Bishnoi Sthapana Divash

Bishnoi Sthapana Divash 2025: बिश्नोई स्थापना दिवस

Bishnoi Sthapana Divash Kab Hai: बिश्नोई स्थापना दिवस सन् 1485 से कार्तिक कृष्णा अष्टमी को बिश्नोई संप्रदाय के द्वारा मनाया जाता है। इस संप्रदाय की स्थापना गुरु जम्भेश्वर जी ने की थी। Bishnoi Sthapana Divash बिश्नोई शब्द को विष्णु से लिया गया, जिसका अर्थ है विष्णु के अनुयायी। विभिन्न विचारों के अनुसार बिश्नोई संप्रदाय में 2 9 सिद्धांतों का पालन किया जाता है। Bishnoi Sthapana Divash बिश का अर्थ है 20(बीस) और नोई का मतलब 9 (नौ)। इस प्रकार, बिश्नोई बीस-नियम के रूप में भी अनुवादित किया जाता है। बिश्नोई समाजी लोग प्रकृति एवं जंगली जानवरों के अत्यधिक प्रेमी होते हैं। प्रारंभ में, Bishnoi Sthapana Divash बिश्नोई सम्प्रदाय को अपनाने वाले अधिकतर लोग जाट समुदाय से थे। अतः बिश्नोई सम्प्रदाय को कुछ जगह बिश्नोई जाट भी बोला जाता है। Bishnoi Sthapana Divash 2025: बिश्नोई स्थापना दिवस अनुष्ठान सप्तमी से ही मुक्तिधाम मुकाम में जाम्भाणी सत्संग का आयोजन किए जाते हैं।अष्टमी को मुक्तिधाम मुकाम से शोभा यात्रा निकली जाती है। शोभा यात्रा में भगवें झण्डे के सात 29 नियमों की पट्टिकाओं के साथ बिश्नोई जन सम्मिलित होते हैं।बिश्नोईयों के‌ आद्य स्थल समराथल‌ धोरा पर जाम्भाणी यज्ञ के साथ पवित्र पाहल बनाया‌ जाता है, बिश्नोई जन अपने संकल्पों को दोहराएंगे।महासभा द्वारा तैयार प्रसाद-भोज‌ का भोजशाला में आकर ग्रहण करते हैं। Bishnoi Sthapana Divash: बिश्नोई समाजी लोग प्रकृति एवं जंगली जानवरों के अत्यधिक प्रेमी होते हैं। प्रारंभ में, बिश्नोई सम्प्रदाय को अपनाने वाले अधिकतर लोग जाट समुदाय से थे। अतः बिश्नोई सम्प्रदाय को कुछ जगह बिश्नोई जाट भी बोला जाता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने चैंपियन ऑफ अर्थ अवार्ड 2018 का श्रेय विश्नोई समाज को दिया ।तथा बिश्नोईयो के पर्यावरण के लिए बलिदान की परंपरा को विश्व इतिहास की अनोखी घटना भी बताया। संबंधित अन्य नाम बिश्नोई समाज स्थापना दिवस शुरुआत तिथि कार्तिक कृष्णा अष्टमी कारण बिश्नोई संप्रदाय स्थापना दिवस उत्सव विधि व्रत, भजन-कीर्तन, मंदिर में प्रार्थना

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Radha Kund Snan

Radha Kund Snan 2025 Date And Time: अहोई अष्टमी पर कब किया जाएगा राधा कुंड स्नान? जानें सही तिथि, मुहूर्त और संतान प्राप्ति का महत्व

Radha Kund Snan 2025 mein kab hai: अहोई अष्टमी का व्रत हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर किया जाता है। इस दिन, मथुरा के गोवर्धन में स्थित राधा कुंड में स्नान करने का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताएं कहती हैं कि इस पवित्र कुंड में डुबकी लगाने से निसंतान दंपत्ति (Childless couples) को संतान की प्राप्ति हो सकती है। यह पर्व केवल संतान की कामना रखने वाले जोड़ों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी साधकों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। Radha Kund Snan 2025 Date And Time:राधा कुंड स्नान 2025: सही तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की Radha Kund Snan अष्टमी तिथि पर अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। इसी दिन राधा कुंड में स्नान का विधान है। राधा कुंड स्नान की सही तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार है: विवरण तिथि और समय अष्टमी तिथि की शुरुआत 13 अक्टूबर, रात 12 बजकर 24 मिनट पर अष्टमी तिथि का समापन 14 अक्टूबर, सुबह 11 बजकर 09 मिनट पर राधा कुंड स्नान की तिथि सोमवार, 13 अक्टूबर (उदया तिथि के अनुसार) स्नान का शुभ मुहूर्त (निशिता काल) रात 11 बजकर 41 मिनट से रात 12 बजकर 30 मिनट तक यह स्नान अर्ध रात्रि यानी निशिता काल में किया जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस समय स्नान करने से संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी हो सकती है। Ahoi Ashtami 2025 Date: 13 या 14 अक्टूबर? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि राधा कुंड स्नान का महत्व: क्यों माना जाता है इसे वरदान:Importance of taking bath in Radha Kund: Why is it considered a boon: Radha Kund Snan: राधा कुंड गोवर्धन परिक्रमा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अहोई अष्टमी के दिन इस कुंड में डुबकी लगाने का विशेष महत्व है, खासकर उन विवाहित जोड़ों के लिए जो संतान सुख से वंचित हैं। 1. संतान प्राप्ति का वरदान: ऐसी मान्यता है कि अहोई अष्टमी के दिन अर्ध रात्रि (निशिता काल) में श्रद्धापूर्वक राधा कुंड में स्नान करने से निसंतान दंपत्ति की संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी हो जाती है। 2. मनोकामना पूर्ति: जो भी साधक इस दिन श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। 3. ईश्वरीय कृपा: इस कुंड में स्नान करने से साधक को न केवल राधा रानी की, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की कृपा की भी प्राप्ति होती है। संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होने के बाद, जोड़े दोबारा इस Radha Kund Snan कुंड में आकर स्नान करते हैं और राधा रानी जी का धन्यवाद प्रकट करते हैं। राधा कुंड में स्नान करने की विधि (Sacred Ritual) संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए राधा कुंड में स्नान करने की एक विशेष विधि है, जिसका पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है: 1. व्रत और संकल्प: संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए स्नान करने वाले जोड़े पूरे दिन व्रत रखते हैं। 2. मध्य रात्रि का स्नान: जोड़े मध्य रात्रि (निशिता काल) में कुंड में स्नान करते हैं। 3. विशेष सामग्री: स्नान के दौरान, कच्चा सफेद कद्दू, जिसे ‘पेठा’ भी कहा जाता है, उसे एक लाल कपड़े में बांधकर अपने हाथों में रखा जाता है। 4. ध्यान और कामना: स्नान करते समय साधक राधा रानी का ध्यान करते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ति की कामना करते हैं। 5. अर्पण: स्नान के बाद, यह ‘पेठा’ राधा रानी को अर्पित किया जाता है। राधा रानी की पूजा के समय मंत्रों का जप करना और श्रीजी की पूजा करना भी शुभ माना जाता है। Story of Radha Kund Bath:राधा कुंड स्नान की कहानी Radha Kund Snan राधा कुंड का निर्माण भगवान कृष्ण ने अरिस्तासुर को मारने के बाद किया था जोकि एक बैल रूपी राक्षस था। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, बैल धर्म का प्रतीक है क्योंकि यह गाय के परिवार से संबंधित है। इसलिए राधारानी और गोपीयों के अनुसार, भगवान कृष्ण ने बैल को मार कर धार्मिक अपराध किया था। Radha Kund Snan राधा जी ने कृष्ण से सभी पवित्र नदियों में पवित्र स्नान करके स्वयं को शुद्ध करने के लिए कहा। अतः राधारानी को खुश करने के लिए, भगवान कृष्ण ने सभी पवित्र स्थानों का पानी एक ही स्थान पर एकत्र किया। कृष्णा ने अपने कमल चरणों को जमीन पर मारा जिससे उस स्थान पर सभी अलौकिक और पवित्र नदियों का पानी एकत्रित हो गया, और उस समय से, यह स्थान श्याम कुंडा के रूप में जाना जाता है। यह देखकर, राधारानी ने अपनी चूड़ियों के साथ जमीन खोदकर श्याम कुंडा के पास एक और कुंड बनाया। सभी पवित्र जल निकायों ने राधा जी से अनुरोध किया कि वे बनाए गए कुंड में प्रवेश करें। Radha Kund Snan इसलिए, इस तरह राधा कुंड बनाया गया था। राधा कुंड के तट पर, राधा रानी के आठ प्रमुख सखियों के नाम पर कुल आठ कुंज भी स्थित हैं।

