सोमेश्वर महादेव मंदिर:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

हजारों साल पहले सोमेश्वर की स्थापना यमुना तट पर जंगल और घने वनों के बीच हुई थी। सोमेश्वर महादेव मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में यमुना तट पर स्थित है। इस मंदिर की गिनती संगमनगरी के प्राचीन मंदिरों में की जाती है, जिसकी महिमा पौराणिक कालों से बताई जाती है। मान्यता है कि सोमेश्वर नाथ मंदिर की स्थापना के लिए स्वयं भगवान शिव ने चंद्रमा को इसे स्थापित करने को कहा था और उनके ही कहने पर चंद्र देव ने सोमेश्वर नाथ मंदिर की स्थापना की थी। चंद्रदेव द्वारा स्थापित किये जाने और यहीं उनका कुष्ठरोग ठीक होने की वजह से बड़ी संख्या में श्रद्धालु निरोगी होने की कामना के साथ यहां पूजन-अर्चन करने के लिए आते हैं। Someswarar Temple:मंदिर का इतिहास हजारों साल पहले सोमेश्वर की स्थापना यमुना तट पर जंगल और घने वनों के बीच हुई थी। इस मंदिर की स्थापना स्वयं चंद्रमा द्वारा की गई थी और भगवान शंकर की आराधना कर चंद्रमा को अपने क्षय रोग से मुक्ति मिली थी। ऐसी पौराणिक कथा बताई जाती है कि राजा दक्ष प्रजापति ने जब चंद्रमा को श्राप दिया तो उससे चंद्रमा कुरूप होकर छय रोग से ग्रसित हो गए, श्राप मुक्त होने के लिए उन्होंने भगवान शिव की ज्योतिर्लिंग की स्थापना कर उनकी आराधना की थी। सोमेश्वर महादेव मंदिर का महत्व सोमेश्वर नाथ मंदिर के बारे में बताया जाता है कि इसके चंद्र कुंड में जो भक्त एक माह तक स्नान कर भगवान भोलेनाथ की आराधना करता है उसे क्षय रोग से मुक्ति मिल जाती है। ग्रंथों की माने तो चंद्रदेव श्राप की वजह से कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गये थे, सोमेश्वर महादेव मंदिर तब भोलेनाथ ने उन्हें इस रोग से मुक्ति का आशीर्वाद दिया था। ऐसी कहा जाता है कि सोमेश्वर नाथ मंदिर के गुंबद पर लगा त्रिशूल पूर्णिमा और अमावस्या को अपनी दिशा बदलता है और जिस तरफ चन्दमा रहता है उधर त्रिशूल घूम जाता है। सोमेश्वर महादेव मंदिर की वास्तुकला सोमेश्वर नाथ मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। मंदिर के शीर्ष पर विशाल शिखर और गुंबद बना है। शिखर के ठीक नीचे गर्भ गृह भगवान भोलेनाथ शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। मंदिर का गर्भ गृह छोटा है और उसमे संगमरमर लगा है। मंदिर एक प्रवेश द्वार है और ठीक सामने सीढ़ियां बनीं हैं। सोमेश्वर नाथ मंदिर में एक चंद्र कुंड बना है। मंदिर के ऊपर छत्र पर त्रिशूल लगा है जो चंद्रमा के पृथ्वी के चक्कर लगाने के अनुसार ही अपना कोड़ बदलता है। सोमेश्वर महादेव मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद सोमेश्वर नाथ मंदिर में शिव जी को फल, ड्राई फ्रूट्स,लड्डू, पेड़े का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु भगवान भोले नाथ को भांग, धतूरा, बेलपत्र और दूध भी चढ़ाते हैं।

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शंकर विमान मण्डपम:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

मंदिर भगवान शिव को समर्पित है इसलिए यह ‘शंकर विमान मंडपम’ कहलाता है। शंकर विमान मण्डपम भारत के उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर में स्थित है। त्रिवेणी संगम के उत्तर में बने इस तीन मंजिला मंदिर को आदि शंकराचार्य की स्मृति में बनाया गया है। शंकर विमान मंडपम भगवान शिव को समर्पित मंदिर है। इसके प्रथम तल कांचिकामकोटि पीठ की आराध्य कामाक्षी देवी को समर्पित है। द्वितीय तल विष्णु भगवान के बाला जी स्वरूप पर आधारित है। शंकर विमान मण्डपम वहीं तृतीय तल योग सहस्त्र लिंग एक पत्थर में है। एक पत्थर में एक हजार शिवलिंग एवं रुद्राक्ष का मंडप बना है। श्रद्धालु मंदिर में पूजन-अर्चना कर अपनी मनोकामना मांगते है, जिसे भोलेनाथ पूरा करते हैं। Shankar Viman Mandapam:शंकर विमान मण्डपम मंदिर का इतिहास शंकर विमान मंडपम की नींव 1969 में रखी गई थी। श्रद्धालुओं के लिए मंदिर 17 मार्च 1986 को खोला गया। शंकर विमान मंडपम को बनने में करीब 16 साल का समय लगा था। तीन मंजिला मंदिर का निर्माण कांचिकामकोटि 69वें पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती ने अपनी गुरु की इच्छापूर्ति के लिए कराया था। मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी कांचिकामकोटि मठ के पास है। मंदिर के दूसरे तथा तीसरे तल से त्रिवेणी संगम का नजारा अद्भुत नज़र आता है, जिसे देखने श्रद्धालु सुबह-शाम पहुंचते हैं। शंकर विमान मण्डपम मंदिर का महत्व चार खण्डों में शंकर विमान मंडपम 130 फीट ऊंचा है। मंदिर में कुमारिल भट्ट, जगतगुरु शंकराचार्य, कामाक्षी देवी (51 शक्तिपीठ समेत) और योगसहस्त्र सहस्त्रयोग लिंग (108 शिवलिंग हैं आसपास) स्थित हैं। शंकर विमान मंडपम मंदिर के प्रत्येक तल पर मुख्य मूर्तियों के कक्ष के बाहर काले रंग के द्वारपाल की मूर्तियां लगी हैं, जिसमें तमिल तथा हिंदी दोनों भाषाओं में श्री द्वारपाल लिखा है। शंकर विमान मंडपम मंदिर की दीवारों तथा छतो पर उकेरी गई मूर्तियां रामायण तथा शिव की कहानियों को बयां करती है। शंकर विमान मण्डपम मंदिर की वास्तुकला प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर बना शंकर विमान मंडपम द्रविड़ शैली में बना है। द्रविड़ संस्कृति में ही मंदिर का प्रवेश बना है, जो कि 16 विशाल खंभो पर बना है। मंदिर का गुंबद ‘विमान’ कहलाता है जिसे सीढ़ी दार पिरामिड की तरह बनाया जाता है जो ऊपर की ओर ज्यामिति रूप से उठा होता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है इसलिए यह ‘शंकर विमान मंडपम’ कहलाता है। चार मंजिला इस मंदिर की बनावट दक्षिण भारतीय शैली पर आधारित है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 01:00 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद शंकर विमान मंडपम में शिव जी को फल, ड्राई फ्रूट्स,लड्डू, पेड़े का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु भगवान भोले नाथ को भांग, धतूरा, बेलपत्र और दूध भी चढ़ाते हैं।

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Narad Jayanti 2025 date Hindi:मई महीने की इस तारीख को है नारद जयंती, यहां जानिए तिथि और शुभ मुहूर्त

