Navratri Day 1 2025: Maa Shailputri Puja Vidhi, Katha, Mantra & Importance

Navratri 2025 का पहला दिन बेहद खास माना जाता है। इस दिन माँ शैलपुत्री (Maa Shailputri) की पूजा की जाती है। शारदीय नवरात्रि (Sharadiya Navratri) की शुरुआत इसी दिन से होती है। माँ शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। आइए जानते हैं Navratri Day 1 puja vidhi, story, mantra और महत्व विस्तार से। Navratri Day 1 Puja Vidhi (नवरात्रि प्रथम दिन पूजा विधि) 1. कलश स्थापना (Ghatasthapana): सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। मिट्टी के बर्तन में जौ/गेहूं बोकर उस पर जल से भरा कलश रखें। कलश पर नारियल, आम के पत्ते और मौली बाँधें। 2. माँ शैलपुत्री की पूजा: माँ शैलपुत्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। रोली, अक्षत, फूल, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती अथवा शैलपुत्री स्तुति का पाठ करें। 3. विशेष भोग: माँ को घी का भोग चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्तों का मानना है कि इस दिन घी अर्पित करने से जीवन में निरोगिता और शक्ति प्राप्त होती है। Navratri Day 1 Story (माँ शैलपुत्री की कथा) माँ शैलपुत्री का जन्म हिमालय के घर हुआ था, इसलिए इन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा गया।पिछले जन्म में ये सती थीं, जिन्होंने भगवान शिव के अपमान को सह न पाने के कारण अपने प्राण त्याग दिए थे। अगले जन्म में हिमालय की पुत्री बनकर इनका पुनर्जन्म हुआ। माँ शैलपुत्री ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया।इनका वाहन वृषभ (बैल) है और इनके हाथों में त्रिशूल तथा कमल सुशोभित रहते हैं। Navratri Day 1 Maa Shailputri Mantra ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥ इस मंत्र का जप करने से मन को स्थिरता, शक्ति और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। Navratri Day 1 Importance (महत्व) नवरात्रि के प्रथम दिन की पूजा से संकल्प शक्ति मजबूत होती है। माँ शैलपुत्री साधना से जीवन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा आती है। कलश स्थापना करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। Navratri Day 1 Puja Vidhi Maa Shailputri Puja Vidhi 2025 Navratri First Day Story in Hindi Navratri 2025 Ghatasthapana Maa Shailputri Mantra Benefits Navratri Day 1 Importance

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bhavAnIstuti: भवानीस्तुति

bhavAnIstuti: भवानीस्तुति आनन्दमन्थरपुरन्दरमुक्तमाल्यं मौलौ हठेन निहितं महिषासुरस्य । पादाम्बुजं भवतु वो विजयाय मंजु-मंजीरशिंजितमनोहरमम्बिकायाः ॥ १॥ ब्रह्मादयोऽपि यदपांगतरंगभंग्या सृष्टि स्थिति-प्रलयकारणतां व्रजन्ति । लावण्यवारिनिधिवी चिपरिप्लुतायै तस्यै नमोऽस्तु सततं हरवल्लभायै ॥ २॥ पौलस्त्यपीनभुजसम्पदुदस्यमानकैलाससम्भ्रमविलोलदृशः प्रियायाः । श्रेयांसिवोदिशतुनिहनुतकोपचिह्नमालिंगनोत्पुलकभासितमिन्दुमौलेः ॥ ३॥ दिश्यान्महासुरशिरः सरसीप्सितानि प्रेंखन्नखावलिमयूखमृणालनालम् । चण्डयाश्चलच्चटुलनूपुरचंचरीकझांकारहारि चरणाम्बुरूहद्वयं वः ॥ ४॥ ॥ इति भवानी स्तुति सम्पूर्णा ॥

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bhagavatIstotram: भगवतीस्तोत्रम्

bhagavatIstotram: भगवतीस्तोत्रम् जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।जय शुम्भ-निशुम्भ कपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ॥ १॥ जय चन्द्रदिवाकर-नेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे ।जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे ॥ २॥ जय महिषविमर्दिनिशूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे ।जय देवि पितामहविष्णुनुते जय भास्करशक्रशिराऽवनते ॥ ३॥ जय षण्मुख-सायुध-ईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते ।जय दुःख-दरिद्र-विनाशकरे जय पुत्रकल त्रविवृद्धिकरे ॥ ४॥ जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ।जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे जय वांछितदायिनि सिद्धिकरे ॥ ५॥ एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः ।गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ॥ ६॥ ॥ इति व्यासकृतं भगवतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Amba Vandana: अम्बावन्दना

Amba Vandana: अम्बावन्दना आदावेकां लोक-सिसृक्षा-रसजुष्टां,द्वन्द्वाध्युष्टां,भूत-निकायान् कलयन्तीम् ।माया-मुख्यैर्नामभिराद्यैरुपदिष्टां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ १॥ मूलाधारादा च विशुद्वेः प्रविभक्तां,शाब्दीं सृष्टिं,पात्रविशेषाद् घटयन्तीम् ।श्रौतैः स्मार्तैः पौरुष-सूक्तैरुपगीतां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ २॥ ऐन्द्रीं भूतिं भक्तजनेभ्यो वितरन्तीं,ह्रीङ्कुर्वाणां,तद्विमुखेषु प्रतिवेलम् ।श्रीं निर्दोलां तद्भवनान्ते विदधानां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ३॥ किं बन्धूकैः,किं नु जपाभिः,किमु रक्तै-रब्जैरुद्यदभास्कर-रागैरुत सृष्टैः ।अङ्गैरिङ्गत्कान्तिवितानैरभिरामां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ४॥ याऽपर्णाहो ताप-निरासाय सपर्णा,वर्णातीता वर्ण-विशेषाञ्जुषमाणा ।तां वैचित्र्योद्भासन-सूनावलि-वल्लींवन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ५॥ नीप-श्रेणी-शालिनि चिन्तामणि-गेहे,पीठासीनामावृतिचक्रैरुपगूढाम् ।ब्रह्मादिभ्यो वाञ्छितमर्थं प्रथयन्तीं,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ६॥ स्फूर्जत्सान्द्रामोद-तरङ्गावलि-लीनै-रर्चामाप्तां,षोडश-मुख्यैरुपचारैः ।उद्यन्नानालङ्कृति-रत्न-द्युति-पुञ्जां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ७॥ माद्यद्देवारब्ध-नमस्या-निकुरम्बां,व्यापच्छैलच्छेद-विलक्षीकृत-शम्बाम् ।आज्ञा-दानान्दोलन-हृद्याधर-बिम्बां,वन्देऽमन्द द्योत कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ८॥ ब्रह्म-विष्णु-महेशांश्च गमयन्ती महर्षिताम् ।यन्त्रात्मना परिणता पुनातु परमेश्वरी ॥ ॥ इत्यम्बा-वन्दना समाप्ता ॥