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Ahoi Ashtami 2025

Ahoi Ashtami 2025 Date: 13 या 14 अक्टूबर? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Ahoi Ashtami 2025 Date: अहोई अष्टमी हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे खासतौर पर माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना के लिए करती हैं। यह व्रत कार्तिक माह में मनाया जाता है और इस वर्ष यह 13 अक्टूबर को पड़ रहा है।  अहोई अष्टमी हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे खासतौर पर माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना के लिए करती हैं। यह व्रत कार्तिक माह में मनाया जाता है और इस वर्ष यह 13 अक्टूबर को पड़ रहा है। Ahoi Ashtami 2025 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी व्रत से न केवल संतान की दीर्घायु सुनिश्चित होती है, बल्कि संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले परिवारों में भी विशेष कृपा मिलती है। अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami 2025) हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना के लिए बड़े उत्साह के साथ मनाती हैं। Ahoi Ashtami 2025 यह व्रत हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत संतान सुख की प्राप्ति और सुख-समृद्धि में वृद्धि के लिए भी विशेष फलदायी होता है। इस वर्ष Ahoi Ashtami 2025 अहोई अष्टमी की सही तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति है। आइए जानते हैं वैदिक पंचांग के अनुसार अहोई अष्टमी व्रत की सही तारीख और शुभ मुहूर्त। अहोई अष्टमी 2025 कब है? (Ahoi Ashtami 2025 Date) वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार अहोई अष्टमी का पर्व 13 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। यह व्रत सुहागिन महिलाएं निर्जला (बिना जल के) रखती हैं। संतान की दीर्घायु सुनिश्चित करने के अलावा, यह व्रत संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले परिवारों के लिए भी विशेष कृपा लेकर आता है। अष्टमी तिथि और शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat) कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत और समापन का विवरण इस प्रकार है: विवरण जागरण (Jagran) हिन्दुस्तान (Hindustan) अष्टमी तिथि की शुरुआत 13 अक्टूबर, रात 12 बजकर 24 मिनट पर 13 अक्टूबर, दोपहर 12 बजकर 24 मिनट पर अष्टमी तिथि का समापन 14 अक्टूबर, रात 11 बजकर 9 मिनट पर 14 अक्टूबर, सुबह 11 बजकर 09 मिनट पर पूजा करने का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 53 मिनट से शाम 7 बजकर 8 मिनट तक शाम 06 बजकर 17 मिनट से शाम 07 बजकर 31 मिनट तक तारों को देखने का समय शाम 6 बजकर 17 मिनट तक शाम 06 बजकर 39 मिनट पर तारों के दर्शन और उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण (व्रत खोलना) किया जाता है। अहोई अष्टमी व्रत की पूजा-विधि (Puja Vidhi) Ahoi Ashtami 2025 अहोई अष्टमी के दिन माताएं भगवान शिव और माता पार्वती के संग अहोई माता की पूजा-अर्चना करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन महादेव की पूजा करने से साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है और जीवन के सभी दुख-संकट दूर होते हैं। 1. व्रत का संकल्प: अहोई अष्टमी के दिन सुबह स्नान करने के बाद माताएं व्रत का संकल्प लें। 2. पूजा की तैयारी: पूजा की शुरुआत दीवार पर अहोई माता की तस्वीर बनाकर की जाती है। 3. पूजा: रोली, चावल, और जल से पूजा संपन्न करें। एक कलश में जल भरकर रखें। 4. व्रत कथा: पूजा के दौरान अहोई अष्टमी व्रत कथा का पाठ अवश्य करें। माना जाता है कि कथा का पाठ करने से संतान के जीवन से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं और तरक्की के मार्ग खुलते हैं। 5. भोग: माता को पूरी और किसी मिठाई का भोग अर्पित किया जाता है। 6. कामना: अहोई माता से संतान के जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति के लिए कामना करें। 7. तारों को अर्घ्य: सायंकाल, तारों को देखकर माताएं उन्हें अर्घ्य देती हैं और संतान की लंबी उम्र, सुखद जीवन और स्वास्थ्य की कामना करती हैं। 8. पारण और सम्मान: तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। व्रत खोलने से पहले घर के बुजुर्गों को सम्मान स्वरूप वस्त्र या आवश्यक सामग्री भेंट करने की परंपरा है। अहोई अष्टमी पर क्या करें और क्या न करें? (Ahoi Ashtami 2025 Do’s and Don’ts) इस पावन दिन पर कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है: क्या करें (Do’s) • सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें। • पूजा-अर्चना और व्रत कथा का पाठ करें। • अहोई माता से संतान के करियर में तरक्की और लंबी आयु की कामना करें। • इस दिन अन्न-धन समेत अन्य चीजों का दान करने का विशेष महत्व है। • व्रत का पारण करते समय केवल सात्विक भोजन का सेवन करें। क्या न करें (Don’ts) • भूलकर भी काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। • किसी के बारे में गलत न सोचें और किसी से वाद-विवाद या लड़ाई-झगड़ा न करें। • इस दिन जमीन की खुदाई करना वर्जित माना गया है। • फल और सब्जियों को काटने से बचें। • व्रत के दिन दूध का प्रयोग भी निषिद्ध होता है। अहोई अष्टमी व्रत का महत्व:Importance of Ahoi Ashtami fast Ahoi Ashtami 2025 अहोई अष्टमी व्रत का विशेष महत्व माताओं और परिवार के लिए है। यह न केवल संतान की रक्षा और स्वास्थ्य की कामना के लिए किया जाता है, बल्कि पूरे परिवार में समृद्धि, सुख और वैभव लाने का भी माध्यम है। Ahoi Ashtami 2025 यह व्रत करने से संतान को लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है, साथ ही बच्चे के करियर में तरक्की भी होती है। Karwa Chauth 2025 Vrat Upay: करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए..