Narad Jayanti 2025 date Hindi:देवर्षि नारद को श्रुति-स्मृति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, खगोल-भूगोल, ज्योतिष और योग जैसे कई शास्त्रों का विद्वान माना जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं इस साल नारद जयंती कि तिथि और शुभ मुहूर्त क्या है… Narad Jayanti 2025 date Hindi:नारद जयंती के बारे में नारद जयंती महान देवर्षि नारद मुनि की जयंती के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष द्वितीया को आता है। Narad Jayanti 2025 date Hindi नारद मुनि ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाते हैं और वे देवताओं तथा असुरों के बीच संवाद सेतु हैं। इस दिन भक्ति, संगीत और ज्ञान का विशेष महत्व होता है। Narada Jayanti 2025:नारद जयंती 2025 वैशाख महीने की कृष्ण पक्ष तिथि में मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन नारद मुनि का जन्म हुआ था। Narad Jayanti 2025 date Hindi आज हम आपको नारद मुनि का सनातन धर्म में महत्व, जन्म कथा और पूजा विधि की जानकारी देंगे लेकिन उससे पहले नारद जयंती से जुड़ी कुछ जरूरी जानकारी आपके साथ साझा कर देते हैं। Date and time of Narada Jayanti:नारद जयंती की तिथि एवं मुहूर्त नारद जयंती तिथि : 13 मई 2025, मंगलवार प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – 12 मई, 2025 को 10:25 पी एम बजे से प्रतिपदा तिथि समाप्त – 14 मई, 2025 को 12:35 ए एम बजे तक Importance of Narad Muni in Sanatan Dharma:नारद मुनि का सनातन धर्म में महत्व Narad Jayanti 2025 date Hindi:भगवान विष्णु के परम भक्त और भगवान ब्रह्मा के पुत्र नारद मुनि से जुड़ी पौराणिक कथाएं पुरातन काल से ही कही सुनी जाती रही हैं। नारद जी को भगवान ब्रह्मा के छह पुत्रों में से छठवां पुत्र माना जाता है। नारद मुनि को सभी ऋषियों के बीच देवर्षि का दर्जा प्राप्त है। यानि कि नारद मुनि देवलोक के ऋषि माने जाते हैं। नारद मुनि की महत्ता इसी बात से समझ में आती है कि न सिर्फ देवता ही उनका सम्मान करते थे बल्कि असुरों के बीच भी उनका बेहद मान-सम्मान था। Narad Jayanti 2025 date Hindi भगवान कृष्ण ने नारद मुनि का जिक्र श्रीमद्भगवद्गीता में करते हुए कहा गया है कि, देवर्षीणाम् च नारद: अर्थात देवर्षियों में मैं नारद हूँ। देवर्षि नारद को श्रुति-स्मृति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, Narad Jayanti 2025 date Hindi खगोल-भूगोल, ज्योतिष और योग जैसे कई शास्त्रों का प्रकांड विद्वान माना जाता है। देवर्षि नारद के सभी उपदेशों का निचोड़ है- सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तितै: भगवानेव भजनीय:। अर्थात् सर्वदा सर्वभाव से निश्चित होकर केवल भगवान का ही ध्यान करना चाहिए। नारद जयंती शुभ मुहूर्त 2025 – Narad Jayanti auspicious time 2025 ब्रह्म मुहूर्त 04 बजकर 04 मिनट ए एम से 04 बजकर 46 मिनट ए एम तक प्रातः सन्ध्या 04 बजकर 25 ए एम से 05 बजकर 28 मिनट ए एम तक अभिजित मुहूर्त 11 बजकर 46 मिनट ए एम से 12 बजकर 40 मिनट पी एम तक विजय मुहूर्त  02 बजकर 29 मिनट पी एम से 03 बजकर 23 मिनट पी एम तक गोधूलि मुहूर्त  06 बजकर 58 मिनट पी एम से 07 बजकर 19 मिनट पी एम तक सायाह्न सन्ध्या 06 बजकर 59 मिनट पी एम से 08 बजकर 02 मिनट पी एम तक अमृत काल  12 बजकर 14 ए एम, मई 14 से 02 बजकर 01 मिनट  ए एम, तक (14 मई) निशिता मुहूर्त 11 बजकर 52 मिनट पी एम  से 12 बजकर 34 मिनट ए एम, तक (14 मई) नारद जयंती पर क्या करें – What to do on Narad Jayanti इस दिन आप अगर दान करते हैं तो आपको इसका पुण्य फल प्राप्त होगा. माना जाता है Narad Jayanti 2025 date Hindi इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने से पुण्य फल प्राप्त होता है. साथ ही इस दिन जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा भी करना चाहिए, इसे इससे जीवन में सुख समृद्धि आती है.  कौन है नारद मुनि –  Importance of Sage Narad in Sanatan Dharma आपको बता दें कि नारद मुनि ऐसे हैं जिनके हाथ में किसी तरह का अस्त्र नहीं है.  इनके एक हाथ में वीणा और एक में वाद्य यंत्र होता है.  नारद मुनि देवताओं और असुरों के बीच संदेशवाहक के रूप में काम करते हैं. Narad Jayanti 2025 date Hindi इस दिन को पत्रकार दिवस के रूप में भी लोग मनाते हैं.  आपको बता दें कि नारद मुनि ऐसे हैं, जो सभी लोकों में वास करते हैं. इनकी सवारो बादल है.  How was Narad Muni born:नारद मुनि का जन्म कैसे हुआ? पौराणिक शास्त्रों में नारद मुनि को भगवान ब्रह्मा जी का पुत्र बताया गया है। लेकिन भगवान ब्रह्मा के पुत्र रूप में पैदा होने की इस घटना का संबंध नारद मुनि के पूर्व जन्म से भी हैं। मान्यता है कि पूर्व जन्म में नारद मुनि एक गंधर्व थे। उनका नाम हुआ करता था। बेहद सुन्दर काया वाले उपबर्हण को अपने रूप पर बेहद घमंड था। कहा जाता है कि एक बार कुछ अप्सराएँ और गंधर्व गीत और नृत्य से ब्रह्मा जी की उपासना कर रहे थे तब उपबर्हण स्त्रियों के साथ वहां आए और रासलीला में लग गए। जिससे भगवान ब्रह्मा जी उन पर कुपित हो गए और उन्हें श्राप दिया Narad Jayanti 2025 date Hindi कि अगले जन्म में वे एक शूद्र दासी के यहाँ जन्म लेंगे। भगवान ब्रह्मा के श्राप से उपबर्हण का जन्म एक शूद्र दासी के यहाँ हुआ लेकिन बालक उपबर्हण ने बचपन से ही अपना पूरा जीवन भगवान की आराधना और उनकी खोज में लगा दिया। यह देख कर भगवान बहुत प्रसन्न हुए और अगले जन्म में उन्हें ब्रह्मा पुत्र होने का वरदान दिया। समय आने पर इनका जन्म ब्रह्मदेव के मानस पुत्र के रूप में हुआ जो नारद मुनि के नाम से चारों ओर प्रसिद्ध हुए। Donate on Narada Jayanti:नारद जयंती पर करें दान भगवान विष्णु के परम भक्त नारद जी के जन्म दिवस पर दान-पुण्य को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए इस दिन दान जरूर करें। माना जाता है कि इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान-दक्षिणा देने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

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Kurma Jayanti 2025 date:कूर्म जयंती कब और कैसे मनाएं आइए इसके महत्व के बारे में जानते हैं…

