Maharishi Dadhichi

Maharishi Dadhichi Jayanti: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा

Maharishi Dadhichi Jayanti Kab hai: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा Maharishi Dadhichi: हर साल भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को महर्षि दधीचि जयंती पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह दिन एक ऐसे महान संत के सर्वोच्च त्याग को याद करने का अवसर है, जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। वर्ष 2025 में, यह पावन पर्व 31 अगस्त को मनाया जाएगा। आइए, इस विशेष अवसर पर महर्षि दधीचि की प्रेरणादायक कहानी को जानें, जिन्होंने अपने निस्वार्थ बलिदान से देवताओं और संसार की रक्षा की। Maharishi Dadhichi Introduction to a great ascetic: महर्षि दधीचि: एक महान तपस्वी का परिचय महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi प्राचीन काल के सबसे पूज्य और महत्वपूर्ण संतों में से एक माने जाते हैं। वे ऋषि अथर्वा और माता शांति (कुछ मान्यताओं के अनुसार चित्ति) के पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी (या कुछ स्थानों पर शांति, जो कर्दम ऋषि की पुत्री थीं) और पुत्र का नाम पिप्पलाद था। महर्षि दधीचि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन घोर तपस्या में समर्पित कर दिया था। उनकी अटूट भक्ति और तपस्या के कारण उन्हें पूरे देश में अत्यंत सम्मान प्राप्त था। An attempt to break the doubts and penance of Devraj Indra: देवराज इंद्र की शंका और तपस्या भंग करने का प्रयास एक पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि दधीचि की घोर तपस्या से तीनों लोकों में भय का माहौल बन गया, और यहां तक कि देवराज इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगा। इंद्र को लगा कि दधीचि उनके इंद्रलोक और सिंहासन को हथियाना चाहते हैं। इस आशंका में, इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा रूपवती को भेजा। हालाँकि, Maharishi Dadhichi महर्षि दधीचि अपनी एकाग्रता में अटल रहे और अप्सरा अपने प्रयास में विफल रही। रूपवती ने स्वर्ग लौटकर इंद्र को दधीचि की एकाग्र शक्ति के बारे में बताया, जिसके बाद इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने महर्षि से क्षमा याचना की। वृत्रासुर का आतंक और देवताओं की दुर्दशा: The terror of Vritrasura and the plight of the gods समय बीतने के साथ, वृत्रासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को देवलोक से बाहर निकाल दिया था। वृत्रासुर इतना बलशाली था कि देवताओं के सभी अस्त्र-शस्त्र उसके सामने निष्प्रभावी हो गए और उसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र प्रभावित नहीं कर पा रहा था। देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर सहायता के लिए ब्रह्माजी के पास पहुंचे। Brahmaji’s advice and Maharishi’s amazing sacrifice: ब्रह्माजी की सलाह और महर्षि का अद्भुत त्याग ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि वृत्रासुर का वध केवल महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की अस्थियों से बने विशेष वज्र से ही किया जा सकता है, क्योंकि उनकी हड्डियाँ असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। देवताओं के कल्याण के लिए यही एकमात्र उपाय था। देवराज इंद्र, अपने पूर्व के एक अपमानजनक व्यवहार के कारण महर्षि दधीचि के पास जाने में हिचकिचा रहे थे। (एक कथा के अनुसार, इंद्र ने एक बार दधीचि का अपमान किया था और उनके सिर को धड़ से अलग करने की धमकी दी थी जब महर्षि ब्रह्म विद्या अश्विनीकुमारों को देने वाले थे; अश्विनीकुमारों ने महर्षि के धड़ पर अश्व का सिर लगाकर विद्या प्राप्त की थी, जिसके बाद इंद्र ने उनका असली सिर धड़ से अलग कर दिया था, जिसे बाद में अश्विनीकुमारों ने फिर से जोड़ा था।)। लेकिन वृत्रासुर के बढ़ते अत्याचारों के कारण, उन्हें आखिरकार महर्षि दधीचि के पास जाना पड़ा और अपनी समस्या बताई। महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi ने, बिना किसी संकोच के, देवताओं और संसार के कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने का निर्णय लिया। भगवान शिव से प्राप्त वरदान के कारण उनका शरीर और अस्थियां असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। उन्होंने स्वेच्छा से अपने प्राणों का त्याग कर दिया, ताकि उनकी अस्थियों से वृत्रासुर का वध किया जा सके। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Creation of Vajra and killing of Vritrasura:वज्र का निर्माण और वृत्रासुर का वध महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की पवित्र अस्थियों से देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक शक्तिशाली वज्र का निर्माण किया। देवराज इंद्र ने इसी वज्र का प्रयोग कर वृत्रासुर का वध किया और देवताओं को उसकी आतंक से मुक्ति दिलाई। इस महान बलिदान के कारण, देवताओं और पूरे संसार की रक्षा हुई, और इंद्र की जय-जयकार होने लगी। त्याग की विरासत और पिप्पलाद का जन्म:Legacy of renunciation and birth of Pippalad महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi का यह बलिदान अनुपम है और सदियों से त्याग तथा निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक रहा है। उनकी पत्नी गभस्तिनी को जब इस त्याग का पता चला, तो वह सती होने को तैयार हो गईं। देवताओं ने उन्हें रोका, यह बताते हुए कि वह गर्भवती हैं। तब देवताओं ने उनके गर्भ को निकालकर पीपल के वृक्ष को उसके पालन-पोषण का दायित्व सौंपा। इसी कारण दधीचि के पुत्र का नाम पिप्पलाद ऋषि पड़ा। निष्कर्ष महर्षि दधीचि जयंती हमें निस्वार्थता, त्याग और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा की याद दिलाती है। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि जन कल्याण के लिए सर्वोच्च त्याग भी छोटा होता है। इस पावन दिन पर, हम उन महान ऋषि को नमन करते हैं जिन्होंने अपनी अस्थियों का दान कर मानवता की रक्षा की।