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Kojagari Puja 2025

Kojagari Puja 2025 Date And Time: कोजागरी पूजा कब है? धरती पर पधारेंगी मां लक्ष्मी, नोट करें शुभ मुहूर्त और महत्व

Kojagari Puja 2025: कोजागरी पूर्णिमा (Kojagari Purnima) हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है, जिसे कोजागरी लक्ष्मी पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व अश्विन माह की पूर्णिमा पर मनाया जाता है। इसे शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) भी कहते हैं। माना जाता है कि पूर्णिमा तिथि मां लक्ष्मी की जन्म तिथि भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष रात्रि को मां लक्ष्मी धरती पर विचरण करने आती हैं और अपने भक्तों के संकटों को दूर करती हैं। जो भी भक्त इस रात को जागरण करते हैं, Kojagari Puja 2025 माता लक्ष्मी उन पर विशेष कृपा बरसाती हैं और उन्हें धन-धान्य से सम्पन्न कर देती हैं। Kojagari Puja 2025 Date And Time : सही तारीख और तिथि कब है? इस वर्ष कोजागरी लक्ष्मी पूजा 6 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। कोजागर व्रत (Kojagar Vrat) सोमवार, 6 अक्टूबर को किया जाएगा। Kojagari Puja 2025 यह पूजा मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा असम आदि राज्यों में विशेष रूप से मनाई जाती है। पूर्णिमा तिथि का आरंभ और समापन:Beginning and end of Purnima Tithi अश्विन पूर्णिमा तिथि (यानी कोजागरी पूर्णिमा तिथि) का विवरण इस प्रकार है: • पूर्णिमा तिथि शुरू: 6 अक्टूबर 2025 को दोपहर 12 बजकर 23 मिनट से। • पूर्णिमा तिथि समाप्त: अगले दिन 7 अक्टूबर 2025 को सुबह 9 बजकर 16 मिनट पर। कोजागरी लक्ष्मी पूजा 2025 शुभ मुहूर्त (Kojagari Puja Shubh Muhurat) मां लक्ष्मी की पूजा के लिए निशिता काल को सबसे उत्तम माना गया है। विवरण समय स्रोत कोजागरी पूजा निशिता काल समय रात 11 बजकर 45 मिनट से देर रात 12 बजकर 24 मिनट तक। (एक अन्य स्रोत में रात 12 बजकर 34 मिनट तक बताया गया है) चंद्रोदय समय शाम 5 बजकर 27 मिनट। (एक अन्य स्रोत में शाम 5 बजकर 26 मिनट बताया गया है) Importance of Kojagari Puja: Why is night vigil performed: कोजागरी पूजा का महत्व: क्यों किया जाता है रात्रि जागरण? हिंदू धर्म में इस पूजा का अत्यधिक महत्व है। दिवाली की तरह ही, इस दिन भी मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। 1. ‘कोजागरी’ का अर्थ: हिन्दू धर्म के अनुसार, इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं और यह देखती हैं कि ‘कौन रात्रि जागरण कर रहा है’। इसी कारण इस पूजा को ‘कोजागरी’ (Kojagari) कहा गया है। 2. धन-धान्य की प्राप्ति: जो व्यक्ति इस रात जागरण करता है (रात्रि जागरण करने वाले व्यक्ति का महालक्ष्मी कल्याण करती हैं), माता लक्ष्मी उसे धन-धान्य से सम्पन्न कर देती हैं। 3. अमृत वर्षा और इंद्र पूजा: इस दिन चंद्रमा से अमृत बरसता है, इसलिए चांद की पूजा महत्वपूर्ण मानी गई है। साथ ही, माता लक्ष्मी की विधि-विधान के साथ पूजा करने के साथ ही इंद्र (Indra) की भी पूजा की जाती है, जिससे पूजा करने वाले व्यक्ति के लिए धन प्राप्ति के द्वार खुल जाते हैं। 4. खुले द्वार: भक्त इस दिन अपने घरों में मिट्टी का दीपक जलाते हैं और पूजा के दौरान दरवाजे और खिड़कियां खुली छोड़ देते हैं, ताकि लक्ष्मी जी का आगमन हो सके। Description of Kojagari fast in Skanda Purana: स्कंद पुराण में कोजागरी व्रत का वर्णन स्कंद पुराण के अनुसार, Kojagari Puja 2025 कोजागरी पूजा को एक सर्वश्रेष्ठ व्रत बताया गया है। इस व्रत का विधिवत पालन करने से एक साधारण प्राणी भी उत्तम गति प्राप्त करता है, और इस जन्म तथा दूसरे जन्मों में भी ऐश्वर्य, आरोग्य एवं पुत्र-पौत्रादि का आनन्द भोगता है। Eight forms of Goddess Lakshmi:मां लक्ष्मी के आठ स्वरूप Kojagari Puja 2025 कोजागरी पूजा के दौरान माता लक्ष्मी के आठ स्वरूपों का ध्यान करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। ये आठ स्वरूप हैं: धनलक्ष्मी, धन्य लक्ष्मी, राजलक्ष्मी, वैभवलक्ष्मी, ऐश्वर्य लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, कमला लक्ष्मी और विजय लक्ष्मी। Mantra to get the blessings of Mahalakshmi:महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए मंत्र Kojagari Puja 2025: कोजागरी पूजा के दिन मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए इन मंत्रों का जप करना अत्यंत फलदायी होता है: 1. श्री लक्ष्मी बीज मंत्र ॐ श्री ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नमः।। 2. लक्ष्मी प्रार्थना मंत्र नमस्ते सर्वगेवानां वरदासि हरे: प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां या सा मे भूयात्वदर्चनात्।। 3. श्री लक्ष्मी महामंत्र ॐ श्रीं ल्कीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा।।

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Padmanabha Dwadashi 2025

Padmanabha Dwadashi 2025 Date: पद्मनाभ द्वादशी तिथि, महत्व, और भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा विधि