Kurma Jayanti 2025 date:कब और इसे क्यों मनाई जाती है। आइए इसके महत्व के बारे में जानते हैं… Kurma Jayanti 2025 date:अपनी परंपराओं और विरासत में समृद्ध होने के कारण भारत में कई सारे त्योहार मनाएं जाते हैं, इन्हीं त्योहारों में से एक है, कूर्म जयंती। कूर्म जयंती (Kurma Jayanti) का त्योहार हिंदूओं के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस शुभ दिन पर भगवान विष्णु के कूर्म अवतार यानी उनके दूसरे अवतार की पूजा की जाती है। देश भर में लोग इस त्योहार को जीवन के प्रतीक के रूप में मानते हैं और इसे पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं। समृद्धि और लंबी उम्र का आशीर्वाद पाने के लिए भगवान विष्णु के मंदिरों में कई अनुष्ठान और पूजा विधियां की जाती हैं। कूर्म जयंती (Kurma Jayanti) 2025 तिथि हिंदू कैलेंडर के अनुसार, कूर्म जयंती (Kurma Jayanti) वैशाख महीने के दौरान पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। कूर्म जयंती 2025 की तिथि और तिथि का समय इस प्रकार है: कूर्म जयंती: सोमवार, मई 12, 2025कूर्म जयंती मुहूर्त: 04:34 पी एम से 07:12 पी एम पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: मई 11, 2025 को 08:01 पी एम बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त: मई 12, 2025 को 10:25 पी एम बजे कुर्म जयंती (Importance of Kurma Jayanti ) का महत्व लोग कूर्म जयंती (Kurma Jayanti) को उस दिन के रूप में मनाते हैं, जब भगवान विष्णु कूर्म (कछुआ) के रूप में अवतरित हुए थे। हिंदू किंवदंतियों के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि इस विशेष दिन पर, भगवान विष्णु ने ‘मंदरांचल पर्वत’ (पहाड़) को अपनी पीठ पर उठा लिया था। ऐसा कहा जाता है कि जब सागर मंथन किया जा रहा था, तब ‘मंदरांचल पर्वत’ का कोई आधार न होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा था, तभी भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लेकर उसे अपनी पीठ पर रखा। तब से, कूर्म जयंती (Kurma Jayanti) को भगवान कूर्म के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। भगवान विष्णु के इस दूसरे अवतार की हिंदुओं द्वारा अत्यंत भक्ति और महिमा के साथ पूजा की जाती है। Kurma Jayanti 2025 date:कूर्म जयंती (Kurma Jayanti Story) कहानी Kurma Jayanti 2025 date:हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ‘क्षीर सागर मंथन’ के दौरान, ‘मंदरांचल पर्वत’ को मदानी के रूप में इस्तेमाल किया गया था और नागराज वासुकी को समुद्र मंथन के लिए रस्सी के रूप में लिया गया था। Kurma Jayanti 2025 date भगवान विष्णु ने अमरता का अमृत निकालने के लिए समुद्र मंथन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए असुरों के साथ देवों को बुलाया। लेकिन पहाड़ डूबने लगा, इसलिए भगवान विष्णु एक बड़े कछुए के रूप में प्रकट हुए और उसे अपनी पीठ पर ले गए। अगर कूर्म अवतार न होता तो मंथन की प्रक्रिया विफल हो जाती और देवताओं को 14 दिव्य उपहार नहीं मिलते। इसके अलावा, समुद्र मंथन ने ‘हलाहल’ नाम का एक विष भी निकाला, जिसे भगवान शिव ने ब्रह्मांड को आपदा और विनाश से बचाने के लिए सेवन किया था। Kurma Jayanti 2025 date उस समय से, कूर्म जयंती हिंदुओं के बीच अत्यधिक महत्व रखती है और लोग भगवान विष्णु की महिमा के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। How to celebrate Kurma Jayanti:कुर्मा जयंती कैसे मनाएं? भक्त कुर्मा जयंती को अत्यंत समर्पण और उत्साह के साथ मनाते हैं। Kurma Jayanti 2025 date इस विशेष दिन पर, भगवान विष्णु के विभिन्न मंदिरों में या पूजा स्थल पर विशेष समारोह और पूजा का आयोजन किया जाता है। कूर्मा जयंती के अनुष्ठान क्या हैं:(What are the rituals of Kurma Jayanti) Kurma Jayanti 2025 date अन्य हिंदू त्योहारों के समान, इस दिन सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करना पवित्र माना जाता है। स्नान करने के बाद, भक्त साफ़ और सुथरे पूजा के वस्त्र पहनते हैं । भक्त भगवान विष्णु को चंदन, तुलसी के पत्ते, कुमकुम, अगरबत्ती, फूल और मिठाई का चढ़ावा चढ़ा कर पूजा और अर्चना करते हैं। श्री कूर्मा जयंती के व्रत का पालन अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। तो, भक्त इस विशेष दिन पर एक मौन व्रत या एक कठोर कुर्मा जयंती का व्रत रखते हैं। जो भक्त उपवास करते हैं, वे दाल या अनाज का सेवन करने से खुद को रोकते हैं और केवल दूध उत्पादों और फलों का सेवन करते हैं। कूर्म जयंती व्रत के पालन के दौरान, पर्यवेक्षक किसी भी तरह के पाप या बुराई करने के लिए प्रतिबंधित होते हैं और झूठ बोलने के लिए भी प्रतिबंधित होते हैं । प्रेक्षकों को रात्रि के समय सोने की अनुमति नहीं होती है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए उन्हें अपना पूरा समय मंत्रों को पढ़ने में लगाना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम‘ का पाठ करना अत्यधिक शुभ माना जाता है। एक बार सभी अनुष्ठान समाप्त हो जाने के बाद, भक्त आरती करते हैं। कूर्म जयंती की पूर्व संध्या पर दान करना अत्यधिक फलदायक माना जाता है। Kurma Jayanti 2025 date पर्यवेक्षक को ब्राह्मणों को भोजन, कपड़े और पैसे दान करने चाहिए। कुर्मा जयंती के लिए अनुष्ठान(Rituals for Kurma Jayanti) Kurma Jayanti 2025 date सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करें। साफ-सुथरे या पूजा वस्त्र धारण करें। धूप, तुलसी के पत्ते, चंदन, कुमकुम, फूल और मिठाई लेकर प्रसाद के साथ भगवान विष्णु की पूजा करके प्रार्थना करें। इस दिन व्रत करना बहुत ही शुभ माना जाता है। इसलिए, कई भक्त मौन उपवास या कठोर कूर्म जयंती व्रत करते हैं। व्रत के दौरान दाल या अनाज का सेवन वर्जित है और फलों के साथ केवल दुग्ध उत्पादों का ही सेवन किया जा सकता है। पूर्ण तपस्या करनी चाहिए और प्रेक्षकों को किसी भी प्रकार के पाप कर्म या झूठ बोलने से बचना चाहिए। रात के समय जागरण करें और पूरी रात भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए मंत्रों का जाप करें। प्रसिद्ध ‘विष्णु सहस्रनाम’ का पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है। सभी रस्में पूरी होने के बाद आरती करें। Kurma Jayanti 2025 date कूर्म जयंती के दिन आप दान या दान कर सकते हैं क्योंकि इससे अत्यधिक फल की प्राप्ति होती है। आप जरूरतमंद या ब्राह्मणों को भोजन, कपड़े, या धन सहित कुछ भी दान कर सकते हैं। कूर्म जयंती (Kurma Jayanti Mantra) मंत्र ॐ कूर्माय नम:ॐ हां ग्रीं कूर्मासने बाधाम नाशय नाशयॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम:ॐ ह्रीं कूर्माय वास्तु पुरुषाय स्वाहा

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महालक्ष्मी मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