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Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व – पाएं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद! Kab Hai Durva Ashtami: हर साल भाद्रपद मास में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, राधा अष्टमी और अनंत चतुर्दशी प्रमुख हैं। इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण पर्व है दूर्वा अष्टमी। यह पर्व दूर्वा घास को समर्पित है, जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। दूर्वा घास को केवल घास नहीं माना जाता, बल्कि इसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है, जिसका प्रयोग लगभग सभी हिंदू अनुष्ठानों में किया जाता है। आइए जानते हैं दूर्वा अष्टमी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके धार्मिक महत्व को विस्तार से। दूर्वा अष्टमी 2025 कब है? (Durva Ashtami 2025 Date) वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 30 अगस्त 2025 को देर रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। यह तिथि 31 अगस्त 2025 को देर रात 12 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है, इसलिए दूर्वा अष्टमी का पर्व 31 अगस्त 2025 (रविवार) को मनाया जाएगा। दूर्वा अष्टमी 2025 के शुभ योग (Durva Ashtami 2025 Shubh Yog) दूर्वा अष्टमी के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देते हैं। • अनुराधा नक्षत्र: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर अनुराधा नक्षत्र का संयोग शाम 05 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। • ज्येष्ठा नक्षत्र: इसके बाद ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग बनेगा। • भद्रावास योग: इस शुभ अवसर पर भद्रावास योग का निर्माण हो रहा है, जो दिन में 11 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भद्रा स्वर्ग में रहेंगी, और भद्रा के स्वर्ग में रहने के दौरान पृथ्वी वासियों का कल्याण होता है। दूर्वा अष्टमी का धार्मिक महत्व(Religious significance of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी Durva Ashtami का दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति-भाव से पूजा की जाती है। दूर्वा घास को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है और हिंदू धर्म में कई पूजाएं इसके बिना अधूरी मानी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर व्रत रखने और दूर्वा घास की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और रौनक आती है, साथ ही भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि पौराणिक कथा और दूर्वा घास का महत्व: प्राचीन कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के सिर से कुछ बाल गिरे थे, जिन्हें दूर्वा घास माना जाता है। यह भी माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत की कुछ बूँदें इस पर गिरी थीं, जिससे यह अत्यंत शुद्ध हो गई। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को दूर्वा घास का महत्व बताया था। दूर्वा अष्टमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान(Rituals performed on the day of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी का त्योहार विशेष रूप से महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस दिन किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं: • स्नान और वस्त्र धारण: महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और नए वस्त्र धारण करती हैं। • विशेष पूजा: दूर्वा अष्टमी के दिन विशेष प्रकार की पूजा और अन्य रीति-रिवाज किए जाते हैं। • भोग और सामग्री: पूजा में फल, फूल, चावल, धूपबत्ती, दही और अन्य आवश्यक पूजन सामग्री के साथ भोग चढ़ाया जाता है। • व्रत का संकल्प: इस दिन महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखती हैं और ईश्वर को भोग अर्पित करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। दूर्वा अष्टमी और पर्यावरण संरक्षण (Durva Ashtami and environmental protection) Durva Ashtami: दूर्वा अष्टमी का पर्व हमें पर्यावरण को सहेजने का भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुड़ी हर एक चीज बहुत महत्वपूर्ण है। दूर्वा घास को घर में भी आसानी से लगाया जा सकता है, और इसे उगाने के लिए विशेष मेहनत की आवश्यकता नहीं पड़ती। सबसे बड़ी बात यह है कि दूर्वा घास को घर में लगाने से शुद्धता और पवित्रता का आगमन होता है। यह त्यौहार हमें यह भी याद दिलाता है कि पेड़-पौधे लगाना कितना आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। पंचांग (31 अगस्त 2025 के लिए) • सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 19 मिनट पर • सूर्यास्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट पर • चंद्रोदय – दोपहर 12 बजकर 08 मिनट से… • चंद्रास्त – रात 10 बजकर 52 मिनट तक • ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 03 बजकर 48 मिनट से 04 बजकर 33 मिनट तक • विजय मुहूर्त – दोपहर 01 बजकर 43 मिनट से 02 बजकर 33 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट से 06 बजकर 17 मिनट तक • निशिता मुहूर्त – रात 11 बजकर 14 मिनट से 12 बजे तक दूर्वा अष्टमी का यह पावन पर्व हमें प्रकृति के प्रति आदर और भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना और व्रत करने से जीवन में सकारात्मकता और खुशहाली आती है। अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई है और केवल सामान्य सूचना के लिए है। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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Shri ambikAShTottarashatanAmAvalI: श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली

Shri ambikAShTottarashatanAmAvalI: श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली ॐ अस्यश्री अम्बिकामहामन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः उष्णिक् छन्दःअम्बिका दुर्गा देवता ॥ [ श्रां – श्रीं इत्यादिना न्यासमाचरेत् ]ध्यानम्या सा पद्मासनस्था विपुलकटतटी पद्मपत्रायताक्षीगम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया ।लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैःनित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥ मन्त्रः – ॐ ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः ॐ ॥ ॥अथ श्री अम्बिकायाः नामावलिः ॥ ॐ अम्बिकायै नमः ।ॐ सिद्धेश्वर्यै नमः ।ॐ चतुराश्रमवाण्यै नमः ।ॐ ब्राह्मण्यै नमः ।ॐ क्षत्रियायै नमः ।ॐ वैश्यायै नमः ।ॐ शूद्रायै नमः ।ॐ वेदमार्गरतायै नमः ।ॐ वज्रायै नमः ।ॐ वेदविश्वविभागिन्यै नमः । १०ॐ अस्त्रशस्त्रमयायै नमः ।ॐ वीर्यवत्यै नमः ।ॐ वरशस्त्रधारिण्यै नमः । ॐ सुमेधसे नमः ।ॐ भद्रकाल्यै नमः ।ॐ अपराजितायै नमः ।ॐ गायत्र्यै नमः ।ॐ संकृत्यै नमः ।ॐ सन्ध्यायै नमः ।ॐ सावित्र्यै नमः । २०ॐ त्रिपदाश्रयायै नमः ।ॐ त्रिसन्ध्यायै नमः ।ॐ त्रिपद्यै नमः ।ॐ धात्र्यै नमः ।ॐ सुपथायै नमः ।ॐ सामगायन्यै नमः ।ॐ पाञ्चाल्यै नमः ।ॐ कालिकायै नमः ।ॐ बालायै नमः ।ॐ बालक्रीडायै नमः । ३० ॐ सनातन्यै नमः ।ॐ गर्भाधारायै नमः ।ॐ आधारशून्यायै नमः ।ॐ जलाशयनिवासिन्यै नमः ।ॐ सुरारिघातिन्यै नमः ।ॐ कृत्यायै नमः ।ॐ पूतनायै नमः ।ॐ चरितोत्तमायै नमः ।ॐ लज्जारसवत्यै नमः ।ॐ नन्दायै नमः । ४०ॐ भवायै नमः ।ॐ पापनाशिन्यै नमः ।ॐ पीतम्बरधरायै नमः ।ॐ गीतसङ्गीतायै नमः ।ॐ गानगोचरायै नमः ।ॐ सप्तस्वरमयायै नमः ।ॐ षद्जमध्यमधैवतायै नमः ।ॐ मुख्यग्रामसंस्थितायै नमः ।ॐ स्वस्थायै नमः ।ॐ स्वस्थानवासिन्यै नमः । ५०ॐ आनन्दनादिन्यै नमः । ॐ प्रोतायै नमः ।ॐ प्रेतालयनिवासिन्यै नमः ।ॐ गीतनृत्यप्रियायै नमः ।ॐ कामिन्यै नमः ।ॐ तुष्टिदायिन्यै नमः ।ॐ पुष्टिदायै नमः ।ॐ निष्ठायै नमः ।ॐ सत्यप्रियायै नमः ।ॐ प्रज्ञायै नमः । ६०ॐ लोकेशायै नमः ।ॐ संशोभनायै नमः ।ॐ संविषयायै नमः ।ॐ ज्वालिन्यै नमः ।ॐ ज्वालायै नमः ।ॐ विमूर्त्यै नमः ।ॐ विषनाशिन्यै नमः ।ॐ विषनागदम्न्यै नमः ।ॐ कुरुकुल्लायै नमः । ॐ अमृतोद्भवायै नमः । ७०ॐ भूतभीतिहरायै नमः ।ॐ रक्षायै नमः ।ॐ राक्षस्यै नमः ।ॐ रात्र्यै नमः ।ॐ दीर्घनिद्रायै नमः ।ॐ दिवागतायै नमः ।ॐ चन्द्रिकायै नमः ।ॐ चन्द्रकान्त्यै नमः ।ॐ सूर्यकान्त्यै नमः ।ॐ निशाचरायै नमः । ८०ॐ डाकिन्यै नमः ।ॐ शाकिन्यै नमः ।ॐ हाकिन्यै नमः ।ॐ चक्रवासिन्यै नमः ।ॐ सीतायै नमः ।ॐ सीताप्रियायै नमः ।ॐ शान्तायै नमः ।ॐ सकलायै नमः ।ॐ वनदेवतायै नमः । ॐ गुरुरूपधारिण्यै नमः । ९०ॐ गोष्ठ्यै नमः ।ॐ मृत्युमारणायै नमः ।ॐ शारदायै नमः ।ॐ महामायायै नमः ।ॐ विनिद्रायै नमः ।ॐ चन्द्रधरायै नमः ।ॐ मृत्युविनाशिन्यै नमः ।ॐ चन्द्रमण्डलसङ्काशायै नमः ।ॐ चन्द्रमण्डलवर्तिन्यै नमः ।ॐ अणिमाद्यै नमः । १००ॐ गुणोपेतायै नमः ।ॐ कामरूपिण्यै नमः ।ॐ कान्त्यै नमः ।ॐ श्रद्धायै नमः ।ॐ पद्मपत्रायताक्ष्यै नमः ।ॐ पद्महस्तायै नमः ।ॐ पद्मासनस्थायै नमः ।ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः । १०८॥ॐ॥

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aparAdhakShamApaNastotram:अपराधक्षमापणस्तोत्रम्

aparAdhakShamApaNastotram: अपराधक्षमापणस्तोत्रम् ॐ अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥ १॥ सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ।इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २॥ अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ ३॥ कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ॥ ४॥ सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत् ।अतोऽहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम् ॥ ५॥ यदक्षरं परिभ्रष्टं मात्राहीनञ्च यद्भवेत् ।पूर्णं भवतु तत् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥ ६॥ यदत्र पाठे जगदम्बिके मया विसर्गबिन्द्वक्षरहीनमीरितम् ।तदस्तु सम्पूर्णतमं प्रसादतः सङ्कल्पसिद्धिश्व सदैव जायताम् ॥ ७॥ यन्मात्राबिन्दुबिन्दुद्वितयपदपदद्वन्द्ववर्णादिहीनंभक्त्याभक्त्यानुपूर्वं प्रसभकृतिवशात् व्यक्त्तमव्यक्त्तमम्ब ।मोहादज्ञानतो वा पठितमपठितं साम्प्रतं ते स्तवेऽस्मिन्तत् सर्वं साङ्गमास्तां भगवति वरदे त्वत्प्रसादात् प्रसीद ॥ ८॥ प्रसीद भगवत्यम्ब प्रसीद भक्तवत्सले ।प्रसादं कुरु मे देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ९॥ ॥ इति अपराधक्षमापणस्तोत्रं समाप्तम्॥

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Shri Chandika Stuti: श्रीचण्डिकास्तुतिः