Padmanabha Dwadashi 2025 Mein Kab Hai: हिंदू धर्म में द्वादशी तिथि का अत्यंत आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है। द्वादशी चंद्र कैलेंडर के प्रत्येक पखवाड़े का बारहवां दिन होता है। यह तिथि एकादशी के उपवास और आध्यात्मिक अभ्यासों के ठीक बाद आती है, और इसे उपवास अनुष्ठानों और पूजा को पूरा करने के लिए एक अत्यंत शुभ दिन माना जाता है। Padmanabha Dwadashi 2025 द्वादशी को अक्सर भगवान विष्णु से जोड़ा जाता है, जिन्हें ब्रह्मांड का संरक्षक माना जाता है। भक्त दिव्य आशीर्वाद, आध्यात्मिक शुद्धि, और व्यक्तिगत विकास के लिए इस दिन विभिन्न अनुष्ठान और प्रार्थना करते हैं। Spiritual and physical importance of Padmanabha Dwadashi 2025 :द्वादशी का आध्यात्मिक और शारीरिक महत्व Padmanabha Dwadashi 2025: द्वादशी का पालन करने से व्यक्ति को कई आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं। 1. एकादशी व्रत की पूर्णता द्वादशी एकादशी व्रत (उपवास) के समापन का दिन होता है और उपवास तोड़ने के लिए इसे अत्यधिक शुभ माना जाता है। उपवास तोड़ने का सही समय, जिसे पारण कहा जाता है, Padmanabha Dwadashi 2025 द्वादशी पर सूर्योदय के बाद और धार्मिक ग्रंथों द्वारा निर्दिष्ट समय के दौरान करना आवश्यक है। यह एकादशी के आध्यात्मिक लाभों को बनाए रखता है। 2. दैवीय कृपा और शुद्धि द्वादशी का पालन करने से आध्यात्मिक शुद्धि की भावना आती है, क्योंकि एकादशी का आत्म-अनुशासन और आत्म-नियंत्रण इस दिन आगे बढ़ता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से शांति, सुरक्षा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। 3. दान और करुणा का भाव द्वादशी दान और करुणा का दिन भी है। इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े या दान देने से सद्भाव, दयालुता और निस्वार्थता के मूल्यों को बढ़ावा मिलता है। द्वादशी पर किए गए ऐसे कार्य धन्य और लाभकारी माने जाते हैं। 4. शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्पष्टता उपवास करने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है। द्वादशी उपवास मन और शरीर को सामंजस्य बिठाने में मदद करता है। यह मानसिक स्पष्टता और बेहतर एकाग्रता को भी बढ़ावा देता है, जिससे ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यासों पर बेहतर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। 5. मोक्ष की ओर मार्ग मान्यता है कि द्वादशी पर उपवास और भक्ति का ईमानदारी से अभ्यास करने वाले लोग चेतना की उच्च अवस्था प्राप्त कर सकते हैं और मोक्ष (मुक्ति) की ओर अपना मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। Padmanabha Dwadashi 2025: Worship of special form of Lord Vishnu:पद्मनाभ द्वादशी 2025: भगवान विष्णु के विशेष स्वरूप की पूजा Padmanabha Dwadashi 2025: पद्मनाभ द्वादशी आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मनाई जाती है। यह पापांकुशा एकादशी (Pasankusa Ekadasi) के ठीक अगले दिन होती है। पद्मनाभ द्वादशी का महत्व:Importance of Padmanabha Dwadashi यह व्रत श्री हरि विष्णु के अनंत पद्मनाभ स्वरूप को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार, चातुर्मास में जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं, Padmanabha Dwadashi 2025 तब आने वाली द्वादशी को पद्मनाभ द्वादशी कहा जाता है। चातुर्मास के दौरान श्री हरि क्षीरसागर में शयन करते हैं, और भगवान विष्णु की इसी विश्राम अवस्था को पद्मनाभ कहा जाता है। पद्मनाभ का अर्थ कमल भी है, क्योंकि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने विष्णु की नाभि-कमल से उत्पन्न होकर सृष्टि की रचना की थी। लाभ: जो व्यक्ति पद्मनाभ द्वादशी पर भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। Padmanabha Dwadashi 2025 इस व्रत के प्रभाव से जीवन में धन-संपदा और वैभव की कमी नहीं होती है। विशेष पूजन से निर्धन भी अमीर बन जाते हैं और नि:संतानों को संतान सुख प्राप्त होता है। पद्मनाभ द्वादशी 2025 तिथि: पद्मनाभ व्रत 2025 की तिथि 4 अक्टूबर है। पद्मनाभ द्वादशी पूजा विधि (Puja Vidhi) पद्मनाभ द्वादशी पर विधि-विधान से पूजा की जाती है। यहां पूजा की चरण-दर-चरण विधि दी गई है: 1. स्थापना: घर की पूर्व दिशा में एक लाल कपड़े पर भगवान पद्मनाभ का चित्र स्थापित करें। 2. कलश स्थापना: एक पीतल का कलश स्थापित करें। इस कलश में जल, रोली, और सिक्के डालें। कलश के मुख पर अशोक के पत्ते रखें और उस पर नारियल रखें, फिर विधिवत पूजन करें। 3. पूजा सामग्री: गाय के घी (गौघृत) का दीपक जलाएं, गुलाब की अगरबत्ती जलाएं, चंदन और लाल फूल चढ़ाएं। 4. भोग: गेहूं और गुड़ के दलिए का भोग लगाएं। 5. तुलसी अर्पण: 12 तुलसी पत्र चढ़ाएं। 6. मंत्र जाप: लाल चंदन की माला से इस विशेष मंत्र का 108 बार जाप करें: ॐ पद्मनाभाय नम:।। 7. प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद दलिए का प्रसाद वितरित करें। Devi Skandmata: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती द्वादशी पर क्या करें और क्या न करें (Do’s and Don’ts) द्वादशी के दिन आध्यात्मिक लाभों को अधिकतम करने के लिए कुछ आचार संहिता का पालन करना महत्वपूर्ण है: क्या करें (Do’s) क्या न करें (Don’ts) एकादशी व्रत का पारण सही समय पर करें। भोजन में अति-लिप्तता से बचें; सादा, शाकाहारी भोजन करें। भारी, मसालेदार या तैलीय भोजन से बचें। भगवान विष्णु की पूजा करें, मंदिर जाएं या घर पर शांतिपूर्ण स्थान पर पूजा करें। मांसाहारी भोजन और शराब का सेवन न करें। तुलसी के पौधे की पूजा करें (जल चढ़ाएं और दीपक जलाएं)। नकारात्मक विचार या कार्य (जैसे गपशप या बहस) से बचें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें या सुनें। तुलसी के पत्ते न काटें या तोड़ें। दान-पुण्य करें, जैसे जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, या धन दान करना। दिन में सोने से बचें, क्योंकि इससे आध्यात्मिक योग्यता कम हो सकती है। साफ और हल्के रंग के कपड़े पहनें। पैसे उधार देने या लेने जैसे वित्तीय लेनदेन से बचें।