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SiddhilakShmIstutih:सिद्धिलक्ष्मीस्तुतिः

SiddhilakShmIstutih:सिद्धिलक्ष्मीस्तुतिः आकारब्रह्मरूपेण ओंकारं विष्णुमव्ययम् ।सिद्धिलक्ष्मि! परालक्ष्मि! लक्ष्यलक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ याः श्रीः पद्वने कदम्बशिखरे राजगृहे कुंजरे श्वेते चाश्वयुते वृषे च युगले यज्ञे च यूपस्थिते ।शंखे देवकुले नरेन्द्रभवने गंगातटे गोकुले या श्रीस्तिष्ठति सर्वदा मम गृहे भूयात् सदा निश्चला ॥ या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी गम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुद्धवस्त्रोत्तरीया ।लक्ष्मिर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भै- र्नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमांगल्ययुक्ता ॥ ॥ इति सिद्धिलक्ष्मीस्तुतिः समाप्ता ॥

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shrI lakShmIsUkta:श्रीलक्ष्मीसूक्त

shrI lakShmIsUkta:श्रीलक्ष्मीसूक्त श्री गणेशाय नमः ।ॐ पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि ।विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥ पद्मानने पद्मऊरु पद्माश्री पद्मसम्भवे ।तन्मे भजसिं पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥ अश्वदायै गोदायै धनदायै महाधने ।धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥ पुत्रपौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम् ।प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥ धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्योधनं वसुः ।धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमस्तु मे ॥ वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥ न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जापिनाम् ॥ सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे ।भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते ।धान्य धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥ ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि ।तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥ ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे महश्रियै च धीमहि ।तन्नः श्रीः प्रचोदयात् ॥ विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥ चन्द्रप्रभां लक्ष्मीमैशानीं सूर्याभांलक्ष्मीमैश्वरीम् ।चन्द्र सूर्याग्निसङ्काशां श्रियं देवीमुपास्महे ॥ ॥ इति श्रीलक्ष्मी सूक्तं सम्पूर्णम् ॥

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Shri Aishvaryalakshmi Ashtottarashata Namavalih:श्रीऐश्वर्यलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावलिः

Shri Aishvaryalakshmi Ashtottarashata Namavalih:श्रीऐश्वर्यलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावलिः ॐ श्रीं श्रीं श्रीं ॐऐश्वर्यलक्ष्म्यै नमः ।अनघायै नमः ।अलिराज्यै नमः ।अहस्करायै नमः ।अमयघ्न्यै नमः ।अलकायै नमः ।अनेकायै नमः ।अहल्यायै नमः ।आदिरक्षणायै नमः ।इष्टेष्टदायै नमः ।इन्द्राण्यै नमः ।ईशेशान्यै नमः ।इन्द्रमोहिन्यै नमः ।उरुशक्त्यै नमः ।उरुप्रदायै नमः ।ऊर्ध्वकेश्यै नमः ।कालमार्यै नमः ।कालिकायै नमः ।किरणायै नमः ।कल्पलतिकायै नमः । २०कल्पस्ङ्ख्यायै नमः ।कुमुद्वत्यै नमः ।काश्यप्यै नमः ।कुतुकायै नमः ।खरदूषणहन्त्र्यै नमः ।खगरूपिण्यै नमः ।गुरवे नमः ।गुणाध्यक्षायै नमः ।गुणवत्यै नमः ।गोपीचन्दनचर्चितायै नमः ।हङ्गायै नमः ।चक्षुषे नमः ।चन्द्रभागायै नमः ।चपलायै नमः ।चलत्कुण्डलायै नमः ।चतुःषष्टिकलाज्ञानदायिन्यै नमः ।चाक्षुषी मनवे नमः ।चर्मण्वत्यै नमः ।चन्द्रिकायै नमः ।गिरये नमः । ४०गोपिकायै नमः ।जनेष्टदायै नमः ।जीर्णायै नमः ।जिनमात्रे नमः ।जन्यायै नमः ।जनकनन्दिन्यै नमः ।जालन्धरहरायै नमः ।तपःसिद्ध्यै नमः ।तपोनिष्ठायै नमः ।तृप्तायै नमः ।तापितदानवायै नमः ।दरपाणये नमः ।द्रग्दिव्यायै नमः ।दिशायै नमः ।दमितेन्द्रियायै नमः ।दृकायै नमः ।दक्षिणायै नमः ।दीक्षितायै नमः ।निधिपुरस्थायै नमः ।न्यायश्रियै नमः । ६०न्यायकोविदायै नमः ।नाभिस्तुतायै नमः ।नयवत्यै नमः ।नरकार्तिहरायै नमः ।फणिमात्रे नमः ।फलदायै नमः ।फलभुजे नमः ।फेनदैत्यहृते नमः ।फुलाम्बुजासनायै नमः ।फुल्लायै नमः ।फुल्लपद्मकरायै नमः ।भीमनन्दिन्यै नमः ।भूत्यै नमः ।भवान्यै नमः ।भयदायै नमः ।भीषणायै नमः ।भवभीषणायै नमः ।भूपतिस्तुतायै नमः ।श्रीपतिस्तुतायै नमः ।भूधरधरायै नमः । ८०भुतावेशनिवासिन्यै नमः ।मधुघ्न्यै नमः ।मधुरायै नमः ।माधव्यै नमः ।योगिन्यै नमः ।यामलायै नमः ।यतये नमः ।यन्त्रोद्धारवत्यै नमः ।रजनीप्रियायै नमः ।रात्र्यै नमः ।राजीवनेत्रायै नमः ।रणभूम्यै नमः ।रणस्थिरायै नमः ।वषट्कृत्यै नमः ।वनमालाधरायै नमः ।व्याप्त्यै नमः ।विख्यातायै नमः ।शरधन्वधरायै नमः ।श्रितये नमः ।शरदिन्दुप्रभायै नमः । १००शिक्षायै नमः ।शतघ्न्यै नमः ।शान्तिदायिन्यै नमः ।ह्रीं बीजायै नमः ।हरवन्दितायै नमः ।हालाहलधरायै नमः ।हयघ्न्यै नमः ।हंसवाहिन्यै नमः । १०८॥ ॐ ॥इति ऐश्वर्यलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ।

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Valmiki Jayanti

Valmiki Jayanti 2025 Date And Time:वाल्मीकि जयंती तिथि, महत्व और आदि कवि महर्षि वाल्मीकि का अद्वितीय योगदान..

वाल्मीकि जयंती (Valmiki Jayanti) एक महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक उत्सव है जो महर्षि वाल्मीकि की जयंती मनाता है। महर्षि वाल्मीकि वह प्रसिद्ध हिंदू कवि हैं जो हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्यों में से एक, रामायण के लेखक के रूप में जाने जाते हैं। इस दिन को बाल्मीकि धार्मिक समुदाय द्वारा प्रगट दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। यह दिन महर्षि वाल्मीकि के ज्ञान, नैतिकता, और साहित्य और आध्यात्मिकता में उनके योगदान का सम्मान करने का एक अवसर है। 1. वाल्मीकि जयंती 2025: तिथि और पंचांग महर्षि वाल्मीकि जयंती की तिथि हर साल बदलती रहती है क्योंकि यह भारतीय चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित की जाती है। तिथि: वर्ष 2025 में, वाल्मीकि जयंती या प्रगट दिवस मंगलवार, 07 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। हिंदी कैलेंडर के अनुसार: यह त्यौहार आश्विन महीने की पूर्णिमा तिथि को पड़ता है, जिसे शरद पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर में सितंबर-अक्टूबर के आसपास आता है। पूर्णिमा तिथि: पूर्णिमा तिथि 06 अक्टूबर 2025 को दोपहर 12:23 बजे प्रारम्भ होगी और 07 अक्टूबर 2025 को सुबह 09:16 बजे समाप्त होगी। यह उत्सव भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है, Valmiki Jayanti जिनमें चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, और कर्नाटक शामिल हैं। हालांकि, यह भारत में एक मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय सार्वजनिक अवकाश नहीं है। Valmiki Jayanti 2025 Date And Time:वाल्मीकि जयंती तिथि, महत्व…. 2. कौन थे महर्षि वाल्मीकि? (प्रारंभिक जीवन) महर्षि वाल्मीकि Valmiki Jayanti को संस्कृत साहित्य का पहला कवि (आदि कवि) माना जाता है। उनकी कहानी आध्यात्मिक परिवर्तन और पश्चात्ताप का एक शक्तिशाली उदाहरण है। डाकू रत्नाकर से बने ऋषि वाल्मीकि प्रारंभिक नाम: पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि का प्रारंभिक नाम रत्नाकर था। जीवन: अपने प्रारंभिक जीवन में, वह एक राजमार्ग डाकू थे जो लोगों को लूटते थे। परिवर्तन: उनके जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात नारद मुनि से हुई, जिन्होंने उन्हें भगवान राम के भक्त बनने के लिए प्रेरित किया। तपस्या और नामकरण: रत्नाकर ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या को एक दिव्य आवाज ने सफल घोषित किया और उनका नाम वाल्मीकि रखा गया। यह नाम “वाल्मीक” (संस्कृत में चींटी-पहाड़ी) से आया है, जहां उन्होंने ध्यान में बहुत समय बिताया था। यह नाम इस विचार पर जोर देता है कि कोई भी व्यक्ति, अपने पिछले कार्यों की परवाह किए बिना, गंभीर पश्चाताप और समर्पण के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। 3. रामायण और साहित्यिक योगदान महर्षि वाल्मीकि का हिंदू धर्म में बहुत धार्मिक महत्व है क्योंकि उन्होंने अद्वितीय साहित्यिक योगदान दिया है। रामायण: उन्होंने महान हिंदू महाकाव्य रामायण की रचना की, जो संस्कृत में लिखी गई थी। संरचना: रामायण में 24,000 छंद (श्लोक) हैं, जो सात ‘कांडों’ (कैंटोस) या सर्गों में विभाजित हैं। (एक स्रोत के अनुसार इसमें 24507 अध्याय हैं)। शिष्य: भगवान राम के पुत्र लव और कुश उनके पहले शिष्य थे, जिन्हें उन्होंने अपने आश्रम में रामायण की शिक्षा दी थी। अन्य रचनाएं: पौराणिक कथाओं के अनुसार, Valmiki Jayanti उन्होंने रामायण के अलावा महाभारत और कई पुराणों जैसी कुछ अद्भुत रचनाएँ भी लिखीं। 4. वाल्मीकि जयंती समारोह और अनुष्ठान हिंदू भक्त वाल्मीकि जयंती को अत्यंत उत्साह के साथ मनाते हैं। शोभा यात्रा: इस दिन बड़े जुलूस, जिन्हें शोभा यात्रा कहा जाता है, विभिन्न कस्बों और गांवों में आयोजित किए जाते हैं। इन जुलूसों में वाल्मीकि की छवि को ले जाया जाता है। मंदिरों की सजावट: महर्षि वाल्मीकि के मंदिरों को विभिन्न रंगों के फूलों से आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। कई स्थानों पर कीर्तन और भजन कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। पूजा और पाठ: भक्तजन श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा करते हैं, रामायण के श्लोकों का पाठ करते हैं। Valmiki Jayanti आध्यात्मिक चर्चाएँ (सत्संग) आयोजित की जाती हैं, जो वाल्मीकि के साहित्यिक और आध्यात्मिक योगदान के महत्व पर जोर देती हैं। दान: इस शुभ दिन पर गरीबों और जरूरतमंदों को मुफ्त भोजन (लंगर) वितरित किया जाता है। दान-पुण्य करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। 5. महर्षि वाल्मीकि का सबसे प्रसिद्ध मंदिर सबसे प्रसिद्ध और सबसे पुराना मंदिर, जो 1,300 वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है, चेन्नई के थिरुवनमियूर (Thiruvanmiyur) में स्थित है। मान्यता है कि Valmiki Jayanti ऋषि वाल्मीकि ने रामायण लिखने के बाद इसी स्थान पर विश्राम किया था। Valmiki Jayanti इस मंदिर की देखरेख मारुंडेश्वर मंदिर (Marundeeswarar Temple) द्वारा की जाती है, जिसका निर्माण चोल शासनकाल के दौरान हुआ था। 6. शुभकामनाएं प्रगट दिवस के इस शुभ अवसर पर, आइए हम महर्षि वाल्मीकि का आशीर्वाद लें, उनकी शिक्षाओं का पालन करें और रामायण के मूल्यों (जैसे ज्ञान और नैतिकता) को अपनाकर एक सुंदर कल के लिए अच्छे कर्म करें।