इस मंदिर में होलकर काल से चली आ रही परंपरा आज भी देखने को मिलती है। भारत के मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के हृदय स्थल राजवाड़ा में महालक्ष्मी मंदिर स्थित है। यह इंदौर के प्राचीन मंदिरों में से एक है। भक्त मंदिर में जो चावल चढ़ाते हैं, उनमें से कुछ चावल मन्नत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं और फिर उसे घर की तिजोरी और दुकान के गल्ले में रखते हैं ताकि वर्षभर बरकत बनी रहे। बताया जाता है कि यह सिलसिला मंदिर की स्थापना के बाद से लगातार जारी है। महालक्ष्मी मंदिर का इतिहास महालक्ष्मी मंदिर करीब 188 साल प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर होलकर कालीन मंदिर की स्थापना 1833 में इंदौर के राजा हरि राव होलकर ने की थी। उस दौर में यहां मंदिर नहीं था, प्रतिमा की स्थापना एक पुराने मकान में की गई थी। होलकर वंश के लोग उस समय नवरात्र और दिवाली पर माता के दर्शन करने आते थे। इसके साथ ही खजाना खोलने से पूर्व भी होलकर राजवंश मां महालक्ष्मी का आशीष लेता था। इस मंदिर में होलकर काल से चली आ रही परंपरा आज भी देखने को मिलती है। Mahalakshmi Temple:मंदिर का महत्व दिवाली के मौके पर भक्त मंदिर पहुंचकर माता लक्ष्मी को पीले चावल देकर अपने घर आने का आमंत्रण देते हैं। भक्त मां लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं कि हमारे घर पधारें और सुख-समृद्धि का आशीष दें। दिवाली के दिन मंदिर के पट सुबह तीन बजे खोल दिए जाते हैं। 11 पंडित मां लक्ष्मी का विशेष अभिषेक करते हैं और फिर श्रृंगार के बाद माता की महाआरती की जाती है। हर साल दीपावली के मौके पर मंदिर में 5 दिवसीय महोत्सव होता है। धनतेरस से शुरू होकर ये महोत्सव भाईदूज पर पूरा होता है। इस मौके पर यहां लाखों दर्शनार्थी मंदिर पहुंचते हैं। होलकर रियासत के दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी और क्षेत्र के व्यापारी अपने दिन की शुरुआत मंदिर में मां लक्ष्मी के दर्शन के साथ करते हैं। मंदिर की वास्तुकला होलकर कालीन महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण पूरी तरह से लकड़ी से हुआ था। 1933 में ये मंदिर तीन मंजिला था, लेकिन बाद में जर्जर होने के कारण ये गिर गया। 1942 में मंदिर जीर्णोद्धार कराया गया, जिसके बाद 2011 में मंदिर का पुन: जीर्णोद्धार कराया गया। इस मंदिर में माता की 21 इंच की प्राचीन मूर्ति प्रतिष्ठित है। गर्भ गृह में बड़े चबूतरे पर माता महालक्ष्मी की भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसके चारों ओर संगमरमर के आठ स्तम्भ लगे हुए हैं। साथ ही भगवान गणेश रिद्धि सिद्धि की काले पत्थरों से बनी मूर्ति है। मुंबई के महालक्ष्मी मंदिर के तर्ज पर इस मंदिर का विकास किया जा रहा है। मंदिर को मराठा शैली में बनाया गया है। मंदिर के दीवारों पर नक्काशी की गई, जिसे देख कर मन प्रसन्न हो जाता है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM सायंकाल मंदिर खुलने का समय 05:00 PM – 10:00 PM सुबह की आरती 07:00 AM – 07:30 AM सायंकाल आरती 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद महालक्ष्मी मंदिर में भक्त मां को फल, ड्राई फ्रूट्स, लड्डू का भोग लगाते हैं। कुछ श्रद्धालु मां को हलवा, चना और पूड़ी का भोग भी लगाते हैं।

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Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date:मोहिनी एकादशी पर भूलकर भी न करें 5 काम, होगी धन की हानि

Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date:मोहिनी एकादशी का दिन बहुत शुभ माना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है। लोग इस दिन व्रत रखते हैं और पूजा-पाठ करते हैं। कहते हैं कि इस व्रत को रखने से सभी कष्टों का अंत होता है। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date इसके साथ ही घर में माता लक्ष्मी का वास होता है। इस साल यह एकादशी (Mohini Ekadashi 2025) 8 मई को रखा जाएगा। Mohini Ekadashi Vrat Niyam: मोहिनी एकादशी पर भक्त उपवास रखकर विष्णु भगवान की आराधना करेंगे। मोहिनी एकादशी पर कुछ कामों को करना अशुभ माना जाता है, जो प्रभु की नाराजगी का कारण भी बन सकते हैं। Mohini Ekadashi Vrat Niyam:  मोहिनी एकादशी का व्रत। सनातन धर्म में मोहिनी एकादशी का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इस शुभ दिन पर भक्त उपवास रखते हैं और द्वादशी तिथि पर पारण करते हैं। इसके अलावा कुछ साधक विशेष पूजा करने के लिए भगवान विष्णु के मंदिर जाते हैं। एकादशी एक महीने में दो बार आती है। एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date एकादशी पर कुछ चीजों को करने से भगवान विष्णु कुपित हो सकते हैं और आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। Mohini Ekadashi per kya na kare:मोहिनी एकादशी पर क्या न करें? 1. चावल- मोहिनी एकादशी पर चावल का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। मान्यता है Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date इस दिन चावल का सेवन करने से दोष लगता है।  2. तुलसी की पत्तियां- तुलसी की पत्तियां भगवान श्री हरि विष्णु को बेहद प्रिय हैं, जिनके बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जाता है। इसलिए मोहिनी एकादशी के दिन भूलकर भी तुलसी की पत्तियों को न तो स्पर्श करना चाहिए और न ही इन्हें तोड़ना चाहिए। तुलसी की पत्तियां तोड़ने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं। 3. काले वस्त्र- धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी शुभ अवसर या फिर पूजा-पाठ के दौरान काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। इसलिए मोहिनी एकादशी के दिन काले रंग के कपड़े पहनने से बचें। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date भगवान विष्णु की असीम कृपा पाने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा। 4. मास-मदिरा- मोहिनी एकादशी के दिन भूलकर भी मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नराज हो सकते हैं।  5. अपमान- कोशिश करें की इस दिन आप किसी का दिल न दुखाएं और वाद-विवाद से भी बचें। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date किसी का भी अपमान करने से बचें और न ही किसी का मजाक उड़ाएं।  Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date:मोहिनी एकादशी का व्रत बहुत मंगलकारी माना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप को समर्पित है। साधक इस दिन व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा-पाठ करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi 2025) का व्रत 8 मई को रखा जाएगा। इस दिन माता तुलसी की पूजा बेहद फलदायी मानी जाती है। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date इसलिए सुबह व्रती उठकर पवित्र स्नान के बाद मां तुलसी को जल चढ़ाएं। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date फिर मां के सामने घी का दीपक जलाएं। तुलसी चालीसा, मंत्र का जप करें। आखिरी में आरती करें। पूजा में हुई गलतियों के लिए माफी मांगे। Mohini Ekadashi Vrat 2025 Date।।तुलसी चालीसा।। श्री तुलसी महारानी, करूं विनय सिरनाय। जो मम हो संकट विकट, दीजै मात नशाय।। नमो नमो तुलसी महारानी, महिमा अमित न जाय बखानी। दियो विष्णु तुमको सनमाना, जग में छायो सुयश महाना।। विष्णुप्रिया जय जयतिभवानि, तिहूँ लोक की हो सुखखानी। भगवत पूजा कर जो कोई, बिना तुम्हारे सफल न होई।। जिन घर तव नहिं होय निवासा, उस पर करहिं विष्णु नहिं बासा। करे सदा जो तव नित सुमिरन, तेहिके काज होय सब पूरन।। कातिक मास महात्म तुम्हारा, ताको जानत सब संसारा। तव पूजन जो करैं कुंवारी, पावै सुन्दर वर सुकुमारी।। कर जो पूजन नितप्रति नारी, सुख सम्पत्ति से होय सुखारी। वृद्धा नारी करै जो पूजन, मिले भक्ति होवै पुलकित मन।। श्रद्धा से पूजै जो कोई, भवनिधि से तर जावै सोई। कथा भागवत यज्ञ करावै, तुम बिन नहीं सफलता पावै।। छायो तब प्रताप जगभारी, ध्यावत तुमहिं सकल चितधारी। तुम्हीं मात यंत्रन तंत्रन, सकल काज सिधि होवै क्षण में।। औषधि रूप आप हो माता, सब जग में तव यश विख्याता, देव रिषी मुनि औ तपधारी, करत सदा तव जय जयकारी।। वेद पुरानन तव यश गाया, महिमा अगम पार नहिं पाया। नमो नमो जै जै सुखकारनि, नमो नमो जै दुखनिवारनि।। नमो नमो सुखसम्पति देनी, नमो नमो अघ काटन छेनी। नमो नमो भक्तन दुःख हरनी, नमो नमो दुष्टन मद छेनी।। नमो नमो भव पार उतारनि, नमो नमो परलोक सुधारनि। नमो नमो निज भक्त उबारनि, नमो नमो जनकाज संवारनि।। नमो नमो जय कुमति नशावनि, नमो नमो सुख उपजावनि। जयति जयति जय तुलसीमाई, ध्याऊँ तुमको शीश नवाई।। निजजन जानि मोहि अपनाओ, बिगड़े कारज आप बनाओ। करूँ विनय मैं मात तुम्हारी, पूरण आशा करहु हमारी।। शरण चरण कर जोरि मनाऊं, निशदिन तेरे ही गुण गाऊं। क्रहु मात यह अब मोपर दाया, निर्मल होय सकल ममकाया।। मंगू मात यह बर दीजै, सकल मनोरथ पूर्ण कीजै। जनूं नहिं कुछ नेम अचारा, छमहु मात अपराध हमारा।। बरह मास करै जो पूजा, ता सम जग में और न दूजा। प्रथमहि गंगाजल मंगवावे, फिर सुन्दर स्नान करावे।। चन्दन अक्षत पुष्प् चढ़ावे, धूप दीप नैवेद्य लगावे। करे आचमन गंगा जल से, ध्यान करे हृदय निर्मल से।। पाठ करे फिर चालीसा की, अस्तुति करे मात तुलसा की। यह विधि पूजा करे हमेशा, ताके तन नहिं रहै क्लेशा।। करै मास कार्तिक का साधन, सोवे नित पवित्र सिध हुई जाहीं। है यह कथा महा सुखदाई, पढ़े सुने सो भव तर जाई।। तुलसी मैया तुम कल्याणी, तुम्हरी महिमा सब जग जानी। भाव ना तुझे माँ नित नित ध्यावे, गा गाकर मां तुझे रिझावे।। यह श्रीतुलसी चालीसा पाठ करे जो कोय। गोविन्द सो फल पावही जो मन इच्छा होय।। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। 