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Shri Chamundeshvari Mangalam:श्रीचामुण्डेश्वरीमङ्गलम्

Shri Chamundeshvari Mangalam:श्रीचामुण्डेश्वरीमङ्गलम् श्रीशैलराजतनये चण्डमुण्डनिषूदिनि । मृगेन्द्रवाहने तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १॥ पञ्चविंशति सालाढ्य श्रीचक्रपुरनिवासिनि । बिन्दुपीठस्थिते तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २॥ राजराजेश्वरि श्रीमद्कामेश्वरकुटुम्बिनि । युगनाथ तते तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३॥ महाकालि महालक्ष्मि महावाणि मनोन्मणि । योगनिद्रात्मके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ४॥ मन्त्रिणि दण्डिनि मुख्ययोगिनि गणसेविते । भण्डदैत्यहरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ५॥ निशुम्भमहिषाशुम्भेरक्तबीजादिमर्दिनि । महामाये शिवे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ६॥ कालरात्रि महादुर्गे नारायणसहोदरि । विन्ध्याद्रिवासिनि तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ७॥ चन्द्रलेखालसत्पाले श्रीमत्सिंहासनेश्वरि । कामेश्वरि नमस्तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ८॥ प्रपञ्चसृष्टिरक्षादि पञ्चकार्यधुरन्धरे । पञ्चप्रेतासने तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ९॥ मधुकैटभसंहर्त्रि कदम्बवनवासिनि । महेन्द्रवरदे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १०॥ निगमागमसंवेद्ये श्रीदेवि ललिताम्बिके । ओढ्याणपीठगदे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ११॥ पुण्ड्रेक्षुखण्डकोदण्डपुष्पकण्ठलसत्करे । सदाशिवकले तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १२॥ कामेशभक्तमाङ्गल्य श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरि । सूर्याग्नीन्दुत्रिलोचनि (नित्यं) चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १३॥ चिदग्निकुण्डसम्भूते मूलप्रकृति(स्व)रूपिणि । कन्दर्पदीपके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १४॥ महापद्माटवीमध्ये सदानन्दविहारिणि । पाशाङ्कुशधरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १५॥ सर्वदोषप्रशमनि सर्वसौभाग्यदायिनि । सर्वसिद्धिप्रदे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १६॥ सर्वमन्त्रात्मिके प्राज्ञे सर्वयन्त्रस्वरूपिणि । सर्वतन्त्रात्मिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १७॥ सर्वप्राणिहृदावासे सर्वशक्तिस्वरूपिणि । सर्वाभिष्टप्रदे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १८॥ वेदमातः महाराज्ञि लक्ष्मि वाणि वसुप्रिये । त्रैलोक्यवन्दिते तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १९॥ ब्रह्मोपेन्द्रसुरेन्द्रादि सम्पूजितपदाम्बुजे । सर्वायुधकरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २०॥ महाविद्यासम्प्रदात्रि संवेद्यनिजवैभवे । सर्वमुद्राकरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २१॥ एकपञ्चाशते पीठे निवासात्मविलासिनि । अपारमहिमे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २२॥ तेजोमयि दयापूर्णे सच्चिदानन्दरूपिणि । सर्ववर्णात्मिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २३॥ हंसारूढे चतुर्वक्त्रे ब्राह्मीरूपसमन्विते । धूम्राक्षसहन्त्रिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २४॥ माहेस्वरीस्वरूपे पञ्चास्ये वृषभवाहने । सुग्रीवपञ्चिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २५॥ मयूरवाहे षट्वक्त्रे कौमारीरूपशोभिते । शक्तियुक्तकरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २६॥ पक्षिराजसमारूढे शङ्खचक्रलसत्करे । वैष्णवीसंज्ञिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २७॥ वाराहि महिषारूढे घोररूपसमन्विते । दंष्ट्रायुधधरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २८॥ गजेन्द्रवाहनारुढे इन्द्राणीरूपवासुरे । वज्रायुधकरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २९॥ चतुर्भुजे सिंहवाहे जटामण्डिलमण्डिते । चण्डिके सुभगे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३०॥ दंष्ट्राकरालवदने सिंहवक्त्रे चतुर्भुजे । नारसिंहि सदा तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३१॥ ज्वलज्जिह्वाकरालास्ये चण्डकोपसमन्विते । ज्वालामालिनि तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३२॥ भृङ्गिणे दर्शितात्मीयप्रभावे परमेश्वरि । नानारूपधरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३३॥ गणेशस्कन्दजननि मातङ्गि भुवनेश्वरि । भद्रकालि सदा तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३४॥ अगस्त्याय हयग्रीव प्रकटीकृतवैभवे । अनन्ताख्यसुते तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३५॥ ॥ इति श्रीचामुण्डेश्वरीमङ्गलं सम्पूर्णम् ॥

