेव में 51 सोमवार पूजन अर्चन करने से जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। मनकामेश्वर मंदिर तंत्र साधना के लिए अलग पहचान है। मंदिर में श्री विद्या की तांत्रिक साधना की शिक्षा भी दी जाती है।ऐसा बताया जाता है कि ऐसा कई बार हुआ है, जब मंदिर परिसर में कोई न हो और वातावरण बिल्कुल शांत हो, उसके बाद भी भगवान शिव के जयकारे सुनाई देते हैं। उन्होंने कहा कि जब मनकामेश्वर भगवान की आरती के बाद सयन की अवस्था में होते हैं तब यहां आस-पास के दिव्य शक्तियां पहरा देती है। मंदिर की वास्तुकला मनकामेश्वर मंदिर का निर्माण हिंदू वास्तुकला के मानदंडों के अनुसार किया गया था और यह राजपूत वास्तुकला की भव्यता को दर्शाता है। मनकामेश्वर मंदिर अष्टकोणीय आकार का है और यह एक बड़े आयताकार प्रांगण से घिरा हुआ है। मंदिर के शीर्ष पर विशाल गुंबद बने हैं। मंदिर के गर्भ गृह में साढ़े तीन फुट का शिवलिंग विराजमान है, जिसे स्वयंभू शिवलिंग कहा जाता है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सुबह आरती का समय 04:30 AM – 05:30 AM मंदिर का प्रसाद मनकामेश्वर मंदिर में भगवान शिव को फल, दूध, दही लड्डू का भोग लगाया जाता है। साथ ही श्रद्धालु शिवलिंग पर बेलपत्र, भांग, धतूरा भी चढ़ाते हैं।

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Holi Dream Meaning: सपने में होली देखने और खेलने का क्या है मतलब, जानें आपके लिए शुभ या अशुभ

Holi Dream Meaning:सपने में आप कुछ भी कभी भी देख सकते हैं। ऐसी ही अगर आप सपने में खुद को होली खेलते देखते हैं तो स्वप्न शास्त्र में इसके अलग-अलग मतलब बताए गए हैं। आइए विस्तार से जानते हैं सपने में होली खेलने के क्या अलग अलग मतलब होते हैं। Sapne Mai Holi Dekhna: सपने हर मनुष्य को दिखाई देते हैं। हर सपने का कोई न कोई अर्थ जरुर होता है और स्वप्न शास्त्र में हर सपने का मतलब बताया गया है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने आपको भविष्य की घटनाओं को लेकर सचेत करते हैं। Holi Dream Meaning कई बार किसी त्योहार के आसपास भी व्यक्ति को उससे जुड़े सपने आने लगते हैं। जैसे अभी होली के पर्व पर कई लोगों को होली से जुड़े सपने आ रहे होंगे। तो आइए जानते हैं होली से संबंधित सपने शुभ होते है या अशुभ। ​सपने में होलिका दहन देखना अगर किसी व्यक्ति को सपने में होलिका दहन दिखाता है तो इस तरह का सपना आना अशुभ नहीं समझा जाता है Holi Dream Meaning बल्कि, यह इस बात संकेत है कि जल्द ही आपके घर में कोई खुशखबरी आने वाली है। इसके अलावा अगर आप किसी समस्या से जूझ रहे हैं तो इसका मतलब है कि वह जल्द ही समाप्त हो जाएगी। सपने में होली खेलने का मतलब यदि आप सपने में देखते हैं कोई व्यक्ति सपने में होली खेलते हैं तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपने आना शुभ माने जाते हैं। इस तरह के सपने संकेत देते हैं की आपको आने वाले समय में कोई अच्छी खबर मिल सकती है। यदि इस तरह का सपने किसी अविवाहित को आता है तो इसका मतलब है कि उन्हें जल्द ही अपना पार्टनर मिल सकता है। खुद को होली खेलते देखना अंक ज्योतिष के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति खुद को सपने में होली खेलते देखता है तो उसका अलग-अलग मतलब होता है। अगर कोई व्यक्ति सपने में गुलाबी रंग से होली खेलते खुद को देखते हा तो इसका मतलब है कि आपको कोई अच्छी खबर मिलेगी। वहीं, अगर कोई खुद को लाल रंग से होली खेलते देखते हैं तो इस तरह के सपने का मतलब है कि आपको थोड़ा सजग रहने की जरुरत है। वरना आपको कोई बड़ा नुकसान हो सकता है। Holi Dream Meaning:काले रंग से होली खेलना का मतलब Holi Dream Meaning:सपने में खुद को काले रंग से होली खेलते देखने का मतलब अच्छा नहीं समझा जाता है। इस तरह का सपना आना अशुभ संकेत माना जाता है। इस तरह के सपने आने का मतलब है कि आप पर कोई बड़ी मुसीबत आ सकती है। या कोई आपको हानि पहुंचा सकता है। इस तरह के सपने आने पर आपको संभलकर रहने की जरूरत है।