Shri Chandika Stuti: श्रीचण्डिकास्तुतिः विविक्ततर-गोमती-जठर-मध्य-सिद्धाश्रमां पुरोगत-सरोवर-स्फुरदगाध-पाथश्छटाम् ।विशाल-तलतुङ्ग-भूलुलित-निम्बमूलालयां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ १॥ न लक्ष्य-घटनाश्रयां न च विशेष-वेश्मावहां घटानुकृति-गोमती-वहन-भाव्यमानास्पदाम् ।नमज्जन-मनोरथारचन-चारु-चिन्तामणिं भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ २॥ निरन्तर-समुल्लसत्कमल-कीर्ण-पाथोजिनी- प्रतान-घनसम्पदा कमपि सम्मदं तन्वतीम् ।त्रिकोण-सरसीमयीं, परिणतिं पुरो बिभ्रतीं, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ३॥ अनुग्रह-रसच्छटामिव सरःश्रियं यान्तिके विकासयति, पद्मिनीदल-सहस्रसन्दानिताम् ।प्रतिक्षण-समुन्मिषत्प्रमद-मेदुरां तामहं, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ४॥ प्रचण्डयति विक्रमं, झटिति खण्डयत्यापदः सुमण्डयति वाक्कलां, सदसि दण्डयत्युद्धतान् ।करण्डयति रोदसी, गुण-समृद्धिभिर्या हि तां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ५॥ श्रुताऽभिलषिता, मता, सुकलिता, समभ्यर्चिता सुधा-पृषत-वर्षिभिर्नवनवैर्वचोभिः स्तुता ।जयाय खलु कल्पते बहुविधादृता, तामहं भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ६॥ इतस्तत उदित्वर-व्रततिनद्ध-वृक्षावली- लुलद्विहग-मण्डली-मधुरराव-संसेविताम् ।स्खलत्कुसुम-सौरभ-प्रसर-पूर्यमाणाश्रमां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ७॥ द्विषत्कुल-कृपाणिकां, कुटिलकाल-विध्वंसिकां, विपद्वन-कुठारिकां, त्रिविध-दुःख-निर्वासिकाम् ।कृपाकुसुम-वाटिकां, प्रणत-भारती-भासिकां, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ८॥ ब्रह्माण्डाधिक-देहापि गोमती-तीर-चङ्क्रमा ।जयाय भजतां भूयाच्चण्डिका चण्ड-विक्रमा ॥ ९॥ इति दुर्गाप्रसादद्विवेदीविरचिता चण्डिकास्तुतिः समाप्ता ।

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Love Dreams

Love Dreams: सपने में प्रेमी या प्रेमिका को देखना – शुभ या अशुभ संकेत? जानिए क्या कहते हैं आपके सपने

Love Dreams:स्वप्न शास्त्र: सपने में प्रेमी या प्रेमिका को देखना – शुभ या अशुभ संकेत? जानिए क्या कहते हैं आपके सपने! Love Dreams: क्या कभी आपको सपने में अपने प्रेमी या प्रेमिका दिखाई दिए हैं? अगर हाँ, तो आपने सोचा होगा कि इसका क्या मतलब हो सकता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हमारे सपने सिर्फ़ एक सामान्य घटना नहीं होते, बल्कि वे हमें हमारे भविष्य के बारे में शुभ या अशुभ संकेत दे सकते हैं. बहुत से लोग स्वप्न शास्त्र में लिखी बातों पर भरोसा करते हैं, जबकि कुछ इसे महज़ एक साधारण घटना समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं. हालांकि, Love Dreams ज्योतिष शास्त्र में भी सपनों को लेकर बहुत सी चीज़ों के बारे में बताया गया है. इस ब्लॉग पोस्ट में, हम जानेंगे कि सपने में अपने बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड को देखने का क्या मतलब हो सकता है, और यह किस अवस्था में देखा गया है, इस पर भी निर्भर करता है. सपने में प्रेमी या प्रेमिका का सामान्य रूप से दिखना: स्वप्न शास्त्र मानता है कि यदि सपने में आपको प्रेमी या प्रेमिका दिखाई देते हैं, Love Dreams तो इसका मतलब है कि आने वाले जीवन में आपके प्रेम प्रसंगों की शुरुआत होने वाली है. मुस्कुराते हुए प्रेमी या प्रेमिका को देखना: एक शुभ संकेत यदि आपको अपने सपने में प्रेमी या प्रेमिका मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं, तो इसे एक बहुत ही शुभ सपना माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इसका अर्थ है कि आपको अपने प्रेमी या प्रेमिका का प्रेम मिलने वाला है. साथ ही, यह संकेत देता है कि आपका रिश्ता विवाह तक भी पहुँच सकता है. Love Dreams: प्रेमिका को विशेष वेशभूषा या अवस्था में देखना: कुछ विशेष अवस्थाएँ या वेशभूषाएँ भी सपनों में महत्वपूर्ण अर्थ रखती हैं: • लाल रंग के कपड़े में: यदि सपने में आपकी प्रेमिका लाल रंग के कपड़े पहने नज़र आती है, तो आपको अपने प्रेम संबंधों में सफलता ज़रूर मिलेगी. • लहंगे में: यदि प्रेमिका लहंगे में नज़र आती है, तो उससे आपकी शादी होने की संभावना बढ़ जाएगी. • कंगन पहने हुए: अगर आप अपने सपनों में अपनी प्रेमिका को कंगन पहने हुए या कंगनों के साथ देखते हैं, Love Dreams तो इसका अर्थ है कि आपकी प्रेमिका ही आपके जीवनसाथी के लिए योग्य है. Love Dreams इसके अलावा, यह आपके जीवन में आने वाले धन की तरफ भी संकेत करता है. • मीठा खाते हुए: यदि सपने में आप अपनी प्रेमिका को मीठा खाते हुए देखते हैं, तो यह आपके जीवन में एक शुभ संकेत देता है. इसका मतलब है कि आपका पूरा जीवन प्रेम से भरा हुआ होगा. • परी के रूप में: सपने में प्रेमिका को किसी परी के रूप में देखना भी आपकी किस्मत बदलने वाला सपना है. • पालतू जानवर के साथ: यदि सपने में आपकी प्रेमिका किसी पालतू जानवर जैसे खरगोश या तोते के साथ दिखाई दे, तो यह इस बात की ओर इशारा है कि जल्दी ही आपकी प्रेमिका से मुलाकात होने वाली है.  सपने में अपने फोन के टूटने का सपना देखते हैं तो इसका क्या मतलब होता है ? अपने पार्टनर से शादी होते देखना: प्रेम विवाह की संभावना अगर आप सपने में अपनी शादी अपने पार्टनर से होते हुए देखते हैं, तो इसका अर्थ है कि आपके लव मैरिज की संभावना बन रही है. रोते हुए प्रेमी या प्रेमिका को देखना: सावधानी की आवश्यकता वहीं, अगर कोई व्यक्ति अपने सपने में अपने बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड को रोते हुए देखता है, तो इस प्रकार के सपने को शुभ नहीं माना गया है. Love Dreams स्वप्न शास्त्र के अनुसार, ऐसा सपना आपको यह संकेत देता है कि आपका प्रेमी या प्रेमिका आपसे नाराज़ है या फिर आपसे विश्वासघात कर सकता है. ऐसा माना जाता है कि यह सपना संकेत करता है कि आने वाले समय में आपका अपने पार्टनर के साथ किसी बात को लेकर विवाद हो सकता है, जो आपके रिश्तों के लिए ठीक नहीं है. ऐसे में आपको सचेत रहने की आवश्यकता है. सपने में झगड़ा करना: लव लाइफ में परेशानियां अगर आप सपने में अपने पार्टनर से झगड़ते हुए दिखाई देते हैं, तो इसका मतलब यह है कि आपकी लव लाइफ में कुछ परेशानियाँ आ सकती हैं. ऐसे में आपको सावधान रहने की ज़रूरत है. पार्टनर से बात करते हुए देखना: जल्द खुशखबरी यदि कोई लड़का या लड़की सपने में अपने पार्टनर से बात कर रहा है, Love Dreams तो इसका अर्थ है कि आपकी लव लाइफ में जल्द ही कोई खुशखबरी आ सकती है. या फिर ये सपना इस बात की ओर भी संकेत करता है कि आपकी अपने लव पार्टनर के साथ शादी पक्की हो सकती है. प्रेमी-प्रेमिका की शादी होते देखना: आंतरिक कमज़ोरी का संकेत यदि आप अपने सपने में प्रेमी-प्रेमिका की शादी होते देखते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप अंदर से कमज़ोर हो रहे हैं या फिर आपका अपने प्रेमी के प्रति प्रेम कम हो रहा है. निष्कर्ष: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हमारे सपने हमारे जीवन और रिश्तों के बारे में महत्वपूर्ण संकेत दे सकते हैं. चाहे आप अपने प्रेमी या प्रेमिका को मुस्कुराते हुए देखें या रोते हुए, हर सपने का एक ख़ास अर्थ होता है, जो आपको भविष्य के लिए तैयार रहने में मदद कर सकता है. Love Dreams इन संकेतों को समझकर आप अपने रिश्तों को बेहतर बना सकते हैं और आने वाली परिस्थितियों के लिए स्वयं को तैयार कर सकते हैं. डिसक्लेमर: ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है. विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियाँ आप तक पहुँचाई गई हैं. हमारा उद्देश्य महज़ सूचना पहुँचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज़ सूचना समझकर ही लें. इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की ज़िम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी

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Shri Ganesha Stotram Shrishivakritam: श्रीशिवकृतं श्रीगणेशस्तोत्रम्

Shri Ganesha Stotram Shrishivakritam: श्रीशिवकृतं श्रीगणेशस्तोत्रम् ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥श्रीशिव उवाच ।गणेशाय परेशाय धूम्रवर्णाय ढुण्ढये ।शिवात्मजाय सर्वेषां मात्रे पित्रे नमो नमः ॥ २२॥गणेशाय गुणानां ते स्रष्ट्रे पात्रे महात्मने ।संहर्त्रे देवदेवाय हेरम्बाय नमो नमः ॥ २३॥अनन्तविभवायैवानन्तमायाप्रचालक ।अनन्तोदरगायैव विघ्नेशाय नमो नमः ॥ २४॥ज्येष्ठराजाय ज्येष्ठाय ज्येष्ठानां ज्येष्ठरूपिणे ।सर्वपूज्याय ते सर्वादिपूज्याय नमो नमः ॥ २५॥स्वानन्दपतये तुभ्यं मूषकध्वजधारिणे ।सिद्धिबुद्धिपते नाथेक्षुसागरपते नमः ॥ २६॥मनोवाणीविहीनाय मनोवाणीमयाय ते ।योगेशाय महाविष्णुसुताय ते नमो नमः ॥ २७॥ शेषपुत्राय त्रैलोक्यक्षेत्रस्थाय नमो नमः ।दण्डकारण्यदेवाय ब्रह्मेशाय नमो नमः ॥ २८॥यत्र वेदादयो नाथ योगिनः शान्तिमाययुः ।तं पश्यामि गणाधीशं धन्योऽहं सर्वभावतः ॥ २९॥नेत्राणि धन्यरूपाणि प्रभो त्वत् दर्शनेन मे ।मस्तकानि नमस्कारात् स्तवनान् मे मुखानि ते ॥ ३०॥हस्ताः पूजनतस्ते मे धन्याः सर्वं मदीयकम् ।धन्यं ते पादपद्मस्य दर्शनेन गजानन ॥ ३१॥भक्तिं देहि त्वदीयां मे तयाऽहं गणनायक ।कृतकृत्यो भविष्यामि शान्तियोगपरायणः ॥ ३२॥त्रिपुरस्य वधार्थाय सामर्थ्यं देहि शाश्वतम् ।महेश त्वं गणाधीश सार्थकं कुरु नित्यदा ॥ ३३॥ इति श्रीशिवकृतं श्रीगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ – ॥ मुद्गलपुराणं अष्टमः खण्डः । अध्यायः १२ । ८.१२ २२-३३॥

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Ekadanta Stuti Naradamunikrita: नारदमुनिकृता एकदन्तस्तुतिः