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करवा चौथ

Karwa Chauth 2025 Vrat Upay: करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए..

Karwa Chauth 2025: करवा चौथ पर पति-पत्नी के आपसी प्रेम और विश्वास को मजबूत करने के लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं। Karwa Chauth 2025 mein Kab Hai: सुहागिन महिलाओं के लिए करवा चौथ का पर्व बहुत ही खास माना जाता है। इस पर्व पर सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सुबह से निर्जला व्रत रखती है। यह पर्व पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम और विश्वास को मजबूत करता है। करवाचौथ पर सुहागिन महिलाएं सुबह से बिना कुछ खाए-पिए उपवास पर रहती हैं। फिर शाम के समय करवा माता की पूजा करती हैं और रात को चांद के निकलने का इंतजार करती हैं। जब चांद निकलता है तो उसके दर्शन करते हुए और अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। करवा चौथ पर पति-पत्नी के आपसी प्रेम और विश्वास को मजबूत करने के लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं। सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए करवाचौथ का दिन बेहद खास होता है. इस दिन सुहागिन महिलाएं अपनी पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. यह सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक भी है. करवा चौथ के दिन मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा आराधना की जाती है इसके साथ-साथ चंद्र देव को अर्घ प्रदान किया जाता है. इसके बाद ही सुहागिन महिलाएं व्रत खोल सकती हैं. यह व्रत अखंड सौभाग्य की प्राप्ति और पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है. करवा चौथ व्रत के दिन सुहागिन महिलाओं को क्या नहीं करना चाहिए? ताकि व्रत की पवित्रता बनी रहे. Karwa Chauth 2025 Vrat Upay: करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं…. Married women should take these measures on the day of Karva Chauth:करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं करें ये उपाय पहला उपाय- चौथ माता की पूजाजो सुहागिन महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती हैं उनके लिए करवा माता की पूजा का विशेष महत्व होता है। करवा चौथ के दिन सुगाहिन महिलाओं को अपने करवा में जल भरकर चौथ माता को अर्पित करना चाहिए। पूजा के दौरान सुहागिन महिलाएं अपने सभी आभूषणों को पहनें। दूसरा उपाय- गौरी शंकर की पूजाकरवा चौथ पर जहां करवा माता की पूजा करने का विधान होता है,वहीं इसके साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन सुहागिन महिलाओं को गौरी शंकर की पूजा के साथ माता को सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी और वस्त्र चढ़ाएं। इसस दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही वैवाहिक जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होती हैं। तीसरा उपाय- सुहाह की चीजों का करें दानकरवा चौथ पर सुख और सौभाग्य का आशीर्वाद पाने के लिए सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी और वस्त्र का दान करना सौभाग्यवती महिलाओं को शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसे करने से मां पार्वती प्रसन्न होती है। जिससे अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती है। चौथा उपाय- 7 सुहागिन महिलाओं का आशीर्वाद धर्म शास्त्रों के अनुसार, करवा चौथ के दिन पूजा के बाद सात सुहागिन महिलाओं का आशीर्वाद लेने की परंपरा होती है। इस दिन जो महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती हैं वे सात दूसरी सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री अर्पित करें। पांचवां उपाय- पति से लाल रंग के उपहार लेंकरवा चौथ पर सुहागिन महिलाएं अपने पति से लाल या फिर पीले रंग की सुहाग की चीजें उपहार में लें। इससे प्रेम और सौभाग्य में वृद्धि होगी। साथी पति-पत्नी के बीच प्रेम और स्नेह बढ़ेगा।  Do not make this mistake even by mistake on the day of Karva Chauth:करवा चौथ के दिन भूलकर भी ना करें यह गलती अनाज का सेवन: करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से पहले खाई जाने वाली सरगी के बाद शुरू होता है और चांद निकलने के बाद ही खोला जाता है. इस दौरान जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती. अगर कोई महिला गलती से भी इस व्रत में जल या भोजन का सेवन कर लेती है, तो उसका व्रत खंडित हो जाता है. दिन में सोना: शास्त्र के अनुसार, व्रत रखने पर दिन के वक्त सोना अच्छा नहीं माना जाता है. इसलिए कोशिश करें अगर आपने व्रत रखा है तो दिन के समय में सोने से बचना बेहतर है. ना काले रंग के कपड़े पहने ना श्रृंगार करें: कई लोगों को काले रंग के या सफेद रंग के कपड़े पहनना काफी अच्छा लगता है. लेकिन करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं काले रंग के या सफेद रंग के कपड़े बिल्कुल भी ना पहने ऐसा करने से आपका व्रत निष्फल हो सकता है. चंद्रोदय के बाद ही खोले व्रत: करवा चौथ के दिन चंद्रोदय के बाद ही अर्घ प्रदान करें और उसके बाद ही अपने पति के हाथों व्रत का पारण करें, तभी शुभ फल की प्राप्ति होगी और हमेशा वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहेगी. करवा चौथ कथा karwa chauth vrat katha