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Bhalchandra Sankashti Chaturthi:कब है चैत्र महीने की संकष्टी चतुर्थी, जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

Bhalchandra Sankashti Chaturthi:गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार हर महीने दो चतुर्थी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हर महीने पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। Bhalchandra Sankashti Chaturthi:सनातन धर्म में पूज्य भगवान श्री गणेश की आराधना के लिए हर माह में दो चतुर्थी तिथियां अत्यंत जरूरी मानी जाती हैं. इन्हीं में से चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी को विशेष शुभ और मंगलकारी माना जाता है. Bhalchandra Sankashti Chaturthi 2025: चतुर्थी व्रत को हिंदू धर्म में अत्यंत मंगलकारी माना जाता है. यह व्रत भगवान गणेश की पूजा के लिए समर्पित होता है. हर माह दो बार चतुर्थी तिथि आती है—शुक्ल पक्ष में विनायक चतुर्थी और Bhalchandra Sankashti Chaturthi कृष्ण पक्ष में संकष्टी चतुर्थी. हर संकष्टी (Bhalchandra Sankashti Chaturthi 2025 Significance) चतुर्थी का अलग नाम और विशेष महत्व होता है. इस बार भालचंद्र संकष्टी (Bhalchandra Sankashti Chaturthi) चतुर्थी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में 17 मार्च 2025, सोमवार को मनाई जाएगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान गणेश (Ganesh Puja on Sankashti Chaturthi) की विधिपूर्वक पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है. आइए, इस तिथि से जुड़ी कुछ खास जानकारी जानते हैं. भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Sankashti Chaturthi 2025 Muhurat And Timings) हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 17 मार्च 2025 को रात 07:33 बजे होगी और इसका समापन 18 मार्च 2025 को रात 10:09 बजे होगा.इस दिन चंद्रोदय के समय भगवान गणेश की पूजा करने का विशेष महत्व होता है. इसलिए, भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 17 मार्च 2025, सोमवार को मनाई जाएगी. भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2025: पूजा विधि (Sankashti Chaturthi March 2025 puja vidhi) भगवान गणेश जिन्हें रिद्धि-सिद्धि और बुद्धि के देवता माना जाता है, उन्हें प्रसन्न करने के लिए हर माह लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी का व्रत और पूजन किया जाता है. विशेष रूप से, महिलाएं यह व्रत संतान की सलामती और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए करती हैं. पूजा को पूर्ण और सफल बनाने के लिए सही और संपूर्ण पूजा सामग्री का होना जरूरी है. इसलिए, संकष्टी चतुर्थी की पूजा के लिए जरूरी सामग्रियां जान लें… इन सभी सामग्रियों के साथ विधिपूर्वक गणपति बप्पा की पूजा करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2025: शुभ योग (Bhalchandra Sankashti Chaturthi Shubh Yog) ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर ध्रुव योग का निर्माण हो रहा है, जो दोपहर 03:45 बजे तक रहेगा. इस योग में भगवान गणेश की पूजा करने से शुभ कार्यों में सफलता मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है.इसके अलावा, इस दिन भद्रावास योग भी बन रहा है, जो शाम 07:33 बजे तक रहेगा. साथ ही, भद्रावास योग के बाद शिव वास योग का संयोग बन रहा है. इन विशेष योगों में भगवान गणेश की पूजा करने से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है. शुभ मुहूर्त भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी पर इन बातों का रखें ध्यान (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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Holi Kab Hai 2025: होली कब है 14 या 15, जानें क्यों है होली की तारीख को लेकर कन्फ्यूजन, देखें होलिका दहन और रंगोत्‍सव की सही डेट