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Mangal Gitam:श्री मंगल गीतम

Mangal Gitam:मंगल गीतम (श्री मंगल गीतम): जब किसी जातक की कुंडली में मंगल गोचर में या गोचर में खराब प्रभाव डाल रहा हो या मंगल की स्थिति और जातकों का दखल खराब हो तो दिए गए मंगल गीतम का प्रतिदिन जाप करने से मंगल से संबंधित समस्या से मुक्ति मिलती है। मंगल गीतम का प्रतिदिन पाठ करने से मंगल अपना बुरा प्रभाव छोड़कर शुभ फल देने लगता है। अगर आप पर कर्ज या ऋण का बोझ बढ़ गया है और आप चाहकर भी ऋण नहीं ले पा रहे हैं तो अगर आप नियमित रूप से मंगल गीतम का पाठ करेंगे तो आपका कर्ज धीरे-धीरे उतर जाएगा। जैसा कि आप जानते हैं कि मंगल का संबंध हनुमान जी से है और हनुमान जी सर्वशक्ति प्रदाता हैं। इस श्लोक को हनुमान जी की पूजा के रूप में भी जाना जाता है। इस महंगे युग में एक बहुत ही आम समस्या है पैसे की बचत करने की समस्या और इसलिए अधिकतम लोग अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। Mangal Gitam धन इस भौतिक संसार का देवता है और इसलिए अपनी जरूरतों को पूरा करने और खुद को सफल बनाने के लिए इसका होना बहुत जरूरी है। इस युग में प्रतिस्पर्धा, महँगाई, अवांछित खर्चों के कारण धन कमाना और उसे बचाना बहुत कठिन है। Mangal Gitam:मंगल गीतम भगवान मंगल/मंगल की प्रार्थना करने का एक विशेष तरीका है जो शक्ति, संपत्ति, समृद्धि, साहस, क्रोध और सफलता पर नियंत्रण रखता है। ऐसी मान्यता है कि प्रतिदिन भक्तिपूर्वक मंगल गीतम का पाठ करने से सफलता के मार्ग खुल सकते हैं। मंगल देवी पृथ्वी के पुत्र हैं और व्यक्ति को कर्ज मुक्त करने में सक्षम हैं। Mangal Gitam उनका आसन स्थिर है और उनका शरीर शक्तिशाली है और वे कर्तव्यों को पूरा करने में आने वाली सभी बाधाओं को जड़ से खत्म करने में भी सक्षम हैं। Mangal Gitam:मंगल गीतम के लाभ: मंगल गीतम का उपयोग करके प्रतिदिन मंगल पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिल सकती है।भगवान मंगल की कृपा से कमाई में रुकावटें आसानी से दूर हो सकती हैं।व्यक्ति काम करने और सफलतापूर्वक कमाने की शक्ति विकसित कर सकता है।इस मंगल गीतम का प्रतिदिन पाठ करने से व्यक्ति संतोषजनक मौद्रिक शक्ति प्राप्त करके सफल जीवन जी सकता है।यह कुज दोष या मांगलिक दोष को कम करने में मदद कर सकता है। Mangal Gitam:इस गीत का पाठ किसे करना चाहिए: जिन व्यक्तियों की कुंडली में मांगलिक दोष है, जो गरीबी, जुनून और अन्य प्रकार के अवसाद से पीड़ित हैं, उन्हें इस मंगल गीत का पाठ अवश्य करना चाहिए । श्री मंगल गीतम हिंदी पाठ:Mangal Gitam in Hindi श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए ।कलितललितवनमाल जय जय देव हरे ।। 1 ।। दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए ।मुनिजनमानsहंस जय जय देव हरे ।। 2 ।। कालियविषधरगञ्जन जनरञ्जन ए ।यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ।। 3 ।। मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए ।सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे ।। 4 ।। अमलकमलदललोचन भवमोचन ए ।त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे ।। 5 ।। जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए ।समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे ।। 6 ।। अभिनवजलधरसुंदर धृतमंदर ए ।श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे ।। 7 ।। तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए ।कुरु कुशलं प्रणतेषु जय जय देव हरे ।। 8 ।। श्रीजयदेवकवेरूदितमिदं कुरुते मुदम् ।मंगलमञ्जुलगीतं जय जय देव हरे ।। 9 ।। राधेकृष्ण हरि गोविन्द गोपालहरि वसुदेव बाल भज नन्द दुलालजय जय देव हरे ।। 10 ।। ।। इति श्री मंगल गीतम संपूर्णम्‌ ।।

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भारत भूमातृ स्तोत्र:Bharat Bhumatra Stotram