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shrIlakShmInArAyaNakavacham:श्रीलक्ष्मीनारायणकवचम्

shrIlakShmInArAyaNakavacham: श्रीलक्ष्मीनारायणकवचम् श्रीगणेशाय नमः ।श्रीभैरव उवाच ।अधुना देवि वक्ष्यामि लक्ष्मीनारायणस्य ते ।कवचं मन्त्रगर्भं च वज्रपञ्जरकाख्यया ॥ १॥ श्रीवज्रपञ्जरं नाम कवचं परमाद्भुतम् ।रहस्यं सर्वदेवानां साधकानां विशेषतः ॥ २॥ यं धृत्वा भगवान् देवः प्रसीदति परः पुमान् ।यस्य धारणमात्रेण ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३॥ ईश्वरोऽहं शिवो भीमो वासवोऽपि दिवस्पतिः ।सूर्यस्तेजोनिधिर्देवि चन्द्रर्मास्तारकेश्वरः ॥ ४॥ वायुश्च बलवांल्लोके वरुणो यादसाम्पतिः ।कुबेरोऽपि धनाध्यक्षो धर्मराजो यमः स्मृतः ॥ ५॥ यं धृत्वा सहसा विष्णुः संहरिष्यति दानवान् ।जघान रावणादींश्च किं वक्ष्येऽहमतः परम् ॥ ६॥ कवचस्यास्य सुभगे कथितोऽयं मुनिः शिवः ।त्रिष्टुप् छन्दो देवता च लक्ष्मीनारायणो मतः ॥ ७॥ रमा बीजं परा शक्तिस्तारं कीलकमीश्वरि ।भोगापवर्गसिद्ध्यर्थं shrIlakShmInArAyaNakavacham विनियोग इति स्मृतः ॥ ८॥ ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीनारायणकवचस्य शिवः ऋषिः ,त्रिष्टुप् छन्दः , श्रीलक्ष्मीनारायण देवता ,श्रीं बीजं , ह्रीं शक्तिः , ॐ कीलकं ,भोगापवर्गसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः ।अथ ध्यानम् ।पूर्णेन्दुवदनं पीतवसनं कमलासनम् ।लक्ष्म्या श्रितं चतुर्बाहुं लक्ष्मीनारायणं भजे ॥ ९॥ shrIlakShmInArAyaNakavacham: अथ कवचम् ।ॐ वासुदेवोऽवतु मे मस्तकं सशिरोरुहम् ।ह्रीं ललाटं सदा पातु लक्ष्मीविष्णुः समन्ततः ॥ १०॥ ह्सौः नेत्रेऽवताल्लक्ष्मीगोविन्दो जगतां पतिः ।ह्रीं नासां सर्वदा पातु लक्ष्मीदामोदरः प्रभुः ॥ ११॥ श्रीं मुखं सततं पातु देवो लक्ष्मीत्रिविक्रमः ।लक्ष्मी कण्ठं सदा पातु देवो लक्ष्मीजनार्दनः ॥ १२॥ नारायणाय बाहू मे पातु लक्ष्मीगदाग्रजः ।नमः पार्श्वौ सदा पातु लक्ष्मीनन्दैकनन्दनः ॥ १३॥ अं आं इं ईं पातु वक्षो ॐ लक्ष्मीत्रिपुरेश्वरः ।उं ऊं ऋं ॠं पातु कुक्षिं ह्रीं लक्ष्मीगरुडध्वजः ॥ १४॥ लृं लॄं एं ऐं पातु पृष्ठं ह्सौः लक्ष्मीनृसिंहकः ।ओं औं अं अः पातु नाभिं ह्रीं लक्ष्मीविष्टरश्रवः ॥ १५॥ कं खं गं घं गुदं पातु श्रीं लक्ष्मीकैटभान्तकः ।चं छं जं झं पातु शिश्र्नं लक्ष्मी लक्ष्मीश्वरः प्रभुः ॥ १६॥ टं ठं डं ढं कटिं पातु नारायणाय नायकः ।तं थं दं धं पातु चोरू नमो लक्ष्मीजगत्पतिः ॥ १७॥ पं फं बं भं पातु जानू ॐ ह्रीं लक्ष्मीचतुर्भुजः ।यं रं लं वं पातु जङ्घे ह्सौः लक्ष्मीगदाधरः ॥ १८॥ शं षं सं हं पातु गुल्फौ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीरथाङ्गभृत् ।ळं क्षः पादौ सदा पातु मूलं लक्ष्मीसहस्रपात् ॥ १९॥ ङं ञं णं नं मं मे पातु लक्ष्मीशः सकलं वपुः ।इन्द्रो मां पूर्वतः पातु वह्निर्वह्नौ सदावतु ॥ २०॥ यमो मां दक्षिणे पातु नैरृत्यां निरृतिश्च माम् ।वरुणः पश्चिमेऽव्यान्मां वायव्येऽवतु मां मरुत् ॥ २१॥ उत्तरे धनदः shrIlakShmInArAyaNakavacham पायादैशान्यामीश्वरोऽवतु ।वज्रशक्तिदण्डखड्ग पाशयष्टिध्वजाङ्किताः ॥ २२॥ सशूलाः सर्वदा पान्तु दिगीशाः परमार्थदाः ।अनन्तः पात्वधो नित्यमूर्ध्वे ब्रह्मावताच्च माम् ॥ २३॥ दशदिक्षु सदा पातु लक्ष्मीनारायणः प्रभुः ।प्रभाते पातु मां विष्णुर्मध्याह्ने वासुदेवकः ॥ २४॥ दामोदरोऽवतात् सायं निशादौ नरसिंहकः ।सङ्कर्षणोऽर्धरात्रेऽव्यात् प्रभातेऽव्यात् त्रिविक्रमः ॥ २५॥ अनिरुद्धः सर्वकालं विश्वक्सेनश्च सर्वतः ।रणे राजकुले द्युते विवादे शत्रुसङ्कटेॐ ह्रीं ह्सौः ह्रीं श्रीं मूलं लक्ष्मीनारायणोऽवतु ॥ २६॥ ॐॐॐरणराजचौररिपुतः पायाच्च मां केशवःह्रींह्रींह्रींहह्हाह्सौः ह्सह्सौः वह्नेर्वतान्माधवः ।ह्रींह्रींह्रींजलपर्वताग्निभयतः पायादनन्तो विभुःश्रींश्रींश्रींशशशाललं प्रतिदिनं लक्ष्मीधवः पातु माम् ॥ २७॥ इतीदं कवचं दिव्यं वज्रपञ्जरकाभिधम् ।लक्ष्मीनारायणस्येष्टं shrIlakShmInArAyaNakavacham चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥ २८॥ सर्वसौभाग्यनिलयं सर्वसारस्वतप्रदम् ।लक्ष्मीसंवननं तत्त्वं परमार्थरसायनम् ॥ २९॥ मन्त्रगर्भं जगत्सारं रहस्यं त्रिदिवौकसाम् ।दशवारं पठेद्रात्रौ रतान्ते वैष्णवोत्तमः ॥ ३०॥ स्वप्ने वरप्रदं पश्येल्लक्ष्मीनारायणं सुधीः ।त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं कवचं मन्मुखोदितम् ॥ ३१॥ स याति परमं धाम वैष्णवं वैष्णवेश्वरः ।महाचीनपदस्थोऽपि यः पठेदात्मचिन्तकः ॥ ३२॥ आनन्दपूरितस्तूर्णं लभेद् मोक्षं स साधकः ।गन्धाष्टकेन विलिखेद्रवौ भूर्जे जपन्मनुम् ॥ ३३॥ पीतसूत्रेण संवेष्ट्य सौवर्णेनाथ वेष्टयेत् ।धारयेद्गुटिकां मूर्ध्नि लक्ष्मीनारायणं स्मरन् ॥ ३४॥ रणे रिपुन् विजित्याशु कल्याणी गृहमाविशेत् ।वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना ॥ ३५॥ सा बध्नीयान् कण्ठदेशे लभेत् पुत्रांश्चिरायुषः ।गुरुपदेशतो धृत्वा गुरुं ध्यात्वा मनुं जपन् ॥ ३६॥ वर्णलक्षपुरश्चर्या shrIlakShmInArAyaNakavacham फलमाप्नोति साधकः ।बहुनोक्तेन किं देवि कवचस्यास्य पार्वति ॥ ३७॥ विनानेन न सिद्धिः स्यान्मन्त्रस्यास्य महेश्वरि ।सर्वागमरहस्याढ्यं तत्त्वात् तत्त्वं परात् परम् ॥ ३८॥ अभक्ताय न दातव्यं कुचैलाय दुरात्मने ।दीक्षिताय कुलीनाय स्वशिष्याय महात्मने ॥ ३९॥ महाचीनपदस्थाय दातव्यं कवचोत्तमम् ।गुह्यं गोप्यं महादेवि लक्ष्मीनारायणप्रियम् ।वज्रपञ्जरकं वर्म गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ ४०॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीदेवीरहस्येलक्ष्मीनारायणकवचं सम्पूर्णम् ॥