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Devi Skandmata

Devi Skandmata: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Devi Skandmata मां दुर्गा का दूसरा रूप हैं और माना जाता है कि वे अपने भक्तों की रक्षा करती हैं, जैसे एक मां अपने बच्चे को नुकसान से बचाती है। Devi Skandmata एक शक्तिशाली देवी हैं जिनके प्यार और देखभाल ने भगवान कार्तिकेय को राक्षस तारकासुर को हराने में मदद की। भगवान शिव और मां पार्वती के पहले पुत्र, भगवान कार्तिकेय को “स्कंद” के नाम से भी जाना जाता था। इसलिए, माँ पार्वती को अक्सर स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ कार्तिकेय या स्कंद की माँ है। नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि बुद्ध ग्रह देवी स्कंदमाता द्वारा शासित हैं। Devi Skandmata का स्वरुप देवी स्कंदमाता क्रूर सिंह पर विराजमान हैं। वह बच्चे मुरुगन को गोद में उठाती हैं। भगवान मुरुगन को कार्तिकेय और भगवान गणेश के भाई के रूप में भी जाना जाता है। देवी स्कंदमाता को चार हाथों से चित्रित किया गया है। वह अपने ऊपर के दोनों हाथों में कमल के फूल लिए हुए हैं। वह अपने एक दाहिने हाथ में मुरुगन को रखती है और दूसरे को अभय मुद्रा में रखती है। वह कमल के फूल पर विराजमान हैं और इसी वजह से स्कंदमाता को देवी पद्मासन के नाम से भी जाना जाता है। देवी स्कंदमाता का रंग शुभ्रा (शुभ्र) है जो उनके सफेद रंग का वर्णन करता है। देवी पार्वती के इस रूप की पूजा करने वाले भक्तों को भगवान कार्तिकेय की पूजा का लाभ मिलता है। यह गुण केवल देवी पार्वती के स्कंदमाता रूप में है। Skanda Mata Puja Vidhi: नवरात्रि 5वें दिन स्कंदमाता पूजन विधि, मंत्र, आरती और प्रसाद का महत्व Devi Skandmata Mantra:देवी स्कंदमाता मंत्र ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥ Om Devi Skandamatayai Namah॥ goddess skandamata prayer:देवी स्कंदमाता प्रार्थना सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥ Simhasanagata Nityam Padmanchita Karadvaya।Shubhadastu Sada Devi Skandamata Yashasvini॥ Devi Skandmata Stuthi:स्तुति या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Ma Skandamata Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ देवी स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय को अपनी दाहिनी भुजा में पकड़े हुए दिखाई देती हैं Devi Skandmata Dyan:देवी स्कंदमाता ध्यान वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्विनीम्॥ धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पञ्चम दुर्गा त्रिनेत्राम्।अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल धारिणीम्॥ प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् पीन पयोधराम्।कमनीयां लावण्यां चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhita Kamarthe Chandrardhakritashekharam।Simharudha Chaturbhuja Skandamata Yashasvinim॥ Dhawalavarna Vishuddha Chakrasthitom Panchama Durga Trinetram।Abhaya Padma Yugma Karam Dakshina Uru Putradharam Bhajem॥ Patambara Paridhanam Mriduhasya Nanalankara Bhushitam।Manjira, Hara, Keyura, Kinkini, Ratnakundala Dharinim॥ Praphulla Vandana Pallavadharam Kanta Kapolam Pina Payodharam।Kamaniyam Lavanyam Charu Triwali Nitambanim॥ Devi Skandmata Stotra:देवी स्कंदमाता स्तोत्र नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।समग्रतत्वसागरम् पारपारगहराम्॥ शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रदीप्ति भास्कराम्॥ महेन्द्रकश्यपार्चितां सनत्कुमार संस्तुताम्।सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलाद्भुताम्॥ अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।मुमुक्षुभिर्विचिन्तितां विशेषतत्वमुचिताम्॥ नानालङ्कार भूषिताम् मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेदमार भूषणाम्॥ सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्र वैरिघातिनीम्।शुभां पुष्पमालिनीं सुवर्णकल्पशाखिनीम्॥ तमोऽन्धकारयामिनीं शिवस्वभावकामिनीम्।सहस्रसूर्यराजिकां धनज्जयोग्रकारिकाम्॥ सुशुध्द काल कन्दला सुभृडवृन्दमज्जुलाम्।प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरम् सतीम्॥ स्वकर्मकारणे गतिं हरिप्रयाच पार्वतीम्।अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥ पुनः पुनर्जगद्धितां नमाम्यहम् सुरार्चिताम्।जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवी पाहिमाम्॥ Namami Skandamata Skandadharinim।Samagratatvasagaram Paraparagaharam॥ Shivaprabha Samujvalam Sphuchchhashagashekharam।Lalataratnabhaskaram Jagatpradipti Bhaskaram॥ Mahendrakashyaparchita Sanantakumara Samstutam।Surasurendravandita Yatharthanirmaladbhutam॥ Atarkyarochiruvijam Vikara Doshavarjitam।Mumukshubhirvichintitam Visheshatatvamuchitam॥ Nanalankara Bhushitam Mrigendravahanagrajam।Sushuddhatatvatoshanam Trivedamara Bhushanam॥ Sudharmikaupakarini Surendra Vairighatinim।Shubham Pushpamalinim Suvarnakalpashakhinim॥ Tamoandhakarayamini Shivasvabhavakaminim।Sahasrasuryarajikam Dhanajjayogakarikam॥ Sushuddha Kala Kandala Subhridavrindamajjulam।Prajayini Prajawati Namami Mataram Satim॥ Swakarmakarane Gatim Hariprayacha Parvatim।Anantashakti Kantidam Yashoarthabhuktimuktidam॥ Punah Punarjagadditam Namamyaham Surarchitam।Jayeshwari Trilochane Prasida Devi Pahimam॥ Devi Skandmata Kavach:देवी स्कंदमाता कवच ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मधरापरा।हृदयम् पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥ श्री ह्रीं हुं ऐं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।सर्वाङ्ग में सदा पातु स्कन्दमाता पुत्रप्रदा॥ वाणवाणामृते हुं फट् बीज समन्विता।उत्तरस्या तथाग्ने च वारुणे नैॠतेअवतु॥ इन्द्राणी भैरवी चैवासिताङ्गी च संहारिणी।सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥ Aim Bijalinka Devi Padayugmadharapara।Hridayam Patu Sa Devi Kartikeyayuta॥ Shri Hrim Hum Aim Devi Parvasya Patu Sarvada।Sarvanga Mein Sada Patu Skandamata Putraprada॥ Vanavanamritem Hum Phat Bija Samanvita।Uttarasya Tathagne Cha Varune Nairiteavatu॥ Indrani Bhairavi Chaivasitangi Cha Samharini।Sarvada Patu Mam Devi Chanyanyasu Hi Dikshu Vai॥ Devi Skandmata Aarti:देवी स्कंदमाता आरती जय तेरी हो स्कन्द माता। पांचवां नाम तुम्हारा आता॥सबके मन की जानन हारी। जग जननी सबकी महतारी॥तेरी जोत जलाता रहूं मैं। हरदम तुझे ध्याता रहूं मै॥कई नामों से तुझे पुकारा। मुझे एक है तेरा सहारा॥कही पहाड़ों पर है डेरा। कई शहरों में तेरा बसेरा॥हर मन्दिर में तेरे नजारे। गुण गाए तेरे भक्त प्यारे॥भक्ति अपनी मुझे दिला दो। शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो॥इन्द्र आदि देवता मिल सारे। करे पुकार तुम्हारे द्वारे॥दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए। तू ही खण्ड हाथ उठाए॥दासों को सदा बचाने आयी। भक्त की आस पुजाने आयी॥