Bharat Bhumatra Stotra in Hindi:भारत भूमातृ स्तोत्र हिंदी पाठ वन्दे मातरमव्यक्तां व्यक्तां च जननीं पराम् ।दीनोहं बालक: कांक्षे सेवां जन्मनि जन्मनि ।। 1 ।। सागरालिंगिता लक्ष्मीं जगज्जनककन्यकाम् ।स्थितां हिमनगस्यांके पार्वतीमपरां भजे ।। 2 ।। शुभ्रं धर्मध्वजं मातु: किं वा राशीकृतं यश: ।रौप्यं वा मुकुटं दिव्यं वन्देऽहं तं हिमालयम् ।। 3 ।। जाह्नवीयमुनासिन्धुब्रह्मपुत्रशतद्रुभि: ।भूदेवीं पंचधाराभि सततं साभिषिचंति ।। 4 ।। नगाधिपं धारयंती मस्तके रत्नमद्वयम् ।काश्मीरं च ललाटे भ्रूमध्ये नेपालिकां शुभाम् ।। 5 ।। Bharat Bhumatra Stotra नर्मदातापतीविंध्यसप्तपीठकमेखलाम् ।पूर्वापराचलोरूँ च मलयं पादपीठके ।मध्यदेशोदरे गुप्तानक्षयान् धनसंचयान् ।। 6 ।। असुराणां पुरी लंका दासी यंच्चरणयो: कृता । तां देवी भारतीं वन्दे मातरं विश्वपूजिताम् ।। 7 ।। दृष्टा चैवोपनिषदां गीतशास्त्रप्रवर्तक: ।षड्दर्शनप्रवक्ता च भगवान्पाणिनिर्मुनि: ।। 8 ।। वाल्मीकिश्र्च तथा व्यास: कालिदासो महाकवि: ।आर्यभट्टश्र्च भरत: शंकरोऽद्वैतकेसरी ।। 9 ।। भीष्मरामार्जुना वीरा नृपौ रामयुधिष्ठिरौ ।सावित्री द्रोपदी सीता दमयंती च तारका ।। 10 ।। महाधान्यद्वितीयानि रत्नान्येतानि भूतले ।जननी भारती तेषां रत्नगर्भा कथं न सा ।। 11 ।। वसुंधरा रत्नगर्भा रसा विश्र्वंभरा क्षमा ।सर्वसहा स्थिरा चैव भारती भूसुकन्यका ।। 12 ।। रत्नाकर: स्वयं भक्त्या मुक्तो पायनपूर्वकम् ।चरणान्क्षालयत्यस्या अंतद्रश्र्च दिवानिशम् ।। 13 ।।  कैलासद्वारकाधीशौ रामेश्वरपुरीश्र्वरौ ।द्वारपाला वभूबुश्र्च सौभाग्यं मातुरद्भुतम् ।। 14 ।। पोषयन्ति सदा मातु: पर्वतस्तनमण्डलात् ।नि:सृहाश्र्च पयोधारा: संततीनां परंपरा ।। 15 ।। पुत्रवत्सलता मातुरगाथा हरिणा स्वयम् ।अवतीर्योदरे सोढं गर्भदुखं पुन: पुन: ।। 16 ।। Bharat Bhumatra Stotra मरणे जन्मकाले च मुमूर्षुर्नवबालक: ।त्वदंके चैव संशेते अहो वत्सलता तव ।। 17 ।। पद्मालया त्वमेवासि त्वमेव च सरस्वती ।अन्नपूर्णा त्वमेवासि त्वमेव च शिवा सती ।। 18 ।। त्वदृक्षा: कल्पवृक्षाश्र्च चिंतामणिशिला: शिला: ।त्वद्वनं नन्दनं साक्षात्साक्षात्वं स्वर्गदेवता ।। 19 ।। प्रतिजन्मनि मे चित्तं वित्तं देहश्र्च संतति: ।त्वत्सेवानिरता भूयुर्माता त्वं करुणामयी ।। 20 ।। न मे वांछाऽस्ति यशसि विद्वत्तवे न च वा सुखे ।प्रभुत्वं नैव वा स्वर्गे मोक्षेत्यानंददायके ।। 21 ।। परं च भारते जनम मानवस्य च वा पशो: ।विहंगस्य च वा जन्तोर्व्रक्षपाषाणयोरपि ।। 22 ।। निरंतरं भवतु मे मातृ सेवांशभाग्यभाक् ।एषैव वांछा ह्रदये साक्षी सर्वात्मक: प्रभु: ।। 23 ।। Bharat Bhumatra Stotra।। इति भारत भूमातृ स्तोत्र संपूर्णम्‌ ।।

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अन्नपूर्णा मंदिर:अयोध्या, उत्तरप्रदेश, भारत

3200 वर्ग फुट में फैला अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। अन्नपूर्णा मंदिर:भारत में माता अन्नपूर्णा के कई सारे मंदिर हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर में बने अन्नपूर्णा मंदिर की अपनी अलग पहचान है। 3200 वर्ग फुट में फैला अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर की ऊंचाई 100 फुट से भी अधिक है। यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। लोग मान्यता अनुसार यहां मांगने वालो की हर मुराद पूरी होती है। मंदिर न केवल धार्मिक आगंतुकों के लिए है, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो प्राचीन भारतीय कला और हिंदू धर्म के वर्चस्व के बारे में जानना चाहते हैं। Annapurna Temple:मंदिर का इतिहास अन्नपूर्णा मंदिर की स्थापना 63 साल पहले यानी 1959 में हुई। इसकी स्थापना ब्रह्मलीन स्वामी प्रभानंद गिरी महाराज ने की थी। मंदिर से मिली जानकारी के मुताबिक महाराज का जन्म 14 जनवरी 1911 को आंध्रप्रदेश के नंदी कुटकुट स्थान पर हुआ। 15 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ वैराग्य लिया। बाद में स्वामी प्रभानंद गिरी जी उज्जैन होते हुए गुजरात पहुंचे जहां प्रसिद्ध देव स्थल गिरनार पर्वत पर कठोर तपस्या की, वहीं उन्हें भगवती अम्बिका का दर्शन हुआ और वहां से वे इंदौर आ गए। 1955 में इंदौर आने के बाद वे रणजीत हनुमान मंदिर क्षेत्र में निवास करने लगे। अन्नपूर्णा मंदिर में वट वृक्ष के नीचे बैठकर मां अन्नपूर्णा की भक्ति-साधना में लग गए। यहीं आपने अन्नपूर्णा मंदिर बनाने का संकल्प लिया और भक्तों के सहयोग से 22 फरवरी 1959 को समारोहपूर्वक मां अन्नपूर्णा का श्री विग्रह स्थापित कर प्राण-प्रतिष्ठा की। मंदिर का महत्व मां अन्‍नपूर्णा को भोजन की देवी माना जाता है। मंदिर की अद्भुत स्‍थापत्‍य शैली, विश्‍व प्रसिद्ध मदुरै के मीनाक्षी मंदिर से प्रेरित लगती है। बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने के लिए ट्रस्ट अन्नपूर्णा विद्यालय, अन्नपूर्णा वेद वेदांग विद्यालय चलाया जाता है। साथ ही आसपास के गरीब बच्चों का 12वीं तक की शिक्षा का शर्च भी मंदिर द्वारा उठाया जाता है। अन्नपूर्णा मंदिर में विराजित तीनों देवियों का दिनभर में तीन बार श्रृंगार किया जाता है यहां देवियों का श्रृंगार कराने के लिए आपको मंदिर के पुजारी से या ऑफिस में संपर्क करना होता है। उनके द्वारा फिर दिन आपको बताया जाता है। जिस दिन श्रृंगार करना होता है उसके एक दिन पहले आपको श्रृंगार की सामग्री और साड़ी देना होती है। मंदिर की वास्तुकला अन्नपूर्णा मंदिर इंदौर का सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर को 9 वीं शताब्दी में इंडो-आर्यन और द्रविड़ स्थापत्य शैली के संयोजन का उपयोग करके बनाया गया था। यह मंदिर में हिंदू देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है। इसमें मां अन्नपूर्णा की तीन फुट ऊंची संगमरमर की मूर्ति है। मंदिर की अविश्वसनीय वास्तुकला शैली मदुरई के विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर से प्रभावित है। मंदिर का प्रवेश द्वार बहुत प्रभावशाली है। मंदिर के मुख्य द्वार पर चार बड़े हाथियों की मूर्ति है। मंदिर परिसर के भीतर अन्नपूर्णा, शिव, हनुमान और काल भैरव भगवान को समर्पित मंदिर भी हैं। मंदिर की बाहरी दीवारें अभी भी रंगीन पौराणिक चित्रों में शामिल हैं। मंदिर की दीवारों पर कृष्ण लीला का चित्रण है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM पहला श्रृंगार 05:00 AM – 05:00 AM सुबह की आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM दूसरा श्रृंगार 11:00 AM – 11:00 AM भोग का समय 12:00 PM – 12:00 PM दोपहर में मंदिर खुलने का समय 02:00 PM – 10:00 PM तीसरा श्रृंगार 05:00 PM – 05:00 PM शाम की आरती 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद अन्नपूर्णा मंदिर में भक्त मां को ड्राई फ्रूट्स, फल, लड्डू और खीर का भोग चढ़ाते हैं। श्रद्धालु माता को अन्न भी चढ़ाते हैं।