Holi Kab Hai 2025:होली को लेकर लोगों में संशय की स्थिति बनी हुई है। Holi Kab Hai 2025 हिंदू पंचांग के अनुसार होली का त्योहार पूर्णिमा के अगले दिन यानि चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि को मनाते हैं, जबकि होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा को भद्रा रहित मुहूर्त में रात के समय करते हैं। होली का त्‍योहार जैसे-जैसे करीब आ रहा है, वैसे वैसे इस बात की चर्चा और गरम होती जा रही है कि होली कब मनाई जाएगी। होली की सही डेट को लेकर लोगों के मन में भारी असमंजस बना है। होली 14 मार्च को होगी या फिर 15 मार्च को, इस बात को लेकर लोगों के बीच में आपस में भारी कन्फ्यूजन की स्थिति पैदा हो गई है। आइए हम आपको बताते हैं होली जलाने और होली खेलने की सही डेट। Holi 2025 Kab Hai :होली कब मनाई जाएगी, इस बात को लेकर हर साल की तरह इस साल भी भारी कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है। होली 14 मार्च को मनाई जाएगी या फिर 15 मार्च को, इस वक्‍त यह काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ स्‍थानों पर होली 14 मार्च को मनाने की बात कर रहे हैं तो कुछ स्‍थानों पर होली 15 मार्च को मनाई जाएगी। आइए आपको बताते हैं कि होली को लेकर कन्फ्यूजन क्‍यों बना, साथ ही जानते हैं होलिका दहन और रंग खेलने की सही डेट क्‍या है। होलिका दहन पर करें ये काम Holi Kab Hai 2025 – होलिका दहन के दिन होलिका की पूजा में अक्षत, गंगाजल, रोली-चंदन, मौली, हल्दी, दीपक, मिष्ठान आदि से पूजा के बाद उसमें आटा, गुड़, कपूर, तिल, धूप, गुगुल, जौ, घी, आम की लकड़ी, गाय के गोबर से बने उपले या गोइठा डाल कर सात बार परिक्रमा करने से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि में वृद्धि, नकारात्मकता का ह्रास होता है। रोग-शोक से मुक्ति मिलती है व मनोकामना की पूर्ति होती है। होलिका के जलने के बाद उसमें चना या गेहूं की बाली को सेंक या पकाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से स्वास्थ्य अनुकूल होता है। Holi Kab Hai 2025:होली कब मनाई जाएगी होली के त्योहार को लेकर इस साल भी कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है। कई स्थानों पर होली का त्योहार 14 मार्च और 15 मार्च को लेकर लोग उलझन में हैं। लेकिन आपको बता दें कि इस बार आपको इन उलझनों में फंसने की जरूरत नहीं है। होली का त्योहार यानी रंगोत्सव हर साल चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि को मनाया है। इस साल चैत्र कृष्‍ण प्रतिपदा तिथि का आरंभ 14 मार्च को दिन में 12 बजकर 25 मिनट के बाद हो जा रहा है। इससे पहले तक फाल्गुन पूर्णिमा तिथि रहेगी। ऐसे में 14 मार्च को दिन में प्रतिपदा तिथि लग जाने से रंगोत्सव इसी दिन मनाया जाएगा। जहां लोग होली रंगोत्सव की तारीख को लेकर कन्फ्यूज हैं वहीं उलझन की वजह यह है कि लोग उदया तिथि को मान रहे हैं। यानी 14 मार्च को सुबह 12 बजकर 25 मिनट तक पूर्णिमा तिथि रहेगी। इसलिए लोग अगले दिन यानी 15 तारीख को उदया तिथि में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा होने से रंगोत्सव मनाने की बात कर रहे हैं। लेकिन आपको बता दें कि होली और रंगोत्सव का नियम है कि जिस दिन प्रदोष काल में फाल्गुन पूर्णिमा तिथि होती है उसी रात में होलिका दहन किया जाता है और उसके अगले दिन रंगोत्सव मनाया जाता है। Holi Kab Hai 2025 इस नियम के अनुसार होलिका दहन इस वर्ष 13 मार्च को किया जाएगा और 14 मार्च को रंगोत्सव धुलैंडी का त्योहार मनाया जाएगा। प्रतिपदा में 15 मार्च को खेली जाएगी होली उदयातिथि के आधार पर होलिका दहन पूर्णिमा तिथि में और होली फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा में मनाने का विधान है। जहां पर उदयातिथि के अनुसार पर्व मनाया जाता है वहां पर प्रतिपदा तिथि के अनुसार 15 मार्च को होली मनाई जाएगी। मिथिला क्षेत्र में भी होली 15 मार्च को मनाई जाएगी। 14 मार्च को इस बार आतर रहेगा। 14 मार्च शुक्रवार को उदयातिथि को लेकर दोपहर तक पूर्णिमा ही है, इस कारण रंगोत्सव होली नहीं मनायी जाएगी। इसलिए इस बार होली 15 मार्च को मनायी जाएगी।