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Skanda Mata

Skanda Mata Puja Vidhi: नवरात्रि 5वें दिन स्कंदमाता पूजन विधि, मंत्र, आरती और प्रसाद का महत्व

Skanda Mata Puja Vidhi: नवरात्र के पांचवें दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की उपासना की जाती है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम दिया गया है। भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं। Skanda Mata ki Puja Kese Kare:  नवरात्रि की पंचमी तिथि को मां दुर्गा के पंचम स्वरूप माता स्कंदमाता की पूजा का विधान है। मान्यता है कि यह मां अपने भक्तों पर स्नेह लुटाती हैं। Skanda Mata Puja Vidhi मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना करने से नकारात्मक शक्तियों दूर होती हैं और कार्यों की विघ्न-बाधा भी खत्म होती है। मां दुर्गा के पंचम स्वरूप स्कंदमाता की पूजा नवरात्रि की पंचमी तिथि पर की जाती है। Skanda Mata स्कंदमाता की भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करने व व्रत करने से जातक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान कार्तिकेय की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस स्वूप को स्कंदमाता का नाम मिला। जानें मां स्कंदमाता की पूजा विधि, भोग, मंत्र व आरती। मां स्कंदमाता का स्वरूप- Skanda Mata मां स्कंदमाता के स्वरूप की बात करें तो मां की गोद में स्कंद देव विराजमान हैं। मां कमल के आसन पर विराजमान हैं, जिसके कारण मां स्कंदमाता को पद्मासना देवी भी कहा जाता है। Skanda Mata मां का वाहन सिंह है। मान्यता है कि मां भगवती के पंचम स्वरूप की उपासना करने से संतान संबंधी परेशानियां दूर होती हैं। स्कंदमाता पूजा विधि– इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मां स्कंदमाता को गंगाजल से स्नान कराएं। चुनरी व वस्त्र आदि अर्पित करें। रोली, कुमकुम आदि लगाएं। Skanda Mata इसके बाद मां को मिठाई व फलों का भोग लगाएं। मां की आरती करें। स्कंदमाता का प्रिय भोग- मान्यता है कि मां स्कंदमाता को केले का भोग अतिप्रिय है। Skanda Mata आप माता रानी को खीर का भोग भी लगा सकते हैं। स्कंदमाता का प्रिय रंग- नवरात्रि के पांचवें दिन का शुभ रंग पीला व सफेद है। मां की पूजा के समय श्वेत रंग या पीले रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं। Skanda Mata:स्कंदमाता का मंत्र या देवी सर्वभूतेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः Skandmata Aarti:स्कंदमाता की आरती जय तेरी हो स्कंद माता, पांचवां नाम तुम्हारा आता। सबके मन की जानन हारी, जग जननी सबकी महतारी। तेरी ज्योत जलाता रहू मैं, हरदम तुझे ध्याता रहू मैं। कई नामों से तुझे पुकारा, मुझे एक है तेरा सहारा। कहीं पहाड़ों पर है डेरा, कई शहरों में तेरा बसेरा। हर मंदिर में तेरे नजारे, गुण गाए तेरे भक्त प्यारे। भक्ति अपनी मुझे दिला दो, शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो। इंद्र आदि देवता मिल सारे, करे पुकार तुम्हारे द्वारे। दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए, तू ही खंडा हाथ उठाए। दासों को सदा बचाने आयी, भक्त की आस पुजाने आयी। कैसे करें पूजन: How to Worship सबसे पहले चौकी (बाजोट) पर स्कंदमाता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें।  चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर कलश रखें। उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी), सप्त घृत मातृका (सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) की स्थापना भी करें।  इसके बाद व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा स्कंदमाता सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें।  इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। तत्पश्चात प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें। Skanda Mata Puja Vidhi:स्कंदमाता के मंत्र मां स्कंदमाता का वाहन सिंह है। इस मंत्र के उच्चारण के साथ मां की आराधना की जाती है।  सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥ ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥ संतान प्राप्ति हेतु जपें स्कंद माता का मंत्र पंचमी तिथि की अधिष्ठात्री देवी स्कन्द माता हैं। जिन व्यक्तियों को संतानाभाव हो, वे माता की पूजन-अर्चन तथा मंत्र जप कर लाभ उठा सकते हैं। मंत्र अत्यंत सरल है – ‘ॐ स्कन्दमात्रै नम:।।’ निश्चित लाभ होगा। इसके अतिरिक्त इस मंत्र से भी मां की आराधना की जाती है: या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। भोग एवं प्रसाद – पंचमी तिथि के दिन पूजा करके भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है। Durga Puja 2025 Date And Time :दुर्गा पूजा 2025 कब से होगी शुरू? जानें महत्वपूर्ण तिथियां, घटस्थापना मुहूर्त और पूजा विधि

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Maa Durga

Sapne Mein Maa Durga ko Dekhna: सपने में मां दुर्गा को देखना: शुभ या अशुभ? जानें क्या कहता है स्वप्न शास्त्र