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गायत्री मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत

मां गायत्री को समर्पित यह शक्तिपीठ भक्तों की धार्मिक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। गायत्री मंदिर:मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के महाराणा प्रताप नगर में स्थित है अद्भुत धार्मिक व आध्यात्मिक स्थल गायत्री मंदिर। यह गायत्री शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध है। मां गायत्री को समर्पित यह शक्तिपीठ भक्तों की धार्मिक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है। भोपाल शहर में व्यायाम के लिए यह मंदिर मुख्य केंद्र माना जाता है। आध्यात्मिक शांति के लिए रोजाना यहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। मंदिर परिसर में एक्यूप्रेशर पार्क बना है, जहां कांटेदार ट्रेक पर चलने से शरीर स्वस्थ्य व निरोगी रहता है। शांतिकुंज हरिद्वार की तर्ज पर इस पार्क की शुरुआत की गई। गायत्री मंदिर में लोग विवाह व उपनयन संस्कार भी कराने आते हैं। Gayatri Mandir का इतिहास गायत्री मंदिर के इतिहास पर नजर डालें तो साल 1980 में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा मंदिर में मां गायत्री की प्राण प्रतिष्ठा की गई। तभी से मंदिर में मां गायत्री की पूजा व हवन संस्कार का कार्य किया जा रहा है। शांतिकुंज हरिद्वार के संस्थापक पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी ने ही गायत्री शक्तिपीठ की स्थापना की थी। इस शक्तिपीठ को बनाने का मुख्य उद्देश्य था कि हरिद्वार की शांतिकुंज आश्रम में होने वाली सभी गतिविधियों को देश के हर छोटे-बड़े गांव शहर कस्बों तक पहुंचाया जा सके। सभी जगहों पर हरिद्वार की तरह धार्मिक आयोजन किया जा सके। मंदिर का महत्व गायत्री मंदिर परिसर में लगे राशि वृक्षों की परिक्रमा से ग्रहों की स्थिति ठीक हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार बुद्ध पूर्णिमा के दिन गायत्री यज्ञ करने से अश्वमेध जैसा फल मिलता है। ऐसा माना जाता है की जो भी भक्त इस मंदिर में गायत्री यज्ञ करता है उसके जीवन से सभी कष्ट मिट हाते हैं। मंदिर की वास्तुकला चारों तरफ प्राकृतिक चीजों से घिरा गायत्री मंदिर देखने में काफी सुंदर लगता है। मंदिर में मां गायत्री की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर के पूरे परिसर में दीवारों पर गायत्री मंत्र व अच्छे विचार लिखे गए हैं, जिसे अगर मनुष्य अपना ले तो उसका जीवन सफल बन सकता है। मंदिर में एक बड़ी गौशाला भी है, यहां आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन के साथ गायों को घास खिलाकर परमसुख की अनुभूति करते हैं। मंदिर परिसर में पुस्तक प्रदर्शनी लगती है, जहां धार्मिक, अध्यात्मिक व साहित्य की पुस्तकें मिलती हैं। मंदिर परिसर में एक्यूप्रेशर पार्क सेंटर, स्वास्थ्य भवन सहित अन्य स्वास्थ्य संबंधी भवन बनाए गए हैं। पार्क में नक्षत्र व राशि वाटिका भी है। यानी हर राशि के अनुसार अलग-अलग वृक्ष लगे हैं। पार्क के अंदर ही मां भगवती प्राकृतिक रसाहार केंद्र भी है, जहां आंवला, एलोवेरा, ज्वारे का रस सहित अन्य प्रकार के जूस मिलते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद हैं। एक्यूप्रेशर ट्रेक के पास बहुत से औषधिय पौधें भी लगे हैं, जैसे: आंवला, तुलसी, एलोवेरा, नीम आदि। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM सुबह मां गायत्री की आरती का समय 05:30 AM – 06:00 AM शाम को मां गायत्री की आरती का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद गायत्री मंदिर में किसी प्रकार का कोई प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता है। मंदिर परिसर में बने हवन कुंड में हवन के लिए नारियल, घी, शहद सहित अन्य हवन सामग्री लगती है।

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How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:कैसे शुरू हुए कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष,जानिए इसके पीछे की पौराणिक मान्यता

How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:हिन्दू कैलेंडर यानी पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है। चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है। दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं। kaise shuru hue krishna and shukla paksha:हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने में 30 दिन होते हैं जिनकी गणना सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर की जाती है. इसी पंचांग के आधार पर भारत के अधिकतर राज्यों में व्रत और त्योहार आदि मनाए जाते हैं. पंचाग के मुताबिक पूर्णिमा के बाद यानी कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नया महीना शुरू होता है. How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: चंद्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही हर महीने को कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के आधार पर दो भागों में बांटा जाता है. इसमें 15 दिनों के एक पक्ष को कृष्ण पक्ष, तो बाकी के 15 दिनों का दूसरा शुक्ल पक्ष कहा जाता है. How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:हिन्दू कैलेंडर यानी पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है। चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है। दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:ऐसे होती है कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की गणना पूर्णिमा से अमावस्या के बीच के 15 दिनों को कृष्ण पक्ष कहा जाता है. वहीं, दूसरी तरफ अमावस्या से पूर्णिमा तक की अवधि को शुक्ल पक्ष कहा गया है. अमावस्या के अगले दिन से ही चंद्रमा का आकार बढ़ना शुरू हो जाता है जिससे अंधेरे में भी चंद्रमा की काफी तेज रोशनी दिखाई देती है. अमावस्या के बाद चंद्रमा अपने पूरे तेज पर रहता है. इसलिए शुक्ल पक्ष के इन 15 दिनों के दौरान कोई भी नया काम करना बेहद शुभ माना जाता है. आइए पहले जानते हैं कि कैसे हुई थी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की शुरुआत. What is the difference between Krishna Ekadashi and Shukla Ekadashi? शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष से जुड़ी कथा This is how the Krishna Paksha started:इस तरह हुई कृष्णपक्ष की शुरुआत How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस बेटियों का विवाह चंद्रमा से कर दिया। ये सत्ताईस बेटियां सत्ताईस स्त्री नक्षत्र हैं और अभिजीत नामक एक पुरुष नक्षत्र भी है। लेकिन चंद्र केवल रोहिणी से प्यार करते थे। ऐसे में बाकी स्त्री नक्षत्रों ने अपने पिता से शिकायत की कि चंद्र उनके साथ पति का कर्तव्य नहीं निभाते। दक्ष प्रजापति के डांटने के बाद भी चंद्र ने रोहिणी का साथ नहीं छोड़ा और बाकी पत्नियों की अवहेलना करते गए। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: तब चंद्र पर क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने उन्हें क्षय रोग का शाप दिया। क्षय रोग के कारण सोम या चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे कम होता गया। कृष्ण पक्ष की शुरुआत यहीं से हुई।  This is how Shuklapaksha started:ऐसे शुरू हुआ शुक्लपक्ष How Kirhsna paksha and shukla paksha started story:कहते हैं कि क्षय रोग से चंद्र का अंत निकट आता गया। वे ब्रह्मा के पास गए और उनसे मदद मांगी। तब ब्रह्मा और इंद्र ने चंद्र से शिवजी की आराधना करने को कहा। शिवजी की आराधना करने के बाद शिवजी ने चंद्र को अपनी जटा में जगह दी। ऐसा करने से चंद्र का तेज फिर से लौटने लगा। इससे शुक्ल पक्ष का निर्माण हुआ। How Kirhsna paksha and shukla paksha started story: चूंकि दक्ष ‘प्रजापति’ थे। चंद्र उनके शाप से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकते थे। शाप में केवल बदलाव आ सकता था। इसलिए चंद्र को बारी-बारी से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में जाना पड़ता है। दक्ष ने कृष्ण पक्ष का निर्माण किया और शिवजी ने शुक्ल पक्ष का।