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ShrImahAlakShmI kavacham: श्रीमहालक्ष्मीकवचम्

ShrImahAlakShmI kavacham: श्रीमहालक्ष्मीकवचम् श्री गणेशाय नमः ।अस्य श्रीमहालक्ष्मीकवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दःमहालक्ष्मीर्देवता महालक्ष्मीप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।इन्द्र उवाच । समस्तकवचानां तु तेजस्वि कवचोत्तमम् ।आत्मरक्षणमारोग्यं सत्यं त्वं ब्रूहि गीष्पते ॥ १॥ श्रीगुरुरुवाच । महालक्ष्म्यास्तु कवचं प्रवक्ष्यामि समासतः ।चतुर्दशसु लोकेषु रहस्यं ब्रह्मणोदितम् ॥ २॥ ब्रह्मोवाच । शिरो मे विष्णुपत्नी च ललाटममृतोद्भवा ।चक्षुषी सुविशालाक्षी श्रवणे सागराम्बुजा ॥ ३॥ घ्राणं पातु वरारोहा जिह्वामाम्नायरूपिणी ।मुखं पातु महालक्ष्मीः कण्ठं वैकुण्ठवासिनी ॥ ४॥ स्कन्धौ मे जानकी पातु भुजौ भार्गवनन्दिनी ।बाहू द्वौ द्रविणी पातु करौ हरिवराङ्गना ॥ ५॥ वक्षः पातु च श्रीर्देवी हृदयं हरिसुन्दरी ।कुक्षिं च वैष्णवी पातु नाभिं भुवनमातृका ॥ ६॥ कटिं च पातु वाराही सक्थिनी देवदेवता ।ऊरू नारायणी पातु जानुनी चन्द्रसोदरी ॥ ७॥ इन्दिरा पातु जंघे मे पादौ भक्तनमस्कृता ।नखान् तेजस्विनी पातु सर्वाङ्गं करुणामयी ॥ ८॥ ब्रह्मणा लोकरक्षार्थं निर्मितं कवचं श्रियः ।ये पठन्ति महात्मानस्ते च धन्या जगत्त्रये ॥ ९॥ कवचेनावृताङ्गनां ShrImahAlakShmI जनानां जयदा सदा ।मातेव सर्वसुखदा भव त्वममरेश्वरी ॥ १०॥ भूयः सिद्धिमवाप्नोति पूर्वोक्तं ब्रह्मणा स्वयम् ।लक्ष्मीर्हरिप्रिया पद्मा एतन्नामत्रयं स्मरन् ॥ ११॥ नामत्रयमिदं जप्त्वा स याति परमां श्रियम् ।यः पठेत्स च धर्मात्मा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ १२॥ ॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे इन्द्रोपदिष्टं महालक्ष्मीकवचं सम्पूर्णम् ॥