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Diwali 2025 Date: दिवाली 2025 में कब है ? अभी से जान लें डेट, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त

Diwali 2025 Date: दिवाली का त्योहार कार्तिक अमावस्या पर मनाया जाता है. अगले साल 2025 में दिवाली कब मनाई जाएगी, इसकी सही तारीख क्या है, पांच दिन का दिवाली कैलेंडर सब यहां देखें. Diwali 2025 Date: हिंदू धर्म में दिवाली के त्योहार को विशेष माना गया है. Diwali 2025 Date कार्तिक अमावस्या के दिन दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का विधान है. कहा जाता है कि इस दिन लक्ष्मी मां की आराधना करने से घर में सुख-समृद्धि आती है. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन श्रीराम 14 साल का वनवास कर अयोध्या लौटे थे इस खुशी में दीपावली मनाई गई. दिवाली के 5 दिन का त्योहार धनतेरस से शुरू हो जाता है और भाई दूज तक रहता है. 2025 में दिवाली कब मनाई जाएगी, अभी से जान लें सही तारीख मुहूर्त. दिवाली 2025 में कब है (Diwali 2025 date in India) दिवाली 20 अक्टूबर 2025 में है. इस दिन लक्ष्मी पूजा सूर्यास्त के बाद करने का विधान है. दीपावली को दीप उत्सव भी कहा जाता है, क्योंकि दीपावली का मतलब होता है दीपों की अवली यानि पंक्ति। दिवाली का त्यौहार अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है. दिवाली 2025 लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (Diwali 2025 Muhurat) पंचागं के अनुसार कार्तिक अमावस्या (Kartik amavasya) तिथि 20 अक्टूबर 2025 को दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 21 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 54 मिनट पर समाप्त होगी. दिवाली 2025 कैलेंडर (Diwali 2025 Calendar) Diwali 2025 Date दिवाली के दिन करें ये शुभ काम दीवाली या लक्ष्मी पूजा के दिन, हिन्दु अपने घरों और दुकानों को गेंदे के फूल की लड़ियों व अशोक, आम तथा केले के पत्तों से सजाते हैं. इस दिन कलश में नारियल स्थापित कर, उसे घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर रखने को शुभ माना जाता है. दिवाली के दिन सफाई का भी विशेष महत्व है. क्योंकि लक्ष्मी मां भी उसी घर में प्रवेश करती हैं जिस घर में साफ-सफाई होती है. लक्ष्मी पूजा के लिए, पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर, Diwali 2025 Date उस पर श्री गणेश और देवी लक्ष्मी की सुन्दर रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित मूर्तियों को स्थापित किया जाता है और फिर पूजन करें. शाम को लक्ष्मी पूजा के साथ ही जलते हुए दीपकों की भी पूजा की जाती है. घर और आंगन में सब जगह दीपक लगाएं. कैसे करें लक्ष्मी जयंती की पूजा: लक्ष्मी जयंती Diwali 2025 Date के दिन भक्त प्रातः काल स्नानादि समाप्त कर देवी लक्ष्मी की मूर्ति को वेदी पर रखें और चार बत्तियों का दीपक जलाएं, वेदी के ऊपर शंख भी रखे जाते हैं।फिर लक्ष्मी मां का अभिषेक रोली और चावल से करें और फूल माला अर्पित करें।देवी लक्ष्मी की स्तुति गान करके देवी की आरती करें। इसके बाद देवी लक्ष्मी को भोग के रूप में मिठाई चढ़ाएं और प्रार्थना के बाद भोग सभी भक्तों में वितरित करें।लक्ष्मी जयंती पर भक्त लक्ष्मी होमम करते हैं, होम के दौरान देवी लक्ष्मी सहस्रनामावली और श्री सूक्तम के 1008 नामों का पाठ किया जाता है।लक्ष्मी जयंती के दिन महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए आहुति के लिए कमल के फूलों को शहद में डुबोकर उपयोग किया जाता है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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गुफा मंदिर:भोपाल, मध्‍यप्रदेश , भारत