Ekadanta Stuti Naradamunikrita: नारदमुनिकृता एकदन्तस्तुतिः ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥नारद उवाच ।नमामि गणनाथं तं सर्वविघ्नविनाशिनम् ।वेदान्तागोचरं तज्ज्ञैर्गम्यं ब्रह्मैव संस्थितम् ॥ ४०॥मनोवाणीविहीनं नो मनोवाणीमयं न च ।ब्रह्मेशानं कथं स्तौमि सिद्धिबुद्धिपतिं परम् ॥ ४१॥त्वद्दर्शनेन हेरम्ब कृतकृत्योऽहमञ्जसा ।इत्युक्त्वा पूजयामास भक्तिभावसमन्वितः ॥ ४२॥पूजयित्वा गणेशानं पुनस्तुष्टाव नारदः ।रोमाञ्चितशरीरोऽसौ भावयुक्तो महामुनिः ॥ ४३॥नमो नमो गणेशाय विघ्नराजाय ते नमः ।भक्तानां विघ्नहन्त्रे चाभक्तानां विघ्नकारिणे ॥ ४४॥ अमेयमायया चैव संयुक्ताय नमो नमः ।योगरूपाय वै तुभ्यं योगिभ्यो मोहदाय ते ॥ ४५॥विनायकाय सर्वेश नमश्चिन्तामणे नमः ।अनन्तमहिमाधार नमस्ते चन्द्रमौलये ॥ ४६॥एकदन्ताय देवाय मायिभ्यो मोहदाय ते ।नमो नमः परेशाय परात्परतमाय ते ॥ ४७॥निर्गुणाय नमस्तुभ्यं गुणाकाराय साक्षिणे ।महाखुवाहनायैव मूषकध्वजधारिणे ॥ ४८॥अनादये नमस्तुभ्यं ज्येष्ठराजाय ढुण्ढये ।हर्त्रे कर्त्रे सदा पात्रे नानाभेदमयाय च ॥ ४९॥त्वद्दर्शनसुधापानाद्धतं मे भ्रान्तिजं महत् ।मरणं भिन्नभावाख्यं गणेशोऽहं कृतस्त्वया ॥ ५०॥न भिन्नं परिपश्यामि त्वदृते गणनायक ।शान्तिदं योगमासाद्य प्रसादात्ते न संशयः ॥ ५१॥भक्तिं देहि गणाधीश परां त्वत्पादपद्मयोः ।कुरु मां गाणपत्यं त्वं प्रेमयुक्तं च ते पदि ॥ ५२॥इत्युक्त्वा विररामाथ तं पुनर्गणपोऽवदत् ।मदीया भक्तिरत्यन्तं भविष्यति सदाऽचला ॥ ५३॥ (फलश्रुतिः)एकदन्त उवाच ।न योगाच्चलनं क्वापि भविष्यति महामुने ।सदा योगीन्द्रपूज्यस्त्वं सर्वमान्यो भविष्यसि ॥ ५४॥त्वया कृतमिदं स्तोत्रं शान्तियोगप्रदं भवेत् ।पठते श‍ृण्वते चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥ ५५॥इत्युक्त्वा तस्य हृदये ययौ लीनो गजाननः ।सदा हृदि गणेशानं पश्यति स्म मुनिः स्वयम् ॥ ५६॥इत्याख्यानं नारदीयं कथितं ते प्रजापते ।श‍ृणुयाद्यः पठेद्वा यः सोऽपि सद्गतिमाप्नुयात् ॥ ५७॥ इति नारदमुनिकृता एकदन्तस्तुतिः सम्पूर्णा ॥ – ॥ मुद्गलपुराणं द्वितीयः खण्डः । अध्यायः ३ । २.३ ४०-५७॥

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Shri Ashtavinayaka Stotram: श्री अष्टविनायकस्तोत्रम्

Shri Ashtavinayaka Stotram: श्री अष्टविनायकस्तोत्रम् स्वस्ति श्रीगणनायको गजमुखो मोरेश्वरः सिद्धिदः बल्लाळस्तु विनायकस्तथ मढे चिन्तामणिस्थेवरे ।लेण्याद्रौ गिरिजात्मजः सुवरदो विघ्नेश्वरश्चोझरे ग्रामे रांजणसंस्थितो गणपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥ इति अष्टविनायकस्तोत्रं सम्पूर्णम् । स्वस्ति श्रीगणनायकं गजमुखं मोरेश्वरं सिद्धिदं बल्लाळं मुरुडं विनायकं मढं चिन्तामणीस्थेवरम् ।लेण्याद्रिं गिरिजात्मजं सुवरदं विघ्नेश्वरं ओझरं ग्रामे रांजणसंस्थितं गणपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥

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haridrAgaNeshakavacham: हरिद्रागणेशकवचम्

haridrAgaNeshakavacham: हरिद्रागणेशकवचम् श्रीगणेशाय नमः ।ईश्वर उवाच ।श‍ृणु वक्ष्यामि कवचं सर्वसिद्धिकरं प्रिये ।पठित्वा पाठयित्वा च मुच्यते सर्वसङ्कटात् ॥ १॥ अज्ञात्वा कवचं देवि गणेशस्य मनुं जपेत् ।सिद्धिर्नजायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि ॥ २॥ ॐ आमोदश्च शिरः पातु प्रमोदश्च शिखोपरि ।सम्मोदो भ्रूयुगे पातु भ्रूमध्ये च गणाधिपः ॥ ३॥ गणाक्रीडो नेत्रयुग्मं नासायां गणनायकः ।गणक्रीडान्वितः पातु वदने सर्वसिद्धये ॥ ४॥ जिह्वायां सुमुखः पातु ग्रीवायां दुर्मुखः सदा ।विघ्नेशो हृदये पातु विघ्ननाथश्च वक्षसि ॥ ५॥ गणानां नायकः पातु बाहुयुग्मं सदा मम ।विघ्नकर्ता च ह्युदरे विघ्नहर्ता च लिङ्गके ॥ ६॥ गजवक्त्रः कटीदेशे haridrAgaNeshakavacham एकदन्तो नितम्बके ।लम्बोदरः सदा पातु गुह्यदेशे ममारुणः ॥ ७॥ व्यालयज्ञोपवीती मां पातु पादयुगे सदा ।जापकः सर्वदा पातु जानुजङ्घे गणाधिपः ॥ ८॥ हारिद्रः सर्वदा पातु सर्वाङ्गे गणनायकः ।य इदं प्रपठेन्नित्यं गणेशस्य महेश्वरि ॥ ९॥ कवचं सर्वसिद्धाख्यं सर्वविघ्नविनाशनम् ।सर्वसिद्धिकरं साक्षात्सर्वपापविमोचनम् ॥ १०॥ सर्वसम्पत्प्रदं साक्षात्सर्वदुःखविमोक्षणम् ।सर्वापत्तिप्रशमनं सर्वशत्रुक्षयङ्करम् ॥ ११॥ ग्रहपीडा ज्वरा रोगा ये चान्ये गुह्यकादयः ।पठनाद्धारणादेव नाशमायन्ति तत्क्षणात् ॥ १२॥ धनधान्यकरं देवि कवचं सुरपूजितम् ।समं नास्ति महेशानि त्रैलोक्ये कवचस्य च ॥ १३॥ हारिद्रस्य महादेवि विघ्नराजस्य भूतले ।किमन्यैरसदालापैर्यत्रायुर्व्ययतामियात् ॥ १४॥ ॥ इति विश्वसारतन्त्रे हरिद्रागणेशकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Lalita Saptami 2025

Lalita Saptami 2025 Date: ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि !

Lalita Saptami 2025 Date:ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Lalita Saptami 2025: हिंदू धर्म में भाद्रपद मास का विशेष महत्व है, क्योंकि इस माह में जन्माष्टमी, राधा अष्टमी और गणेश उत्सव जैसे कई प्रमुख त्योहार आते हैं। इन्हीं पावन पर्वों में से एक है ललिता सप्तमी, जो श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। ललिता देवी, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की प्रिय सखी थीं। Lalita Saptami 2025 यह व्रत सुख, सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। आइए जानते हैं साल 2025 में ललिता सप्तमी कब है, इसका महत्व क्या है और पूजा की सही विधि क्या है। ललिता सप्तमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Lalita Saptami 2025 Date and Muhurat) हर साल ललिता सप्तमी, Lalita Saptami 2025 राधाष्टमी से ठीक एक दिन पहले भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। • ललिता सप्तमी 2025 की तिथि: इस वर्ष ललिता सप्तमी का पावन पर्व 30 अगस्त 2025, शनिवार को मनाया जाएगा। • सप्तमी तिथि का आरंभ: 29 अगस्त 2025, शुक्रवार को रात 08 बजकर 21 मिनट पर होगा। • सप्तमी तिथि का समापन: 30 अगस्त 2025, शनिवार को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। • ललिता/संतान सप्तमी की पूजा दोपहर में करने का विधान है। ललिता सप्तमी का महत्व (Significance of Lalita Saptami) Lalita Saptami 2025: ललिता सप्तमी का त्योहार श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण की आठ प्रमुख सखियाँ थीं – श्री राधा, श्री ललिता, श्री विशाखा, श्री चित्रा, श्री इंदुलेखा, श्री चंपकलता, श्री रंग देवी, श्री सुदेवी और श्री तुंगविद्या। इन सभी सखियों में से नंदलाल श्री राधा जी और ललिता जी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। देवी ललिता को राधा जी के प्रति सबसे समर्पित गोपी माना गया है और राधा व कृष्ण के प्रेम और रासलीला में इनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। मान्यता है कि ललिता सप्तमी का व्रत और पूजा करने से सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। Lalita Saptami 2025 इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में पड़ जाते हैं। नवविवाहित जोड़ों को स्वस्थ और सुंदर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद भी मिलता है। इसके अलावा, यह व्रत संतान की अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए भी रखा जाता है। ललिता सप्तमी पूजा विधि (Lalita Saptami Puja Vidhi) Lalita Saptami 2025: ललिता सप्तमी के दिन विधि-विधान से पूजा करने पर श्री ललिता देवी, राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं। पूजा करते समय इन बातों का ध्यान रखें: 1. स्नान और ध्यान: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें। 2. देवताओं की स्थापना: इसके बाद, देवी ललिता देवी, राधा-कृष्ण या शालिग्राम की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। आप गणेश जी, देवी पार्वती, देवी षष्ठी, कार्तिक और शिव की भी पूजा कर सकते हैं। 3. सामग्री अर्पित करें: घी का दीपक जलाएँ और देवताओं को नारियल, चावल, हल्दी, चंदन, गुलाल, फूल और दूध प्रसाद के रूप में अर्पित करें। 4. भोग लगाएं: मिठाई का भोग लगाएं। इस दिन विशेष रूप से मालपुए का भोग लगाना बेहद शुभ माना गया है। 5. धागा बांधें: पूजा क्षेत्र में एक लाल धागा या मौली रखें। प्रार्थना के बाद, इसे अपने दाहिने हाथ में पहनें। 6. अर्घ्य और प्रार्थना: अंत में, जल का अर्घ्य दें और अपनी मनोकामनाएं मांगें। 7. व्रत का पालन: उपवास सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक होता है, और दिन में केवल एक बार भोजन किया जाता है। 8. विशेष परिस्थितियों में: कामकाजी महिलाओं, पढ़ाई करने वालों और चिकित्सीय समस्याओं वाले लोगों को उपवास नहीं करना चाहिए; उन्हें केवल प्रार्थना करनी चाहिए। 9. व्रत खोलना: अगले दिन सुबह प्रार्थना करने के बाद उपवास तोड़ा जाता है। देवताओं को चढ़ाए गए फल को प्रसाद के रूप में वितरित करें। ललिता सप्तमी व्रत कथा (Lalita Saptami Vrat Katha) ललिता सप्तमी से जुड़ी दो प्रमुख कथाएँ हैं: 1. राधा-कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी की कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण की आठ प्रमुख सखियाँ थीं, जिनमें श्री राधा और श्री ललिता जी प्रमुख थीं। माना जाता है कि श्री कृष्ण इन दोनों से विशेष प्रेम करते थे। ललिता सप्तमी का व्रत श्री कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री Lalita Saptami 2025 ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में लीन हो जाते हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि ललिता सप्तमी की पूजा करने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है। 2. संतान सप्तमी (ललिता सप्तमी) की पौराणिक कथा: पौराणिक ग्रंथों में ऋषि लोमेश के मुख से संतान सप्तमी (जिसे ललिता सप्तमी भी कहा जाता है) की कथा सुनने को मिलती है। एक कथा के अनुसार, अयोध्या के राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी और उनकी सहेली रूपमती (जो एक ब्राह्मण की पत्नी थी) दोनों में बहुत गहरा प्रेम था। Lalita Saptami 2025 एक बार वे सरयू नदी के तट पर स्नान करने गईं, जहाँ उन्होंने देखा कि बहुत सी स्त्रियाँ संतान सप्तमी का व्रत कर रही थीं। उन स्त्रियों से कथा सुनकर, चंद्रमुखी और रूपमती ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए इस व्रत को करने का निश्चय किया, लेकिन घर आकर वे दोनों इस बात को भूल गईं। कुछ समय बाद, दोनों की मृत्यु हो गई और उन्होंने पशु योनि में जन्म लिया। कई जन्मों के बाद, दोनों ने मनुष्य योनि में फिर से जन्म लिया। इस जन्म में चंद्रमुखी का नाम ईश्वरी और रूपमती का नाम भूषणा था। ईश्वरी राजा की पत्नी बनीं और भूषणा ब्राह्मण की पत्नी थीं, और इस जन्म में भी दोनों में बहुत प्रेम था। Lalita Saptami 2025 इस जन्म में भूषणा को पूर्व जन्म की कथा याद थी, इसलिए उसने संतान सप्तमी का व्रत विधि-विधान से किया, जिसके प्रताप से उसे आठ पुत्र प्राप्त हुए। लेकिन ईश्वरी ने इस व्रत का पालन नहीं किया, इसलिए उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण उसे भूषणा