Sapne Mein Maa Durga ko Dekhna: क्या आपने कभी सपने में मां दुर्गा के दर्शन किए हैं? स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने हमारे वास्तविक जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं और भविष्य में होने वाली घटनाओं, Maa Durga चाहे वे शुभ हों या अशुभ, की एक झलक दिखा सकते हैं। चिकित्सा शास्त्र भले ही सपनों को मन की गतिविधियों का परिणाम मानता हो, लेकिन स्वप्न शास्त्र हर सपने का एक अलग मतलब बताता है। मां दुर्गा से संबंधित सपने भी शुभ या अशुभ संकेत दे सकते हैं। आइए जानते हैं कि सपने में मां दुर्गा को अलग-अलग रूपों में देखने का क्या मतलब होता है: सपने में मां दुर्गा के शुभ संकेत:Auspicious signs of Maa Durga in dreams अगर आपको सपने में मां दुर्गा इन रूपों में दिखाई देती हैं, तो यह आपके लिए अच्छा संकेत हो सकता है: सपने में मां दुर्गा की मूर्ति देखना: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में Sapne Mein Maa Durga ko Dekhna मां दुर्गा की मूर्ति देखना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह संकेत देता है कि आपके जीवन में चल रही कई परेशानियों से छुटकारा मिलने वाला है। आपको मानसिक और शारीरिक समस्याओं से निजात मिल सकती है। इसके साथ ही, नौकरी और व्यापार में अपार सफलता के साथ धन लाभ मिलने के भी आसार होते हैं। व्यापारियों को नई डील्स मिल सकती हैं जिनमें मुनाफा होने की संभावना है। सपने में मां दुर्गा का मंदिर देखना: सपने में मां दुर्गा का मंदिर देखना भी बहुत शुभ माना जाता है। Maa Durga यह दर्शाता है कि आपकी लंबे समय से चली आ रही इच्छाएं अब पूरी हो सकती हैं। जीवन के कई क्षेत्रों में आपको लाभ मिल सकता है और विभिन्न प्रकार की मुश्किलों से छुटकारा मिलेगा। यह माता रानी की कृपा का संकेत भी होता है। सपने में मां दुर्गा की आरती करते देखना: यदि आप सपने में खुद को मां दुर्गा की आरती करते हुए देखते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी कोई बड़ी समस्या का समाधान होने वाला है। यह आशा की एक नई किरण पैदा करता है Maa Durga और संकेत देता है कि आप भविष्य में सफलता की ओर बढ़ेंगे। व्यापार, नौकरी और विवाह जैसे क्षेत्रों में भी आपको लाभ मिलने के आसार हैं। •सपने में शेर पर सवार मां दुर्गा को देखना: सपने में मां दुर्गा को शेर पर सवार देखना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह संकेत है कि आपके अच्छे दिन शुरू होने वाले हैं। आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और भविष्य भी बेहतर हो सकता है। आपको शुभ समाचार भी मिल सकते हैं। मां दुर्गा को लाल वस्त्र में देखना: अगर कोई व्यक्ति मां दुर्गा को लाल वस्त्र में देखता है, तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार यह बहुत शुभ होता है। इसका मतलब है कि आपका भविष्य अच्छा होने वाला है और तरक्की के द्वार खुल सकते हैं। Maa Durga रिश्तों में मधुरता बढ़ेगी और आपको उन्नति व तरक्की मिलने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। संतान पक्ष की ओर से भी खुशी की प्राप्ति हो सकती है। जिन लोगों की शादी नहीं हुई है, उन्हें विवाह के प्रस्ताव भी आ सकते हैं। सपने में श्रृंगार किये माता को देखना: सपने में श्रृंगार की हुई माता रानी को देखना शुभ माना जाता है। इसका अर्थ है कि आपके जीवन में खुशियां आने वाली हैं और सकारात्मकता का वास होगा। आने वाले समय में आपको कोई अच्छी खबर मिल सकती है। वहीं, शादीशुदा लोगों की समस्याएं भी दूर हो सकती हैं। Durga Panchami 2025 Start Date: दुर्गा पूजा 2025: कब से शुरू होगी यह महापर्व, जानें शुभ तिथियां और महत्व  सपने में मां दुर्गा के अशुभ संकेत:Inauspicious signs of Maa Durga in dreams सभी सपने शुभ नहीं होते। कुछ सपने ऐसे भी होते हैं जो आपको भविष्य की चुनौतियों या समस्याओं के प्रति सचेत करते हैं: सपने में मां दुर्गा को दुखी या रोते हुए देखना: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में मां दुर्गा को दुखी या रोते हुए देखना अशुभ माना जाता है। यह संकेत देता है कि आपको कार्य क्षेत्र या व्यापार में हानि हो सकती है। Sapne Mein Maa Durga ko Dekhna किसी अपने से धोखा मिलने की संभावना है। पैसों की तंगी बढ़ सकती है, जिससे कर्ज लेने तक की नौबत आ सकती है। इसके साथ ही, पारिवारिक कलह भी बढ़ सकता है। अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिषियों, पंचांग, प्रवचनों, मान्यताओं, धर्मग्रंथों और दंतकथाओं पर आधारित है। KARMASU.IN इस जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं देते हैं और न ही इसे अंतिम सत्य या दावा मानते हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। किसी भी तरह के उपयोग से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

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Durga Puja 2025

Durga Puja 2025 Date And Time :दुर्गा पूजा 2025 कब से होगी शुरू? जानें महत्वपूर्ण तिथियां, घटस्थापना मुहूर्त और पूजा विधि