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ShrIdIpalakShmIstotram: श्रीदीपलक्ष्मीस्तोत्रम्

ShrIdIpalakShmIstotram: श्रीदीपलक्ष्मीस्तोत्रम् दीपस्त्वमेव जगतां दयिता रुचिस्ते,दीर्घं तमः प्रतिनिवृत्यमितं युवाभ्याम् ।स्तव्यं स्तवप्रियमतः शरणोक्तिवश्यंस्तोतुं भवन्तमभिलष्यति जन्तुरेषः ॥ दीपः पापहरो नॄणां दीप आपन्निवारकःदीपो विधत्ते सुकृतिं दीपस्सम्पत्प्रदायकः ।देवानां तुष्टिदो दीपः पितॄणां प्रीतिदायकःदीपज्योतिः परम्ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ॥ दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीप नमोऽस्तु ते ॥ फलश्रुतिःया स्त्री पतिव्रता लोके गृहे दीपं तु पूरयेत् ।दीपप्रदक्षिणं कुर्यात् सा भवेद्वै सुमङ्गला ॥ इति श्रीदीपलक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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Papankusha Ekadashi

Papankusha Ekadashi 2025 Date: पापांकुशा एकादशी के दिन शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें, जीवन में मिलेंगे सभी सुख

Papankusha Ekadashi: सनातन धर्म में, प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की सभी तिथियों का विशेष महत्व होता है, जिसमें एकादशी तिथि भी शामिल है. वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को (Papankusha Ekadashi) पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को विधिपूर्वक करने से साधक के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और सभी दुखों से छुटकारा मिलता है. इस व्रत को करने से सभी पापों से भी छुटकारा मिलता है. पापांकुशा एकादशी 03 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही विधिपूर्वक व्रत भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, Papankusha Ekadashi पापांकुशा एकादशी व्रत करने से साधक के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और सभी दुखों से छुटकारा मिलता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करना भी शुभ माना गया है। एकादशी के दिन महादेव की पूजा करने से जीवन खुशहाल रहता है और बिगड़े काम पूरे होते हैं। अगर आप भी शिव जी को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो पापांकुशा एकादशी के दिन शिवलिंग पर विशेष चीजें अर्पित करें। इससे शुभ फल की प्राप्ति होगी। पापांकुशा एकादशी 2025 कब है? (Papankusha Ekadashi 2025 Date and Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के अनुसार, साल 2025 में पापांकुशा एकादशी 03 अक्टूबर को मनाई जाएगी. तिथि की शुरुआत: आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 02 अक्टूबर को शाम 07 बजकर 10 मिनट पर होगी. तिथि का समापन: एकादशी तिथि का समापन 03 अक्टूबर को शाम 06 बजकर 32 मिनट पर होगा. व्रत का पारण: व्रत का पारण 04 अक्टूबर को किया जाएगा. एकादशी पर क्यों करें भगवान शिव की पूजा:Why worship Lord Shiva on Ekadashi? पापांकुशा एकादशी Papankusha Ekadashi पर मुख्य रूप से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विधान है. लेकिन, इस दिन भगवान शिव की पूजा करना भी अत्यंत शुभ माना गया है. एकादशी के दिन महादेव की पूजा करने से जीवन खुशहाल रहता है, और साधक के बिगड़े काम पूरे होते हैं. अगर आप भी शिव जी को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो पापांकुशा एकादशी के दिन शिवलिंग पर विशेष चीजें अर्पित करनी चाहिए. इससे शुभ फल की प्राप्ति होगी. शिवलिंग पर क्या-क्या चढ़ाएं और क्या लाभ मिलेगा:What should be offered to Shivling and what will be the benefit? यदि आप भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं और जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता चाहते हैं, तो Papankusha Ekadashi पापांकुशा एकादशी के दिन निम्नलिखित चीजें शिवलिंग पर अर्पित करें: 1. आर्थिक तंगी होगी दूर: कच्चे चावल (Raw Rice) अगर आप लंबे समय से आर्थिक तंगी (Financial Difficulties) का सामना कर रहे हैं, तो Papankusha Ekadashi पापांकुशा एकादशी के दिन शिवलिंग पर कच्चे चावल अर्पित करें. इसके साथ ही, महादेव से जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति के लिए कामना करें. धार्मिक मान्यता है कि शिवलिंग पर कच्चे चावल अर्पित करने से महादेव प्रसन्न होते हैं और आपकी आर्थिक तंगी की समस्या दूर होती है. 2. मिलेगा मनचाहा वर: घी (Ghee) शिवलिंग पर घी अर्पित करना भी बहुत शुभ माना जाता है. एकादशी के दिन महादेव का घी से अभिषेक करने से साधक को मनचाहे वर (Desired Spouse) की प्राप्ति होती है और जीवन में सफलता (Success) मिलती है. 3. जीवन में मिलेंगे सभी सुख: गन्ने का रस (Sugarcane Juice) जीवन में सभी सुखों (All Worldly Comforts) की प्राप्ति के लिए Papankusha Ekadashi पापांकुशा एकादशी के अवसर पर शिवलिंग पर गन्ने के रस से अभिषेक करें. ऐसा माना जाता है कि इस उपाय को करने से साधक को जीवन में सभी सुख प्राप्त होते हैं और उसे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है. भगवान शिव के मुख्य मंत्र:Main mantras of Lord Shiva शिवलिंग पर अभिषेक और पूजन करते समय आप इन पवित्र मंत्रों का जाप भी कर सकते हैं: 1. शिव जी का मूल मंत्र: ॐ नमः शिवाय॥ 2. महामृत्युंजय मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ 3. रूद्र मंत्र: ॐ नमो भगवते रूद्राय। 4. रूद्र गायत्री मंत्र: ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

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