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Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai:सभी एकादशियों में बड़ी एकादशी कौन – कौन सी होती हैं,सबसे शुभ माना जाता है इन चार एकादशी को….

Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai:हर माह आने वाली एकादशी की दो तिथियां भगवान विष्णु की अराधना के लिए समर्पित होती हैं. एक वर्ष में कुल 24 एकादशी आती हैं लेकिन उनमें से कुछ एकादशी बहुत खास मानी जाती हैं. Most Important Ekadashi:हर माह आने वाली एकादशी की दो तिथियां भगवान विष्णु की अराधना के लिए समर्पित होती हैं. इस दिन भक्त व्रत रखकर विधि-विधान से भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा करते हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai मान्यता है कि एकादशी का व्रत रखने और भगवान विष्णु की अराधना से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और सांसारिक कष्ट मिट जाते हैं. एक वर्ष में कुल 24 एकादशी (Ekadashi) आती हैं लेकिन उनमें से कुछ एकादशी बहुत खास होती हैं. आइए जानते हैं कौन सी 4 एकादशी का महत्व होता है सबसे अधिक. Ekadashi | हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में महत्वपूर्ण होता हैं और साल में चौबीस एकादशी आती हैं यानि कि हर महीने में दो एकादशी होती हैं एक कृष्ण पक्ष की और दूसरी शुक्ल पक्ष की लेकिन जिस साल अधिक मास या फिर मलमास आती हैं तो एकादशी व्रत की संख्या दो बढ़ जाया करती हैं अर्थात 24 एकादशी की जगह 26 एकादशी होती हैं अधिक मास में परमा और पद्मिनी एकादशी नाम की होती हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai सभी एकादशी व्रत भगवान विष्णु की पूजा अर्चना के लिए समर्पित होती हैं मान्यता है कि जो भी एकादशी व्रत को सच्चे मन से करता है उसे उसके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती हैं और इस लोक में सभी सुखों को भोगकर मृत्यु के बाद स्वर्ग में स्थान प्राप्त करता है कहा जाता हैं कि एकादशी व्रत के प्रताप से पितरों को मोक्ष मिलता हैं. हर एकादशी का अपना विशेष महत्व होता लेकिन सभी एकादशियों में से चार एकादशियों ऐसी है जिनको विशेष महत्व माना गया है और वे सभी एकादशी बड़ी एकादशी कहलाती हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai :आइए जानते हैं साल की चार बड़ी एकादशी और उनके महत्व को…. 1) आमलकी एकादशी : Amalaki Ekadashi Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai आमलकी एकादशी फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है इस एकादशी को आंवला एकादशी और रंगभरनी एकादशी भी कहा जाता हैं. आमलकी एकादशी को सारे एकादशियों में श्रेष्ठ माना जाता हैं क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु के साथ आंवले वृक्ष की भी विधिवत पूजन किया जाता हैं. Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai यह एकादशी साल की एक मात्र ऐसी एकादशी है जिसमें भगवान विष्णु के अलावा भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा होती हैं मान्यता है कि इस एकादशी के दिन भगवान शंकर के गण शंकर पार्वती के संग गुलाल की होली खेलते हैं इसी लिए इस एकादशी को रंगभरनी एकादशी भी कहा जाता हैं. आमलकी एकादशी का महत्व :Importance of Amalaki Ekadashi Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai धार्मिक मान्यता हैं कि आमलकी एकादशी व्रत को करने से सभी पाप धुल जाते हैं और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु को आंवला फल को चढ़ाने से भक्त को अच्छे स्वास्थ्य, धन और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. शास्त्रों के अनुसार जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्माजी का जन्म हुआ तब उसी समय भगवान विष्णु ने आंवले वृक्ष को आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया जिसके हर भाग में ईश्वर का स्थान माना जाता हैं. 2) पापमोचनी एकादशी : Papmochani Ekadashi पापमोचनी एकादशी चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती हैं और धार्मिक मान्यता के अनुसार पापमोचनी एकादशी का विशेष महत्व है. पापमोचनी दो शब्द पाप और मोचनी से मिलकर बना है Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai जिसमें पाप का अर्थ पाप या फिर दुष्कर्म और मोचनी का अर्थ है हटाने वाला यानि कि पापमोचनी एकादशी का व्रत को करने वालों को उनके पापों से मुक्ति मिल जाती हैं. पापमोचनी एकादशी का महत्व : Importance of Papamochani Ekadashi: पापमोचनी एकादशी का व्रत रखने से मन की चंचलता खत्म होने के साथ ही धन और आरोग्य की प्राप्ति होती हैं.पुराणों के अनुसार इस एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के सारे कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai तो वहीं पापमोचनी एकादशी व्रत से जाने अनजाने में कि गई पाप और गलतियों से छुटकारा मिल जाता हैं और उसे सहस्त्र गोदान यानि हजार गायों के बराबर दान का फल मिलता हैं मान्यता है कि ब्रह्म हत्या, स्वर्ण चोरी, सुरापान और गुरुपत्नी गमन जैसे महापाप भी पापमोचनी एकादशी व्रत को करने से दूर हो जाते हैं. 3) निर्जला एकादशी : Nirjala Ekadashi निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती हैं. इस एकादशी में निर्जल व्रत यानि कि बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती हैं. निर्जला एकादशी को भीम एकादशी भी कहा जाता हैं. मान्यता है कि जो कोई भी यह व्रत रखता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने के साथ ही यश, वैभव और सुख की प्राप्ति होती हैं. निर्जला एकादशी का महत्व : Importance of Nirjala Ekadashi: निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन और पवित्र व्रतों में से एक है इस एकादशी के बारे में मान्यता है कि अगर पूरे साल एक भी एकादशी का व्रत नहीं करते हैं और जो निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं Sabse Badi Ekadashi Kaun – kaun Hoti Hai तो उनकों संपूर्ण एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता हैं. पद्म पुराण के अनुसार इस व्रत को करने से दीर्घायु और मोक्ष मिलता है इस व्रत को अन्न और जल त्याग करके व्रत करना पड़ता हैं. 4) देवोत्थान एकादशी : Devotthan Ekadashi देवोत्थान एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है इस एकादशी को देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देव शयन करते हैं और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को उठते हैं इसीलिए इसे देवोत्थान एकादशी या देवउठनी एकादशी कहते हैं. इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती

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