Durga Puja 2025 Mein Kab suru hogi: हिंदू धर्म में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रि के दौरान मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा विशेष रूप से पूर्वी भारत में, खासकर बंगाल, ओडिशा और असम में बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाई जाती है। इस पर्व को दुर्गोत्सव के नाम से भी जाना जाता है और यह देवी दुर्गा की पूजा का एक प्रमुख त्योहार है। यह अवधि नवदुर्गाओं की उपासना के लिए उत्तम मानी गई है। देवी दुर्गा का धरती पर आगमन देवी पक्ष के पहले दिन होता है और Durga Puja 2025 दुर्गा विसर्जन के दिन वह प्रस्थान करती हैं। मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान वाले दिन महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि इन दिनों से आने वाले समय का अनुमान किया जाता है और यह माना जाता है कि मां के आगमन और प्रस्थान से भविष्य में शुभ और अशुभ स्थितियों का संकेत मिलता है। आइए, जानते हैं साल 2025 में दुर्गा पूजा और शारदीय नवरात्रि से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण तिथियां, घटस्थापना मुहूर्त और पूजा सामग्री के बारे में: Shardiya Navratri 2025 start and end Date: शारदीय नवरात्रि 2025: कब से कब तक? वैदिक पंचांग के अनुसार, साल 2025 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 22 सितंबर 2025, सोमवार से हो रही है, जो 1 अक्टूबर 2025, बुधवार तक चलेगी। इस बार नवरात्रि 10 दिनों की होगी, क्योंकि तृतीया तिथि दो दिन रहेगी। इस दौरान Durga Puja 2025 मां दुर्गा की पूजा और व्रत करने से साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। Durga Puja 2025: Important dates of Durga festival:दुर्गा पूजा 2025: दुर्गोत्सव की प्रमुख तिथियां Durga Puja 2025:दुर्गोत्सव पांच दिनों तक मनाया जाता है, Durga Puja 2025 जिसमें षष्ठी, महासप्तमी, महाष्टमी, महानवमी और विजयादशमी के दिन विशेष रूप से पूजे जाते हैं। Durga Puja vidhi 2025:दुर्गा पूजा की विधि क्या है? Durga Puja 2025:दुर्गा पूजा विधि में सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, फिर अपने घर के मंदिर में मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें. कलश स्थापना करें, दीप जलाकर गंगाजल छिड़कें, फिर अक्षत, सिंदूर, लाल फूल और फल-मिठाई मां को अर्पित करें. दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, और अंत में मां की आरती करके प्रसाद बांटें.  Durga Puja 2025:मुख्य पूजा विधि अतिरिक्त जानकारी Start of Durga Puja (Shashthi Tithi): 28 September 2025, Sunday:दुर्गा पूजा की शुरुआत (षष्ठी तिथि): 28 सितंबर 2025, रविवार     ◦ इस दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है।     ◦ दुर्गा पूजा की मूर्ति स्थापना के लिए यह दिन शुभ माना गया है।     ◦ मूर्ति स्थापना का उत्तम मुहूर्त: सुबह 06:08 बजे से लेकर 10:30 बजे तक।     ◦ इस दिन बिल्व निमंत्रण और पंडाल सजाने की परंपरा भी निभाई जाती है। संधि पूजा (अष्टमी तिथि): 30 सितंबर 2025, मंगलवार     ◦ संधि पूजा अष्टमी और नवमी के संधिकाल में की जाती है।     ◦ संधिकाल का मुहूर्त: रात्रि 07:36 बजे से 08:24 बजे तक।     ◦ इस समय 108 दीपों और 108 कमल पुष्पों से मां की पूजा की जाती है।     ◦ यह समय मां दुर्गा के चामुंडा रूप की आराधना के लिए अत्यंत विशेष होता है। दुर्गा विसर्जन (विजयादशमी): 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन नदियों और तालाबों में किया जाएगा। शारदीय नवरात्रि 2025: घटस्थापना का महत्व और मुहूर्त शारदीय नवरात्रि Durga Puja 2025 के पहले दिन कलश स्थापना (घटस्थापना) की जाती है। Durga Puja 2025 ऐसा माना जाता है कि कलश स्थापना में विशेष चीजों को शामिल करने से साधक को पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है और मां दुर्गा जीवन के सभी दुखों को दूर करती हैं। घटस्थापना के शुभ मुहूर्त: 22 सितंबर 2025, सोमवार को घटस्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त हैं: • पहला मुहूर्त: सुबह 6 बजकर 09 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 06 मिनट तक। • दूसरा मुहूर्त (अभिजीत मुहूर्त): 11 बजकर 49 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 38 मिनट तक। आप इन दोनों में से किसी भी मुहूर्त में घटस्थापना कर सकते हैं। Durga Panchami 2025 Start Date: दुर्गा पूजा 2025: कब से शुरू होगी यह महापर्व, जानें शुभ तिथियां और महत्व ! Shardiya Navratri 2025 Puja Samagri: घटस्थापना की सामग्री लिस्ट शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना के लिए आपको इन चीजों की आवश्यकता होगी: • अनाज, साफ जवा • कलश • गंगाजल • सुपारी, मौली, रोली • जटा वाला नारियल • आम या अशोक के पत्ते • मिट्टी का बर्तन • किसी पवित्र स्थान की मिट्टी (मंदिर आदि) • अखंड ज्योति के लिए बड़ा दीया, रुई की बाती • लाल सूत्र, सिक्का • लाल कपड़ा • फूल, फूल माला • इलायची, लौंग, कपूर • अक्षत, हल्दी इस तरह करें घटस्थापना (कलश स्थापना विधि) • सुबह स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। • इसके बाद मंदिर की साफ-सफाई करें। • कलश स्थापना के लिए घर की उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा को शुभ माना जाता है। • कलश में साफ जल भरकर उसमें सिक्का, फूल और अक्षत डालें। • इसके बाद कलश पर स्वास्तिक बनाएं और कलावा लपेट दें। • लाल चुनरी में नारियल को लपेट कर कलश के ऊपर रख दें। • देसी घी का दीपक जलाकर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करें। • व्रत कथा का पाठ करें। • फल और मिठाई का भोग लगाएं। मां दुर्गा के शक्तिशाली मंत्र मां दुर्गा की उपासना के दौरान आप इन मंत्रों का जप कर सकते हैं: • ॐ ह्रींग डुंग दुर्गायै नमः • ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै • सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।। मां दुर्गा का आह्वान मंत्र: • ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

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Kalash Sthapna

Kalash Sthapna 2025: शुभ मुहूर्त और विधान जानें !

Kalash Sthapna, जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है, नवरात्रि के नौ दिवसीय पर्व की शुरुआत का प्रतीक है। यह हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें देवी दुर्गा की ऊर्जा का आह्वान किया जाता है और उनकी दिव्य कृपा प्राप्त की जाती है। यह पवित्र अनुष्ठान वैदिक परंपराओं और नियमों के अनुसार किया जाता है। यदि आप 2025 में कलश स्थापना की योजना बना रहे हैं, तो यहां इसका शुभ मुहूर्त, प्रक्रिया और महत्व की पूरी जानकारी दी गई है। कलश स्थापना का महत्व:Importance of establishing Kalash Kalash Sthapna एक पवित्र अनुष्ठान है जो घर या मंदिर में दिव्य ऊर्जा की स्थापना का प्रतीक है। यह कलश (पवित्र घड़ा) समृद्धि, पवित्रता और देवी की उपस्थिति का प्रतीक है। यह देवी दुर्गा की उपस्थिति को दर्शाता है और उनकी दिव्य शक्ति को आमंत्रित करता है। कलश सकारात्मक ऊर्जा को संचित करता है और वातावरण से नकारात्मकता को दूर करता है। यह नवरात्रि के दौरान भक्ति और पूजा का केंद्र बनता है। Method of Kalash Establishment (Step-by-Step Process):कलश स्थापना की विधि (स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया) Kalash Sthapna करते समय मन, हृदय और वातावरण की शुद्धता आवश्यक होती है। इस प्रक्रिया को ध्यानपूर्वक करें: 1. तैयारी और शुद्धिकरण 2. कलश का चयन और स्थापना 3. देवी का आह्वान (संकल्प और मंत्र) 4. आरती और प्रार्थना अर्पण करें 5. नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजन What not to do during Kalash installation: कलश स्थापना के दौरान क्या न करें? निष्कर्ष Kalash Sthapna एक अत्यंत पवित्र और शुभ अनुष्ठान है, जो नवरात्रि की शुरुआत को दिव्यता और सकारात्मकता से भर देता है। सही विधि और शुभ मुहूर्त में इस अनुष्ठान को करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में समृद्धि, सुख और सुरक्षा मिलती है। कलश स्थापना 2025 के लिए पूरी तैयारी रखें और पूरी श्रद्धा से नवरात्रि मनाएं।

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