यह 7 प्राकृतिक गुफाओं से घिरा है, जिसके कारण इसका नाम गुफा मंदिर पड़ा। गुफा मंदिर मध्‍यप्रदेश के भोपाल शहर में लालघाटी पर स्थित भगवान शिव का यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है। यह भोपाल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। इस मंदिर को पहाड़ काटकर बनाया गया है। यह 7 प्राकृतिक गुफाओं से घिरा है, जिसके कारण इसका नाम गुफा मंदिर पड़ा। इन 7 गुफाओं में से एक गुफा में स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन होते हैं। भगवान शिव के साथ उनका परिवार माता पार्वती, पुत्र गणेश जी, कार्तिकेय व नंदी जी की प्रतिमा भी विराजित है। माना जाता है कि इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन से भाग्य खुल जाता है। सावन, महाशिवरात्रि व नवरात्रि पर यहां बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर का इतिहास गुफा मंदिर की खोज साल 1949 में महंत नारायण दासजी त्यागी द्वारा की गई थी। उस समय यहां आसपास घना जंगल व सिर्फ 2 गांव थे। बताया जाता है कि गुफा की खोज करने के बाद महंत गुफा में ही आध्यात्मिक तपस्या में लीन हो गए। आसपास के लोगों को जब इसका पता चला तो वे सभी महंत से मिलने गए। गुफा के अंदर स्वयंभू देख गांव वालों ने यहां एक मंदिर निर्माण की इच्छा जताई। जिसके बाद महंत नारायण दासजी त्यागी ने मंदिर की नींव रखी। 2 अप्रैल 1965 को महंत द्वारा इसका पुनर्निर्माण भी कराया गया। मंदिर में पहाड़ के नीचे प्राकृतिक रूप से गुफा निर्मित गृर्भ गृह में भगवान भोलेनाथ स्वयंभू पिंडी रूप में विराजमान हैं। मंदिर का महत्व कहा जाता है कि गुफा में विराजित शिवलिंग स्वयंभू यानी अपने आप प्रकट हुए थे । गुफा में विराजित ​शिवलिंग पर प्राकृतिक रूप से पानी की बूंदे लगातार गिरती रहती है। माना जाता है कि गुफा मंदिर में सावन माह में ​स्वयंभू शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भक्तों के हर कष्ट दूर हो जाते हैं। मंदिर की वास्तुकला बाहर से देखने में गुफा मंदिर दक्षिण भारत के किसी मंदिर जैसा प्रतीत होता है। एक मीनार की तरह 3 खंड ऊंचे शिखर शैली में दिखाई देता है, जोकि अलग-अलग रंगों से की गई सुंदर कलाकृतियों के कारण काफी आकर्षक लगता है। हालांकि, अंदर से मंदिर सिर्फ एक ही खंड यानी प्रथम खंड में निर्मित है। गर्भगृह से गुफा के अलावा यहां एक प्राचीन गुफा है, जहां शिवलिंग विराजित है। यह गुफा सालभर जल से भरी रहती है। गुफा के बाहर लक्ष्मीनारायण जी की सुंदर प्रतिमा है, जहां भगवान विष्णु अपने बैकुण्ड निवास में माता लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। – मुख्य गुफा में प्रवेश से पहले बाईं ओर भगवान सीताराम का एक सुंदर मंदिर है, जिसमें पूरा राम दरबार सुशोभित है। परिसर में हनुमान जी की एक प्रतिमा है, जिसमें आदीवासी मूर्तिकला की झलक देखने को मिलती है। – मंदिर की दीवारों पर श्रीराधाकृष्ण, हनुमान जी व गणेश जी की सुंदर छवियां चित्रित की गई हैं। परिसर में भगवान परशुराम जी की भी विशाल प्रतिमा विराजमान है। मंदिर का समय गुफा मंदिरन खुलने का समय 06:30 AM – 07:00 PM महादेव के श्रंगार व आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM मंदिर का प्रसाद शिवलिंग पर परंपरा अनुसार शुद्ध जल, दूध, दही, शहद, घी व बेलपत्र का अर्पण किया जाता है।

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