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Mahalakshmi Vrat

Mahalakshmi Vrat 2025 date:लक्ष्मी व्रत 2025 कब है? पूजा विधि, महत्व और शुभ मुहूर्त

Mahalakshmi Vrat 2025: महालक्ष्मी व्रत 2025: आर्थिक संकटों से मुक्ति और सुख-समृद्धि का अचूक उपाय Mahalakshmi Vrat: क्या आप आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं? क्या धन, सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति के रास्ते बंद नजर आ रहे हैं? यदि ऐसा है, तो महालक्ष्मी व्रत आपके लिए एक बहुत ही कारगर और अचूक उपाय साबित हो सकता है। यह 16 दिवसीय व्रत धन और समृद्धि की देवी, माता महालक्ष्मी को समर्पित है, जिनके प्रताप से कंगाल भी धनवान बन जाता है और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा की संपूर्ण विधि। महालक्ष्मी व्रत का महत्व ( Significance of Mahalaxmi Vrat) महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि से आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि तक 16 दिनों तक मनाया जाता है। इन 16 दिनों में माता महालक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। Mahalakshmi Vrat मान्यता है कि जो भक्त इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं, उन पर मां लक्ष्मी की असीम कृपा बनी रहती है, Mahalakshmi Vrat और उनके जीवन से सभी दुख-दर्द और आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं। Mahalakshmi Vrat यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो धन संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं और जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। महालक्ष्मी व्रत 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Mahalaxmi Vrat 2025 Date and Muhurat) इस साल, महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 31 अगस्त 2025 से होगी और इसका समापन 14 सितंबर 2025 को होगा। • भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि: 30 अगस्त 2025 को रात 10 बजकर 46 मिनट पर शुरू होगी। • अष्टमी तिथि का समापन: अगले दिन 1 सितंबर 2025 को सुबह 12 बजकर 57 मिनट पर होगा। • चंद्रोदय का समय: दोपहर 1 बजकर 11 मिनट। कुल मिलाकर यह व्रत 16 दिनों का होता है, जिसमें से संपूर्ण व्रत के दिन 15 होते हैं। महालक्ष्मी पूजा विधि (Mahalaxmi Puja Vidhi) महालक्ष्मी व्रत की पूजा विधिवत रूप से करने पर मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और अपनी कृपा भक्तों पर बरसाती हैं। पूजा करते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखें: 1. सबसे पहले, भगवान गणेश के साथ मां लक्ष्मी की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। 2. मां के सामने गुलाब और कमल के फूल, साड़ी, सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, बिछिया, धूप, दीप और फल अर्पित करें। 3. एक गुलाबी या लाल रंग का धागा लें, उसमें 16 गांठें लगाएं और उसकी भी पूजा करें। यह प्रक्रिया आपको 15 दिनों तक करनी है। 4. इसके बाद, महालक्ष्मी मंत्र का जाप करें और अपनी मनोकामनाएं मांगें। 5. व्रत के अंतिम दिन (आश्विन कृष्ण अष्टमी), मां लक्ष्मी की मूर्ति का विसर्जन कर दें। Mahalakshmi Vrat आप चाहें तो मूर्ति को अपने पूजा घर में भी स्थापित कर सकते हैं। 6. जब व्रत पूरा हो जाए, तो वस्त्र से एक मंडप बनवाएं और उसमें लक्ष्मीजी की प्रतिमा रखें। 7. प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। 8. सोलह प्रकार से पूजा करें। 9. रात्रि के समय तारागणों को पृथ्वी के प्रति अर्घ्य दें और लक्ष्मी जी की प्रार्थना करें। 10. व्रत रखने वाली स्त्रियाँ ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उनसे हवन करवाएं। हवन में खीर की आहुति दें। 11. चंदन, ताल, पत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल और नाना प्रकार के पदार्थ नए सूप में सोलह-सोलह की संख्या में रखें। 12. फिर दूसरे नए सूप से ढक कर निम्न मंत्र को पढ़कर लक्ष्मीजी को समर्पित करें: क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्र सहोदरा। व्रतेनाप्नेन सन्तुष्टा भवर्तोद्वापुबल्लभा।। 13. इसके बाद, चार ब्राह्मण और सोलह ब्राह्मणियों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करें। फिर घर में बैठकर स्वयं भोजन करें। नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ अगर 16 दिन व्रत न रख पाएं तो क्या करें? (What if you can’t fast for 16 days?) यह व्रत धन और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए किया जाता है। यदि किसी कारणवश आप पूरे 15 दिन का व्रत नहीं रख पाते हैं, Mahalakshmi Vrat तो आप व्रत के शुरुआत के 3 दिन या फिर आखिर के 3 दिन भी व्रत रख सकते हैं। Mahalakshmi Vrat माना जाता है कि ऐसा करने से भी व्रत पूरा हो जाता है और आपको महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार जो भक्त विधि-विधान से महालक्ष्मी व्रत Mahalakshmi Vrat करते हैं, वे इस लोक में सभी सुखों का भोग करते हैं और बहुत काल तक लक्ष्मी लोक में भी सुख पाते हैं। तो, इस साल महालक्ष्मी व्रत का संकल्प लें और अपने जीवन में धन, सुख और समृद्धि का आह्वान करें!

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